बोधगया की आतंकी घटना और राजनैतिक दलों का रवैया

Buddha Statue Bodhgayaराजनेताओं का रवैया

         आतंकवाद को लेकर अपने देश के राजनेताओं का रवैया बेहद हास्यास्पद रहा है । उनका एकमात्र उद्येश्य शासन पर कब्जा करके और उस पर येनकेन प्रकारेण चिपके रहकर सत्तासुख भोगना है । किसी राजनेता के दिलोदिमाग में देश की तस्वीर भविष्य में क्या होगी इसे लेकर कोई चिंता नहीं होती । उन्हें तो अपनी पांचसाला सत्ता बचाये रहना और अगले पांचसाला सत्ता को हथियाने की चिंता सताती है । और इस प्रयोजन के लिए हर प्रकार का समझौता करना उन्हें जायज लगता है । राजनैतिक सिद्धांत जैसी भी कोई चीज होती है यह उन्हें मालूम ही नहीं । देश की दीर्घकालिक नीतियां क्या हों इस पर उनका ध्यान कभी नहीं जाता है । अरे भई, देश के सामने कई समस्याएं ऐसी हैं जिन पर हर व्यक्ति को चिंतित होना चाहिए, खासकर उनको जो सत्ता पर कब्जा जमाए हों ।

आतंकवाद उन समस्याओं में से एक है । देशसेवा का ढिढोरा पीटने वाले नेताओं को तो ऐसी समस्याओं पर एकमत होना चाहिए और एक ही दिशा में कारगर कदम उठाने के लिए संकल्प लेना चाहिए । लेकिन देखिए कि वे आपस में ही एक-दूसरे पर तरह-तरह के लांछन लगाना शुरू कर देते हैं । उनके रवैये को देख आतंकी भी खुश होते होंगे और सोचते होंगे कि कैसा देश है यह कि नेता आपस में ही लड़ते रहतेे हैं । वे कहते होंगे कि इस देश में हमारे लिए डरने की कोई बात नहीं है । अरे भई, जिस किसी ने भी गलती की हो उसे लेकर आप ऊलजलूल तो नहीं बोलिए । देश के खातिर कुछ तो एकता दिखाइए । वैसे इतिहास गवाह है कि आपस में लड़कर हम बाहरी लोगों के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करते रहे हैं । सदियों की गुलामी परस्पर के इसी झगड़ने की आदत का नतीजा रही है । और आज भी हम झगड़ने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं । अरे भई, कम से कम एकता नहीं तो एकता का नाटक तो कर सकते हैं । लेकिन नहीं, उनका दिमाग तो यह सोचने में लग जाता है कि क्या यह मुद्दा आगे सत्ता कब्जियाने में मदद करेगा या नहीं । मेरे मन में ऐसे राजनेताओं के प्रति कोई सम्मान नहीं । मैं सोचता हूं कि इनमें कोई नहीं जो मेरे वोट का हकदार हो ।

राजनेताओं को चिंता कहां

         आतंकी घटना राजनेताओं के लिए कोई माने नहीं रखती है । उन्होंने तो अपनी सुरक्षा का ऐसा इंतिजाम कर रखा है कि आतंकी उन्हें छू नहीं सकते हैं । ऐसी घटना में तो आम आदमी मारा जाता है, या अधिक से अधिक कोई सरकारी मुलाजिम । जानमाल का नुकसान भी आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है । भारत की गरीब जनता की जुबान भुक्तभोगियों को दो-चार लाख की मदद देकर बंद करने की कला हमारी सरकारें बखूबी जानती हैं । यह पैसा उन्हें वास्तव में मिलता भी है मुझे तो इसमें भी शंका होती है । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी तंत्र में गरीब के पैसे पर भी लार टपकाने वालों की कमी थोड़े ही है ।

हमारे नेताओं में सामूहिक विचारणा का नितांत अभाव है । वे यह विचार नहीं करते कि ऐसी घटनाएं रुकें कैसे । जब घटना हो जाती है तो बस जांच शुरू हो जाती है । ठीक हैं जांच होनी चाहिए, पर जांच से क्या कोई सबक लिया जाता है ? घटना के लिए कौन जिम्मेदार है यह भी पता चल जाए, वह पकड़ में भी आ जाए, उसे सजा भी हो जाए, पर इस सब से भविष्य की घटनाएं रुक जाएंगी क्या ? आगे क्या किया जाना चाहिए यह बात जांच से न सीखी जाए तो उसका महत्व ही क्या रह जाता है ? जो होना था वह हो गया, सबक तो भविष्य के लिए सीखा जाता है । सरकारें अभी तक सीख पाई हैं ? कुछ दिनों के हल्लेगुल्ले के बाद सब शांत हो जाता है ।

अवांछित हस्तक्षेप

इस समय हर सरकारी तंत्र राजनैतिक हस्तक्षेप का शिकार है । सूचना तंत्र एवं जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने नहीं दिया जाता है । कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो अपने अनुमान को ऐसे पेश करते हैं जैसे कि वे घटना के चस्मदीद गवाह हों । अरे जांच एजेंसियों को नतीजे तक पहुंचने तो दीजिए । लेकिन अपनी बेहूदी आदत से मजबूर जो हैं । आज तक नहीं सुधर सके तो अब क्या सुधरेंगे । मुझे लगता है कि राजनेताओं के मौजूदा रवैये से क्षुब्ध होकर सूचना एवं जांच एजेंसियां भी अपने कार्य में ढिलाई बरतने लगी हैं । किसी की जवाबदेही भी तो कभी तय नहीं होती है ।

हमारी राज्य सरकारों ने भी कसम खा रखी है कि केंद्र सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई नहीं लड़नी है । हर राजनैतिक दल अपने दलीय नफे-नुकसान का हिसाब लगाकर आगे के कदम उठाता है । देशहित उनके लिए दोयम दर्जा रखता है । जिस लोकतंत्र में नेतागण इतने स्वार्थी हों वह कभी सफल नहीं हो सकता ।

सेक्युलरिज्म का राजनैतिक रोग

एक बात और ध्यान देने की है । अपने अधिकतर राजनैतिक दल “सेक्युलरिज्म” के गंभीर रोग से पीड़ित हैं । मैं उनके इस रोग को ऑब्सेसिव कंपल्सिव सिंड्रोम (obsessive compulsive syndrome) कहता हूं । वे आतंकी घटनाओं को भी बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के विभाजन से जोड़कर देखने लगते हैं । ये याद रखें कि आतंकवाद दुनिया भर में है, अलग-अलग कारणों से है । अधिकतर कारण स्थानीय अथवा क्षेत्रीय स्तर पर संसाधनों एवं शासकीय व्यवस्था को लेकर लोगों के बीच पनप रहे असंतोष से जुड़े हैं । इसलिए संबंधित आतंकी घटनाओं का महत्व अंताराष्ट्रीय न होकर केवल राष्ट्रीय होकर रह जाता है ।

लेकिन जेहादी आतंकवाद सही अर्थों में अंताराष्ट्रीय प्रकृति का है और “इस्लाम खतरे में है” के नारे के साथ चल रहा है । जब ऐसी आतंकी घटना हो तो उसे सेक्युलरिज्म के हिमायती होने का दावा करते हुए हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए । किंतु कई दल राजनैतिक लाभ पाने के चक्कर में वहां भी सेक्युलरिज्म का नारा बुलंद करने से नहीं हिचकते हैं । वे यह दावा भी कर बैठते हैं अल्पसंख्यकों को फ़ंसाया जा रहा है । यह कितना सच है इसका निर्णय ईमानदार नेता जांच पर छोड़ेगा । लगता है जांच एजेंसियां भी राजनीति में रंग चुकी हैं । ऐसे में भगवान ही मालिक है । – योगेन्द्र जोशी

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