लोकसभा के 60 वर्ष एवं ‘कार्टून कथा’ – वाकई सफल है अपना लोकतंत्र?

संसद के 60 वर्ष

कल रविवार 13 मई के दिन देश के दोनों सदनों की बैठक चल रही थी । संसद ने ‘सफलता पूर्वक’ 60 वर्ष पूरे कर लिए हैं । इसी उपलक्ष्य पर विशेष बैठक कल के साप्ताहिक अवकाश यानी रविवार के दिन आयोजित हुई थी । चुने गये कुछ सांसदों ने अपने-अपने उद्गार प्रस्तुत किए । दिन भर की कार्यवाही देखने-सुनने में मेरी खास दिलचस्पी नहीं थी । दो-चार सदस्यों के विचार सुन लिए, उतने से ही चर्चा का लुब्बेलुआब समझ में आ गया था । हमारा संविधान उत्कृष्टतम है और हमारा लोकतंत्र सफल है ऐसा मत कमोबेश सभी संसद-सदस्यों का था ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा था ।

संसद की कार्यवाही देख मेरे मन में प्रश्न उठता है कि अपना लोकतंत्र क्या वाकई सफल है? सफलता की कैसे व्याख्या की जानी चाहिए? देश की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था किन उद्येश्यों को पूरा करने में सफल हुई है? कुुछ सांसदों ने असफलताओं की ओर भी इशारा किया । फिर भी वे इस बात पर संतुष्ट दिखाई दिए कि तमाम कमियों के बावजूद अपना लोकतंत्र सफल है ।

सफल लोकतंत्र, वाकई?

हां, अपना लोकतंत्र सफल है इस माने में कि मतदाता निर्भीक होकर मतदान में भाग ले सकते हैं । जाति, धर्म, लिंग अथवा क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है; सबको समान अधिकार प्राप्त हैं । हमारे निर्वाचन आयोग ने अपने सांविधानिक अधिकारों और दायित्वों के अनुरूप कार्य करने में काफी हद तक सफलता पाई है । उसकी कार्यप्रणाली में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है । अवश्य ही आयोग प्रशंसा एवं शाबाशी का पात्र है । किंतु इस कार्य में राजनेताओं, विशेषकर सांसदों, की रचनात्मक भूमिका रही है ऐसा दावा करना सही नहीं होगा । संसद के माध्यम से जिस प्रकार के सुधारों की वकालत आयोग करता रहा है उनमें सांसदों ने वांछित रुचि नहीं दिखाई है । बल्कि उनका रवैया कुछ हद तक टालने या रोड़ा अटकाने की ही रही है ।

यह भी सच है कि अपना लोकतंत्र अभी तक लड़खड़ाया नहीं है । अभी इस लोकतंत्र के प्रति विद्रोह नहीं दिखाई देता है । किंतु इस संभावना से हम इंकार नहीं कर सकते हैं कि भविष्य में स्थिति बदतर हो सकती है, यदि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यकुशलता, ईमानदारी और दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता लाने के प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते हैं ।

लोगों के मतदान में रुचि लेना और निर्वाचन आयोग की सफलता को ही लोकतंत्र की सफलता का मापदंड नहीं माना जा सकता है । निर्वाचन कार्य तो लोकतांत्रिक कार्यसूची का केवल आरंभिक कदम भर होता है । उसके बाद सभी कुछ तो जनप्रतिनिधियों के दायित्व-निर्वाह पर निर्भर करता है । अगर वह संतोषप्रद न हो तब हमें सफलता पर सवाल उठाने चाहिए ।

लोकतंत्र का उद्येश्य केवल यह नहीं है कि जनता संसद में जनप्रतिनिधियों को बिठा दे । मूल आवश्यकता यह है कि वे जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में प्रयासरत हों; कि वे जनता की समस्याओं को हल करें; कि वे कुशल, समर्पित एवं संवेदनशील प्रशासन देश को दें; कि वे जनता के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें; इत्यादि । वस्तुतः इस प्रकार के कई सवाल उठाए जा सकते हैं जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जाना चाहिए । कहां खड़ा है हमारा लोकतंत्र? कुछ सवाल हैं मेरे मन में ।

मेरे सवाल-जवाब

प्रश्नः मेरा आरंभिक प्रश्न यह है कि हमारे मौजूदा सांसद (और राज्यों के स्तर पर विधायक) नैतिकता, आचरण, जनहित की चर्चा, आदि की दृष्टि से क्या उन सांसदों से बेहतर सिद्ध हो रहे हैं जो संसद के आरंभिक दौर में उसके सदस्य बने । आम जन से जो सम्मान सांसदों को तब प्राप्त था क्या उसके बराबर सम्मान आज के सांसदों को मिल रहा है? लोकतंत्र की सफलता तो तभी मानी जानी चाहिए, जब संसद बेहतर और बेहतर नजर आने के लिए प्रयत्नशील हो । क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः क्या संसद में होने वाली बहसों का स्तर पहले की तुलना में बेहतर हुआ है? क्या सांसद हर बात पर हंगामा खड़ा करने के बजाय धैर्यपूर्वक सार्थक चर्चा में भाग लेते हैं, और अपने बातों के प्रति अन्य को सहमत करने के प्रयास करते हैं? क्या वे संसद के भीतर बहुमत को समझते हैं और उसका सम्मान करते हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः संसद/विधानसभाओं में आपराधिक छवि एवं वैसी मानसिकता के सदस्यों की संख्या समय के साथ घटी है क्या? हमारे सांसद जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हैं क्या? अपनी सामूहिक छबि के प्रति क्या वे जागरूक दिखाई देते हैं क्या? अपनी ही संसद के बनाए कानूनों का वे सभी सम्मान करते हैं क्या?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनैतिक दलों में क्या आंतरिेक लोकतंत्र है? कांग्रेस पार्टी अपने 126 साल पुराने इतिहास पर गर्व करती है, किंतु वह भूल जाती है कि उसका चरित्र पिछले 4-5 दशकों में पूरी तरह बदल चुका है । अब यह पूरी तरह गांधी-नेहरु परिवार पर केंद्रित है । उसमें कभी मतभेदों के लिए जगह हुआ करती थी, किंतु आज मुुखिया ने जो कह दिया वह सबके लिए वेदवाक्य बन जाता है । पिछले 4 दशकों में जिन दलों ने जन्म लिया वे अब किसी न किसी नेता की ‘प्राइवेट कंपनी’ बन कर रह गए हैं । उनमें मुखिया की बात शिरोधार्य करना कर्तव्य समझा जाता है । चाहे डीएमके हो या एआइएडीएमके या त्रृृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, नैशनल कांफरेंस, बसपा, सपा, राजद आदि आदि, सब इसी रोग के शिकार हैं । जो दल आंतरिक लोकतंत्र से परहेज रखते हैं उनसे सफल लोकतंत्र की उम्मींद नहीं की जा सकती है । क्या मेरी बातें गलत हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधि संसद/विधानसभाओं में अपने-अपने दलों की नीतियों का समर्थन करते हैं न कि लोगों की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिनकी नुमाइंदगी का वे दावा करते हैं । वे दल द्वारा जारी ‘ह्विप’ के अधीन कार्य करते हैं न कि अपने मतदाताओं के मत के अनुसार । लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि को यह विवशता नहीं होनी चाहिए कि दल की नीति का वह समर्थन करे ही भले उसे वह नीति अनुचित लगे । क्या मैं अनुचित कह रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधियों के संसद में उपस्थित रहने और कार्यवाही में सक्रिय तथा सार्थक भागीदारी निभाने की मौजूदा तस्वीर संसद के आरंभिक दिनों की अपेक्षा बेहतर कही जा सकती है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे दायित्वों के प्रति ईमानदार, समय पर कार्य निष्पादित करने वाली, और जनता के प्रति संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करें । अलावा इसके वे भ्रष्ट, लापरवाह, कार्य टालने वाले प्रशासनिक कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक/दंडात्मक कार्यवाही करें । लेकिन हम पाते हैं कि प्रशासन में भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ता जा रहा है । इस संदर्भ में सरकारें चलाने वाले सांसदों का रवैया क्या संतोषप्रद रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे सांसदों ने कानून तो बहुत बनाए हैं? किंतु क्या उन्होंने कभी इस बात की चिंता की है कि उनका ठीक से पालन नहीं हो रहा है? त्वरित कानूनी कार्यवाही की व्यवस्था क्या बीते 60 सालों में की गयी है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः इस देश में पुलिस बल सत्तासीन राजनेताओं के इशारे पर उनकी असफलताओं के विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर डंडा चलाने का काम करती है । उनकी कार्यप्रणाली ब्रिटिश राज से भी बदतर है और उनके नियम-कानून आज भी अंग्रेजी काल के हैं । आम आदमी पुलिस बल को खौफ के नजरिये से देखता है, उसे एक मित्र संस्था के रूप में नहीं । पुलिस की छबि सुधारने के लिए सांसदों/विधायकों ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं । तब भी लोकतंत्र को सफल माना जाए?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे राजनेता सत्ता पाने और उस पर चिपके रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति करते आ रहे हैं । वे जनता की भावनाओं को उभाड़ने के लिए बेतुके और गैरजरूरी मुद्दे उठाने से नहीं हिचकते हैं । संसद में उठा ‘कार्टून’ मुद्दा इसका ताजा उदाहरण है । वे जनभावनाओं के ‘आहत’ होने की बात करते हैं, भले ही जनता को मुद्दे की जानकारी ही न हो और वह उसे तवज्जू ही न दे । ऐसा लगता है कि वे “तुम्हें आहत होना चाहिए” का संदेश फैलाकर जनभावनाओं का शोषण करते हैं और अपना वोट बैंक मजबूत करते हैं । क्या मैं गलत कर रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः आम जनता में राजनेताओं की साख गिरी है इस बात की ओर वे स्वयं यदाकदा इशारा कर जाते हैं । कौन है जिम्मेदार? गिरती हुई साख क्या सफल लोकतंत्र का संकेतक है?
उत्तरः नहीं ।

निष्कर्ष

मेरे जेहन में अभी ये सवाल उठे हैं । ऐसे तमाम अन्य सवाल पूछे जा सकते हैं, और जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जा सकता है । कुल मिलाकर मैं भारतीय लोकतंत्र को सफल नहीं कहूंगा, क्योंकि यह जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है । अवश्य ही यह ध्वस्त नहीं हो रहा है । इस बात का श्रेय जनता को जाता है जो धैर्यवान है और लोकतंत्र में आस्था रखती है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी

दो-तीन रोज पहले संविधान-लेखन से संबंधित नेहरू-आंबेदकर को लेकर तत्कालीन विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा 1949 में अंकित एक कार्टून बना हंगामा खड़ा किया था । यह कार्टून एनसीआरटी की 11-12वीं की पुस्तक में शामिल है । और यही विवाद का विषय था । अधिक जानकारी के लिए देखें ‘डेलीन्यूज’ अथवा ‘बीबीसी’, और ‘कार्टून-अकैडेमी’ । मेरी जानकारी में कार्टून यह हैः

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