2 अक्टूबरः गांधी जयंती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (1)

स्वच्छता अभियान

 

 

 

 

गांधी-शास्त्री जयंती

2 अक्टूबर गांधी जयंती है । प्रायः सभी देशवासी इस दिन से सुपरिचित रहे हैं, क्योंकि प्रथमतः इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है और द्वितीयतः गांधी के नाम को दुनिया में अहिंसक आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है । कदाचित कम ही लोगों को यह याद रहता होगा कि “जय जवान जय किसान” का नारा देने वाले तथा सोमवार को सामूहिक उपवास रखने की अपील करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।

मैं देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधी को उतना नहीं देता जितना आम तौर पर दिया जाता है । अवश्य ही उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, किंतु स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने वाले अनेकों स्मरणीय जननेताओं का योगदान कम नहीं रहा । वस्तुतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सामाज्य की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उन्हें अपना सामाज्य संभालना कठिन लगने लगा था और एक-एक करके उन्हें तमाम बड़े देशों को स्वतंत्रता प्रदान करनी पड़ी थी । यह मेरा मत है जिसे लोग शायद स्वीकार न करें । मेरा यह आलेख स्वाधीनता के मुद्दे पर केंद्रित न होकर गांधी से जुड़े अन्य बातों पर केंद्रित है ।

गांधी और अहिंसा

निःसंदेह गांधी अहिंसा के पक्षधर थे, लेकिन कदाचित कायरता के पक्षधर नहीं थे । वे कठिन परिस्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिंसक मार्ग अपनाने से हिचकने की सलाह देते रहे हों मैं ऐसा नहीं समझता । अस्तु, अहिंसा को केवल गांधी से जोड़कर ही क्यों देखा जाता है ? अनेक ऐसे महापुरुष हो चुके हैं जिन्होंने हिंसा का मार्ग त्यागने की सलाह दी है । यह ठीक है कि सभी समान रूप से सुविख्यात नहीं रहे हैं, पर उनको भुलाया नहीं जा सकता । भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, एवं प्रभु यीशु को तो दुनिया जानती ही है । वे सभी तो अहिंसा का उपदेश देते रहे । अवश्य ही उन्हें अहिंसक आदोलन चलाने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि उनके काल में राजनैतिक परिस्थियां आधुनिक काल की सी नहीं रहीं । वस्तुतः गांधी स्वयं इन महापुरुषों से प्रेरित रहे हैं ।

सवाल है कि गांधी की चर्चा अहिंसा के संदर्भ में ही सर्वाधिक क्यों की जाती है । उन्होंने तमाम अन्य बातों पर भी जोर डाला था जिनको अपनाने की सलाह उन्होंने लोगों को दी थी । किंतु उन बातों की चर्चा आम तौर पर जोरशोर से नहीं की जाती है । मैं समझता हूं कि गांधी के अहिंसा की बात को सारी दुनिया इसलिए महत्व देती है क्योंकि हिंसा से प्रायः हर मनुष्य डरता है । हो सकता है कि आंतकवादी और उनके विरुद्ध लड़ने का दायित्व निभाने वाले सुरक्षकर्मी न डरते हों । अथवा स्वीकारे गए दायित्य के कारण उन्हें कदाचित निडरता बरतनी पड़ती हो । अतः अधिकांशतः सभी चाहेंगे हि मानव समाज हिंसामुक्त हो । मैं इस भावना को मनुष्य के स्वार्थ की प्रवृत्ति से जोड़कर देखता हूं, अर्थात उसकी इस अपेक्षा से कि अन्य जन उसको हानि न पहुंचाएं । गांधी की अन्य बातें मनुष्य के स्वार्थ के अनुरूप नहीं हैं, अतः उन बातों का पक्ष लेने और उन्हें जीवन में अपनाने में उन्हें असुविधा अधिक और व्यक्तिगत लाभ कम दिखता है ऐसा मैं मानता हूं । इसलिए लोग उन बातों को तवज्जू नहीं देते हैं । मैं अपने उक्त मत को सप्ष्ट करता हूं:

गांधी के विषय में व्यापक एवं शोधपरक अध्ययन मैंने नहीं किया है । अतः उनके बारे में बहुत कुछ तथा वह भी सही-सही जानता हूं यह दावा नहीं कर सकता । जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार वे अहिंसा के अतिरिक्त अधोलिखित बातों को महत्व देते थे और उन पर स्वयं अमल करते थे, न कि दूसरों को महज उपदेश भर देते थे:

गांधी – अहिंसा से आगे कुछ और भी

(1) स्वच्छता – गांधी का स्वच्छता पर विशेष ध्यान था । वे मानते थे कि हर व्यक्ति को स्वयं अपने हाथ से साफ-सफाई करनी चाहिए । यदि दूसरों का शौच आदि उठाने की जरूरत पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए । स्वच्छता से उनका ताप्तर्य दूसरों से सफाई करवाना नहीं था, बल्कि उसमें स्वयं भागीदारी निभाना था ।

(2) शारीरिक श्रम – गांधी शारीरिक श्रम के पक्षधर थे और यह विचार रखते थे कि मनुष्य को अपना कार्ययथासंभव अपने शारीरिक श्रम के संपन्न करना चाहिए । मशीनों पर निर्भरता कम से कम होना चाहिए । उन्हें किस स्थिति में इस्तेमाल करना चाहिए इस पर विवेकपूर्ण विचार होना चाहिए । मात्र आलस्य अथवा सुविधाभोग के लिए हमें अपने शारीरिक श्रम से नहीं बचना चाहिए । श्रम करने के लाभ क्या-क्या हैं यह तो लोग समझते हैं, किंतु उससे फिर भी बचते हैं । गांधी की नजर में व्यावसायिक तौर पर शारीरिक श्रम करने वालांे को हेय दर्जा देना अक्षम्य माना जाना चाहिए ।

(3) सादा जीवन – वे सादगी भरे जीवन के पक्षधर थे । शानो-शौकत और दिखावे का जीवन उनके विचारों के प्रतिकूल था । उनके मतानुसार व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके विचारों से आंकी जानी चाहिए न कि उसकी भौतिक सपन्नता से । आज के युग में गांधी के कितने प्रशंसक होंगे जो अपनी आर्थिक संपन्नता के बावजूद सादा जीवन जीते हों । आज तो व्यक्ति ही संपन्नता ही उसकी सामाजिक श्रेष्ठता का आधार बन चुका है ।

(4) सामाजिक समानता – गांधी का मत था कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, सबको सम्मान दिया जाना चाहिए । यह सच है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । परंतु  सभ्य समाज वही कहला सकता है जिसमें इस अंतर को भेदभाव का आधार न बनाया जाता हो । शारीरिक अथवा बौद्धिक स्तर पर कोई अधिक समर्थ होता है तो कोई कम । तदनुसार लोग अपना-अपना व्यावसायिक क्षेत्र चुनते हैं, परंतु उस क्षेत्र के आधार पर उन्हें ऊंचनीच की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए । धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर तो भेदभाव किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि ये कृत्रिम आधार हैं – समाज में घर कर गईं विकृतियां । छुआछूत गांधी की दृष्टि में हिंदू समाज पर एक कलंक है ।

(5) कमजोर का शोषण न हो – अपेक्षया कमजोर व्यक्ति का शोषण विश्व के हर समाज में सदा से ही होता रहा है । गांधी चाहते थे कि हमें शोषण की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना चाहिए । किंतु देखने में आता है कि समाज में कमजोर व्यक्ति से तरह-तरह से लाभ उटाये जाते हैं । कमजोर व्यक्ति से कम से कम पारिश्रमिक देकर अधिक से अधिक कार्य लेना आम बात है । दूसरों का हक छीनने में भी बहुतों को कोई संकोच नहीं होता है । वास्तव में देखा जाय तो समाज में फैले कदाचार का संबंध शोषण की प्रवृत्ति से ही है । वस्तुस्थिति का अपने हक में लाभ उठाना और दूसरों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हानि पहुंचाना आम प्रवृत्ति है ।

(6) आर्थिक विषमता कम हो

कहा जा चुका है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । अतः अर्थोपार्जन की क्षमताएं असमान है । अपने बौद्धिक कौशल से कोई असीमित संपन्नता अर्जित कर लेता है तो कोई अपनी सीमित क्षमताओं के कारण जीवन-यापन के लिए पर्याप्त साधन तक नहीं जुटा पाता है । फलतः समाज में आर्थिक विषमता स्वाभाविक तौर पर बढ़ती जाती है । गांधी का मत था कि सब असमान जन्म लेेते हैं के तर्क के साथ इस असमानता का औचित्य नहीं ठहराया जाना चाहिए । वे चाहते थे कि हमें ऐसी सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था अपनानी चाहिए जिससे यह अंतर कम से कम हो । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि समाज में यह प्रवृत्ति पैदा की जानी चाहिए कि संपन्न वर्ग किंचित त्याग के लिए प्रस्तुत हो और कमजोर वर्ग को ऊठाने में योगदान दे ।

ये वे कुछ बातें हैं जो इस समय मेरे विचार में आ रही हैं । ऐसी अन्य बातें भी होंगी जो गांधी के चिंतन में रही हों । गौर करें तो देखेंगे कि ये बातें मनुष्य के विविध स्वार्थों के प्रतिकूल हैं – स्वार्थ जिनमें सुविधा भोगना, संपन्नता अर्जित करना, दूसरों पर वर्चस्व पाना, दायित्वों से बचना, आदि शामिल हैं ।

स्वच्छता अभियान

गांधी-चिंतन में जिस स्वच्छता को महत्व दिया गया है उसे आज मौजूदा प्रधानमंत्री मोंदी ने अपने स्वच्छता व्भियान का आधार बना लिया है । मोदी ने भविष्य में सतत चलने वाले इस अभियान के लिए गांधी जयंती को चुना है । देखने पर मोदी के इरादे सराहनीय लगते हैं । साथ में मेरे मन में ये सवाल भी उठते हैं:

(1) वे और उनके दल के लोग इस विषय पर कितने गंभीर होंगे ?

(2) उनकी खुद की सरकार तथा राज्यों की सरकारों की प्रतिवद्धता किस स्तर की होगी ?

(3) इस कार्य के लिए कैसे पर्याप्त संसाधन जुटाए जाएंगे ?

और (4) आम जन का कितना सहयोग उन्हें मिलेगा ?

ऐसे और भी प्रश्न हैं । इन प्रश्नों के उत्तर स्वयं मोदी के पास होंगे इसमें मुझे शंका है । उम्मीद पर दुनिया टिकी है, सो हमें सफलता की आशा करनी चाहिए । इस बारे में कुछ अधिक कहने से पहले मैं कांग्रेस पार्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहता हूं ।

कांग्रेस पार्टी गांधी पर अपना “कॉपीराइट” जताती है, जब कि गांधी स्वातंत्र्योत्तर भारत के किसी दल के नेता नहीं थे । वे पूर्व में एक जननायक थे और वही अंत तक रहे । कांग्रेस यह भूल जाती है कि वे उस कांग्रेस के नेता थे जो देश के स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थी । और उन्होंने स्वतंत्र भारत में चुनाव लड़ने के लिए बने राजनैतिक दल के तौर पर कांग्रेस को नहीं स्वीकारा । वे उससे नाता तोड़ चुके थे । ऐसे में कांग्रेसियों का उन्हें अपने दल से जुड़ा होना कहना नितांत गलत है । वैसे भी कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने गांधी की जीवन शैली अपनाई हो ?  गांधी को अपना कहने वाले कांग्रेस के किसी नेता ने ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाया ? क्यों नहीं स्वयं मनमोहन सिंह के दिमाग में स्वच्छता अभियान का खयाल आया ? अस्तु, गांधी के नाम पर किए जाने वाले मोदी के अभियान को कांग्रेस तथा अन्य दलों ने सहयोग देना चाहिए, न कि उस पर कोई टिप्पणी करनी चाहिए ।

शंकाएं

मैंने इस अभियान के संदर्भ में ऊपर कुछ सवाल उठाऐ हैं । अभियान किस हद तक सफल होगा और क्या अड़चनें मोदी के समक्ष होंगी इस पर मैं अपनी टिप्पणियां इस ब्लॉग की अगली पोस्ट में करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

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