केन्द्रीय रेलवे बजट एवं सफाई की बातः यात्रिकों की भी जिम्मेदारी बनती है (2)

रेलवे का दायित्व

वर्तमान रेलमंत्री ने अपने बजट में रेलवे की हालत बेहतर करने के लिए अनेक प्रस्ताव रखे हैं । नई रेलवे लाइन बिछाना या मौजूदा के दोहरीकरण करना, नई रेलगाड़ियां चलाना या न चलाना, सवारी डिब्बों की संख्या बढ़ाना, गाड़ियों को दुर्घटनाओं से बचाना, यात्रियों की सुरक्षा की व्यवस्था करना, आरक्षण को दलालों से मुक्त करना, टिकट-खरीद आसान बनाना, स्टेशनों पर वाई-फाई की सुविधा प्रदान करना, इत्यादि ऐसे कार्य हैं जिनकी योजना बनाना और उन्हें मूर्त रूप देना रेलवे प्रशासन की ही जिम्मेदारी बनती है । आम यात्री इतना ही कर सकता है कि वह व्यवस्था को घ्वस्त न करे अथवा उसका दुरुपयोग न करे ।

परंतु एक क्षेत्र ऐसा है जहां यात्रियों की भूमिका मेरी नजर में रेलवे प्रशासन से अधिक है । वह क्षेत्र है स्व्च्छता का । प्रशासन इस प्रयोजन से ढांचागत सुविधा तो प्रदान कर सकता है किंतु प्लेटफॉर्मों पर तथा गाड़ी के डिब्बों के भीतर की पल-पल की साफ-सफाई का इंतिजाम नहीं कर सकता है । यह ऐसा क्षेत्र है जहां यात्रियों से सहयोग की अपेक्षा की जाती है । उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने स्तर पर गंदगी न फैलाएं और उपलब्ध व्यवस्था का समुचित उपयोग करें । यह सवाल किया जा सकता है कि रेलवे की व्यवस्था अपर्याप्त हो तो कोई क्या करें । अवश्य ही तब सोचने की बात होगी, लेकिन मैं उन बातों की ओर इशारा करना चाहता हूं जो आप और हम सामान्यतः कर सकते हैं किंतु जो हमारे विचार में या तो आती ही नहीं या जिन्हें हम उदासीन भाव से नजरअंदाज कर देते हैं । मैं अपने स्वयं के तरीकों के उल्लेख के साथ अपनी बात यहां पर रख रहा हूं ।

स्वच्छता का मेरा तरीका

मैं अपनी किसी यात्रा के एक अनुभव का जिक्र सर्वप्रथम करता हूं । मैं ओर मेरी पत्नी यात्रा के दौरान जब कभी भुनी छिलकेदार मूंगफली खाते हैं तो अपनी गोद में या शायिका पर रुमाल अथवा अखबार बिछा लेते हैं, जिस पर मूंगफली रख दी जाती है । और ठूंगी जा रही मूंगफली के छिलके उस ठोंगे में इक्ट्ठा कर लेते है । अंत में उस ठोंगे को डिब्बे में उपलब्ध कूड़ेदान में डाल देते हैं, और अगर वह उपलब्ध न हो तो अपने साथ रख लेते हैं ताकि किसी उपयुक्त स्थल पर डाला जा सके, जैसे किसी स्टेशन के कूड़ेदान में या जंगल/निर्जन इलाके की झाड़ियों के बीच आदि ।

एक बार हम इसी तरह मूंगफली का आस्वादन कर रहे थे । हमारे सामने की शायिका पर चार जनों का परिवार बैठा था जिसमें दो छोटे बच्चे शामिल थे । उस परिवार ने भी मूंगफली ली और ठूंगते हुए छिलके फर्श पर गिराते गये । हम छिलके कैसे एकत्रित कर रहे थे इस पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया । या ध्यान दिया भी होगा तो उसे महज मूर्खतापूर्ण समझ लिया होगा । कूछ देर तक तो मैं देखता रहा । जब मुझसे रहा न गया तो अपनी ‘आपत्तिजनक’ आदत से विवश हो मैं बोल पड़ा, “आप लोग छिलकों को किसी कागज बगैरह में लपेटकर कूड़ेदान में डाल लेते तो फर्श साफ रहता ।” उस परिवार के वयस्क  मेरी बात पर मुस्करा दिए, और उनका कार्य यथावत आगे चलता रहा । मैं चुप हो गया; कुछ आगे कहने का औचित्य रह नहीं गया था ।

मुझे सुव्यवस्थित परिवेश की अपेक्षा रहती है । दुर्व्यवस्था से मुझे खास परहेज है जिसे आप ‘ऐलर्जी’ कह सकते हैं । अपने घर में मैं चीज-वस्तुओं को सुव्यवस्थित रखने का हिमायती हूं । कभी-कभी मेरी पत्नी भी झल्लाने लगती हैं, “अरे, क्यों इतनी जल्दी मचाए रहते हो चीजों को व्यवस्थित रखने में ।” लेकिन मैं अपने स्वभाव से लाचार हूं । मेरे घर में आरंभ से लेकर आज तक के बिजली-पानी-टेलीफोन आदि के पेमेंट-बिल करीने से रखे हैं । मेरी पत्नी ने कोई चार दशक पहले संपन्न हमारे दाम्पत्य-बंधन के बाद से आज तक के घर के हिसाब-किताब का प्रायः समस्त ब्योरा अपनी डायरियों में कैद रखा है । मैं मानता हूं कि इतना सब करने की आम जन को आवश्यकता नहीं होगी । लेकिन चीजें घर के कमरों में दुर्व्यवस्थित इधर-उधर बिखरी रहें, शयनागार में बिस्तर बेतरतीब फैला रहे, स्नानागार में फर्श पर काई लगी रहे और उस पर कपड़े गुड़ी-मुड़ी पड़े रहें, इत्यादि जैसी हालत मुझे स्वीकार्य नहीं । और कुछ ऐसा ही सोचना मेरा रेलगाड़ी के डिब्बों के लिए भी है ।

रेलयात्रा के समय किसी भी प्रकार का कूड़ा रेल-डिब्बे के फर्श पर डालना हम दोनों को गवारा नहीं । खाने-पीने के बाद बचे कचरे को पॉलीथीन या अखबार के कागज में लपेटकर कूड़ेदान में यथाशीघ्र डाल देना हम जरूरी मानते हैं । हमारी यह भी आदत है कि प्रातःकाल जब आरक्षित शायिका से हम उठते हैं तो बिछाने के लिए मिली चादरें और कंबल करीने से तहाकर शायिका के एक सिरे पर अथवा ऊपरी बर्थ पर रख दें, ठीक वैसे ही जैसा हम अपने घर में कर रहे होते । यह कोई माने नहीं रखता कि हम घर पर हैं या गाड़ी के डिब्बे में । सफाई तो सफाई है, कहीं भी । बर्थ पर मुड़ी-तुड़ी चादरों/कंबलों के साथ बैठे रहें या उन्हें वैसे ही छोड़कर चल दें यह अपने को अच्छा नहीं लगता है । यह काम तो परिचारक यानी अटेंडेंट का है यह सोचकर बैठना ठीक नहीं लगता । जब तक वह आए तब तक यों ही बैठे रहने के बजाय थोड़ा काम रेलवे के लिए भी कर लें तो कौन-सा घाटा हो जाएगा ?

यात्रियों का रवैया

मैंने अधिकांश यात्रियों को स्वच्छता के प्रति संवेदनशून्य पाया है । प्लेटफॉर्म पर सफाईकर्मी झाड़ू लगाते हुए आगे बढ़ता है तो उसके पीछे मूंगफली या संतरे के छिलके या टॉफी आदि के रैपर बिखेरते हुए भी लोग दिख जाते हैं । लगता है लोग मानते हैं कि सफाई का कार्य करना तो रेलवे का काम है; कोई कूड़ा बिखेर दे तो उसकी सफाई उन्हें ही करनी चाहिए । हम यह क्यों नहीं सोचते कि हमारा फर्ज है कि कहीं कूड़ादान खोजकर उसमें कचरा डाल दें । क्यों ऐसा होता है कि मुंह में थूक भर जाए या बलगम आ जाए तो कुछ लोग पच्च करके अगल-बगल थूक देते हैं ? क्यों कोई चाय का कागजी प्याला यत्रतत्र छोड़कर चला जाता है ?

कुछ ऐसा ही अनुभव रेल के डिब्बों के भीतर भी देखने को मिल जाता है । बिस्किट खाये और रैपर फर्श पर गिरा दिया; पानी पिया और खाली बोतल एक ओर लुढ़का दी; चाय पी और प्याली सीट के नीचे रख दी; इस प्रकार के नजारे यदाकदा देखने को मिल जाते हैं । कभी-कभी पानी-नल की टोंटी ठीक से बंद किए बिना भी यात्री शौचालय से बाहर निकल आते हैं । कुछ लोग कागजी साबुन (पेपर सोप) से हाथ धोने पर उसका कचरा वॉशबेसिन पर ही गिरा देते हैं जो बेसिन की जाली पर अटक जाता है । पान खाने के शौकीन वॉशबेसिन में थूकने के बाद पानी चलाकर उसे बहा दें ऐसा सदैव नहीं देखने को मिलता है ।

कुल मिलाकर मैं यही कहना चाहता हूं कि रेलवे में स्वच्छता की जिम्मेदारी केवल रेलवे की नहीं हो सकती । इस कार्य में यात्रियों की भी महती भूमिका होती है । दुर्भाग्य से अपने देशवासियों में स्वच्छता के प्रति सचेतनता वांछित से काफी कम है । मेरे मन में अक्सर प्रश्न उठता है कि क्या लोगों की सोच स्वतः बदल सकती है, अथवा क्या कोई व्यक्ति उनको प्रेरित कर सकता है । मुझे नहीं लगता है कि यह आसान कार्य है । मुझ जैसे यात्री उदाहरण पेश कर सकते है और सहयात्रियों से स्वच्छता की बातें कर सकते है । परंतु इस मुद्दे पर हर रोज हर पल बात होती रहनी चाहिए जो कोई स्वयंसेवी संस्था अथवा रेलवे ही कर सकती है । रेलवे को चाहिए कि वह इस दिशा में एक अभियान चलाए । – योगेन्द्र जोशी

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