सुरेश प्रभु का रेलवे बजट एवं सफाई की बातः यात्रिकों की भी तो जिम्मेदारी होनी चाहिए (1)

रेल बजट वर्ष 2015-16

कल देश के रेलमंत्री ने बजट पेश कर दिया । जैसा कि आम तौर पर होता है राजनेताओं की टिप्पणी इस पर निर्भर करती है कि वे सरकार के घटक दल हैं कि विपक्ष में हैं । अपने देश में विपक्ष का मतलब होता है विरोध । विपक्ष का सोचना होता है कि जो भी सरकार करेगी या कहेगी उसका विरोध करना उसका ‘धर्म’ होता है । उसे तो बजट में खामियां ही खामियां दिखती हैं । इसलिए उनकी नजर में बजट कुल मिलाकर निराशाजनक रहा । विपरीत इसके सरकारी पक्ष की तरफ के लोग प्रसंशा ही करते हैं । मैंने सबकी टिप्पणियां नहीं पढ़ी/सुनी, बस थोड़ा बहुत उनकी राय का अंदाजा ले लिया । मैं राजनेताओं के कथनों को अधिक महत्व नहीं देता । हां, जानकरों, विशेषज्ञों और समीक्षकों की बातों में कुछ दम रहता है ऐसा मेरा सोचना है । उनके मतानुसार बजट लीक से हटकर है और लोकलुभावन वादों से बचने का भरसक प्रयास मंत्रीजी ने किया है । ऐसा कदम सराहनीय है यही मैं भी मानता हूं ।

एक बात जो पूर्ववर्ती प्रायः सभी रेलमंत्री करते आए हैं वह है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों/इलाकों को विशेष तवज्जू देते थे, गोया कि रेलबजट देश के लिए नहीं उस क्षेत्रविशेष के लिए पारित किया जाना हो । इतना ही नहीं, नयी-नयी रेलगाड़ियां चलाने का वादा भी कर देते थे, भले ही उनका संचालन मौजूदा ढांचागत सुविधाओं के साथ संभव हो या न हो । बड़ी-बड़ी योजनाओं की बात की जाती थी इसका आकलन किए बिना कि वे मूर्त रूप ले सकेंगी कि नहीं । सुरेश प्रभु काफी हद तक इन बातों से बचे हैं, अच्छा किया ।

कुछ टिप्पणियां

मैं इस बजट को कुल मिलाकर अच्छा प्रयास मानता हूं । ऐसा कोई बजट संभव ही नहीं जो सभी नागरिकों को खुश कर सके । हरएक को थोड़ी-सी अच्छाइयां और अधिक कमियां नजर आती ही हैं । सब कुछ संतोषप्रद हो ऐसा संभव नहीं । अतः मैं अधिक उम्मीद करना स्वयं में व्यर्थ समझता हूं । फिर भी कुछ बातों पर मैं विशेष रूप से टिप्पणी करना चाहता हूं ।

(1) मैं समझता हूं कि रेलवे का किराया हर वर्ष नहीं तो 2-3 वर्ष में एक बार बढ़ना ही चाहिए । जब हर चीज के दाम बढ़ पहे हों तो रेलवे की प्राप्तियां क्यों न बढ़ें ? हम भूल जाते हैं कि रेलवे कर्मचारियों के वेतन-भत्ते पिछले दस सालों में करीब तीन गुना बढ़ चुके हैं । इस बीच किराया कितना बढ़ा जरा सोचिए । हम देशवासी सरकारों से बहुत कुछ पाना चाहते हैं, लेकिन बदले में देना कुछ नहीं चाहते हैं । गरीबों के हितों के नाम पर दाम न बढ़ाने की बात की जाती है । लेकिन कोई इस पर भी विचार करेगा कि संपन्न कर्मचारियों की तनख्वाहें क्यों इतना बढ़ाई जाती हैं ? ये बात मैं लाभान्वित हो सकने वाले एक सरकारी पेंशनर होने के बावजूद कह रहा हूं । देशवासियों को तो मुफ्त की यात्रा से भी परहेज नहीं होगा ! घाटे में बताई जाने वाली रेलवे ने विगत काल में 90-90 दिन तक का बोनस क्यों बांटा ? किसी ने सवाल कयों नहीं उठाए ? दरअसल हमारी सरकारें ‘रेवड़ी’ वांटने का काम करती आ रही है ।

(2) अब फिर से 4 मास पूर्व आरक्षण की सुविधा दी जाएगी । पहले भी ऐसा हुआ करता था । एक समय था जब कोई समय सीमा ही नहीं थी । तर्क दिया गया है कि इससे टिकटों की दलाली पर अंकुश लगेगा । कैसे यह मैं अभी समझ नहीं पाया । किसी ने स्पष्ट करने का शायद प्रयास भी नहीं किया । मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि वह कौन-सी तकनीकी है जिससे दलाल अपना काम 2 माह के आरक्षण पर तो कर लेते हैं किंतु 4 माह के आरक्षण पर नहीं कर पाऐंगे । वस्तुतः रेलवे में यात्रियों की संख्या उपलब्ध शायिकाओं की संख्या से कहीं अधिक होती हैए विशेषतः तीज-त्योहार जैसे अवसरों पर । किसी को आरक्षण मिलेगा तो किसी को नहीं । एक अनार सौ बीमार की कहावत यहां लागू होती है ।

(3) मुझे मुफ्त की वाई-फाई सुविधा कुछ स्टेशनों तथा रेलगाड़ियों में देने के उत्साह का औचित्य समझ में नहीं आया । ये सुविधा अभी गिने-चुने यात्रियों के लिए ही माने रखती है । अधिसंख्य यात्रियों को तो वे सुविधाएं चाहिए जो सभी के लिए माने रखती हैं, यथा प्लेटफॉर्म पर बैठने, स्वच्छ पानी की व्यवस्था और सामान्य डिब्बों की संख्या में इजाफा ताकि बैठने को स्थान मिल सके । अभी हाल यह हैं कि थोड़ी दूरी के यात्री भी आरक्षित डिब्बों में घुस जाते हैं । यह जरूर है कि वाई-फाई पर खर्चा बहुत नहीं आएगा ।

(4) रेलगाड़ियों की रफ्तार बढ़ाने की बात भी कही गयी है । अभी हालात यह है कि सुपरफास्ट ट्रेनों तक का संचालन घंटों देरी से होता है । पहले तो उन्हीं को दुरुस्त करे दें । गति बढ़ाने की बातें बाद में की जाएं । सुरेश प्रभु को इस तथ्य पर खास तौर पर गौर करना चाहिए कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यात्रीगण अपने गंतव्य के पास पहुंचने पर जहां-तहां चेन-पुलिंग करते हैं । तत्सदृश कारणों का निराकरण रेलवे कैसे करेगा यह विचारणीय है ।

(5) रेलवे ओवर अंडर ब्रिज बनाने और मानवरहित क्रॉसिंग ख़त्म किए जाने की बात वाकई अच्छी है । अपने देश में रेलवे क्रॉसिंगों पर आए दिन हादसे होते रहते हैं । इन्हें रोकना/घटाना रेलवे की प्राथमिकता होनी ही चाहिए ।

(6) रेलमंत्री ने महिला-सुरक्षा, बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त आरक्षण, ‘हेल्पलाइन’ आदि जैसी अनेक बातों का उल्लेख किया है । सुनने में सब अच्छा लगता है, किंतु इनका कारगर कार्यान्वयन हो भी पाएगा इसमें मुझे शंका है । हमारे देश में सरकारी मुलाजिमों का लापरवाही बरतना, कार्य के प्रति अरुचि रखना, आदि जैसी नकारात्मक बातें क्षम्य मानी जाती है । इसलिए योजनाओं का समुचित कार्यान्वयन सदैव एक समस्या रहती है । हो सकता है सुरेश प्रभु ऐसी प्रवित्तियों का इलाज खोज लें ।

स्वच्छता – यात्रीगण योगदान करें तब न ?

पिछले कुछ समय से देश में स्वच्छता की बातें जोर-शोेर से की जा रही हैं । प्रस्तावित बजट में भी उसकी झलक दिखती है । डिब्बों में निर्वात आधारित जैव शौचालय बनाने की बात की गई है । ऐसे शौचालय बनाना समय-साध्य और खर्चीला होगा यह मेरा अनुमान है । फिर भी इस सब की आशा तो है ही । स्वच्छता की बात पर कहना चाहता हूं कि अपनी युवावस्था में मैं सामान्य डिब्बे में भी यात्रा करता था, रात-रात भर भी । तब खास कष्ट नहीं होता था । आरक्षण भी स्लीपर डिब्बे से आगे कभी नहीं लिया । स्लीपर में आराम से यात्रा होती थी । लेकिन आज उस डिब्बे में घुसने की भी हिम्मत नहीं होती है, कारण स्वच्छता का अभाव खासकर शौचालय में ।

सुरेश प्रभु का मंत्रालय रेलवे डिब्बों में अपने स्तर पर स्वच्छता की व्यवस्था कैसे करेगा यह मैं कह नहीं सकता । स्वच्छता ऐसी चीज है जिसके लिए रेलवे इंतजामात कम और यात्री अधिक जिम्मेदार होते हैं । अर्थात् जब तक यात्रीगण स्वयं स्वच्छता न बरतें रेलवे कुछ अधिक नहीं कर सकता । इस विषय पर मैं अपने स्वयं का उदाहरण देते हुए कुछ कहना चाहूंगा अगले (आगामी कल के) ब्लॉग-आलेख में । – योगेन्द्र जोशी

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