साइकिल में गुन बहुत हैं …

साइकिल में गुन बहुत हैं सदा राखिए संग।

पेट्रोल की जहमत नहीं बदलें जीने का ढंग॥

साइकिल के “गुन-अवगुनों” की बात करने से पहले में यह बताना चाहूंगा कि साइकिल से मेरा रिश्ता कब और कैसे स्थापित हुआ।

पर्वतीय पृष्ठभूमि

मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के सुदूर पर्वतीय क्षेत्र के छोटे-से गांव में तब हुआ था, जब अपना देश भारत (यानी इंडिया) बस स्वतंत्र ही हुआ था। उस काल में वहां सड़कों का जाल नहीं था। निकटतम बस अड्डा पैदल मार्ग से लगभग १७ मील (करीब ३२ कि.मी.) दूर हुआ करता था। वह समय था जब शेर-छटांक, गज-फुट, मील, सोलह आने (६४ पैसे) के अंग्रेजी काल के माप-तौल की इकाइयां चलन में थीं। आज के बच्चे-युवा इनका नाम भी नहीं जानते हों तो ताज्जुब नहीं। मेरे जीवन के शुरुआती १३-१४ वर्ष गांव के माहौल में ही बीते थे। कक्षा ५ तक की आरंभिक शिक्षा भी गांव की ही पाठशाला में हुई थी। हम लोग प्राइमरी स्कूल या प्रारंभिक विद्यालय नहीं कहते थे, भले ही इन संबोधनों से परिचित थे। बिजली, टेलीफोन, रेलगाड़ी, बस, साइकिल, आदि शब्द हम बच्चे सुनते तो थे किंतु ये सब क्या होते होंगे की सही कल्पना नहीं कर पाते थे। उस पर्वतीय क्षेत्र की चढ़ाई-ढलान वाली पगडंडियों पर साइकिल का कोई काम नहीं था। कहीँ-कहीं ३-४ फुट चौडे रास्ते भी होते थे जिन पर खच्चर/घोड़े से सामान या सवारी ढोने का कार्य लिया था। यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि आरंभिक किशोरावस्था तक साइकिल का साक्षात्कार मैंने नहीं किया था।

छात्रजीवन और साइकिल

जब गांव से ८-१० कि.मी. दूर के विद्यालय से हाई-स्कूल (१०वीं) की परीक्षा उत्तीर्ण करके जब कानपुर पहुंचा आगे की शिक्षा के लिए तब मेरा साइकिल से असल परिचय हुआ। परिचय ही नहीं विद्यालय आने-जाने के लिए गिरते-पड़ते उसे सीखा भी। और फिर वह अपनी सवारी बन गयी अभी तक के जीवन भार के लिए। अभी तक के जीवन भर के लिए इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कल किसी ने देखा नहीं, शारीरिक सामर्थ्य कितनी रहेगी कोई बता नहीं सकता।

यह बताना भी समीचीन होगा कि उस जमाने में तांगा, रिक्शा, बस, और साइकिल ही शहरी आवागमन के साधन होते थे, या फिर पैदल ही रास्ता नापा जाता था। स्कूटर, बाइक और कारें किस्मत वालों के पास देखने को मिलते थे। इनकी उपलब्धता भी बेहद कम थी। शहरों में जाम की समस्या शायद ही कहीं सुनने को मिलती होगी। यही साइकिल मेरे और मेरे सहपाठियों के आवागमन का साधन बना रह एक लंबे समय तक। विश्वविद्यालय तक की शिक्षा लेने और उसके बाद शोधछात्र के तौर पर और २-४ साल बाद विश्वविद्यालय में भौतिकी (physics) के शिक्षक के तौर पर कार्यरत होने के बाद भी मेरा साइकिल चलाना वैसे ही चलता था जैसे मेरे अन्य संगीसाथियों का। विकल्प भी कहां थे? वह काल था जब स्कूटर ब्लैक में मिलते थे, विशेषतः वेस्पा मॉडल, दुगुने-डेड़ गुने दाम पर। मुझे याद है यह सुना हुआ कि मेरे एक-दो वरिष्ठ शिक्षक जब कभी विदेश जाते थे तो वहां से मिले डॉलरों से स्कूटर खरीदते थे और कालांतर में उसे ब्लैक में बेच देते थे। सन् १९७० के दशक में सरकारों ने सीमित संख्या में स्कूटर-निर्माण की छूट निर्माताओं को दी और वे लोगों को उपलब्ध होने लगे। मेरे संगी साथियों ने भी अपनी जमा-पूंजी से स्कूटर खरीदे, और फिर उनमें से कुछ की साइकिल की आदत धीरे-धीरे छूट ही गयी। बढ़ती संपन्नता के साथ साइकिल की जगह पहले स्कूटर ने और बाद में कार ने ली।

साइकिल और स्कूटर साथ-साथ

मैंने भी १९८१ में एक स्कूटर खरीदा, किंतु साइकिल छोड़ी नहीं। विश्वविद्यालय या अन्यत्र जाने पर कोई एक इस्तेमाल कर लेता था। जहां किसी और को साथ ले चलना होता, या शीघ्रता से कहीं पहुंचना होता अथवा अधिक दूर जाना होता तो स्कूटर ही प्रयोग में लेता था। अन्यथा कभी साइकिल तो कभी स्कूटर। मेरे शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्थित यातायात व्यवस्था वाली सड़कों ने स्कूटर चलाने की मेरी हिम्मत वर्षों पहले छीन ली थी। जीवन के ७३ वसंत पार कर चुका मैं अब स्कूटर नहीं चलाता। बस एकमात्र साइकिल ही मेरा निजी वाहन है। मैं आवश्यकतानुसार पैडल-रिक्शा, ऑटोरिक्शा, अथवा टैक्सी का इस्तेमाल कर लेता हूं।

जैसा कह चुका हूं मेरे परिचितों, संगी-साथियों और सहकर्मियों में से कई ने कारें ले लीं और साइकिलें छोड़ दीं। एक बार जब विश्वविद्यालय कर्मचारियों का वेतन-पुनरीक्षण एवं वेतन-वृद्धि हुई तो मुझे साथियों ने सलाह दी थी कि मैं भी कार खरीद लूं। कार चलाना तो मैंने कभी सीखी नहीं। और मेरे शहर वाराणसी की बेतरतीब तथा जाम से ग्रस्त यातायात व्यवस्था में मुझे उसकी कोई उपयोगी नहीं दिखी। इसलिए मैं ‘बे’कार ही रहा।

अब मैं इस लेख के शीर्षक में व्यक्त असली मुद्दे पर आता हूं। जब मैंने करीब २० साल पहले पर्यावरण (environment), प्रदूषण (pollution), पारिस्थितिकी (ecology) एवं प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) जैसे मुद्दों पर जिज्ञासावश जानकारी जुटानी शुरू की तो मुझे एहसास हुआ कि वस्तुस्थिति काफी गंभीर है। लगभग वही समय था जब मेरे हृदयरोग का निदान भी हुआ और डाक्टरी सलाह पर दवाइयों के सेवन के साथ मैंने तेज गति से टहलना (brisk walking) भी आरंभ किया। आज हूं तो हृद्रोगी, लेकिन खुद को हृद्रोगी के रूप में नहीं देखता। इस रोग के होते हुए भी मैं १००-५० नहीं १०००-१२०० सीढ़ियां आराम से चढ़ लेता हूं।

उसी समय मुझे शारीरिक श्रम तथा साइकिल की उपयोगिता विशेष तौर पर समझ में आने लगी। तब की अनुभूति ने मुझे अधिकाधिक पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए प्रेरित किया। साइकिल की उपयोगिता के दूसरे पहलू भी मुझे समझ मैं आने लगे। आगे उसी सब का संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूं।

साइकिल में गुन बहुत

किसी वस्तु अथवा कार्य से क्या लाभ हैं इसका आकलन हर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं और पसंदगी के आधार पर तय करता है। बहुत संभव है कि जिसे में लाभ कहूं उसे आप कोई लाभ नहीं कहकर खारिज कर दें। स्पष्ट है कि मैं अपनी सोच के अनुसार साइकिल के लाभ गिनाउंगा।

(२) यह ऐसा साधन है जिसके इस्तेमाल करने पर शारीरिक व्यायाम भी होता है। आजकल लोग शारीरिक श्रम से परहेज करते हैं और शिकायत करते हैं कि उन्हें हृदरोग जैसी शिकायत है। शारीरिक श्रम के अभाव में रोगी बनने की संभावना बढ़ जाती है यह चिकित्सक भी कहते हैं। साइकिल का प्रयोग करने पर जिम जाने की जरूरत नहीं। वृद्धावस्था में साइकिल चलाना या टहलना ही बेहतर व्यायाम है।

(१) साइकिल यातायात का एक सस्ता साधन है। इंधन-चालित वाहनों की तुलना में उसकी कीमत काफी कम रहती है। उसका रखरखाव का खर्चा भी कुछ खास नहीं होता है। इंधन-आधारित न होने के कारण उसके रोजमर्रा इस्तेमाल पर भी कोई खर्चा भी नहीं होता।

(३) साइकिल पर्यावरण के लिए हितकर है। न कार्बन प्रदूषण, न ध्वनि प्रदूषण, न सड़क पर जाम का खास कारण बनता है। जाम की स्थिति पर जहां अन्य वाहनों को रुकना पड़ता है वहीं साइकिल-चालक बगल-बगल से निकलने में भी सफल हो सकता है। सड़कों पर अन्य वाहन दुर्घटना के कारण बन सकते हैं लेकिन साइकिल शायद ही कभी कारण होगा।

(४) अन्य वाहनों को खड़ा करने के लिए भी जगह चाहिए। आजकल शहरों में वाहनों की “आबादी” पर कोई रोक नहीं किंतु उनकी “पार्किंग” के लिए पर्याप्त स्थान कम ही उपलब्ध है। मेरे शहर, वाराणासी, में तो हालात इतने खराब हैं कि कभी-कभी बेतरतीब खड़े वाहनों के कारण पैदल चलना भी दूभर हो जाता है। साइकिल को खड़ा करना रिहायशी कमरे में भी संभव है और सड़क के किसी कोने-किनारे पर भी।

अवगुन भी तो हैं

(१) साइकिल की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे चलाने वाले की प्रतिष्ठा पर बट्टा लग जाता है। आप संपन्न हों तो आपसे उम्मीद की जाती है कि आप कार से नीचे किसी वाहन को नहीं चलाएंगे। कुछ नहीं तो बाइक आपके पास होनी चाहिए। साइकिल तब आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप हो सक्ती है जब आपकी इतनी ख्याति हो कि आपकी संपन्नता से लोग सुपरिचित हों और वे जानते हों कि आप स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने से साइकिल चलाते हैं।

(२) आम तौर पर साइकिल एक सवारी के लिए बनी रहती। इसलिए दो या अधिक सवारियों के लिए हरएक के लिए साइकिल की जरूरत होती है। साइकिल की यह कमी गंभीर तो है ही। वैसे कभी-कभार दो-दो तीन-तीन सवरियां ढोते हुए भी लोग दिख जाते हैं।

(३) साइकिल के इस्तेमाल का मतलब है शारीरिक श्रम और उसका मतलब है आराम की जिन्दगी को छोड़ना। आम तौर पर मनुष्य सुखसुविधा से जीना चाहता है। आधुनिक तकनीकी का विकास जीवन को अधिकाधिक आरामदेह बनाना भी है। कष्टकर जीवनशैली को भला कौन चुनना चाहेगा?

अन्त में निजी रुचि

     अभी साइकिल के लाभहानि की उक्त बातें ही मेरे मस्तिष्क में आ रही है। इनके अतितिक्त भी लाभ या हानि की अन्य बातें हो सकती हैं। लेख का समापन करूं इससे पहले यह भी बताना चाहूंगा कि मेरी उम्र ७३+ हो चुकी है, फिर भी पैदल चलना मेरी पहली पसंद है। डेड़-दो कि.मी. दूर के गतव्य के लिए पैदल चलना मुझे स्वीकार्य है। पांचएक कि.मी. की दूरी तक साइकिल से आना-जाना मुझे कठिन नहीं लगता है। अधिक दूरी के लिए ऑटोरिक्शा या अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है। पहले कभी स्कूटर चलाता था, लेकिन अब नहीं। वाराणसी की दुर्व्यवस्थित यातायात में स्कूटर से चलना मेरे लिए संभव नहीं। – योगेन्द्र जोशी

साइकिल में गुन बहुत हैं …” पर एक विचार

  1. Reblogged this on Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति and commented:

    आज के युग मैं आरामतलबी आम जीवन का हिस्सा बन चुकी है। लोग शारीरिक श्रम से बचते है। अतः साइकिल वही चलाते हैं जो पेट्रोल वाहन नहीं रख सकते। या वे गिने-चुने लोग जो शौक रखते हैं। लेकिन साइकिल की अपनी उपयोगिता है।

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