“सचिन, सचिन, सचिन …” का जाप अंततः खत्म हुआ भारत रत्न के राष्ट्रीय सम्मान के साथ

Sachin & Rao   सर्वत्र छाया सचिनगुणगान !

पिछले कुछ दिनों से टेलिविजन समाचार चैनलों, विशेषतः हिन्दी चैनलों, पर और कई अखबारों में सचिन छाए हुए हैं । जिधर देखो सचिन की महानता का गुणगान चल रहा है, और उनको देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान “भारत रत्न” दिए जाने की मांग जोर-शोर से उठती रही है ।

जिधर देखो उधर “सचिन” , “सचिन”, “सचिन” …। “क्रिकेट के भगवान सचिन”, “क्रिकेट के महानायक सचिन”, “सचिन, गॉड ऑफ क्रिकेट ”, आदि-आदि । आगे “सचिन”, पीछे “सचिन”, अगल “सचिन”, बगल “सचिन”। बस केवल “सचिन”। मैं समाचार चैनलों को खोजता रहा इस उम्मीद के साथ कि कहीं कोई सार्थक समाचार प्रसारित कर रहा हो जिसे देखूं-सुनूं । प्रायः निराश ही रहा । दुनिया में रोज कुछ न कुछ तो घटता ही रहता है, कहीं अच्छा तो कहीं बुरा, कभी अधिक अहम तो कभी कुछ कम । लेकिन “सचिन” के नाम पर सभी चैनल सब कुछ भूल गए । केवल “सचिन” की चर्चा । माफ करें कि मुझे कहना पड़ रहा है कि “सचिन”, “सचिन”, “सचिन” … सुनते-सुनते मेरे तो कान पक गये ।

क्रिकेट की दीवानगी स्पष्ट कर दूं कि मुझे “सचिन” से कोई शिकायत नहीं है । व्यक्तिगत तौर पर मैं क्रिकेट को एक घटिया, उबाऊ, और समय की बरबादी वाला खेल मानता हूं । मुझे याद नहीं कि मैंने आज तक कभी मैदान में अथवा टी.वी. पर्दें पर क्रिकेट मैच देखा हो, शायद छात्र-जीवन में भी नहीं । लेकिन अनेकों भारतीय क्रिकेट देखते हैं । मुझे इसमें कोई दोष नहीं दिखता । मैं नहीं देखता, किंतु कई – सब नहीं – क्रिकेट देखते हैं पूरी तल्लीनता से । निःसंदेह इस देश में क्रिकेट इंग्लैंड से भी अधिक लोकप्रिय बन चुका है ।

मुझे दिक्कत तब महसूस होती है जब लोग दीवाने ही नहीं, बल्कि उसके आगे पागलपन की हद पर पहुंच जाते हैं । यह पागलपन “सचिन” को लेकर भी मुझे देखने को मिल रहा है । मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा पागलपन क्यों । कल ही एक समाचार चैनल पर देख रहा था कि किस तरह कुछ युवतियां “सचिन” की तस्वीर सजा के “जै सचिन बाबा …” (“जय जगदीश हरे …” की तर्ज पर) का “भजन” गा रही थीं । ये सब मुझे दिमागी दिवालियापन ही लगता है ।

किसी व्यक्ति के हुनर या कला की तारीफ करना, उसका प्रशंसक होना, समुचित अवसर के अनुकूल उसकी चर्चा करना ठीक है । लेकिन सब कुछ भुला के उसी का यशोगान करना ठीक लगता है क्या ?

सचिन को भारत रत्न का सम्मान “सचिन” के मामले में तो बात कहीं अधिक आगे तक बढ़ी है “भारत रत्न का सम्मान दो” की मांग के रूप में । हर तरफ से आवाज उठने लगी । मौजूदा सरकार के शीर्षस्थ प्रबंधक तो पहले से ही “सचिन” के कायल रहे हैं । उन्होंने और अधिक देर किये बिना उक्त सम्मान “सचिन” पर निछावर भी कर दिया । (भारत रत्न सम्मान-सूची देखें यहां अथवा यहां)

लगे हाथ एक और व्यक्ति को भी भारत रत्न का सम्मान मिल गया – वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.एन.आर. राव, जिनका कार्यक्षेत्र रसायन(केमिस्ट्री)-भौतिकी(फिजिक्स) रहा है । भौतिकी विषय का अध्यापक/वैज्ञानिक होने के नाते मैं प्रो. राव के बारे में थोड़ा-बहुत जानता हूं, लेकिन मुझे शंका है कि रसायन-भौतिकी से इतर क्षेत्रों के कम ही वैज्ञानिक उनके बारे में जानते होंगे । तब भला आम जन उनके बारे में कितना जानते होंगे यह समझा जा सकता है ।

वस्तुतः आम लोग राजनेताओं, फिल्मी हस्तियों और चर्चित खिलाड़ियों को छोड़ अन्य क्षेत्रों के लोगों को कम ही जानते हैं । “सचिन” के लिए भारत रत्न का जैसा हल्ला मचाया जा रहा था वैसा प्रो. राव के लिए कोई नहीं मचा सकता है, फिर भी उन्हें यह सम्मान मिल ही गया । निःसंदेह वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक हैं और देश-विदेश से अनेकों सम्मान/पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं । वे स्वयं राजनेताओं के बारे क्या सोचते हैं इसे देखिये:

“….why the hell these idiots, these politicians have given so little for us. Inspite of that, we scientists have done something,” Prof. Rao said, losing his cool.

अब प्रो. राव यह अवश्य कहते हैं कि यह तो वे मजाक में कह गये थे । कोई व्यक्ति कम गंभीरता से बोलता है और कब मजाक में यह जान पाना इस ‘महान’ देश में संभव नहीं ! भारत रत्न की मांग औरों के लिए भी सचिन के भारत रत्न की चर्चा सर्वत्र बारंबार पूरे जोर-शोर से हुई और उन्हें चहुं ओर से बधाइयां भी मिल गयीं । उसके बाद और लोगों को भारत रत्न क्यों नहीं जैसे सवाल उठने लगे हैं । यों पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेई, बंग राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु एवं राजनीति में दलितों को स्थापित करने वाले कांसीराम के लिए पिछले कुछ समय से इस सम्मान की मांग उठती आ रही है । अब बाजपेई जी के लिए भा.ज.पा. अधिक मुखर होकर नये सिरे से मांग कर रही है, जिसका समर्थन कई अन्य लोग कर रहे हैं । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाजपेई के साथ राममनोहर लोहिया एवं कर्पूरी ठाकुर की भी वकालत कर डाली है । एक बात दिलचस्प है । सचिन के लिए भरत रत्न की मांग जितने जोरशोर से चारों ओर से हुई है वह अपने आप में अद्वितीय है । ऐसा हल्ला शायद आज तक किसी व्यक्ति के लिए देश के इतिहास में अभी तक नहीं मचा था । यह हल्ला क्रिकेट के प्रति कुछ लोगों का अनन्य लगाव और सचिन के प्रति पागलपन का द्योतक है । मैं इसका विरोधी हूं, लेकिन किसी के पागलपन का इलाज भला मैं कैसे कर सकता हूं ? सचिन को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए यह बात जनता दल (यू) के शिवानंद तिवारी अपने तर्कों के साथ कह चुके हैं । ऐसे बहुत जन हैं जो पूछते हैं कि हॉकी के ‘जादूगर’ ध्यानचंद को यह सम्मान क्यों नहीं दिया गया । भारत रत्न – समुचित प्रक्रिया का अभाव बहुत-से लोगों का मत है कि “भारत रत्न” का सम्मान बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यह निश्चित करना मुश्किल है कि कौन इसके योग्य है और कौन नहीं । वस्तुतः यह कुछ हद तक राजनीति की चपेट में आ चुका है । मेरी जानकारी में इस सम्मान के योग्य पात्र के चुनाव की कोई कारगर और विवादमुक्त प्रक्रिया है भी नहीं । बहुत कुछ राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री की मरजी पर निर्भर करता है । जिस प्रकार पहले कभी राजे-महाराजे उस व्यक्ति को स्वेच्छया पुरस्क्त कर देते थे जिससे वे खुश हो जाते थे, कुछ उसी प्रकार केंद्र सरकार करती है ।

सचिन के मामले से यह स्पष्ट होता है कि जिसके पीछे इस सम्मान की मांग करने वाले समर्थकों की फौज खड़ी हो जाए वह सम्मान पा जाता है । यह भी निश्चित है कि यदि केंद्र में अगली बार भा.ज.पा.-नीत सरकार बन गई तो बाजपेई जी को भारत रत्न का सम्मान मिल जाएगा ।

अभी तक की स्थिति यह है कि एक वर्ष में अधिकतम 3 व्यक्तियों को ही यह सम्मान दिया जा सकता है । इस स्म्मान के स्थापना के समय देश की जनसंख्या मात्र 30 करोड़ से कम थी । आज वह 4 गुनी हो चुकी है । समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय लोगों की संख्या 4 गुनी से भी अधिक हो चुकी है, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, खेल-कूद, विविध कलाओं आदि के क्षेत्र में यही स्थिति है । तब क्या भारत रत्न सम्मानों की संख्या भी 4 गुनी यानी 12 नहीं कर देनी चाहिए ?

मैं स्वयं को इस योग्य नहीं मानता कि किसे भारत रत्न मिले यह बता सकूं । इतना कहना काफी है कि सचिन ने क्रिकेट से लगभग सन्यास लेने के साथ ही भारत रत्न पा लिया तो एक अध्याय बंद हुआ । मैं उम्मीद करता हूं कि दो-चार दिन और मीडिया पर सचिन-चर्चा होगी और फिर वक्त-बेवक्त “सचिन-चालीसा” मुझे नहीं सुननी पड़ेगी । कुछ तो सुकून मिलेगा ! – योगेन्द्र जोशी

पुनश्च:

आज के अखबार की खबर है कि बिहार के कैमूर जिले में “भगवान सचिन” के नाम पर बने मंदिर में उक्त “भगवान” की मूर्ति का अनावरण गायक मनोज तिवारी द्वारा किया गया है । इस मंदिर में लोग नये “भगवान” की पूजा अर्चना करेंगे और कदाचित अपने दु:ख-दर्दों से मुक्ति की प्रार्थना कर सकेंगे ।

मेरा देश वाकई महान है ।

यहां जो व्यक्ति असाधारण उपलब्धि पा लेता है और तमाम लोगों का चहेता बन जाता है वह अंततः भगवान का दर्जा पा जाता है । यह देशवासियों में व्याप्त हीन भावना का द्योतक है कि लोग स्वयं को ऐसे व्यक्ति के समक्ष दीन-हीन पाता है और स्वयं को बराबरी पर सोच ही नहीं सकता है । भक्तों की दृष्टि में तो बाबा आसाराम-बाबा साई भी भगवान हैं !

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