समाचार माध्यमों पर प्रकाशित/प्रचारित होने वाली त्रुटिपूर्ण अथवा भ्रामक जानकारी

अखबारों में छपने वाले और टेलिविजन चैनलों पर प्रचारित होने वाले लेखों/विज्ञापनों से सदैव भरोसेमंद जानकारी नहीं मिला करती है । यह संभव है कि लेखक/प्रकाशक की भूल या असावधानी की बजह से कभी-कभार त्रुटियां लेख में आ जाती हों । किंतु मेरा विचार है कि कुछ विज्ञापनों में इरादतन भ्रामक जानकारी ठूंसी जाती है ।

लेख की त्रुटि का एक उदाहरण मुझे परसों के दैनिक जागरण समाचारपत्र (28 जुलाई 2015) में पढ़ने को मिला । स्वास्थ्य/चिकित्सा संबंधी लेख के विषय का मैं विशेषज्ञ नहीं हूं, अतः उस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता । परंतु वैज्ञानिक होने के नाते मुझे मानव शरीर रचना का मोटामाटी ज्ञान तो है ही । उस लेख की आंशिक प्रति चित्र रूप में मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Jagaan - About Liver

 

लेख में एक चित्र छपा है जिसमें मानव शरीर के भीतरी कुछ अंगों यकृत/कलेजा (लीवर), आमाशय (स्टमक) आदि की मनुष्य के धड़ में स्थिति दिखाई गई है । प्रायः सभी लोगों को यह जानकारी रहती है कि हृदय (हार्ट) सामने से देखने पर मानव शरीर के बांयी ओर रहता है । इसी प्रकार कुछ लोग यह भी जानते हैं कि यकृत दायीं ओर स्थित रहता है । किंतु उक्त लेख के चित्र में दिखाई गई स्थिति उल्टी है । वस्तुतः चित्र सही चित्र का दर्पण-प्रतिबिम्ब (मिरर इमेज) है । यहां प्रस्तुत चित्र में क्रमांक 1 लेख के चित्र को इंगित करता है । क्रमांक 2 उसका ऊर्ध्व तल के सापेक्ष प्रतिबिम्ब है, जिसमें दायें का बांया और बांये का दायां हो गया हैं । क्रमांक 3 का चित्र 2 के तुल्य है और इंटरनेट पर उपलब्ध अनेक चित्रों में से एक है ।

उक्त त्रुटि क्यों और कैसे हुई होगी मैं कह नहीं सकता । इस भूल को मैं गंभीर मानता हूं क्योंकि इससे कुछ लोगों को भ्रम सकता है कि लीवर दायीं ओर होता है ।

जहां तक विज्ञापनों को सवाल है मैं यह मानता हूं कि उनमें भ्रामक जानकारी जानबूझ कर दी जाती है । टेलीविजन चैनलों पर और अखबारों में ऐसे विज्ञापन दिख जाते हैं जिनमें इस प्रकार के दावे सुनाई देते हैं: “यह उपकरण (इंवर्टर) आपकी इतनी बिजली बचाता है कि अमुक सालों में हो जाए फ्री ।” स्मरण रहे कि बिजली का कोई उपकरण ऐसा नहीं बन सकता है कि जो बिजली बचाता हो । केवल यह हो सकता कि बाजार में उपलब्ध उपकरणों की तुलना में अमुक न्यूनतम बिजली खरचता हो । इंवर्टर जैसी युक्ति में तो उसकी क्षमता का करीब 10 प्रतिशत या अधिक उसकी आंतरिक कार्यप्रणाली में भी खर्च होता है ।

इसी प्रकार बिजली से चलने वाली ऐसी मशीनों के भी विज्ञापन देखने को मिलते हैं जो आपको व्यायाम कराती हैं थिराप्यूटिस्ट कराती हैं । अर्थात आप निष्क्रिय लेटे या बैठे रहिए, मशीन आपके हाथपांव चला देगी और आपका व्यायाम संपन्न । थोड़ा दिमाग पर जोर डालिए, समझ में आ जाएगा कि व्यायाम का मतलब होता है शरीर की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए अपनी  मांसपेशियों (मसल्स) को स्वयं चलाना । थिराप्यूटिस्ट तो शिथिल पड़ी मांसपेशियों की स्वाभाविक सक्रियता लौटाने का उपक्रम करता है । वह “कैलोरी बर्निंग” के लिए व्यायाम नहीं कराता है । कहने का मतलब है कि असल ऊर्जा तो मशीन की खर्च होती है न कि आपकी, फिर वह व्यायाम कहां रहा ? – योगेन्द्र जोशी

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