11 जुलाई 2015 – विश्व जनसंख्या दिवसः किंतु अपने देश को उससे कोई मतलब नहीं

जनसंख्या दिवस

आज 11 जुलाई ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ था/है । मैं उम्मीद कर रहा था कि इस दिन देश की जनसंख्या पर विभिन्न व्यक्तियों-संगठनों के बीच गंभीर चर्चा होगी, और मीडिया मुद्दे को जनता तक पहुंचाएगा तथा जनता में जागरूता फैलाएगा । मेरे लिए यह देखना आश्चर्य एवं खेद की बात थी कि अखबारों में इस विषय का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं, किसी संस्था या सरकार की कोई विज्ञप्ति नहीं । टीवी चैनलों पर भी कोई जिक्र नहीं, गोया कि जनसंख्या वृद्धि का हससे कुछ लेना-देना नहीं ।

अभी हाल ही में देश के प्रधानमंत्री मोदीजी ने बड़े जोशोखरोश के साथ ‘विश्व योग दिवस’ मनाया । कई-कई दिनों तक उसकी तैयारी चली । लोगों ने बढ़चढ़कर सहभागिता निभाई । योग की उपादेयता में मैं संदेह नहीं करता, लेकिन ये सवाल जरूर उठाता हूं कि जिस देश में लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब न हो रही हो, जहां 40-50 फीसदी बच्चे कुपोषित हों, जहां लोगों को सड़कों पर रातें गुजारनी पड़ती हों, जहां जीवन-निर्वाह के लिए दिन भर आदमी भागदौड़ में लगा हो, वहां योग का लाभ कितने लोग उठा सकते हैं ?

मैं उम्मीद कर रहा था कि प्रधानमंत्री जी जनसंख्या दिवस को भी अहमियत देगें और जनसंख्या नियंत्रण की बातें जनता के बीच करेंगे । यह ठीक है कि योग दिवस उनके दिमाग की उपज थी, लेकिन उसके सापेक्ष जनसंख्या दिवस महत्वहीन बना के छोड़ना प्रधानमंत्री जी को शोभा नहीं देता । जनसंख्या इस देश की अतिगंभीर समस्या है यह उन्हें नहीं भूलना चाहिए था ।

दिवस की अहमियत

याद रहे कि इस दिवस के पीछे संयुक्त राष्ट्र संगठन (सं.रा.सं. अथवा यू.एन.ओ.) का एक ध्येय रहा है । ध्येय है कि इस विश्व की मानव जनसंख्या लगातार नहीं बढ़ने दी जा सकती है । प्रकृति ने हमें सीमित संसाधन दिए हैं । हमें और हमारे साथ-साथ अन्य प्राणियों को उन्हीं संसाधनों को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या सीमित रखनी है । मानवेतर प्राणियों की जनसंख्या प्रकृति सीधे तौर पर नियंत्रित करती है । उन प्राणियों के लिए न जनसंख्या के कोई अर्थ हंै और न ही उसे सीमित रखने का कोई विचार ।

किंतु मनुष्य की स्थिति भिन्न है । उसने अपने बौद्धिक बल के सहारे रोगों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है जिससे मृत्यु दर घटी है । इसके अतिरिक्त प्राकृतिक विपदाओं के कारण से होने वाली मौतों को भी कुछ हद वह रोकने में समर्थ हुआ है । फलतः परिस्थितियां ऐसी बन चुकी हैं कि उसकी जनसंख्या वढ़ती जाएगी यदि उसे रोकने के प्रयास न किए जाएं । मृत्यु दर कम हो ऐसा विचार तभी ठीक माना जा सकता है जब जन्म दर भी उसी के अनुरूप कम हो । अन्यथा जनसंख्या उस सीमा तक पहुंच जाएगी जहां जीवन-निर्वाह के संसाधन कम पड़ने लगेंगे । उस सीमा पर या तो प्रकृति अपने तरीके से जनसंख्या नियंत्रित करेगी, या मनुष्य स्वयं को विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में असमर्थ पाकर आत्म-हनन का रास्ता चुनने लगेगा । ऐसी भयावह स्थिति न पैदा हो इसी प्रयोजन से सं.रा.सं. ने 11 जुलाई को जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता की याद दिलाने वाले दिवस के रूप में स्थापित किया है ।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस धरती पर केवल हमें (हम मनुष्य) ही जीने का अधिकार नहीं है, बल्कि अन्य प्राणियों को भी अधिकार है । वैसे भी उनके अस्तित्व पर हमारा अस्तित्व टिका है, भले ही इस तथ्य का एहसास अधिकांश लोगों को न हो । वर्तमान काल में बढ़ती जनसंख्या हमें पूरी धरती पर एकाधिकार जमाने के लिए प्रेरित या विवश कर रही है । उन प्राणियों के लिए उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन भी हम कब्जे में ले रहे हैं । परिणाम यह है कि उनमें से कइयों की संख्या घट रही है और कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं । वे हमारी दया के पात्र बन चुके हैं । ऐसी संभावना राकने के लिए भी जनसंख्या नियंत्रण बांछित है ।

इस धरती का सौभाग्य है कि विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि कमोबेश नियत्रण में है । कई देश तो नकारात्मक (ऋणात्मक) जनसंख्या दर पर चल रहे हैं, अर्थात उनकी जनसंख्या समय के साथ घट रही है; कारणों में विविधता है । इनमें रूस, पोलैंड, जापान, क्यूबा आदि के साथ यूरोप के कई छोटेबड़े देश शामिल हैं । इस विषय की विस्तृत जानकारी निम्नलिखित इंटरनेट पते पर प्राप्य है:

https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_population_growth_rate

भारत की स्थिति

दुनिया के प्रमुख देशों में भारत के अतिरिक्त शायद ही कोई अन्य देश हो जिसकी जनसंख्या दर आवश्यकता से अधिक हो । विकसित देशों के लोगों की आर्थिक संपन्नता और उनका लगभग सौ फीसदी शिक्षित होना ही जनसंख्या नियंत्रण का आधार बन गया । चीन ने कानून की सख्ती से जनसंख्या को काबू में किया । लेकिन अपने देश की स्थिति निराशाजनक रही है । यहां तो कोई राजनेता जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं करता । इसका कारण है 1970 के दशक की संजय गांधी की एक भूल । किसी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी उसने सरकारी महकमों पर अपना नियंत्रण पा लिया था । परिवार नियोजन उस व्यक्ति के कार्यक्रमों में से एक था । उसके इरादे तो नेक थे किंतु कार्यप्रणाली जोर-जबरदस्ती वाली थी, जिसके दुष्परिणाम तब कांग्रेस को भुगतने पड़े थे । तत्कालीन घटनाओं ने परिवार नियोजन को ऐसा विषय बना दिया जिसको जबान पर लाना राजनेताओं के लिए वर्जित हो गया । सबको यह भय सताने लगा कि जनसंख्या की बात करेंगे तो हमारा वोटबैंक खिसक जाएगा । हमारे लोकतंत्र की यह दुःखद विडंबना है ।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि अगर जनसंख्या बढ़ती जाए तो देश प्रगति नहीं कर सकता । हमने जनसंख्या को भगवान भरोसे छोड़ रखा है । दक्षिण भारत के चार राज्यों के साथ कुछ अन्य राज्यों ने अच्छी प्रगति दिखाई है और वहां लोगों का जीवन-स्तर अपेक्षया उठा भी है । वहां प्रति दम्पती जन्मे बच्चों  की संख्या 2 के निकट है । यह माना जाता है कि करीब 2.3 बच्चे प्रति दम्पती जनसंख्या को स्थिरता प्रदान करती है, न बढ़ना न घटना । लेकिन सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के साथ बिहार, मध्यप्रदेश आदि में यह संख्या 3 से ऊपर है । अर्थात इन प्रदेशों की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है । लगता नहीं कि यहां की सरकारें गंभीर प्रयास की इच्छुक हैं ।

जनसंख्या के संदर्भ में एक रोचक तथ्य मेरे देखने में आया है कि आज के अपेक्षया संपन्न मध्य एवं उसके ऊपर के वर्ग में परिवार को 1 या 2 बच्चों तक सीमित रखने का चलन बढ़ रहा है । कुछ कामकाजी दम्पती तो “एक भी बच्चा नहीं” के हिमायती मिल जाएंगे । ये वे वर्ग हैं और जो अधिक बच्चों के भरण-पोषण स्वास्थ्य एवं शिक्षा आदि का निर्वाह कर सकते हैं । फिर भी परिवार सीमित रखकर ये जनसंख्या स्थिरीकरण में योगदान दे रहे हैं ।

असल समस्या समाज के निम्नतर वर्गों के साथ । धनाभाव के कारण वे कुपोषण, शिक्षा के अभाव, स्वास्थ्य की समस्याओं आदि से घिरे रहते हैं । फिर भी परिवार में बच्चों की संख्या वहीं अधिक देखी जाती है । कारण भले ही कुछ भी हों वहां चार-चार, छः.छः बच्चों की पैदाइश सामान्य बात है । देश की जनसंख्या वृद्धि इन्हीं के कारण है । इस समय आवश्यकता इन्हीं को ऊपर उठाने की है । जब तक इन तबकों में परिवार सीमित रखने की भावना न पैदा होगी स्थिति में वांछित बदलाव नहीं हो सकेगा, क्योंकि जब तक कुछ जने गरीबी से उबर पाते हैं तब तक कई अन्य गरीब पैदा हो चुकते हैं ।

जनसंख्या दिवस इनमें जागरूकता फैलाने का दिन है; उन्हें यह विश्वास दिलाने का दिन है कि सीमित परिवार उनके लिए घाटे का सौदा नहीं है क्योंकि सरकार उनका साथ देगी । दुर्भाग्य से आज इस दिवस पर प्रधानमंत्री जी ने वांछित संकल्प लेने की कोशिश नहीं की । अतः जनसंख्या का स्थिरीकरण भगवान भरोसे । – योगेन्द्र जोशी

 

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