रिओ ओलंपिक पदक एवं खजाने की लूट: अंधेर नगरी चौपट राजा

Opening Rio Olympics 2016

अगस्त 5 से 21, 2016, तक चले सत्रह-दिवसीय रियो ओलंपिक खेलों में आरंभिक 13-14 दिनों तक तो भारतीय दल का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उस दौरान मेरी पत्नी एवं मुझ सरीखे कुछ लोगों को लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि 118-सदस्यीय भारतीय खिलाड़ियों के दल को एक भी पदक न मिले। (इस बार का दल अपेक्षया बड़ा था 2012 के 83-सदस्यीय दल की तुलना में।)

(विभिन्न देशों द्वारा प्राप्त पदकों की तालिका लेख के अंत में दी गयी है।)

दो पदकों पर जश्न

खैर देशवासियों की किस्मत अच्छी रही कि पहला पदक महिला कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक पाने में कामयाब रहीं। देश की जनता इस उपलब्धि पर इतनी खुश हुई कि जैसे ओलंपिक के सभी पदक देश की झोली में आ गये हों। लोग तुरंत जश्न मनाने में जुट गये। हरियाणा सरकार ने बिना देर किये साक्षी को 2.50 करोड़ का पुरस्कार भी दे डाला। भारतीय रेलवे ने भी समय गंवाये बिना 50/60 लाख के इनाम की घोषणा कर डाली और साथ में नौकरी में पदोन्नति भी। सुनने में आया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं अनूठे व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी ने भी दिल खोल के ईनाम देने का ऐलान कर दिया, एक करोड़ की राशि देने के वादे के साथ। (देखिए इकनॉमिक-टाइम्ज़ तथा इंडियन-एक्सप्रेस)

साक्षी की उपलब्धि पर देशवासी झूम ही रहे थे कि खबर आई कि बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधु प्रतिस्पर्धा के क्वार्टर-फ़ाइनल की बाधा पर करके सेमी-फ़ाइनल में पहुंच गयीं हैं। बाद में सेमी-फ़ाइनल की बाधा पार करके उन्होंने अपने नाम एक पदक  पक्का कर लिया। इसके बाद देशवासियों को उम्मींद होने लगी कि स्वर्ण पदक उनके नाम होना है। स्वर्ण पदक लिए भजन-पूजन, हवन-यज्ञ और दुआओं का दौर भे चल पड़ा ताकि उन टोटकों से पदक की गारंटी में शक ही न रहे। दुर्भाग्य कि इन टोटकों ने कोई कमाल नहीं दिखाया और जैसा कहा जाता है विश्व की खिलाड़ी नंबर एक के सामने वह कमजोर ही रहीं। कुछ भी हो रजत पदक को तो वह बटोर के ले ही आईं । खैर पदकों के लिए तरसते देश के लिए यह मरुभूमि में पानी पाने की खुशी से कम नहीं था।

कांस्य पदक विजेता को 2.50 करोड़ तो रजत पदक विजेता का “रेट” अधिक होना ही था। तेलंगाना सरकार ने 3 करोड़ तो कुछ ऐसी या कम राशि आन्ध्र सरकार ने भी उनकी झोली में डाल दिए। केजरीवाल जी क्यों पीछे रहते? उन्होंने भी दिल खोल के पुरस्कृत कर दिया। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार सिंधु को करीब 13 करोड़ की प्राप्ति हुई। समाचार है कि विज्ञापन कंपनियां उनसे अनुबंध के लिए कतार में खड़े हो चुके हैं।

इन दो खिलाड़ियों के लिए स्वागतार्थ समारोह और जलूस भी अपूर्व रहे। स्वागत में तो दीपा कर्माकर (जिमिनास्ट में चतुर्थ स्थान-प्राप्त) भी शामिल की गयीं यद्यपि उन पर खास धनवर्षा नहीं हुई।

पदक तालिका में इंडिया दैट इज़ भारत

उक्त रिओ ओलंपिक में भारत की स्थिति कितनी दयनीय रही इस हेतु मैंने उपलब्ध पदक-तालिका का अध्ययन किया और जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न देशों की स्थिति के लिये एक सूचकांक M/P = मेडल (पदक) संख्या प्रति लाख पोप्युलेशन (जनसंख्या) भी परिभाषित किया है। (देखिए तालिका लेख के अंत में।) तालिका में उन देशों के नाम नहीं हैं जिनको एक भी पदक नहीं मिला है।

गौरतलब है कि 6 स्वर्ण के साथ 11 पदक जीत कर 16वें क्रम पर स्थित जमैका (आबादी केवल 28 लाख) जैसे छोटे देश के लिए M/P = 0.3929 सर्वाधिक है। दरअसल छोटे देशों के लिए M/P अपेक्षया अधिक है। क्रम में 67वें स्थान पर भारत के लिए न्यूनतम, 0.0002 है। उसके ऊपर नाइजीरिया है M/P = 0.0005 के साथ। अन्य सभी देशों के लिए यह 0.0010 से अधिक है।

इस सूचकांक को मैं महत्वपूर्ण इसलिए मानता हूं क्योंकि सांख्यकीय सिद्धांतों के अनुसार मानव-कार्यकलाप के किसी भी क्षेत्र में दक्ष लोगों की संख्या आबादी के लगभग अनुपात में होगी ऐसी उम्मीद सामान्यतः की जाती है। इसे शब्दशः नहीं लिया जा सकता है किंतु बहुत बड़ी आबादी वाले देश में अधिक दक्ष लोग तो होने ही चाहिए। इसलिए भारत जैसा देश दो पदक भी मुश्किल से पा सका इसके निहितार्थ पर चिंतन तो होना ही चाहिए।

खजाने का दुरुपयोग

देश के नाम अधिक पदक नहीं आये इसका देशवासियों के लिए भावनात्मक महत्व है, किंतु इससे देश की व्यवस्था और खुशहाली पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। मुझे जिस बात पर घोर आपत्ति है वह है पदक-प्राप्त दोनों खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने के लिए सरकारों द्वारा राजकोष यानी खजाना लुटाना । अधोलिखित बातों पर जरा विचार करें।

(1) मुझे याद नहीं आता कि पहले कभी खिलाड़ियों पर रातोंरात करोंड़ों रुपये लुटाये गये हों। एक समय था जब देश में क्रिकेट बेहद लोकप्रिय था (आज भी है), लेकिन खेल के माध्यम से उसके खिलाड़ी लाखों नहीं कमा सके (तब लाख ही बहुत होता था)। उनमें से अधिकतर स्टेट बैंक या रेलवे में नौकरी करते थे। उस काल में विज्ञापनों की दुनिया इतनी चमकदार नहीं थी। लेकिन आज के समय में विज्ञापन-दाता कंपनियां दिल खोल कर पैसा खर्च कर रही हैं और अपने विज्ञापनों के लिए लब्धप्रतिष्ठ खिलाड़ियों और सिने-टीवी कर्मियों आदि के साथ करोड़ों का अनुबंध स्वीकरती हैं। अब ऐसे खिलाड़ियों को नौकरी नहीं करनी होती है। जहां तक मेरा अनुमान है सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन की करोड़ों की संपदा उनके व्यवसाय एवं विज्ञापनों से प्राप्त हुई है। ये दो नाम मात्र उदाहरण के लिए हैं, अन्यथा सूची तो लंबी होगी। सरकारी खजानों से उनको बहुत मिला हो मुझे नहीं लगता। जैसा पहले कहा है विज्ञापन-प्रदाता कंपनियां पदक-प्राप्त खिलाड़ियों से अनुबंध के लिए आतुर रहती हैं। अस्तु, चाहे पहले हो या आज, खिलाड़ियों पर सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाना उचित नहीं कहा जायेगा।

(2) मैं सोचता हूं कि 6 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 16 पदक जीतने वाले जमैका की सरकार ने खिलाड़ियों को कितने करोड़ों से नवाजा होगा? तुलना के लिए ध्यान रहे कि भारत की अनुमानित आबादी 130 करोड़ से ऊपर है और जमैका की मात्र 28 लाख। वहां की प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय है करीब 8000 डॉलर और भारत की करीब 5000 डॉलर।

(3) मेरे मन में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि कई अन्य देशों की तरह अपने यहां भी 15-16 खिलाड़ियों ने पदक जीता होता तो उनको सरकारी खजानों से कितना-कितना मिला होता? और हमारे विशिष्ठ व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी तब अपने खजाने से कितनों पर कितना लुटाते? ध्यान दें जिन दो पदक विजेताओं को उन्होंने करोड़ों से पुरस्कृत किया है उनका दिल्ली राज्य से सीधा संबंध नहीं। यह सवाल भी मेरे मन में उठता है कि क्या परिणाम होते यदि सभी राज्य सरकारें दिल खोलकर खजाना लुटाने चल देतीं? तब ये खिलाड़ी दो दिन में ही कितने करोड़ों के मालिक हो जाते?

(४) मेरी दृष्टि में सर्वाधिक आपत्तिजनक है राज्य के खजानों को लेकर सरकारों का रवैया। किसी जमाने में राजे-महाराजे राजकीय कोशों के मालिक होते थे। उनके लिए खजाना अपनी निजी संपत्ति होती थी। उसे जैसे चाहें वे खर्च करते थे। वे किसी पर खुश हो गये तो उसे गले का हार दे देते थे या खजांची को आदेश देते थे कि स्वर्ण मुद्राओं से उसे नवाजा जाये। क्या लोकतंत्र में शासन चलाने वाला जनप्रतिनिधि-मंडल अर्थात मंत्री-परिषद के साथ मुख्यमंत्री खजाने का मालिक होता है जिसे जैसे चाहे अपनी मरजी से खर्ज करे? अथवा वे राजकोष के रखवाले या संरक्षक होते हैं जिनसे अपेक्षा रहती है कि वे जनहित में उस कोष का इस्तेमाल करें – जनहित जो जनता की समझ में भी आवे? बिना किसी पूर्वनिर्धारित नियमों के जैसी मरजी हुई वैसे खजाना लुटा देने को भी जनहित कह देना न्यायसंगत कहा जायेगा क्या? जिन सरकारों ने खिलाड़ियों पर खुल कर खजाना लुटाया उन्होंने किन कायदे-कानूनों के तहत ये सब किया?

(4) मेरी आपत्ति और भी गंभीर हो जाती है जब ये सरकारें स्कूलों, अस्पतालों, की हालत सुधारने में धन खर्च नहीं करतीं, वेतन बचाने के चक्कर में खाली पड़े पदों को नहीं भरतीं, असंपन्न किसानों के छोटे-मोटे कर्जों को माफ़ करके उन्हें आत्महत्या से नहीं बचाती। सरकारी लापरवाही से हुए हादसों में परिवारों के कमाऊ सदस्य चल बसते हैं, सरकारें उनके लिए भी 2-3 लाख का मुवावजा बहुत समझती हैं। और खिलाड़ियों पर करोड़ों? वाह मेरे देश का लोकतंत्र! जरा सोचिए सफ़ाई कर्मियों को तनख्वाह देने में केजरीवाल जी जल्दी नहीं करते परंतु खिलाड़ियों पर धन लुटाने में उन्हें देर नहीं लगती।

(5) प्रबुद्ध जन इस तथ्य पर विचार करें कि विश्व का सर्वाधिक चर्चित पुरस्कार भी गत वर्ष केवल 6.5 करोड़ का था। वह भी स्वीडन की सरकार नहीं बल्कि आल्फ़्रेड नोबेल की दानराशि से स्वीडिश अकादमी देती है। मेरी जानकारी में किसी नोबेल पुरस्कार विजेता पर संबंधित देश की सरकार धनवर्षा नहीं करती। क्या हमारी कोई सरकार धनवर्षा करेगी यदि कोई नोबेल पुरस्कार जीते? इस पर भी गौर करें कि केंद्रीय सरकार का सबसे बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार भी केवल 25 लाख रुपये का है। प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार (साहित्य) मात्र 11 लाख रुपये का है। देश में बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार गैर-सरकारी संस्था इंफ़ोसिस साइंस फ़ाउन्डेशन देती है वह भी 55 लाख का है। तब सवाल उठता है कि क्या ओलंपिक पदक की अहमियत विज्ञान, साहित्य आदि की उपलब्धियों से बड़ी है?

अंधेर नगरी

ऐसी विकृत शासकीय व्यवस्था को भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी ने कभी “अंधेर नगरी चौपट राजा” के विशेषण से संबोधित किया था।

Olympic Medals Tally

विडंबना: उच्च अदालतों का स्वदेशी नामकरण किंतु देश का नाम इंडिया ही रहेगा

हाईकोर्टों के नाम-परिवर्तन का निर्णय

बॉम्बे एवं मद्रास उच्च न्यायालयों का नाम बदलकर क्रमशः मुम्बई तथा चेन्नै न्यायालय करने के निर्णय को केन्द्र सरकार की कैबिनेट कमिटी (काबिना समिति?) ने मंजूरी दे दी है ऐसा समाचार मीडिया में देखने-पढ़ने को मिल रहा है । समाचार के अनुसार विचार तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के नाम के स्वदेशीकरण का भी था, किंतु वह अभी शायद उस आदेश में शामिल नहीं है । समाचार कितना पुष्ट है यह मैं नहीं जानता, किंतु निराधार तो नहीं ही होना चाहिए । मैंने तत्संबंधित समाचार हिन्दी में दैनिक जागरण एवं दैनिक भाष्कर नामक अखबारों में पढ़ा । अंगरेजी अखबारों में भी उक्त समाचार उपलब्ध है । उदाहरणार्थ द हिन्दू में इस शीर्षक के साथ समाचार छपा हैः Now, Bombay, Madras and Calcutta High Courts to bear city names.

उक्त समाचार को ब्रितानी अखबार दि टेलीग्राफ ने Bombay and Madras High Courts to abandon British colonial names शीर्षक के साथ समाचार को प्रमुखता दी है । इस शीर्षक के अनुसार अदालतों के ब्रितानी उपनिवेशीय नामों को हटाकर उनको देशज यानी स्वदेशी नाम देना जनभावना के अनुरूप है । अखबार ने शिवसेना नेता अरविन्द सावन्त के हवाले से कहा है “यह तो सरकारी मुलाजिम हैं जिन्होंने समस्या पैदा की है । अदालतें भी बदलाव चाहती हैं । सरकार की नौकरशाही ऐसा करना नहीं चाहती है । इसमें अभी और पांच वर्ष लग सकते हैं ।”

नाम बदलने की परंपरा

अपने देश में राज्यों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है । अभी कुछ दिन पूर्व हरियाणा के शहर गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्रामकर दिया गया । इस बदलाव पर लोगों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त की थीं । नाम बदलाव का सरकारी तर्क था कि यह उसका प्राचीन नाम रहा है । रहा होगा, लेकिन आज तक तो वहां के लोग शहर को गुड़गांव ही कहते आ रहे हैं । नाम बदलाव का विचार किसके दिमाग की उपज थी और उसके विषय में कितनों के विचार जाने गये यह मुझे नहीं मालूम ।

एक बार मैंने जिज्ञासावश कुछ नाम-परिवर्तनों को इंटरनेट (अंतरजाल) पर खोजा था । उनमें से कुछ का उल्लेख करना समीचीन होगाः

राज्य असम (आसाम), ओडिशा (उड़ीसा), पश्चिम बंग (वैस्ट बंगाल), पुदुच्चेरी (पांडुचेरी)|

शहर कन्याकुमारी (केप कोमारिन), कोज़ीकोड (कालीकट), कोलकाता (कैलकटाध्कलकत्ता), गुवाहाटी (गौहाटी), चेन्नै (मद्रास), तिरुअनंतपुरम (त्रिवेन्द्रम), पणजी (पंजिम), पुणे (पूना), बंगलूरु (बैंगलोर), मुम्बई (बॉम्बे), विशाखापत्तनम (वालटेयर), विजयपुर (बीजापुर)| (पुराने नाम कोष्ठकों में)

परिवर्तित नामों की सूची लंबी होगी; उसे ढूंढ़ने का अधिक प्रयास मैंने नहीं किया । कई शहरों के राजमार्गों के नाम भी बदले ही गये होंगे । अपने उत्तर प्रदेश राज्य के हाल ये हैं एक सरकार किसी जिले का पसंदीदा नाम चुनती है तो दूसरी सरकार उसे बदलने की कोशिश करती है । संस्थानों के साथ भी यह खिलवाड़ होता रहता है ।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस दल की नीति रही थी (अभी भी होगी) कि हर नयी संस्था, मार्ग, पुल, आदि का नाम यथासंभव प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एवं उनके वंशजों के नाम पर होवे, गोया कि यह देश उस एकल परिवार की बपौती हो । जनोपयोगी योजनाओं के साथ भी यही किया गया । अब मौजूदा सरकार यथासंभव उन्हें बदलने की कोशिश कर रही है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । मुझे याद आता है कि कभी दिल्ली के कनॉट सर्किल एवं कनॉट प्लेस को इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के नाम पर नया नाम दिया गया था । वे नाम किसी को याद भी हैं इस पर मुझे शंका है । दिल्ली जाइए और उन्हीं पुराने नामों को लोकमुख से सुनिए ।

नाम-परिवर्तनो की आम जनों में कितनी स्वीकार्यता है इस पर मुझे शंका है । यह देश की आवश्यकता है या महज वोट के खातिर जनता को लुभाने की कोशिश ? या सामाजिक सक्रियता के शौकीन और “राष्ट्रीयता” की भावना से उत्साहित लोगों के मांग का परिणाम ?

अंगरेजी का वर्चस्व ठीक, अंगरेजी नाम नहीं !

वापस बात उच्च न्यायालयों के नाम परिवर्तन के मुद्दे पर । अधिकतर लोग अदालतों को न्यायालय न कहकर कोर्ट ही कहते हैं यह मेरा मानना है । बहुत हुआ तो उन्हें अदालत कह दिया । न्यायालय तो आम बोलचाल में कम ही लोग कहते है । आज के अंगरेजी स्कूलों में पढ़े युवाओं को तो यह शब्द मालूम न हो तो आश्चर्य नहीं होगा ।

नाम बदलने का विचार राजनेताओं से शुरु होता है और जनभावनाओं के उभार के रूप में आगे बढ़ता है । बदलाव के पीछे बहुत गंभीर कारण रहते हों और बदलाव की उपयोगिता को आंका जाता हो ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जैसा आरंभ में उल्लिखित द टेलीग्राफ अखबार में कहा गया है नाम-परिवर्तन के पीछे का सशक्त तर्क यह है कि अंगरेज उपनिवेश काल की पहचान रखने वाले नामों का देशीकरण होना चाहिए । मैं स्वयं इसका पक्षधर हूं किंतु इस कार्य में विसंगति कितनी है इस पर विचार किए बिना नहीं ।

गुड़ खाये और गुलगुले से परहेज

(पाठकवृन्द क्षमा करें मुझे मुहावरा ठीक-से याद नहीं ।) अंगरेजी विरासत के तौर पर जो नाम देश में प्रचलित हैं उनको देशज नामों से संबोधित किया जाए यह बात कहने-सुनने में अच्छी लगती है । परंतु इस कार्य में मुझे विसंगति के दर्शन होते हैं । जिस देश में पग-पग पर अंगरेजी का साक्षत्कार होता हो, प्रायः सभी दस्तावेजी कार्य अंगरेजी में किए जाते हों, जिस देश का संविधान अंगरेजी में हो, उच्चतम न्यायालय का कार्य अंगरेजी में होता हो, अंगरेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही हो, देशज भाषाओं के विद्यालय बंद होने के कगार पर हों, वहां अंगरेजी नामों को बदलने का औचित्य ही क्या है । अब तो हालात यह हैं कि हिन्दीभाषी हिन्दी में अपनी बात नहीं कह सकते बिना अंगरेजी शब्दों के प्रयोग के । जब देशवासियों को अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं तो अंगरेजी नामों से परहेज क्यों ?

यह देश है ही विचित्र । यदि नाम ही बदलना है तो सबसे पहले देश का नाम बदला जाना चाहिए । इस देश का नाम “भारत” होना चाहिए या “इंडिया”?  इंडिया नाम अंगरेजों का दिया हुआ है न कि इस देश का मौलिक या प्राचीन नाम है । विष्णुपुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को भारतवर्ष या भारत कहा गया है । तब हम इसे भारत क्यों नहीं कहते ? सब जगह इंडिया ही क्यों सुनने को मिलता है ? यहां तक कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी भी अपने नारे इंडिया के नाम ही गढ़ते है, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, आदि-आदि । ऐसी स्थिति में अदालतों और अन्य संस्थाओं के अंगरेजी नाम हटाने का आडंबर क्यों ?

पहले इस देश का नाम “भारत” किया जाना चाहिए तब अन्य नाम बदलने का तुक बनता है । इस बारे में मेरे अपने तर्क हैं और प्राचीन ग्रंथों का आधार भी, जिनकी चर्चा मैंने अपने ब्लॉग (दिनांक 15 जून 2016) में की है ।

अदालतों के ब्रितानी नाम बदल दो किंतु देश को इंडिया ही कहते रहो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है । – योगेन्द्र जोशी

और प्रसंग से कुछ हटकर   

यह देश भारत, जिसे विदेशी ही नहीं देशवासी भी इंडिया नाम से संबोधित करना पसंद करते हैं, विविधताओं, विचित्रताओं, विसंगतियों और विरोधाभासों का देश है । यहां इतना कुछ एक साथ देखने को मिल सकता है जो विश्व के किसी अन्य देश में संभव नहीं लगता, न चीन में और न ही संयुक्त राज्य अमरीका  में; छोटे देशों में तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती । अतः मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि अपने आप में अद्भुत, अद्वितीय, अनूठे देश में जन्मा हूं मैं, जिसे प्राचीन मनीषियों ने भारतवर्ष नाम दिया था और जिस नाम से मैं स्वयं इसे संबोधित करना चाहूंगा । – योगेन्द्र जोशी

देश का संविधान-सम्मत नाम “इंडिया”; तब “भारत” नाम की जरूरत  क्यों आ पड़ी?

लंबे अंतराल से  मैं एक प्रश्न का उत्तर पाने की इच्छा रखते आया हूं। अभी तक मेरी दृष्टि में जानकारी का ऐसा स्रोत नहीं आया जो मेरी समस्या का संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत कर सके। समस्या है कि इस देश के दो नाम क्यों हैं? क्या दो नामों की कोई उपयोगिता है, विशेषतः जब प्रायः सर्वत्र एक ही नाम सुनने-पढ़ने में आ रहा हो। 

देश का संविधान अंगरेजी में लिखा गया है और उसी को उसकी प्रामाणिक प्रति माना जायेगा यह भी स्पष्ट किया गया है। किसी अन्य भाषा (तथाकथित बेचारी राजभाषा हिन्दी भी शामिल) में लिखित (अनूदित/अनुवादित) प्रति अमान्य होगी यदि कानूनी व्याख्या में अंगरेजी मूल और अन्य भाषा में कहीं फ़र्क दिखने में आवे।

अंगरेजी में लिखित इस संविधान के आरंभ में दिए गये PREAMBLE (प्रस्तावना, भूमिका, प्राक्कथन जो भी अनुवादकगण कहते हों) के शब्द ये हैं:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:

JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(हिन्दी में यों आरंभिक शब्द होंगे: “हम इंडिया के लोग …”

ध्यान दें कि इस PREAMBLE में “भारत” का प्रयोग या उल्लेख नहीं है। तब क्या इस देश को भारत कहना संवैधानिक दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जायेगा?

अगर हिन्दी में इस PREAMBLE के शब्द कहे जाने हों तो कैसे शुरुआत करेंगे? हम क्या यों आरंभ करेंगे: “हम इंडिया के लोग …” अथवा हम कहेंगे: “हम भारत के लोग …”? यहां यह प्रश्न उठेगा कि क्या किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा-शब्द (नाम, proper name) का अनुवाद किया जाता है? यह सभी जानते हैं कि किसी भी भाषा में बात करने पर व्यक्तिवाचक या भाववाचक संबोधन का अनुवाद नहीं किया जाता है। तब उक्त अनुवाद में इंडिया के बदले भारत कैसे कहा जा सकता है।

प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है जब हिन्दी अथवा देवनागरी लिपि वाली भाषाओं से इतर भाषाओं में इस देश का जिक्र किया जाना हो। यथा तमिल में क्या कहेंगे, सिन्धी में क्या कहेंगे, सिंहली (श्रीलंका की भाषा – विदेशी, संस्कृत शब्दों की बहुलता वाला) में क्या होगा, थाई (थाइलैंड की भाषा) में क्या होगा, इत्यादि इत्यादि। मेरी जानकारी के अनुसार संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि हिन्दी में “भारत” होगा। लिखा भी हो तो भी तमाम अन्य भारतीय/विदेशी भाषाओं में क्या कहेंगे यह तो नहीं ही स्पष्ट है।

ऐसी दुविधा किसी ऐसे देश के मामले में हो सकती है जिसके एकाधिक नाम हों। मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इस राष्ट्र को अनौपचारिक रूप से हिन्दुस्तान, हिंद, आदि कहा ही जाता है, उसी प्रकार भारत कहना भी अनौपचारिक तौर पर स्वीकार्य माना जायेगा। लेकिन कानूनी दस्तावेजों में भारत कहना अनुचित नहीं होगा क्या? देशवासी बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, लेकिन वे इस विसंगति की चर्चा क्यों नहीं करते हैं?

यह भी विचारणीय है कि प्राचीन काल में यहां के बाशिन्दों ने इस भूभाग को “भारत” नाम दिया। विष्णुपुराण में कहा गया है:

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। (विष्णुपुराण, 2.3.1)

अर्थात् जो देश (वर्ष – देश का पर्याय) समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है उसका नाम है भारत और उसकी संतानें हैं भारती ।

मेरा मानना है कि यह पौराणिक नाम “यूरोपवासियों” के संबोधन “इंडिया” से अधिक प्राचीन रहा ही होगा।

स्पष्ट है कि भारत नाम हमारे पुरखों ने प्राचीन काल में इस भूभाग को दिया था जो आज एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर स्थापित है। अंगरेजों ने अपने आधिपत्य के अधीन इस भूभाग को इंडिया कहा अपनी सुविधा से न कि यहां की जनता से पूछकर । उन्होंने “India as a sovereign nation” के तौर पर राज नहीं किया; यह तो उनके ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा था। हमने राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल की लेकिन अपना स्वयं का दिया हुआ नाम भूलकर उनके द्वारा दिया हुआ नाम स्वीकार कर लिया। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कोई विलायत में रहे और विलायतियों के उच्चारण की सुविधा के अनुसार उनके संबोधन को ही अपना नाम मान ले और अपने परिवार द्वारा प्रदत्त मूल नाम भूल जाए।

इस राष्ट्र को “भारत” संबोधित न कहकर “इंडिया” क्यों कहा गया यह मेरी समझ से परे है। यह ठीक है कि अंगरेजों ने इस देश को इंडिया कहा और शासकीय व्यवस्था में अपनी जरूरत के अनुसार अंगरेजी भाषा तथा अंगरेजियत का प्रसार किया। विडंबना यह है कि जब देश स्वतंत्र हुआ तो अंगरेजों से तो हम मुक्त हुए, लेकिन गुलामी की निशानी उनकी अन्य बातों के प्रति देशवासी सम्मोहित बने रहे। फलतः देश इंडिया बना रहा, भारत नहीं बन सका संविधान की दृष्टि में।

इस समय इस देश को भारत कहने वाले नगण्य हो चले हैं। अखबारों/टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाले विज्ञापनों में इंडिया ही प्रयुक्त होता है। प्र.मं. मोदी तक “डिजिटल इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” जैसे नारे गढ़ते हैं और उसके बाद उन नारों के हिन्दी रूपान्तरों मे भारत प्रयुक्त होता है। जब मौलिक रूप से “इंडिया” ही इस्तेमाल होना है तो “भारत” की आवश्यकता क्या है?

यहां इतना तो बता ही दें कि ‘केंद्र शासन की स्थापना के लिए 1949 में जिस अधिनियम को पारित किया गया उसके अनुच्छेद 1(1) का पाठ यों है (अंगरेजी में): “1(1) India, that is Bharat, shall be a Union of States”, जिसका हिन्दी रूपान्तर यों दिया जा सकता है: “इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का संघ होगा ।” ध्यान दें कि इस स्थल पर देश का नाम ‘इंडिया’ के साथ-साथ ‘भारत’ भी घोषित कर दिया है । ऐसा करने की आवश्यकता क्या थी यह भी मेरे समझ से परे है। ऐसा करना ही था तो जैसे संविधान के ४२वें संशोधन (1976) में “SECULAR” शब्द जोड़ा गया वैसे ही संविधान संशोधन के जरिये “भारत” शब्द भी जोड़ा जा सकता था। पर ऐसा किया नहीं गया। कारण? मेरे लिए अज्ञात! – योगेन्द्र जोशी

संस्कारहीनता की राह पर भारतीय समाज एवं गुवाहाटी की घटना

गुवाहाटी की घटना

पिछले दो-चार दिन से टीवी समाचार चैनलों पर अपने देशवासियों की एक बेशर्म हरकत की खबर छाई हुई है । खबर है असम राज्य के गुवाहाटी नगरी की, जहां पांच-छः दिन पहले युवाओं की भीड़ खुले आम व्यस्त राजमार्ग पर एक किशोरी/युवती को निर्वस्त्र करने या उसकी असमत लूटने की कोशिश में जुटा था ।

इसे मैं संयोग ही मानता हूं कि स्थानीय टीवी चैनल के संवाददाता एवं कैमरामैन वहां प्रकट हो गये । वे मानव-पशुओं की उस भीड़ से उस युवती को बचा तो नहीं पा रहे थे, अलबत्ता घटना की फूटेज वे जरूर बना सके । यही फूटेज देश भर में समाचार चैनलों की मुख्य खबर बन बैठी । अगर यह फूटेज न होता तो न लोगों को खबर लगती और न ही इतना हो-हल्ला मचता । और घटना सहज रूप से रफा-दफा हो गयी होती । उस भीड़ के ‘प्रमुख पात्रों’ ने सोचा नहीं होगा कि उनकी फोटो होर्डिंग पर प्रदर्शित हो जाएंगी, और उनकी गिरफ्तारी का पुलिसिया नाटक भी चल पड़ेगा ।

संबंधित संवाददाता का कहना है कि उसने पुलिस को तुरंत खबर दी थी । लेकिन भारतीय पुलिस दल से यह आशा तो की ही नहीं जा सकती है कि वह घटनास्थल पर अविलंब पहुंचे । संवाददाता का कहना था कि वह अकेले में असहाय था । उसने वारदात को अपने कैमरे में कैदकर देशवासियों को दिखाया तो । अन्यथा खबर दबकर रह जाती । इसके विपरीत एक ‘आरटीआई’ कार्यकर्ता का दावा है कि टीवी चैनल वालों के उकसाने पर ही भीड़ ने वारदात को अंजाम दिया । अब संवाददाता गौरवज्योति नियोग स्वयं आरोपों के घेरे में है ।

इस देश में कौन सच बोलता है और कौन झूठ यह कहना असंभव-सा है । कोई भी प्रमाण यहां विवादास्पद बनकर रह जाता है । भगवान ही देश का मालिक है!

समाज में फैल रही संस्कारहीनता

उक्त घटना की व्याख्या मैं इस देश में निरंतर बढ़ रही संस्कारहीनता के प्रतिबिंब के रूप में करता हूं ।
देशवासियों ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर डाला है । स्वतंत्रता का अर्थ अब स्वच्छंदता, निरंकुशता, अनुशासनहीनता लिया जाने लगा है । नियम-कानूनों का उल्लंघन, जो मर्जी आए वह कर बैठना, जब जो मन में आए बक देना, आदि लोगों का शगल बन चुका है ।

संस्कारहीन व्यक्ति समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है ।
वह सहनागरिकों को सम्मान नहीं दे सकता है ।
वह दूसरों की सुविधा-असुविधा की परवाह किए बिना अपने हित साधता है ।
मेरा काम कैसे निकले यही उसकी चिंता होती है ।
इत्यादि ।

आप दावा करेंगे कि देश में अधिकांश लोग संस्कारहीन नहीं हैं । आपकी बात अवश्य ही सच है । लेकिन जिस समाज में सौ में एक भी संस्कारहीन नहीं होना चाहिए, वहां सौ में पांच वैसे हों तो उसे कम कहेंगे क्या ? समाज को दूषित करने के लिए 50 फीसदी लोगों की जरूरत होती है क्या ? तथ्य तो यह है कि बस चंद लोग ही समाज का स्वरूप बिगाड़ने के लिए काफी होते हैं । और अपने समाज में उनकी कमी नहीं है ।

उदाहरण एक नहीं, अनेकों हैं

यह संस्कारहीनता हमारे सामाजिक जीवन में अलग-अलग रूपों में उजागर हो रही है । कहीं वह अपेक्षया महत्वहीन घटना को जन्म दे रही है, तो कहीं अपने को बेहद घिनौनी सूरत में पेश कर रही है । देश इस समय भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा है तो वह संस्कारों के अभाव के ही कारण है । सरकारी मुलाजिम मोटी तनख्वाह ऐंठने के बावजूद कर्तव्यों से आंखें मूंदे रहते हैं तो संस्कारशून्य होने कारण । सत्तासीन लोग अपराधियों को संरक्षण एवं प्रशय देते आ रहे हैं तो संस्कारच्युत होने के कारण ही । क्या-क्या गिनाएं ? गुवाहाटी की घटना और उस सरीखी अन्य घटनाएं, जिसमें स्त्रीजाति के साथ दुराचार-अत्याचार किया गया हो, इसी संस्कारहीनता के परिणामों में से हैं ।

यह सोचना निहायत बचकानी बात होगी कि यह संस्कारहीनता भटके हुए निरंकुश युवकों के एक छोटे-से वर्ग तक सीमित है । दरअसल यह समाज के हर क्षेत्र में जड़ें जमा चुकी है, खास तौर पर हमारे राजनैतिक दलों एवं उनके अधीनस्थ पुलिस बलों में और अन्य सरकारी महकमों में ।

टीवी कार्यक्रमों में हम जितनी भी बहस कर लें होना कुछ भी नहीं है, क्योंकि जिन पर कारगर कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनको करना कुछ नहीं है । आम आदमी चीखने से अधिक कुछ कर नहीं सकता है, क्योंकि उसके हाथ में वैधानिक ताकत नहीं है ।

हम ‘प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न’ पर पहुंच चुके हैं, इसलिए लगता नहीं कि अब कुछ संभव है । ऐसा क्यों अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

11 जुलाई – विश्व जनसंख्या दिवस और इंडिया बनाम भारत

बधाई एवं शुभकामना

आज विश्व जनसंख्या दिवस (World Population Day) है । इस अवसर पर मैं अपने देशवासियों को बधाई और शुभकामना देना चाहता हूं ।

बधाई इस बात पर कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ शीघ्र ही सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा । अभी चीन की जनसंख्या सर्वाधिक है किंतु उसकी आबादी नियंत्रण में है । विशेषज्ञों के अनुसार वह अधिकतम करीब 140 करोड़ के आंकड़े को छुएगी । अभी वह 135 के आसपास है । अपने इंडिया दैट इज भारत की आबादी फिलहाल 120 करोड़ से ऊपर है । जिस रफ्तार से वह बढ़ रही है उसे देखते हुए उसे 140 करोड़ पहुंचने में 15 वर्ष से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए । थोड़ा विलंब हो भी गया तो भी 20 साल के भीतर तो हम चीन से आगे बढ़ ही जाएंगे । तब हम सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन ही जाएंगे । हम अपने को किसी क्षेत्र में – चाहे जनसंख्या का ही क्षेत्र क्यों न हो – सर्वोंपरि सिद्ध कर लेंगे । क्या यह छोटी-मोटी उपलब्धि होगी ? इसी बात पर मेरी देशवासियों के प्रति बधाई !

साथ में मेरी शुभकामना भी । अपना देश इस बढ़ती जनसंख्या के बोझ को किसी प्रकार वहन कर सके ऐसी शुभेच्छाएं लोगों के प्रति हैं । ऊपर वाले से मेरी प्रार्थना है – अगर वह किसी की सुनता हो तो – कि दुनिया के सभी कुपोषित, भूखे, रुग्ण, अनपढ़ एवं बेरोजगार यहीं हों ऐसी मेहरबानी कृपया न करे । देश भगवान भरोसे है, आगे भी रहेगा, इसलिए उससे प्रार्थना करना निहायत जरूरी है ।

जनसंख्या दिवस – औचित्य?

वैसे ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाने का क्या औचित्य है यह मैं आज तक समझ नहीं सका । दीवाली हो तो पटाखे छुड़ाऊं, होली हो तो मित्रों के अबीर-गुलाल लगाऊं, ईद हो तो सेवई खाने-खिलाने की सोचूं, किसी महापुरुष का जन्मदिन हो तो भी जश्न मनाने की सोचूं, आदि-आदि । लेकिन इस दिन को कैसे मनाऊं ?

आप कहेंगे कि जनसंख्या वृद्धि को लेकर कुछ करिए । क्या करूं ? क्या कर सकता हूं मैं ? अपने हाथ में है क्या ? आप कहेंगे लोगों को समझाएं । साल में एक दिन ऐसा करना क्या माने रखता है ? साल के एक दिन क्या किसी शराबी को शराब न पीने की, किसी तंबाकूबाज को सिगरेट न पीने की, सलाह दे दें तो क्या वह मान जाएगा ? बार-बार याद दिलाने पर भी कुछ काम बनेगा इसकी भी आशा मैं नहीं कर पाता । किसी को सलाह देने पर वह कह सकता कि आप परेशान न हों; मेरे परिवार का पेट आपको नहीं भरना पड़ेगा । वह यह भी कह सकता है कि परिवार की वृद्धि तो ऊपर वाले की मरजी से है, मैं भला क्या करूं । वह ऐसे ही तमाम तर्क दे सकता है । मेरे पास समझाने को कुछ नहीं । जिसे ‘सन्मति’ होगी उसे समझाने की जरूरत नहीं, और जिसे नहीं है, उसके मामले में ‘भैंस के आगे बीन बजे, भैंस खड़ी पगुराय’ वाली कहावत लागू होती है ।

यों भी अपने देश में इस दिवस की कोई अहमियत नहीं । हमारे सरकारों, राजनैतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं बुद्धिजीवियों ने इस मुद्दे को दशकों पहले तिलांजलि दे दी थी । मुझे पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशकों की याद है, जब मैं युवावस्था में प्रवेश कर चुका था और परिवार नियोजन के अर्थ समझने लगा था । वे दिन थे जब ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे जहां-तहां दिखाई-सुनाई पड़ते थे । सड़क किनारे होर्डिंगों, बसों, पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों आदि पर ‘उल्टा लाल तिकोन’ के निशान दिखते थे । नियोजित परिवार के पक्ष में विज्ञापनों एवं अन्य साधनों का सहारा लिया जाता था ।

पटरी से उतरा परिवार नियोजन कार्यक्रम

तब परिवार नियोजन की गाड़ी चल तो रही थी । इसे देश का दुर्भाग्य कहें कि सौभाग्य यह तो आप जानें कि गाड़ी पटरी से उतरी तो उतरी ही रह गई । ठप हो गयी तो हो गयी । सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी के कनिष्ठ पुत्र, स्व. संजय गांधी, के मन में यह जोशीला विचार उठा कि जनसंख्या पर जबर्दस्त तरीकों से नियंत्रण किया जाना चाहिए । उनके बारे में लोगों में यह धारणा व्याप्त थी कि सत्ता पर उनका जोरदार प्रभाव था, और उनके कार्यक्रम के विरोध का साहस सत्तापक्ष में किसी को नहीं था । वे सत्ता में न होते हुए भी सत्ता की हैसियत रखते थे । उनके जोश का परिणाम था कि गाड़ी ने तेज रफ्तार पकड़ी और पटरी से ऐसी उतरी कि फिर पटरी पर चढ़ नहीं सकी । उसके बाद आपात्काल घोषित हुआ, सत्ता परिवर्तन हुआ, कालांतर में श्री संजय गांधी भी इहलोक से विदा हो गये, इत्यादि ।

उस काल की घटनाओं का परिणाम यह रहा कि सभी राजनैतिक दलों ने कसम खा ली कि अब जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं की जानी चाहिए । चूंकि जनसंख्या वृद्धि के बाबत चिंता सारी दुनिया में व्यक्त की जा रही है, अतः इस देश को भी उस कोलाहल में चीखना ही है । लेकिन यह चीखना सतही एवं दिखावे का है, गंभीरता कहीं नहीं है ।

मामला इंडिया बनाम भारत

और असल सवाल तो यह है कि आबादी बढ़ किसकी रही है ? ‘इंडिया’ की कि ‘भारत’ की ? याद रहे यह देश दो खंडों में बंटा है, इंडिया एवं भारत । इंडिया की पॉप्युलेशन नहीं बढ़ रही है । वहां टू-चाइल्ड, वन-चाइल्ड अथवा नो-चाइल्ड नॉर्म प्रैक्टिस में आ चुका है । वहां कि समस्याएं वही नहीं हैं जो भारत की है । वह तो वाकई शाइन कर रहा है । जनसंख्या वृद्धि तो भारत की समस्या है, जहां एक-एक परिवार में छः-छः, सात-सात बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनकी परवरिश बेढंगी है, जो कुपोषित हैं, जिनका इलाज छोलाछाप डाक्टर करते हैं, जिनकी स्कूली व्यवस्था में अक्षरज्ञान तक दुर्लभ है । और क्या-क्या बताऊं ?

भारत की जनसंख्या बढ़ जाए तो इंडिया को क्या फर्क पड़ता है ? देश की व्यवस्था तो इंडिया के हाथ में है । इंडिया घाटे में न रहे इसके लिए हर क्षेत्र में दोहरी व्यवस्था अपनाई गयी है अघोषित रूप में । आबादी बढ़ जाए तो उसको थोड़ी परेशानी तो होगी, लेकिन उसे सह लिया जाएगा । असली परेशानी तो भारत को होगी । उसी को तो संसाधनों के अभाव का दंश झेलना होगा । इंडिया उसके लिए क्यों परेशान होवे ?

इसलिए जनसंख्या की बात बेमानी है !

युवा शक्ति – पूंजी?

विश्व के तमाम देशों में आबादी बुढ़ा रही है; यानी उनके यहां आबादी का बृहत्तर हिस्सा प्रौढ़ों-बुजुर्गों का है । इसके विपरीत इंडिया दैट इज भारत में 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है ऐसा दावा किया जाता है । कुछ लोगों का मत है ये युवा तो अपने देश की पूंजी हैं । किन युवाओं की बात करते हैं आप ? सड़क पर कूड़ा बीनते हुए, ढाबे पर चायपानी के बर्तन साफ करते हुए, चौराहे पर फल-सब्जी बेचते हुए अथवा ईंटा-गारा ढोते हुए सार्थक स्कूली शिक्षा से वंचित जो बच्चे युवावस्था में पहुंच रहे हों उनको आप पूंजी कहते हैं ? हो सकता है, मेरी समझ निहायत घटिया हो । – योगेन्द्र जोशी

क्या महात्मा गांधी की अहिंसा नीति वास्तव में व्यावहारिक है ?

गांधीजी और स्वाधीनता संघर्ष

कल 2 अक्टूबर गांधी जयंती है और साथ ही विश्व अहिंसा दिवस भी । वस्तुतः गांधीजी विश्व भर में उनके अहिंसात्मक आंदोलन के लिए जाने जाते हैं, और यह दिवस उनके प्रति वैश्विक स्तर पर सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है । यह आम धारणा लोगों में व्याप्त है कि गांधीजी के अहिंसक आंदोलन ने ही देश को स्वाधीनता दिलाई थी । मुझे इस मत को पूर्णतः स्वीकारने में हिचकिचाहट होती है । मेरी अपनी धारणा है कि उस संग्राम में अनेकों सेनानियों ने योगदान दिया था । उस काल में अंग्रेज सामाज्य कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था । एक ओर विश्वयुद्ध की समस्या पूरे यूरोप को घेरे थी तो दूसरी ओर विश्व के प्रायः सभी पराधीन देश अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए आंदोलनरत थे । ब्रितानी सरकार को यह अहसास हो चुका था कि अब अपने सामाज्य को यथावत् बनाए रखना आसान नहीं । याद करें कि उस कालखंड में अनेकों लोग यूरोप में मारे गये थे, और उन्हें ‘मैन-पावर’ की समस्या का सामना करना पड़ रहा था, जिस कारण से कालांतर में भारत-पाकिस्तान सरीखे देशों से कई-कई लोग पुरुष कर्मियों की कमी पूरा करने के लिए ब्रिटेन पहुंचे थे । ऐसे में ब्रितानी हुकूमत ने एक-एक कर विभिन्न देशों को स्वाधीनता देना आरंभ कर दिया था । गांधीजी के आंदोलन को अकेले फलदायक मान लेना उचित नहीं है । स्वाधीनता प्राप्ति में उन अनेकों लोगों का निर्विवाद योगदान भी शामिल था जो गांधीजी से मतभेद रखते थे ।

अगर यह मान भी लें कि गांधीजी का अहिंसक आंदोलन वस्तुतः कारगर रहा, तो भी इतने मात्र से उसकी प्रभाविता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उचित नहीं होगा । यद्यपि मैं व्यक्तिगत तौर पर अहिंसा का पक्षधर हूं, और कामना करता हूं कि सभी सांसारिक जन ऐसा ही करें, तथापि इस तथ्य को नकारना मैं नादानी मानता हूं और इस पर जोर डालता हूं कि ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा । मेरे अपने तर्क हैं; उन्हें प्रस्तुत करने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरे लिए महात्मा गांधी उन गिने-चुने ऐतिहासिक महापुरुषों – शायद दर्जन भर भी नहीं – में से एक हैं, जिनको मैं विशेष सम्मान की दृष्टि से देखता हूं । साफ-साफ कहूं तो इस सूची में उनके अलावा महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, ईसा मसीह, और यूनानी दार्शनिक सुकरात जैसे महापुरूष शामिल हैं । मैं इन सभी को उनकी सिद्धांतवादिता, स्पष्टवादिता, त्यागशीलता, आम जन के प्रति संवेदनशीलता, और इन सबसे अधिक अहम (भेड़चाल से हटकर) स्वतंत्र चिंतन की गुणवत्ता के कारण सम्मान देता हूं ।

हिंसा: स्वाभाविक प्रवृत्ति

अब मैं मुद्दे पर लौटता हूं । मनुष्य में तमाम प्रकार की स्वाभाविक प्रवृत्तियां अलग-अलग तीव्रता के साथ मौजूद रहती हैं । जो प्रवृत्तियां समाज के लिए किसी भी प्रकार से हितकर हों उन्हें सकारात्मक कहा जा सकता है, और जो अहितकर हों उन्हें नकारात्मक । किसी भी व्यक्ति में दोनों ही अलग-अलग मात्रा में मौजूद हो सकती हैं । परिस्थितियां नियत करती हैं कि कब कौन-सी प्रवृत्तियां हावी होंगी और कितने समय तक प्रभावी रहेंगी । इन प्रवृतियों में से एक हिंसा की प्रवृत्ति है, जो प्रायः सभी विकसित जीव-जन्तुओं में विद्यमान रहती है । वस्तुतः प्रकृति ने जीवधारियों में यह प्रवृत्ति अपनेे अस्तित्व को बनाए रखने के एक साधन के रूप में प्रदान किया है । इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि मनुष्य में भी यह स्वाभाविक तौर पर मौजूद रहती है । किंतु अन्य प्राणियों तथा मनुष्य में अंतर यह है कि मनुष्य हिंसात्मक प्रवृत्ति के नकारात्मक पहलू को समझ सकता है और यदि वह चाहे तो स्वयं को एक हद तक उससे मुक्त कर सकता है । ‘यदि वह चाहे तो’ एक महत्वपूर्ण शर्त है जो कम ही मौकों पर पूरी हो पाती है ।

कौन ऐसा है जो खुलकर एस बात की वकालत न करे कि समाज में संवेदनशीलता हो, परोपकार भावना हो, अन्य जनों पर हावी होने का भाव न हो, दूसरों के शोषण की प्रवृत्ति न हो, इत्यादि । पर क्या हमारे चाहने भर से ये बातें समाज में व्यापक स्तर पर दिखाई देती हैं ? विश्व के इतिहास में कितने महापुरुष हैं जो अपने अथक प्रयासों से समाज को इन गुणों के प्रति पे्ररित कर सके हों ? निश्चित ही एक बहुत बड़ा जनसमुदाय उन इतिहास-पुरुषों का प्रशंसक हो सकता है और स्वयं को उनका अनुयायी होने का दंभ भर सकता है । किंतु इसके यह अर्थ कतई नहीं है वह उन गुणों को अपनाने का संकल्प भी लिए हो । यह विडंबना ही है कि अनुयायी होने की बात अनेक जन करते हैं, परंतु तदनुरूप आचरण विरलों का ही होता है ।

मैं कहना चाहता हूं बहुत-से सामाजिक चिंतक/उपदेष्टा अहिंसा की बातें करते आए हैं, फिर भी हिंसा की प्रवृत्ति समाज में बनी हुई है और उससे लोग मुक्त नहीं हुए हैं । वास्तविकता के धरातल पर अहिंसा की बात कितनी सार्थक है यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि किसी भी देश का शासन तंत्र हिंसा के प्रयोग पर टिका है । उनकी न्यायिक व्यवस्था मैं दंड का प्रावधान हिंसा पर आधारित है । शासन तंत्र नागरिकों में यह भय पैदा करता है कि यदि वे अनुचित कार्य करेंगे तो उन्हें दंडित होना पड़ेगा । चाहे परिवार के भीतर की बात हो या समाज की बात व्यक्ति को हिंसा का ही भय दिखाया जाता है, और लोगों को दंडित करके उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं । देश बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, सेना एवं पुलिस का गठन ही हिंसा पर आधारित होता है ।

यह तर्क दिया जा सकता है कि उपर्युक्त मामलों को हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए । हिंसा परिभाषा ही बदलकर उसका औचित्य निर्धारण करना क्या उचित है यह विचारणीय एवं विवादास्पद विषय है । जब आप अहिंसक आंदोलनों की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि वे तभी सफल होते हैं जब दूसरा पक्ष – जो अक्सर शासन में होता है – भयभीत हो जाता है यह सोचते हुए कि आंदोलन उग्र होकर हिंसक रूप ले लेगा । हालिया अन्ना हजारे आंदोलन जब देशव्यापी हो गया तो सरकार को भय लगने लगा कि स्थिति विस्फोटक हो सकती है । अन्यथा कई जन अहिंसक विरोध का रास्ता अपनाते हैं, लेकिन असफल रहते हैं ।

अहिंसक विरोध: संदिग्ध सफलता

मेरा अनुभव यह है कि अहिंसक विरोध/आंदोलन तभी सफल होता है जब उठाया गया मुद्दा समाज को व्यापक स्तर पर उद्वेलित करता है । स्वाधीनता-पूर्व गांधीजी का आंदोलन, आठवें दशक का जेपी आंदोलन, और हालिया अन्ना हजारे का आंदोलन इसलिए सफल हुए – अगर आप सफल मानते हों तो – क्योंकि उठाया गया मुद्दा लोगों की सहभागिता पा सका और उन्हें आंदोलन से जोड़ सका । लेकिन जब मुद्दा क्षेत्रीय स्तर की अहमियत रखता हो या एक सीमित जनसमुदाय की दिलचस्पी का हो, तब सफलता की संभावना घट जाती है । वास्तव में जैसे-जैसे मुद्दे की व्यापकता घटती जाती है, वैसे-वैसे अहिंसक आंदोलन/विरोध की सफलता भी कम होते जाती है । देखने में तो यही आता है कि जब विरोध करने वाला अकेला या केवल दो-चार व्यक्तियों का समूह होता है, तब वह असफल ही हो जाता है । हरिद्वार में गंगा बालू उत्खनन रोकने के लिए अनशनरत स्वामी निगमानंद की मृत्यु इसी तथ्य की पुष्टि करता है । ऐसे अवसरों पर हिंसक आंदोलन ही कुछ हद तक सफल होते हैं, या शासन उनको दंड के सहारे दबा देता है, जो उसकी हिंसक नीति दर्शाता है ।

अहिंसक आंदोलन तभी सफल होता है जब विरोधी पक्ष में किंचित् संवेदना, लज्जा, विनम्रता एवं दायित्व भाव हो । जिसमें ये न हों उसका मन आंदोलन को देख पसीजेगा यह सोचना ही मुर्खता है । आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में लोग निहायत स्वार्थी एवं संवेदनशून्य होते जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में अहिंसा की वकालत करना बेमानी हो जाता है ऐसा मेरा दृढ मत है ।

गांधी दर्शन: केवल अहिंसा ही नहीं

गांधीजी की चर्चा अहिंसा के पुजारी के तौर पर की जाती है । लोग यह भूल जाते हैं कि गांधीजी के अन्य बातें मानव समाज के लिए अहिंसा से कम अहमियत नहीं रखती हैं । वे शारीरिक परिश्रम के पक्षधर थे । वे आ बात पर जोर देते थे हर इंसान को अपना निजी कार्य को यथासंभव स्वयं ही करना चाहिए । वे मानव-मानव के बीच असमानता के विरोधी थे । उनके मतानुसार हमारी नीतियां आर्थिक विषमता को घटाने वाली होनी चाहिए । वे ग्रामीण विकास, कृषि, एवं घरेलू उद्योगों की वकालत करते हैं । दुर्भाग्य से वर्तमान भारतीय समाज इन मूल्यों को भुला चुका है । कहां हैं गांधीजी अब ?योगेन्द्र जोशी

‘सीबीआइ की गृहमंत्री श्री चिदंबरम से पूछताछ’

पिछले दो-तीन दिनों से 2जी स्पेक्ट्रम के तथाकथित घोटाले का मुद्दा फिर से गरमाया है । बिना राज्य के ए. राजा देश के सुप्रसिद्ध कारागार तिहाड़ जेल में कई अन्य साथियों के साथ आजकल पिकनिक मना रहे हैं, या स्वाथ्यलाभ कर रहे हैं । सुनते हैं वहां की व्यवस्था उच्चतम श्रेणी की है । आप-हम जैसों को उस दिव्यस्थल के दर्शन भी पाना कठिन है, किंतु इन महानुभावों को वहां की हर सेवा उपलब्ध है । किस्मत अपनी-अपनी !

टीवी पर उक्त ‘घोटाले’ की असीमित चर्चा ने मेरे दिमाग पर पूरा कब्जा कर लिया है । उससे संबंधित सभी नेताओं-अभिनेताओं की बातें सोते-जागते खयालों में घूमती रहती हैं । कल ही रात नींद में मुझे सपना दिखा कि कैसे श्री चिदंबरम से पूछताछ होती है ।

सपने में देखता हूं कि विपक्ष के चिदंबरम-विरोध के मद्देनजर डा. सुब्रमण्यम स्वामी की इस मांग को शीर्षस्थ अदालत ने मान लिया है कि देश की सर्वाधिक ‘कार्यकुशल’ पूछताछ संस्था सीबीआई श्री चिदंबरम से पूछताछ करे । वैसे तो वे ग्रहमंत्री हैं, लेकिन तथाकथित घोटाले के दौरान वे ही वित्तमंत्री थे । बतौर वित्तमंत्री के उन्होंने अवश्य ही घोटाले में अहम भूमिका निभाई होगी ऐसा डा. स्वामी का कहना है । बहरहाल अदालत ने सीबीआइ को आदेश दिया कि जाओ श्री चिदंबरम से पूछो कि उन्होंने राजा की क्या मदद की थी ।

बेचारी सीबीआइ करे क्या ? वह तो श्री चिदंबरम के अधीनस्थ ग्रहमंत्रालय का एक अंग भर है । उसे हिम्मत तो नहीं कि अपने मालिक से कुछ पूछे, लेकिन कुछ तो करना ही था, आखिर अदालत को जवाब जो देना था ।  हिम्मत करके सीबीआइ के निदेशक महोदय अधिकारियों का एक दल गठित करते हैं । हर कोई ना-नुकुर करता है और जांचदल में शामिल होने से बचता है । निदेशक जी को कुछ पर तरस भी आता है, और वे उन्हें छूट भी दे देते हैं और दल में तेजतर्रार समझे जाने वाले कुछएक अधिकारी शामिल कर लिए जाते हैं । दल में शामिल ये लोग अपनी किस्मत को कोसते हैं कि कहां फंस गये, किंतु अपनी तेजतर्रार होने की छबि बचाए रखने के लिए हांमी भर देते हैं । उनमें से श्री हिकलानी को दल का नेता घोषित कर दिया जाता है ।

जांचदल दो-एक दिन ‘होमवर्क’ करने में जुटा रहता है, क्या करना है, क्या सवाल पूछने हैं, इत्यादि । और उसके बाद निकल पड़ता है श्री चिदंबरम से मिलने उनके कार्यालय । अपना परिचय देने हुए दल के नेता श्री हिकलानी मंत्री महोदय के निजी सचिव से मुलाकात की व्यवस्था करने को कहते हैं । अपना परिचय तो उन्होंने औपचारिकतावश दिया, अन्यथा उनके मंत्रालय के सभी अधिकारी तो उन्हें जानते ही हैं । मंत्रीजी के कक्ष में पहले से चल रही बैठक पूरी होने तक सचिव जी उनसे प्रतीक्षा करने को कहते हैं । दल के सदस्य अतिथि-कक्ष में इंतिजार करने लगते हैं ।

बैठक की समाप्ति के उपरांत मंत्री महोदय उन्हें अपने कक्ष में बुलाते हैं । सहमे-से हिकलानी जी अपने दल के साथ अंदर दाखिल होते हैं । मंत्री जी आरामदेह कुर्सी के सहारे पीठ टिकाए हुए उनकी ओर मुखातिब होते हैं और मुस्कुराते हुए सवालिया अंदाज में बोलते है, “कहिए हिकलानी जी, कैसे आना हुआ, वह भी इतने जनों के साथ ? सब खैरियत तो है न ?”

दल के प्रमुख जवाब देते हैं, “वैसे तो सब ठीक है सर, लेकिन …”, और क्षण भर के लिए चुप हो जाते हैं । मंत्री जी उन्हें आश्वस्त करते हुए पूछते हैं, “लेकिन क्या ? बेहिचक बताइए, मैं मदद करने की भरसक कोशिश करूंगा । आखिर देश का एक अहम महकमा है आपका, उसके कर्मी परेशानी में हों तो मैं भला निश्चिंत कैसे रह सकता हूं ?”

“सर, बात ये है कि देश की उच्च अदालत ने हमें परेशानी में डाल दिया है । अदालत कहती है कि पूर्व वित्तमंत्री और अब वर्तमान गृहमंत्री, यानी आप, से भी पूछो कि 2जी स्पेक्ट्रम में उनकी क्या भूमिका रही है । पता लगाओ कि उन्होंने ए. राजा की कितनी मदद की थी । अब आप ही बताएं हम आपसे क्या पूछें ?” दल के मुखिया ने कहा ।

“अरे इतनी-सी बात ? इसमें परेशान होने की क्या बात ? जो मैं बताऊं वह कोर्ट में जाकर उगल देना ।”

“वह तो ठीक है, सर । लेकिन खानापूरी के लिए कुछ सवाल-जवाब तो करने ही पड़ेंगे । हमने कुछ सवाल तैयार किए हैं । आप कहें तो आपके सामने पेश करें ?”

“ठीक है, पूछिए जो पूछना हो, मुझे क्या परेशानी होगी भला ।”

“वो तो हम भी जानते हैं, सर, कि मामले से आपका कुछ लेना-देना नहीं है । लेकिन करें क्या, हमारी भी मजबूरी है ।”

और फिर शुरू होता है सवाल-जवाबों का सिलसिला । मंत्री जी बिलाझिझक सवालों का जवाब फटाफट देने लगते हैं । अधिकतर सवालों के जवाब वे हां या ना में ही देते हैं, और कुछ के बारे में “मुझे नहीं मालूम” कहकर सीबीआइ को संतुष्ट करते हैं । एक सवाल के उत्तर में वे थोड़ा विचलित होते हैं और कहते हैं, “मुझे याद नहीं ।” और फिर उल्टे अधिकारियों से ही पूछ बैठते हैं, “अरे भई, आदमी की याददास्त इतनी मजबूत नहीं होती कि हर बात याद रह सके । आप ही बताइए कि पिछले महीने की 20 तारीख डिनर में आपने क्या लिया था ? याद नहीं ना ? फिर सोचिए कि बरसों पहले किससे क्या बात हुई यह कैसे मुझे याद आ सकता है ? लिखित रूप में कहीं कुछ बचा हो तो कह नहीं सकता ।”

दल के सदस्य समवेत स्वर में हां में हां मिलाते हुए कक्ष से निकलने को उद्यत होने लगते हैं । तब तक वहां चाय और कुछ स्नैक्स आ चुकते हैं । मंत्री जी चाय की चुस्की लेने का आग्रह करते हुए कहते हैं, “ये जरूर देख लीजिएगा कि भूल से आप कोर्ट में कुछ उल्टा-सीधा जवाब न दे बैठें ।”

फिर समवेत स्वर में उत्तर मिलता है, “यह सब कहने की जरूरत नहीं आपको, आप निश्चिंत रहें ।”

सपने के दृश्य अभी चल ही रहे थे कि मेरी आंख खुलती है और देखता हूं कि श्रीमती जी नींबू की चाय हाथ में लिए हुए मुझे जगा रही हैं ।

(नोटः वैसे तो मैं ही आम तौर पर सुबह की नींबू-चाय बनाता हूं और श्रीमती जी को भी पिलाता हूं । लेकिन इस बार संयोग से देर तक सोता ही रह गया, और रोज की मेरी भूमिका उन्होंने ही निभा ली । आगे यह भी स्पष्ट कर दूं कि यह सब मेरे सपने में घटित बात है, और इस वर्णन पर मेरा ‘कॉपीराइट’ है ! कह नहीं सकता कि यह सब हकीकत में कभी घटेगा कि नहीं ।) – योगेन्द्र जोशी

बेटे की करतूत – बाप की शर्मिंदगी (चीन की खबर)

“चीनी सेना के एक जनरल और गायक ने उस जोड़े से माफ़ी मांगी है जिसे उनके पुत्र ने सड़क पर हुई लड़ाई के दौरान पीट दिया था.”
ये हैं बीबीसी की इंटरनेट साइट (BBC website) पर छ्पी एक खबर के आरंभिक शब्द। खबर के अनुसार चीनी सेना के एक जनरल के बेटे और उसके साथी का सड़क पर एक दंपती से झगड़ा हो गया, जिसके बाद उन्होंने दंपती की पिटाई कर दी। घायल पति-पत्नी को अस्पताल में भरती कराना पड़ा। जनरल महोदय स्वयं अस्पताल पहुंचे जहां उन्होंने माफ़ी मांगते हुए ये शब्द भी बोले:
“पिता के तौर पर मैं अपने पुत्र के व्यवहार की ज़िम्मेदारी लेता हूं. मैं इतना शर्मिंदा हूं कि अब आप चाहें तो मेरी पिटाई कर दें. मैं अपने बेटे की ग़लतियों का पक्ष नहीं लूंगा.”

उक्त समाचार यह भी बताता है कि ऐसी ही एक घटना पिछ्ले वर्ष भी हुई थी जिसमें एक पुलीस उच्चाधिकारी के बेटे ने दो छात्रों को रौंदा था, जिसमें एक की बाद में मौत हो गयी। मीडिया में तब भी खूब चर्चा हुई थी और अपराधी को सजा भी दी गयी।

समाचार के अनुसार चीन में भी भारत की तरह उच्चपदस्थ अधिकारियों के बच्चे अपने बाप का रुतवा दिखाकर अपराधों से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन वहां के सख्त कानून के सामने वे हारमान हो जाते हैं। अपने यहां तो ऐसे बिगड़ैल युवकों के उच्च संबंध उन्हें बचाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं, और ये युवक बच निकलते हैं। यहां के बापों का माफ़ी मांगना तो असंभव-सा है। चीन में अपने बच्चों की गलत हरकतों के लिए माफ़ी तो मांगी जाती है। यहां तो चोरी और उपर से सीनाजोरी चलती है। कुछ फ़र्क तो है ही चीन और अपने महान्‌ देश में! – योगेन्द्र जोशी

अण्णा के अनशन की समाप्ति और सिमरन-इकरा की भूमिका

दिल्ली के रामलीला मैदान पर भूख-हड़ताल पर बैठे अण्णा हजारे जी ने कल पूर्वाह्न करीब 10 बजे अपना अनशन तोड़ दिया, और उसी के साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके अभियान का पहला एवं अहम चरण पूरा हुआ । आगे का कार्य देश के जनप्रतिनिधियों के हाथ में है । उम्मीद की जानी चाहिए कि वे टालमटोल का रास्ता न अपनाकर यथाशीघ्र (जन) लोकपाल बिल का अंतिम मसौदा तैयार करके उसे पास कर पायेंगे ।

अण्णा के अनशन तोड़ते समय उनको शहद एवं नारियल पानी पिलाने का कार्य किया दो छोटी बच्चियां: इकरा, 4 साल, समीना बेगम तथा शहाबुद्दीन की बेटी, और सिमरन, 5 साल, रेखा तथा बच्चू सिंह की बेटी ने । पहली मुस्लिम समुदाय की तो दूसरी हिंदू दलित वर्ग की थी । क्या राज था इनको खास तौर पर चुनने का ? खुलकर शायद कहा न जा रहा हो, लेकिन बात छिपी नहीं है ।

दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे अनशन के दौरान टीवी चैनलों के माध्यम से एक बात मेरे देखने में आई । मुस्लिम समुदाय तथा हिंदू दलित वर्ग के कुछ जन अण्णा के आंदोलन से नाखुश नजर आये, यहां तक कि वे विरोधी स्वर व्यक्त करने से भी नहीं बचे । कुछ जन तो यह भी कह बैठे कि यह आंदोलन दलित विरोधी है । उनका कहना था कि आंदोलन हिंदू सवर्णों के द्वारा चलाया गया है और उसमें दलितों एवं मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं है । ऐसे खयालात इन समुदायों के आम लोग कहते तो मैं उनकी बातों को तवज्जू न देता । लेकिन कहने वालों में बुद्धिजीवी भी शामिल थे ।

मुझे उनके तर्क हास्यास्पद और बेमानी नजर आते हैं । इस संदर्भ में निम्नांकित बिंदुओं पर तनिक विचार करेंः

■ (1)  

अण्णा का आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था और उसके निवारण के लिए सरकार पर दबाव डालने हेतु वे अनशन पर बैठे थे । उसके अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचने में अभी कितनी अड़चनें आएंगी कहना मुश्किल है । भ्रष्टाचार का मामला देश के किसी समुदाय से जुड़ा नहीं हैं । देश के अधिकांश लोग, विशेषकर कमजोर नागरिक जिनके पास धन, बाहुबल, राजनैतिक पहुंच या प्रशासनिक संरक्षण नहीं है, वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं । उक्त आंदोलन उसके निवारण की दिशा में उठाया गया कदम है । यह किसी तबके के हित-साधन में नहीं किया गया । तब किस आधार पर कुछ दलितों/मुस्लिमों को इससे विरोध था ?

■ (2)    

मैं समझता हूं कि आंदोलन का विचार समाज के 5-10 संवेदनशील जनों में पैदा हुआ होगा, और उन्होंने कुछ और लोगों को स्वयं से जोड़ते हुए अण्णा के नेतृत्व में मुहिम छेड़ दी होगी । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने समाज के किसी वर्ग विशेष से साथ देने के लिए सदस्यों को नहीं चुना होगा । जिसमें दिलचस्पी जगी होगी और जिसे भी सहभागिता निभाने में पर्याप्त समय तथा ऊर्जा लगाने की सामर्थ्य लगी होगी वह जुड़ा होगा । संयोग से यदि किसी समुदाय विशेष का कोई कार्यकर्ता इस मुहिम में नहीं शामिल हो सका हो तो इससे यह कहना कि यह आंदोलन उस खास समुदाय के विरुद्ध है सर्वथा अनुचित है । अगर किसी दलित/मुस्लिम ने आगे बढ़कर इसमें सहभागिता निभाने की बात की होती और उसको मना कर दिया होता तो वह विरोध का आधार बन सकता था । मुझे विश्वास है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा । ध्यान रहे कि आंदोलन उसकी व्यवस्था करने वालों तक सीमित नहीं था । दिल्ली तथा अन्यत्र आंदोलन में सम्मिलित होने वाले विशाल जन समुदाय में तो सभी तबकों के लोग थे । फिर विरोध कैसा ?

■ (3)    

जहां तक आंदोलन के कर्ताधर्ताओं में दलितों या मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का सवाल है, इस पर भी ध्यान देें कि कई अन्य समुदायों या सामाजिक तबकों के मामले में भी यह कहा जा सकता है । मुझे आंदोलन की केंद्रीय समिति में कोई सिख, इसाई या बौद्ध नहीं दिखा । ओर क्षेत्रीयता की बात करें तो कोई, बंगाली, असमी या कन्नड़ भी उसमें नहीं था । वे भी विरोध के पक्ष में तर्क दे सकते थे । तब फिर दलितों/मुस्लिमों को ही मौजूदा मामला नागवार क्यों  गुजरा ?

■  (4)    

इस संदर्भ में एक विचारणीय तथ्य यह है कि जिन मुद्दों पर जनांदोलन होते हैं उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है । पहली श्रेणी में वे आते हैं जो किसी खास सामाजिक वर्ग या भौगोलिक क्षेत्र से सरोकार रखते हों । मुस्लिम वर्ग के लिए आरक्षण की आजकल की जा रही वकालत और अलग तेलंगाना राज्य की मांग इस प्रकार के मुद्दे हैं । ऐसे मुद्दे देश के सभी नागरिकों को आकर्षित नहीं करते हैं । इसलिए इन मामलों में राष्ट्रव्यापी जनसमर्थन की आशा नहीं की जाती है । इनके विपरीत दूसरी श्रेणी में वे मुद्दे आते हैं जिनका ताल्लुक किसी खास समुदाय से या क्षेत्रविशेष से नहीं होता । महंगाई का मुद्दा इस श्रेणी का ज्वलंत उदाहरण है । भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे से अण्णा के आंदोलन का संबंध रहा है वह भी सभी से सरोकार रखता है । इन दोनों के मामले में जनसमर्थन देश के हर कोने से और हर तबके के नागरिक से मिल सकता है । इन मुद्दों को सवर्णों अथवा केवल हिंदुओं से जोड़ना किसी भी तरह से उचित नहीं है ।

अण्णा आंदोलन में मुस्लिमों या दलितों की सहभागिता के न दिखाई देने का कारण मुद्दे का संकीर्ण होना नहीं है । मेरा अनुभव यह है कि इन सामाजिक तबकों के सामाजिक कार्यकर्ता आम तौर पर केवल उन्हीं मुद्दों में दिलचस्पी लेते जो इन तबकों से संबंध रखते हों । वे अक्सर दलितों या मुस्लिमों के हितों तक ही अपने कार्य सीमित रखते हैं । ऐसे दलित/मुस्लिम कार्यकर्ता अधिक नहीं होंगे जो अपने-अपने समुदायों के हटकर सभी नागरिकों के हितों की बात करते हों । ऐसी स्थिति में इन समुदायों के लोगों की भागीदारी अण्णा आंदोलन के प्रबंधन में यदि नहीं दिखी तो इसमें आश्चर्य नहीं है ।

अंत में इस बात पर आपका ध्यान खींचता हूं कि अण्णा के अनशन तोड़ने में दो बच्चियों, सिमरन एवं इकरा, की खास भूमिका दलित एवं मुस्लिम वर्गों को यह बताने के लिए रही होगी कि आंदोलन के कर्ताधर्ताओं को इन समुदायों से कोई परहेज नहीं । उनका समर्थन सहर्ष स्वीकारा जाएगा यह संदेश उक्त घटना में निहित है । – योगेन्द्र जोशी

अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

आज देश को स्वाधीन हुए 64 साल हो रहे हैं । इस मौके पर कुछ लोग – मेरा खयाल है कि बहुत नहीं – उत्साहित हो रहे होंगे, उमंग में होंगे, प्रगति करते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहे राष्ट्र का सपना देख रहे होंगे, इत्यादि । मैं सोचता हूं कि कदाचित् अधिकांश जनों की नजर में यह दिवस औपचारिकता में मनाए जाने वाला दिन हो चुका होगा । और मेरे जैसे कुछ गिने-चुने जनों – जिन्हें आप भ्रमित या सनकी मानने में देरी नहीं करेंगे – की दृष्टि में यह अपनी सार्थकता खो चुका दिवस बनकर रह गया है । मुझे इस दिन कुछ भी नया नजर नहीं आता । कुछ ऐसा नहीं देख पाता हूं जो मुझे आशान्वित कर सके । सोचने लगता हूं कि क्या यह देश ऐसे ही चलता रहेगा ?

देश को आजाद हुए इतना समय बीत चुका है, जिसमें दो पीढ़ियां पैदा हो चुकी हैं । जिन्होंने देश को आजादी पाते देखा था उनमें से कई अब इस धरती पर नहीं रहे, और जो अभी हैं उनके अपने भविष्य के लिए इस आजादी के सार्थकता समाप्तप्राय मानी जा सकती है । स्वाधीनता की अर्थवत्ता तो उनके लिए है जिन्हें जिंदगी का सफर अभी तय करना है । क्या वे उस भारत को देख पाएंगे जिसका सपना उन लोगों ने देखा था, जिन्होंने छोटी-छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी तक कुर्बानियां दी थीं ? मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती । पिछले करीब चार दशकों से मैं इस देश के लोकतंत्र को देख रहा हूं, और इसकी गुणवत्ता में लगातार आ रही गिरावट को अनुभव करता आ रहा हूं । आज की तस्वीर वह नहीं है जिसे स्वाधीनता-संग्रामियों ने 1947 में अपने-अपने जेहन में संजोयी थी ।

कुछ लोग विभिन्न क्षेत्रों में देश की प्रगति की चर्चा करते हुए जरूर संतोष जताएंगे । वे लोग मेरे जैसे ‘वैचारिक अल्पसंख्यकों’ की सोच को बेतुकी, बेमानी, हास्यास्पद और निराधार इत्यादि कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे । वे कहेंगे कि देश ने न्यूक्लियर टेक्नालाजी (नाभिकीय तकनीकी) में महारत हासिल करके दुनिया को अपनी क्षमता दिखा दी है । उसने अपनी स्वयं की संचार सैटेलाइट एवं राकेट तकनीकी विकसित कर डाले हैं । देश अपने द्वारा विकसित मिसाइलों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हो रहा है । और इन बातों के आगे जाकर, 8-9 फीसदी आर्थिक विकास दर से बढ़ते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहा है । इस प्रकार तमाम दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए देश की स्वाधीनता एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता सिद्ध करेंगे ।

निःसंदेह इस प्रकार की उपलब्धियों का अपना महत्त्व है, जिसे मैं अस्वीकार नहीं करता । किंतु ये स्वतंत्रता की सार्थकता एवं लोकतंत्र की सफलता के आकलन के लिए उपयुक्त मापदंड नहीं माने जा सकते । स्वाधीनता संग्रामियों ने इस विचार के साथ संधर्ष नहीं किया था कि एक दिन देश सफल पोखरन विस्फोट कर पाएगा, या अग्नि मिसाइल विकसित करके अपनी क्षमता दिखा पाएगा, या चंद्रमा पर चंद्रयान उतारने में सफलता प्राप्त कर लेगा, इत्यादि । अगर देश आजाद न हुआ होता तो भी ऐसी चीजें शायद इस देश में हो जातीं, क्योंकि अंग्रेजों के लिए यह विशाल देश ऐसे वैज्ञानिक तंत्रों के विकास के लिए उपयुक्त भूक्षेत्र होता । वे अपनी सामरिक एवं संचार संबंधी आवश्यकताओं के लिए ऐसा कदाचित् करते ही, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने रेल पटरियों का जाल देश में विछाया, टेलीफोन एवं तारघरों की स्थापना की, विद्युत् आपूर्ति आंरभ की । इन सबकी शुरुआत स्वतंत्र भारत में नहीं हुई; हमने जो विरासत में पाया उसे आगे बढ़ाया । इस प्रकार के विकास कार्य विदेशी शासक भी अपने हित-साधन में अवश्य करते यह मेरी समझ कहती है । ऐसा होता या न इस बात की अहमियत उतनी नहीं जितनी वे बातें जिनका मैं जिक्र करने जा रहा हूं ।

याद रहे स्वाधीनता संघर्ष का मूल लक्ष्य था ऐसी शासकीय व्यवस्था स्थापित करना जो पूर्णतः देशवासियों के हाथ में हो, जिस पर हमारे देशवासियों का नियंत्रण हो, जो जनाकांक्षाओं के अनुरूप होतत्कालीन जननेताओं का सपना था ऐसे भारत का निर्माण करना, जहां लोगों के बीच समानता हो, लोग शिक्षित हों, जाति, धर्म एवं क्षेत्र के नाम पर सामाजिक भेदभाव न हो, न्यायिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त हो ताकि न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़े, भ्रष्टाचार न हो, राजनीति में पारदर्शिता और शुचिता हो, चिकित्सा सेवा निर्धनों को भी मिल सके, आर्थिक विषमता न्यूनतम हो, और जहां सरकारें जरूरतमंदों पर सबसे अधिक ध्यान दे । इस प्रकार के अनेकों बिंदु गिनाए जा सकते हैं जिनके आधार पर शासकीय व्यवस्था की सफलता का आकलन किया जाना चाहिए । ये वे बिंदु हैं जिनकी अहमियत आम आदमी की जिंदगी में हर क्षण बनी रहती है । चंद्रयान जैसे अभियानों से आम आदमी की जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता है ।

अवश्य ही किसी राष्ट्र के पुनर्निमाण के लिए 64 वर्ष का समय बहुत नहीं है । किंतु यह इतना समय तो है ही कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व सही दिशा में आगे वढ़ रहा है इस बात के प्रति देशवासी आश्वस्त हो पायें । क्या आज के हालात बेहतर कल का विश्वास दिला पा रहे हैं ? यह देश दो भागों में – इंडिया एवं भारत – में बंट चुका है इसे अब खुलकर कहा जाने लगा है । क्यों ? क्या देश में राजनीति में साफ-सुथरे छवि वाले नेताओं की संख्या घट नहीं रही है, और उसमें आपराधिक छवि के लोगों की संख्या क्या लगातार नहीं बढ़ रही है ? क्या जातीय, धार्मिक एवं क्षेत्रीय आधार पर लोगों को बांटकर अपने-अपने वोटबैंक बनाने की प्रवृत्ति घटने के बजाय बढ़ नही रही है ? क्या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार दिन-ब-दिन बढता नहीं जा रहा है ? क्या पुलिस बल लोगों की सहायक संस्था बनने के बजाय सत्तासीन राजनेताओं के हाथ में दमन का हथियार नहीं बन रहा है ? किसी ने सरकारी नीतियों एवं कार्यशैली का विरोध किया नहीं कि उस पर पुलिस का डंडा चल जाता है ! क्या सरकारी शिक्षा-संस्थानों की व्यवस्था चरमरा नहीं रही है, और उनकी जगह ‘प्राइवेट’ संस्थानों ने नहीं ले ली है, जो केवल पैसे वालों को शिक्षा देने और धनोपार्जन करने में विश्वास करती हैं ? क्या चिकित्सा व्यवस्था भी निजी व्यवसाय नहीं बन चका है, जिसका लाभ केवल राजनेताओं, सरकारी कर्मचारियों एवं अमीरों को मिल सकता है किंतु आम आदमी को नहीं ? उसके लिए जो अस्पताल हैं उनके हाल छिपे नहीं है ।

ये तो सवालों की बानगी है, असल में इस प्रकार के अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं और उनका उत्तर मुझे नकारात्मक और बेचैन करने वाला ही मिलता है । अगर आपको ऐसा कुछ भी नहीं लगता है, और चारों ओर अच्छा ही अच्छा नजर आता है तो मैं आपको भाग्यशाली मानता हूं । काश कि मेरी ‘वैचारिक दृष्टि’ इतनी धुंधली हो पाती कि हकीकत नजर न आ सके !

यह कैसा लोकतंत्र है इस पर गौर करिए । हमारे जनप्रतिनिधियों की विकृत सोच क्या है यह बताता हूं । कांग्रेस के नेता तो अब खुलकर कहते हैं कि आम आदमी का सोचने का अधिकार उसके वोट डालने तक ही सीमित है । उसके बाद उसकी सोच 5 साल तक जनप्रतिनिधि के हाथ गिरवी हो जाती है । क्या सही है और क्या गलत, क्या होना चाहिए और क्या नहीं, कैसे कानून बनने चाहिए और कैसे नहीं इन बातों पर अपनी राय देने का उसे अधिकार नहीं है; उसके विचारों की कोई अहमियत नहीं है । केवल प्रनिनिधि ही सोचने का अधिकार रखता है, और उसे भी अपने दल की विचारधारा के अनुसार ही मत व्यक्त करने का अधिकार है । उनके अनुसार हमारा संविधान कहता है (?) कि चुन लिए जाने के बाद समस्त अधिकार जनप्रतिनिधि को मिल जाते हैं और आम आदमी न मत व्यक्त कर सकता है न उसको लेकर विरोध प्रकट कर सकता है । सत्तासीन दल जो कहेगा उसे ही आम आदमी को अपनी राय समझनी होगी । कुल मिलाकर उसके विचारों का अपने लोकतंत्र कोई स्थान नहीं है । क्या लोकतंत्र की इसी परिभाषा प्रतिष्ठापित करने के लिए स्वाधीनता हासिल की गयी थी ?

सोचें और तनिक अपने वैचारिक ‘कोकून’ से बाहर निकलकर भी देखें । वंदे मातरम् । – योगेन्द्र जोशी