शहर वाराणसी – “स्मार्ट सिटी” बनने का ख्वाब, ध्वस्त कूड़ा-कचरा-निस्तारण, और मेरी निजी व्यवस्था

tangytuesday

 

 

 

1 - कूड़े-कचरे की तस्वीरें

क्योटो या स्मार्ट्सिटी या सिर्फ़ बनारस?

जब मोदीजी मेरे शहर वाराणसी के सांसद, तत्पश्चात् प्रधानमंत्री, चुने गये तो उन्होंने शहर को जापानी नगरी क्योटो की तर्ज पर विकसित करने का विचार पेश किया । जापान पहले से ही वाराणसी के विकास कार्य हेतु आर्थिक और तकनीकी मदद देता आ रहा है । मोदी के प्र.मं. बनने पर जापान की  वाराणसी पर दिलचस्पी और बढ़ गई । वहां से विशेषज्ञों का यहां आने और यहां के अधिकारियों का वहां जाने का सिलसिला भी चल निकला । अभी तक क्या हासिल हुआ पता नहीं । मुझे तो कहीं कोई खास प्रगति का पता नहीं चला । पैसा जरूर खर्च हो रहा है ।

शहर क्योटो बना कि नहीं यह इस नगरी का नागरिक होने के बावजूद मैं नहीं जान पाया । क्योटो भूलकर इसे “स्मार्ट सिटी” बनाने की कवायद की बात आजकल जरूर सुन रहा हूं । क्या होती है स्मार्ट सिटी यह मैं नहीं जानता, न ही मेरे परिचित समझ पाए हैं । सभी स्मार्ट सिटी “ऐसी होती होगी”, “वैसी होती होगी ” का कयास लगाते हैं, किंतु कोई ठीक-से नहीं जानता । सभी यही सोचते हैं कि ऐसे शहर की व्यवस्था उच्च कोटी की होगी ।

वाराणसी या कोई अन्य शहर “स्मार्ट” सिटी बने या न, कम से कम, साफ-सुथरा, पर्याप्त सुविधाओं से लैस तो बन ही सकता है, जहां के बाशिंदे अपने नागरिक दायित्वों के प्रति सचेत, नियम-कानूनों के प्रति निष्ठावान हों और प्रशासन जिम्मेदारियों के प्रति संमर्पित हो । उसे स्मार्ट सिटी नाम दें या केवल “अच्छा शहर” कहें, क्या फर्क पड़ता है ?

उक्त बातों का अभाव मैं इस नगरी में देखता आ रहा हूं । तदनुसार वाराणसी “अच्छे शहर” की श्रेणी में फिलहाल नहीं और और वैसा बनने में उसे सालों लग सकते हैं । यहां हर वांछित परिवर्तन मंथर गति से होता है । 43 वर्षों के अपने वाराणसी निवास के दौरान मैंने यहां व्यवस्थात्मक गिरावट ही देखी है । उम्मीद किस आधार पर की जाए ? अकेले पैसा फूंकने से चीजें सुधर जाती हैं क्या ? पैसा उतना जरूरी नहीं जितना सुधरने-सुधारने का संकल्प जो यहां के न नागरिकों में दिखता है और न ही प्रशासन में ।

मैं इस नगरी के “अच्छा शहर” अथवा “क्योटो” या “स्मार्ट सिटी” बनने की उम्मीद ले के नहीं चल पा रहा हूं । उम्मीद कैसे घटती है इसे मैं स्पष्ट करता हूं कूड़े-कचरे के उदाहरण से । पहले यह बता दूं कि इस शहर में कूड़े-कचरे के निस्तारण की सुचारु व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी है ।

आज (12 दिसंबर) मोदीजी वाराणसी पधारने वाले हैं जापानी प्र.मं. शिंजो आबे के साथ । उनके आगमन के कारण शहर के कुछ हिस्सों को अस्थाई तौर पर चमकाया जा रहा है यह अखबारों में पढ़ने को मिल रहा है । कोई भी घूमफिर के देख सकता है कि सबकुछ ताजा-ताजा है और आगन्तुकद्वय के सम्मान में हो रहा है । बाद में स्थिति वही पुरानी हो जानी है । मेरे इलाके में मोदी जी को आना नहीं इसलिए परसों तक तो यहां कचरे की तस्वीर वही थी जो आम तौर पर सदा रहती है । तस्वीर कैसी रहती है यह मैं लेख के आरंभ में पेश कर चुका हूं ।

वापस कूड़े-कचरे की चर्चा पर ।

कूड़े-कचरे के निस्तरण की कारगर व्यवस्था इस शहर में कभी रही नहीं । एक समय था जब नयी-नयी कॉलोनियों में कई प्लॉट खाली पड़े रहते थे । जो भी मकान बनाकर रहने लगा उसने पास के खाली पड़े प्लाटों में कचरा डालकर काम चला लिया । समय के साथ मकान बनते गए और बाशिंदों ने सड़क पर जहां जगह दिखी वहीं कचरा डालकर काम चला लिया । प्रशासन ने मुख्य सड़कों पर कहीं-कहीं इस हेतु कंटेनर भी रख दिए जो आज भी दिख जाते हैं । कोई उसमें कचरा डालता है तो कोई उसके बाहर । छुट्टा जानवर, आवारा कुत्ते, और बंदर उन कंटेनरों में भोज्य पदार्थ की तलाश करते हैं और कचरा बिखेर देते हैं । अंजाम आप सोच सकते हैं ।

कोई 6-7 साल पहले नगर-प्रशासन ने घर-घर कूड़ा-कचरा-उठान की व्यवस्था आरंभ की । ए-टु-जेड नाम की संस्था को यह जिम्मा सोंपा गया जिसे हर घर से 30 रुपये/माह की वसूली का भी जिम्मा सोंपा गया । करीब डेड़-दो साल तक ठीक-ठाक चलता रहा । फिर प्रशासन एवं उस संस्था के बीच क्या विवाद हुआ कि संस्था काम छोड़कर चली गई । कुछ महीनों के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और नागरिकों ने राहत की सांस ली । लेकिन फिर कुछ हुआ और साल भर के भीतर संस्था ने काम छोड़ दिया । एक बार पुनः समझौता हुआ और खबर मिली कि वही संस्था काम पर लौट आई है । हो सकता है शहर के कुछ स्थानों पर कार्य होने लगा हो पर मेरे मोहल्ले में नहीं । समझौता टिका नहीं, विवाद बढ़ा और मामला अदालत में चला गया । उसके बाद क्या हुआ मुझे पता नहीं; हां सफाई का जिम्मा नगर निगम ने अपने हाथ में ले लिया । लेकिन व्यवस्था कितनी सफल रही यह आरंभ में दिये गये तस्वीर से ही स्पष्ट होता है ।

नगर की सफाई व्यवस्था चरमराई है और चरमराई रहेगी इसका विश्वास मुझे 3-4 साल पहले हो चुका था । मुझे सड़क में कूड़ा फेंकना अटपटा और नागवार लगता ही था, अतः सोचा कि अब मुझे अपनी निजी व्यवस्था करनी ही होगी ।

मैंने क्या किया उसे बताता हूं । यहां दी गई तस्वीर से अंदाजा लग जाएगा ।

2 - कचरा निस्तारण व्यवस्था

मैंने सड़ने-गलने वाली चीजों (साग-सब्जियों, फल-फूलों के छिलके आदि) के लिए अपने अहाते के एक कोने में कचराघर बनाया, ईंटे-गारे से स्वयं अपने हाथ से । (मुझे ऐसे छोटे-मोटे कार्य अपने हाथ से करने का शौक है और उसके लिए मैंने पर्याप्त साधन जुटा रखे हैं ।) चित्र के बांये तथा मध्य में कचराघर की बाहर एवं भीतर की तस्वीरें हैं, और अंत में उससे प्राप्त होने वाली खाद की तस्वीर है जो गमलों या कच्ची जमीन के पेड़-पौधों पर इस्तेमाल हो जाती है ।

जहां तक कूड़ा-कबाड़ का सवाल है उसकी व्यवस्था भी मैंने की है । इसके लिए भी तस्वीर प्रस्तुत है ।

3 - कूड़े-कबाड़ का इंतिजाम

फेरी लगाकर कबाड़ ले जाने वाले अखबार-पत्रिकाएं, प्लास्टिक एवं शीशे के बेकार हो चुके सामान, लोहे-तांबे आदि के सामान, इत्यादि ले जाते हैं । मैं ये चीजें मुफ्त में दे देता हूं कभी एक को तो अगली बार किसी दूसरे को । चित्र के प्रथम हिस्से में इस प्रकार के सामान की तस्वीर है ।

चित्र के मध्य भाग में पॉलिथीन-बैगों का का चित्र है । यों तो मैं किराने का सामान तथा फल-सब्जियां कपड़े के छोले में लाता हूं, फिर भी छोटी-मोटी चीजें पॉलिथीन थैलियों में ही मिलती हैं । मैं इन थैलियों को फेंकता नहीं हूं, बल्कि उनका पुनःचक्रमण (रिसाइकिल) करता हूं । थैलियों को करीने से तहाकर और उनकी गड्ढी बनाकर किसी दुकानदार या सब्जी-फल वाले  को सोंप देता हूं । जरूरत पड़ने पर उनको धो-सुखा लेता हूं ।

इतने सब के बाद भी बहुत कुछ बच जाता है जो आसानी से सड़ता-गलता नहीं और न ही कबाड़ आले लेते हैं । चित्र के अंतिम भाग में ऐसे कूड़े की तस्वीर है । विवश होकर उसे मैं जला देता हूं । मुझे नगर-निगमकर्मी भी कूड़ा जलाते अक्सर दिख जाते हैं ।

मुझे इस बात की तसल्ली है कि कम-से-कम मेरी बजह से वाराणसी गंदा नहीं है ।

अवश्य ही मैं नगरवासियों और प्रशासन को सुधार नहीं सकता । – योगेन्द्र जोशी

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