नोटों का विमुद्रीकरण (demonetization): सार्थक एवं निरर्थक टिप्पणियां और वह जो केंद्र सरकार ने किया होता।

 

विमुद्रीकरण की खबर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी जी ने मंगलवार 8 नवंबर की संध्या, यानी रात्रि प्रथम प्रहर, उस दिन तक प्रचलित 500 एवं 1000 के नोटों के विमुद्रीकरण की जो अप्रत्याशित घोषणा की उसके लिए देशवासी तैयार नहीं थे। इसमें दो राय नहीं कि जिस उद्देश्य से यह निर्णय सरकार ने लिया उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। यह जरूर है कि बहुत से लोगों को इस निर्णय से परेशानी हुई है। बहुतों के लिए विमुद्रीकरण की खबर निराशा/हताशा का संदेश बनकर भी आई। खबर की ठीक-ठीक जानकारी का अभाव जनलेवा भी साबित हुई यह भी सुनने में आ रहा है। अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह निःसंदेह खेदजनक था। मैं ऐसी स्थिति के पीछे उन लोगों की गलती कहूंगा जिन्होंने नोटों के बंद होने की आधी-अधूरी जानकारी अन्य जनों को देकर भ्रम की स्थिति पैदा की।

कुछ लोगों का कहना है कि नोटों के प्रचलन को बंद करने की सूचना समय पर दी गयी होती तो उन्हें संभलने का अवसर मिला होता। उन लोगों को समझना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा गया था जिससे उन लोगों को संभलने का अवसर ही न मिले जिन्होंने अघोषित धनराशि घरों में जमा कर रखी हो। यह अवश्य है कि ऐसा करने पर उन लोगों को भी परेशानी हो गयी जिनका पैसा उस श्रेणी का नहीं था और जिन्होंने किसी न किसी आवश्यकता के अंतर्गत उसे घर में रखा था।

सरकार ने यह किया होता

     सरकार योजना को पूर्णतः गोपनीय रख सकी यह सराहनीय था। पूरी तैयारी करीब छः महीने पहले से चल रही थी फिर भी वह इस क़दर गोपनीय बनी रही इसके लिए संबधित अधिकारी-गण बधाई के पात्र हैं। तैयारी में कहीं कुछ कमी रह जाना आश्चर्य की बात नहीं है। मेरी समझ में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखी गयी होतीं तो बेहतर होता:

(1) अगर उक्त घोषणा मंगल की रात्रि न करके गुरुवार की रात्रि की गयी होती तो शायद लोगों को कम असुविधा होती। दूसरे दिन शुक्रवार बैंक शेष तैयारी करने के लिए लेनदेन के लिए बंद रहते जैसा कि बुधवार को हुआ था। कई कार्यालयों में सप्ताहांत (शनिवार, रविवार) पर छुट्टी रहती हैं और कुछ के लिए शनिवार के दिन द्वितीय शनिवार (सेकंड सैटरडे) की छुट्टी रहती है, अतः लोगों को काम पर जाने की अफरातफ़री झेलते हुए तुरंत नोट बदलने की जल्दीबाजी न होती। लोगों को आश्वस्त होकर वस्तुस्थिति समझने और उसके साथ सामंजस्य बिठाने का समय मिल गया होता। बैंक खोले ही गये हैं तब भी खोले गये होते।

(2) अच्छा होता कि बैंकों के एटीएम से एक-दो दिन पहले से ही केवल सौ के नोट दिए जाते ताकि सौ के नोटों का मुद्राचलन अधिक हो गया होता। पूरी तरह गुप्त रखे अभियान की भनक इतने से न लगती। अफवाह या अनुमानबाजी का दौर चलता तो भी बैंकों का कारोबार बंद रहने से उनके माध्यम से पुराने नोटों को ठिकाने लगाना संभव न होता। कालाधन और जगह खपाना भी इतनी जल्दी संभव न होता। आजकल बहुत से लोगों की आदत छोटे नोट रखने की कम हो गयी है। वे लेनदेन में तुरंत 5 सौ का नोट पेश कर देते हैं। टोलप्लाज़ाओं पर यही तो हुआ था। देना 40-50 रुपये और पेश किये जा रहे थे 5 सौ के नोट। हर व्यक्ति को 4-4 सौ के नोट लौटाना टोलप्लाज़ा के लिए संभव न था। बाद में यह चुंगी बंद की गयी। वही आदेश आरंभ में ही आ गया होता तो लोग आतंकित न होते और जाम की स्थिति न बनती।

(3) 5 सौ, 2 हजार के नोटों के साथ 1 हजार के नोट को भी बैंको को मिले होते तो अच्छा होता। 1 हजार का नोट तो सरकार लाने वाली ही है। पहले ही ले आती तो जहां 2 हजार को छुट्टा करने के लिए 4 पांच-पांच सौ के नोट चाहिए वहीं केवल 2 एक-एक हजार के नोटों की जरूरत होती।

(4) निजी अस्पतालों जैसी संस्थाओं को भी पुराने नोट स्वीकारने की अनुमति दी गयी होती तो लोगों को राहत रहती। बहुत से लोग अस्पतालों के खर्चे को लेकर परेशान रहे।

आलोचनाओं का दौर

अस्तु जो होना था हो चुका है। किसी योजना के कार्यान्वयन में भूल-चूक हो ही सकती है। उतने भर से योजना को निरर्थक नहीं कहा जा सकता।

टीवी चैनलों पर जो देखने-सुनने को मुझे मिला उससे यही लगा कि अधिकांश आम जनों ने सरकार के इस कदम को अच्छा कदम बताया। यह भी सभी ने स्वीकारा कि दो-चार दिनों की परेशानी अवश्य सबको हो रही है। कुछ की परेशानी अवश्य ही गंभीर रही और अभी है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए और शादी-व्याह की तैयारी में जुटे लोगों को बेहद परेशानी हो रही है यह भुक्तभोगी कहते हुए सुने जा रहे हैं। योजना की सही जानकारी न होने के कारण किसी ने दम तोड़ दिया या आत्महत्या कर ली ऐसी पीड़ाप्रद खबरें भी सुनने को मिल रही हैं।

जनसामान्य से हटकर जिस प्रकार की आलोचनाएं विपक्षी राजनेताओं की हैं वह मुझे हैरान करती है:

माननीय मुलायम जी चाहते थे कि नोटों का प्रचलन बंद होने की बात हफ़्ता भर पहले बता देना चाहिए था ताकि लोग अपना इंतजाम कर सके होते। इंतजाम ही न कर पाते इसी के लिए तो 6 माह से चल रही कवायद को गुप्त रखा गया था यह बात उनकी समझ में नहीं आ रही।

बहन मायावती जी क्या बोल रहीं है यह शायद वह स्वयं नहीं जानतीं। कहती हैं भाजपा ने सौ सालों का इंतिजाम कर लेने के बाद दूसरों को परेशानी में डालने के लिए ऐसा कदम उठाया है। वह क्या यह भी समझती हैं कि सौ साल के इंतिजाम का मतलब क्या है? क्या कोई ऐसी व्यवस्था कर सकता है? क्या वह बता सकती हैं उन्हें यह बात कब और कैसे पता चलीं? क्यों नहीं उन्हेंने समय पर भंडाफोड़ किया योजना का और भाजपा के इरादों का? राष्ट्रीय स्तर की राजनेत्री होते हुए उन्हें अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए।

केजरीवाल जी के कहने ही क्या! वे सोचते हैं कि मोदी न होते तो वही देश के प्रधानमंत्री होते। बस मोदी जी ही उनकी राह के रोड़ा हैं। उनकी लड़ाई बस मोदी और केवल मोदी से है। इसलिए उन्हें रात-दिन सोते-जागते केवल मोदी की ही बातें सूझती हैं। वे कहते कि तीन माह पहले भाजपा के लोगों का कालाधन ठिकाने लगा दिया गया और उसके बाद दूसरों की परेशानी बना यह योजना सामने लाई गयी। सितंबर तक बैंकों में करोड़ों जमा इसीलिए हुए। वे यह भूल गये कि पैसा जमा करने की योजना तो सरकार सबके लिए थी केवल भाजपा के लोगों के लिए नहीं थी। आगे क्या होगा यह केजरी जी भी नहीं जानते होंगे। लगता है मायावती जी की तरह क्या हो रहा है यह उन्हें भी मालूम था, फिर भी वे इस दौरान चुप्पी साधे रहे। आश्चर्य है।

श्री राहुल गांधी को “पप्पू” की उपाधि ऐसे ही नहीं मिली है। पुराने नोट बदलवाने में कितनी परेशानी “गरीब” लोगों को हो रही है इसका वे बखान नहीं कर पा रहे। लोगों की इस परेशानी में शरीक होने के लिए वे भी बैंक पहुंच गये। वे यह भूल गये कि उनकी सुरक्षा में लगे कर्मी जनता की परेशानी में इजाफा ही कर रहे होंगे। गरीबों को परेशानी तो पग-पग पर होती है, वे कहां-कहां पहुंचते हैं पता नहीं।

इधर सुश्री ममता बनर्जी ने भी अपनी भड़ास निकाली है। वे कहती हैं कि यह योजना गरीबों के विरुद्ध है। लोगों की रोजी-रोटी खत्म हो गयी है, कामधंधे चौपट हो रहे हैं, इत्यादि-इत्यादि।

     उक्त राजनेता तथा अन्य नेता सब मुहिम को गरीब विरोधी मान रहे है। गरीबॊ को होने वाली अड़चन के लिए सब चिंतित है। इस देश में है कोई राजनेता जो गरीबों की चिंता न करता हो। गरीबों की चिंता में वे कितने दुबला रहे हैं यह तो इन लोगों की काया से स्पष्ट जाता है। ये गरीब ही तो हैं जिन पर इनके और इनके दलों का अस्तित्व टिका है। गरीब न हों तो यह किसकी सेवा करेंगे? इसलिए जय गरीब, जय गरीबी। गरीबी, तू कभी छोड़ के न जाना।

     गरीबों की चिंता करने वाले ये नेता बता सकते हैं कि गरेबओं के बच्चों के लिए बने सरकारी स्कूलों की दशा क्या है? अस्पतालों में उनका इलाज डाक्टर करता है या अन्य कर्मी? गरीबों के साथ इन नेताओं के अधीन पुलिस का क्या व्यवहार होता है यह इनको पता है क्या? रेलगाड़ियों के जनरल डिब्बी में वे कैसे ठुंसे रहते हैं इस बात सुध ली कभी इन्होंने? ऐसे तमाम सवालों का इनके पास है कोई जवाब?

इस बार परेशानी इन नेताओं को हो रही है और बहाना कर रहे हैं गरीबों की दिक्कतों का। वाह!

अपने देश में विपक्ष एक ही बात पर जोर देता है: “हम विपक्षी हैं। हमारा कर्तव्य है कि पक्ष जो कहे-करे उसे कोसते फिरें। हम विकल्पों की बात नहीं करेंगे।”

     अपने-अपने दल के शीर्षस्थ ये नेता स्वयं कालेधन के विरुद्ध क्या कदम उठाते अगर उनको यह मौका मिलता इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहेगा, क्योंकि उनकी कोई योजना ही नहीं। लगता है वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।

     राहुल जी को इस विषय में कुछ नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आजतक उन्हीं की पार्टी सरकार चला रही थी। – योगेन्द्र जोशी

केन्द्रीय रेलवे बजट एवं सफाई की बातः यात्रिकों की भी जिम्मेदारी बनती है (2)

रेलवे का दायित्व

वर्तमान रेलमंत्री ने अपने बजट में रेलवे की हालत बेहतर करने के लिए अनेक प्रस्ताव रखे हैं । नई रेलवे लाइन बिछाना या मौजूदा के दोहरीकरण करना, नई रेलगाड़ियां चलाना या न चलाना, सवारी डिब्बों की संख्या बढ़ाना, गाड़ियों को दुर्घटनाओं से बचाना, यात्रियों की सुरक्षा की व्यवस्था करना, आरक्षण को दलालों से मुक्त करना, टिकट-खरीद आसान बनाना, स्टेशनों पर वाई-फाई की सुविधा प्रदान करना, इत्यादि ऐसे कार्य हैं जिनकी योजना बनाना और उन्हें मूर्त रूप देना रेलवे प्रशासन की ही जिम्मेदारी बनती है । आम यात्री इतना ही कर सकता है कि वह व्यवस्था को घ्वस्त न करे अथवा उसका दुरुपयोग न करे ।

परंतु एक क्षेत्र ऐसा है जहां यात्रियों की भूमिका मेरी नजर में रेलवे प्रशासन से अधिक है । वह क्षेत्र है स्व्च्छता का । प्रशासन इस प्रयोजन से ढांचागत सुविधा तो प्रदान कर सकता है किंतु प्लेटफॉर्मों पर तथा गाड़ी के डिब्बों के भीतर की पल-पल की साफ-सफाई का इंतिजाम नहीं कर सकता है । यह ऐसा क्षेत्र है जहां यात्रियों से सहयोग की अपेक्षा की जाती है । उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने स्तर पर गंदगी न फैलाएं और उपलब्ध व्यवस्था का समुचित उपयोग करें । यह सवाल किया जा सकता है कि रेलवे की व्यवस्था अपर्याप्त हो तो कोई क्या करें । अवश्य ही तब सोचने की बात होगी, लेकिन मैं उन बातों की ओर इशारा करना चाहता हूं जो आप और हम सामान्यतः कर सकते हैं किंतु जो हमारे विचार में या तो आती ही नहीं या जिन्हें हम उदासीन भाव से नजरअंदाज कर देते हैं । मैं अपने स्वयं के तरीकों के उल्लेख के साथ अपनी बात यहां पर रख रहा हूं ।

स्वच्छता का मेरा तरीका

मैं अपनी किसी यात्रा के एक अनुभव का जिक्र सर्वप्रथम करता हूं । मैं ओर मेरी पत्नी यात्रा के दौरान जब कभी भुनी छिलकेदार मूंगफली खाते हैं तो अपनी गोद में या शायिका पर रुमाल अथवा अखबार बिछा लेते हैं, जिस पर मूंगफली रख दी जाती है । और ठूंगी जा रही मूंगफली के छिलके उस ठोंगे में इक्ट्ठा कर लेते है । अंत में उस ठोंगे को डिब्बे में उपलब्ध कूड़ेदान में डाल देते हैं, और अगर वह उपलब्ध न हो तो अपने साथ रख लेते हैं ताकि किसी उपयुक्त स्थल पर डाला जा सके, जैसे किसी स्टेशन के कूड़ेदान में या जंगल/निर्जन इलाके की झाड़ियों के बीच आदि ।

एक बार हम इसी तरह मूंगफली का आस्वादन कर रहे थे । हमारे सामने की शायिका पर चार जनों का परिवार बैठा था जिसमें दो छोटे बच्चे शामिल थे । उस परिवार ने भी मूंगफली ली और ठूंगते हुए छिलके फर्श पर गिराते गये । हम छिलके कैसे एकत्रित कर रहे थे इस पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया । या ध्यान दिया भी होगा तो उसे महज मूर्खतापूर्ण समझ लिया होगा । कूछ देर तक तो मैं देखता रहा । जब मुझसे रहा न गया तो अपनी ‘आपत्तिजनक’ आदत से विवश हो मैं बोल पड़ा, “आप लोग छिलकों को किसी कागज बगैरह में लपेटकर कूड़ेदान में डाल लेते तो फर्श साफ रहता ।” उस परिवार के वयस्क  मेरी बात पर मुस्करा दिए, और उनका कार्य यथावत आगे चलता रहा । मैं चुप हो गया; कुछ आगे कहने का औचित्य रह नहीं गया था ।

मुझे सुव्यवस्थित परिवेश की अपेक्षा रहती है । दुर्व्यवस्था से मुझे खास परहेज है जिसे आप ‘ऐलर्जी’ कह सकते हैं । अपने घर में मैं चीज-वस्तुओं को सुव्यवस्थित रखने का हिमायती हूं । कभी-कभी मेरी पत्नी भी झल्लाने लगती हैं, “अरे, क्यों इतनी जल्दी मचाए रहते हो चीजों को व्यवस्थित रखने में ।” लेकिन मैं अपने स्वभाव से लाचार हूं । मेरे घर में आरंभ से लेकर आज तक के बिजली-पानी-टेलीफोन आदि के पेमेंट-बिल करीने से रखे हैं । मेरी पत्नी ने कोई चार दशक पहले संपन्न हमारे दाम्पत्य-बंधन के बाद से आज तक के घर के हिसाब-किताब का प्रायः समस्त ब्योरा अपनी डायरियों में कैद रखा है । मैं मानता हूं कि इतना सब करने की आम जन को आवश्यकता नहीं होगी । लेकिन चीजें घर के कमरों में दुर्व्यवस्थित इधर-उधर बिखरी रहें, शयनागार में बिस्तर बेतरतीब फैला रहे, स्नानागार में फर्श पर काई लगी रहे और उस पर कपड़े गुड़ी-मुड़ी पड़े रहें, इत्यादि जैसी हालत मुझे स्वीकार्य नहीं । और कुछ ऐसा ही सोचना मेरा रेलगाड़ी के डिब्बों के लिए भी है ।

रेलयात्रा के समय किसी भी प्रकार का कूड़ा रेल-डिब्बे के फर्श पर डालना हम दोनों को गवारा नहीं । खाने-पीने के बाद बचे कचरे को पॉलीथीन या अखबार के कागज में लपेटकर कूड़ेदान में यथाशीघ्र डाल देना हम जरूरी मानते हैं । हमारी यह भी आदत है कि प्रातःकाल जब आरक्षित शायिका से हम उठते हैं तो बिछाने के लिए मिली चादरें और कंबल करीने से तहाकर शायिका के एक सिरे पर अथवा ऊपरी बर्थ पर रख दें, ठीक वैसे ही जैसा हम अपने घर में कर रहे होते । यह कोई माने नहीं रखता कि हम घर पर हैं या गाड़ी के डिब्बे में । सफाई तो सफाई है, कहीं भी । बर्थ पर मुड़ी-तुड़ी चादरों/कंबलों के साथ बैठे रहें या उन्हें वैसे ही छोड़कर चल दें यह अपने को अच्छा नहीं लगता है । यह काम तो परिचारक यानी अटेंडेंट का है यह सोचकर बैठना ठीक नहीं लगता । जब तक वह आए तब तक यों ही बैठे रहने के बजाय थोड़ा काम रेलवे के लिए भी कर लें तो कौन-सा घाटा हो जाएगा ?

यात्रियों का रवैया

मैंने अधिकांश यात्रियों को स्वच्छता के प्रति संवेदनशून्य पाया है । प्लेटफॉर्म पर सफाईकर्मी झाड़ू लगाते हुए आगे बढ़ता है तो उसके पीछे मूंगफली या संतरे के छिलके या टॉफी आदि के रैपर बिखेरते हुए भी लोग दिख जाते हैं । लगता है लोग मानते हैं कि सफाई का कार्य करना तो रेलवे का काम है; कोई कूड़ा बिखेर दे तो उसकी सफाई उन्हें ही करनी चाहिए । हम यह क्यों नहीं सोचते कि हमारा फर्ज है कि कहीं कूड़ादान खोजकर उसमें कचरा डाल दें । क्यों ऐसा होता है कि मुंह में थूक भर जाए या बलगम आ जाए तो कुछ लोग पच्च करके अगल-बगल थूक देते हैं ? क्यों कोई चाय का कागजी प्याला यत्रतत्र छोड़कर चला जाता है ?

कुछ ऐसा ही अनुभव रेल के डिब्बों के भीतर भी देखने को मिल जाता है । बिस्किट खाये और रैपर फर्श पर गिरा दिया; पानी पिया और खाली बोतल एक ओर लुढ़का दी; चाय पी और प्याली सीट के नीचे रख दी; इस प्रकार के नजारे यदाकदा देखने को मिल जाते हैं । कभी-कभी पानी-नल की टोंटी ठीक से बंद किए बिना भी यात्री शौचालय से बाहर निकल आते हैं । कुछ लोग कागजी साबुन (पेपर सोप) से हाथ धोने पर उसका कचरा वॉशबेसिन पर ही गिरा देते हैं जो बेसिन की जाली पर अटक जाता है । पान खाने के शौकीन वॉशबेसिन में थूकने के बाद पानी चलाकर उसे बहा दें ऐसा सदैव नहीं देखने को मिलता है ।

कुल मिलाकर मैं यही कहना चाहता हूं कि रेलवे में स्वच्छता की जिम्मेदारी केवल रेलवे की नहीं हो सकती । इस कार्य में यात्रियों की भी महती भूमिका होती है । दुर्भाग्य से अपने देशवासियों में स्वच्छता के प्रति सचेतनता वांछित से काफी कम है । मेरे मन में अक्सर प्रश्न उठता है कि क्या लोगों की सोच स्वतः बदल सकती है, अथवा क्या कोई व्यक्ति उनको प्रेरित कर सकता है । मुझे नहीं लगता है कि यह आसान कार्य है । मुझ जैसे यात्री उदाहरण पेश कर सकते है और सहयात्रियों से स्वच्छता की बातें कर सकते है । परंतु इस मुद्दे पर हर रोज हर पल बात होती रहनी चाहिए जो कोई स्वयंसेवी संस्था अथवा रेलवे ही कर सकती है । रेलवे को चाहिए कि वह इस दिशा में एक अभियान चलाए । – योगेन्द्र जोशी

सुरेश प्रभु का रेलवे बजट एवं सफाई की बातः यात्रिकों की भी तो जिम्मेदारी होनी चाहिए (1)

रेल बजट वर्ष 2015-16

कल देश के रेलमंत्री ने बजट पेश कर दिया । जैसा कि आम तौर पर होता है राजनेताओं की टिप्पणी इस पर निर्भर करती है कि वे सरकार के घटक दल हैं कि विपक्ष में हैं । अपने देश में विपक्ष का मतलब होता है विरोध । विपक्ष का सोचना होता है कि जो भी सरकार करेगी या कहेगी उसका विरोध करना उसका ‘धर्म’ होता है । उसे तो बजट में खामियां ही खामियां दिखती हैं । इसलिए उनकी नजर में बजट कुल मिलाकर निराशाजनक रहा । विपरीत इसके सरकारी पक्ष की तरफ के लोग प्रसंशा ही करते हैं । मैंने सबकी टिप्पणियां नहीं पढ़ी/सुनी, बस थोड़ा बहुत उनकी राय का अंदाजा ले लिया । मैं राजनेताओं के कथनों को अधिक महत्व नहीं देता । हां, जानकरों, विशेषज्ञों और समीक्षकों की बातों में कुछ दम रहता है ऐसा मेरा सोचना है । उनके मतानुसार बजट लीक से हटकर है और लोकलुभावन वादों से बचने का भरसक प्रयास मंत्रीजी ने किया है । ऐसा कदम सराहनीय है यही मैं भी मानता हूं ।

एक बात जो पूर्ववर्ती प्रायः सभी रेलमंत्री करते आए हैं वह है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों/इलाकों को विशेष तवज्जू देते थे, गोया कि रेलबजट देश के लिए नहीं उस क्षेत्रविशेष के लिए पारित किया जाना हो । इतना ही नहीं, नयी-नयी रेलगाड़ियां चलाने का वादा भी कर देते थे, भले ही उनका संचालन मौजूदा ढांचागत सुविधाओं के साथ संभव हो या न हो । बड़ी-बड़ी योजनाओं की बात की जाती थी इसका आकलन किए बिना कि वे मूर्त रूप ले सकेंगी कि नहीं । सुरेश प्रभु काफी हद तक इन बातों से बचे हैं, अच्छा किया ।

कुछ टिप्पणियां

मैं इस बजट को कुल मिलाकर अच्छा प्रयास मानता हूं । ऐसा कोई बजट संभव ही नहीं जो सभी नागरिकों को खुश कर सके । हरएक को थोड़ी-सी अच्छाइयां और अधिक कमियां नजर आती ही हैं । सब कुछ संतोषप्रद हो ऐसा संभव नहीं । अतः मैं अधिक उम्मीद करना स्वयं में व्यर्थ समझता हूं । फिर भी कुछ बातों पर मैं विशेष रूप से टिप्पणी करना चाहता हूं ।

(1) मैं समझता हूं कि रेलवे का किराया हर वर्ष नहीं तो 2-3 वर्ष में एक बार बढ़ना ही चाहिए । जब हर चीज के दाम बढ़ पहे हों तो रेलवे की प्राप्तियां क्यों न बढ़ें ? हम भूल जाते हैं कि रेलवे कर्मचारियों के वेतन-भत्ते पिछले दस सालों में करीब तीन गुना बढ़ चुके हैं । इस बीच किराया कितना बढ़ा जरा सोचिए । हम देशवासी सरकारों से बहुत कुछ पाना चाहते हैं, लेकिन बदले में देना कुछ नहीं चाहते हैं । गरीबों के हितों के नाम पर दाम न बढ़ाने की बात की जाती है । लेकिन कोई इस पर भी विचार करेगा कि संपन्न कर्मचारियों की तनख्वाहें क्यों इतना बढ़ाई जाती हैं ? ये बात मैं लाभान्वित हो सकने वाले एक सरकारी पेंशनर होने के बावजूद कह रहा हूं । देशवासियों को तो मुफ्त की यात्रा से भी परहेज नहीं होगा ! घाटे में बताई जाने वाली रेलवे ने विगत काल में 90-90 दिन तक का बोनस क्यों बांटा ? किसी ने सवाल कयों नहीं उठाए ? दरअसल हमारी सरकारें ‘रेवड़ी’ वांटने का काम करती आ रही है ।

(2) अब फिर से 4 मास पूर्व आरक्षण की सुविधा दी जाएगी । पहले भी ऐसा हुआ करता था । एक समय था जब कोई समय सीमा ही नहीं थी । तर्क दिया गया है कि इससे टिकटों की दलाली पर अंकुश लगेगा । कैसे यह मैं अभी समझ नहीं पाया । किसी ने स्पष्ट करने का शायद प्रयास भी नहीं किया । मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि वह कौन-सी तकनीकी है जिससे दलाल अपना काम 2 माह के आरक्षण पर तो कर लेते हैं किंतु 4 माह के आरक्षण पर नहीं कर पाऐंगे । वस्तुतः रेलवे में यात्रियों की संख्या उपलब्ध शायिकाओं की संख्या से कहीं अधिक होती हैए विशेषतः तीज-त्योहार जैसे अवसरों पर । किसी को आरक्षण मिलेगा तो किसी को नहीं । एक अनार सौ बीमार की कहावत यहां लागू होती है ।

(3) मुझे मुफ्त की वाई-फाई सुविधा कुछ स्टेशनों तथा रेलगाड़ियों में देने के उत्साह का औचित्य समझ में नहीं आया । ये सुविधा अभी गिने-चुने यात्रियों के लिए ही माने रखती है । अधिसंख्य यात्रियों को तो वे सुविधाएं चाहिए जो सभी के लिए माने रखती हैं, यथा प्लेटफॉर्म पर बैठने, स्वच्छ पानी की व्यवस्था और सामान्य डिब्बों की संख्या में इजाफा ताकि बैठने को स्थान मिल सके । अभी हाल यह हैं कि थोड़ी दूरी के यात्री भी आरक्षित डिब्बों में घुस जाते हैं । यह जरूर है कि वाई-फाई पर खर्चा बहुत नहीं आएगा ।

(4) रेलगाड़ियों की रफ्तार बढ़ाने की बात भी कही गयी है । अभी हालात यह है कि सुपरफास्ट ट्रेनों तक का संचालन घंटों देरी से होता है । पहले तो उन्हीं को दुरुस्त करे दें । गति बढ़ाने की बातें बाद में की जाएं । सुरेश प्रभु को इस तथ्य पर खास तौर पर गौर करना चाहिए कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यात्रीगण अपने गंतव्य के पास पहुंचने पर जहां-तहां चेन-पुलिंग करते हैं । तत्सदृश कारणों का निराकरण रेलवे कैसे करेगा यह विचारणीय है ।

(5) रेलवे ओवर अंडर ब्रिज बनाने और मानवरहित क्रॉसिंग ख़त्म किए जाने की बात वाकई अच्छी है । अपने देश में रेलवे क्रॉसिंगों पर आए दिन हादसे होते रहते हैं । इन्हें रोकना/घटाना रेलवे की प्राथमिकता होनी ही चाहिए ।

(6) रेलमंत्री ने महिला-सुरक्षा, बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त आरक्षण, ‘हेल्पलाइन’ आदि जैसी अनेक बातों का उल्लेख किया है । सुनने में सब अच्छा लगता है, किंतु इनका कारगर कार्यान्वयन हो भी पाएगा इसमें मुझे शंका है । हमारे देश में सरकारी मुलाजिमों का लापरवाही बरतना, कार्य के प्रति अरुचि रखना, आदि जैसी नकारात्मक बातें क्षम्य मानी जाती है । इसलिए योजनाओं का समुचित कार्यान्वयन सदैव एक समस्या रहती है । हो सकता है सुरेश प्रभु ऐसी प्रवित्तियों का इलाज खोज लें ।

स्वच्छता – यात्रीगण योगदान करें तब न ?

पिछले कुछ समय से देश में स्वच्छता की बातें जोर-शोेर से की जा रही हैं । प्रस्तावित बजट में भी उसकी झलक दिखती है । डिब्बों में निर्वात आधारित जैव शौचालय बनाने की बात की गई है । ऐसे शौचालय बनाना समय-साध्य और खर्चीला होगा यह मेरा अनुमान है । फिर भी इस सब की आशा तो है ही । स्वच्छता की बात पर कहना चाहता हूं कि अपनी युवावस्था में मैं सामान्य डिब्बे में भी यात्रा करता था, रात-रात भर भी । तब खास कष्ट नहीं होता था । आरक्षण भी स्लीपर डिब्बे से आगे कभी नहीं लिया । स्लीपर में आराम से यात्रा होती थी । लेकिन आज उस डिब्बे में घुसने की भी हिम्मत नहीं होती है, कारण स्वच्छता का अभाव खासकर शौचालय में ।

सुरेश प्रभु का मंत्रालय रेलवे डिब्बों में अपने स्तर पर स्वच्छता की व्यवस्था कैसे करेगा यह मैं कह नहीं सकता । स्वच्छता ऐसी चीज है जिसके लिए रेलवे इंतजामात कम और यात्री अधिक जिम्मेदार होते हैं । अर्थात् जब तक यात्रीगण स्वयं स्वच्छता न बरतें रेलवे कुछ अधिक नहीं कर सकता । इस विषय पर मैं अपने स्वयं का उदाहरण देते हुए कुछ कहना चाहूंगा अगले (आगामी कल के) ब्लॉग-आलेख में । – योगेन्द्र जोशी

पानी से इंजन चलेंगे; पाकिस्तानी इंजीनियर का चमत्कार, या झूठा दावा?

[Hindi version of 30 July  post in English]

पिछली 28 तारीख के समाचारपत्र में मुझे दिलचस्प एवं अविश्वसनीय खबर पढने को मिली । एक पाकिस्तानी इंजीनियर, वकार अहमद, ने अनेकों लोगों के सामने पानी से चलने वाला इंजन दिखाया ।

मेरी जिज्ञासा जगी और इंटरनेट से अधिक जानकारी जुटाने का विचार बना । मुझे समाचार से जुड़े ये वेब-पृष्ट मिले:

timesofindia.indiatimes.com

cssforum.com.pk

godlikeproductions.com

pesn.com

newsworldwide.wordpress.com

पाक सरकार बहुत खुश है । पानी से चलने वाला इंजन ! बहुत खूब, समझो ऊर्जा की समस्या सुलझ गई अब । पानी की कमी तो है नहीं; फिर क्या, मनुष्यों के खर्चने के लिए ऊर्जा की कमी नहीं रहेगी ! सरकार इंजिनियर को योजना पर आगे बढ़ने में मदद करने वाली है ।

मजे ही मजे ! अब ऊर्जा कोई समस्या नहीं रह जाएगी !!

लेकिन मेरे जैसे भौतिकीविद (फिजिसिस्ट) के लिए यह झूठ के अलावा कुछ नहीं । अंतर्दहन इंजन (internal combustion engine) के लिए पानी बतौर इंधन के ? 100 फीसद असंभव, क्योंकि प्रकृति (भौतिकी) के नियम इसकी इजाजत नहीं देते ।

अज्वलनशील पानी से ऊर्जा पाने की यांत्रिकी या विधि क्या है ? समाचार इस बात को स्पष्ट नहीं करता । मेरी समझ में जो आया वह यह हैः पानी का विद्युत्-अपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस) करके हाइड्रोजन प्राप्त किया जाएगा, जो पेट्रोल/डीजल के बदले इंधन का कार्य करेगा । ठीक; इसमें कुछ भी गलत नहीं ।

लेकिन यह तो बताया नहीं गया है कि इलेक्ट्रोलिसिस स्वयं में कैसे संपन्न होगा, जिसके लिए बिजली की आवश्यकता अनिवार्य होती है । वह इंजीनियर क्या एक बैटरी का प्रयोग कर रहा है निर्बाध विद्युत्-धारा हेतु, जिससे पानी अपने रासायनिक घटकों, जिसमें हाइड्रोजन (इंधन) एक है, में विघटित हो सके ? इंजन चलाने के लिए आपको हाइड्रोजन की सतत पूर्ति जरूरी है, जिसका मतलब है इलेक्ट्रोलिसिस की सतत प्रक्रिया, और उसके लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति ।

बिजली की यही आपूर्ति ऊर्जा का वास्तविक स्रोत है । मैं पुनः कह रहा हूं समाचार स्पष्ट नहीं करता है कि कथित इंजन के लिए बिजली आपूर्ति कहां से हो रही है ? अगर बिजली आपूर्ति नहीं तो फिर इलेक्ट्रोलिसिस कैसे हो रही है ?

अगर ये बातें सही हैं तो इसका मतलब है कि आप असल में ये कर रहे हैं:

विद्युत् स्रोत (बिजली) → रासायनिक ऊर्जा (इलेक्ट्रोलिसिस) → हाइड्रोजन (रासायनिक ऊर्जा स्रोत) → ऊष्मा ऊर्जा (हाइड्रोजन बतौर इंधन) → यांत्रिक ऊर्जा (धूर्णन गति) → वाहन चलाने में प्रयुक्त

विद्युत् ऊर्जा आपूर्ति का खुलासा न करते हुए यदि उक्त युक्ति अपनाई जा रही हो, तब इस सवाल का जवाब मिलना चाहिएः उस बिजली को सीधे विद्युत्-मोटर चलाने में इस्तेमाल क्यों न किया जाए, जिससे मशीन चलाई जाए ?

विद्युत् स्रोत (बिजली) → यांत्रिक ऊर्जा (धूर्णन गति देने वाली मोटर चले) → वाहन चलाने में प्रयुक्त

बैटरी-चालित कारों/बाइकों का यही सिद्धांत है । ऊष्मागतिकी (थर्मोडाइनेमिक्स) का छात्र इसे भली भांति समझ सकता है कि पहली विधि दूसरी से अनिवार्यतः कम दक्ष (इफिसेंट) होगी, क्योंकि ऊर्जा के एक प्रकार से दूसरे में परिवर्तन के प्रत्येक चरण में उसकी अपरिहार्य हानि होती है ।

इस प्रकार बेहद अहम सवाल उठता है कि कैसे पानी बतौर इंधन के कार्य करता है । मैं रासायनिक इंधन की बात कर रहा हूं, नाभिकीय इंधन की नहीं । – योगेन्द्र जोशी

Water to fuel car engine. Pak engineer’s miraculous feat, or hoax?

My Hindi newspaper of 28th had an amusing and amazing story. A Pak engineer, Waqar Ahmad, recently demonstrated his Water-Fuelled engine before a gathering of politicians, government officials, scientists (?) and students, etc.

I got curious and searched the internet for more about the news. I got some links to the said item, which I give here:

timesofindia.indiatimes.com

cssforum.com.pk

godlikeproductions.com

pesn.com

newsworldwide.wordpress.com

The Pak Government is very happy. An engine running on Water as fuel! All energy problems will get solved! Water being available in abundance, humanity shall have unlimited energy to consume. The engineer is now to go ahead with govt. support.

Rejoicing! Hurrah!! Energy problem no more!!!

For a physicist like me, that is a pure HOAX, unfortunately. Water as fuel in place of petrol/diesel in an internal combustion engine? 100 per cent impossible. Why? Simply because the known laws of nature (physics) do not permit that.

What is the mechanism of getting energy out of noncombustible water? The news items does not make things clear. What I could understand is this: water would be subjected to electrolysis to produce hydrogen, which would act as fuel in place of petrol/diesel. That is fine; nothing wrong.

But it is not explained how that electrolysis would be effected. Electrolysis necessarily means use of electricity! Is the engineer using a storage battery to have continuous supply thereof to decompose water into its chemical constituents, one of them being hydrogen to be used as fuel? To run an engine, you would need a continuous supply of hydrogen. And that would demand a continuous process of electrolysis, which in itself implies a continuous supply of electricity.

This electric power supply is the ultimate source of energy. I reiterate that the news does not clarify if an electric supply is being used for the said engine. What else is the mechanism of electrolysis?

If this much is true then what you are actually doing is this:

electric source (electricity) →convert to chemical energy (electrolysis) → hydrogen (source of chemical energy) → convert to heat energy (hydrogen as fuel) → convert to mechanical energy (rotational motion produced) → use

this to drive a vehicle etc.

Now if this is the trick being followed, without disclosing the hidden use of an electric power supply, then a question deserves to be answered: Why not use that electricity to run an electric motor directly, which would drive the desired machinery.

electric source (electricity) → convert to mechanical energy (drive an electric motor to get rotational motion) → use this to drive a vehicle etc.

This is the principle of battery-driven cars/bikes available in the market.

Any student of thermodynamics can understand well that the first approach would be necessarily less efficient than the second, because at every step of converting one form of energy into another involved unavoidable loss of energy.

So a million dollar question is how water can act as a fuel? (I am talking of chemical fuel and not nuclear fuel!)

बजट 2011-12: अतिवरिष्ठों की करयोग्य आय की सीमा बढ़ाने का औचित्य भला क्या है?

बीते कल (1 मार्च 2011)  की अपनी ब्लाग-प्रविष्टि में मैंने जिक्र किया था कि अपने बजट भाषण में देश के वित्तमंत्री ने आयकरदाताओं की एक नई श्रेणी परिभाषित की है । 80 साल की उम्र पार कर चुके नागरिकों को ‘अतिवरिष्ठ’ (very senior) नाम देते हुए उनके लिए खास एवं खूब रियायत देने का प्रस्ताव पेश हुआ है । मेरी जानकारी में यह एक नितांत नई अवधारणा है । प्रस्ताव के अनुसार उनको अब रुपया 5.00 लाख तक की आमदनी (मान्य कटौतियों को घटाकर बची आय) पर कोई टैक्स नहीं देना होगा । वरिष्ठ नागरिकों के लिए रियायत पहले से ही मौजूद थी जिसे 2.40 लाख से बढ़ाकर 2.50 लाख करने की बात कही गयी है । इतना ही नहीं, ‘वरिष्ठ नागरिक’ (senior citizen) की परिभाषा भी बदली जा रही है; अब 60 (विगत वर्षों में 65) वर्ष पार करते-करते आप वरिष्ठ कहलाएंगे । मुझ जैसे लोग, जो अभी 65 नहीं छू सके हैं, भी वरिष्ठ हो जाऐंगे । ऐसे पुरुषों को अब 9.00 हजार की अतिरिक्त आयकर छूट मिलेगी और महिलाओं को 6.00 हजार की । (महिलाओं को पहले से ही कुछ अतिरिक्त छूट मिल रही थी ।) इसके अलावा नये प्रस्ताव में ‘अतिवरिष्ठों’ को ‘वरिष्ठों’ की तुलना में 25 हजार की और छूट की बात है । इस आधारभूत जानकारी की प्रस्तुति के बाद मैं असली मुद्दे पर आता हूं ।

मेरे मन में यह जानने एवं समझने की उत्कंठा है कि ‘वरिष्ठ’, खास तौर पर ‘अतिवरिष्ठ’ जनों को आयकर में छूट देने के पीछे कौन से तर्कसम्मत आधार (rationale) नीतिनियंताओं के विचार में रहा होगा । नये बजट के अनुसार मैं स्वयं वरिष्ठता का लाभ पाने जा रहा हूं, फिर भी मैं सवाल उठा रहा हूं यह किसी के समझ में शायद ही आये । मैं देश का शायद अकेला करदाता होऊंगा जो ऐसा ‘बेहूदा’ सवाल उठा रहा हो । लेकिन वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले एवं तार्किक चिंतन के हिमायती मुझे पूरी बात समझ से परे लगती है । चूंकि मुझे लाभ मिलने वाला है, अतः मेरे मन में सवाल ही नहीं उठना चाहिए यह बात मेरे चिंतन को नहीं दबाती है । सवाल अपनी जगह है और लाभ-हानि अपनी जगह ।

आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि जेब में आए पैसे को कोई खोना नहीं चाहेगा । आयकर देना कानूनी बाध्यता है, इसलिए लोग खजाने में इसे देते हैं, लेकिन कम से कम देना पड़े इसकी विधिसम्मत कोशिश भी करते हैं । यदि सरकार खुद ही राहत दे रही हो तो खुशी तो होगी ही । मुझे इस सब पर कोई आपत्ति भी नहीं है । कई ऐसे लोग हैं जो पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को निभाने में आर्थिक कष्ट अनुभव करते हैं । उन्हें यदि राहत मिले तो उनकी जिंदगी कुछ कम दूभर हो जाये । इसलिए यह हिसाब लगाना जरूरी है कि किस श्रेणी के लोगों को राहत पहले मिलनी चाहिए और किसके लिए राहत की जरूरत नहीं है । मैं समझता हूं कुछ लोग इतने सुसंपन्न होते हैं या कुछ की जिम्मेदारियां इतनी सीमित हो चुकी होती हैं कि उन्हें राहत देना आवश्यक नहीं है । यह बात अलग है कि राहत दिये जाने पर वे लपक के उसे स्वीकारेंगे और खुश होंगे । किंतु व्यापक सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में उन्हें राहत न मिले तो अनुचित नहीं होगा । सवाल यह है कि राहत किसे पहले मिले । मैं अपनी सोच स्पष्ट करता हूं ।

मैं उस श्रेणी के लोगों की बात नहीं कर रहा हूं जिनको बाप-दादों से अच्छी-खासी संपदा मिली हो, जिससे अथवा अपने पेशे से जिनकी आमदनी इतनी हो कि उनके लिए आर्थिक कष्ट की स्थिति ही पैदा न हो । मैं उनकी चर्चा कर रहा हूं जो नौकरी-पेशे से कुछ कमा-धमा लेते हैं और अपनी एवं अपने परिवार की आवश्यकताओं को येनकेन प्रकारेण पूरा कर पाते हैं । मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि एक औसत भारतीय पच्चीस-तीस साल की उम्र पाते-पाते गृहस्थ जीवन में पदार्पण करता है । उसके बाद परिवार में वृद्धि होने लगती है । उसकी जिम्मेदारियां निरंतर बढ़ने लगती हैं । एक ओर उसे अपने बुजुर्गों का दायित्व निभाना होता है तो दूसरी ओर बाल-बच्चों की आवश्यकताएं पूरी करनी होती हैं । समय के साथ ये आवश्यकताएं बढ़ती जाती हैं । बच्चे बड़े होने लगते हैं, उनका भोजन-पानी बढ़ता है, लत्ते-कपड़ों की जरूरत बढ़ती हैं, स्कूल-कालेजों का खर्चा सामने आता है, और इन तमाम बातों के साथ वैयक्तिक इच्छाओं/आकांक्षाओं में वृद्धि होती है । आमदनी भले ही बढ़ती जाती हो, ऐसे दायित्व बढ़ते जाते हैं ।

किंतु समय के साथ स्थिति बदलती है । आम तौर पर लोगों की जिम्मेदारियां 60-65 की आयु तक पहुंचते-पहुंचते घट चुकती हैं, या घटने लगती हैं । बच्चों के लालन-पोषण, उनके शादी-ब्याह आदि जैसे कार्य संपन्नप्राय हो चुकते हैं । मकान आदि की व्यवस्था भी सामान्यतः हो चुकती है । कम से कम वे लोग, जो आयकरदाता की श्रेणी में आते हों, वृद्धावस्था पाते-पाते अपनी अधिकांश जिम्मेदारियां पूरी कर चुकते हैं । मेरा विश्वास है 80 वर्ष की उम्र पार कर चुकने पर ऐसे व्यक्ति के पास बहुत कुछ पाने या करने को नहीं रह जाता है, जिसके लिए अब उसे राहत दी जाए । मेरे मत में किसी बुजुर्ग को इस उम्र में अपने लिए न तो मकान की सोचनी चाहिए और न कार खरीदने की । सीधी-सी बात यह है कि उसके अपने निजी खर्चे भी काफी हद तक घट चुकते हैं । तब चिकित्सा तथा दवा ही मुख्य बन जाते हैं । वह भी बहुत अधिक नहीं, आम तौर पर नहीं । कुछ ही बदकिस्मत होंगे जिनको भारी-भरकम राशि इस मद पर खर्चना पड़ सकता है । वे अपवाद कहलाएंगे, और ऐसे अपवाद तो युवावस्था/प्रौढ़ावस्था के लोगों में भी मिलेंगे । यदि उन जिम्मेदारियों से मुक्त बुजुर्गों को राहत दी जाने की सोची जाती है, तो फिर कम उम्र के लोगों को क्यों न राहत मिले, जिनकी जिम्मेदारियां कहीं अधिक होती हैं, स्वयं के और स्वयं से जुड़े लोगों के प्रति?

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आयकर में छूट किसी व्यक्ति की जवानी एवं प्रौढ़वस्था में अधिक सार्थक और उपयोगी समझी जानी चाहिए न कि तब जब कब्र में पांव लटक रहे हों । ऐसा इसलिए कि व्यक्ति वृद्धावस्था से पूर्व ढेरों दायित्व निभा चुकता है । एक और बात यह है कि जो व्यक्ति इस उम्र में भी आयकरदाता की श्रेणी में आ रहा हो, उसकी आमदनी कमाने-धमाने की उम्र में कम नहीं रही होगी । और तब उसे राहत नहीं दी तो अब देने का औचित्य क्या है ?

निस्संदेह लोगों के अपने-अपने परस्पर बेमेल मत होते हैं, जिनके पक्ष में वे तर्क-कुतर्क, सभी कुछ पेश कर सकते हैं । इसलिए सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर कोई भी मत सर्वमान्य नहीं होता । फिर भी ऊपर कही गयी बातें विचारणीय हैं । – योगेन्द्र जोशी

बजट 2011-12: काश, इंकम-टैक्स ही न लगता, और न कोई अन्य टैक्स

केंद्रीय बजट 2011-12

कल, 28 फरवरी, केंद्रीय वित्तमंत्री ने देश का बजट पेश कर दिया । पूरा भाषण तो मैंने सुना नहीं, बीच-बीच में कुछएक अंश सुनने से ही मन भर गया । भाषण के बाद आशानुसार प्रायः सभी चैनलों पर उसकी समीक्षा और मूल्यांकन का दौर चल पड़ा, उसे भी तल्लीनता से पूरे समय सुनने का विचार मन में नहीं उठा । फिर आज अखबारों में बजट की समीक्षा । न तो अपने को बहुत कुछ पढ़ने की फुरसत थी और न ही ऐसा करने की दिलचस्पी । सरसरी तौर पर कुछ पढ़ा-सुना बस काम चल गया । दो-एक बातें मुझे दिलचस्प लगीं, उसी कर चर्चा करने का विचार मन में उठा है ।

मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, न ही शौकिया अर्थशास्त्र का कभी कहने योग्य अध्ययन किया है । बजट क्या कह रहा है और उसकी क्या अहमियत है, यह तो समझ में आता है, किंतु उसे बनाने वाले किस सोच के साथ ‘यह किया जाए और फलां चीज न की जाए’ का निर्णय लेते हैं यह मैं नहीं समझ पाता । मैं तो विज्ञान – अधिक सही कहूं तो भौतिकी (फिजिक्स) – का अध्यापक-सह-अनुसंधानकर्ता रहा हूं । मैं भौतिकी के नियमों को लगभग ठीक-से समझ लेता हूं (लोग कह सकते हैं कि मुझे ऐसा भ्रम है!) । भौतिकी के नियम आज एक और कल कुछ और नहीं होते है । उनमें एक प्रकार की शाश्वतता बनी रहती है । भौतिकीविद परस्पर इतना मतभेद नहीं रखते हैं जितना अर्थशास्त्रीगण । मैं समझ नहीं पाता कि किसी साल बजट में एक बात होती है, तो दूसरे साल वह काट दी जाती है । कभी किसी चीज पर कम टैक्स तो कभी अधिक । ‘आम’ आदमी के क्या जरूरी है इस पर लोगों पर में गंभीर मतभेद देखने को मिलते हैं । सरकार के प्रशंसकों को बजट ‘बढ़िया’ दिखता है, आलोचकों को ‘घटिया’ । सच में, बजट के मामले में ‘जितने मुंह उतनी बातें’ वाला कथन चरितार्थ होता है ।

आयकर में राहत

अस्तु, मैं उस बात पर लौटता हूं जिससे मेरा सीधा-सीधा सरोकार है – आयकर यानी इंकम टैक्स, जिसमें घुमा-फिराकर मौजूदा सरकार ने कुछ राहत दी है । बहुत राहत नहीं दी है, जैसा कि लोगों का मत है (मेरा नहीं), जो मानते हैं कि राहत तो कहीं अधिक होनी चाहिए थी । हर कोई कहता है कि आयकर में और छूट मिलनी चाहिए थी । मेरे खयाल में शायद ही कोई इच्छा से आयकर देना चाहेगा, चाहे वह एक साधारण व्यक्ति हो जो किसी प्रकार अपने परिवार की गाड़ी खींच पा रहा हो, या अच्छाखासा खाता-पीता सुसंपन्न व्यक्ति जिसके पास भोगने से कहीं अधिक धन-संपदा हो । उससे भी अगर कहा जाए कि टैक्स-रेट घट गया है और तुम्हारी इतनी बचत होने जा रही है, तो वह खुशी के मारे उछलने लगेगा । पैसा है ही ऐसी चीज कि हाथ में आ जाने के बाद जिसे छोड़ने का मन नहीं करता है । पैसे का अपना अलग नशा होता है । अपने पास इतना है यह सोचकर ही प्रमुदित हो उठता है आदमी का मन । इसलिए छूट कुछ भी मिले कम ही लगेगी । काश, आयकर जैसी चीज ही समाप्त हो जाती!

लेकिन मुझे तो खूब छूट मिलने जा रही है । मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि मैं खुश होऊं या उदास । मैं पेंशन-भोगी हूं, उम्र में 60 साल से ऊपर और 65 से नीचे, और करीब नौ साल पहले ही विश्वविद्यालय छोड़कर ‘घर बैठने’ की ‘अक्षम्य मूर्खता’ (यह मैं नहीं, मेरे हितैशी मानते हैं!) के बावजूद सरकारी खजाने से पर्याप्त पेंशन बटोरता हूं । मेरी पेंशन बहुत नहीं है इस अर्थ में कि आजकल सेवानिवृत्त होने वाले उच्चपदस्थ अधिकारी मुझसे डेड़-दो गुना अधिक पेंशन पाते होंगे । फिर भी मैं संतुष्ट हूं, क्योंकि मेरी आमदनी मुझ सपत्नीक के लिए जरूरत से कम नहीं है । वह मेरी नजर में इतनी है कि अपना तो खर्च बखूबी चलता ही है, साथ में परिचित जरूरतमंदों की भी थोड़ी-बहुत मदद कर लेता हूं और हुए कुछएक संस्थाओं को चंदा भी भेजता हूं । यहां तक कि मेरी इच्छा अपनी नियमित दवाइयों का पैसा अपनी संस्था से वसूलने की नहीं होती है । और अंत में पर्याप्त टैक्स भी जमा करता हूं, टैक्स बचत की कोशिश किए बिना । मुझे लगता है कि मुझे अधिक राहत की जरूरत नहीं है । और मेरी तरह कइयों को जरूरत नहीं होनी चाहिए । लेकिन टैक्स में भारी छूट का हकदार तो मैं हो ही चुका, जिसका औचित्य तार्किक चिंतन के आदी एवं वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के मुझ साधारण व्यक्ति की समझ से परे है । सो कैसे बताता हूं ।

‘अतिवरिष्ठ’ नागरिक

पिछले वर्ष पुरुषों, महिलाओं, एवं वरिष्ठ नागरिकों (स्त्री/पुरुष) के लिए क्रमशः रुपया 1.60, 1.90 एवं 2.40 लाख तक की आमदनी (अनुमत कटौतियों को घटाकर बची आय) पर आयकर शून्य था । सरकार ने इस बार ये सीमाएं 1.80 एवं 2.50 लाख क्रमशः 60 वर्ष अथवा कम उम्र वाले व्यक्तियों और वरिष्ठ (60 या अधिक किंतु 81 साल से कम उम्र वाले) नागरिकों के लिए नियत की हैं । 80 साल की आयु पार कर चुके लोगों के लिए वित्तमंत्री ने ‘अतिवरिष्ठ’ नागरिकों (very senior citizens) की एक नई श्रेणी भी परिभाषित की है, और उनके लिए उक्त सीमा 5.00 लाख निर्धारित हुई है । अर्थात् अतिवरिष्ठ नागरिकों को अब 5.00 लाख तक की आमदनी पर कोई टैक्स नहीं देना होगा । उनकी तो बल्ले-बल्ले ।

मैं समझ नहीं पाया कि क्या महिलाओं की उक्त आयकर सीमा अभी 1.90 लाख रहेगी या वह भी घटकर 1.80 हो जाएगी । अब जो सवाल मेरे जेहन में घूम रहा है वह यह है: वह कौन से कारण थे जिनके चलते अभी तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में विशष छूट दी जा रही थी, और अब जो नहीं रहे कि छूट या तो समाप्त कर दी गयी या एकदम घटा दी गयी । मेरा वैज्ञानिक दिमाग इस बात को नहीं समझ पाता है कि क्यों हर बार नए-नए प्रयोग होते हैं । पुरूषों और स्त्रियों में कभी भेद करना तो कभी भेद मिटाना करीब सवा लीटर के अपने भेजे में नहीं घुसता है ।

खैर, आगे बढ़ता हूं । अब 60 वर्ष पार करते-करते आप वरिष्ठ नागरिक को जाएंगे । कल तक ऐसा नहीं था; आपको 65 तक इंतिजार रहता था । अब वह इंतिजार खत्म । मैं भी अब पहली अप्रैल (अप्रिल फूल्स डे!) से ‘वरिष्ठ नागरिक’ हो जाऊंगा और साथ में पाऊंगा आयकर में हजार-पांचसौ नहीं पूरे 9 हजार की छूट । वाह रे किस्मत! और मुझसे भी अधिक ‘भाग्यशाली’ होंगे वे जो 80 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं या करने जा रहे हैं । वे कहलाएंगे ‘अतिवरिष्ठ’ नागरिक और उनको मिलेगी 25 हजार की अतिरिक्त छूट! यानी वे 5.00 लाख की आमदनी करें तो भी उनको धेले भर का टैक्स नहीं देना होगा । मैं इस छूट को ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली व्यवस्था के अनुरूप देखता हूं । इस रियायत के औचित्य को मैं समझ नहीं सकता । अंधेरगर्दी ही कहूंगा इसे । क्यों? इसके मेरे पास तर्क हैं, बताता हूं, लेकिन कल की पोस्ट में, 24 घंटों के भीतर ।योगेन्द्र जोशी

केंद्रीय बजट 2010: कितना उम्दा कितना घटिया कहना मुश्किल क्योंकि …

कल केंद्र सरकार के माननीय वित्तमंत्री, प्रणवदादा, ने अपने ‘महान्’ देश का बजट संसद से पास करा लिया । तब से संचार माध्यमों के माध्यम से उस पर तमाम प्रतिक्रियाएं सुनने को मिल रही हैं । प्रतिक्रियाओं का सिलसिला दो-एक दिन और चलेगा । फिर उसके बाद सब सामान्य हो जायेगा, देश की गाड़ी भगवान् भरोसे सदैव की भांति चल पड़ेगी । जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उन्हें बजट से कोई फर्क नहीं पड़ता, और जो कमजोर हैं उन्हें भी कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि उनकी नियति में सदा की भांति हर रोज कुआं खोदकर पानी पीना लिखा है । वे भारत में रहते हैं, और बजट इंडिया के लोगों के लिए इंडिया में रहने वाले एवं राजकाज चलाने वालों द्वारा तैयार होता है, जिनके लिए उनके अस्तित्व की कोई खास अहमियत नहीं । न ही उस वर्ग के किसी व्यक्ति को मैंने टीवी पर्दे पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सुना है । इंडिया और भारत के अंतर को तो अब सभी ‘बुद्धिजीवी’ स्वीकारते हैं ।

इस बजट पर मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं है । मेरे लिए तो हर बजट एक बजट होता है, साल भर के लिए, न अच्छा न बुरा । अच्छा-बुरा तो इस पर निर्भर करता है कि आप किस कोण से इसे देखते हैं । किसी के लिए यह अच्छा है तो किसी के लिए घटिया । सत्तासीन दल सदा ही अपनी पीठ थपथपाता है यह कहते हुए कि बढ़िया है, और विपक्ष के लिए उसे घटिया करार देना विवशता है । उसे तो विपक्ष का विरोध-धर्म निभाना होता है । दोनों अपने-अपने धर्म से बंधे हैं । इस बार तो विपक्ष ने एकजुट होकर संसद से बहिर्गमन भी कर डाला, गोया कि इससे बजट का स्वरूप बदल जायेगा, या देश की आर्थिक स्थिति बदल जाऐगी । जो हो गया सो हो गया, सदन में बैठे रहें या बाहर निकलकर ऊंची-ऊंची हांकें ।

हर सरकार अपना बजट कतिपय प्राथमिकताओं के आधार पर तय करती है । ध्यान रहे कि राजनैतिक दलों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं होती हैं । अगर एक ही होतीं तो उनके बीच नीतिगत विरोध ही क्यों होता ? क्या कभी ऐसा बजट बन सकता है जो सबके लिए समान रूप से स्वीकार्य हो, जिसे सभी अपने-अपने हितों के अनुकूल देख सकते हों ? मेरा तार्किक मन यही मानता है कि ऐसा असंभव है । अगर आप समान आमदनी वाले गृहस्थ लोगों के बजटों पर ही ध्यान दें तो यह बात समझ में आ जाएगी । क्या सभी एक प्रकार से ही अपने धन का उपयोग करते हैं ? कोई बचत पर जोर देते हुए अधिकाधिक धन जमा करता है, ताकि भविष्य में निजी मकान का ख्वाब पूरा कर सके, तो कोई दूसरा चार पहिए के वाहन के लिए बचत करता है जिससे उसकी ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ में वृद्धि हो सके, तथा कोई अन्य खाओ-पियो और ऐश करो, कल की ज्यादा फिक्र मत करो की नीति अपनाता है । कोई व्यक्ति अपनी बेटियों के दहेज के लिए आरंभ से ही बचत करने लगता है, तो कोई अन्य उनकी पढ़ाई-लिखाई पर धन खर्च करना बेहतर समझता है, ताकि वे समय आने पर अपने पैर पर खड़े हो सकें । कोई व्यक्ति ब्रैंडेड और कीमती कपड़ों पर पैसा खर्च करता है, तो कोई और उसके बदले पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता देता है । सबकी सोच भिन्न-भिन्न रहती है । किसे सही कहेंगे और किस गलत ? जो एक की समझ में करने योग्य है वह दूसरे की दृष्टि में मुर्खतापूर्ण । कुछ ऐसा ही देश के बजट के संदर्भ में कहा जा सकता है । सरकारों की सोच भी अलग-अलग होती है, दृष्टांत के तौर पर इस पर गौर करें कि उत्तर प्रदेश की माननीया मुख्यमंत्री, सुश्री मायावतीजी, के लिए अबेडकर पार्क बनवाना और उनमें अपनी ही मूर्तियां लगवाना एक प्राथमिकता है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट को भी आपत्ति नहीं है ।

बजट को लेकर जो तमाम प्रतिक्रियाएं मेरे कान में पड़ती हैं उनसे मेरा सिर चकराता जरूर है । अपने शैक्षिक जीवन में मुझे अव्वल दर्जे का छात्र माना जाता था । गणित तथा भौतिकी (फिजिक्स) जैसे आम तौर पर दुरूह समझे जाने वाले विषय मेरे लिए कभी कठिन नहीं रहे हैं । इन विषयों के सवालों को हल करने में मुझे खास दिक्कत कभी नहीं होती थी । मेरा अपने बारे में यह भ्रम रहा है कि मेरी समझने-बूझने एवं तार्किक समीक्षा की सामर्थ्य औसत से अच्छी ही रही है । लेकिन जब बजट पर लोगों की प्रतिक्रियाएं सुनता हूं तो लगता है मेरी समझने की ताकत निहायत घटिया है । राजनेताओं एवं आम लोगों की प्रतिक्रियाएं मुझे तर्कसम्मत नहीं लगतीं । आखिर वे लोग तो सोच-समझकर ही कुछ कहते होंगे न ? तब फिर मेरे गले से नीचे वे क्यों नहीं उतर पाती हैं । मेरी समझदानी में ही कहीं खोट होना चाहिए ।

मैं पूछता हूं कि यदि देश के चुनिंदा अर्थशास्त्रियों को एक साथ बिठा दिया जाये और उनसे एक खूबसूरत बजट बनाने को कहा जाये तो वे क्या ऐसा कर सकेंगे ? मुझे लगता है कि तब भी उम्दा बजट एक ख्वाब ही रहेगा । ऐसा मैं इसलिए कहता हूं क्योंकि अर्थशास्त्रियों की भी बजट पर प्रतिक्रियाएं एक जैसी सुनने को नहीं मिलती हैं ।

याद रहे कि बजट देश के आय के स्रोतों का निश्चित करना और व्यय की प्राथमिकताएं तय करना है । दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना बजट बनाने की कला का हिस्सा है । आम तौर पर घाटे के बजट ही सदा बनते रहे हैं, यानी आमदनी कम और खर्चा अधिक । अब सवाल यह है कि जब लोग यह कहते हैं कि फलां-फलां क्षेत्र में राहत नहीं दी गई, टैक्स घटाए नहीं गये, इत्यादि, तो वे यह नहीं बताते कि सरकार की आमदनी का जरिया आखिर क्या हो ? लोगों से कुछ धन प्रत्यक्ष कर तो कुछ परोक्ष कर रूप में सरकार वसूलती है । अगर ऐसा न करे तो धन जुटाएगी कहां से, क्या अतिरिक्त नोट छापकर ? तब भी मुश्किलें खड़ी होंगी । आप चाहेंगे कि टैक्स न वसूला जाये या कम से कम टैक्स वसूला जाये, उपभोक्ता वस्तुओं के दाम न बढ़ें, आदि, तो सरकार पैसा लाएगी कहां से ? जब कोई राहत न मिलने की शिकायत करे तो उसे यह भी तो बताना चाहिए कि फलां-फलां वैकल्पिक तरीके से आमदनी बढ़ाई जानी चाहिए । ठीक, लेकिन यह न भूलें कि किसी न किसी को वह तरीका भी रास नहीं आयेगा और कहेगा हमको लूटा जा रहा है, हमें राहत चाहिए, आदि-आदि ।

उदाहरण के तौर पर मैं प्रत्यक्ष टैक्स, आयकर यानी इंकम टैक्स, की बात करता हूं । मेरी अपनी समझ से कर सीमा बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं थी । जिस देश में 20-25% जनता लाख-सवालाख रुपया सालाना की आमदनी में गुजर-बसर करती हो, उस देश में 5.00 लाख रुपये सालाना कोई कम पैसा है क्या ? तब 20% वाला टैक्स स्लैब उठाकर 8.00 लाख करने की जरूरत पर जोर क्यों दिया गया ? मैं भी एक करदाता हूं और मुझे भी इसका लाभ मिलेगा, फिर भी मैं इसे गैरजरूरी मानता हूं ।

इससे भी दिलचस्प तथ्य पर गौर फरमाएं । पिछले कुछ सालों से सरकारें महिलाओं पर विशेष रूप से मेहरबान रही हैं । पुरुषों के मामले में 1.60 लाख से अधिक की आमदनी पर टैक्स देना होगा पहले की तरह, लेकिन महिलाओं के लिए यह सीमा 1.90 रहेगी । इसका क्या औचित्य है ? मेरी आपत्ति सुनिए । समाज के उस तबके के लोगों, जो आयकर के घेरे में आते ही नहीं, में आम तौर पर महिलाएं भी अपने पतियों के साथ छोटे-मोटे काम करके परिवार चलाती हैं । उनके लिए आयकर की सीमा का कोई मतलब नहीं होता । लेकिन जो महिलाएं टैक्स के दायरे में आती हैं, वे अकेले परिवार का भरण-पोषण नहीं करती हैं, बल्कि उनके पति ही मुख्यतः आर्थिक जिम्मेदारियां निभाते हैं । कहीं कोई अपवाद हो सकता है जिसमें पति और शेष परिवार की आर्थिक जिम्मेवारी घर की महिला के सिर पर हो और उसका पति निठल्ला बैठा रहता हो । यदि महिला दायित्व उठा रही हों तो वे या तो अविवाहित होंगी अथवा उनके पति गुजर चुके होंगे या अलग रहने लगे होंगे । कुल मिलाकर यही माना जा सकता है कि महिला को पुरुष का भरण-पोषण शायद ही करना पड़े । इसके विपरीत समाज में ऐसे पुरुषों को संख्या कहीं अधिक होगी जो अकेले दम पर पत्नी और शेष परिवार की जिम्मेदारी ढो रहें हों । ऐसे में आप ही बताइए कि राहत पुरुषों को मिलनी चाहिए कि महिलाओं को ? दूसरे शब्दों में सवाल यों है: उन पुरुषों को राहत मिलनी चाहिए, जिनकी पत्नियों की कोई कमाई नहीं, या उन महिलाओं को जिनके पति भी कमाते हों या जिन पर पति का बोझ ही न हो ? लेकिन हो तो उल्टा रहा है !

मेरी टैक्स संबंधी इन बातों को हर कोई सिरे से खारिज कर देगा । मेरी बात क्यों गलत है, मैं समझ नहीं पाता । दरअसल आम तौर पर लोग टैक्स देना नहीं चाहते हैं । कम ही लोग होंगे जो स्वेच्छया और हंसी-खुशी टैक्स देना चाहते हों । अधिकांश लोग तो मिठाई बांटने निकल पड़ेंगे यदि टैक्स ही खत्म कर दिया जाए । हम सब चाहते हैं कि खूब विकास कार्य होवे, किंतु उसके लिए योगदान देने को तैयार नहीं होते । जिनके पास कुछ है ही नहीं वे भला क्या देंगे, किंतु जिनके पास है वे भी देना नहीं चाहते । यह सब मेरे समझ से परे है ।

किसी भी सभ्य लोकतंत्र में बजट ऐसा होना चाहिए जिसमें समाज के सबसे अधिक जरूरतमंद को ध्यान में रखा गया हो । क्या कभी ऐसा बजट आज तक बना भी है ? देश में सब जगह चर्चा रहती है कि देश की आर्थिक विकास दर 8-8, 10-10 फीसदी है, अथवा ऐसा लक्ष्य रखा गया है । क्या कभी इस बात पर भी चिंता जताई जाती है कि इस विकास से प्राप्त लाभ किसकी झोली में जा रहे हैं । कल्पना कीजिए कि आपके पास दो संभावनाएं हैं: पहला यह कि विकास दर 10 फीसदी हो और उसके लाभ समाज के खाते-पीते लोगों तक सीमित रहे, और दूसरा यह कि विकास दर केवल 5 फीसदी ही हो किंतु उसका फल संपन्नता के सबसे निचले पायदान पर खड़े आदमी के जीवन-स्तर के उठने में दिखता हो । आप किसे चुनेंगे ? जाहिर है कि आप उसे चुनेंगे जिसके चलते आप लाभ की स्थिति में हों । यही बात बजट पर लागू होती है, यदि उससे आपको निजी लाभ हो तो अच्छा, नहीं तो बेकार ।

अनेकों सवाल हैं जो बजट की चर्चा चलने पर मेरे जेहन में उठते हैं । मैं समझ नहीं पाता कि लोग कितने गंभीर चिंतन के बाद प्रतिक्रिया देते हैं । पता नहीं वे मुद्दे के सभी पहलुओं पर गंभीरता से सोचते भी हैं कि नहीं । – योगेन्द्र जोशी