सावधान, महाराजाधिराज पधार रहे हैं! तीन बार स्थगित हो चुका प्रधानमंत्री का वाराणसी आगमन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बीते 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र (अर्थात मेरे नगर) वाराणसी आने वाले थे । ऐन वक्त पर उनका आगमन निरस्त हो गया । कारण बताया जाता है कि रेलवे की औद्यागिक संस्था डी.एल.डब्ल्यू. (डीजल लोकोमोटिव वर्क्स) यानी डि.रे.का. (डीजल रेल कारखाना) में मोदीजी के संबोधन के लिए बनाए गए विशाल पंडाल की सजावट में लगे किसी श्रमिक की दुर्घटनावश मृत्यु हो गई । शायद यह वास्तविक कारण रहा हो । कुछ ऐसी ही एक दुर्घटना दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की रैली में पहले कभी हुई थी । रैली चलती रही और बाद में केजरीवाल की काफी आलोचना हुई थी । ऐसे मातमी माहौल में भाषणबाजी करने पर मोदीजी की भी आलोचना होती अवश्य । मोदी जी के दौरों के बारे में जानकारी यहां और यहां प्राप्य है ।

मोदी जी विगत कुछ महीनों से वाराणसी नहीं आ पा रहे हैं । उन्हें विगत 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी आना था । इस बार प्रस्तावित उनके विविध कार्यक्रमों में से एक था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) चिकित्सा संस्थान के नियंत्रण में चलने वाले ‘ट्रॉमा सेंटर’ का उद्घाटन । आधुनिक एवं उन्नत दर्जे का यह ‘अभिघात केंद्र’ पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने किस्म की प्रथम चिकित्सकीय व्यवस्था है । मोदी जी को अपने गोद लिए गांव, जयापुर, भी जाना था । संयोग कहिए या दुर्योग, कि उक्त तारीख की पूर्व रात्रि जो बारिश आंरभ हुई वह अगले दिन (16 तारीख) डेड़-दो बजे तक चलती रही । इस बारिश की बजह से डीएलडब्ल्यु परिसर में बनाये गए विशाल पंडाल की स्थिति दयनीय हो गई । मोदी जी को सुनने के लिए कीचड़मय पंडाल के नीचे भीड जुट भी पायेगी इसमें शंका होने के कारण मोदी जी का वाराणसी दौरा निरस्त कर दिया गया । लेकिन कहा यही जाता है पानी से भीगे पंडाल में बिजली का कंरेंट लगने से वहां कार्य कर रहे एक मजदूर की मृत्यु हो गयी । असली कारण क्या रहा होगा यह प्रशासन ही बता सकती है ।

असल में मोदी जी को पिछले माह 28 जून को वाराणसी आना था । तब भी ऐन मौके पर अतिवृष्टि के कारएा उनका वाराणसी दौरा रद किया गया था । इस माह के 16 जुलाई का दौरा उसी रद दौरे के ऐवज में था, और वह भी फलित नहीं हो सका । अब फिर भविष्य में किसी दिन उनके आने का कार्यक्रम होगा । इस पावस ऋतु में उनका भावी दौरा फिर से निरस्त हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । दोनों ही तारीखों पर अतिवृष्टि के कारण उनके दौरे निरस्त करने पड़े थे । संयोग देखिए उक्त तारीखों के आगे-पीछे कोई खास बारिश नहीं हुई । असल में 16 तारीख की दोपहर बारह-एक बजे तक पानी बरसना बंद हो चुका था, लेकिन तब तक उनका कार्यक्रम निरस्त घोषित हो चुका था । कल 22 तारीख थी और मेरे इलाके में 16 के बाद तब तक  पानी ही नहीं बरसा । शहर में हो सकता है कहीं थोड़े-बहुत छीटे पड़े होंगे ।

यह भी उल्लेखनीय है कि 12 अक्टूबर 2014 को भी मोदी जी का दौरा होना था । तब देश के पूर्वी समुद्र तट पर आए हुदहुद तूफान के कारण यहां का मौसम खराब हो गया था और उनका आगमन नहीं हो पाया । इस प्रकार हाल में उनके तीन प्रस्तावित वाराणसी-दौरे निरस्त हुए । इस अंतराल में वे 11 नवंबर एवं 25 दिसंबर को वाराणसी आए थे लेकिन तब तक बी.एच.यू. स्थित अभिघात केंद्र (ट्रॉमा सेंटर) का कार्य पूरा नहीं हो सका था ।

अखबार में छपी खबर के अनुसार जिन निरस्त दौरों का जिक्र ऊपर किमोदी के वाराणसी दौरेया गया है उन पर 30-35 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं । बात सही होनी चाहिए । कहा जा रहा है कि डी.एल.डब्ल्यू में विशाल पंडाल खड़ा करने में 9 करोड़ की लागत आई । उस पंडाल में विदेशी वाटरप्रूफ कनात-शामियाना इस्तेमाल हुआ था ऐसा सुना जाता है ।

मैं समझ नहीं पाता कि मोदी जी के दौरे पर इतनी विशाल राशि खर्चने की क्यों आवश्यकता है । यह सब उस मोदी जी के लिए जो दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी देखी है, वे गरीब परिवार में पले-बढ़े हैं । क्या बचपन की गरीबी के कारण अब वे शानोशौकत, दिखावा, तामझाम के शौकीन हो चले हैं । उनकी सुरक्षा मात्र पर तो यह राशि खर्च नहीं हो रही होगी ऐसा मेरा सोचना है । अगर सुरक्षा का इतना बड़ा सवाल है तो उन्हें वाराणसी आना ही नहीं चाहिए । बरसात के मौसम में जलजमाव होना सामान्य बात है । ऐसे में यह दौरा बरसात में रखा भी नहीं जाना चाहिए था ।

गरीबी और गरीबों की बात करने वाले मोदी जी को समझना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि में कई गरीबों का भला हो सकता है । उन्होंने अपना दौरा सादगी के संदेश के साथ संपन्न करना चाहिए था । लेकिन अब वे गरीब कहां जो उसका दर्द समझें ।

मोदी जी के दौरे पर धन का अपव्यय तो होता ही है, साथ में आम जनता को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं । दिक्कतों का अनुभव स्वयं मुझे हुआ है । बीते नवंबर में मेरे एक मित्र सपत्नीक भोपाल से आए थे । संयोग से उनके रेलगाड़ी से लौटने की तारीख वही थी जब मोदी जी का यहां कार्यक्रम चल रहा था । मेरे घर के पास के मुख्य मार्ग, बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. सड़क, पर वाहनों का आवागमन ठप था । आटोरिक्शा की दिक्कत हो सकती है इसका अंदाजा मुझे था । मैंने प्रातःकाल ही पास के चौराहे पर जाकर आटोरिक्शा वालों से समाधान पुछा था । तब उन्होंने बताया कि मुख्य मार्ग पर तो वाहन खड़े मिलेंगे नहीं, परंतु गलीकूचों के भीतर जरूर खड़े रहेंगे और आपको कोई न कोई मिल ही जाएगा । उस दिन स्टेशन जाने के लिए मैंने कोई छेड़-दो घंटे का अतिरिक्त समय निर्धारित कर रखा था । जब समय आने पर मैंने आटोरिक्शे खोजे जो कहीं कोई नहीं दिखा । इससे तनाव बढ़ा कि 10 कि.मी. दूर स्टेशन कैसे जाया जाए । तभी ध्यान में आया कि मेरे पासपड़ोस में रहने वाले और आटोट्रॉली से सामान ढोने का धंधा करने वाले कुछ मदद कर सकेंगे । संयोग से उस समय एक नौजवान घर पर मिल गया । उसकी मदद से मित्र को गली-कूचों से होते हुए स्टेशन तक छोड़ पाना संभव हो सका ।

दूसरा अनुभव बीते दिसंबर माह के 25 तारीख का है जब मेरे बेटा-बहू विदेश से वाराणसी आए हुए थे । वे मात्र 5-6 दिन के संक्षिप्त अंतराल के लिए यहां आए थे और अपना कार्यक्रम पहले से तय किए हुए थे । उस दिन आटोरिक्शा से उन्हें कहीं निकलना था । वाहन न मिलने के कारण उन्हें पैदल ही गंतव्य तक जाना पड़ा ।

और तीसरा अनुभव बीते 15 तारीख का है जब मोदी के 16 तारीख के आगमन की तैयारी चल रही थी । मुझे उस दिन कार्यवशात् लंका जाना पड़ा था । बी.एच.यू. प्रवेशद्वार के आसपास का इलाका लंका कहलाता है । यहीं से बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. मार्ग आरंभ होता है । मैं लंका पहुंच तो गया, किंतु कालांतर में जब लौटने लगा तो देखा कि विश्वविद्यालय प्रवेशद्वार के आसपास जबरदस्त जाम लगा है । जाम की समस्या तो वाराणसी में रहती ही है, लेकिन यह जाम पुलिस के 20-30 जीपों के कारण था जो अगले दिन मोदी जी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के चक्कर में नगरवासियों के लिए आफत पैदा किए हुए थे । गनीमत थी कि मैं साइकिल से गया था । उस जाम से साइकिल घसीटते हुए अगल-अगल के गली-कूचों से होकर मैं किसी तरह बी.एच.यू. परिसर में पहुंचा और वहां से लंबा रास्ता लेते हुए घर पहुंचा । लंका से आने में सामान्यतः जहां दसएक मिनट लगते हैं वहां इस बार आधे घंटे से अधिक का समय मुझे लगा ।

लोग लोकतंत्र के प्रशंसा-गीत गाते रहते हैं कि इसमें सभी नागरिक बराबर होते हैं । अवश्य ही मतदान के समय सभी बराबर होते हैं । सभी लाइन में लगते हैं और नंबर आने पर ही मत डालते हैं । मेरी जानकारी में विशिष्ट/अतिविशिष्ट जन भी उसी लाइन में लगते हैं । किंतु वोट डालने के बाद गैरबराबरी वापस लौट आती है । चुने गये राजनेता आम आदमी नहीं रह जाते हैं । उनके लिए सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ विशेष होता है जिनको पाने का सपना भी आम आदमी नहीं देख सकता ।

मैं अपने देश के लोकतंत्र को निर्वाचित राजशाही कहता हूं । लंबे अरसे से चले आ रही राजशाही विश्व में अब कम ही रह गए हैं । लगभग सभी प्रतीकात्मक रह गए हैं जिसमें राजा/रानी  की सक्रियता नहीं के बराबर होती है । वे सामान्यतः वंशानुगत होते थे, अर्थात राजा/रानी के बाद उनके बेटे-बेटियां सत्ता संभालती थीं/हैं । हमारे देश में ऐसा राजतंत्र अब रहा नहीं । लेकिन इस देश में लोकतंत्र ने जो स्वरूप धारण किया हुआ है वह राजशाही का ही बदला स्वरूप है, नया अवतार है । इस नये राजतंत्र में राजा जनता के मतों के आधार पर चुना जाता है, एक बार में केवल 5 साल के लिए । जो चुनकर गद्दी हासिल कर लेता है वह राजा हो जाता है विशेष अधिकारों से सुसंपन्न । एक प्रकार से देखा जाए तो वह मनमरजी से राजकाज कर सकता है । पूरी व्यवस्था उसके हाथ में होती है । अगर वह अपनी पुलिस को कहे कि अपराधी को पकड़ो तो वह पकड़ेगी, अगर कहे कि उसे छूना मत तो नहीं छुएगी । वह निरपराध को जेल में डाल सकता है, जिसे यह भ्रम हो सकता है कि कानून उसे बचाएगा, यह भूलते हुए कि पूरा शासकीय तंत्र तो लोकतंत्र के उस राजा के हाथ में रहेगा । उसे निरपराध सिद्ध कौन करेगा ? उस 5 साल में राजा बहुत कुछ कर सकता है, जो चाहे वह । प्रशासनिक तंत्र इस राजा के चेहरे के भाव पढ़कर कार्य करता है । पुलिस-प्रशासन जनता की समस्याओं की चिंता कम राजा की चिंता अधिक करता है ।

सरकार चलाने वालों को मैं तीन वर्गों में बांटता हूंः

(1) प्रथम महाराजाधिराज जिसमें राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री शामिल किए जा सकते हैं ।

(2) द्वितीय महाराजा जिसमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री सरीखे राजनेता सम्मिलित किए जा सकते हैं ।

(3) तृतीय वर्ग राजाओं का जिसमें मंत्रियों को गिना जा सकता है ।

अन्य जनप्रतिनिधियों में से कुछ को मैं दरवारी कहता हूं जो राजा की कृपा पाने में प्रयासरत रहते हैं । उन्हें राजा का साथ देना होता है, बदले में राजा उन्हें विविध तरीकों से उपकृत करता है । उनके लिए राजा का विरोध करना वर्जित रहता है । जो दरवारी नहीं बन पाते हैं उन्हें अगली बार के राजा की प्रतीक्षा रहती है ।

इनको मैं राजा-महाराजा क्यों कहता हूं ? इसलिए कि वे राजा-महाराजाओं वाली सुख-सुविधाओं के हकदार होते हैं । सुरक्षा के नाम पर इनके लिए इंतजामात देखिए । पुलिसबल की पूरी ताकत इनके लिए तैनात रहती है । मरणासन्न मरीज का एंबुलेंस तक उनके रास्ते में नहीं आ सकता है । उनके रोगों के इलाज के लिए सर्वोत्तम अस्पताल/चिकित्सक रातदिन उपलब्ध रहते हैं । इलाज भी मुफ्त में । वे जब चाहें विदेश जा सकते हैं, अपनी गांठ का धेला खर्च किए बिना । मुफ्त का मकान, विजली-पानी चौबीसों घंटे । लोकतंत्र के ऐसे राजा-महाराजा जब अपनी दौरे पर निकलते हैं तो रातोंरात सड़कें समतल हो जाती हैं, सड़कों से कूड़ा गायब हो जाता है, बदबदाती नालियां साफ हो जाती है, और न जाने क्या-क्या नहीं हो जाता है । एक व्यक्ति के लिए इतना सब प्रजा के लिए क्यों नहीं ? आम आदमी सोच सकता है ऐसे विशेषाधिकार की ? इन्हें राजा न कहूं तो क्या कहूं ?

ऐसी राजकीय व्यवस्था में मोदी जी के वाराणसी आगमन की तैयारी पर करोड़ो खर्च हो जाए तो किसे कोफ्त होगी । कहते है डी.एल.डब्ल्यू के क्रीडांगन (स्पोर्ट्स ग्राउंड) की जमीन पंडाल की बजह से खराब हालत में हैं । सरकारी धन की बरबादी से इस देश में किसी को कचोटन नहीं होती है; अपनी जेब से थोड़े ही जा रहा हैं !

जीवन के आरंभ में गरीबी झेल चुके लोग जब कुरसी पर बैठते हैं तो वे अपने अतीत की चर्चा वोट बटोरने के लिए करते हैं,  न कि अतीत को याद करके जनता की सेवा के लिए । बीते समय की अपनी गरीबी को भी वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और जनता उनके सम्मोहन में फंस जाती है । क्या करें, कुरसी की तासीर ही कुछ ऐसी होती है ! – योगेन्द्र जोशी

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