राज्यों के चुनाव – आ.आ.प. पार्टी की उपलब्धिः कांग्रेस, भाजपा के लिए चेतावनी

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव

पांच राज्यों के विधान-सभाओं के बहुप्रतीक्षित चुनाव परिणाम अंततः आ ही गये । देश की राजनीति में छोटे-छोटे पूर्वोत्तर राज्यों की भूमिका को अहम नहीं माना जाता । मीडिया वहां के चुनाव परिणामों का खास जिक्र नहीं करती । कांग्रेस का वहां जीतना देश की राजनीति के लिए माने नहीं रखता । इसीलिए मीजोरम को छोड़कर शेष चार – दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छट्टीसगढ़ – को केंद्र में रखकर ही समीक्षकगण परिणामों के निहितार्थ पर बहस कर रहे हैं । मैं भी लगे हाथ अपनी टिप्पणी पेश कर रहा हूं ।

पिछले दश-बारह सालों से मैं किसी भी दल को वोट नहीं दे रहा हूं । मेरे अनुभव में यही आया है कि मौजूदा भारतीय राजनीति में सभी राजनेता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं । सभी दल सत्ता के भूखे हैं और सत्ता हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं । राजनैतिक-प्रशासनिक सुधारों की बात वे जोर-शोर से करते तो हैं, लेकिन हकीकत में सभी किसी न किसी बहाने उन्हें टाल जाते हैं । भ्रष्टाचार से उन्हें परहेज नहीं । ऐसी स्थिति में किसे वोट दूं समझ में नहीं आता । अतः चुनाव नियमों के धारा 49ओ के अधीन 17ए का ही प्रयोग करने लगा हूं । खुशी की बात है कि इस बार चुनाव आयोग ने “नोटा” (NOTA) का विकल्प भी मतदाताओं को प्रदान किया है । अपनी निराशा व्यक्त करने के लिए मतदाता के पास यह विकल्प है तो । मीडिया के अनुसार नोटा का प्रयोग करने वालों की संख्या 1 प्रतिशत या अधिक रही ।

किंतु सभी तो मेरी तरह नहीं सोचते हैं न ? प्रायः सभी वोट देते हैं और चुनावी नतीजों में उलट-फेर भी कर सकते हैं, जो मौजूदा चुनाव में खुलकर दिख रहा है । मैं भविष्य में मत डालूंगा या नहीं अभी कह नहीं सकता, परंतु इन चुनावों की अनदेखी नहीं कर सकता । इन परिणामों से कुछ सार्थक निष्कर्ष तो निकाले ही जा सकते हैं । मैं वही कर रहा हूं ।

आ.आ.प. (आप) पार्टी और दिल्ली

अन्ना के आंदोलन से पैदा हुई किंतु उनकी असहमति/नाखुशी झेल रही आप पार्टी बमुश्किल डेड़-दो वर्ष पुरानी है । फिर भी उसने दिल्ली में जो कर दिखाया वह काबिलेतारीफ है । इस पार्टी की खास बातें ये हैं:

1.   यह नितांत नये दर्शन के साथ मैंदान में कूदी है जो अन्ना के राजनैतिक दर्शन कि अंततः जनता ही सर्वोपरि है पर आधारित है । अन्ना के अनुसार जनता के सामने यह अहंकार नहीं व्यक्त किया जा सकता कि हम चुनाव जीतकर आये हैं, इसलिए अब समस्त राजनैतिक शक्तियां हम में समाहित हो चुकी हैं और जनता अब चुप बैठे । अभी तक सभी दल इसी अहंकार से ग्रस्त हैं ।

2,   आम पार्टी आम आदमी का सही अर्थों में प्रतिनिधित्व करती है । मतलब यह कि वह आम लोगों से निकलकर बाहर आए व्यक्तियों का संगठन है । चुने हुए प्रतिनिधि होने के कारण उन्हें अब वी.आई.पी. का दर्जा भले ही दिया जाए, लेकिन उम्मीद की जाती है कि वे अपने को जनता का स्वामी नहीं मानेंगे ।

3.   यह पार्टी बीते समय की किसी राजनैतिक हस्ती या चिंतक को केंद्र में रखकर नहीं बनी है । यह गांधी, नेहरू, पटेल (सरदार), अंबेदकर, लोहिया, दीनदयाल, जयप्रकाश (लोकनायक) आदि में से किसी के नाम पर खड़ी नहीं हुई । यह सबका सम्मान तो करेगी लेकिन उनके कीर्तिगान से राजनीति नहीं चलाएगी ।

4.   इसका अपना वोटबैंक है इस अर्थ में कि जो लोग पहले से ही अस्तित्व में आए राजनैतिक दलों की कार्यप्रणाली से खिन्न हो चुके हैं वे इसमें एक विकल्प देख रहे हैं और उसे चुन रहे हैं । लेकिन इसका वोटबैंक अल्पसंख्यकवाद, क्षेत्रवाद, दलितवाद, सेक्युलरवाद, भाषावाद आदि पर नहीं आधारित है । इसका वोटबैंक आम आदमी ही है !

5.   देश की राजनीति में यह कुछ नया करने का विचार रखती है । राजनीति में शुचिता का यह पक्षधर है और इसीलिए लोग इसकी ओर खिंच रहे हैं ।

यह दल उन राजनेताओं की चुनौती पर बना जो कहते फिरते थे कि चुनाव जीतकर दिखाओ । दिल्ली में कांग्रेस को धूल चटाकर और बीजेपी को उसकी हैसियत दिखाकर इसने उनके दंभ को चुनौती दी है । यह करिश्मा कर के दिखाना कोई छोटी बात नहीं है । इसके गठन के समय सभी दल इसका मजाक उड़ा रहे थे कि यह बरसाती नाले की तरह आई-गई हो जाएगी । आज भी कुछ अहंकारी नेता है जो कह रहे है कि यह तो एक धूमकेतु है जो आज आया है और अगले चुनाव में गायब हो जाऐगा । अपनी खीज मिटाने को बहुत कहा जा सकता है ।

कांग्रेस के लिए संदेश

आप की अप्रत्याशित जीत कांग्रेस पार्टी को बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है । यह तो किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि राजनीति का नया-नया खिलाड़ी केजरीवाल शीला दीक्षित को कोई 25+ हजार वोटों से हराएगा । हारजीत राजनीति में देखी जाती है, लेकिन ऐसी हारजीत शायद नई है ।

मुझे ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी के लिए समय आ गया है कि वह नेहरू-गांधी परिवार के आभामंडल से बाहर निकलकर अंदरूनी लोकतंत्र वाला एक राजनैतिक दल बने ।

कांग्रेस अपने को 126 साल पुरानी पार्टी कहते हुए नहीं अघाती है । लेकिन यह भूल जाती है कि यह देश की स्वतंत्रता से पहले एक नितांत भिन्न उद्येश्य से बना संगठन था । देश के प्रायः सभी धुरंधर नेता इसी में शामिल होकर देश की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे । नेहरू का उस पार्टी पर ऐसा एकाधिकार नहीं था जैसा आज नेहरू-गांधी परिवार का है । बारी-बारी से अनेकों नेता उसके अध्यक्ष हुआ करते थे, वे कमोबेश बराबरी पर खड़े होते थे । उनमें आपस में मतैक्य अथवा मतभेद, दोनों ही, होते थे जो स्वाभाविक था । उस कांग्रेस में नेहरू ने कुछ कह दिया और शेष लोगों के लिए वह ब्रह्मवाक्य हो गया ऐसा कभी नहीं था, जैसा कि आज की कां्रग्रेस में देखने को मिल रहा है ।

यह इस दल और प्रकारांतर से देश का दुर्भाग्य है कि कांग्रेसजन चाटुकारिता के रोग से ग्रस्त हैं । वे नेहरू-गांधी परिवार के, और संप्रति राहुल गांधी के, गुणगान से बाहर की सोच ही नहीं पाते । इस परिवार के सामने वे इस कदर नतमस्तक एवं समर्पित हैं कि परिवार के बाहर के नेतृत्व की उनके विचार में आता ही नहीं । किसी भी लोकतांत्रिक दल में नेतृत्व की क्षमता एवं आकांक्षा रखने वाले एक से अधिक जननायकों को होना स्वभाविक तथा आवश्यक है, लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां अधिकांश दल एक व्यक्ति या परिवार के इर्दगिर्द अस्तित्व में हैं । ये दल उस व्यक्ति/परिवार से बाहर के नेतृत्व की कल्पना ही नहीं करते । कांग्रेस पार्टी में पहले कभी ऐसा नहीं था, परन्तु अब वह भी इसी रोग का शिकार हो चुकी है । देश का 10 वर्ष तक प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति राहुल के मातहत कार्य करने में प्रसंन्नता अनुभव करे तो इसे चाटुकारिता की पराकाष्ठा नहीं कहा जाएगा क्या ?

यह सच है कि नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेसियों को एक दल के तौर पर बांधे रखने वाला गोंद (फेबिकॉल) है । ऐसा इसलिए कि कभी वैकल्पिक नेतृत्व उभरने देने की कोशिश उनके बीच हुई ही नहीं । आप सोचिए सोनिया गांधी के बाद राहुल, फिर कौन ? शायद प्रियका बढेरा, फिर । नेतृत्व इसी परिवार के हाथ में रहना है !!

“राहुलजी तो हमारे जन्मजात नेता हैं । उन्हें नेतृत्व क्षमता तो विरासत में मिली है । वे हमारे भावी प्रधानमंत्री हैं । प्रधानमंत्री पद पर पहला अधिकार तो उन्हीं का बनता है ।” जैसी बातों से कांग्रेसियों को बाहर निकल जाना चाहिए । अब तक तो उन्हें यह अहसास हो ही गया होगा कि राहुल में कोई राजनैतिक खूबी नहीं है । सामान्य आदमी से आप बात करें तो वह राहुल के विचारों को प्रायः अपरिपक्व ही बताऐंगे ।

इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि धनसंपदा की तरह राजनीति की समझ और नेतृत्व-क्षमता विरासत में नहीं मिलती । नेहरू एवं इंदिरा गांधी की खूबी राहुल को महज इसलिए मिलेगी कि वे उस परिवार में जन्मे हैं ऐसा सोचना मूर्खता है । दरअसल राहुल सामान्य राजनेता से अधिक कुछ नहीं !

कांग्रेसियों को उक्त परिवार के प्रति दासत्वभाव से बाहर निकलने में वक्त लगेगा, किंतु उन्हें इस दिशा में सोचना आरंभ करना चाहिए ।

भाजपा एवं अन्य दल

दिल्ली में कांग्रेस की करारी हार में आप पार्टी का बड़ा हाथ रहा इसमें दो राय नहीं । लेकिन भाजपा को यह समझना चाहिए कि आप ने कांग्रेस का ही नहीं भाजपा का भी खेल बिगाड़ा । अगर आप पार्टी न होती तो कांग्रेस की हार इतनी बुरी न होती और न ही भाजपा बहुमत से दूर रहती । इस समय तो दिल्ली विधान सभा त्रिशंकु हो गई है ।

यह निश्चित है कि आप पार्टी के नूतन राजनीतिक दर्शन ने अपना प्रभाव दिल्ली में तो छोड़ा ही है और यदि वह अपना प्रभाव क्षेत्र का विस्तार दिल्ली से बाहर भी करे तो उसे सफलता अवश्य मिलेगी । कितनी सफलता यह नहीं कहा जा सकता, परंतु वह राजनैतिक समीकरणों को एक हद तक प्रभावित अवश्य करेगी । दिल्ली की जीत से आप में ही आत्मविश्वास नहीं जगा है, बल्कि बहुत-से लोगों को भी उसके प्रति आकर्षित किया है । लोग उससे जुड़ने लगेंगे, और यह अन्य दलों की कीमत पर ही होगा, जिसमें कांग्रेस ही नहीं भाजपा भी शामिल रहेगी ।

आप पार्टी की सफलता ने यह संदेश भी अन्य दलों को दिया है कि अब उनकी मनमर्जी नहीं चलेगी । लोग जागरूक हो रहे हैं । उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख दलों, सपा एवं बसपा, ने इस बार प्रदेश से बाहर भी सफलता पाने की कोशिश की थी । सपा तो बुरी तरह असफल रही और बसपा भी पुरानी सफलता से आगे नहीं बढ़ पाई ।

इन दलों की साख अच्छी नहीं रही है । कभी देश के अग्रणी राज्यों में शुमार उ.प्र. को इन दोनों ने बारी-बारी से बरबाद किया है ऐसा मेरा सुविचारित मत है । वस्तुतः ये दल विशुद्ध वोट-बैंक की राजनीति का खेल खेलते आ रहे हैं । बसपा ने दलित वोट बैंक से सफलता पाई, और कालांतर में ब्राह्णों, जिनको वह कभी गाली देती थी, को अपने से जोड़कर बोट बैंक का विस्तार किया । सपा ने यादव-मुस्लिम वोट बैंक के बल पर अपनी राजनीति चमकाई । उसने “भाजपा आएगी तो तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा” जैसा संदेश मुस्लिमों को देते हुए उनके वोट बटोरने की नीति अपनाई ।

लेकिन अब मुझे लगता है कि मौजूदा चुनावों में भाजपा की उल्लेखनीय जीत और आप का दिल्ली में प्रदर्शन यहां के वोटरों को भी प्रभावित करेगा । कुछ न कुछ वोटरों को तो उपर्युक्त दोनों दलों के वोट बैंक राजनीति से मोहभंग होगा, जिसके परिणाम इन दलों को लोकसभा चुनाव में भुगतने पड़ेंगे । सपा को अब समझना होगा कि मुसलिम समुदाय को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बनाए रखा जा सकता है । लैपटॉप आदि बांटकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की राजनीति अधिक सफल नहीं होगी । उसे अपने शासन में सुधार करना होगा । इस समय उ.प्र दुर्व्यवस्था के दौर से गुजर रहा है । बिजली, पानी, सड़क, कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि, कोई क्षेत्र नहीं जहां स्थिति संतोषजनक हो ।

राजनैतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि जनता अब धीरे-धीरे जाग रही है । – योगेन्द्र जोशी

और अंत में एक तस्वीर:

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