समाचारः यूपी यानी उत्तर प्रदेश को मिलेगा पिछड़े राज्य का दर्जा

कल के जागरण अखबार में खबर थी कि यूपी को पिछड़े राज्य का दर्जा मिलेगा । मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि अपने प्रदेशवासियों को इस खबर पर बधाई दूं या उनके प्रति सहानुभूति जताऊं ।\

UP - Pichada Raaya

मेरी दुविधा अकारण नहीं है । मेरी जानकारी के अनुसार आजादी के समय उत्तर प्रदेश देश के अग्रणी या उन्नत राज्यों में से एक था । तमिलनाडु, आंध्र आदि उससे पिछड़े थे । आज स्थिति यह है कि उन राज्यों से यह पिछड़ चुका है और हालात यह हो गए हैं कि उसके पिछड़ा कहे जाने की नौबत आ गई । अवश्य ही प्रदेश की सरकार पिछड़ा घोषित होने पर खुश हो रही होगी, क्योंकि पिछड़ेपन के अनुरूप उसे केंद्र सरकार से कुछ मदद/रियायतें मिलेंगी । इस खिताब को वह अपनी उपलब्धि मान रही होगी । लेकिन मुद्दे का दूसरा पहलू देखिए कि आगे बढ़ने के बजाय यह राज्य पिछड़ा बन गया । यह यहां के बाशिंदों के लिए शर्मिदगी की बात है कि नहीं ?

पिछड़े होने की ‘उपाधि’ राज्य को राजनैतिक कारणों से मिला होगा यह कोई भी समझ सकता है । केंद्र की कांग्रेस-नीत सरकार आगामी चुनावों के मद्देनजर इस कदम को लाभदायी देख रही होगी । उसे राज्य की कितनी चिंता है यह कहकर वह मतदाताओं के वोट बटोरना चाहती होगी । मतदाताओं को सुभाने के लिए वह हर हथकंडा अपना रही है । इसके अलावा उसे राज्य सरकार की ‘मालिक’ समाजवादी पार्टी का भी सहारा चाहिए । पिछड़ेपन का दर्जा देकर वह उक्त पार्टी के सहयोग की भी व्यवस्था कर रही है ऐसा मेरा मत है । उसके राजनैतिक इरादे किस हद तक सफल होंगे यह भविष्य के चुनाव ही बताएंगे ।

उत्तर प्रदेश आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ता ही क्यों गया ? इसके कारण कई होंगे, किंतु मैं इस अवनति के लिए मायावती-मुलायम सरीखे राजनेताओं को जिम्मेदार मानता हूं । इन नेताओं ने इस प्रदेश की सत्ता को निजी स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बना डाला । उन्होंने “बांटो और राज करो” की नीति अपनाकर अपन-अपने वोट बैंक तैयार कर लिए । मायावती ने दलितों की भावनाएं उभाड़कर दलित वोट बैंक बनाया तो मुलायम सिंह ने ‘एम-वाई’ यानी यादव-मुस्लिम की राजनीति से अपना स्वार्थ साधा । भारतीय जनतंत्र है ही जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता की भावनाओं को भड़काकर मत बटोरने पर आधारित । शायद ही कोई दल होगा जो कह सके कि वह ऐसी घटिया राजनीति से मुक्त है । इसलिए मुलायम-मायावती अकेले दोषी नहीं रहे, किंतु उन्होंने जातीय राजनीति को पराकाष्ठा पर पहुंचाया जरूर ।

इस सबके अलावा इन दलों ने गुंडे-माफियाओं को भी भरपूर प्रश्रय दिया । आज हालात यह हैं कि सर्वत्र लूट मची है । बालू-माफिया कितनी चर्चा में हैं यह तो सभी देख ही रहे हैं । इन दलों ने प्रशासनिक तंत्र का भी राजनीतिकरण कर दिया । सबके अपने चहेते अधिकारी हैं, जिन्हें अहम अथवा तथाकथित ‘मलाईदार’ पदों पर नियुक्त किया जाता है और निष्ठावान अधिकारियों को दरकिनार कर दिया जाता है । आज हालत यह है कि वाराणसी जैसे शहर में सड़कें बनने के बाद साल भर नहीं टिक पाती हैं । कहने का मतलब है कि प्रदेश को तो नीचे लुड़कते ही जाना है । अब इस अवनति के लिए पुरस्कार स्वरूप “पिछड़ा” प्रदेश घोषित किया जा रहा है । हमारे राजनेता “पिछड़ा” कहलाने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करते, बल्कि इसे अपनी राजनैतिक उपलब्धि समझते हैं ।

उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य रहा है कि सबसे बड़ा राज्य होने के कारण यह राजनीति का अखाड़ा भी बना रहा । यह धारणा सभी दलों में घर कर गई कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता इसी प्रदेश से होकर गुजरता है । इस प्रदेश की सुध लेने के बजाय सभी दल दिल्ली पर कब्जा करने के प्रयासों में लगे रहे । आज भी मुलायम-मायावती दिल्ली का ख्वाब पूरा करने के लिए प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से 50-50 पर जीत की तिकड़म में लगे हुए हैं ।

असीमित भ्रष्टाचार, जाति-धर्म की गिरी हुई राजनीति, एवं प्रशासन में भाई-भतीजावाद के चलते इस राज्य का भला होने वाला नहीं । राजनैतिक अखाड़ेबाजी घटे और सरकारों का ध्यान दिल्ली के बजाय राज्य पर हो इसके लिए इसका 3-4 भागों में बंटवारा निहायत जरूरी है । उत्तराखंड का उदाहरण यह दिखाता है कि वह, अच्छा-बुरा जैसा भी कर रहा हो, यहां की राजनीति से मुक्त तो है ! – योगेन्द्र जोशी

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