चुनाव आयोग का राहुल गांधी से सवाल – क्या हो राहुल का जवाब

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

 

बेचारे राहुल गांधी, कांग्रेस के स्टार प्रचारक और लगभग सर्वेसर्वा । बुलंदशहर के हालिया दंगों को लेकर उन्होंने जो उल्टासीधा बोल दिया वह अब उनके गले की हड्डी बन गया है । (देखें 29 अक्टूबर की पोस्टसमझ में नहीं आता कि उन्होंने जो कुछ कहा वह निहायत नादानी में कह दिया या सोचसमझकर । इस बात को शायद वह भी खुद ठीक से नहीं जानते होंगे । बस जोशोखरोश में मन में कुछ आया और बोल गए, आगा-पीछा देखे बिना ।

राहुल गांधी अभी राजनीति में कच्चे खिलाड़ी हैं । कांग्रेसजन तो उन्हीं को आगे करने में उतावले हैं, और उनकी नजर में वे ही प्रधानमंत्री पद के योग्यतम व्यक्ति हैं, क्योंकि वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के वंशज हैं और राजनीति में निपुणता उनको उनसे विरासत में मिली हैं । वे भूल जाते हैं धनसंपदा-जमीन-जायदाद तो कानूनन विरासत में मिलती है, लेकिन किसी विषय में महारत या नैपुण्य नहीं । खैर, होगी क्रांग्रेसजनों की भी कोई मजबूरी !

इन बातों पर लंबी बहस संभव है । मुझे अभी उसमें पड़ने की जरूरत नहीं है । मेरी चिंता तो इस बात को लेकर है कि चुनाव आयोग ने उनसे उनके उपरिकथित दंगों के संदर्भ में स्पष्टीकरण मांग डाला है, जिसका उत्तर वे अभी तक नहीं दे पाए और जिसके लिए उन्होंने हफ्ते भर की मोहलत और मांगी है । जो कहा उसके लिए वे कुछ ऐसी सफाई देना चाहेंगे कि उन्हें शर्मसार न होना पड़े । क्रांग्रेसजन तो अभी तक उनका बचाव करते ही आ रहे हैं । उनकी भी कुछ किरकिरी होनी लाजिमी है । इस मौके पर मेरे दिमाग में एक स्पष्टीकरण सूझ रहा है । काश! कि यह उन तक पहुंच जाए । यों उनके पास तो एक से एक धुरंधर कानूनी सलाहकार होंगे । उन्हीं की पार्टी में अनेकों हैं । फिर भी विधिवेत्ता कभी-कभी चूक कर जाते हैं, जैसे जेठमलानी आत्मविश्वास की अतिशयता में बापू आसाराम को बचाने के चक्कर में बिना किसी प्रमाण के उस नाबालिग को ही दिमागी तौर पर असंयत बता बैठे, जिसने आसाराम पर आरोप लगाए हैं । हां, तो मेरी सफाई कुछ यों है:

“मेरे पास एक आदमी आया था जिसका कहना था कि वह अमुक खुफिया एजेंसी में कार्यरत है । मैं झूठ नहीं बोलूगा; मैंने उस पर भरोसा कर लिया । मुझे लगा कि यह व्यक्ति मुझ तक यों ही नहीं पहुंच गया होगा । उस आदमी को मेरी उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था से गुजरना ही पड़ा होगा । सुरक्षाकर्मियों ने अवश्य ही उसके बारे में पूरी जांच की होगी और उसके दावे को सही पाया होगा । मैं खुद अपने से मिलने वालों की जांच कभी नहीं करता, सो इस बार भी वैसा करने की जरूरत नहीं थी । उस व्यक्ति ने मुझे जो बताया वह सब जगजाहिर है । उसने वह सब मुझे बताना चाहिए था या नहीं इसका ख्याल तो उसे रहा ही होगा । उसे तो अपने खुफिया तंत्र के सर्विस-रूल्स मालूम ही होंगे । उसने जो कुछ बताया वह क्यों बताया, जब इस सवाल पर मैंने गंभीरता से विचार किया तो यही समझ में आया कि दंगों के दुष्परिणामों की हकीकत देश की जनता के सामने आनी चाहिए । लोगों को जानने का हक है इसीलिए तो हम आर.टी.आई. कानून लाए थे । जब देश में कोई आंतकी घटना होती है तो उसे छिपाते नहीं हैं । उसकी चर्चा करते हैं और पाकिस्तानी आई.एस.आई. की भूमिका की बात करते हैं । ठीक उसी तर्ज पर मैंने वे बातें कहीं जिनकी सफाई मुझसे मांगी जा रही है । इसे यदि मेरी गलती मानी जाती है तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं । अगर गलती उस खुफिया-कर्मी की है तो उसकी सफाई वही दे सकता है । और यदि वह व्यक्ति खुफियाकर्मी ही नहीं था तो गलती मेरे सुरक्षकर्मियों की है और वे ही उसकी सफाई दे सकते है ।”

जाहिर में कि पूरा मामला लंबीचौढ़ी जांच का बन जाता है । उसके लिए एक जांच कमिशन होना चाहिए जिसके नतीजे सालों में आएं । अंततः मामला रफादफा हो जाए । मेरी दिली तमन्ना है कि ऐसा ही हो ! – योगेन्द्र जोशी

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