अपने प्रधानमंत्री – भ्रष्ट हैं, ईमानदार हैं, भ्रष्ट हैं, ईमानदार हैं, …! सच क्या है?

देशव्यापी भ्रष्टाचार

पिछले कुछ समय से सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा जोरों पर है । देश की राजनीति पर भ्रष्टाचार के काले दाग पूरी चमक के साथ लोगों को नजर आ रहे हैं । कोई भी राजनैतिक दल स्वयं को साफ और दूसरों को दागदार कहने में नहीं हिचक रहा है । इस माने में पूरी बेशर्मी छाई हुई है देश भर में । आप किसी से पूछिए कि आपकी पार्टी में भ्रष्ट नेता भरे हैं तो वह सिरे से नकार देगा, और लगे हाथ दूसरे दलों में बेईमानों का चिट्ठा खोलने बैठ जाएगा । मान लें कि आप राह चलते किसी से पूछते हैं, “जनाब, दशाश्वमेध घाट के लिए किधर से रास्ता जाता है?” (दशाश्वमेध घाट वाराणसी नगरी की उत्तरवाहिनी गंगा – उल्टी, दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित – के तट पर अवस्थित है ।) और आपको जवाब मिलता है, “कैंट रेलवे स्टेशन यहां से करीब 7 किलोमीटर है ।” आपको कैसा लगेगा? आप माथा पकड़कर चलते बनेंगे । कुछ ऐसा ही है रवैया आपने राजनेताओं का । आप उनके भ्रष्टाचार की बात पूछेंगे और वे किसी और की बात शुरू कर देंगे । सवाल का संक्षिप्त और सटीक (टु द पॉइंट) उत्तर अपने राजनेताओं से मिलने का नहीं ।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार है भी कहीं? क्या ये कोरी कल्पना तो नहीं है । बचपन में संध्याकाल के बाद जब अपने गांव में अंधेरा छा जाता था तो मेरी मां कहती थीं कि बाहर मत जाना बाघ-भालू खा जाएंगे या भूतप्रेत उठा ले जाएंगे । उस काल में मां की बातें सच लगती थीं । घर के एक कोने में बिस्तर पर दुबक कर बैठ जाते थे । बाद के वर्षों में, जब उम्र के साथ अक्ल ने भी धीमी दौड़ लगाई, तब समझ में आया कि वे डराती भर थीं । मुझे लगता है कि बस यही बात आजकल के बहुचर्चित भ्रष्टाचार के बारे में सही है । पता नहीं क्यों राजनैतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की बातें जोरशोर से उठाई जा रही हैं, जब कि आजतक दो-चार अपवादों को छोड़ कहीं कोई राजनेता अपराधी सिद्ध नहीं हो पाया । कहीं कोई साक्ष्य मिलें तब तो ! जब भी कोई तथाकथित भ्रष्ट राजनेता कुछ दिनों या हफ्तों की पिकनिक पर तिहाड़ जेल भेजा जाता है, तब वह पूरी ताकत से चीखता है कि वह निरपराध है और उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है । मैं यही देखता आ रहा हूं कि उसकी बात अंत में सही निकलती है । वह पूरे स्वास्थ्यलाभ के साथ तिहाड़ से लौटता है ।

मैं सोचता हूं कि जिस देश में यत्र तत्र सर्वत्र चमत्कार ही चमत्कार देखने को मिलते हों वहां भ्रष्टाचार की घटनाएं भी कहीं दैवी चमत्कार तो नहीं होती हैं । घटना तो होती है, लेकिन कोई मनुष्य उसे अंजाम नहीं देता है । जिस देश में छुन्नूलाल जैसा एकदम लापरवाह आदमी, जो किसी लायक न हो, श्री श्री निर्मल बाबा (जिनकी शोहरत टीवी चैनलों ने तीनों लोकों में फैला दी है) की कृपा से मुंहमांगा कुछ भी पा जाए, उस देश में असंभव-सा लगने वाला कुछ भी घटित हो सकता है । किसी की हत्या हो जाए पर कोई हत्यारा न हो, किसी युवती के साथ दुष्कर्म हो पर कोई दुष्कर्म करने वाला न हो, किसी के घर में करोड़ों की धनराशि जमा हो जाए पर उसे पता तक न चले, या ऐसी अन्य घटनाएं घट जाएं तो आश्चर्य की क्या बात है? ऐसे चमत्कार तो हो ही सकते हैं । तब किसी को जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं?

मौजूदा प्रधानमंत्री कितने ईमानदार?

अब मैं अपने सम्मानित प्रधानमंत्री की बात पर आता हूं । उनके बारे में अपनी राय मैंने अन्यत्र व्यक्त की है । दुनिया क्या कहती है, या समाचार माध्यमों के अनुसार दुनिया क्या सोचती है, इसे लेकर कुछ कहना है मुझे भी । उन्हें आज तक सर्वाधिक ईमानदार राजनेता कहा जाता रहा है । क्रांग्रेस दल में कोई बेईमान हो या न हो डा. मनमोहन सिंह तो बेईमान हो ही नहीं सकते हैं ये राग क्रांग्रेस के विरोधी जन भी अभी तक अलापते रहे हैं । यह भी कहा जाता है कि उनकी साख विदेशों में बहुत अच्छी है । लेकिन अब एक-एक कर कुछ लोग उनकी तरफ अंगुली उठाने लगे हैं । वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? कल तक तो वे भी प्रशंसक थे पर अब क्या हो गया? माननीय अण्णाजी भी उन्हें ईमानदार कहते आये हैं, लेकिन अब उन्हें भी शंका हो रही है । यह सब मुझे स्वयं में चमत्कार नजर आता है । चमत्कारों के देश में कब कौन कहां भ्रमित हो जाए यह कह पाना कठिन है ।

मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि किसकी बात सच है किसकी झूठ यह पता लगाना मरणशील मनुष्य के लिए असंभव है । पूरी स्थिति मरुभूमि में भटक रहे यात्रिक की सी है जिसे दूर कहीं जलाशय के रूप में मृग-मरीचिका के दर्शन होते हैं, लेकिन जिसके पास वह सामर्थ्य नहीं रह गयी हो कि वह उस स्थल पर जाकर स्वयं देख सके कि वह भ्रम है या यथार्थ । भ्रष्टाचार के मामले में भी हम सब भ्रम में जी रहे हैं । आप ही बताएं कि सीबीआइ जैसी संस्था कभी कहती है सच क्या है यह पता चल गया; फिर कहती है सच तो कुछ और ही है (याद करें हेमराज-आरुषी कांड)। कभी वह सच की तलाश में बर्षों इस धरती पर भटकती है और सच है कि दूर, और दूर, होता जाता है (बोफार्स का मामला याद है?)। सत्य का ज्ञान बड़े-बड़े महात्माओं तक को नहीं हो सका है, तब हम जैसे नाचीजों की बात ही क्या है ।

हमारे प्रधानमंत्री जी सदा यही कहते रहे हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता है कि कहीं कोई बेईमानी भी कर रहा है । वे तो गांधीजी के तीन बंदरों की नीति में आस्था रखते हैं – न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न हि बुरा कहो । इतना ही नहीं वे चमत्कारों में आस्था रखते होंगे ऐसा मैं मानता हूं । शासन में भ्रष्टाचार है यह तो वे स्वीकारते हैं, लेकिन साथ में यह भी मानते हैं कोई भ्रष्ट नहीं है । उनकी नजर में भ्रष्टाचार दैवी आपदा है ।

राजनैतिक संन्यास की बात

अब मीडिया में यह खबर भी आ गई है कि प्रधानमंत्री जी ने टीम अन्ना के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यदि उन पर आरोप सिद्ध हो गए तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे । उम्र को देखते हुए संन्यास तो उन्हें वैसे भी ले लेना चाहिए । दुबारा प्रधानमंत्री बनने के उनके आसार अब मुझे तो दिखते नहीं । यदि 2014 में यूपीए सत्ता में न लौट पाई तो वे प्रधानमंत्री कैसे बनेंगे? यदि संयोग से यूपीए फिर जीतकर आ गई तो अब के बारी राहुल गांधी की होगी । दोनों ही स्थितियों में कुर्सी मिलने से रही । चुनाव वे लड़ेंगे नहीं तो संन्यास ही बचा रहेगा । वैसे भी कांग्रेस के भोंपू श्री दिग्विजय सिंह चाहते हैं कि उम्रदराज लोग अब रिटायर हो जाएं ।

जहां तक उन पर लगे आरोपों का सवाल है उनकी जांच होगी भी? जांच कौन करेगा? सभी जांच एजेंसियां तो सरकार के अधीन होती हैं । सीबीआइ के हाल सभी जानते हैं । जब जांच का काम सालों-साल चलता रहे और आरोप झूठ या सच सिद्ध न हो पाएं तब आरोपी साफसुथरा होने का दावा करता रहेगा ।

“न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी ।”

समस्या इस बात की भी है कि बेईमानी की कोई स्पष्ट परिभाषा कहीं नहीं मिलती है । आप अगर घूस नहीं लेते या इसी प्रकार का कोई अवैधानिक लाभ नहीं उठाते, लेकिन उन दायित्वों का निर्वाह नहीं करते जिसे आपने स्वीकारी हैं तो आप ईमानदार हैं या नहीं? देश के जननेताओं का जवाब मौके की नजाकत पर निर्भर करता है । अपने उत्तर प्रदेश (उल्टा प्रदेश?) में पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी और अपने ‘हीरो’ की मूर्तियां पार्कों में करोड़ों रुपये में लगवाईं । मामला कोर्ट में पहुंचा तो अदालत ने कहा जब कैबिनेट ने यही निर्णय लिया है तो इसे गलत कैसे कहें । जब पार्टी में सब ‘यस मिनिस्टर’ शैली में हां में हां मिलाने वाले ठुंसे पड़े हों, आंतरिक लोकतंत्र जैसी चीज न हो, तब विरोध करेगा कौन । निष्कर्ष: ‘निर्णय एकदम सही था’ । आंख मूंदकर जहां उल्टा-सीधा होने दिया जाए वहां किसे ईमानदार कहें?

मेरी समझ में नहीं आता है कि ‘हमारे प्रधानमंत्री ईमानदार हैं’ का राग सब अलाप रहे हैं । अन्य मंत्री बेईमान हैं क्या? यदि नहीं तो अकेले प्रधानमंत्री की ही इतनी तारीफ क्यों?

मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि अपने प्रधानमंत्री को ईमानदार कहूं अथवा बेईमान । – योगेन्द्र जोशी

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