विडंबना: उच्च अदालतों का स्वदेशी नामकरण किंतु देश का नाम इंडिया ही रहेगा

हाईकोर्टों के नाम-परिवर्तन का निर्णय

बॉम्बे एवं मद्रास उच्च न्यायालयों का नाम बदलकर क्रमशः मुम्बई तथा चेन्नै न्यायालय करने के निर्णय को केन्द्र सरकार की कैबिनेट कमिटी (काबिना समिति?) ने मंजूरी दे दी है ऐसा समाचार मीडिया में देखने-पढ़ने को मिल रहा है । समाचार के अनुसार विचार तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के नाम के स्वदेशीकरण का भी था, किंतु वह अभी शायद उस आदेश में शामिल नहीं है । समाचार कितना पुष्ट है यह मैं नहीं जानता, किंतु निराधार तो नहीं ही होना चाहिए । मैंने तत्संबंधित समाचार हिन्दी में दैनिक जागरण एवं दैनिक भाष्कर नामक अखबारों में पढ़ा । अंगरेजी अखबारों में भी उक्त समाचार उपलब्ध है । उदाहरणार्थ द हिन्दू में इस शीर्षक के साथ समाचार छपा हैः Now, Bombay, Madras and Calcutta High Courts to bear city names.

उक्त समाचार को ब्रितानी अखबार दि टेलीग्राफ ने Bombay and Madras High Courts to abandon British colonial names शीर्षक के साथ समाचार को प्रमुखता दी है । इस शीर्षक के अनुसार अदालतों के ब्रितानी उपनिवेशीय नामों को हटाकर उनको देशज यानी स्वदेशी नाम देना जनभावना के अनुरूप है । अखबार ने शिवसेना नेता अरविन्द सावन्त के हवाले से कहा है “यह तो सरकारी मुलाजिम हैं जिन्होंने समस्या पैदा की है । अदालतें भी बदलाव चाहती हैं । सरकार की नौकरशाही ऐसा करना नहीं चाहती है । इसमें अभी और पांच वर्ष लग सकते हैं ।”

नाम बदलने की परंपरा

अपने देश में राज्यों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है । अभी कुछ दिन पूर्व हरियाणा के शहर गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्रामकर दिया गया । इस बदलाव पर लोगों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त की थीं । नाम बदलाव का सरकारी तर्क था कि यह उसका प्राचीन नाम रहा है । रहा होगा, लेकिन आज तक तो वहां के लोग शहर को गुड़गांव ही कहते आ रहे हैं । नाम बदलाव का विचार किसके दिमाग की उपज थी और उसके विषय में कितनों के विचार जाने गये यह मुझे नहीं मालूम ।

एक बार मैंने जिज्ञासावश कुछ नाम-परिवर्तनों को इंटरनेट (अंतरजाल) पर खोजा था । उनमें से कुछ का उल्लेख करना समीचीन होगाः

राज्य असम (आसाम), ओडिशा (उड़ीसा), पश्चिम बंग (वैस्ट बंगाल), पुदुच्चेरी (पांडुचेरी)|

शहर कन्याकुमारी (केप कोमारिन), कोज़ीकोड (कालीकट), कोलकाता (कैलकटाध्कलकत्ता), गुवाहाटी (गौहाटी), चेन्नै (मद्रास), तिरुअनंतपुरम (त्रिवेन्द्रम), पणजी (पंजिम), पुणे (पूना), बंगलूरु (बैंगलोर), मुम्बई (बॉम्बे), विशाखापत्तनम (वालटेयर), विजयपुर (बीजापुर)| (पुराने नाम कोष्ठकों में)

परिवर्तित नामों की सूची लंबी होगी; उसे ढूंढ़ने का अधिक प्रयास मैंने नहीं किया । कई शहरों के राजमार्गों के नाम भी बदले ही गये होंगे । अपने उत्तर प्रदेश राज्य के हाल ये हैं एक सरकार किसी जिले का पसंदीदा नाम चुनती है तो दूसरी सरकार उसे बदलने की कोशिश करती है । संस्थानों के साथ भी यह खिलवाड़ होता रहता है ।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस दल की नीति रही थी (अभी भी होगी) कि हर नयी संस्था, मार्ग, पुल, आदि का नाम यथासंभव प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एवं उनके वंशजों के नाम पर होवे, गोया कि यह देश उस एकल परिवार की बपौती हो । जनोपयोगी योजनाओं के साथ भी यही किया गया । अब मौजूदा सरकार यथासंभव उन्हें बदलने की कोशिश कर रही है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । मुझे याद आता है कि कभी दिल्ली के कनॉट सर्किल एवं कनॉट प्लेस को इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के नाम पर नया नाम दिया गया था । वे नाम किसी को याद भी हैं इस पर मुझे शंका है । दिल्ली जाइए और उन्हीं पुराने नामों को लोकमुख से सुनिए ।

नाम-परिवर्तनो की आम जनों में कितनी स्वीकार्यता है इस पर मुझे शंका है । यह देश की आवश्यकता है या महज वोट के खातिर जनता को लुभाने की कोशिश ? या सामाजिक सक्रियता के शौकीन और “राष्ट्रीयता” की भावना से उत्साहित लोगों के मांग का परिणाम ?

अंगरेजी का वर्चस्व ठीक, अंगरेजी नाम नहीं !

वापस बात उच्च न्यायालयों के नाम परिवर्तन के मुद्दे पर । अधिकतर लोग अदालतों को न्यायालय न कहकर कोर्ट ही कहते हैं यह मेरा मानना है । बहुत हुआ तो उन्हें अदालत कह दिया । न्यायालय तो आम बोलचाल में कम ही लोग कहते है । आज के अंगरेजी स्कूलों में पढ़े युवाओं को तो यह शब्द मालूम न हो तो आश्चर्य नहीं होगा ।

नाम बदलने का विचार राजनेताओं से शुरु होता है और जनभावनाओं के उभार के रूप में आगे बढ़ता है । बदलाव के पीछे बहुत गंभीर कारण रहते हों और बदलाव की उपयोगिता को आंका जाता हो ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जैसा आरंभ में उल्लिखित द टेलीग्राफ अखबार में कहा गया है नाम-परिवर्तन के पीछे का सशक्त तर्क यह है कि अंगरेज उपनिवेश काल की पहचान रखने वाले नामों का देशीकरण होना चाहिए । मैं स्वयं इसका पक्षधर हूं किंतु इस कार्य में विसंगति कितनी है इस पर विचार किए बिना नहीं ।

गुड़ खाये और गुलगुले से परहेज

(पाठकवृन्द क्षमा करें मुझे मुहावरा ठीक-से याद नहीं ।) अंगरेजी विरासत के तौर पर जो नाम देश में प्रचलित हैं उनको देशज नामों से संबोधित किया जाए यह बात कहने-सुनने में अच्छी लगती है । परंतु इस कार्य में मुझे विसंगति के दर्शन होते हैं । जिस देश में पग-पग पर अंगरेजी का साक्षत्कार होता हो, प्रायः सभी दस्तावेजी कार्य अंगरेजी में किए जाते हों, जिस देश का संविधान अंगरेजी में हो, उच्चतम न्यायालय का कार्य अंगरेजी में होता हो, अंगरेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही हो, देशज भाषाओं के विद्यालय बंद होने के कगार पर हों, वहां अंगरेजी नामों को बदलने का औचित्य ही क्या है । अब तो हालात यह हैं कि हिन्दीभाषी हिन्दी में अपनी बात नहीं कह सकते बिना अंगरेजी शब्दों के प्रयोग के । जब देशवासियों को अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं तो अंगरेजी नामों से परहेज क्यों ?

यह देश है ही विचित्र । यदि नाम ही बदलना है तो सबसे पहले देश का नाम बदला जाना चाहिए । इस देश का नाम “भारत” होना चाहिए या “इंडिया”?  इंडिया नाम अंगरेजों का दिया हुआ है न कि इस देश का मौलिक या प्राचीन नाम है । विष्णुपुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को भारतवर्ष या भारत कहा गया है । तब हम इसे भारत क्यों नहीं कहते ? सब जगह इंडिया ही क्यों सुनने को मिलता है ? यहां तक कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी भी अपने नारे इंडिया के नाम ही गढ़ते है, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, आदि-आदि । ऐसी स्थिति में अदालतों और अन्य संस्थाओं के अंगरेजी नाम हटाने का आडंबर क्यों ?

पहले इस देश का नाम “भारत” किया जाना चाहिए तब अन्य नाम बदलने का तुक बनता है । इस बारे में मेरे अपने तर्क हैं और प्राचीन ग्रंथों का आधार भी, जिनकी चर्चा मैंने अपने ब्लॉग (दिनांक 15 जून 2016) में की है ।

अदालतों के ब्रितानी नाम बदल दो किंतु देश को इंडिया ही कहते रहो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है । – योगेन्द्र जोशी

और प्रसंग से कुछ हटकर   

यह देश भारत, जिसे विदेशी ही नहीं देशवासी भी इंडिया नाम से संबोधित करना पसंद करते हैं, विविधताओं, विचित्रताओं, विसंगतियों और विरोधाभासों का देश है । यहां इतना कुछ एक साथ देखने को मिल सकता है जो विश्व के किसी अन्य देश में संभव नहीं लगता, न चीन में और न ही संयुक्त राज्य अमरीका  में; छोटे देशों में तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती । अतः मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि अपने आप में अद्भुत, अद्वितीय, अनूठे देश में जन्मा हूं मैं, जिसे प्राचीन मनीषियों ने भारतवर्ष नाम दिया था और जिस नाम से मैं स्वयं इसे संबोधित करना चाहूंगा । – योगेन्द्र जोशी

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