कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई

कोरोना संक्रमण

पूरी दुनिया इस समय ऐसी विपदा झेल रही है जिसकी दूर-दूर तक किसी को आशंका नहीं थी। चीन से चले कोरोना (COVID-19) नामक विषाणु ने अनेक विश्व-नागरिकों को तेजी से रोगग्रस्त कर दिया है और उनमें से कई काल के गाल में भी समा गए हैं। यह विषाणु कहां से आया, कैसे पैदा हुआ, जैसे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। विश्वसमुदाय में कई जन मिल जाएंगे जो इसे चीनियों के उस खानपान से जोड़कर देखते हैं जिसमें कुछ भी अखाद्य नहीं होता यदि वह विषैला न हो तो। कहते हैं कि वहां कुत्ते-बिल्ली, मेढक-सांप, चूहे-चमगादड़, आदि सभी का मांस भक्षणीय माना जाता है। कदाचित इस विषाणु का स्रोत चमगादड़ है। कदाचित!

लेकिन लोग इस संभावना से आगे चलकर भी देखते हैं। कइयों को शंका है कि यह चीन की किसी चूक का दुष्परिणाम है; अथवा चीन ने यह विषाणु जैविक हथियार के तौर पर ईजाद किया है और जानबूझ कर अनेक देशों के लोगों को संक्रमित कर दिया है। अपनी बात सिद्ध करने को किसी के पास पुख्ता प्रमाण नहीं हैं; बस चीन पर अविश्वास ही उनकी सोच का आधार है।

इसमें दो राय नहीं कि इस विषाणु का फैलाव बड़ी तेजी से हुआ और हो रहा है। यह माना जा रहा है कि यह रोगियों के छींकने पर, सांस की प्रक्रिया में और बोलते वक्त नाक-मुंह से निकले अत्यंत सूक्ष्म जलबिंदुओं (ड्रॉपलेट) में स्थित विषाणुओं से एकदूसरे में फैलता है।

अभी उपचार का कोई कारगर तरीका खोजा नहीं जा सका है। दुनिया के सभी कोनों में भांति-भांति के तरीके अपनाए जा रहे हैं, शायद कोई कारगर सिद्ध हो जाए। प्रभावी दवा के अभाव में एकदूसरे के संपर्क से बचना ही वांछित तरीका है। इसके लिए कई देशों ने “लॉकडाउन” का रास्ता अपना लिया है जिसके तहत लोगों को घरों में सीमित रहने की सलाह दी गई है और कई उद्यमों और कार्यालयों को फिलवक्त अस्थाई बंदी झेलनी पड़ रही है। अपने देश में भी प्रधानमंत्री ने २४ तारीख की अर्धरात्रि से त्रिसाप्ताहिक लॉकडाउन घोषित किया है।

आर्थिक हानि

दैनिक मजदूर इस बंदी के कारण अपने मूल स्थान गांवघरों को लौटने को मजबूर हो चुके हैं। वे लोग बेहद परेशानी झेल रहे हैं। लोगों को सभंलने के लिए २४ घंटे का समय तो मोदीजी को देना ही चाहिए था। निर्णय के कार्यान्वयन में उतावलापन न दिखाते तो रोग के प्रसार में खास फर्क न पड़ता। मैं घर से दूर कुछ करने में असमर्थ हूं। घर पर भी होता तो वृद्धावस्था आड़े आती। चंदे के रूप थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद की जा सकती वह मैं कर रहा हूं।

पूरे विश्व के भयावह आर्थिक हानि और मंदी के दौर से गुजरने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं। आने वाले समय में उक्त विषाणु मानव समाज को किस हालात में छोड़ेगा यह पूर्णतः अनिश्चित है।

मैं स्वयं कैसे इस मौजूदा हालात से तालमेल बिठा रहा हूं इसे बताने का मन हुआ सो लिख रहा हूं।

लॉकडाउन – आवागमन बंद

हम, (पत्नी तथा मैं) इस समय महानगर बेंगलूरु में हैं, अपने बेटे-बहू-पोते के पास अपने स्थाई निवास वाले शहर वाराणसी से करीब २००० किलोमीटर दूर। आये तो थे केवल महीने भर के लिए और बीते माह (मार्च) की २२ तारीख हवाई टिकट से लौटना था। लेकिन अब यहीं फंसकर रह गये हैं। असल में उस दिन (२२ ता.) के लिए अपने प्रधान मंत्री मोदीजी ने एक-दिवसीय “जनता कर्फ्यू” की घोषणा कर दी। वाराणसी के मेरे मित्रों की सलाह थी कि वहां हवाई अड्डे से घर आने के लिए टैक्सी वगैरह की उपलब्धता की समस्या हो सकती है, अतः उस दिन की यात्रा टाल देना ही उचित होगा। हवाई सेवा वाली कंपनी भी बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा निरस्त करने के या यात्रा की तिथि आगे बढ़ाने की सुविधा दे ही रही थी।

हमने भी सोचा कि अगले २३, २४, या २५ ता. निकलना बेहतर होगा। दरअसल हम वाराणसी यथाशीघ्र पहुंचना चाहते थे ताकि २५ ता. से आरंभ हो रहे नवरात्र पर्व पर वहां रहें और नौ-दिवसीय फलाहारी उपवास पर रह सकें जिसकी समुचित व्यवस्था यहां पर नहीं हो पा रही थी। वाराणसी के स्थायी बाशिंदा होने के कारण हमारे लिए वहां वांछित व्यवस्था करना आसान था। उपवास तो अभी भी चल रहा है किंतु रात्रि भोजन में अन्नाहार अपना लिया है। संयोग से २४ ता. की अर्धरात्रि से लॉकडाउन हो गया और यात्रा की संभावना फिलवक्त समाप्त हो गई।

हम बेंगलूरु के जिस बहु-आवासीय परिसर में रह रहे हैं वह काफी बड़ा है। २३ बहुमंजीले इमारतों में अनुमानतः २००० फ्लैट होंगे और निवासियों की संख्या ६००० से अधिक ही होगी।  परिसर के चारों ओर टहलने में करीब आधा घंटा लग जाता है। आजकल बमुश्किल चार-छः लोग टहलते दिखते हैं जब मैं बाहर निकलता हूं। अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में दुबके रह रहे हैं।

अभी लॉकडाउन की शुरुआत है, इसलिए लोग ऊब नहीं रहे होंगे। लेकिन सोशल मीडिया में कुछ लोगों की बेचैनी के वीडियो देखने को मिल रहे हैं। इन पर विश्वास नहीं होता, पर यदि ऐसा हो तो आश्चर्य भी नहीं होगा। कुछ लोगों को घर पर समय बिताना (या समय काटना!) वास्तव में कठिन होता है। इसका कारण है रोजमर्रा के कामधंधे से जुड़े कार्यों से मुक्त होने पर कुछ नया करने के उत्साह का अभाव। जब कामधंधे से भिन्न रुचियों का अभाव हो तो क्या करूं, क्या करूं की बेचैनी स्वाभाविक होती है।

दिनचर्या बदल-सी गई है

सौभाग्य से मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। मेरी रुचियों में पर्याप्त विविधता है। इसलिए मेरे लिए २४ घंटे का समय व्यतीत करना कठिन काम नहीं रहता। यहां घर से दूर भी मेरी सुनियोजित दिनचर्या है।

प्रातःकाल थोड़ा विलंब से उठना हो पाता है, छः-पौनेछः बजे। वाराणसी में होता तो पांचः-पौनेपांच बजे तक उठ जाता। उसके बाद शौच-स्नानादि का कार्य संपन्न करता हूं। पश्चात थोड़ा-बहुत्त प्राणायाम एवं यौगिक व्यायाम भी संपादित कर लेता हूं। इस बीच पत्नी महोदया भी स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर नित्यपूजा (संप्रति संक्षिप्त) में लग जाती हैं और मैं नहाने का कार्य पूरा करने स्नानागार चला जाता हूं। चूंकि रोजमर्रा के कपड़े अपने-अपने हाथ से धोने की हम दोनों की आदत है, अतः नहाने में थोड़ा अधिक समय लग जाता है। मेरे नहाने-धोने के दौरान परिवार का कोई एक सदस्य चाय तैयार कर लेता है।

यहां हिंदी समाचार-पत्र मुश्किल से मिलते हैं और आजकल तो वह भी संभव नहीं। कागज पर छपा समाचार-पत्र पढ़ना मुझे आसान एवं आरामदेह लगता है। मेरी आदत वर्षों से ‘दैनिक जागरण’ के वाराणसी संस्करण पढ़ने की बन चुकी है और उसकी ई-प्रतिलिपि (ई-पेपर) से मेरा काम चल जाता है। चाय की चुस्कियों के साथ तथा उसके कुछ समय बाद तक मेरा ई-पेपर पढ़ना जारी रहता है।

घड़ी की सुइयां अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं और इतना सब करते-करते साड़ेदस-ग्यारह बज जाते हैं। तब मैं बाहर निकलता हूं आधा-पौनघंटे के लिए  टहलने। मैं वाराणसी में होता तो यह कार्य प्रातः-काल ही कर चुकता, किंतु यहां यह दोपहर तक हो पाता है। टहलना मेरे नित्यकर्मों का एक अनिवार्य हिस्सा रहता है जिसकी सलाह मुझे अपने डाक्टर से मिली है। आजकल यहां आसमान साफ है लॉकडाउन की मेहरबानी से जिसने प्रदूषण स्तर बहुत घटा दिया है। इसलिए धूप एकदम चटक रहती है, परंतु उससे मुझे कोई परेशानी नहीं होती। दिन का शेष समय लैपटॉप पर लेखन-पठन, टेलीविज़्-समाचार सुनने, अथवा पोते के साथ खेलने आदि में गुजर जाता है। इनके अतिरिक्त घर के भीतर छिटपुट कामों में अन्य सदस्यों को सहयोग देने में भी बीतता है।

कुल मिलाकर लॉकडाउन के इस काल में २४ घंटे का समय व्यतीत करना मेरे लिए कोई समस्या नहीं रहती। मेरा कष्ट इस बात को लेकर है कि यदि में अपने स्थाई निवास वाराणसी में होता तो घर-बाहर के विविध कार्य निबटा रहा होता, जैसे अपने अहाते के छोटेबड़े पौधों या गमलों में लगे पौधों की काटछांट, करने, उन्हें खादपानी देने का काम कर लेता। या घर के भीतर भी घर-गृहस्थी से जुड़े काम निकल ही जाते हैं; उनका भी समाधान निकालता। या किसी पुस्तक अथवा पत्रिका का अध्ययन कर लेता। यहां पर वह सब न पा सकने की विवशता तो है ही। देखिए कब तक यह सब चलता है। – योगेंद्र जोशी

कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई” पर 5 विचार

  1. Reblogged this on जिंदगी बस यही है and commented:

    कोरोना विषाणु (वाइरस) ने दुनिया में कहर ढा रखा है। अपने महीने भर के पूर्वतः चयनित कार्यक्रम को निरस्त करते हुए अपने शहर से दूर महानगरी में चार हफ्ता रुकना पड़ गया है। नई दिनचर्या अपनानी पड़ी है। उसी का लेखा-जोखा।

  2. महोदय ,
    सादर प्रणाम ।
    आपका लेख पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा । सबसे प्रमुख बात हिन्दी भाषा में शुद्धता । आपके शेष लेख भी पढ़ रहा हूं ।
    आपकी लेखनी ने ऐसा सुंदर लिखा है कि बंध गया हूं आपके लेखों से ।
    साभार धन्यवाद् ।

    • बहुशः धन्यवाद कि आपने मेरे लेख को पसंद किया।
      यह बताना प्रासंगिक होगा कि मैं यथासंभव साफसुथरी हिंदी में लिखता हूं, ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजी में लिखते समय ठीकठाक अंग्रेजी प्रयोग में लेने का प्रयास करता हूं। अंग्रेजी में कम लिखता हूं लेकिन लिखता हूं।
      कुछ जनों को शिकायत रहती है कि मेरी हिंदी कठिन रहती है। मेरा कहना है दिक्कत मेरी हिंदी के साथ नहीं बल्कि उनकी हिंदी के साथ है। जब आप हिंदी का शब्दज्ञान ही नहीं बढ़ाएंगे तो हिंदी कठिन लगेगी ही।
      मेरे लिए लिखना आसान नहीं होता। मैं अपने लिखे का एक बार पुनरीक्षण (रिविजन) करना आवश्यक समझता हूं। अस्तु, बहुत कुछ कहा जा सकता है।
      शुभाकांक्षाएं।

  3. महोदय ,
    सादर प्रणाम ।
    आज आपसे एक सहायता चाहिए । एक लेखक का नाम जानना है ,क्या इसमें आप मेरी सहायता करेंगे ।
    उस लेखक के बारे में कुछ महीने पहले एक समाचार पत्र में उनकी चिट्ठी के कुछ अंश प्रकाशित हुए ।
    उनके बारे में सिर्फ इतना याद है कि उनकी जो दूसरी शादी हुई उस लड़की की उम्र बहुत कम थी , लड़की के पिता इसी बात से शादी के खिलाफ थे ।लड़की लेखक से प्रभावित थी इस वजह से उसने सिर्फ अपनी सुनी ।
    जब वो लेखक लड़की के पिता के घर गए तो वहां लड़की ने किसी से कुछ नहीं पूछा बस अपना सामान एक सूटकेस में भरा और लेखक के साथ आ गई ।

    मै इन लेखक का नाम भूल रहा हूं , इनके बारे में पढ़ना है मुझे । बहुत खोजा लेकिन कुछ मिला नहीं ।
    हालांकि इनका निधन हो चुका है शायद 2018 या 2017 में ।

    • मुझे खेद है कि इस बारे में मैं आपकी मदद नहीं कर सकता। असल में मैं एक भतिकीविद (फ़िजिसिस्ट) एवं तद्विषयक शिक्षक रहा हूं। भाषायी जानकारी हासिल करने और उस पर आधारित ब्लॉगलेख लिखने का शौक है। संस्कृत में विशेष रुचि जरूर रही है, लेकिन हिंदी साहित्यकारों के न तो संपर्क में हूं और न ही उनके बार में कोई जानकारी रखता हूं। क्षमा करें।

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