आया मौसम वर्षफल का (नववर्ष 2013)

ख्रिस्तीय वर्ष 2013 का आगाज हो चुका है । इस मौके पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी शुभाकांक्षाएं ।

नववर्ष के आगमन पर लोगों के मन में आने वाला समय कैसा रहेगा खुद के लिये तथा समाज-देश के लिए यह जानने की उत्कंठा होती है । लोग समझते हैं कि भविष्य की तस्वीर खींची जा सकती है । वे समझते हैं कि कुछ विशेषज्ञ भविष्य की घटनाओं को ‘पढ़ने’ की काबिलियत रखते हैं । लोगों की उत्कंठा शांत करने के लिए देश में बहुत से ‘एक्सपर्टों’ का जन्म हुआ है जिन्होंने भविष्यवाणी की अलग-अलग विधियां इजाद की हैं या अपनाई हैं । इनमें सबसे अधिक प्रचलित जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित है । और इसी का सरलतर संस्करण मात्र जन्मतिथि के विचार पर आधारित विधि है जिसके परिणामों की जानकारी कई अखबारों/पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाती हैं ।

विगत 28 दिसंबर के ‘अमर उजाला’ के साथ उपलब्ध ‘रुपायन’ नाम के परिशिष्ट के पन्ने जब मैंने पलटे तो पाया कि उसके आरंभ से अंत तक के सभी पृष्ठों में नाम के प्रथम अक्षर पर आधारित वर्षफल का ब्योरा छपा पड़ा है और कुछ नहीं । और परसों, 30 दिसंबर, के समाचारपत्र ‘हिंदुस्तान’ का भी एक पृष्ठ उसी प्रकार की भविष्यवाणी से भरा था, इस बार जन्ममाह पर आधारित । वस्तुतः ऐसे वर्षफल कई पत्र-पत्रिकाओं में दिसंबर-जनवरी के इस मौसम में और टेलीविजन चैनलों पर पढ़ने को मिल जाते हैं । इतना ही नहीं, बाजार में अलग-अलग नामराशियों के वर्षफलों के विस्तार से चर्चा वाली पुस्तिकाएं भी उपलब्ध हो जाती हैं ।

ऐसी प्रकाशित जानकारी देखकर मेरे मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठ जाता है कि इन वर्षफलों की वाकई में कोई अहमियत है ? क्या लोग कही गई बातों पर विश्वास करते होंगे ? या ऐसी बातों को महज मनोरंजन के नाते पढ़ते होंगे ? मनोरंजन के लिए हम हास्य कविताएं सुनते हैं, व्यंगलेख पढ़ते हैं, बेतुकी हरकतों वाले वचकानी हेसी वाले टीवी सीरियल देखते हैं, इत्यादि । ठीक वैसे ही ये राशिफल, वर्षफल भी पढ़े जाते होंगे, लेकिन गंभीरता से इन्हें शायद ही कोई लेता होगा ।

इन्हें गंभीरता से लिया भी नहीं जा सकता है, क्योंकि इनका कोई तर्कसम्मत आधार है ही नहीं । बस ऐसा होता है यह कहते हुए इनको सही ठहराने की कोशिश की जाती है । और वैसे भी ये बातें अनुभव में सही ठहरती नहीं । भला कैसे सही हो सकती हैं । एक ही राशिनाम अथवा जन्मदिन वाले अनेक लोग इस धरती पर पैदा हुए होंगे, जिनकी पारिवारिक पुष्ठभूमि में कोई समता नहीं होगी; उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वाथ्य तथा क्षमता में समानता की कोई संभावना नहीं; उनके परिवेश अलग-अलग होंगे; उनकी शिक्षा-दीक्षा में भी परस्पर भेद होगा ही; व्यावसायिक दृष्टि से भी उनमें समानता की उम्मीद की नहीं जा सकती है; इत्यादि । तब कैसे एक ही वर्षफल सबके लिए स्वीकार्य हो सकता है ?

इसके अतिरिक्त इस पर भी गौर करें कि लोगों के नाम राशियों के अनुसार हों यह आवश्यक नहीं । मैंने सुना है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में तो राशिनाम प्रयोग में न रखने को प्रचलन है, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा करने पर उम्र घटती है । आजकल तो लोग खोज-खोजकर ऐसा नाम रखने लगे हैं जिसे किसी ने सुना ही न हो – एकदम नया, दुनिया में अकेले एक व्यक्ति का । वैसे भी यह संभावना भी रहती है कि राशि पर आधारित नाम अच्छा लगे । मेरे उत्तराखंडीय समाज में राशिनाम का चलन है, फिर भी मेरा स्वयं का नाम मेरे पिताश्री ने कुछ हटकर चुना था । ऊपर मैंने रूपायन का उल्लेख किया ह, जिसमें नाम के प्रथम अक्षर के वर्षफल के साथ किसी सिनेतारिका अथवा महिला खिलाड़ी का उदाहरण भी दे रखा है । उन्हीं में शामिल है एक मुस्लिम महिला का नाम । मुझे पूरा विश्वास है कि इस्लाम धर्मावलंबियों में महीने की तारीखों के अनुसार नाम रखने की कोई परंपरा नहीं है । अगर होगी भी तो वह ‘हिजरी’ कलेंडर पर आधारित होगा न कि ख्रिस्तीय कलेंडर पर । तब संबंधित भविष्यवक्ता ने अपनी विधि उस महिला पर भी कैसे इस्तेमाल कर दी होगी ?

और गहराई से सोचने पर मन में सवाल उठता है कि कार्य-कारण (कॉज एंड इफेक्ट) के जिस सिद्धांत का उपयोग तार्किक विवेचना में किया जाता है वह ऐसी भविष्यवाणियों के मामले में कहीं नजर नहीं आता है । सवाल यह है किसी दिन विशेष पर पैदा हुए व्यक्ति का भविष्य किस प्रक्रिया के द्वारा जन्मतिथि निर्धारित करती है ।

कुल मिलाकर ऐसी कवायद की अहमियत शुद्ध मनोरंजन के अलावा कुछ और नहीं हो सकती है । भौतिकी (फिजिक्स) के अनुसार तो भविष्य जाना ही नहीं जा सकता है !! – योगेन्द्र जोशी

 

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