निष्प्रभावी न्यायिक तंत्र बनाम नियोजित मुठभेड़ – किस्सा विकास दुबे का

कानपुर की दिल दहलाने वाली घटना

पिछले कुछ दिनों से विकास दुबे समाचार-माध्यमों (मीडिया) पर चर्चा का विषय रहा है। उसके बारे में पहले कभी मैंने नहीं सुना था। शायद कम ही लोग (कानपुर से बाहर) उसके बारे में सुनते रहे होंगे। मेरे ख्याल से उससे कहीं अधिक चर्चा में उत्तर प्रदेश के अन्य अपराधी-माफिया रहे हैं। उसका अनायास चर्चा में आना उस दिल दहलाने की घट्ना के बाद हुआ जब २-३ जुलाई की अर्धरात्रि में हुए पुलिस छापे (raid) में उसने अपने गुर्गों की फौज की मदद से ८ पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना में उसके मदद्गार खुद दो पुलिसकर्मी भी थे जिन्होंने छापे की गोपनीय जानकारी समय से पूर्व उस तक पहुंचाई। क्या विडंबना है कि पुलिस वालों को मरवाने में खुद अन्य पुलिसकर्मियों का हाथ था। घटना के बाद उसके कई साथी मारे गये और वह भागते-फिरते उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर तक दर्शनार्थ पहुंच गया।

समाचार के अनुसार उज्जैन में एक पुष्पविक्रेता (माली) और मंदिर के सुरक्षाकर्मी ने उसे पहचान लिया और उसे पुलिस के हत्थे चढ़वा दिया। पुलिस जब उसे पकड़कर ले जा रही थी तो वह चीखकर बोला “मैं विकास दुबे कानपुर वाला”। ऐसा कहकर वह शायद लोगों को बताना चहता था कि उसके साथ कोई मुठभेड़ की घटना तो नहीं होगी। उसने भागने की कोशिश नहीं की है और पुलिस ने उसे निर्विरोध पकड़ लिया है। खुद को उज्जैन की पुलिस के हवाले करके वह मुठभेड़ से बच जाने की उम्मीद कर रहा था।

नियोजित घातक मुठभेड़ यानी इन्काउंटर

जुलाई ११ (शनिवार) के दैनिक जागरण (वाराणसी संस्करण, पृ. ८) में छपे समाचार के अनुसार गुरुवार को विकास दुबे को उज्जैन पुलिस ने महाकालेश्वर में पकड़ा और उसे पहले महाकाल थाने और फिर भैरवगढ़ थाने ले गई। पूछताछ के बाद उसे उ.प्र. से पहुंची एसटीएफ (STF) टीम को सौंप दियाउज्जैन पुलिस का दावा है की उसको हथकड़ी पहनाई थी और साथ में सुरक्षा हेतु बुलेट-प्रूफ जैकेट भी। विचार ठीक था क्योंकि उसका कोई दुश्मन कहीं घातक हमला न कर दे इससे बचना था। सुरक्षा के कदम तो उठाने ही चाहिए भले ही वे गैरजरूरी लगें। ऐन मौके पर धोखा तो हो ही सकता है, खास तौर पर शातिर अपराधी के मामले में। मध्य प्रदेश पुलिस शिवपुरी थाने तक एसटीएफ टीम के साथ रही जहां उ.प्र. का पुलिस बल पहुंच गया था। म.प्र. पुलिस ने वहां पर उसकी सुपुर्दगी (रात्रि करीब ८:०० बजे) की और एसटीएफ टीम कानपुर की ओर लौट आई।

कानपुर लौटते समय झांसी बॉर्डर पार करने के बाद सभी ने एक ढाबे पर भोजन किया और फिर आगे बढ़ गये। यहां तक तो सब ठीक रहा, किन्तु पुलिस के अनुसार कनपुर से करीब १०-१२ किमी पहले (भौंती गांव के आसपास) पानी बरसने के कारण फिसलनदार हो चुकी सड़क पर पुलिस की वैन जिसमें दुबे और कुछ पुलिसकर्मी थे पलट गयी। पुलिस कहती है कि गाय-भैंसों के झुंड के सामने आ जाने से यह हादसा हुआ। इसमें कुछ पुलिसकर्मीं जख्मी हुए। विकास दुबे को मौका मिला, उसने एक पुलिसमैन की पिस्टल छीनी और गोली चलाते हुए वह खेतों की तरफ भागने लगा। पुलिस ने उसे चेतावनी दी, वह माना नहीं। अंततः पुलिस को आत्मरक्षा एवं उसे रोकने के लिए गोलियां चलानी पड़ी। परिणाम उसके जीवन का अंत।

मुठभेड़ की विवशता

दुर्दांत अपराधियों के मामले में उ.प्र. की पुलिस आमतौर पर निष्क्रिय बनी रहती है जब तक कि कोई गंभीर घटना न घट जाये, जैसे कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या। ऐसे अपराधियों को कानूनसम्मत तरीके से सजा दिलाना पुलिस के लिए बेहद कठिन होता है। तब एक ही रास्ता रह जाता है – घातक मुठभेड़ यानी इन्काउंटर। इन्काउंटर का रास्ता विवादास्पद होता है यह सरकार और पुलिसबल, दोनों, जानते हैं। जनता भी इसे समझती है। लेकिन पुलिस की मजबूरी होती है इसे समझते हुए कई लोग इसे स्वीकार्य मानते हैं। लेकिन आलोचना के शौकीन लोगों को कुछ कहने-लिखने का मसाला मिल जाता है। वे भी समुचित सजा दिलाने का विकल्प क्या है यह नहीं बता पाते। सिद्धांतों से दुनिया चलती नहीं, किसी विकल्प को व्यावहारिक होना चाहिए!

अपराधों के अनुरूप सजा दिलाना क्यों असंभव-सा होता है इसे समझना कठिन नहीं है। कोई इंसान रातोँ-रात दुर्दांत अपराधी नहीं बनता और न ही वह राजनेताओं और प्रशासनिक/पुलिस अधिकारियों के संरक्षण के बिना चर्चित अपराधी की श्रेणी में आता है। अपराधी मूर्ख नहीं होते लेकिन उनकी सोच असामान्य और आपराधिक मनोवृत्ति की होती है। अपने काम में समय के साथ महारत हासिल कर लेते हैं। राजनेताओं और अधिकारियों से संबंध कैसे स्थापित करें इस कला को वे बखूबी सीख जाते हैं। दोनों पक्षों के बीच एक प्रकार के लेनदेन (give and take) का रिश्ता स्थापित हो जाता है। “मुझे तुम संरक्षण दो और मैं मौके पर तुम्हारे काम आऊंगा।” की नीति अपना लेते हैं। उदाहरणार्थ वह संरक्षक राजनेता के लिए येनकेन प्रकारेण वोट का बंदोबस्त करता है और बदले में राजनेता पुलिस और न्याय-तंत्र उसे बचाने की कोशिश करते है।

साफ है कि जब किसी को बचाने वाले मौजूद हों तो सजा कौन दिलायेगा? कोई पुलिस वाला करे क्या जब उस पर दवाब पड़ रहा हो। फोन पर उस तक पहुंचने वाले “आदेश” वह न माने तो अपराधी का कुछ बिगड़ता नहीं उल्टे पुलिस वाले को तबादले या निलंबन का दंड भुगतना पड़ता है। संबंधित राजनेता या उच्चाधिकारी का भी कुछ नहीं बिगड़ता है। राजनेता तो यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है, “सार्वजनिक व्यक्ति होने के कारण तमाम लोग उससे मिलने आते हैं, जिनको पहचानने न पहचानने की जिम्मेदारी वह नहीं ले सकता। इसलिए किसी के साथ तस्वीर छप गयी तो इसमें गुनाह क्या है?“

अपराधियों से सभी आम लोग डरते हैं, खास तौर पर भुक्तभोगी जो कहीं से भी संरक्षण नही पाते और पुलिस भी अपराधी का नाम सुन मामला रफा-दफा करने में जुट जाती है (कौन दुश्मनी मोल ले?)। इसलिए अपराधी के विरुद्ध गवाही देने की हिम्मत आम आदमी नहीं दिखा पाता। फलतः अदालतों में जघन्य अपराध सिद्ध नहीं हो पाता और जब अपराधी बरी हो जाता है तब वह उन साक्ष्य देने वालों से चुन-चुन कर बदला लेता है। वह पहले से अधिक ताकतबर होकर उभरता है।

यदि पुलिसबल यह महसूस करे कि अपराधी को मृत्युदंड से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए  जो  लचर न्यायिक  व्यवस्था के चलते  होगा नहीं तो वह घातक मुठभेड़ का रास्ता अपनाता है।

ध्वस्त न्यायिक व्यवस्था

यह सचमुच दुर्भाग्य का विषय है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था भरोसेमंद नहीं रह गयी है। अंग्रेजी में एक उक्ति हैः “Justice delayed is justice denied”। अर्थात् बिलंब से दिया गया अदालती निर्णय असल में न्याय नहीं रह जाता है। यह कथन आप न्यायाधीशों, राजनेताओं, जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों, सभी, के मुख से सुनते आये होंगे। तो फिर त्वरित न्याय की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाये जाते?

न्यायिक व्यवस्था की गंभीर खामियों का शिकार भुक्तभोगियों को होना पड़ता है। समस्याएं अनेक हैं जैसेः

(१) न्यायालयों में न्यायाधीशों की कमी

(२) अपराधियों की पैरवी को कानूनी दांवपेंच के ज्ञाता अधिवक्ता

(३) किसी मामले की सुनवाई की तारीख पर तारीख

(४) गंभीर पाये गये अपराधियों को भी जमानत

(५) पुलिसबल का मामले के प्रति उदासीनता

(६) सुरक्षा के अभाव में गवाहों का मुकरना

(७) नयायालयों का परिस्थिति-जन्य साक्ष्यों को गंभीरता से न लेना

(७) न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार

इनके अतिरिक्त भी अन्य कारण हो सकते हैं।

मुठभेड़ का अविश्वसनीय नाटकीय खेल

मेरी धारणा है कि मुठभेड़ के बहुत कम मामले होते हैं जिसमें पूरा घटनाचक्र इस तरह घटित होता है कि उसकी वास्तविकता पर शक न किया जाये। उसमें दोनों पक्षों के कुछ सदस्य जख्मी होते हैं और एक या अधिक अपराधी मारे भी जाते हैं। इसके विपरीत अधिकांश बनावटी होते हैं, अर्थात् वे पूर्वनिर्धारित रहते हैं और उनको कैसे अंजाम दिया जायेगा इसकी योजना पहले से तय हो चुकती है। मेरा मानना है कि विकास दुबे की मुठभेड़ इसी श्रेणी की थी। मुझे कई बातें ऐसी लगी जो उसे एक घटिया दर्जे के फिल्मांकन की तरह लगता है जिसमें निर्देशक साफ नजर माने वाली गलतियां करता है।

(१ )     मुठभेड़ की घटना प्रातः ७:००-७:३० बजे की बताई जाती है। कहा जाता है कि सड़क पर गाय-भैंसो के आ जाने और पुलिस-वैन का अचानक ब्रेक लगने से वह एक ओर पलट गयी। मेरा ख्याल है कि पशुपालक सुबह के टाइम अपने नित्य कर्म करके उन्हें दुहते हैं और चारागहों को ८-९ बजे से पहले नहीं ले जा पाते हैं। (घटना के वीडियो में मैंने तो किसी को कहते भी सुना कि रात भर वैन चला रहे चालक को  झपकी  आ गयी होगी।)

(२ )     क्या वैन पलटने का कथित दावा सही है? यदि हां तो सवाल उठता है कि तेज गति का वाहन पलटने के बाद भी कुछ दूर तक घिसटेगी ही। लेकिन घटनस्थल पर ऐसे कोई संकेत नहीं दिख रहे थे। वाहन एक तरफ पलटी हुई थी लेकिन क्षतिग्रस्त नजर नही आ रही थी। उसके पहिए तो सही सलामत दिख रहे थे। यह भी मेरी समझ से परे है क्यों क्रेन से उस वाहन को कुछ दूर तक घसीट कर ले जाया गया? क्या इसलिए की वाहन का एक पार्श्व (कदाचित बाई साइड) सड़क से रगड खाये ताकि बाद में कोई देखे तो दावे को सही मान ले। अन्यथा कोई भी सामान्य समझ वाला यही मानेगा कि वाहन को पहले पहियों पर खड़ा किया जाना चाहिए, फिर आगे खींचकर ले जाना चाहिए। “टो” (tow) करने का आम तरीका यही होता है।

(३)     विकास दुबे दुर्दांत अपराधी माना गया। खुद उज्जैन पुलिस ने उसे हथकड़ी पहनाकर उ.प्र. पुलिस को सोंपा था। तब क्यों एसटीएफ टीम ने उसे हथकड़ी नहीं पहनाई? हथकड़ी किस श्रेणी के अपराधी को पहनाई जाती है। पुलिस का तर्क मनमानी का था। हथकड़ी न सही, अपराधी के हाथ तो कमर के पीछे ही बांधा होता!!

(४)     कहते है उसे दो पुलिसकर्मियों ने बीच में बिठाकर पकड़ रखा था। वाहन पलटने पर पुलिसकर्मियों को चोटें आईं, अपराधी को नहीं। वह उनके बीच से वाहन के बाहर निकलने में कैसे सफल हुआ? हल्की-फुल्की चोट खाये (?) दो पुलिसजन उसे नियंत्रित नहीं कर सके। इतने कमजोर थे वे दोनों? अन्य कर्मी क्या थे ही नही? पूरा काफिला चल रहा था।

(५ )     ताज्जुब कि वह किसी की पिस्टल भी छीनकर भागने में समर्थ हुआ। उसकी एक टांग कमजोर थी और वह ठीक-से चल भी चल भी नहीं पाता था और वह ऐसा दौड़ा कि कोई जवान उसे पकड़ भी नहीं पाया।

(६)     खैर भागा, फायरिंग करते हुए। पुलिस ने जो गोलिया चलाईं इतनी नजदीक से चलाईं कि उसका हृदय, गुर्दा (किडनी), जिगर (लिवर) को छेदते हुए पार हो गयीं। क्या निशाना था जवानों का! वैसे कम ही पुलिसमैन निशानेबाज हो पाते हैं। मुठभेड़ में आम तौर पर कमर के नीचे गोली चलाई जाती है। लेकिन जब इरादा ही मुठभेड़ में मारने का हो तो ऐसा ही होता है।

अंतिम बात

मुठभेड़ में विकास दुबे को मारा जाना था इरादतन। यह बात प्रायः हर कोई मान कर चल रहा था। जैसा पहले कह चुका हूं मैं भी यही मान रहा था। पुलिस की यह मजबूरी थी और यह न्यायसम्मत नहीं था। मेरा कहना है कि इस नाटक को गटिया तरीके से नहीं पेश करना चाहिए था। उसे विश्वसनीय लगना चाइए था।

नौबत मुठभेड़ की आई। इसके लिए जनता की सेवा करने का राग अलापने वाले राजनेता और खुद पुलिस महकमा जिम्मेदार रहा था। अन्य अप्रराधियों को भी संरक्षण ये ही दिये हुए हैं।

इस घटना पर मुझे एक पौराणिक कथा ध्यान में आती है।स्मासुर नामक एक असुर ने महादेव शिव की घोर तपस्या की। आशुतोष कहे जाने वाले भगवान शिव वरदान देते समय भावी परिणामों के बारे में सोच नहीं पाते थे। असुर ने वर मांगा कि जिसके सिर पर हाथ रखूं वह भस्म हो जाए। शिवजी ने वर दे दिया। असुर ने उसका प्रयोग उन्हीं पर करना चाहा। वे भागे-भागे भगवान् विष्णु के पास पहुंचे। श्रीविष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके असुर को अपने साथ नृत्य का प्रलोभन दिया। नृत्य की एक भंगिमा में मोहिनी ने अपने सिर पर हाथ रखा। असुर ने उस भंगिमा की नकल की और स्वयं को भस्म कर डाला। हमारे शासकीय तंत्र में अपराधी को इसी प्रकार पहले संरक्षण दिया जाता है, फिर अति होने पर उसका इंकाउंटर कर दिया जाता है।योगेंद्र जोशी

निष्प्रभावी न्यायिक तंत्र बनाम नियोजित मुठभेड़ – किस्सा विकास दुबे का” पर एक विचार

  1. Reblogged this on Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति and commented:

    कानपुर के बिकरु गांव के विकास दुबे ने छापा मारने आये आठ पुलिसकर्मियों की साथियों के साथ मिलकर हत्या कर दी। बाद में उज्जैन में पकड़े जाने के बाद उस अपराधी को पुलिस ने मुठभेड़ में मार डाला। उसका इंकाउंटर तो होना ही था, क्योंकि देश की लचर न्यायिक व्यवस्था के चलते उसको ह्ल्कीफुल्की सजा मिलती या न मिलती। किंतु मुठभेड़ का खेल मुझे एक्दम कृतिम-सा लगता है।

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