स्वतंत्रता दिवस 2015: स्वतंत्रता बनाम अनुशासनहीनता अर्थात अपनी-अपनी मरजी

आज अपने देश इंडिया (भारत कहने वाले अब इक्कादुक्का होंगे) का स्वतंत्रता दिवस है । इस राष्ट्रीय पर्व पर मित्रों-परिचितों तथा सामान्य जन के साथ बधाई एवं शुभकामना के आदान-प्रदान की औपचारिकता निभाने का कार्य पिछले करीब 7 दशकों से चल रहा है । उस परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य है । अतः

सभी देशवासियों के प्रति मेरा अभिनंदन एवं शुभाकांक्षा

परंतु इस अवसर पर मेरे मन में तमाम सवाल उठते हैं । इस दिन को लेकर कितना संतुष्ट हुआ जाए, कितनी प्रसन्नता जताई जाए ? किंचित चिंतन करने पर मैं निराशा ही अनुभव करता हूं । क्या हमारी यह स्वतंत्रता सार्थक हो पाई है ? इस स्वतंत्रता को देश ने उस अवसर के रूप में भुनाया है जिसकी तलाश हमारे पूर्ववर्ती स्वाधीनता सेनानियों को थी ? तब के वास्तविक सेनानी अब इक्कादुक्का कहीं मुश्किल से बचे हैं और उनसे अगर पूछें तो वे निराशा ही व्यक्त करते है । आज ही मैं किसी टीवी चैनल पर एक बुजुर्ग की व्यथा सुन रहा था कि कैसे उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहे जाने का अधिकार पाने में 32 साल की लड़ाई लड़नी पड़ी ।

अवश्य ही एक-एक व्यक्ति के तौर पर बहुतों ने बहुत कुछ हासिल किया होगा । कुछ ने वैधानिक तो बहुतों ने अवैधानिक भी । जो जिसको मिला वह उसके अपने हितों को साधने के प्रयास से मिला, वह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि कही जाएगी । क्या वह सब समग्र देश की उपलब्धि मानी जा सकती है ? क्या व्यक्तियों का कुछ पाना और देश को कुछ मिल जाना एक ही बात है ? नहीं, मैं व्यक्ति के हित एवं देश के हित एक ही नहीं मान सकता । दोनों परस्पर संबद्ध हो सकते हैं, किंतु दोनों एक ही नहीं हो सकते । सोचें ।

देश की घोषित स्वतंत्रता के कुछ ही काल पहले पैदा हुआ मैं पचास के दशक के दिनों की याद करता हूं जब मैंने क्रमशः प्राथमिक एवं माध्यमिक दर्जों की पढ़ाई की । (देश की स्वतंत्रता और मुझे हमउम्र कहा जा सकता है ।) बाल्यकाल के उन दिनों  मेरी आरंभिक शिक्षा उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के अपने सुदूर गांव की पाठशाला (जिला परिषद) में हुई थी । हम छात्र-छात्राओं के घरों में घड़ी न होने के बावजूद विद्यालय के पहले घंटे की आवाज सुनकर सभी समय पर विद्यालय पहुंचते थे । मेरे तीनों शिक्षक बाकायदा समय पर पहुंच जाते थे और पढ़ाते थे न कि खाली बैठे रहते थे । तब जो कुछ सीखा उसकी धूमिल याद आज भी है । क्या आज सरकारी स्कूलों में वैसी ही पढ़ाई होती है ? तब हर वर्ष परीक्षाएं होती थीं जिन्हें गंभीरता से लिया जाता था । लेकिन आज कक्षा पांच के पहले परीक्षा नहीं होती है । बताया जाता है कि सरकारी स्कूलों से प्राइमरी-पास करीब 30% बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं आता है । हालत इतनी दयनीय है कि गांव-देहातों में भी लोग बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजने से कतराने लगे हैं । मिड-डे मील भी आकर्षण नहीं पैदा कर पा रहा है । स्वतंत्रता के बाद की कितनी अच्छी प्रगति हुई आप अनुमान लगाएं ।

मैंने हाईस्कूल परीक्षा गांव से 7-8 किलोमीटर दूर के गैरसरकारी माध्यमिक विद्यालय (अब सरकारी) से उत्तीर्ण की थी । वहां भी हम छात्रों की पढ़ाई सुचारु चली थी । मेर शिक्षक विषय के कितने जानकार थे इस पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकता, किंतु विद्यालय के दायित्वों की वे अनदेखी नहीं करते थे । नकल करना क्या होता है इसकी हम कल्पना कर सकते थे, परंतु उसे होता हुआ कभी देखा नहीं । मुझे याद है जब हमने सुना कि 10वीं की परीक्षा के समय 15-20 किलोमीटर दूर के किसी परीक्षा-केंद्र में एक छात्र ने नकल की है । तब यह एक खबर बन गई । आज नकल सामान्य बात हो चुकी है । सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र ही नकल नहीं करते बल्कि उनके अभिभावक, अध्यापक, पुलिस बल के कर्मी, सभी इस अपराध में बेशर्मी के साथ लिप्त पाये जाने लगे हैं । क्या यही स्वतंत्रता के बाद होना चाहिए था ?

अपने बाल्यकाल के उन दिनों मैंने बुजुर्गों (अब तक सभी दिवंगत) के मुख से अंगरेजी राज की प्रशंसा सुनी थी । वे कहते थे कि तब लोग चोरी-चकारी करने की हिम्मत नहीं करते थे । भले ही अंगरेजों के नियम अपने लिए कुछ भिन्न रहे हों, शेष देशवासियों के लिए उसमें भेदभाव कम था और मामले त्वरित और अपेक्षया निष्ठापूर्वक निबटाए जाते थे । लोगों को प्रशासन पर आज की तुलना में अधिक भरोसा होता था । इस प्रशंसा को प्रायः सभी अनुचित कहेंगे, किंतु वयस्क-काल के 40-42 साल के मेरे अनुभव तो यही दर्शाते हैं कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था का स्तर गिरा ही है ।

मुझे स्मरण हो आता है उस घटना का जब 1970-75 में कभी यात्रा के दौरान मेरे एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र खो गये थे । तब मैंने उनकी द्वितीय प्रति पाने के लिए आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करते हुए आवेदन किया था । मुझे न किसी को पैसा देना पड़ा ओर न ही किसी से सिफारिश करानी पड़ी । समय पर मुझे संबंधित संस्थाओं से वांछित प्रमाणपत्र मिल गये थे । आज उतनी ही आसानी से मेरा कार्य हो सका होता क्या ? शायद नहीं यही मेरे विचार में आता है ।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रशासनिक व्यवस्था के स्तर में गिरावट को नकारा नहीं जा सकता है । गिरावट की मात्रा अलग-अलग राज्यों में अवश्य ही एक जैसी नहीं होगी, कहीं सह्य तो कहीं असह्य । मैं वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में रहता हूं और वहीं का अनुभव मुझे है । प्रदेश का शायद ही कोई शासकीय विभाग होगा जहां घोटाले न हो रहे हों । स्थिति कितनी दयनीय है इसका एक ही उदाहरण काफी होगा । मेरे शहर की कुछ सड़कें कुछ समय पहले सीमेंट-कांक्रीट से बनाई गयीं ताकि वे वर्षों चल सकें । लेकिन दो ही साल में उनमें इस कदर गड्ढे पड़ गये कि अलकतरा एवं पत्थर की रोड़ी से उनकी मरम्मत की गयी है । न किसी को शर्म, न किसी को दंड । सरकारी खजाने को कैसे लूटा जाए इसी को सीखने में अधिकांश सरकारी मुलाजिम लगे हुए दिखते हैं । मेरा अंदाजा है कि हर सरकारी विभाग इस कोशिश में लगा रहता है कि कैसे उसके आरोपित कर्मचारियों को बचाया जाए । ताजा उदाहरण आरोपित अधिकारी यादव सिंह का है जिसके भ्र्रष्टाचार की जांच सीबीआई से बचाने की कोशिश सरकारी तंत्र में अंत तक होती रही है । होना तो अभी भी कुछ नहीं हैं, क्योंकि कोई इतनी आसानी से हार नहीं मानने वाला । टीवी-अखबारों से अक्सर देखने-सुनने में आता है कि कैसे प्रदेश में सधवाएं विधवा पेंशन पा जा रही हैं, कैसे युवा लोग थी वृद्धावस्था पेंशन ले रहे हैं, कैसे फर्जी प्रमाणपत्रों के बल पर नौकरी की जा रही है, इत्यादि । पुलिस बल के कारनामे जगजाहिर हैं, न जाने किसको कब पकड़ ले जाएं और मूड बिगड़ गया तो पीट-पीटकर मार डालें । थानों के भीतर महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामले सुनने को मिलते ही हैं । सरकारी तंत्र की क्या-क्या कहानी सुनाएं ?

क्या स्वतंत्रता के यही अर्थ हैं कि जिसकी जो मर्जी वैसा वह करे ? मैं ऐसी स्वतंत्रता पर संतोष नहीं कर सकता । यह तर्क मेरे लिए बेमानी है कि हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है क्या यह कम है । शासन और समाज में व्याप्त ऐसी अनुशासनहीनता से तो मुझे पीड़ा ही होती है ।

यह कहते हम नहीं अघाते कि हमारा लोकतंत्र सबसे बड़ा है । बड़ा होना हमारी विवशता है, क्योंकि यह हमारी अरब पार कर चुकी जनसंख्या की देन है । जनसंख्या यों ही बढ़ती रहेगी – और वह बड़ेगी संकेत यही हैं – तो एक दिन हम विश्व का सबसे बड़ा देश बन जाएंगे । कितने जन तब गर्वान्वित होंगे ? हमें यह स्वीकारना चाहिए कि अपना लोकतंत्र महान नहीं है । उसके लिए जनसंख्या नहीं बल्कि गुणवत्ता चाहिए । है कोई जो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को उत्कृष्ट श्रेणी का कह सके ? क्या कोई बिलाझिझक कह सके कि हमारी इस व्यवस्था की गुणवत्ता उत्तरोत्तर बेहतर होती गई है ?

गुणवत्ता की बात पर टिप्पणी करने का मतलब होगा कि हम अपने राजनेताओं एवं जनप्रतिनिधियों के चरित्र, व्यवहार, सोच आदि पर विचार करें । हमारी संसदीय प्रणाली में चुनाव आयोग की भूमिका निःसंदेह अतीव गंभीर है । इसमें मुझे शंका नहीं कि आयोग ने बीते 2-3 दशकों में अपनी कार्यप्रणाली में उल्लेखनीय सुधार किए हैं । किंतु उसकी अपनी सीमाएं हैं और वह उन नियमों-कानूनों को नहीं बदल सकता जिनके तहत जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं । वह लाख प्रयास कर ले जनप्रतिनिधि कैसे होंगे इस बाबत बहुत कुछ नहीं कर सकता है । वे कैसे होंगे यह हमारा राजनैतिक माहौल, राजनैतिक दल और जनता की सामूहिक सोच ही तय कर सकते हैं । अधोलिखित बिंदुओं पर तनिक विचार करें:

(1) लोकतंत्र की कसमें खाने वाले हमारे राजनैतिक दलों में क्या आंतरिक लोकतंत्र है ? गौर करें तो दो-तीन को छोड़ सभी दल किसी न किसी व्यक्ति या उसके परिवार की जागीर बने हुए हैं । इन दलों में ऐसा कोई नेता नहीं हो सकता जो मुखिया के विचारों से असहमत होने की हिम्मत करे । उसे मुखिया की हां में हां मिलाना ही होगा । ऐसा करना जिसके स्वाभिमान के विरुद्ध हो उसे दल में रहने की जरूरत ही नहीं ऐसा हमारे दलों की नीति रही है । यही कारण है कि इन दलों में वैकल्पिक नेतृत्व नहीं उभर पाता, नेतृत्व बदलेगा तो परिवार के भीतर से ही । क्या ऐसे दलों के द्वारा नियंत्रित लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हम गर्व कर सकते हैं ?

(2) क्या हमारी राजनीति में अपराधिक छबि के लोगों की बहुतायत नहीं है ? आम तौर पर समाज में सौ में दो-तीन से अधिक लोग ऐसे छबि नहीं रखते । कितु हमारे सांसदों विधायकों में यह 30% तक आंकी जाती है । इसका मतलब यह नहीं है क्या कि हमारी राजनीति ऐसी छबि के लोगों की शरणस्थली बनी हुई है ? दलों को ऐसे लोग स्वीकार्य हैं और जनता उनको बेझिझक चुनती है । क्या यह कलंक सदृश नहीं है ?

(3) हमारे राजनेता कहने को तो आम लोगों में से उभर कर आते हैं, किंतु जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद वे स्वयं को राजा जैसे शासक और सामान्य जनता को शासित प्रजा समझने लगते हैं । वे अपने लिए तमाम विशेषाधिकार बटोर के रखना चाहते हैं । जनसेवक होने का दावा करने वाले वे अपनी उच्चतम कोटि की सुरक्षा हासिल कर लेते हैं, कहीं सुरक्षा जांच होती हो तो स्वयं को उससे मुक्त रहने की मानसिकता रखते हैं, सड़क, रेलगाड़ी, अस्पताल आदि के प्रयोग पर अपना अधिकार पहले चाहते हैं, इत्यादि । क्या ऐसी व्यवस्था पर खुश हुआ जाए ?

(4) आप ऐसे राजनेताओं का नाम ले सकते हैं जिन्होंने जनता के समक्ष अनुकरणीय व्यवहार प्रस्तुत करने का प्रयास किया हो ? मैं उनके कारनामों की फेहरिस्त नहीं पेश कर सकता, किंतु एक उदाहरण दे सकता दूं । ऐसे कई राजनेता हैं जो वर्षों तक सरकारी आवास छोड़ने को तैयार नहीं होते, बिजली-पानी का बिल नहीं चुकाते, जिनको लेकर संबंधित संस्थाओं को अदालतों की शरण में जाना पड़ता है । यह सब शर्मोझिझक छोड़ चलता रहता है । ऐसे जनप्रतिनियों को देखकर जनता भी जोर-जबरदस्ती पर उतरती है तो आश्चर्य ही क्या है ?

(5) अपना देश अनेकों त्वलंत समस्याओं का सामना कर रहा है । ये समस्याएं किसी एक दल से सरोकार नहीं रखती हैं, बल्कि  उनके प्रति सभी को संजीदा होना चाहिए । क्या वे कभी मिल-बैठकर उनका समाधान खोजते हैं ? विपरीत उसके क्या वे एक-दूसरे के प्रति ऊलजलूल आरोप-प्रत्यारोपों में उलझे नहीं रहते हैं ? हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही स्पष्ट करती है कि देश की समस्याओं के प्रति हमारे जनप्रतिनिधि कितने सजग हैं । मैं जनसंख्या का उदाहरण लेता हूं जो 1951 में करीब 36 करोड़ आंकी जाती है । 1960 और 1970 के शुरुआती दशक में वह करीब दोगुनी हो गयी । जनसंख्या वृद्धि गंभीर समस्या हो सकती है इसका एहसास तब हो चुका था और उसके नियंत्रण के लिए सरकारों ने भी कारगर कदम उठाना आरंभ कर दिये थे । दुर्भाग्य से तब स्व. संजय गांधी के अत्युत्साह से ऐसा कुछ हुआ कि उसके बाद राजनेताओं ने जनसंख्या की बात से मुख मोड़ लिया । आज जनसंख्या तब से करीब दोगुनी और 1951 की तुलना में चौगुनी हो चुकी है । स्वतंत्रता प्राप्ति को 68 वर्ष हो चुके हैं । इतना समय बहुत नहीं होता, लेकिन यह इतना कम भी नहंीं कि कुछ समस्याएं सुलझाई न जा सकें । तू-तू-मैं-मैं छोडकर कितने नेताओं ने देश में सरकारी शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था के सुधार हेतु अभियान छेड़ा है ? गरीबी-अमीरी का फर्क और आज के 45% कुपोषित बच्चों की गंभीर चिंता कितनों ने जताई है ? भ्रघ्टाचार को बढ़ावा क्या राजनेताओं से ही नहीं मिलता है ? भ्रष्ट अधिकारियों का बचाव कौन करता है ? इत्यादि ।

इनके सदृश और भी ख्याल मन में उठ सकते हैं । वस्तुस्थिति मुझे संतोष्रद नहीं दिखाई देती है । अंगरेजी राज से हम मुक्त हो गये इस बात को लेकर कितने वर्षों तक जश्न मनाया जाए ? उसके बाद ? देश में परमाणु परीक्षण हुआ, राकेट-मिसाइल तकनीकी विकसित हुई, चंद्रयान का प्रक्षेपण हुआ, मंगलयान का सफल प्रयोग हुआ, आदि के उदाहरण पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि इनका लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी से सीधा सरोकर नहीं है । उनके लिए स्कूल, अस्पताल, बिजली-पानी, सड़क आदि का महत्व होता है न कि चंद्रयान जैसी चीजों का ।

कुल मिलाकर मुझे संतोष एवं भविष्य के प्रति आशा की अनुभूति नहीं होती है । वे अवश्य ही सौभाग्यशाली होंगे जो वस्तुस्थिति से खुश हों ।

शुभाकांक्षाएं । – योगेन्द्र जोशी

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