अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

आज देश को स्वाधीन हुए 64 साल हो रहे हैं । इस मौके पर कुछ लोग – मेरा खयाल है कि बहुत नहीं – उत्साहित हो रहे होंगे, उमंग में होंगे, प्रगति करते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहे राष्ट्र का सपना देख रहे होंगे, इत्यादि । मैं सोचता हूं कि कदाचित् अधिकांश जनों की नजर में यह दिवस औपचारिकता में मनाए जाने वाला दिन हो चुका होगा । और मेरे जैसे कुछ गिने-चुने जनों – जिन्हें आप भ्रमित या सनकी मानने में देरी नहीं करेंगे – की दृष्टि में यह अपनी सार्थकता खो चुका दिवस बनकर रह गया है । मुझे इस दिन कुछ भी नया नजर नहीं आता । कुछ ऐसा नहीं देख पाता हूं जो मुझे आशान्वित कर सके । सोचने लगता हूं कि क्या यह देश ऐसे ही चलता रहेगा ?

देश को आजाद हुए इतना समय बीत चुका है, जिसमें दो पीढ़ियां पैदा हो चुकी हैं । जिन्होंने देश को आजादी पाते देखा था उनमें से कई अब इस धरती पर नहीं रहे, और जो अभी हैं उनके अपने भविष्य के लिए इस आजादी के सार्थकता समाप्तप्राय मानी जा सकती है । स्वाधीनता की अर्थवत्ता तो उनके लिए है जिन्हें जिंदगी का सफर अभी तय करना है । क्या वे उस भारत को देख पाएंगे जिसका सपना उन लोगों ने देखा था, जिन्होंने छोटी-छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी तक कुर्बानियां दी थीं ? मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती । पिछले करीब चार दशकों से मैं इस देश के लोकतंत्र को देख रहा हूं, और इसकी गुणवत्ता में लगातार आ रही गिरावट को अनुभव करता आ रहा हूं । आज की तस्वीर वह नहीं है जिसे स्वाधीनता-संग्रामियों ने 1947 में अपने-अपने जेहन में संजोयी थी ।

कुछ लोग विभिन्न क्षेत्रों में देश की प्रगति की चर्चा करते हुए जरूर संतोष जताएंगे । वे लोग मेरे जैसे ‘वैचारिक अल्पसंख्यकों’ की सोच को बेतुकी, बेमानी, हास्यास्पद और निराधार इत्यादि कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे । वे कहेंगे कि देश ने न्यूक्लियर टेक्नालाजी (नाभिकीय तकनीकी) में महारत हासिल करके दुनिया को अपनी क्षमता दिखा दी है । उसने अपनी स्वयं की संचार सैटेलाइट एवं राकेट तकनीकी विकसित कर डाले हैं । देश अपने द्वारा विकसित मिसाइलों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हो रहा है । और इन बातों के आगे जाकर, 8-9 फीसदी आर्थिक विकास दर से बढ़ते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहा है । इस प्रकार तमाम दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए देश की स्वाधीनता एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता सिद्ध करेंगे ।

निःसंदेह इस प्रकार की उपलब्धियों का अपना महत्त्व है, जिसे मैं अस्वीकार नहीं करता । किंतु ये स्वतंत्रता की सार्थकता एवं लोकतंत्र की सफलता के आकलन के लिए उपयुक्त मापदंड नहीं माने जा सकते । स्वाधीनता संग्रामियों ने इस विचार के साथ संधर्ष नहीं किया था कि एक दिन देश सफल पोखरन विस्फोट कर पाएगा, या अग्नि मिसाइल विकसित करके अपनी क्षमता दिखा पाएगा, या चंद्रमा पर चंद्रयान उतारने में सफलता प्राप्त कर लेगा, इत्यादि । अगर देश आजाद न हुआ होता तो भी ऐसी चीजें शायद इस देश में हो जातीं, क्योंकि अंग्रेजों के लिए यह विशाल देश ऐसे वैज्ञानिक तंत्रों के विकास के लिए उपयुक्त भूक्षेत्र होता । वे अपनी सामरिक एवं संचार संबंधी आवश्यकताओं के लिए ऐसा कदाचित् करते ही, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने रेल पटरियों का जाल देश में विछाया, टेलीफोन एवं तारघरों की स्थापना की, विद्युत् आपूर्ति आंरभ की । इन सबकी शुरुआत स्वतंत्र भारत में नहीं हुई; हमने जो विरासत में पाया उसे आगे बढ़ाया । इस प्रकार के विकास कार्य विदेशी शासक भी अपने हित-साधन में अवश्य करते यह मेरी समझ कहती है । ऐसा होता या न इस बात की अहमियत उतनी नहीं जितनी वे बातें जिनका मैं जिक्र करने जा रहा हूं ।

याद रहे स्वाधीनता संघर्ष का मूल लक्ष्य था ऐसी शासकीय व्यवस्था स्थापित करना जो पूर्णतः देशवासियों के हाथ में हो, जिस पर हमारे देशवासियों का नियंत्रण हो, जो जनाकांक्षाओं के अनुरूप होतत्कालीन जननेताओं का सपना था ऐसे भारत का निर्माण करना, जहां लोगों के बीच समानता हो, लोग शिक्षित हों, जाति, धर्म एवं क्षेत्र के नाम पर सामाजिक भेदभाव न हो, न्यायिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त हो ताकि न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़े, भ्रष्टाचार न हो, राजनीति में पारदर्शिता और शुचिता हो, चिकित्सा सेवा निर्धनों को भी मिल सके, आर्थिक विषमता न्यूनतम हो, और जहां सरकारें जरूरतमंदों पर सबसे अधिक ध्यान दे । इस प्रकार के अनेकों बिंदु गिनाए जा सकते हैं जिनके आधार पर शासकीय व्यवस्था की सफलता का आकलन किया जाना चाहिए । ये वे बिंदु हैं जिनकी अहमियत आम आदमी की जिंदगी में हर क्षण बनी रहती है । चंद्रयान जैसे अभियानों से आम आदमी की जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता है ।

अवश्य ही किसी राष्ट्र के पुनर्निमाण के लिए 64 वर्ष का समय बहुत नहीं है । किंतु यह इतना समय तो है ही कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व सही दिशा में आगे वढ़ रहा है इस बात के प्रति देशवासी आश्वस्त हो पायें । क्या आज के हालात बेहतर कल का विश्वास दिला पा रहे हैं ? यह देश दो भागों में – इंडिया एवं भारत – में बंट चुका है इसे अब खुलकर कहा जाने लगा है । क्यों ? क्या देश में राजनीति में साफ-सुथरे छवि वाले नेताओं की संख्या घट नहीं रही है, और उसमें आपराधिक छवि के लोगों की संख्या क्या लगातार नहीं बढ़ रही है ? क्या जातीय, धार्मिक एवं क्षेत्रीय आधार पर लोगों को बांटकर अपने-अपने वोटबैंक बनाने की प्रवृत्ति घटने के बजाय बढ़ नही रही है ? क्या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार दिन-ब-दिन बढता नहीं जा रहा है ? क्या पुलिस बल लोगों की सहायक संस्था बनने के बजाय सत्तासीन राजनेताओं के हाथ में दमन का हथियार नहीं बन रहा है ? किसी ने सरकारी नीतियों एवं कार्यशैली का विरोध किया नहीं कि उस पर पुलिस का डंडा चल जाता है ! क्या सरकारी शिक्षा-संस्थानों की व्यवस्था चरमरा नहीं रही है, और उनकी जगह ‘प्राइवेट’ संस्थानों ने नहीं ले ली है, जो केवल पैसे वालों को शिक्षा देने और धनोपार्जन करने में विश्वास करती हैं ? क्या चिकित्सा व्यवस्था भी निजी व्यवसाय नहीं बन चका है, जिसका लाभ केवल राजनेताओं, सरकारी कर्मचारियों एवं अमीरों को मिल सकता है किंतु आम आदमी को नहीं ? उसके लिए जो अस्पताल हैं उनके हाल छिपे नहीं है ।

ये तो सवालों की बानगी है, असल में इस प्रकार के अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं और उनका उत्तर मुझे नकारात्मक और बेचैन करने वाला ही मिलता है । अगर आपको ऐसा कुछ भी नहीं लगता है, और चारों ओर अच्छा ही अच्छा नजर आता है तो मैं आपको भाग्यशाली मानता हूं । काश कि मेरी ‘वैचारिक दृष्टि’ इतनी धुंधली हो पाती कि हकीकत नजर न आ सके !

यह कैसा लोकतंत्र है इस पर गौर करिए । हमारे जनप्रतिनिधियों की विकृत सोच क्या है यह बताता हूं । कांग्रेस के नेता तो अब खुलकर कहते हैं कि आम आदमी का सोचने का अधिकार उसके वोट डालने तक ही सीमित है । उसके बाद उसकी सोच 5 साल तक जनप्रतिनिधि के हाथ गिरवी हो जाती है । क्या सही है और क्या गलत, क्या होना चाहिए और क्या नहीं, कैसे कानून बनने चाहिए और कैसे नहीं इन बातों पर अपनी राय देने का उसे अधिकार नहीं है; उसके विचारों की कोई अहमियत नहीं है । केवल प्रनिनिधि ही सोचने का अधिकार रखता है, और उसे भी अपने दल की विचारधारा के अनुसार ही मत व्यक्त करने का अधिकार है । उनके अनुसार हमारा संविधान कहता है (?) कि चुन लिए जाने के बाद समस्त अधिकार जनप्रतिनिधि को मिल जाते हैं और आम आदमी न मत व्यक्त कर सकता है न उसको लेकर विरोध प्रकट कर सकता है । सत्तासीन दल जो कहेगा उसे ही आम आदमी को अपनी राय समझनी होगी । कुल मिलाकर उसके विचारों का अपने लोकतंत्र कोई स्थान नहीं है । क्या लोकतंत्र की इसी परिभाषा प्रतिष्ठापित करने के लिए स्वाधीनता हासिल की गयी थी ?

सोचें और तनिक अपने वैचारिक ‘कोकून’ से बाहर निकलकर भी देखें । वंदे मातरम् । – योगेन्द्र जोशी

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