राजनैतिक दांवपेंच में माहिर मुलायम सिंह का अखिलेश को समाजवादी पार्टी सौंपने का नाटक

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दिनांक 16 जनवरी (2017)। हफ़्तों से चले आ रहे समाजवादी पार्टी के पारिवारिक नाटक का अंत हो गया। चुनाव आयोग ने भी घोषित कर दिया कि इस पारिवारिक “राजनैतिक” पार्टी के दो फाड़ हो चुके हैं जिसका बड़ा धड़ा अखिलेश के पाले में जा चुका है। आयोग के नियमानुसार यही गुट अब “समाजवादी पार्टी” कहलायेगा जिसका राष्ट्रीय अध्यक्ष मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव होंगे और गरीबों के गमनागन का साधन दोपहिया “साइकिल” बतौर चुनाव-चिह्न इस्तेमाल करने के वे ही हकदार होंगे। मुलायम सिंह और उनके अनुयायीयों (चाटुकार और पिछलग्गू?) को पार्टी के उस नाम से हाथ धोना पड़ा है जिसे उन्होंने प्रदेश की राजनीति में करीब ढाई दशक से पाला-पोसा और प्रायः अजेय दल के रूप में स्थापित किया। मुलायम सिंह, शिवपाल, अमर सिंह (?) तथा शेष विवश नेता अब क्या करेंगे ये वे ही ठीक-ठीक बता पायेंगे। निश्चय ही कई नेता होंगे जो असमंजस की स्थिति में होंगे कि किस धड़े का हिस्सा बनें।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो यह घटना बाप-बेटे के बीच की वर्चस्व की लड़ाई थी। अखिलेश अपनी “साफ-सुथरी” (कितनी साफ-सुथरी?) छवि को और चमकाने के चक्कर में रहे, इसलिए वे अपने सगे चाचा के उन चहेतों से छुटकारा चाहते थे जिनकी छवि आपराधिक बताई जाती है। दूसरी तरफ चाचा का सीधा-सादा उद्येश्य था किसी भी प्रकार से चुनावों में जीत हासिल करना और बहुमत हासिल करना। चाचा का तर्क सीधा था: हमें जिताऊ प्रत्याशी चाहिए चाहे वह आपराधिक छवि का ही क्यों न हो। स्पष्ट है कि चाचा-भतीजे में निभ नहीं रही थी। दूसरी तरफ एक पीढ़ी दूर के दूसरे चाचा अखिलेश के पक्ष में रहे और उनका मार्गदर्शन करते रहे। झगड़ा यादव परिवार के भीतर का था और वही समाजवादी पार्टी का झगड़ा भी बन गया था जिसमें किसी भी पार्टी सदस्य की कोई भूमिका नहीं रही, सिवाय अनुनय-विनय करने के, जिसमें आजम खां प्रमुख थे।

क्या मुलायम सिंह वास्तव में अखिलेश के विरुद्ध थे? मेरा व्यक्तिगत मत है कि ऐसा नहीं था।  पांच साल पहले अखिलेश को गद्दी पर किसने बिठाया? क्या खूबी थी अखिलेश में? तब तक तो अखिलेश का कोई शासकीय अनुभव भी न था। क्या सपा में अनुभवी नेताओं का अकाल था?

भारतीय लोकतंत्र में प्रायः सभी दलों में मुखिया जो चाहे वही होता है। अन्य नेताओं की औकाद बंधुआ मजदूरों की जैसी होती है। उन्हें हां में हां मिलाना होता है, अन्यथा जिसमें स्वाभिमान होता है वह पार्टी छोड़ देता है। मुखिया ही ताउम्र अध्यक्ष होता है या उसके परिवार का उसका चहेता। ऐसे दलों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसी परिवार के सदस्यों का हक होता है। तो उस समय भी अखिलेश की जगह शिवपाल को मुख्यमंत्री बनाना अधिक तार्किक होता। वर्षों से उनका साथ निभाते आ रहे लक्ष्मण जैसे भाई के स्थान पर अखिलेश को क्यों चुना? हो सकता है मुलायम सिंह के समक्ष धर्मसंकट रहा हो, पर अंत में उन्होंने पुत्रमोह में अखिलेश को वरीयता दी होगी यह मेरा सुविचारित मत है। वे भाई को गद्दी सौंपकर बेटे के भविष्य को दांव पर नहीं लगाना चाहते होंगे। पुत्रमोह से प्रायः सभी ग्रस्त रहते हैं, खासकर राजनीति में।

मुलायम सिंह राजनीति के चतुर खिलाड़ी रहे हैं। वे इतने मूर्ख नहीं हो सकते थे कि बेटे के सामने हार मान लें। मुलायम सिंह 77 वर्ष हो चुके हैं और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। इसलिए वे अपनी ढलती उम्र में समय रहते अखिलेश को सुस्थापित न करने की घोर गलती नहीं कर सकते थे। मतलब यह कि जो सपा परिवार (पार्टी कहें या परिवार कोई अंतर नहीं!) में हुआ वह सोचा-समझा नाटक था – देखने वालों में भ्रम पैदा करने के लिए।

मैं यही मानता हूं कि बाप-बेटे में मूक सहमति रही होगी कि कैसे नाटक खेला जाना है। उनके बीच अकेले में जो गुप्त बातें हुई होंगी उसका ब्योरा कौन दे सकता है भला?  मुलायम सिंह भली भांति जानते थे कि शिवपाल के खेमे के पार्टी-जनों – जिनमें कइयों की आपराधिक छवि रही है या अभी है – को साथ लेकर अखीलेश नहीं चल पायेंगे। उनकी मौजूदगी शिवपाल के हक में होती और वे अखिलेश को कमजोर भी कर सकते थे। मुलायम को यह भी याद रखना था कि शिवपाल और पार्टी के अनेक जन, जिन्हें अखिलेश नापसंद करते हैं, के उन पर एहसान हैं, क्योंकि उन्हीं के बल पर वे सपा को स्थापित कर सके और सफल हुए। उन सभी लोगों की नजर में मुलायम सिंह को उनका पक्षधर भी दिखना था और साथ में अपने बेटे को भी मजबूती देनी थी। तब रास्ता क्या था? यही न कि बाप-बेटा एक नाटक रचें जो सबको सच से दूर अंधेरे में रखे।

इस घटना को देख मुझे महाभारत का एक प्रकरण याद आता है। भीष्म पितामह कौरव-पांडव युद्ध में कौरवों (दुर्योधन आदि) की ओर से लड़े। यह सब जानते थे कि जब तक भीष्म जीवित रहेंगे तब तक पांडव युद्ध नहीं जीत सकते थे। यह स्वयं भीष्म ही थे जिन्होंने पांडवों को वह राज बताया कि कैसे वे मारे जा सकते हैं और पांडव जीत सकते हैं। कहने का मतलब यह कि भीष्म लड़ तो रहे थे युर्योधन की ओर से लेकिन युद्ध जिता रहे थे पांड़वों को। कुछ ऐसा ही मुलायम कर रहे थे। पक्ष लेते दिख रहे थे शिवपाल बगैरह का और छिपे तौर पर बेटे अखिलेश को आगे बढ़ा रहे थे।

दुर्भाग्य से नाटक का मंचन इतना अच्छा नहीं हो पाया कि वह हकीकत लगे। पैनी निगाह रखने वाले बहुत-से लोगों को अनुभव हो चुका है कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह बहुत कुछ सोच-समझके ही यह खेल खेले होंगे।

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अब बाप-बेटे एक हो गये हैं। अखिलेश पिता से आशीर्वाद ले लिए हैं और मुलायम सिंह ने उनको अपने समर्थकों की सूची दे दी है जिनको अखिलेश ने टिकट देना है। उस सूची में शिवपाल का भी नाम है जिसे अखिलेश अपनी सूची से बाहर कर चुके थे। कभी आपने ऐसा नेता देखा है जो अपने कार्यकर्ताओं को विरोधी खेमे से प्रत्याशी बनने की सिफ़ारिश करे? मुलायम मौके की नजाकत के हिसाब से ऐसा भी कर सकते हैं।

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पूरे घटनाक्रम से यही लगता था कि सपा दो धड़ों में बंट चुकी है और दोनों धड़े अपने-अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारेंगे। पर ऐसा हो नहीं रहा है। जरा गौर करिए इस लेख के आरंभ में प्रदर्शित अखिलेश के चुनावी बैनर पर, जिसमें पिता-पुत्र दोनों मौजूद हैं। दरअसल मुलायम सिंह अखिलेश की समाजवादी पार्टी के संरक्षक है और अब ताउम्र रेहेंगे।

भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ हो सकता है। लोकतंत्र के भारतीय मॉडल को मैं छद्म राजतंत्र कहता हूं, जो लोकतंत्र की मूल भावना के प्रतिकूल है। ऐसे लोकतंत्र को नकारा जाना चाहिए “नोटा” बटन के माध्यम से विरोध जताकर। – योगेन्द्र जोशी

 

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