अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

क्या यीशु मसीह (Jesus Christ) का जन्म २५ दिसंबर को हुआ था? शायद नहीं!

आज क्रिसमस का पर्व है, 25 दिसंबर, जिसे ईसाई समुदाय के लोग यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर मनाते हैं।

     इस अवसर पर मैं सर्वप्रथम देशवासियों को, विशेष तौर पर अपने ईसाई बंधुओं को, बधाई एवं शुभेच्छाएं देना चाहता हूं।

विषय का आरंभ करने से पहले मैं यह बाताना चाहूंगा कि ईसाई धर्म जिस व्यक्ति के विचारधारा पर आधारित है उसका असल नाम यीशु (Jesus)  है। मेरा खयाल है कि यह नाम हेब्रू (Hebrew, इज़्राइलवासियों की भाषा, जिसमें यहूदियों के धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं) के उच्चारण के अनुरूप है। ध्यान दें कि यूरोप की भाषाओं में लैटिन (Latin) अल्फाबेट J का उच्चारण अंग्रेजी के अनुरूप (यानी ) हो यह आवश्यक नहीं, जैसे जर्मन भाषा में)। ग्रीक (यूनानी) मूल के शब्द क्राइस्ट (Christ) का शब्दिक अर्थ होता है मसीह/मसीहा। यह विशेष उपाधि के तौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो सामन्य से कहीं ऊपर उठ चुका हो और जिसे “बचाने वाला” कहा जाये। यीशू को लोगों ने मानवता को बचाने वाले के तौर पर देखा और उन्हें मसीह का दर्जा दे दिया।

मैं सुनता आया हूं कि यीशु मसीह का असली जन्मदिन वस्तुतः किसी को भी ठीक-ठीक नहीं मालूम है। इस विषय पर विस्तार से बहुत कुछ लिखा-कहा गया है। मुझे इस बारे में “Live Science” नाम की ई-पत्रिका का एक लेख पढ़ने को मिला है –

 http://www.livescience.com/42976-when-was-jesus-born.html

मैं उसी के आधार पर अधोलिखित बातें लिख रहा हूं।

लेख कहता है कि रोमन कैथोलिक चर्च ने काफी सोच-विचार के बाद 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर चुना था। दरअसल प्राचीन काल में जब ईसाई धर्म रोम तक पहुंचा तो धर्मप्रवर्तकों ने संघर्ष का रास्ता न चुन कर रोमन जनता को मिलमिलाप से अपने धर्म की ओर खींचना ठीक समझ। रोमन लोग (तथाकथित पैगन Pagans)  उस काल में अपने शनि देवता (Deity Saturn) के नाम पर सैटर्नालिया (Saturnalia) नाम के त्योहार को उत्तरायण (winter solstice) के मौके पर मनाते थे। धर्मप्रवर्तकों ने इसे यीशु के जन्मदिन के नाम पर मनाना आरंभ कर दिया ताकि वहां की परंपरा और ईसाई मान्यता में तालमेल बैठ सके। (अन्यथा ईसाई धर्म में शनि देवता की कोई मान्यता नहीं।) 25 दिसंबर चुनने के अन्य कारण भी कदाचित रहे होंगे।

कोई नहीं जानता कि यीशु क जन्म किस शताब्दी और तारीख पर हुआ था। विषय के जानकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ का मानना है कि उनका जन्म 6 से 4 बीसी (BC = before Christ) में हुआ होगा। बाइबिल की एक कथानुसार तब यूडिया (Judea ) के शासक हैरॉड (Herod) को यीशु के बेथलेहम (Bethlehem) में अपने शत्रु के रूप में पैदा होने का अंदेशा था, इसलिए उसने उस स्थान के आसपास के उस काल में पैदा हुए सभी बच्चों को मरवा डाला। (बेथलेहम यूडिया के अंदर स्थित था।) चूंकि हैरॉड स्वयं 4 बीसी में दिवंगत हो गया, अतः कथानुसार ईशु का जन्म 4 बीसी या पहले हुआ होगा, न कि शून्य बीसी में।

लेकिन इतिहासज्ञ उक्त कथा को सही नहीं मानते।

यीशु के जन्म के संदर्भ में कथा प्रचलित है कि उस समय एक नक्षत्र (बेथलेहम नक्षत्र Star of Bethlehem) आकाश मे दिखाई दिया था। लंदन की रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोशाइटी (Royal Astronomical Society) के खगोलविद कॉलिन हम्फ़्रीज़ (Colin Humphreys) का दावा है कि उक्त तारा वस्तुतः अतिमंद गति से चल रहा एक धूमकेतु रहा होगा जिसका उल्लेख चीनी खगोलविदों ने 5 बीसी में देखा था। अतः जन्मवर्ष 5 बीसी हो सकता है।

अन्य खगोलविद डेव रेनके (Dave Reneke) के अनुसार यीशु का जन्म 2 बीसी (जून 17) में हुआ होगा शुक्र तथा वृहस्पति ग्रह साथ आ गये होंगे और दोनों ने मिलकर तेज रोशनी के तारे का भ्रम पैदा किया होगा। रेनके ने कंप्यूटर माडल के आधार पर यह बात कही है।

दूसरे खगोलविदों के अनुसार इस प्रकार की घटना 7 बीसी (अक्टूबर माह) में हुई थी जब वृहस्पति एवं शनि ग्रह ने साथ-साथ आकर तेज प्रकाश के तारे का भ्रम पैदा किया।

धर्मवेत्तओं के अनुसार यीशु का जन्म वसंत ऋतु में हुआ था। बाइबिल की कथा के अनुसार यीशु के जन्म के समय गड़रिये अपनी भेड़ों को घास के मैदानों में चरा रहे थे। यह घटना जाड़ों में नहीं हो सकती है। – योगेन्द्र जोशी

विजयादशमी के पर्व पर व्यक्त विचार: बेचारा रावण

विजयादशमी के पावन पर्व पर
सभी देशवासी एवं विदेशवासी भारतीयों को
मेरी मंगलकामनाएं

आज विजयादशमी का पर्व संपन्न हो चुका है । देश भर में अपने-अपने तरीके से इस मनाया गया है । इस पर्व पर देश के कई भागों में रावण के पुतले के दहन की परंपरा प्रचलन में है । कहा जाता है कि जब भगवान् श्रीराम ने रावण का वध करके लंका पर विजय पाई और वे अयोध्या लौटे तब नगरवासियों ने हर्षोल्लास के साथ विजय पर्व मनाया था । उसी घटना की स्मृति में यह पर्व रावण-दहन के रूप में मनाया जाता है ।

विजयादशमी बुराई के ऊपर अच्छाई की, असत्य के ऊपर सत्य की, अनर्थ के ऊपर अर्थ की, कदाचार के ऊपर सदाचार की, स्वोपकार के ऊपर परोपकार की, जीर के रूप में देखा जाता है । रावण को बुराई के प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत करते हुए उसका दहन किया जाता है, और उस दहन को समाज में व्याप्त बुराइयों के खात्मे के संकेत के तौर पर देखा जाता है । रावण-दहन समाज की बुराइयों के खात्मे के संकल्प की याद दिलाता है, ऐसा समझा जा सकता है ।

क्या रावण-दहन वाकई में बुराइयों को दूर करने का संकल्प व्यक्त करता है, और क्या यह लोगों को अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे पाता है ? या यह एक विशुद्ध उत्सव भर है जिसे हम साल में इस दिन मनाते हैं और फिर अगले साल के उत्सव का इंतजार करते हैं । भले ही हम विजयादशमी के दिन संपन्न रावण-दहन की व्याख्या तरह-तरह से करें, हकीकत यह है कि यह भी होली-राखी के पर्व की तरह ही महज एक पर्व है – आज मनाया और साल भर के लिए भूल गए ।

मुझे नहीं लगता है कि लेखों-व्याख्यानों में कही जाने वाली ‘अच्छाई की जीत एवं बुराई की हार’ जैसी औपचारिक बातें वास्तविक जीवन से कोई ताल्लुक रखती हैं । मुझे तो यह मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों की तरह का एक और कार्यक्रम लगता है । बड़े-बड़े पुतले जलाओ, पटाखे छोड़ो, आतिशबाजी दिखओ, और एक दर्शनीय नजारा जुटी हुई भीड़ के सामने पेश करो, बस । बुद्धिजीवीगण राहण-दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर भले ही दर्ज करें, आम जन के लिए तो यह एक तमाशा भर है, जिसे देखने बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी भीड़ में शामिल होते हैं । रावण-दहन के बाद जिंदगी अपने ढर्रे पर चल निकलती है । जिसे घूस लेना है वह लेता रहेगा, जिसे दूसरे की संपदा हथियानी है वह हथियाएगा, जिसे कमजोर का शोषण करना है वह करता रहेगा, जिसे गुंडई-बदमाशी करनी है वह करेगा ही है । रावण का पुतला जले या न यह सब यथावत् चलता रहेगा । समाज में अच्छाई-बुराई का मिश्रण चलता रहेगा । फिर किस बात को लेकर बुराई पर अच्छाई की जीत कहें ? बुराई का प्रतीक तो जल जाता है, लेकिन बुराई बनी रहती है ! इस संसार का यही सच है ।

मैंने एसे अवसरों पर लोगों को कहते सुना है और लेखों में पढ़ा है कि हमें ‘यह करना चाहिए, वह करना चाहिए; ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए’ आदि-आदि । क्या वयस्क मनुष्य इतना नादान होता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं का ज्ञान ही न हो ? अगर विशेषज्ञता स्तर की बात हो तो संभव है कि आम आदमी को बहुत कुछ समझाना पड़े । जैसे आदमी को यह बताने की आवश्यकता होती है कि हृद्रोग से कैसे बचा जाए, इंटरनेट कैसे काम करता है, केमिस्ट्री में पॉलिमराइजेशन क्या होता है, भौतिकी का सापेक्षता सिद्धांत क्या है, इत्यादि । लेकिन एक व्यक्ति के समाज के प्रति क्या कर्तव्य हैं यह भी कोई बताने की चीज है ? क्या यह भी किसी से कहा जाना चाहिए कि उसे नियम-कानूनों का पालन करना चाहिए और अपराध नहीं करना चाहिए । हम सब ये बातें बखूबी जानते हैं, लेकिन आदत से बाज नहीं आते हैं ।

इसमें दो राय नहीं कि यदि सभी लोग अपने-अपने हिस्से के कर्तव्य निभाएं तो समाज में बुराइयां ही न रहें । लेकिन ऐसा होता नहीं है । किसको क्या करना चाहिए यह तो सभी बता देते हैं, परंतु यह कोई नहीं बताता कि जब कोई कर्तव्य-पालन नहीं करता तो क्या करें । मुझे आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बता सके कि तब क्या करें । आप अपराध करने वाले को सजा दे सकते हैं (वह भी इस देश में कम ही होता है !), लेकिन वह अपराध ही न करे, उस प्रवृत्ति से बचे, इसके लिए कोई क्या करे ? कुछ नहीं कर सकते न ! तब भ्रष्टाचार यथावत् बना रहेगा ।

रावण हर वर्ष जलेगा । बार-बार जलने के लिए उसे अस्तित्व में बना रहना है । रावण की अहमियत बनी रहे इसके लिए भ्रष्टाचार को भी बने रहना है । बेचारा रावण, समाज उसे बार-बार मरने को मजबूर करते आ रहे हैं । हा हा हा … ! जय हिंद – योगेन्द्र जोशी

आज 21 जून फादर्स डे – जून का तृतीय रविवार

आज ‘फादर्स डे’ (Fathers’ day) है । मदर्स डे की भांति यह भी पश्चिम से अपने देश में आयातित एक और पर्व-दिवस है, और उसी की तरह हालिया डेड़-दो दशकों में देश के मध्यम तथा उच्च वर्गीय शहरी नवयुवाओं में लोकप्रिय हो चला है । इसे क्यों और कैसे मनाया जाए जैसे कुछ सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए, इसलिए कि अपने यहां तो उत्सवों और दिवसों की पहले से ही भरमार है । उनकी तुलना में इन आयातित दिवसों को अधिक अहमियत देना क्या उचित माना जा सकता है इस बात की समीक्षा की जानी चाहिए । अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने से पहले मैं इस ‘दिवस’ के बारे में उपलब्ध किंचित् जानकारी का संक्षेप में जिक्र करना समीचीन समझता हूं ।

कहा जाता है कि ‘फादर्स डे’ मनाने का विचार प्रथम बार एक अमेरिकी महिला, सोनारा लुई स्मार्ट (Sonora Louise Smart), के मन में तब आया जब वह वेस्ट वर्जीनिया के फेयरमॉंट नगर ( Fairmont, West Virginia) के एक चर्च (आज का Central United Methodist Church) में धर्मोपदेश सुन रही थीं । उपदेष्टा ने अपने कथनों में प्रसंगवश ‘मदर्स डे’ की चर्चा की थी । उस चर्चा से प्रेरित होकर सुश्री सोनारा को विचार आया था कि क्यों नहीं मदर्स डे की भांति फादर्स डे भी मनाया जाए, जिस दिन लोग अपने पिताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें । वस्तुतः सोनारा अपने पिता से बहुत प्रभावित रहीं, जिनके प्रति उनके मन में अपार सम्मान था । मां की छत्रछाया तो वह किशोरावस्था में ही खो चुकी थीं और उनके जीवन का अधिकांश भाग पिता के ही संरक्षण एवं सान्निध्य में बीता था । फादर्स डे के मूल में यही तथ्य कारगर था ।

शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, दिस डे, दैट डे …

बीते कल ‘मदर्स डे’ था, मई मास का दूसरा रविवार । मीडिया में इसका खूब जिक्र था, खूब प्रचार था । शहरी नवयुवाओं-नवयुवतियों ने खूब उत्साह से इसे मनाया होगा ऐसा मेरा अनुमान है । ग्रामीण अंचलों में इसका ‘क्रेज’ अभी शायद नहीं पहुंचा है । मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे आदि कुछ दिवस हैं जो हालिया वर्षों में पश्चिम से अपने देश में आयातित हुए हैं, कोई दो-ढाई दशक पहले । वैसे देश में दिवसों की कोई कमी कभी नहीं रही । कभी किसी ‘महापुरुष’ के जन्मदिन के नाम पर, तो कभी देश की किसी स्मरणीय उपलब्धि के नाम पर, और कभी किसी राष्ट्रीय/अंताराष्ट्रीय समस्या के प्रति जागरूकता फैलाने के नाम पर, इत्यादि । अधिकांश दिवस राष्ट्रीय महत्त्व रखते हैं, परंतु दिखावे के शौकीन आधुनिक संपन्न शहरी नवयुवाओं-युवतियों के मन में उनके प्रति विशेष आकर्षण नहीं रहता । किंतु ‘सामाजिक संबंधों’ को औपचारिकता का जामा पहनाने वाले उक्त दिवस अवश्य आकर्षण रखने लगे हैं ।

‘मदर्स डे’ नाम से कोई पर्व या उत्सव अपने देश में कभी मनाया जाता रहा हो ऐसा मेरी जानकारी में तो नहीं है । अन्य प्राच्य देशों में भी कहीं इस प्रकार के किसी दिवस का जिक्र सुनने को नहीं मिलता है । मैंने अंतरजाल से जानकारी जुटाई तो पता चला कि आजकल के ‘मदर्स डे’ का इतिहास पुराना नहीं है । वैसे इस बात का उल्लेख किया जाता है कि प्राचीन काल में यूनान में ‘मातृ उत्सव’ मनाने का चलन था । इसे वहां वसंत ऋतु में देवी-देवताओं की जननी ‘रीआ’ (Rhea), धनधान्य एवं वंशवृद्धि की देवी, की पूजा के रूप में मनाया जाता था । रोम में वही देवी ‘ऑप्स’ (Ops) के नाम से पुकारी तथा पूजी जाती थी । ‘एशिया माइनर’ क्षेत्र में उक्त देवी ‘सिबली’ (Cybele) के नाम से पुकारी जाती थी ।

शेष के लिए यहां >> क्लिक करें