संस्कारहीनता की राह पर भारतीय समाज एवं गुवाहाटी की घटना

गुवाहाटी की घटना

पिछले दो-चार दिन से टीवी समाचार चैनलों पर अपने देशवासियों की एक बेशर्म हरकत की खबर छाई हुई है । खबर है असम राज्य के गुवाहाटी नगरी की, जहां पांच-छः दिन पहले युवाओं की भीड़ खुले आम व्यस्त राजमार्ग पर एक किशोरी/युवती को निर्वस्त्र करने या उसकी असमत लूटने की कोशिश में जुटा था ।

इसे मैं संयोग ही मानता हूं कि स्थानीय टीवी चैनल के संवाददाता एवं कैमरामैन वहां प्रकट हो गये । वे मानव-पशुओं की उस भीड़ से उस युवती को बचा तो नहीं पा रहे थे, अलबत्ता घटना की फूटेज वे जरूर बना सके । यही फूटेज देश भर में समाचार चैनलों की मुख्य खबर बन बैठी । अगर यह फूटेज न होता तो न लोगों को खबर लगती और न ही इतना हो-हल्ला मचता । और घटना सहज रूप से रफा-दफा हो गयी होती । उस भीड़ के ‘प्रमुख पात्रों’ ने सोचा नहीं होगा कि उनकी फोटो होर्डिंग पर प्रदर्शित हो जाएंगी, और उनकी गिरफ्तारी का पुलिसिया नाटक भी चल पड़ेगा ।

संबंधित संवाददाता का कहना है कि उसने पुलिस को तुरंत खबर दी थी । लेकिन भारतीय पुलिस दल से यह आशा तो की ही नहीं जा सकती है कि वह घटनास्थल पर अविलंब पहुंचे । संवाददाता का कहना था कि वह अकेले में असहाय था । उसने वारदात को अपने कैमरे में कैदकर देशवासियों को दिखाया तो । अन्यथा खबर दबकर रह जाती । इसके विपरीत एक ‘आरटीआई’ कार्यकर्ता का दावा है कि टीवी चैनल वालों के उकसाने पर ही भीड़ ने वारदात को अंजाम दिया । अब संवाददाता गौरवज्योति नियोग स्वयं आरोपों के घेरे में है ।

इस देश में कौन सच बोलता है और कौन झूठ यह कहना असंभव-सा है । कोई भी प्रमाण यहां विवादास्पद बनकर रह जाता है । भगवान ही देश का मालिक है!

समाज में फैल रही संस्कारहीनता

उक्त घटना की व्याख्या मैं इस देश में निरंतर बढ़ रही संस्कारहीनता के प्रतिबिंब के रूप में करता हूं ।
देशवासियों ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर डाला है । स्वतंत्रता का अर्थ अब स्वच्छंदता, निरंकुशता, अनुशासनहीनता लिया जाने लगा है । नियम-कानूनों का उल्लंघन, जो मर्जी आए वह कर बैठना, जब जो मन में आए बक देना, आदि लोगों का शगल बन चुका है ।

संस्कारहीन व्यक्ति समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है ।
वह सहनागरिकों को सम्मान नहीं दे सकता है ।
वह दूसरों की सुविधा-असुविधा की परवाह किए बिना अपने हित साधता है ।
मेरा काम कैसे निकले यही उसकी चिंता होती है ।
इत्यादि ।

आप दावा करेंगे कि देश में अधिकांश लोग संस्कारहीन नहीं हैं । आपकी बात अवश्य ही सच है । लेकिन जिस समाज में सौ में एक भी संस्कारहीन नहीं होना चाहिए, वहां सौ में पांच वैसे हों तो उसे कम कहेंगे क्या ? समाज को दूषित करने के लिए 50 फीसदी लोगों की जरूरत होती है क्या ? तथ्य तो यह है कि बस चंद लोग ही समाज का स्वरूप बिगाड़ने के लिए काफी होते हैं । और अपने समाज में उनकी कमी नहीं है ।

उदाहरण एक नहीं, अनेकों हैं

यह संस्कारहीनता हमारे सामाजिक जीवन में अलग-अलग रूपों में उजागर हो रही है । कहीं वह अपेक्षया महत्वहीन घटना को जन्म दे रही है, तो कहीं अपने को बेहद घिनौनी सूरत में पेश कर रही है । देश इस समय भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा है तो वह संस्कारों के अभाव के ही कारण है । सरकारी मुलाजिम मोटी तनख्वाह ऐंठने के बावजूद कर्तव्यों से आंखें मूंदे रहते हैं तो संस्कारशून्य होने कारण । सत्तासीन लोग अपराधियों को संरक्षण एवं प्रशय देते आ रहे हैं तो संस्कारच्युत होने के कारण ही । क्या-क्या गिनाएं ? गुवाहाटी की घटना और उस सरीखी अन्य घटनाएं, जिसमें स्त्रीजाति के साथ दुराचार-अत्याचार किया गया हो, इसी संस्कारहीनता के परिणामों में से हैं ।

यह सोचना निहायत बचकानी बात होगी कि यह संस्कारहीनता भटके हुए निरंकुश युवकों के एक छोटे-से वर्ग तक सीमित है । दरअसल यह समाज के हर क्षेत्र में जड़ें जमा चुकी है, खास तौर पर हमारे राजनैतिक दलों एवं उनके अधीनस्थ पुलिस बलों में और अन्य सरकारी महकमों में ।

टीवी कार्यक्रमों में हम जितनी भी बहस कर लें होना कुछ भी नहीं है, क्योंकि जिन पर कारगर कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनको करना कुछ नहीं है । आम आदमी चीखने से अधिक कुछ कर नहीं सकता है, क्योंकि उसके हाथ में वैधानिक ताकत नहीं है ।

हम ‘प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न’ पर पहुंच चुके हैं, इसलिए लगता नहीं कि अब कुछ संभव है । ऐसा क्यों अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

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