आवश्यक नहीं कि न्यायिक व्यवस्था निर्दोष हो – निरपराध को मृत्युदंड का एक मामला

बीबीसी वेबसाइट पर प्रकाशित एक समाचार पढ़ने को मिला मुझे; शीर्षक था ।  “अमरीका में ‘एक निर्दोष’ को हुई मौत की सजा” ।

समाचार अमेरिका के टेक्सस राज्य में घटित एक पुराने न्यायिक मामले से जुड़ा है । सन् 1989 में कारलोस दे लूना नामक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा दी गई थी, जिसे वांदा लोपेज नाम की एक महिला की 1983 में की गई हत्या का दोषी ठहराया गया था । समाचार `द गार्जियन’ में भी पढ़ सकते हैं ।

मामले का अहम पहलू यह है कि लूना मौत की सजा दिए जाने तक यह कहता रहा कि वह निर्दोष है और असल हत्यारा कारलोस हैर्नादेज नामक व्यक्ति है । लेकिन उसके कथन को नजरअंदाज कर दिया गया ।

कारलोस दे लूना वस्तुतः निर्दोष रहा होगा इस बात का संकेत अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के विधि विभाग के एक अध्ययन से मिलता है । उक्त मामले का शैक्षिक शोध के तौर पर बारीकी से गवेषणात्मक अध्ययन प्रोफेसर जेम्स लीबमैन के मार्गदर्शन में पिछले पांच वर्षों तक बारह छात्रों ने किया गया था । पेट्रोल पंप पर कार्य करने वाली उक्त महिला की चाकू घोंपकर हत्या की गई थी । छात्रों ने पुलिस की मामले से संबंधित फाइलों को खंगाला, उपलब्ध चस्मदीदों के साक्षात्कार लिए, और मामले से जुड़े जासूसों से बात की । हत्या के बाद के 40 मिनटों के दौरान क्या-क्या घटित हुआ इस पर विशेष ध्यान दिया गया । पुलिस अधिकारियों ने कारलोस दे लूना को पास के एक ट्रक के नीचे छिपा पाया । अपने बचाव में उसके द्वारा दिए गये बयानों को दरकिनार करते हुए उसी को हत्यारा ठहरा दिया गया ।

छात्रों ने पाया कि पूरी पड़ताल में तमाम खामियां थीं । एक खामी यह थी कि चस्मदीदों के अनुसार हत्यारा घटना-स्थल से उत्तर दिशा की ओर भागा था, जब कि दे लूना पूर्व की ओर खड़े केट्र के नीचे छिपा मिला । उसके कपड़ों पर खून के निशान भी नहीं थे । छात्रों के अनुसार पुलिस ने प्रयुक्त हथियार, और मृतक के शरीर के ऊतकों (नाखून, बाल आदि) के नमूने लेने में भी चूक की थी । न ही इस बात की पर्याप्त छानबीन की कि हत्या कहीं कार्लोस हैर्नादेज ने तो नहीं की थी, जैसा कि दे लूना ने बारबार कहा । लूना के अनुसार उसने हैर्नादेज को पंप परिसर में घुसते देखा था । (वह कदाचित् हैर्नादेज को पहचानता था ।) मुकदमे के दौरान हैर्नादेज को दे लूना द्वारा हत्यारा बताए जाने को अभियोजकों ने उसकी कोरी कल्पना कहा था ।

उपर्युक्त अध्ययन में हैर्नादेज को एक खतरनाक अपराधी बताया गया है, जिसे पड़ोसी पर हमले के लिए जेल की सजा भी हो चुकी थी ।

हैर्नादेज का देहांत 1999 में एक जेल में हुआ था । दे लूना को पहले ही 1989 में मौत की सजा मिल चुकी थी । वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे ताकि वे अपनी बात रख सकें । कुल मिलाकर लगता यही है कि दे लूना को निर्दोष होने के बावजूद मौत दी गयी ।

वास्तव में न्यायप्रणाली जटिल होती है और उसमें कदम-कदम पर त्रुटियों की संभावनाएं रहती हैं । न्यायिक प्रक्रिया में अपनी-अपनी भूमिका निभाने वाले लोगों की अपनी कमजोरियां भी उसमें दोष पैदा कर सकती हैं । इसलिए अंतिम न्यायिक निर्णय सही ही होगा यह दावा करना कठिन है ।

बीबीसी के इस समाचार के साथ ही मुझे न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में भी न्यायप्रणाली संबंधी कुछ बातें पढ़ने को मिलीं । उनमें
कुछएक कारकों की चर्चा की गयी है, जिनका निर्णय-प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है । इनमें कुछ यों हैं:

आरोपी की सही-सही पहचान करने में साक्षियों की विफलता ।
आरोपी के प्रति नस्ल, जाति आदि संबंधी पूर्वाग्रह ।
आरोपी के चरित्र, सामाजिक स्थिति, आदि के आधार पर कथित अपराध को आंकना ।
इत्यादि । – योगेन्द्र जोशी

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