23 मार्च, ‘दि अर्थ ऑवर, यानी पृथ्वी के नाम एक घंटा: है इसकी कोई अहमियत?

आज के दिन (अंताराष्ट्रीय मौसम दिवस – International Meteorological Day) संध्याकाल विश्व में ‘अर्थ ऑवर’ मनाया जाता है । अर्थात् दुनिया के प्रायः सभी देशों में रात्रि प्रथम प्रहर 8:30 बजे से घंटे भर के लिए रोशनियां बंद कर दी जाती हैं । यह दिवस अब 9 वर्ष पुराना हो चला है ।

          क्या है इस दिवस की अहमियत? यों दावा तो यही किया जाता है कि इसके माध्यम से इस धरती के बाशिंदों को ऊर्जा की अधिकाधिक बचत करने और जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस) पर अपनी निर्भरता घटाने का संदेश जाता है । और यह भी कि ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोतों को व्यवहार में लिया जाना चाहिए । जहां तक नये ऊर्जा स्रोतों का प्रश्न है, इस प्रकार के प्रयास तो विभिन्न देशों में चल ही रहे हैं और उसमें सामान्यतः आम आदमी का हाथ कम ही रहता है, क्योंकि इस प्रकार के प्रयास सरकारें अथवा संस्थाएं ही सामान्यतः कर पाती हैं ।

          आम आदमी तो ऊर्जा की बचत ही कर सकता है । दूसरे शब्दों में यह दिवस आम जनों को ऊर्जा की मितव्ययिता का संदेश देता है । मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई संदेश लोगों तक वास्तव में पहुंचता भी है ? और क्या वे इस संदेश को ग्रहण करते हैं ? यह ठीक है कि आज के दिन घंटे भर के लिए घर-बाहर की रोशनी बंद कर देंगे, लेकिन क्या उसके एवज में मोमबत्ती सरीखे प्रकाश-स्रोतों का इस्तेमाल नहीं करेंगे ? क्या उतने समय फ्रिज, ए.सी., टी.वी. जैसे विद्युच्चालित उपकरण भी बंद रखेंगे ? मामला केवल रोशनी बंद रखने तक सीमित नहीं है । आपको बिजली की खपत यथासंभव कम करनी है । क्या लोग तैयार हैं ? संदेश का असल मकसद क्या वे समझ पाते हैं, उसे ग्रहण करते हैं और तदनुरूप व्यवहार करते हैं ? मुझे संदेह है कि मुद्दे के प्रति समर्पण भाव से अपनी भूमिका स्वीकारते हुए ऐसा करने का विचार कम ही लोगों के मन में उपजता होगा ।

          और असल बात तो यह है कि यह दिन केवल प्रतीकात्मक है ऊर्जा की खपत घटाने के पक्ष में । वस्तुतः यह कार्य तो चौबीसों घंटे, 365 दिन चलना चाहिए । कितने लोग हैं जो जीवन में मितव्ययिता बरतते होंगे ? घरों में अनावश्यक बिजली-बल्ब न जलें इसका खयाल कितनों को रहता है ? ए.सी. जैसे सुविधा-भोग के साधन कितने लोग नहीं चाहते हैं ? कितने लोग निजी वाहनों के प्रयोग से बचते हैं ? कितनों के मन में यह विचार आता है कि जहां तक संभव हो साइकिल जैसे साधन प्रयोग में लेने चाहिए ? कितने लोग यह जानकारी रखते हैं कि ‘स्टैंड-बाई की अवस्था में छोड़े गये उपकरणों के साथ भी बिजली की खपत होती है जिसे रोका जा सकता है ? कितनों को मालूम है कि कैसे भोजन बनाते समय गैस की खपत घटाई जा सकती है ?

और मैं तो यह सवाल पूछता हूं कि आदमी धनोपार्जन करता ही क्यों है ? क्या समाजसेवा के लिए ? नहीं, भौतिक सुख-सुविधा के साधन जुटाने के लिए । और यदि वह मितव्ययिता ही बरतने लगे तो अपने धन का उपभोग करेगा कैसे ? उसे ढेर-सी धन-दौलत की जरूरत ही क्या रह जाएगी यदि वह कम से कम खर्चापानी चलाने का इच्छुक हो । स्मरण रहे कि आदमी के प्रायः सभी क्रियाकलाप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऊर्जा पर निर्भर होते हैं, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी जीवाश्म इंधनों से मिल रहा है । यह भी अनुमान है कि अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जो वृद्धि हो रही है वह ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरा करने भर के लिए भी पर्याप्त नहीं है ।

मेरा कहने का आशय यह है कि अर्थ ऑवर का संदेश यह समझा जाना चाहिए कि हमें मितव्ययिता अपनाते हुए सादगी भरी जीवनशैली अपनानी चाहिए, न कि एक-दूसरे की नकल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग में लेना चाहिए । मनुष्य और अन्य जीवधारियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को रहने योग्य यदि छोड़ना हो तो हमें भोगवाद से बचना होगा । कितने लोग हैं जो इस विचार से सहमत होंगे ? शायद गिनेचुने ही, बस !! – योगेन्द्र जोशी

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