अण्णा के नाम खुला पत्र: राजनीति में कूदे नहीं कि साख गयी!

श्रीमान् अण्णा हजारे एवं सहयोगी

मार्फत इंडिया अगेंस्ट करप्शन

माननीय अण्णाजी,

मेरा प्रणाम स्वीकारें । मैं 65-वर्षीय वरिष्ठ नागरिक हूं और एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का विज्ञान (फिजिक्स) विषयक अध्यापक रह चुका हूं । आपके आंदोलन का मैं नैतिक समर्थन करता रहा हूं, भले ही उसकी सफलता पर मुझे संदेह रहा है ।

टीवी चैनलों पर प्रसारित समाचारों के अनुसार आप लोग अब सक्रिय राजनीति में कूदने जा रहे हैं । मैं आगाह करना चाहता हूं कि ऐसा करना आपके जनांदोलन की विफलता की गारंटी है ।

मैं सुश्री मेधा पाटकर और अन्य कुछ के विचारों का समर्थन करता हूं कि आप सक्रिय राजनीति में सफल नहीं हो पाएंगे । इससे आपकी साख पर तो प्रभाव पड़ेगा ही, लोगों में घोर निराशा भी घर कर जाएगी ।

मुझे लगता है कि देश के राजनेता यही चाहते रहे हैं कि आप सक्रिय राजनीति में कूदें और वे वहां आपको, आपके प्रस्तावित प्रत्याशियों को, चित कर दें ।

एक टीवी चैनल पर मैं देख रहा था कि सांसद रेणुका चौधरी किस प्रकार कुटिल मुस्कान के साथ व्यंगात्मक लहजे में कह रहीं थीं कि वे लोग (राजनेता) तो चाहते ही रहे हैं कि आप राजनीति में कूदें और खुद ही अनुभव कर लें कि लोकपाल बिल पास कराना कितना कठिन है । उन्होंने खुले शब्दों में जो कहा वह हर राजनैतिक दल का मूक संदेश रहा है ।

उनकी बात साफ जाहिर करती है कि आप राजनीति में आए नहीं कि लोकपाल बिल ठंडे बस्ते में गया ! और राजनेताओं का वांछित एजेंडा पास !!

यदि आप समझते हैं कि भारतीय राजनीति में आप सफल हो पाएंगे तो इस पर दश बार सोचिए । तार्किक विचार किए बिना भावुकता में बहकर आपके समर्थक यह राय दे रहे होंगे । लेकिन पूछिए कि उन्होंने वस्तुस्थिति की बारीकी से समीक्षा की है क्या ?

जल्दीबाजी ठीक नहीं है । एक ने कहा, औरों ने सुर में सुर मिलाकर बिना सोचे-समझे हां-हां कह दिया, बस । ऐसा करना घातक होगा ।

आप जो भी कर पाएंगे, वह राजनैतिक ‘प्रेशर ग्रूप’ के नाते ही कर पाएंगे; सक्रिय राजनीति में कूदकर नहीं, जहां विफलता की गारंटी है ।

मैं अपने विचारों का आधार स्पष्ट करता हूं:

लंबे अनुभव के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि अधिसंख्य भारतीयों को लोकतंत्र की समझ नहीं है; उन्हें ‘वोट देने’ का लोकतांत्रिक अधिकार तो मालूम है, लेकिन लोकतांत्रिक दायित्वों की समझ नहीं है । इन लोगों को न तो किसी टीवी चैनल पर विमर्ष का अवसर मिलता है और न ही किसी अन्य मंच पर । किंतु असली वोटर तो वही हैं जिनकी धारणा से तो आप भी वाकिफ नहीं हैं । बात स्पष्ट करता हूं:

भारतीय मतदाताओं का बृहत्तर हिस्सा ‘वोट बैंकों’ में बंटा है ।

चतुर एवं मौकापरस्त राजनेताओं ने उनकी भावनाओं का भरपूर शोषण किया है, उनको इस प्रकार ‘ब्रेन-वाश’ किया गया है कि किसी अन्य को वोट देने का विचार भी उनके मन में न उठे । राजनीति में ‘ब्रेन-वाश’ सर्वत्र होता रहा है, किंतु सभी उसकी चपेट में नहीं आते हैं । किंतु अधिसंख्य भारतीय ‘ब्रेन-वाश’ हो चुके हैं । उदाहरण देता हूं:

1- अधिसंख्य दलित सुश्री ‘मायावती बहिनजी’ को वोट देता है, क्योंकि वह दलित है, अच्छी-भली जैसी भी हो; दलित है, बस इतनी योग्यता काफी है ।

2- यादव-मुस्लिमों का गठबंधन समाजवादी पार्टी को वोट इसलिए देता है कि उनके दिमाग में बैठ चुका है कि यही उनके असली रहनुमा हैं ।

3- कट्टर हिंदुओं का एक वर्ग भाजपा के साथ हर हालत में बना रहता है, क्योंकि उसके मत में हिंदुओं के हित उनके हाथों में ही सुरक्षित हैं ।

4- कांग्रेस को आंख मूंदकर वोट देने वालों के लिए वही दल असली ‘सेक्युलर’ है; इस देश को ‘सेक्युलरिज्म’ से अधिक चाहिए ही क्या !

5- शिवसेना ने ‘मराठी’ के हितों के नाम पर अपना क्षेत्रीय वोट बैंक बना ही रखा है ।

6- कर्णाटक में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे येदियुरप्पा का ‘लिंगायत’ समुदाय का अपना वोट बैंक है, जिसे स्वयं भाजपा नजरअंदाज नहीं कर पा रही है ।

7- एक कांग्रेसी के लिए नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का व्यक्ति नेता हो ही नहीं सकता; उस परिवार के सदस्य में ही पैदाइशी नेतृत्व गुण होता है – प्रधानमंत्री होने की पैदाइशी योग्यता ।

8- सरकार में मंत्रियों की नियुक्ति विभिन्न वोट बैंकों को आकर्षित करने अथवा बांधे रखने के लिए होती है, न कि योग्यता के आधार पर; ये बातें राज्यपालों – यहां तक कि राष्ट्रपति – के मामले में देखने को मिलती है ।

ऐसे अनेकों दृष्टांत हैं । वास्तविकता यह कि हर दल ने अपने न्यूनतम पुख्ता वोट बैंक स्थापित कर रखे हैं, जिनके भरोसे वह चुनाव में जीतने की कोशिश करता है ।

यह सच है कि सभी लोग – किसी भी समुदाय में – वोट बैंक में शामिल नहीं रहते हैं; यही वे लोग होते हैं जो चुनावी नतीजों को उलट-पलट देते हैं ।

परंतु सभी दलों द्वारा ब्रेन-वाश किये जा चुके ‘कोर वोट बैंक’ हर हाल में बरकरार रहते हैं, जिनके प्रति ये दल आश्वस्त रहते हैं ।

राजनैतिक दल अपना वोट बैंक बरकरार रखते हुए बचे हुए ‘खुले दिमाग वाले’ वोटरों को अपनी ओर खींचने का प्रयास करते हैं; उसी से यदाकदा सत्ता परिवर्तन देखने को मिलता है ।

अगर आपकी टीम चुनाव में उतरती है तो ये सवाल उठते हैं:

1- इन वोट-बैंकों के अपने-अपने दल के प्रति जो अंधभक्ति है आप उन्हें उससे कैसे मुक्त करेंगे? हकीकत यह है कि जब तक आप भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाएं तब तक तो वे आपके साथ हैं, किंतु जैसे ही आप वोट मांगेंगे वे कन्नी काट जाएंगे । वोट वे ‘अपने’ ही दल को देंगे हर हालत में, न कि आपको !! क्या आप समझते हैं कि एक दलित सुश्री मायावती को छोड़ देगा, मुस्लिम-यादव गठजोड़ का सदस्य श्री मुलायम को छोड़ेगा, कट्टर हिंदू भाजपा को वोट नहीं देगा, इत्यादि ? भाड़ में जाए भ्रष्टाचार की बात हम तो ‘अपने’ दल को वोट देंगे यह औसत भारतीय की मानसिकता है ।

2- जो लोग वोट-बैंकों में शामिल न हों वे अगर आप लोगों को वोट दे भी दें तो भी क्या आप चुनाव जीत पाएंगे ? जीत भी गए तो कितनी सीटें ले पाएंगे ? किसी भी हालत में संख्या इतनी नहीं होने जा रही कि आप संसद में अपने दम पर कुछ कर दिखाएं । आपके अभी तक के विचारों के अनुसार आप किसी से हाथ नहीं मिलाएंगे । आप यह मानते आ रहे हैं कि कोई राजनैतिक दल सार्थक लोकपाल नहीं चाहता; तब उस उद्येश्य को कैसे पूरा करेंगे ?

3- मैंने टीवी पर बहसों में कुछ ‘दलित बुद्धिजीवियों’ को यह कहते सुना है कि टीम अण्णा तो दलित-मुस्लिम विरोधी है, क्योंकि इसमें इन समुदायों का प्रतिनिधित्व ही नहीं । जब ऐसी धारणा के लोगों की भरमार देश में है, तब आप लोगों के विरुद्ध प्रचार भी कम नहीं होगा, और वह दुष्प्रचार सफल भी होगा ।

4- भारत की गरीब ‘बेईमानी’ स्वीकारने वाले ‘ईमानदार’ वोटर होते हैं । अगर कोई दल उनको हजार-पांचसौ का नोट पकड़ा दे तो वे उसे स्वीकारने से नहीं हिचकिचाते (बेईमानी), लेकिन इतनी ईमानदारी वे अवश्य बरतते हैं कि वोट उसी को देंगे और धोखा नहीं देंगे, प्रत्याशी भले ही भ्रष्ट हो । गरीब वोटरों में पैसा आदि बांटने की घटनाएं चर्चा में सदा आती रही हैं । तब ‘घूस’ न स्वीकारने वाले वोटर कहां से लाएंगे ?

5- लोग तो यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आप चुनावों के लिए साफ-सुथरे प्रत्याशी कहां से लाएंगे ? उनके चयन में जरा भी असावधानी विरोधियों के लिए मसाला बन जाएगी । आप पर इलजाम लगेंगे: मुस्लिम तो हैं ही नहीं, या इसाई नहीं, मराठी नहीं, तमिल नहीं, आदि; या ये अधिक हैं, वे कम हैं, आदि । यह देश भांति-भांति के समुदायों में बंटा है, महज भारतीय होना यहां माने नहीं रखता है । सबका प्रतिनिधित्व हो रहा है यह विश्वास दिलाना कठिन होगा ।

6- जाहिर में कि पर्याप्त संख्या में सांसद न होने के कारण आप संसद में कुछ नहीं कर पाएंगे । फलतः जो संदेश जनता में जाएगा वह घातक होगा । लोग कहेंगे, “देखा, इन्हीं ने कौन-सा कमाल कर दिखाया है ?” लोगों को आपसे मोहभंग हो जाएगा, समाज में आपकी साख गिरेगी । “आपने हमें पर्याप्त संख्या में जिताया ही नहीं ।” जैसी उक्तियों से जनता संतुष्ट होने से रही !!

आपके राजनीति में कूदने और असफल होने – जो होना ही है – से आपके समर्थकों में घोर निराशा ही होगी, लोकपाल फिर कुछ सालों के लिए ठंडे बस्ते में चला जाएगा, और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आपकी बातों में लोगों का विश्वास वैसे ही खो जाएगा जैसे भाजपा की बातों में ।

जरा सोचिए । अभी तो लोगों को आपसे नाउम्मीदी नहीं हुई है, किंतु जब राजनीति में उतरकर विफल हो जाएंगे तो किसे उम्मीद रह जाएगी ?
भवदीय,
योगेन्द्र जोशी

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