15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस – कैसी स्वतंत्रता, कैसा जश्न?

कल ही की बात है । निकट में रहने वाले समाज के कमजोर तबके में शामिल मेरे हमउम्र पड़ोसी ने चलते-चलाते अपने शहर की दुर्दशा का दुखड़ा सुना डाला । “देखिए टूटी-फूटी सड़कें, अभी साल भर भी बने नहीं हुआ; जहां-तहां कूड़े का ढेर जमा हो चला है, कोई उठाने वाला नहीं; नालियां या तो हैं नहीं या फिर मलवे से पटी हैं और बदबदा रही हैं; चारों तरफ दुर्व्यवस्था फैली हुई है; लगता नहीं कि कहीं सरकार जैसी भी कोई चीज है । सुनता हूं कि कल स्वतंत्रता दिवस है । मैं तो निपट अनपढ़, कुछ जानता नहीं लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि इससे अच्छा तो अंगरेजों का राज था ।

मैं शहर के हालात से पूरी तरह परिचित हूं । उसकी बातों से असहमत नहीं हो सकता था । मैं स्वयं महसूस करता हूं कि आज के स्वशासन से तो अंगरेजों का राज बेहतर था

न मेरे उस पड़ोसी ने और न ही मैंने अंगरेजों का राज देखा । हम तो 1947 की इसी तारीख के आगे-पीछे पैदा हुए थे । हमारे माता-पिता तथा अन्य बुजुर्गों ने उसका कुछ अनुभव अवश्य पाया था, दादा-परदादा तो उन्हीं के राज में पैदा हुए और दिवंगत हुए । उनमें से अधिकतर अब इस लोक में रहे नहीं कि आज के और बीते जमाने के बीच तुलना कर सकें । हमने अंगरेजी राज के अच्छाई-बुराई की बातें उन्हीं के मुख से सुनी थीं । और जो सुना वह यही था कि जहां तक रोजमर्रा के राजकाज का सवाल है वह तब बेहतर था आज की तुलना में ।

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यह सच है कि अंगरेज भारतीयों को अपनी बराबरी में नहीं रखते थे । वह शासक थे और उसके अनुरूप उन्होंने अपने लिए विशेषाधिकार नियत कर रखे थे । आप उनका विरोध नहीं कर सकते थे । लेकिन यह भी सच है कि आम आदमी को अंगरेज से सीधा पंगा लेने की जरूरत भी नहीं थी । वह अपने काम में लगा रहता, तो अंगरेज अपने राजकाज को संभालता था । और जब तक आम आदमी उसके काम में व्यवधान नहीं डाल रहा हो वह बुरा नहीं था ।

बुजुर्गों के मुख से हमने सुना है । समाज में तब आज की जैसी अराजकता नहीं थी । आज की जैसी चोरी-छिनैती, छेडखानी, दबंगई तब नहीं थी । आप पुलिस से मदद की उम्मीद कर सकते थे, बशर्ते कि आपकी शिकायत किसी अंगरेज के विरुद्ध न हो । तब भ्रष्टाचार आज के जैसा खुल्लमखुल्ला नहीं होता था । लोगों में शर्मोहया रहती थी । लोग शासन से तो डरते ही थे, समाज की टीका-टिप्पणियों से भी भय खाते थे ।

तब स्कूल-कालेजों की भरमार नहीं थी, लेकिन जो थे वहां शिक्षक पढ़ाते थे, मुफ्त की तनख्वाह नहीं बटोरते थे । क्या मजाल कि कहीं नकल हो । पढ़ाई का स्तर कहीं बेहतर था । तब अस्पताल भी बहुत कम थे, लेकिन जो थे उनमें इलाज होता था; डाक्टर घर पर आज की तरह निजी प्रैक्टिस नहीं करते थे । पुलिस कमजोर व्यक्ति को मनमाने तरीके से सलाखों के पीछे नहीं डाल देती थी । पर आज ? कमजोर पर डंडा चला देती है और रसूखदार की जी-हजूरी करने लगती है । आम आदमी को सरकारी दफ्तरों में आज की तरह घूस नहीं देनी पड़ती थी । नागरिक कार्यों की तब की गुणवत्ता आज से कहीं बेहतर थी । उस जमाने के पुल, सड़कें, भवन आदि कहीं अधिक टिकाऊ थे यह आज भी देखने में आ रहा है । आज तो हालात यह है कि ये सब चीजें बनते-बनते ही टूटने लगती हैं, बावजूद इसके कि तकनीकें कहीं अधिक उन्नत हो चुकी हैं ।

तुलना करें तो पाएंगे कि तब भले ही व्यवस्था अपर्याप्त थी पर जो थी वह गुणवत्ता में बेहतर थी ।

मगर राज अंगरेजों का था । इसलिए अस्वीकार्य था ।

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आज राजकाज की गुणवत्ता की गिरावट किसी से छिपी नहीं है । चारों तरफ असंतोष व्याप्त है । फिर भी हम इठला रहे हैं, क्योंकि राज हमारे लोगों का है (हमारा नहीं!!) । चाहे जितना भी बुरा हो, है तो अपने लोगों का !! इसलिए खुशी मनाना जरूरी है ।

लेकिन यह सवाल तो जायज है कि देश की स्वतंत्रता से जो उम्मीदें लेकर संघर्ष किया गया था वह क्या पूरी हुईंं । अधोलिखित कुछएक बिंदुओं पर विचार करें:

1- ममता ने एक निरीह किसान को सलाखों के पीछे डाल दिया क्योंकि उसने एक सीधा-सा सवाल पूछने की हिमाकत कर दी । अंगरेज क्या इससे बुरा करता ?

2- मायावती स्वयं को दलितों की मसीहा कहती हैं, लेकिन उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए रचनात्मक कुछ कर दिखाने के बजाय करोड़ों रुपयों में अपनी ही मूर्तियां लगावाना अधिक जरूरी मानती रहीं । क्या यही स्वतंत्रता के माने हैं ?

3- किसी मनचले ने मायावती की बेजान प्रस्तर मूर्ति तोड़ दी तो अखिलेश सरकार हरकत में आ गई और रातोंरात नयी मूर्ति उस स्थल पर लग गई । लेकिन आए-दिन कितने ही जीते-जागते मनुष्यों की हत्या हो रही है, और पुलिस एफआईआर तक लिखने को तैयार नहीं होती । हिन्दुस्तानी और अंगरेज के बीच भेदभाव अंगरेजी राज में था, किंतु यहां तो कमजोर-बलवान के बीच भी वही चल रहा है ।

4- अंगरेजों पर यह इलजाम लगता रहा है कि उन्होंने ‘बाटो और राज करो’ की नीति अपनाई । उन्होंने क्या किया कह नहीं सकता, लेकिन हमारे राजनेता तो ऐसा खुलकर कर रहे हैं !! किस दल ने लोगों को जातीयता, धार्मिकता, भाषा एवं क्षेत्रीयता के आधार पर नहीं बांटा है ? कौन उनकी भावनाओं का शोषण करते हुए अपने-अपने वोट बैंक स्थापित नहीं किए बैठा है ?

5- लोकतंत्र की बात करने वाले राजनेताओं के दलों में क्या लोकतंत्र है ? क्या वे किसी परिवार अथवा व्यक्ति की प्राइवेट कंपनी बनकर नहीं रह गये हैं ?

6- क्या यह बिडंबना नहीं है कि लोकतांत्रिक देश की बागडोर एक नौकरशाह के हाथ में है, जो कभी भी जनप्रनिनिधि नहीं रहा है, जिसने कभी कोई जनांदोलन में भाग नहीं लिया है, और जिसने कभी भी आम लोगों के बीच जाकर तथा समस्याओं को सुनकर उनका निराकरण नहीं किया है ?

7- देश स्वतंत्र हुए 65 साल हो चुके हैं और हालात यह है कि दुनिया के

(1) सर्वाधिक निरक्षर अपने देश में हैं;
(2) सर्वाधिक कुपोषित बच्चे यहीं पल रहे हैं;
(3) सर्वाधिक कुष्ठरोगी अपने यहीं हैं;
(4) सबसे अधिक आर्थिक विषमता इसी जगह व्याप्त है, समाजवाद आधारित अर्थतंत्र की वकालत करने वाले देश में;
(5) चीन कभी भारत से पिछड़ा देश माना जाता था, आज वह हमसे कहीं आगे निकल चुका है और अमेरिका को टक्कर दे रहा है; इत्यादि ।

8- दरअसल हमने स्वतंत्रता शब्द के अर्थ बदल डाले हैं । आज स्वतंत्रता का मतलब है, अनुशासनहीनता, लापरवाही, मुफ्तखोरी, और मनमरजी । जिसमें हिम्मत है भ्रष्टाचार में लिप्त होवे और नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाये । किसी को न भय है और न शर्मोहया ।

9- इस समय देश एक प्रकार की अराजकता के दौर से गुजर रहा है । आसाम की घटना, मुंबई का दंगा, नक्सलवाद, और आए दिन की छोड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं निराश करने वाली बातें हैं ।

***

मेरी दृष्टि में परिस्थितियां जश्न मनाने के योग्य नहीं हैं । देशवासियों को गंभीर आत्मचिंतन करने की जरूरत है, न कि “सारे जहां से अच्छा …” सरीखा गीत गा लिया, तिरंगा फहरा दिया, आदर्श बातों से भरा भाषण दे दिया या सुन लिया, और फिर सब कुछ भुला दिया ।

मेरी नजर में खुश होने के पर्याप्त कारण नहीं हैं, और मेरा जश्न मनाने का मन नहीं है ।

प्रार्थना है कि सद्विचारों का संचार हो ! – योगेन्द्र जोशी

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