भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

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इस दिवस पर देशवासियों के प्रति शुभकामना व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य बनता है । तदनुरूप उक्त संदेश सभी को स्वीकार्य होवे । किंतु इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने और देश के भविष्य के प्रति आशान्वित होने का कोई विश्वसनीय आधार मुझे कहीं नहीं दिखता । देश की जो निराशाप्रद स्थिति मुझे वर्षों से दिखती आ रही है, उसकी ओर मेरा ध्यान इस मौके पर कुछ अधिक ही चला जाता है । मुझे लगता है कि आंख मूंदकर खुश होने के बजाय देशवासियों को तनिक गंभीरता से अपनी राजनैतिक उपलब्धियों पर विचार करना चाहिए । उन्हें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या साड़ेछः दशक पूर्व हासिल की गयी स्वाधीनता का उपयोग हम एक स्वस्थ एवं जनहित पर केंद्रित लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था स्थापित करने में कर पाये ? इस अवसर पर कई प्रश्न मेरे मन में उठते हैं जिनके उत्तर मुझे नकारात्मक ही मिलते हैं । मेरी बातें सुन मुझ पर पूर्वाग्रह-ग्रस्त होने का आरोप लग सकता है । क्या मैं वाकई गलत हूं; मेरी बातों में कोई सार नहीं; मैं निराशावादी हूं ?

भारतीय संविधान कहता है:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved constitute India into a SOVEREIGN  SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens

JUSTICE …

LIBERTY …

EQUALITY …

FRATERNITY …

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT, AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(SECULAR ‘kCn 1976 ds 42osa la’kks/ku esa tksM+k x;k A)

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाबत कुछ प्रश्न उठाता हूं । हमारी तत्संबंधित उपलब्धियां क्या हैं ? परमाणु परीक्षण, मिसाइल तकनीकी, उपग्रह प्रक्षेपण, और चंद्रयान अभियान या अन्य विकास कार्यों को मैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बेहतरी के संकेतक नहीं मानता । ऐसे विकास कार्य तो राजशाही, तानाशाही, लोकशाही अथवा किसी भी अन्य शासकीय तंत्र में होते ही रहते हैं । हर एक तंत्र में शासक अपने को मजबूत करने में लगा ही रहता है । चीन इसका उदाहरण है जो इन सब मामलों में हमसे कहीं आगे है । मेरे सवाल सीधे-सीधे अपने लोकतंत्र से जुड़े हैं कि क्या उसकी गुणवत्ता उत्तरोत्तर बढ़ी है; क्या वह आम जन की आकांक्षाओं के अनुरूप है, आदि । चलिए एक-एक सवाल पर विचार करें:

कहां है लोकतंत्र ? मूल भावना का अभाव

हमने बहुदलीय शासन पद्धति स्वीकारी है, जिसके अनुसार व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक दलों को प्राप्त हुई है । उनसे अपेक्षा रही है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृड़ ही नहीं करेंगे, बल्कि उसकी मर्यादाओं का पूर्णतः सम्मान करेंगे । लेकिन जिन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उन्होंने ही लोकतांत्रिक प्रणाली का दायित्व संभाल रखा है । क्या इसमें विरोधाभास नहीं है ? आज के प्रमुख दलों में कितने हैं जो शपथ लेकर कह सकें कि उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है ? प्रायः हरएक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा उसके परिवार की निजी राजनैतिक जागीर बना हुआ है और उसके कार्यकर्ता तोते की भांति मुखिया के कथनों को उच्चारित करना अपना धर्म मानते हैं ।

कहां है लोकतंत्र ? सत्ता हथियाने की होड़

सत्ता हथियाना ही सभी दलों का एकमेव लक्ष बन चुका है । सत्ता क्यों चाहिए ? देश का स्वरूप आने वाले 20-30 सालों में क्या होगा इसके चिंतन से प्रेरित होकर सत्ता नहीं पाना चाहते । देश की कोई भावी तस्वीर उनके मन में नहीं उभरती है, बल्कि उनकी नजर पांचसाला सत्ता पर रहती है कि कैसे वे भरपूर सत्तासुख भोगें और और सत्ता से तमाम सही-गलत लाभ बटोर सकें । यही वजह है कि उनके पास देश के लिए कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, और न ही वे किसी सिद्धांत पर टिके रहते हैं । चुनाव में जिसका विरोध करें उसी से हाथ मिलाकर सत्ता पर बैठने से कोई नहीं हिचकता है । हर प्रकार का समझौता, हर प्रकार का गठबंधन उन्हें स्वीकार्य है, बशर्ते कि वह उनके निजी हित में हो, देशहित दरकिनार करते हुए ।

कहां है लोकतंत्र ? क्षेत्रीय दलों का उदय

जोड़तोड़ से सत्ता में भागीदारी पाने, और अपनी शर्तों पर दूसरे दलों से मोलभाव करने की क्षमता बटोरनेे के लिए क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ है । स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक ऐसे दलों का जन्म नहीं  हुआ था ऐसा मैं समझता हूं । कदाचित डीएमके पहला ऐसा दल था जो क्षेत्रीय दल के रूप में हिंदीविरोध के साथ जन्मा था । अन्य दल बाद में ही उभरे जब नेताओं को लगने लगा कि इस रास्ते से उनकी कीमत बढ़ जाएगी । इन दलों ने केंद्र की सत्ता को कमजोर ही किया । हाल के समय में गठबंधन-धर्म जैसा शब्द गढ़ा गया और राष्ट्रधर्म को दरकिनार कर इस धर्म को अहमियत मिलने लगी । इन दलों ने कुछ भी करने की छूट की शर्त पर गठबंधन बनाए रखने की घातक परंपरा को जन्म दिया है । क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र है ?

अहंकारग्रस्त सांसद-विधायक

जनता के द्वारा बतौर प्रतिनिधि के चुन लिए जाने के बाद हमारे राजनेता स्वयं को पांच-साला राजा समझने लगते हैं । विनम्रता तो उनमें मुश्किल से ही मिलेगी । वे किसी भी विषय पर जनता की राय जानने के लिए क्षेत्र में नहीं जाते हैं, बल्कि दल एवं मुखिया की बात ही उनके लिए माने रखती है । जब वे अपने हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं और जनता विरोध करती है तो अहंकार के साथ कह देते हैं कि हम चुनकर आए हैं । हिम्मत हो तो आप भी चुनकर आओ हमें रोक लो । मतलब यह कि हम अब राजा हैं और अपनी मरजी से चलेंगे । नेताओं की ऐसी सोच कभी भी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं कही जा सकती है । हिम्मत तो उन्हें होनी चाहिए कि अपने मतदाताओं के बीच जाकर उनके विचार जानें । ऐसा वे कभी नहीं करते । कहना ही पड़ेगा कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान नहीं उपज पाता है ।

सेक्यूलरिज्म का ढिंढोरा

सेक्यूलरिज्म, जिसे हिंदी में धर्मनिरपेक्षता कहा गया है, के अर्थ क्या होते हैं यह शायद ही किसी राजनेता को मालूम हो । यह शब्द वे तोते की तरह बिना सोचे-समझे कही भी बोल देते हैं । उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह शब्द यूरोपीय देशों में गढ़ा गया जहां शासकीय व्यवस्था को ईसाई धर्म के प्रभाव के मुक्त करने का अभियान चला था । फलतः वहां इस विचारधारा ने जन्म लिया कि लोकतंत्र में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, और शासन के नियम-कानून में देश और समाज के समग्र हित के अनुसार बनने चाहिए न कि किसी धर्म के मतानुसार । जब नेहरू-आंबेडकर ने हिन्दू भावना के विरुद्ध हिन्दू कोड बिल पारित करवाया तो उनकी सोच यही थी कि कालांतर मे कॉमन सिवल कोड देश में स्थापित किया जाऐगा । लेकिन ऐसा हो न सका और अब संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों के होते हुए भी यह कभी होगा नहीं । हमने ‘सेक्युलर’ शब्द का आयात का तो कर लिया, किंतु उसकी भावना अपनाई नहीं । वस्तुत यह देश मल्टीरिलीजस या बहुधर्मी है न कि धर्मनिरपेक्ष, क्योंकि हमारे कुछ कानून धर्मसापेक्ष ही हैं । फिर कैसे हम स्वयं को सेक्युलर कहें । यह आत्मप्रवंचना है ।

अल्पसंख्यकवाद

इस देश में सेक्युलर का व्यावहारिक अर्थ अल्पसंख्यक हितों की बात करना हो चुका है । बहुसंख्यकों की चर्चा करना सेक्युलर न होना समझा जाता है । और दिलचस्प बात तो यह है कि जब भी अल्पसंख्यक शब्द राजनेताओं के मुख से निकलता है तो उनका इशारा प्रायः मुसलिम समुदाय से ही होता है । देश में सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से तो कुछ सही अर्थ में अल्पसंख्यक हैं । परंतु उनकी बात शायद ही कभी कोई राजनेता करता है । दरअसल सबसे कमजोर आर्थिक एवं शैक्षिक दशा में होने के बावजूद मुसलिम समुदाय चुनावी नजर से अत्यधिक अहम समुदाय है, क्योंकि वह चुनाव परिणामों में उलटफेर कर सकता है । उनकी इसी ताकत को देखते हुए हमारे कई राजनैतिक दलों की नीति उनके हितों की जबरन बातें करना रही है । उनको अपने पक्ष में करने के लिए वे हर चारा उनके सामने डालते आ रहे हैं, और उन्हें वोट बैंक के रूप में देखते हैं । उनके वास्तविक हितों में शायद ही किसी की दिलचस्पी होगी । मुझे तो पूरा संदेह है कि ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि वे कभी ऊपर उठें और प्रलोभनों से मुक्त हो पाएं । इस प्रकार का घटिया अल्पसंख्यकवाद मेरी नजर में लोकतंत्र के विरुद्ध है ।

नेतागण – अनुकरणीय दृष्टांतों का अभाव

हमारे राजनेताओं का अहंकार तब खुलकर सामने आता है जब वे कानूनों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते हैं । वे अदालतों के आदेशों/निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते है । वे भले ही मुख से न बोलें, किंतु उनका इशारा इस ओर सदैव रहता है कि उन्हें कानूनों के ऊपर होने का ‘विशेषाधिकार’ होना चाहिए, क्योंकि वे राजा से कम नहीं हैं । इस प्रकार का रवैया स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में देखने को नहीं मिलता था । तब के नेता नैतिक स्तर पर कहीं अधिक ऊपर थे । कहने का अर्थ है कि इस क्षेत्र में भी गिरावट ही आई है । होना तो यह चाहिए था कि नेता जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करें, वे अपने संयत व्यवहार से उन्हें प्रेरित करें । यही सब बातें हैं जिससे जनता में उनके प्रति सम्मानभाव घटता जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं हैं । क्या वे इन बातों को समझ पाएंगे ।

बढ़ता भ्रष्टाचार और लचर न्याय प्रणाली

कोई यह दावा कर सकता है कि समय बीतने के साथ देश में भ्रष्टाचार घटा है ? जो इसका उत्तर हां में दें मैं उनसे माफी ही मांग सकता हूं । शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जहां उल्टे-सीधे काम न होते हों, लेकिन दंडित कोई नहीं होता । यह राजनेताओं समेत सभी मानते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है, लेकिन तमाशा देखिए कि भ्रष्टाचारी कोई सिद्ध नहीं होता है, गोया कि यह भी कोई दैवी चमत्कार हो । दरअसल हमारी न्यायप्रणाली है ही ऐसी कि आरोपी को बचाने के लिए उसने तमाम रास्ते दिए हैं । रसूखदार व्यक्ति किसी न किसी बहाने मामले को सालों लटका लेता है और दंड से बच जाता है । क्या यही अपने लोकतंत्र से अपेक्षित था ?

लोकपाल, आरटीआई, एवं आपराधिक राजनीति

हमारे देश के मौजूदा राजनेता भ्रष्टाचार के प्रति कितने संजीदा हैं यह उनके लोकपाल के मामले को टालने एवं आरटीआई से अपने दलों को मुक्त रखने के इरादे से स्पष्ट है । इसी प्रकार वे राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध भी कारगर उपाय नहीं अपनाना चाहते हैं । जिन आपराधिक छवि के नेताओं के बल पर वे सत्ता हासिल करते आ रहे हैं आज उन्हें वे बचाने की जुगत में लगे हैं । मेरा विश्वास है कि शुरुवाती दौर में राजनीति इतनी अस्वच्छ नहीं थी । समय के साथ आपराधिक छवि के लागों की पैठ जो शुरू हुई तो आज संसद तथा विधानसभाओं में उनका बोलबाला दिखाई देता है । जब ऐसे नेता और उनको बचाने वाले नेता संसद में तो अपराधमुक्त राजनीति कहां से आएगी ? इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें ?

चुनावी एवं प्रशासनिक सुधार

मुझे अब विश्वास हो चला है कि हमारे नेता ऐसे कोई उपाय नहीं करना चाहते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे पर उनकी मनमर्जी पर अंकुश लगाए । मैं अब मानता हूं कि उनमे परस्पर यह मुक सहमति बनी है कि ऐसे किसी भी कानून का हममें कोई न कोई किसी न किसी बहाने विरोध करता रहेगा ताकि वह कानून पास न हो सके । ऊंची-ऊंची बातें होती रहती हैं लेकिन ठोस कुछ किसी को नहीं करना है । यही वजह है कि चुनाव, न्याय-व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, तथा पुलिस तंत्र में सुधार आज तक नहीं हुए हैं और न आगे होने हैं । यही हमारी उपलब्धि है क्या ?

इंडिया बनाम भारत

स्वतंत्र हिंतुस्तान की सबसे त्रासद और दुःखद घटना है इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटवारा । ये देश की चिंताजनक प्रगति है कि यहां दो समांतर व्यवस्थाएं साथ-साथ चल रही हैं । एक व्यवस्था है देश के समर्थ एवं संपन्न वर्ग के लिए और दूसरी है बचेखुचे कमजोर लोगों के लिए । चाहे शिक्षा हो, चिकित्सा हो, यातायात हो या कुछ और, दोनों के लिए असमान व्यवस्था कायम हुई हैं । तर्क दिया जाता है कि लोकतंत्र में तो लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम पाने का अधिकार है । संविधान में जिस EQUALITY की बात कही गई हैं उसके निहितार्थ क्या हैं यह मैं समझ नहीं पाता ।

स्वतंत्रता यानी अनुशासनहीनता

अंत में । क्या ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार्य हो सकती है जिसमें व्यक्तियों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न हो, जहां मर्यादाएं न हों ? लेकिन बहुत से लोगों के लिए स्वतंत्रता के अर्थ हैं अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, जो मर्जी वह करने का अधिकार, कानूनों का उल्लंघन, आदि । हमारा लोकतंत्र लोगों को दायित्यों का एहसास दिलाने का कार्य नहीं कर सका है । लोगों को कार्य-संस्कृति, दूसरों के प्रति संवेदना, देश-समाज के प्रति कर्तव्य का पाठ कोई नहीं पड़ा सका है । सभी को खुली छूट जैसे मिली हो ।

ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठते हैं । ये सब बातें व्यापक बहस के विषय के हैं, किंतु इनसे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि यह देश सही दिशा में नहीं जा रहा है ।

मेरी दृष्टि में चंद्रमा पर यान उतार देना उतना महत्व नहीं रखता जितना सड़क पर कूड़ा बीनने वाले को उस दशा से मुक्त करना । – योगेन्द्र जोशी

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