‘सत्यमेव जयते’ – आमिर खान का नया धारावाहिक

आम तौर पर मैं टेलिविजन कार्यक्रम नहीं देखता । बस समाचार चैनलों पर नजर दौड़ाता हूं, वह भी चाय-पानी या भोजन करते हुए । वर्षों से मैंने कोई टीवी सीरियल नहीं देखा है ।

 ‘सत्यमेव जयते’ 

किंतु आज, रविवार, 6 मई, मेरा मन हुआ कि मैं फिल्म अभिनेता आमिर खान का नितांत नया धारावाहिक ‘सत्यमेव जयते’ देख लूं; देखूं तो कि इस सीरियल में आखिर क्या है । इस सीरियल को लेकर आमिर के किसी टीवी समाचार चैनल पर प्रसारित एक साक्षात्कार के कुछ अंश मैं पहले देख-सुन चुका था, जिसमें आमिर ने यह खुलासा नहीं किया कि धारावाहिक में वह असल में क्या दिखाने जा रहे हैं । महज इस बात पर जोर था कि कुछ हटकर, कुछ नया, उसमें रहेगा । मुझे जिज्ञासा हुई कि मैं भी देखूं तो उसमें कुछ भी नया क्या है, उसमें क्या संदेश देने की आमिर ने कोशिश की है, इत्यादि ।

दरअसल आमिर को मैं लीक से हटकर कार्य करने वाला कलाकार समझता आया हूं । पिछले 20-25 वर्षों में मैंने एक या दो फिल्में देखी होंगी । इसलिए में इस काल के कलाकारों के बारे में खास कुछ जानता । चलते-चलाते जो सुनने-पढ़ने में आता है उसी पर मेरी जानकारी आधारित है । कुछ भी हो आमिर के बारे में मेरी धारणा थोड़ा हटकर ही रही है

इन आरंभिक शब्दों के बाद मैं धारावाहिक की विषयवस्तु पर लौटता हूं ।

विषयवस्तु 

निःसंदेह इसमें बहुत कुछ नया है, सामयिक एवं पीड़ाप्रद सामाजिक समस्या को धारावाहिक का मुद्दा बनाया गया है, और समाज को रचनात्मक संदेश का सार्थक प्रयास किया गया है । ‘स्टार प्लस’ पर पूर्वाह्न 11:00 से 12:30 बजे तक प्रसारित आज के प्रथम अंक (एपिसोड) में क्या था मैं इस स्थल पर उसका संक्षिप्त उल्लेख करने जा रहा हूं ।

पहले इसके नाम के बारे में । धारावाहिक का नाम ‘सत्यमेव जयते’ चुना गया है । ये शब्द हमारे संघीय सरकार के अशोक की लाट वाले प्रतीक अथवा मोहर के साथ प्रयुक्त हुए हैं । मेरा अनुमान है कि उक्त पदबंध ‘मुण्डक उपनिषद्’ के एक मंत्र का आरंभिक वाक्यांश है, किंतु वहां पर ‘जयति’ प्रयुक्त है न कि ‘जयते’, जो कि व्याकरण की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण लगता है । इस मंत्र के बारे में मैंने अन्यत्र लिखा भी है

आमिर के धारावाहिक का आज का अंक देश में इस समय प्रचलित भ्रूण हत्या पर केन्द्रित है । आमिर ने दो-तीन पीड़ित महिलाओं की व्यथा-कथा उन्हीं की जुबानी सुनाई है कि किस प्रकार उनकी सहमति के बिना उनके गर्भ इसलिए गिराए गये कि भावी संतानें कन्याएं होतीं; कैसे उन्होंने अंततः कन्याओं को जन्म दिया और परिवार (ससुराल) से अलग होकर नया जीवन आरंभ किया ।

कन्या भ्रूण हत्या

‘अल्ट्रासाउंड’ की चिकित्सकीय निदान विधि पर आधारित कन्या भ्रूण हत्या समाज के किस वर्ग में प्रमुखतया प्रचलित होगी इस बाबत आमिर ने कार्यक्रम में शामिल दर्शकों की राय जाननी चाही । लोगों का मत यही था कि यह समाज के अपेक्षया गरीब एवं अनपढ़ लोगों में अधिक प्रचलित है । आमिर ने एक शोधकर्ता के हवाले से इस धारणा का खंडन किया और बताया कि कन्या भ्रूण हत्या समाज के अपेक्षया संपन्न, उच्चशिक्षित और लब्धप्रतिष्ठ लोगों में अधिक मिलती है । आम धारणा के विपरीत अपने इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए अतिसामान्य तबके की दो-एक महिलाओं के साक्षात्कार भी प्रस्तुत किए गये कि कन्या-जन्म क्यों उनको स्वीकार्य है ।

यहां इस बात पर मैं टिप्पणी करना समीचीन समझता हूं कि समाज में एक भ्रम सदैव से व्याप्त रहा है । वह यह कि भ्रष्ट आचरण, आपराधिक प्रवृत्ति, और अशिष्ट व्यवहार आदि समाज के गरीब और अशिक्षित वर्ग में अधिक होता है । मेरे अनुभव में यह धारणा पूर्वाग्रहजनित एवं तथ्यहीन है । अभिजात लोगों के इस मत पर मुझे संस्कृत नाट्यकृति ‘मृच्छकटिकम्’ की यह उक्ति याद आती है “पापं कर्म च यत्परैरपि कृतं तत्तस्य संभाव्यते ।” अर्थात् दूसरों के पापकर्म को भी बेचारे गरीब द्वारा किया हुआ मानने में लोग नहीं हिचकिचाते हैं । भर्तृहरि नीतिशतक में भी कहा गया है “सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति”, अर्थात् सभी गुण धनवानों में ही देखे जाते हैं न कि धनहीनों में ।

आमिर ने अपने कार्यक्रम में आंकड़ों द्वारा यह भी दिखाया है कि पुरुष एवं स्त्रियों के मध्य लिंगानुपात पिछले 25 वर्षों में किस प्रकार लगातार घटता गया है, और कुछ राज्यों में तो यह 1000 पुरुषों पर लगभग 800 स्त्रियों के स्तर पर पहुंच चुका है । अल्ट्रासोनिक विधि को अपनाते हुए गर्भ में पल रही कन्या का भ्रूण गिराना दो-तीन हजार करोड़ रुपये का व्यवसाय बन चुका है इसका भी खुलासा किया गया है । देश के भौगोलिक मानचित्र के माध्यम से यह दिखाने की चेष्टा भी कार्यक्रम में की गयी है कि हरयाणा के आसपास आरंभ हुए यह व्यवसाय किस प्रकार देश के प्रायः हर कोने में फैल चुका है यह देखना चिंताजनक है । गर्भ गिराने का यह रोग उत्तराखंड (मेरा गृहराज्य) तक पहुंच गया है यह जान मुझे हैरानी हुई, जिसका मुझे अंदेशा नहीं था ।

परिवार नियोजन  से संबंध

कार्यक्रम में प्रस्तुत अधिकांश जानकारी मुझे कमोबेश पहले से थी । किंतु एक नई बात हैरान करने और कष्ट पहुंचाने वाली थी । एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ ने यह जानकारी दी कि भ्रूण हत्या का यह फैशन विगत सदी के सत्तर के दशक में चलन में आया, जब परिवार नियोजन की बात जोर-शोर से चल रही थी । परिवार नियोजन लोग अपनाना तो चाहते थे, लेकिन चाहते थे कि ऐसा कोई रास्ता हो कि लड़का ही हो न कि लड़की । हैरानी की बात यह थी कि इसकी शुरुआत सरकारी अस्पतालों से हुई जो कालांतर में विरोध के चलते हुए चोरीे-छिपे जारी रहा । बाद में इसे गैरकानूनी घोषित तो कर दिया, लेकिन यह निजी अस्पतालों में घड़ल्ले से आज तक चलता आ रहा है । कार्यक्रम में दो पत्रकारों ने यह भी स्पष्ट किया कि कैसे उन्होंने सौ-एक डाक्टरों की इस अवैधानिक व्यवसाय में संलिप्तता पर स्टिंग आपरेशन किया । राजस्थान के विभिन्न अदालतों में उनके मामले कछुआ चाल से चल रहे हैं, और उन पर निर्णय आने की फिलहाल कोई उम्मींद नहीं ।

इस घटते अनुपात के गंभीर दुष्परिणामों की ओर आमिर ने ध्यान आकर्षित किया है । एक वीडियो दिखाया गया है जिसमें हरयाणा के कुछ युवकों ने अपना दुखड़ा रोया है कि लड़कियों की अनुपलब्धता के कारण उनकी शादी नहीं हो पा रही है । यह बात भी बताई गयी है कि किस प्रकार देश के अन्य क्षेत्रों से गरीब परिवारों की लड़कियां खरीदकर राजस्थान, हरयाणा जैसे जगहों पर बेचा जा रहा है । इन लड़कियों से शादी का स्वांग भर होता है, किंतु उन्हें नौकरानी से अधिक का दर्जा नहीं मिलता है ।

आमिर का निवेदन

आमिर ने इस मुद्दे पर रचनात्मक क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी लोगों को दी है । यह बताया गया है कि कुछ सालों पहले पंजाब के नवाशहर में एक सरकारी अधिकारी (डिपुटी कमिश्नर/कलेक्टर ?) ने कन्याओं के पक्ष में मुहिम चलाई जो सफल रहा । लोग उससे जुड़ते गये और आज उसके आशाप्रद परिणाम सामने आ रहे हैं । लोगों की सोच में उल्लेखनीय अंतर आया है ।
कार्यक्रम में स्वयंसेवी संस्था ‘स्नेहालय’ की भी चर्चा की गई है, जो मां-बापों द्वारा त्यागी गई कन्याओं को अपनाता है, उनका लालन-पालन करता है । अंत में आमिर ने लोगों से स्नेहालय की मुहिम से जुड़ने की अपील की है, और उसके लिए चंदा देने की भी प्रार्थना की है । लोगों से यह भी मांग की गयी है कि वे आमिर से संपर्क साधकर राजस्थान सरकार से निवेदन करें कि ऊपर कहे गये अदालती मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाए और अपराधियों को शीघ्र सजा दिलाई जाए ।

कुल मिलाकर यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए अहमियत रखता है जो संवेदनशील हों और सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने के इच्छुक हों । ‘अरे सब चलता है’ की सोच रखने वालों के लिए यह कार्यक्रम नहीं है ।

आमिर और उनके सहयोगियों को मेरी बधाई और आगे सफलता के लिए शुभकामनाएं । योगेन्द्र जोशी

आमिर के धारावाहिक की वेबसाइट हैः satyamevjayate.in

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