चीनी मोबाइल-ऐपों पर प्रतिबंध – गनीमत कि मेरे पास एक भी नहीं

साम्यवादी (Communist) देश चीन के साथ हाल में पैदा हुई कड़ुवाहट और सीमा पर अतिक्रमण के साथ उसकी युद्ध के लिए गंभीर तैयारी को देखते हुए केन्द्र सरकार ने उस देश से आर्थिक संबंधों को यथासंभव सीमित करने का निर्णय लिया है। उस दिशा में चीनी कंपनियों की देश में आर्थिक क्रियाकलापों में भागीदारी घटाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। उसी दिशा में एक कदम हें चीन में बने आधुनिक मोबाइल फोनों के “ऐपों” (अप्लिकेशन प्रोग्राम, application software) पर प्रतिबंध लगा दिया जाना। ऐसे ऐपों की कुल संख्या उनसठ (५९) है। यह सूची यहां प्रदर्शित है।

प्रतिबंधित चीनी मोबाइल ऐप (Apps)

जब यह समाचार मैंने पढ़ा तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा जगी कि देख लूं कि मेरे स्मार्टफोन में कौन-कौन से मौजूद हैं। संलग्न हैं ऐपों को प्रदर्शित करने वाले “स्क्रीन-शॉट” की तस्वीरः

मेरे सक्रिय मोबाइल ऐप

My MobileApps

गिनने पर मेरे स्मार्ट्फोन के ऐपों की संख्या ६२ निकली। और मुझे आश्चर्य हुआ कि प्रतिबंधित ऐपों में से एक भी मेरे फोन पर मौजूद नहीं। इसका मतलब यह हुआ कि कोई भी ऐप मेरे काम का नहीं। या यों कहिए कि मेरी निगाह में वे कभी आये नहीं। मैं आवश्यकता पड़ने में इंटरनेट पर उपयुक्त ऐप की तलाश करता हूं, परंतु डाउनलोड करने में सावधानी बरतता हूं। मैं छानबीन कर लेता हूं कि ऐप सुरक्षित तो है। अधिकतर कार्य में लैपटॉप पर करता हूं खास तौर पर ऑनलाइन लेनदेन के काम में।

उक्त प्रतिबंधित ऐपों में से अधिकांश का तो नाम मैंने कभी सुना भी नहीं। कोई काम का होता तो कभी न कभी उसे इंटरनेट पर खोजकर “डाउनलोड” कर चुका होता। इन ऐपों की कुछ न कुछ उपयोगिता होगी ही कि उन पर प्रतिबंध से चीनी आईटी कंपनियों को भारी भरकम घाटा उठाना पड़ रहा है।

ऐसी क्या खूबी है इनमें कि दुनिया दीवानी है और मैं उनसे अनजान पड़ा हूं। मेरे पास अधिक छानबीन करने का न तो समय है न सामर्थ्य। फिर भी सोचा कि दो-तीन ऐप के बारे में देख तो लूं कि वे किस काम के हैं, क्या खूबी है उनमें। सबसे पहले मैंने टिकटॉक (TikTok) को चुना क्योंकि इसका नाम मैं सुनते आ रहा था और प्रतिबंध लगने पर कदाचित सर्वाधिक चर्चित ऐप यही रहा। टिकटॉक को लेकर अपना दुःख व्यक्त करते एक युवती का वीडियो मैंने देखा। युवती सचमुच में दुःखी थी या वह अभिनय कर रही थी इसमें मुझे शंका है।

टिकटॉक (TikTok)

Tik Tok को चीनी कंपनी बाइटडांस (ByteDance) ने विकसित किया है। मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि यह कमोबेश वही कार्य करता है जो आपका स्मार्टफोन कैमरा कर लेता है यानी “वीडियो क्लिप” (video clip) बनाना। फर्क यह है कि टिकटॉक की तस्वीरें कहीं अधिक स्पष्ट और जीवंत होती हैं। यह छोटे-छोटे वीडियो-क्लिप बनाने में काम आता है, आम तौर पर तीन-चार सेकंड और अधिकतम साठ सेकंड। इसके लिए ऐप में आरंभ में ही समय-अंतराल चुनने का विकल्प रहता होगा। इतना ही नहीं टिकटॉक में वीडियो के साथ पृष्ठभूमि का संगीत भी मिश्रित कर सकते हैं। इस कार्य के किए विविध म्यूज़िक-क्लिपों में से चुनने का विकल्प टिकटॉक प्रदान करता है। स्पष्ट है कि इतने सब की व्यवस्था आपके फोन पर हो नहीं सकती। इसके लिए टिकटॉक का सर्वर ही आपके काम आता है। यहीं पर उससे खतरे की संभावना रहती है। आप के फोन के कौन से आंकड़े (data) उस सर्वर तक पहुंचते हैं कहना मुश्किल है। बहुत कुछ ऑनलाइन करना होता है। खैर, यह ऐप विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध है। मुझे जो जानकारी मिली उसके अनुसार खुद चीन में टिकटॉक नहीं चलता है। इसका मौलिक चीनी संस्करण डॉयिन (Douyin) चीन की जनता पहले से इस्तेमाल कर रही है।

बायडू मैप्स (Baidu maps)

दूसरा ऐप जिसके बारे में मैंने जानकारी जुटाई वह है बायडू मैप्स। यह चीन की बायडू (Baidu) कंपनी का उत्पाद है। इसे मैं गूगल मैप का चीनी संस्करण कहूंगा। अर्थात् यह वांछित स्थानों का नक्शा और सेटेलाइट तस्वीरें प्रदान करता है। गुणवत्ता की दृष्टि से इसकी तस्वीरें कहीं अधिक बेहतर कही जायेंगी। दूसरे शब्दों में नक्शे एवं तस्वीरें उच्चस्तरीय स्पष्टता (high definition) की रहती हैं। कहा जाता है कि इसके द्वारा मिली तस्वीरों का निरीक्षण बारीकी से किया जा सकता हैं। दावा किया जाता है कि मैप में सड़कें ही नहीं बल्कि उनके किनारे के मकानों, पेड़-पौधों आदि की तस्वीरें पूरी भी बारीकी से प्रदर्शित होती हैं। पढा तो मैंने यह भी कि कुछ भवनों की भीतरी तस्वीरें भी देखने को मिल सकती हैं। बायडू मैप में चीन की अपनी जीपीएस (GPS) प्रणाली भी एकीकृत है। इसलिए यह वाहन-चालकों को यात्रा-संबंधी सुविधा भी प्रदान करता है। अन्य प्रणालियां पहले से प्रचलन में हैं किंतु यह चीनी ऐप स्पष्टता के नजरिये से अधिक आकर्षक एवं उपयोगी कहा जा सकता है। चूंक़ि मैपों की विस्तृत जानकारी अर्थात् तत्संबंधित आंकड़े किसी स्मार्टफोन की सीमित स्मृति (memory) पर भंडारित रखना संभव नहीं, अतः केंद्रीय सर्वर उपयोक्ता के फोन की मदद करता है। इस कारण से सर्वर की पहुंच उपयोक्ता के फोन की गोपनीय सामग्री तक रहती है।

यूसी ब्राउज़र (UC browser)

मैंने जिन तीन इंटरनेट ऐप्स को जांचने के लिए चुना उनमें अंतिम है यूसी ब्राउज़र (UC browser)| इंटरनेट सर्फिंग के लिए ब्राउजरों की कोई कमी आईटी क्षेत्र में नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट अपने विंडोज़ प्रचालन प्रणाली (operating system) के अभिन्न घटक के तौर पर आईई (इंटरनेट एक्सप्लोरर internet explorer) जोड़कर देता है। किंतु बहुत से लोग गूगल क्रोम (Google chrome) अथवा (Mozilla firefox) या इन जैसे ही किसी अन्य निःशुल्क ब्रौउज़र का इस्तेमाल करते हैं। ऐप्पल आइइओएस) (Apple iOS) के साथ सफारी (safari) का प्रयोग सामान्य बात है। हरएक की अपने खूबियां एवं कमियां हैं। इसी कड़ी में चीनी आईटी कंपनी यूसीवेब (UCWeb) का यूसी ब्राउज़र (UC browser) उपयोक्ताओं को निःशुल्क उपलब्ध है।

यूसी ब्राउज़र के बारे में कहा जाता है कि यह काफी तेज है अन्य ब्राउज़रों की तुलना में। डाउनलोड एवं उपलोड करने की गति अधिक बताई जाती है। ऐसा यह डेटा-कंप्रेशन (data compression) तकनीकी के इस्तेमाल से करता है। इस तकनीक का अर्थ है किसी फाइल का बाइटों में आकार उसमें निहित जानकारी को प्रभावित किए बिना छोटा करना ताकि डाउनलोड/उपलोड कम समय में हो जाये। कई उपयोक्ता अपनी भारी-भरकम फाइलों को किसी को भेजने या उपलोड करने में इस तकनीक का प्रयोग करते हैं। इस कार्य के लिए फाइल “ज़िप” (zip) करने हेतु अप्लिकेशन प्रोग्राम अर्थात् ऐप उप्लब्ध है। इसके विपरीत जिप की गई फाइल की प्राप्ति को उसके मूल (original) रूप में वापस पाने के लिए उसे “अनज़िप” (anzip) किया जाता। प्रचलित ब्राउज़र आम तौर पर यह सब नहीं करते। लेकिन यूसी ब्राउज़र करता है। चूंकि प्रचलित स्मार्टफोन इतने समर्थ नहीं होते इसलिए यह कार्य यह ब्राउज़र यूसी-वेब के केंद्रीय सर्वर के साथ मिलकर करता है। यही इसके खतरे का कारण बन सकता है, क्योंकि सर्वर उपयोक्ता के मोबाइल के गोपनीय आंकड़े चुरा सकता है।

यूसी ब्राउज़र चीन, भारत, एवं इंडोनेशिया में अधिक प्रचलित है, न कि अन्य देशों में। कई देशों में अपनी भाषा में अप्लिकेशन प्रोग्राम उपलब्ध रहते हैं शायद अन्य देशों की दिलचस्पी कम हो।

भारतीय आईटी पेशेवर

भारत के आईटी (information technology) के पेशेवर दुनिया भर में छाए हुए हैं और उनकी सभी जगह अच्छी साख है, चीन के पेशेवरों से कम नहीं शायद उनसे भी अधिक। लेकिन उनकी यह कमजोरी रही है कि वे पहले से स्थापित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी सेवा देते रहे हैं। भारत के कंप्यूटर युग के शुरुआती दौर में इन्फोसिस, एचसीएल, टीसीएस, विप्रो आदि जैसी दिग्गज कंपनियां स्थापित हुईं, लेकिन मेरे ध्यान में कोई कंपनी नहीं जो हाल के वर्षॉं में स्थापित हुई हो शीर्ष की कंपनियों में स्थान पा सकी हो। यहां के पेशेवरों ने विभिन्न संगठनों के कार्य-निष्पादन (working) के लिए प्रोग्राम विकसित किए हैं, जैसे भारतीय रेलवे, बैंक आदि। किंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि इन पेशेवरों ने आम आदमी के रोजमर्रा उपयोग के लिए आईटी प्रोग्राम विकसित करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई है और वे भारतीय भाषाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहे हैं। आपको शायद ही किसी संस्था की वेबसाइट भारतीय भाषाओं में मिले। राज्य सरकारों के राजकाज की भाषाएं क्षेत्रीय घोषित हैं, लेकिन उनका “ऑनलाइन” कार्य प्रायः अंग्रेजी में ही दिखाई देता है। इसके विपरीत चीनी पेशेवरों ने चीनी जनता के लिए चीनी (मेंडरिन) भाषा में अप्लिकेशन प्रोग्राम विकसित किए हैं। चीन के लोग यथासंभव चीनी भाषा का प्रयोग करते हैं अतः ऐसे प्रोग्राम लोकप्रिय होते रहे हैं। दुनिया वाले इन प्रोग्रामों के (अंग्रेजी संस्करण) अधिक न भी इस्तेमाल करें तब भी करोड़ों में उनके यहां उपयोगकर्ता मिल ही जायेंगे। भारतीय जन समुदाय देशज प्रोग्रामों के बदले अंग्रेजी में प्राप्य प्रोग्रामों में रुचि रखता है भले ही वे चीन में विकसित हों। इस मामले में हम कभी भी चीन की बराबरी नहीं कर सकते।

मुझे यह देख कोफ़्त होती है कि भारतीय युवा नये-नये ऐपों का आकर्षण झेल नहीं पाते है। आईटी आधारित नये-नये शौक पालने में उन्हें देर नहीं लगती। नयी चीजों के प्रति अति उत्साह हानिकर भी हो सकता है इसे नजरअंदाज करना उचित नहीं। – योगेन्द्र जोशी

 

‘नोबेल शांति पुरस्कार 2010’ – अब इंटरनेट की बारी ?! …

इंटरनेट का जाल व्यापक हो चला है और दुनिया के अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ने लगे है, अपनी-अपनी रुचियों और आवश्यकताओं के अनुसार । मेरे लिए यह एक तरफ विविध जानकारियों, जिन्हें मैं अपने लिए उपयोगी पाता हूं, को बटोरने का एक सुविधाजनक माध्यम है, तो दूसरी तरफ यह अपने निजी विचारों तथा उनसे संबंधित श्रव्य/दृश्य सूचनाओं को अन्य लोगों के सामने रखने का सरलतम साधन है ।

निःसंदेह इंटरनेट एक उपयोगी व्यवस्था है, और इसी तथ्य को केंद्र में रखते हुए कुछ उत्साही इंटरनेट-उपभोक्ताओं ने आगामी नोबेल शांति पुरस्कार (2010) के लिए इस व्यवस्था को नामित कर डाला है । उन्होंने इसके पक्ष में जनमत बनाने हेतु इसी इंटरनेट पर अपील जारी कर रखी है । यह समाचार मुझे पहले-पहल दो-तीन दिन पूर्व अपने समाचार पत्र से मिला था । जिज्ञासावश अधिक जानकारी के लिए इसी इंटरनेट का सहारा लेने पर पता चला कि समाचार कई स्रोतों पर उपलब्ध है (उदाहरणार्थ देखें http://www.mynews.in/News/Nobel_Peace_Prize_2010_nomination_for_’Internet’_N37095.html)
जानकारी में यह भी आया कि इस दिशा में उठाए गये कदम के पीछे इटली की wired.com कंपनी की खासी भूमिका रही है । ( wired.com प्रौद्योगिकी से संबंधित दैनिक समाचारों की वेबसाइट है और wired नाम की मासिक प्रत्रिका से संबद्ध है ।) उत्साही लोगों ने अपने उद्येश्य की पूर्ति हेतु एक वेबसाइट भी आरंभ कर दी, जिस पर इंटरनेट को शांति पुरस्कार दिया जाये इस आशय की अपील है । (देखें http://www.internetforpeace.org/manifesto.cfm) उक्त अपील मूलतः अंग्रेजी में है, किंतु विश्व की कई प्रमुख भाषाओं में उसके ‘अनुवाद’ की व्यवस्था भी साइट पर उपलब्ध है । मुझे लगता है कि यह अनुवाद गूगल (google) के तत्संबंधित सॉफ्टवेयर पर आधारित है । यह सॉफ्टवेयर अभी अर्थपूर्ण अनुवाद में सफल नहीं दिखता है, अतः उपलब्ध अनुवाद मुझे ऊटपटांग ही लगता है । अपील के आरंभिक शब्दों पर नजर डालें:-

“अंत में, हम सब समझ में आ गया है कि इंटरनेट केवल कंप्यूटर नेटवर्क पर एक दूसरे के साथ interlocked लोगों की एक अंतहीन शृंखला नहीं है । पुरुषों और महिलाओं, सभी अक्षांश पर, आपस में जुड़ा के लिए कर रहे हैं सबसे बड़ा मंच के नाते और संबंध मानव जाति माना जाता है के प्लेटफार्म में । …”
जब कि अंगरेजी मूल इस प्रकार हैः-
“We have finally realized that the Internet is much more than a network of computers. It is an endless web of people. Men and women from every corner of the globe are connecting to one another, thanks to the biggest social interface ever known to humanity. …”

खैर यह सब है इंटरनेट के शांति पुरस्कार के लिए नामित किए जाने की खबर । असली सवाल जो उठाया जा सकता है वह है कि क्या इस प्रकार का विचार स्वयं में सम्माननीय, उत्तम अथवा सार्थक माना जा सकता है ? क्या इंटरनेट को पुरस्कार के लिए नामित किया जाना चाहिए ? मैं अपना मत व्यक्त कर रहा हूं:-

नोबेल शांति पुरस्कार अभी उन लोगों या संस्थाओं को दिए जाते रहे हैं जो मानव समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान में कार्यरत रहे हैं । किसी व्यक्ति या संस्था के योगदान के सही-सही मूल्यांकन में स्वयं नोबेल कमेटी सदैव सफल रही हो ऐसा नहीं है; यथा विगत वर्ष का पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को दिया जाना विवादास्पद माना गया है । विवादास्पद इसलिए कि मानव जाति की तमाम समस्याओं के प्रति उन्होंने चिंता जताई थी और उनको हल करने के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता की बातें वे करते रहे । लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ सार्थक उन्होंने कर दिखाया हो ऐसा नहीं था । उनकी बातों को ही नोबेल समिति ने पर्याप्त समझा, जो कदाचित् एक भूल थी । वस्तुस्थिति का आकलन कुछ अवसरों पर भले ही त्रुटिपूर्ण रहा हो, एक संस्था की दृष्टि से संस्था के ध्येय अच्छे ही रहे हैं । जो व्यक्ति/संस्था मानव हित में घोषित तौर पर कार्यरत हो वही इस पुरस्कार का दावेदार हो सकता है यह तो नोबेल समिति भी मानती ही है ।

लेकिन क्या इंटरनेट वाकई में उक्त प्रकार की संस्था मानी जा सकती है । उत्तर है नहीं । यह तो एक व्यवस्था भर है सूचना के आदान-प्रदान की, सूचना के एक स्थान से दूसरे स्थान तक त्वरित गति से भेजने की, ज्ञान के भंडारण तथा वितरण के लिए बनी । इस व्यवस्था को जो जिस प्रकार से उपयोग में लेना चाहे ले सकता है । स्वयं इंटरनेट के कोई नियम नहीं हैं । वह खुली छूट देता है । समझदार लोग ‘सार सार गहि रहै, थोथा देय उड़ाय’ के मंत्र के अनुसार उसका उपयोग करते हैं । लेकिन इंटरनेट पर समाज के हित वाली बातें ही उपलब्ध हैं, मानव हित के लिए ही उसका प्रयोग होता है, ऐसा कहना सही नहीं है । इंटरनेट तो एक खुला मंच है, जहां गाली-गलौज भी हैं और सूक्तियां भी । इसमें उत्कृष्ट साहित्य और अश्लील साहित्य (पॉर्नोग्रफी) एक साथ मिलेंगे । इंटरनेट का प्रयोग शांति तथा भाईचारा का संदेश फैलाने के लिए भी होता है और नफरत फैलाने के लिए भी । वस्तुतः इंटरनेट व्यवस्था अंकीय – डिजिटल – सूचना के ग्लोबलाइजेशन का एक साधन भर है, और यह अपने उपयोग या दुरुपयोग के बारे में मूक है । तब इंटरनेट को पुरस्कार हेतु नामित करना माने रखता है क्या ?

आज इंटरनेट को नामित करने की बात की जा रही है । कल यही बात वैश्विक टेलीफोन व्यवस्था के लिए भी की जा सकती है । परसों टेलीविजन व्यवस्था के लिए भी बात की जा सकती । फिर यही बात ग्रंथालयों एवं संग्रहालयों के बारे में भी कही जा सकती है, क्योंकि वे ज्ञान के भंडार हैं और समाज के लिए ज्ञानार्जन का स्रोत हैं । फिर तो तरह-तरह की संस्थाओं के लिए भी पुरस्कार की बात कही जा सकती है । परंतु ध्यान रहे कि मात्र उपयोगी संस्था होना पर्याप्त नहीं है; संस्था का एक स्पष्ट ध्येय होना चाहिए । इंटरनेट जैसे खुले मंच के मामले में बहुत कुछ संदेहास्पद है ।

तो क्या कथित नामांकन स्वीकार्य है ? मैं इंटरनेट का उपयोक्ता अवश्य हूं, किंतु इसे नोबेल पुरस्कार के लिए इसे योग्य नहीं मानता । आप क्या मानते हैं यह आप जाने । – योगेन्द्र जोशी