रिओ ओलंपिक पदक एवं खजाने की लूट: अंधेर नगरी चौपट राजा

Opening Rio Olympics 2016

अगस्त 5 से 21, 2016, तक चले सत्रह-दिवसीय रियो ओलंपिक खेलों में आरंभिक 13-14 दिनों तक तो भारतीय दल का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उस दौरान मेरी पत्नी एवं मुझ सरीखे कुछ लोगों को लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि 118-सदस्यीय भारतीय खिलाड़ियों के दल को एक भी पदक न मिले। (इस बार का दल अपेक्षया बड़ा था 2012 के 83-सदस्यीय दल की तुलना में।)

(विभिन्न देशों द्वारा प्राप्त पदकों की तालिका लेख के अंत में दी गयी है।)

दो पदकों पर जश्न

खैर देशवासियों की किस्मत अच्छी रही कि पहला पदक महिला कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक पाने में कामयाब रहीं। देश की जनता इस उपलब्धि पर इतनी खुश हुई कि जैसे ओलंपिक के सभी पदक देश की झोली में आ गये हों। लोग तुरंत जश्न मनाने में जुट गये। हरियाणा सरकार ने बिना देर किये साक्षी को 2.50 करोड़ का पुरस्कार भी दे डाला। भारतीय रेलवे ने भी समय गंवाये बिना 50/60 लाख के इनाम की घोषणा कर डाली और साथ में नौकरी में पदोन्नति भी। सुनने में आया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं अनूठे व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी ने भी दिल खोल के ईनाम देने का ऐलान कर दिया, एक करोड़ की राशि देने के वादे के साथ। (देखिए इकनॉमिक-टाइम्ज़ तथा इंडियन-एक्सप्रेस)

साक्षी की उपलब्धि पर देशवासी झूम ही रहे थे कि खबर आई कि बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधु प्रतिस्पर्धा के क्वार्टर-फ़ाइनल की बाधा पर करके सेमी-फ़ाइनल में पहुंच गयीं हैं। बाद में सेमी-फ़ाइनल की बाधा पार करके उन्होंने अपने नाम एक पदक  पक्का कर लिया। इसके बाद देशवासियों को उम्मींद होने लगी कि स्वर्ण पदक उनके नाम होना है। स्वर्ण पदक लिए भजन-पूजन, हवन-यज्ञ और दुआओं का दौर भे चल पड़ा ताकि उन टोटकों से पदक की गारंटी में शक ही न रहे। दुर्भाग्य कि इन टोटकों ने कोई कमाल नहीं दिखाया और जैसा कहा जाता है विश्व की खिलाड़ी नंबर एक के सामने वह कमजोर ही रहीं। कुछ भी हो रजत पदक को तो वह बटोर के ले ही आईं । खैर पदकों के लिए तरसते देश के लिए यह मरुभूमि में पानी पाने की खुशी से कम नहीं था।

कांस्य पदक विजेता को 2.50 करोड़ तो रजत पदक विजेता का “रेट” अधिक होना ही था। तेलंगाना सरकार ने 3 करोड़ तो कुछ ऐसी या कम राशि आन्ध्र सरकार ने भी उनकी झोली में डाल दिए। केजरीवाल जी क्यों पीछे रहते? उन्होंने भी दिल खोल के पुरस्कृत कर दिया। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार सिंधु को करीब 13 करोड़ की प्राप्ति हुई। समाचार है कि विज्ञापन कंपनियां उनसे अनुबंध के लिए कतार में खड़े हो चुके हैं।

इन दो खिलाड़ियों के लिए स्वागतार्थ समारोह और जलूस भी अपूर्व रहे। स्वागत में तो दीपा कर्माकर (जिमिनास्ट में चतुर्थ स्थान-प्राप्त) भी शामिल की गयीं यद्यपि उन पर खास धनवर्षा नहीं हुई।

पदक तालिका में इंडिया दैट इज़ भारत

उक्त रिओ ओलंपिक में भारत की स्थिति कितनी दयनीय रही इस हेतु मैंने उपलब्ध पदक-तालिका का अध्ययन किया और जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न देशों की स्थिति के लिये एक सूचकांक M/P = मेडल (पदक) संख्या प्रति लाख पोप्युलेशन (जनसंख्या) भी परिभाषित किया है। (देखिए तालिका लेख के अंत में।) तालिका में उन देशों के नाम नहीं हैं जिनको एक भी पदक नहीं मिला है।

गौरतलब है कि 6 स्वर्ण के साथ 11 पदक जीत कर 16वें क्रम पर स्थित जमैका (आबादी केवल 28 लाख) जैसे छोटे देश के लिए M/P = 0.3929 सर्वाधिक है। दरअसल छोटे देशों के लिए M/P अपेक्षया अधिक है। क्रम में 67वें स्थान पर भारत के लिए न्यूनतम, 0.0002 है। उसके ऊपर नाइजीरिया है M/P = 0.0005 के साथ। अन्य सभी देशों के लिए यह 0.0010 से अधिक है।

इस सूचकांक को मैं महत्वपूर्ण इसलिए मानता हूं क्योंकि सांख्यकीय सिद्धांतों के अनुसार मानव-कार्यकलाप के किसी भी क्षेत्र में दक्ष लोगों की संख्या आबादी के लगभग अनुपात में होगी ऐसी उम्मीद सामान्यतः की जाती है। इसे शब्दशः नहीं लिया जा सकता है किंतु बहुत बड़ी आबादी वाले देश में अधिक दक्ष लोग तो होने ही चाहिए। इसलिए भारत जैसा देश दो पदक भी मुश्किल से पा सका इसके निहितार्थ पर चिंतन तो होना ही चाहिए।

खजाने का दुरुपयोग

देश के नाम अधिक पदक नहीं आये इसका देशवासियों के लिए भावनात्मक महत्व है, किंतु इससे देश की व्यवस्था और खुशहाली पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। मुझे जिस बात पर घोर आपत्ति है वह है पदक-प्राप्त दोनों खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने के लिए सरकारों द्वारा राजकोष यानी खजाना लुटाना । अधोलिखित बातों पर जरा विचार करें।

(1) मुझे याद नहीं आता कि पहले कभी खिलाड़ियों पर रातोंरात करोंड़ों रुपये लुटाये गये हों। एक समय था जब देश में क्रिकेट बेहद लोकप्रिय था (आज भी है), लेकिन खेल के माध्यम से उसके खिलाड़ी लाखों नहीं कमा सके (तब लाख ही बहुत होता था)। उनमें से अधिकतर स्टेट बैंक या रेलवे में नौकरी करते थे। उस काल में विज्ञापनों की दुनिया इतनी चमकदार नहीं थी। लेकिन आज के समय में विज्ञापन-दाता कंपनियां दिल खोल कर पैसा खर्च कर रही हैं और अपने विज्ञापनों के लिए लब्धप्रतिष्ठ खिलाड़ियों और सिने-टीवी कर्मियों आदि के साथ करोड़ों का अनुबंध स्वीकरती हैं। अब ऐसे खिलाड़ियों को नौकरी नहीं करनी होती है। जहां तक मेरा अनुमान है सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन की करोड़ों की संपदा उनके व्यवसाय एवं विज्ञापनों से प्राप्त हुई है। ये दो नाम मात्र उदाहरण के लिए हैं, अन्यथा सूची तो लंबी होगी। सरकारी खजानों से उनको बहुत मिला हो मुझे नहीं लगता। जैसा पहले कहा है विज्ञापन-प्रदाता कंपनियां पदक-प्राप्त खिलाड़ियों से अनुबंध के लिए आतुर रहती हैं। अस्तु, चाहे पहले हो या आज, खिलाड़ियों पर सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाना उचित नहीं कहा जायेगा।

(2) मैं सोचता हूं कि 6 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 16 पदक जीतने वाले जमैका की सरकार ने खिलाड़ियों को कितने करोड़ों से नवाजा होगा? तुलना के लिए ध्यान रहे कि भारत की अनुमानित आबादी 130 करोड़ से ऊपर है और जमैका की मात्र 28 लाख। वहां की प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय है करीब 8000 डॉलर और भारत की करीब 5000 डॉलर।

(3) मेरे मन में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि कई अन्य देशों की तरह अपने यहां भी 15-16 खिलाड़ियों ने पदक जीता होता तो उनको सरकारी खजानों से कितना-कितना मिला होता? और हमारे विशिष्ठ व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी तब अपने खजाने से कितनों पर कितना लुटाते? ध्यान दें जिन दो पदक विजेताओं को उन्होंने करोड़ों से पुरस्कृत किया है उनका दिल्ली राज्य से सीधा संबंध नहीं। यह सवाल भी मेरे मन में उठता है कि क्या परिणाम होते यदि सभी राज्य सरकारें दिल खोलकर खजाना लुटाने चल देतीं? तब ये खिलाड़ी दो दिन में ही कितने करोड़ों के मालिक हो जाते?

(४) मेरी दृष्टि में सर्वाधिक आपत्तिजनक है राज्य के खजानों को लेकर सरकारों का रवैया। किसी जमाने में राजे-महाराजे राजकीय कोशों के मालिक होते थे। उनके लिए खजाना अपनी निजी संपत्ति होती थी। उसे जैसे चाहें वे खर्च करते थे। वे किसी पर खुश हो गये तो उसे गले का हार दे देते थे या खजांची को आदेश देते थे कि स्वर्ण मुद्राओं से उसे नवाजा जाये। क्या लोकतंत्र में शासन चलाने वाला जनप्रतिनिधि-मंडल अर्थात मंत्री-परिषद के साथ मुख्यमंत्री खजाने का मालिक होता है जिसे जैसे चाहे अपनी मरजी से खर्ज करे? अथवा वे राजकोष के रखवाले या संरक्षक होते हैं जिनसे अपेक्षा रहती है कि वे जनहित में उस कोष का इस्तेमाल करें – जनहित जो जनता की समझ में भी आवे? बिना किसी पूर्वनिर्धारित नियमों के जैसी मरजी हुई वैसे खजाना लुटा देने को भी जनहित कह देना न्यायसंगत कहा जायेगा क्या? जिन सरकारों ने खिलाड़ियों पर खुल कर खजाना लुटाया उन्होंने किन कायदे-कानूनों के तहत ये सब किया?

(4) मेरी आपत्ति और भी गंभीर हो जाती है जब ये सरकारें स्कूलों, अस्पतालों, की हालत सुधारने में धन खर्च नहीं करतीं, वेतन बचाने के चक्कर में खाली पड़े पदों को नहीं भरतीं, असंपन्न किसानों के छोटे-मोटे कर्जों को माफ़ करके उन्हें आत्महत्या से नहीं बचाती। सरकारी लापरवाही से हुए हादसों में परिवारों के कमाऊ सदस्य चल बसते हैं, सरकारें उनके लिए भी 2-3 लाख का मुवावजा बहुत समझती हैं। और खिलाड़ियों पर करोड़ों? वाह मेरे देश का लोकतंत्र! जरा सोचिए सफ़ाई कर्मियों को तनख्वाह देने में केजरीवाल जी जल्दी नहीं करते परंतु खिलाड़ियों पर धन लुटाने में उन्हें देर नहीं लगती।

(5) प्रबुद्ध जन इस तथ्य पर विचार करें कि विश्व का सर्वाधिक चर्चित पुरस्कार भी गत वर्ष केवल 6.5 करोड़ का था। वह भी स्वीडन की सरकार नहीं बल्कि आल्फ़्रेड नोबेल की दानराशि से स्वीडिश अकादमी देती है। मेरी जानकारी में किसी नोबेल पुरस्कार विजेता पर संबंधित देश की सरकार धनवर्षा नहीं करती। क्या हमारी कोई सरकार धनवर्षा करेगी यदि कोई नोबेल पुरस्कार जीते? इस पर भी गौर करें कि केंद्रीय सरकार का सबसे बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार भी केवल 25 लाख रुपये का है। प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार (साहित्य) मात्र 11 लाख रुपये का है। देश में बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार गैर-सरकारी संस्था इंफ़ोसिस साइंस फ़ाउन्डेशन देती है वह भी 55 लाख का है। तब सवाल उठता है कि क्या ओलंपिक पदक की अहमियत विज्ञान, साहित्य आदि की उपलब्धियों से बड़ी है?

अंधेर नगरी

ऐसी विकृत शासकीय व्यवस्था को भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी ने कभी “अंधेर नगरी चौपट राजा” के विशेषण से संबोधित किया था।

Olympic Medals Tally

“सचिन, सचिन, सचिन …” का जाप अंततः खत्म हुआ भारत रत्न के राष्ट्रीय सम्मान के साथ

Sachin & Rao   सर्वत्र छाया सचिनगुणगान !

पिछले कुछ दिनों से टेलिविजन समाचार चैनलों, विशेषतः हिन्दी चैनलों, पर और कई अखबारों में सचिन छाए हुए हैं । जिधर देखो सचिन की महानता का गुणगान चल रहा है, और उनको देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान “भारत रत्न” दिए जाने की मांग जोर-शोर से उठती रही है ।

जिधर देखो उधर “सचिन” , “सचिन”, “सचिन” …। “क्रिकेट के भगवान सचिन”, “क्रिकेट के महानायक सचिन”, “सचिन, गॉड ऑफ क्रिकेट ”, आदि-आदि । आगे “सचिन”, पीछे “सचिन”, अगल “सचिन”, बगल “सचिन”। बस केवल “सचिन”। मैं समाचार चैनलों को खोजता रहा इस उम्मीद के साथ कि कहीं कोई सार्थक समाचार प्रसारित कर रहा हो जिसे देखूं-सुनूं । प्रायः निराश ही रहा । दुनिया में रोज कुछ न कुछ तो घटता ही रहता है, कहीं अच्छा तो कहीं बुरा, कभी अधिक अहम तो कभी कुछ कम । लेकिन “सचिन” के नाम पर सभी चैनल सब कुछ भूल गए । केवल “सचिन” की चर्चा । माफ करें कि मुझे कहना पड़ रहा है कि “सचिन”, “सचिन”, “सचिन” … सुनते-सुनते मेरे तो कान पक गये ।

क्रिकेट की दीवानगी स्पष्ट कर दूं कि मुझे “सचिन” से कोई शिकायत नहीं है । व्यक्तिगत तौर पर मैं क्रिकेट को एक घटिया, उबाऊ, और समय की बरबादी वाला खेल मानता हूं । मुझे याद नहीं कि मैंने आज तक कभी मैदान में अथवा टी.वी. पर्दें पर क्रिकेट मैच देखा हो, शायद छात्र-जीवन में भी नहीं । लेकिन अनेकों भारतीय क्रिकेट देखते हैं । मुझे इसमें कोई दोष नहीं दिखता । मैं नहीं देखता, किंतु कई – सब नहीं – क्रिकेट देखते हैं पूरी तल्लीनता से । निःसंदेह इस देश में क्रिकेट इंग्लैंड से भी अधिक लोकप्रिय बन चुका है ।

मुझे दिक्कत तब महसूस होती है जब लोग दीवाने ही नहीं, बल्कि उसके आगे पागलपन की हद पर पहुंच जाते हैं । यह पागलपन “सचिन” को लेकर भी मुझे देखने को मिल रहा है । मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा पागलपन क्यों । कल ही एक समाचार चैनल पर देख रहा था कि किस तरह कुछ युवतियां “सचिन” की तस्वीर सजा के “जै सचिन बाबा …” (“जय जगदीश हरे …” की तर्ज पर) का “भजन” गा रही थीं । ये सब मुझे दिमागी दिवालियापन ही लगता है ।

किसी व्यक्ति के हुनर या कला की तारीफ करना, उसका प्रशंसक होना, समुचित अवसर के अनुकूल उसकी चर्चा करना ठीक है । लेकिन सब कुछ भुला के उसी का यशोगान करना ठीक लगता है क्या ?

सचिन को भारत रत्न का सम्मान “सचिन” के मामले में तो बात कहीं अधिक आगे तक बढ़ी है “भारत रत्न का सम्मान दो” की मांग के रूप में । हर तरफ से आवाज उठने लगी । मौजूदा सरकार के शीर्षस्थ प्रबंधक तो पहले से ही “सचिन” के कायल रहे हैं । उन्होंने और अधिक देर किये बिना उक्त सम्मान “सचिन” पर निछावर भी कर दिया । (भारत रत्न सम्मान-सूची देखें यहां अथवा यहां)

लगे हाथ एक और व्यक्ति को भी भारत रत्न का सम्मान मिल गया – वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.एन.आर. राव, जिनका कार्यक्षेत्र रसायन(केमिस्ट्री)-भौतिकी(फिजिक्स) रहा है । भौतिकी विषय का अध्यापक/वैज्ञानिक होने के नाते मैं प्रो. राव के बारे में थोड़ा-बहुत जानता हूं, लेकिन मुझे शंका है कि रसायन-भौतिकी से इतर क्षेत्रों के कम ही वैज्ञानिक उनके बारे में जानते होंगे । तब भला आम जन उनके बारे में कितना जानते होंगे यह समझा जा सकता है ।

वस्तुतः आम लोग राजनेताओं, फिल्मी हस्तियों और चर्चित खिलाड़ियों को छोड़ अन्य क्षेत्रों के लोगों को कम ही जानते हैं । “सचिन” के लिए भारत रत्न का जैसा हल्ला मचाया जा रहा था वैसा प्रो. राव के लिए कोई नहीं मचा सकता है, फिर भी उन्हें यह सम्मान मिल ही गया । निःसंदेह वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक हैं और देश-विदेश से अनेकों सम्मान/पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं । वे स्वयं राजनेताओं के बारे क्या सोचते हैं इसे देखिये:

“….why the hell these idiots, these politicians have given so little for us. Inspite of that, we scientists have done something,” Prof. Rao said, losing his cool.

अब प्रो. राव यह अवश्य कहते हैं कि यह तो वे मजाक में कह गये थे । कोई व्यक्ति कम गंभीरता से बोलता है और कब मजाक में यह जान पाना इस ‘महान’ देश में संभव नहीं ! भारत रत्न की मांग औरों के लिए भी सचिन के भारत रत्न की चर्चा सर्वत्र बारंबार पूरे जोर-शोर से हुई और उन्हें चहुं ओर से बधाइयां भी मिल गयीं । उसके बाद और लोगों को भारत रत्न क्यों नहीं जैसे सवाल उठने लगे हैं । यों पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेई, बंग राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु एवं राजनीति में दलितों को स्थापित करने वाले कांसीराम के लिए पिछले कुछ समय से इस सम्मान की मांग उठती आ रही है । अब बाजपेई जी के लिए भा.ज.पा. अधिक मुखर होकर नये सिरे से मांग कर रही है, जिसका समर्थन कई अन्य लोग कर रहे हैं । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाजपेई के साथ राममनोहर लोहिया एवं कर्पूरी ठाकुर की भी वकालत कर डाली है । एक बात दिलचस्प है । सचिन के लिए भरत रत्न की मांग जितने जोरशोर से चारों ओर से हुई है वह अपने आप में अद्वितीय है । ऐसा हल्ला शायद आज तक किसी व्यक्ति के लिए देश के इतिहास में अभी तक नहीं मचा था । यह हल्ला क्रिकेट के प्रति कुछ लोगों का अनन्य लगाव और सचिन के प्रति पागलपन का द्योतक है । मैं इसका विरोधी हूं, लेकिन किसी के पागलपन का इलाज भला मैं कैसे कर सकता हूं ? सचिन को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए यह बात जनता दल (यू) के शिवानंद तिवारी अपने तर्कों के साथ कह चुके हैं । ऐसे बहुत जन हैं जो पूछते हैं कि हॉकी के ‘जादूगर’ ध्यानचंद को यह सम्मान क्यों नहीं दिया गया । भारत रत्न – समुचित प्रक्रिया का अभाव बहुत-से लोगों का मत है कि “भारत रत्न” का सम्मान बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यह निश्चित करना मुश्किल है कि कौन इसके योग्य है और कौन नहीं । वस्तुतः यह कुछ हद तक राजनीति की चपेट में आ चुका है । मेरी जानकारी में इस सम्मान के योग्य पात्र के चुनाव की कोई कारगर और विवादमुक्त प्रक्रिया है भी नहीं । बहुत कुछ राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री की मरजी पर निर्भर करता है । जिस प्रकार पहले कभी राजे-महाराजे उस व्यक्ति को स्वेच्छया पुरस्क्त कर देते थे जिससे वे खुश हो जाते थे, कुछ उसी प्रकार केंद्र सरकार करती है ।

सचिन के मामले से यह स्पष्ट होता है कि जिसके पीछे इस सम्मान की मांग करने वाले समर्थकों की फौज खड़ी हो जाए वह सम्मान पा जाता है । यह भी निश्चित है कि यदि केंद्र में अगली बार भा.ज.पा.-नीत सरकार बन गई तो बाजपेई जी को भारत रत्न का सम्मान मिल जाएगा ।

अभी तक की स्थिति यह है कि एक वर्ष में अधिकतम 3 व्यक्तियों को ही यह सम्मान दिया जा सकता है । इस स्म्मान के स्थापना के समय देश की जनसंख्या मात्र 30 करोड़ से कम थी । आज वह 4 गुनी हो चुकी है । समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय लोगों की संख्या 4 गुनी से भी अधिक हो चुकी है, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, खेल-कूद, विविध कलाओं आदि के क्षेत्र में यही स्थिति है । तब क्या भारत रत्न सम्मानों की संख्या भी 4 गुनी यानी 12 नहीं कर देनी चाहिए ?

मैं स्वयं को इस योग्य नहीं मानता कि किसे भारत रत्न मिले यह बता सकूं । इतना कहना काफी है कि सचिन ने क्रिकेट से लगभग सन्यास लेने के साथ ही भारत रत्न पा लिया तो एक अध्याय बंद हुआ । मैं उम्मीद करता हूं कि दो-चार दिन और मीडिया पर सचिन-चर्चा होगी और फिर वक्त-बेवक्त “सचिन-चालीसा” मुझे नहीं सुननी पड़ेगी । कुछ तो सुकून मिलेगा ! – योगेन्द्र जोशी

पुनश्च:

आज के अखबार की खबर है कि बिहार के कैमूर जिले में “भगवान सचिन” के नाम पर बने मंदिर में उक्त “भगवान” की मूर्ति का अनावरण गायक मनोज तिवारी द्वारा किया गया है । इस मंदिर में लोग नये “भगवान” की पूजा अर्चना करेंगे और कदाचित अपने दु:ख-दर्दों से मुक्ति की प्रार्थना कर सकेंगे ।

मेरा देश वाकई महान है ।

यहां जो व्यक्ति असाधारण उपलब्धि पा लेता है और तमाम लोगों का चहेता बन जाता है वह अंततः भगवान का दर्जा पा जाता है । यह देशवासियों में व्याप्त हीन भावना का द्योतक है कि लोग स्वयं को ऐसे व्यक्ति के समक्ष दीन-हीन पाता है और स्वयं को बराबरी पर सोच ही नहीं सकता है । भक्तों की दृष्टि में तो बाबा आसाराम-बाबा साई भी भगवान हैं !

क्रिक्रेट, क्रिक्रेट, बस क्रिक्रेट, और कुछ नहीं!

         पिछले 10-12 दिनों से टेलीविजन चैनलों पर मुझे क्रिक्रेट में स्पॉट फिक्सिंग के समाचारों के अलावा कुछ और सुनने को मिल ही नहीं रहा था । देश-विदेश में इस बीच बहुत कुछ हो गया, परंतु टीवी चैनलों को क्रिक्रेट के अलावा कुछ और समाचार सूझ ही नहीं रहे थे । देश में कहीं हत्या में 7 जनों के परिवार का सफाया हो रहा था तो कहीं गोदाम जल रहा था । अमेरिका में कहीं तूफान ने तबाही मचाई तो कहीं पुल टूट गया । ऐसी अनेक खबरें रही होंगी, किंतु टीवी चैनलों को क्रिक्रेट से फुरसत ही नहीं थी । श्रीसंत, विंदु दारासिंह, मयप्पन, श्रीनिवासन, आदि । बस घूमफिर कर इन्हीं को लेकर खबरें । यों कहिए कि उनके लिए क्रिक्रेट एक तरफ और सारा जहां दूसरी तरफ, फिर भी क्रिक्रेट भारी । या खुदा क्या कभी ऐसा भी कोई दिन आयेगा जब क्रिक्रेट का भूत ‘इंडियावासियों’के दिलोदिमाग से भाग जाये ?

दुर्योग से 25 की तारीख पर नक्सल आतंकियों ने क्रांग्रेस पार्टी की रैली पर ऐसा कहर बरपाया कि पूरा देश हिल गया । टीवी चैनलों को भी कुछ देर के लिए अपना बल्ला थामकर इस नये दुःसमाचार का प्रसारण करना ही पड़ा । पर ऐसा नहीं कि क्रिक्रेट-समाचार उन्होंने छोड़ दिया हो, बस थोड़ा विराम के साथ, कुछ कम जोश के साथ प्रसारण चलता रहा । इस देश में तो क्रिक्रेट की चर्चा के बिना ‘न्यूज’का आरंभ अथवा अंत सोचा ही नहीं जा सकता है ।

          बहुत से लोगों के मुख से मैंने सुना है कि इस देश के लिए क्रिक्रेट ‘रिलीजन’ बन चुका है, यानी एक ऐसी चीज जिसके बिना आप जीवन ही व्यर्थ समझने लगें, ऐसी चीज जो आपके तार्किक चिंतन की सामर्थ्य ही छीन ले । जैसे आप रिलीजन के मामले में सवाल नहीं उठाते हैं (वह रिलीजन ही क्या जिस पर आस्थावान शंकास्पद प्रश्न पूछने लगे), वैसे ही आप आंख मूदकर क्रिक्रेट का पक्ष लेते हैं, उसके अंधभक्त बने रहते हैं । कभी यह सवाल नहीं पूछते कि क्रिक्रेट की ऐसी दिवानगी भली चीज है क्या ? मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो सब कुछ छोड़ क्रिक्रेट मैच के लिए टीवी पर चिपक जाते हैं; कमरे में बैठे-बैठे कंमेंटेटर बन जाते हैं; तालियां पीटने लगते हैं; खिलाड़ी के खेल में मीनमेख निकालते हैं; आदि-आदि ।

         देश में क्रिक्रेट की दीवानगी इस कदर फैली है कि कुछ लोग खिलाड़ियों को पूजते पाए जाते हैं, उन्हें भगवान कहने लगते हैं (ऐसा करना स्वयं भगवान का निरादर करना तो नहीं होगा ? किसी और खेल के मामले में मैंने ऐसा समर्पण भाव नहीं देखा !) । वे टीम-विशेष की जीत क लिए पूजापाठ करने बैठ जाते जाते हैं; प्रिय टीम की हार पर उपद्रव मचाने से भी नहीं कतराते हैं; और मामला इंडिया-पाकिस्तान का हो तो कहना ही क्या । जैसे शराबी बिना शराब के बेचैन हो जाता है; जुआबाज बिना जुआ खेले रह नहीं पाता; नशेड़ी नशे के बिना जी नहीं पाता; वैसे ही क्रिक्रेट के दीवाने क्रिक्रेट के खेल के बिना रह नहीं सकते ।

         ऐसा पागलपन समाज के लिए ठीक है क्या ? क्या दुनिया में और खेल नहीं हैं क्या ? बच्चों-युवाओं को अन्य खेलों के प्रति प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए क्या ? ऐसे अनेकों प्रश्न मेरे दिमाग में उठते रहते हैं । ये सवाल लोगों के दिमाग में क्यों नहीं उठते ? मैं तो क्रिक्रेट का खेल सपने में भी नहीं देख सकता, जागृत अवस्था में तो सवाल ही नहीं !

जिस आई पी एल की आजकल धूम मची है वह खेल नहीं है । वह किसी के लिए जुआ है तो और के लिए धनकमाई का एक और धंधा है । खिलाड़ियों की नीलामी की जाती है तो यों ही नहीं । जब यह एक बिजनेस बन चुका हो जिसके रास्ते सभी संबंधित पक्ष पैसा कमाना चाहते हों तो वहां उल्टा-सीधा बहुत कुछ होना ही है । अधिकाधिक दर्शकों को आकर्षित करने के लिए टीवी चैनलों पर रातदिन प्रसारण करना ही होगा । ऐसे में अन्य समाचार गौण बन जाएं तो आश्चर्य ही क्या ? सट्टेबाजी तो आदमी के धन-लोलुपता का सीधा परिणाम है । तीन-चार दिन पहले और कल फिर स्थानीय अखबार में खबर थी कि वाराणसी के श्मशान घाटों (हरिश्चंद्र एवं मणिकर्णिका) पर आने वाले शवों को लेकर भी सट्टेबाजी की जा रही है कि घंटे भर में कितने शव आएंगे । सट्टेबाजी आदमी के चरित्र में है, लेकिन यह वहां नहीं दिखती जहां अधिक लोग मामले में दिलचस्पी नहीं दिखाते । चूंकि क्रिक्रेट में दिलचस्पी लाखों-करोड़ों की है इसलिए यह सट्टे के लिए बेहतर धंधा है ।

चूंकि अब क्रिक्रेट कमाई का लाजवाब धंधा बन चुका है, अतः संबंधित पक्ष चाहेंगे कि इसको खूब प्रचारित-प्रसारित किया जाए और अधिक से अधिक लोगों को इसकी ओर खींचा जाए । इस क्रिक्रेट में चियर गर्ल्स क्यों शामिल होती हैं? सोचिए । क्रिकेट को लोगों के दिमाग में ठूंसने में टीवी चैनलों एवं समाचारपत्रों की भूमिका बहुत अहम हो चुकी है । क्या वजह है कि वे कहलाते तो न्यूज चैनल हैं लेकिन हकीकत में क्रिक्रेट चैनल बन के रह गये हैं । इन चैनलों का काम होना चाहिए कि सभी प्रकार के समाचार वे प्रसारित करें, किंतु जैसा मैं कह चुका हूं पिछले कुछ दिनों से वे केवल क्रिक्रेट की ही बात करते रहे हैं । अगर उनसे पूछा जाए कि ऐसा क्यों है तो वे रटा-रटाया तर्क (कुतर्क?) पेश करेंगे: “दर्शक तो क्रिक्रेट के बारे में ही सुनना चाहते हैं, और हम वही तो दिखायेंगे जो वे चाहते हैं ।”ठीक है, पर अपने को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया को लोगों में क्रिक्रेट की दिवानगी बढ़ने का काम करना चाहिए या उन्हें यह समझाना चाहिए कि अति ठीक नहीं । इसी अति का नतीजा है जो हम आज देख रहे हैं । न हम दीवाने होते और न ही क्रिक्रेट अन्य सभी खेलों को निरर्थक बना देता । क्रिक्रेट की दीवानगी बढ़ाने में टीवी चैनलों की जबरदस्त भूमिका रही है इसे कोई नकार नहीं सकता है । मुझे तो यह शंका होने लगी है कि इन चैनलों को भी बीसीसीआई (BCCI) द्वारा कुछ अनुचित लाभ पहुचाया जाता होगा । मेरे पास प्रमाण नहीं है, लेकिन क्रिक्रेट और केवल क्रिक्रेट की बात वे यों ही नहीं करते होंगे । – योगेन्द्र जोशी