हादसों का देश भारत – क्या देशवासी कभी सुधरेंगे भी?

कल (19 अक्टूबर) दशहरे के दिन रावण-दहन के मौके पर अमृतसर में एक बेहद गंभीर और दुखद हादसा हुआ।

उस अनिष्ट घटना में बहुत से (शायद 50 से अधिक) जनों की अकाल मृत्यु हो चुकी है और पता नहीं कितने जने आहत हुए हैं।

उस हादसे में दिवंगत हो चुके लोगों की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना और आहतों के त्वरित स्वास्थ्य लाभ की हम सभी कामना कर सकते हैं। प्रभावित पारिवारिक जनों को अप्रत्याशित विकट कष्टप्रद स्थिति का सामना करने का बल मिले यह प्रार्थना सभी करते हैं।

जिम्मेदार कौन?

वह हादसा हुआ क्यों? कौन जिम्मेदार है उसके लिए?

मैं टेलीविज़न समाचार सुन रहा था। दुर्घटना के तुरंत बाद सभी समाचार चैनलों पर उस हृदयविदारक घटना की जानकारी प्रसारित होने लगीं। सभी पर लगभग एक जैसी बातें सुनने को मिल रही थीं। कुछ लोग कह रहे थे कि आयोजकों की गलती से दुर्घटना घटी, तो कोई स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहा था। कहने वाले तो रेल प्रशासन को भी कुछ हद तक जिम्मेदार कह रहे थे।

मुझसे पूछें तो मैं स्थानीय प्रशासन और रावण प्रकरण के आयोजकों को तो जिम्मेदार मानता ही हूं। लेकिन क्या वहां तमाशा देखने वाले लोग खुद जिम्मेदार नहीं? टिप्पणी करने वाले यह भी कह रहे थे कि अपने देश में रेलवे विभाग ने पटरियों की फ़ेंसिंग (बाड़ से घेराबंदी) नहीं की है जो कि विकसित देशों में किया जाता है। फ़ेंसिंग होती तो हादसा न होता।

लेकिन सवाल यह है कि फ़ेंसिंग न होने का मतलब यह तो नहीं कि आप रेल पटरियों का इस्तेमाल मनमाने तरीक से करें। क्या लोगों को यह सामान्य समझ नहीं होनी चाहिए कि पटरियों पर खड़े होकर तमाशा देखना खुद में लगत व्यवहार है? क्या प्रशासन डंडा लेकर लोगों को भगाए तभी वे मानें यही रवैया अपनाया जाना चाहिए? दरअसल रेलवे ट्रैक को पार करना भी पड़े तो भी सोच-समझ कर करना चाहिए, और उसे जल्दी ही पार कर लेना चाहिए ताकि किसी हादसे की गुंजाइश न हो। लेकिन मानता कौन है? रेलवे लाइन पर कुछ जने ऐसे बैठते या चलते हैं जैसे वह कोई सामान्य पैदल मार्ग हो। ऐसे हादसे सुनने को मिलते हैं जिनमें रेलवे लाइन पर कोई हेडफोन कान पर लगाए गाना सुन रहा हो, या फोन पर बात कर रहा हो। कोई-कोई तो रेलगाड़ी आ रही हो और उसके सामने सेल्फ़ी भी लेते देखे जाते हैं।

बुरा लगेगा लोगों को परंतु यह बात सही है कि हम भारतीय सुरक्षा के मामले में बेहद लापरवाह हैं और हर बात पर प्रशासन पर दोष मढ़ने लगते हैं। क्या लोगों को खुद भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?

जहां तक रेलवे लाइन की फ़ेंसिंग का सवाल है वह मुझे अपने देश में संभव नहीं लगता है। रेलवे के पास संसाधन भी अपर्यप्त हैं और सुरक्षा की उसकी अन्य प्राथमिकताएं हैं। इतना और बता दूं कि विकसित देशों एवं अन्य विकासशील देशों में विकास का अर्थ केवल ढांचागत विकास ही नहीं होता है। अपितु उसके साथ लोगों के व्यवहार, सोच, और कायदे-कानूनों को मानने की प्रवृत्ति भी विकसित होते हैं। यदि लोग लापरवाही वरतना छोड़ दें बहुत-सी दुर्घटनाएं होना ही बंद हो जाएं।

मेरे अनुभव

मैं इंग्लैंड में रह चुका हूं। वहां पर मैंने देखा है कि रेलवे फ़ेंसिंग की आवश्यकता जानवरों के लिए अधिक और आदमियों के लिए कम अनुभव की जाती हैं। लाइन पार करने लिए आवश्यकतानुसार लाइन के ऊपर पुल या नीचे अंडरपास बने रहते हैं। यहां की तरह वहां लोगों की भीड़ भी जहातहां नहीं दिखती है। नियमों को मानते हुए सड़कें या रेलवे लाइन पार करते हैं। पटरियां उन जगहों से गुजरती हैं जहां गाएं एवं अन्य पशुओं को पालने के लिए फ़ार्महाउस बने होते हैं। ढेरों जानवरों के साथ उन्हें देखने वाले ग्वाले बहुत कम होते हैं। चरते-चरते जानवर लाइन पर न आ जाएं इसलिए फ़ेंसिंस की जाती है। अपने यहां फ़ेंसिंस करना भी चाहे तो आसान नहीं। देश में बहुत से इलाके मिल जायेंगे जहां रेलवे लाइन के दोनों तरफ़ रिहायशी मकान बने हों और लोगों का लाइन के आरपार आना जाना लगा रहता है। कम से कम झुग्गी-झोंपड़ियां तो खड़ी रहती ही हैं। ऐसे में रेलवे भी कितना सावधानी वरत सकती है?

मैंने यह भी देखा है कि इंग्लैंड में वहां जहांतहां पटाखे फोड़ना प्रतिबंधित रहता है। वहां भी पटाखों का चलन है जैसे “हैलोवीन” के मौके पर। पटाखों का कार्यक्रम रिहायशी मकानों बीच नहीं होता बल्कि उनके पास खुले मैदानों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसी प्रकार पतंगें भी सड़कों एव मकानों की छतों से नहीं, बल्कि खुले मैदानों में उड़ाई जाती हैं। और अपने यहां?

हादसों के प्रकार अनेक

मैं जब मुद्दे पर गंभीरता से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि रोजमर्रा की बहुत-सी दुर्घटनाएं जो पूरी तरह से मानव लापरवाही के कारण होती हैं। उनके लिए न प्रकृति दोषी ठहराई जा सकती है और न ही मशीनी उपकरण। यदि मशीनें कारण दिखाई देती हैं तो वह भी उसी लापरवाही की वजह से। आगे दुर्घाटनाओं के कुछ मामले गिनाता हूं जो बखूबी रोके जा सकते हैं:

(1) हर्ष-फ़ायरिंग कई लोगों को बंदूकें लहराकर खुशी व्यक्त करने का शौक होता है। वे यारों की शादी पर, किसी चहेते नेता की चुनाव में जीत पर, या ऐसे ही किसी और मौके पर हवा में गोली चलाने लगते है। इस अवांछित कृत्य में कभी-कभी किसी को गोली लग जाती है और खुशी मातम में तब्दील हो जाती है।

(2) पटाखों का चलन शादी-ब्याह, दीवाली-होली आदि मौकों पर पटाखों का चलन दिनबदिन बढ़ता जा रहा है। संकरी गलियां हों या बाजार का इलाका शौकीन लोगों को कोई चिंता नहीं रहती है। मुझे अपने शहर वाराणसी की एक दीवाली का स्मरण है जिसमें लंका नामक इलाके में स्थाई दुकानों के आगे पटाखों की अस्थाई दुकानें सजी थीं। पास ही में लोग पटाखे छोड रहे थे। एक चिनगारी कहीं से एक दुकान में गिरी। तब क्या हुआ होगा अंदाजा लगा सकते हैं।

(3) बिना लाइसेंस वाहन चालन मैंने वाहन चलाना वर्षों पहले छोड़ दिया था। जब मैं चलाता था तब मेरी पहचान में किसी का भी लाइसेंस वाहन-चालन के ठोस परीक्षण पर आधारित नहीं था। आज भी स्थिति वैसी ही होगी ऐसा मेरा ख्याल है। दुनिया के प्रमुख देशों में कड़े सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक परीक्षण का प्रावधान है। लोगों को एक-एक घंटा तक सड़कों पर वाहन-चालन क्षमता दिखानी पड़ती है। लाइसेंस के लिए कभी-कभी दो-दो तीन-तीन बार परीक्षण से गुजरना पड़ता है। साफ जाहिर है कि लाइसेंसधारी को नियम-कानूनों का अच्छा ज्ञान तथा जिम्मेदारी का भाव होता है। इसलिए वहां यातायात के नियमों का उल्लंघन बहुत कम होता है और जब होता है तो जुर्माना भी कम नहीं होता। अपने यहां लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफिक होता है। सड़कों पर हादसे तो होंगे ही।

(4) व्यक्तिगत सुरक्षा के चिंता महानगरों को छोड़ दें तो आप देखेंगे अन्य शहरों में लोग दुपहिया वाहन पर हेल्मेट नहीं पहनते, कार चलाने में बेल्ट नहीं पहनते, सड़क पर गति की सीमा का ख्याल नहीं रखते, शराब के नशे में भी वाहन चलाते हैं, चलाते समय मोबाइल फोन पर बात करते रहते हैं, नींद के झोंके आ रहे हों तो भी वाहन चलाते है, वाहनों में अनुमत संख्या से कहीं अधिक सवारियां ठूंसते हैं, इत्यादि। प्रशासन की जिम्मेदारी होती है की कड़ाई से नियमों का पालन कराएं। प्रशासन परवाह नहीं करता तो क्या किसी को व्यक्तिगत तौर पर समुचित कदम नहीं उठाना चाहिए?

(5) आग की घटनाएं आए दिन दुकानों मे, बहुमंजिली इमारतों में, रिहायशी भवन में आग की घटनाएं सुनने को मिलती हैं। अक्सर “शॉर्ट-सर्किट” को दोष देकर जिम्मेदारी तय हो जाती है। क्यों होते हैं शॉर्ट-सर्किट इसकी परवाह कोई करता है? और ऐसे मौकों पर अग्निशमन के उपकरण मौके पर क्यों नहीं रहते हैं?

(6) आवारा पशु आवारा जानवर, खास तौर पर आवारा कुत्ते, कई दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। आवारा कुत्तों के झुंडों द्वारा जख्मी किए या मारे जाने की खबरें मीडिया में आती रहती हैं। इनको नियंत्रित करने के लिए क्या कभी राष्ट्र के स्तर पर अथवा राज्यों के स्तर पर समुचित प्रयास की बातें सुनी जाती हैं?

(7) अनियंत्रित भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार इस देश को खोखला कर रहा है। अधिकांश समस्याएं तो उसी की देन हैं। जीर्णशीर्ण भवनों का गिरना, निर्माण के समय भवनों और पुलों का गिरना आम बात है। सभी हादसों में गरीब लोग ही मारे जाते हैं जिनके जीवन की कीमत 2-4 लाख रुपया तय कर दी जाती है और मामले कालांतर में रफादफा हो जाते हैं। किसी को जिम्मेदार नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार की अनेक दुर्घटनाएं रोजमर्रा के जीवन में देखने को मिलती हैं। घटना के समय घड़ियाली आंसूं बहाने वाले अनेक मिलेंगे। लेकिन आम जन और प्रशासन उनसे कोई सीख क्यों नहीं लेते? मेरी राय में आम लोग तमाशबीन होते हैं। वे जहां भीड़ हो वहां खतरे हो सकते हैं इसकी अनदेखी करके भीड़ में शामिल हो जाते हैं। क्या इतनी भी समझ नहीं होती कि वे स्वयं बचें?

दुर्घटनाओं के समय शासन चलाने वाले नेता “दोषी व्यक्ति बख्शे नहीं जाएंगे का आलाप शुरू करते हैं” लेकिन किसी को दोषी न ठहरा पाते हैं और न ही किसी जो दंडित करते हैं। अपने यहां के राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी, दोनों ही, असल में गैरजिम्मेदार होते हैं। क्यों न हों? उसी समाज से ही तो वे निकलते हैं जहां लापरवाही को जनता का मौलिक अधिकार समझा जाता है। वे घिसेपिटे तरीके से शासन-प्रशासन चलने के आदी होते हैं। विरला ही कभी थोड़ा नया और सार्थक कार्य करने की कोशिश करता है।

हादसों पर दुःखित होना स्वाभाविक है। लेकिन मुझे इस बात का अधिक दु:ख होता है कि यहां व्यवस्था के लिए उत्तरदायी लोगों को न तो कभी शर्म आती है और न कभी आत्मग्लानि। वे ऐसे हालात में भी देश को विकसित करने का ख्वाब देखते हैं। – योगेन्द्र जोशी

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