गण्तंत्र दिवस 2017 – खोया अधिक और पाया कम

आज 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद शासकीय व्यवस्था के लिए स्वीकृत संविधान के प्रभावी होने के प्रथम दिन (सन् 2050) की स्मृति में मनाये जाने वाला राष्ट्रीय उत्सव।

इस अवसर पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी हृदय से शुभेच्छाएं।

विगत वर्ष की एक स्मराणीय बड़ी शासकीय घटना “विमुद्रीकरण अर्थात् नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों से अब कुछ हद तक देशवासी उबर चुके होंगे, और बचीखुची अड़चनों से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे यह मेरी आशा और अपेक्षा है।

देशवासी आज के दिन हर्षित होंगे ही। अपने लोकतंत्र की सफलता को लेकर काफी हद तक संतुष्ट एवं भावी काल के लिए आशान्वित होंगे ही। मैं स्वयं को एक अपवाद के रूप में देखता हूं। कदाचित कुछ गिनेचुने अन्य जन भी मेरी तरह सोचते होंगे। मैं इस दिन, और इसी प्रकार स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), पर खुद को संतुष्ट नहीं पाता।

क्या हमारे गणतंत्र की खामियां – जो भी रही हों – समय के साथ दूर हुयी हैं? क्या हमारी राजनीति दिन-ब-दिन सुधार की दिशा में अग्रसर हुई है? क्या जिन उद्येश्यों के साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई थी वे पूरे हुए हैं? या उनके पूरे होने की ओर हम संतोषप्रद तरीके से बढ़ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्न जब मेरे मन में उठते हैं तो मैं स्वयं को संतुष्ट नहीं देख पाता। मेरी सोच और दृष्टि में दोष है, अथवा वस्तुस्थिति ही जैसी होनी चाहिए उसके निकट नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अन्य जन ही मुझे दे सकते हैं।

इसके पहले कि मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूं मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कुछ लोगों की नजर में गणतंत्र (अंग्रेजी में रिपब्लिक) जनतंत्र/लोकतंत्र (डेमोक्रसी) का ही पर्याय है। हमारे गणतंत्र में देश के राज्य गणतांत्रिक इकाइयां हैं, जिनमें से प्रत्येक स्वयं में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाये है। मुझे शंका है कि संघशासित प्रदेश (यूनियन-गवर्न्ड टेरिटरी) एक इकाई वाली इस परिभाषा में आते हैं कि नहीं। वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं अतः “गण” की परिभाषा उन पर लागू नहीं होती है। अतः मेरे मत में देश को किंचित् परिवर्तित गणतंत्र कहना अधिक उचित होगा। अस्तु, इस बात को विशेष महत्त्व देने की जरूरत नहीं।

मेरा अनुभव मुख्यतः उत्तर प्रदेश और उस पर विशेषतया मेरे शहर वाराणसी पर आधारित हैं। हो सकता है अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर हो, लेकिन कुल मिलाकर हम शासकीय व्यवस्था के गिरावट के दौर से गुजर्र रहे हैं ऐसा मेरा मानना है।

वापस अपने उपर्युक्त शंकाओं/प्रश्नों पर। जीवन के सातवें (यानी साठ का दशक) पूरा करने के निकट पहुंचे वरिष्ठ नागरिक के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि मैंने राजनीति एवं लोकतंत्र की पर्याप्त समझ अर्जित की है। क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है में भेद कर सकने में मैं काफी हद तक सक्षम हूं। मुझे नेहरू-काल के अंतिम दिनों की याद है। याद है उस समय के चीनी आक्रमण की। याद है उस काल के पीएल480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आयातित जीरा सदृश लाल गेहूं की। याद है जब कांग्रेस ही एक प्रकार से देश में एकछत्र राज कर रही थी और “नेहरू के बाद कौन संभालेगा देश को” जैसी कुछ लोगों की चिंताओं की। याद है जब अन्य राजनैतिक दल अस्तित्व में आ रहे थे। किशोरावस्था से वयस्कता के सोपन पर चढ़ते हुए एक नागरिक के तौर पर शासकीय व्यवस्था की मेरी समझ तब नितांत अपरिपक्व रही होगी यह मैं स्वीकारता हूं। कालान्तर में नौकरी-पेशे (विश्वविद्यालय अध्यापन) में आने पर और प्रशासनिक/नागरिक व्यवस्था के संपर्क में आते-आते तथा मतदान का अधिकार पाते-पाते विषय की मेरी समझ में शनैः-शनैः परिपक्वता आते गयी । हाल के डेढ़-दो दशकों में तो विषय को समझने में रुचि विशेषतः बढ़ गयी। मेरे विचारों से अन्य जन सहमत हों मैं इस मुगालते में कभी नहीं रहता। मेरी शंकाएं:

(1) हमारे संविधान की प्रस्तावना में साफ उल्लिखित है कि हम देशवासी इस राष्ट्र को “पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के रूप में स्वीकारते हैं। पंथनिरपेक्ष शब्द श्रीमती गांधी ने संधोधन के तौर पर शामिल किया था। देश का स्वरूप बदला नहीं। देश को संविधान-निर्माताओं ने आरंभ में ही “सेक्युलर” क्यों नही कहा? यह बात विचारणीय है। खैर, मेरी आपत्ति है “समाजवादी” पर है। क्या देश को बाद के राजनेता समाजवाद की ओर ले गये? आज अमीर और गरीब की खाई तब से बहुत बढ़ गयी। क्या एक समाजवादी देश में यह होना चाहिए था?

(2) संविधान जातिमुकत होने की लालसा व्यक्त करता है। शुरुआती दौर में जाति और धर्म वोट के आधार पर नहीं होते थे। समय के साथ राजनीति में आयी नई पीढ़ी के नेताओं ने इन भावनाओं को भुनाकर वोटबैंक बना डाले। यही अपेक्षा की गयी थी क्या?

(3) पुराने जीवित बचे लोग बताते थे कि वोट पाने के लिए आज की तरह बेतहासा धन खर्च नहीं होता था। सुनते है कि अब सांसद/विधायक बनने के लिए करोड़ों दांव पर लगाये जाते हैं। यह भी कहा जाता कि पार्टियों के टिकट के लिए करोड़ों की बोली लगती है। यह हमारे नेताओं के सच्चरित्र होने का द्योतक है क्या?

(4) पिछले तीन-चार दशकों में धनबलियों, बाहुबलियों और आपराधिक छबि वालों की राजनीति में तादाद बढ़ती गयी है। सांसंदों/विधायकों में उनकी दागदार छवि वालों की संख्या 30% के आसपास बतायी जाती है। क्या ऐसा शुरुआती दौर में था?

(5) वर्तमान समय में राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों का एक ही सिद्धन्त रह गया है कि कोई सिद्धांत नहीं। विशुद्ध मौकापरस्ती। जहां लाभ उधर चलो की नीति। इसलिए दलबदलुओं की भरमार है सभी दलों में। जिसे जिताऊ समझते हैं उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। जो कल तक सेक्युलर था वह आज सांप्रदायिक बन जाता है, दक्षिणपंथी समाजवादी बन जाता है। सिद्धांतहीनता व्यक्तियों में ही नहीं दलों में होती है जो सिद्धांतहीनों का बढ़चढ़कर स्वागत करते हैं, बेशर्मी से अपने कदम सही ठहराते हुए।

(6) आज की राजनीति में परिवारवाद चरम पर है। और बड़ा बेहूदा तर्क (कुतर्क?) पेश किया जाता है। कहते है डाक्टर का बेटा-बेटी डाक्टर, वकील का बेटा-बेटी वकील, उद्यमी (बिज़नेसमैन) का बेटा-बेटी उद्यमी तो राजनेता का बेटा क्यों नहीं राजनेता हो सकता है? वाह ! मेरा सवाल है कि क्या राजनीति भी डाक्टरी, वकालत, उद्यमिता इत्यादि की तरह का ही धंधा है? जीवन-यापन और धन कमाने का व्यवसाय है क्या राजनीति? जिन व्यवसायों से तुलना की जाती हैं उसमें समाजसेवा या सामाजिक व्यवस्था को सुचारु और कुशल बनाने का ध्येय नहीं होता है। उन व्यवसाय में लगे हाथ कोई समाजसेवा करता है तो यह उसकी रुचि होती है न कि व्यवसाय के स्थापित एवं स्वीकृत उद्येश्य का कार्य। हर व्यवसाय में पहले अनुभव और योग्यता हासिल किये जाते हैं। इस पर भी गौर करें कि स्वाधीनता के बाद के भारत में जो नये नेता आये वे बाप-दादाओं की विरासत पर नहीं आये बल्कि अपने बल पर आये, लेकिन उन्होंने ही अपनी अगली पीढ़ी को विरासत के नाम पर आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता संघर्ष वाले कितने नेताओं की बहू-बेटियां राजनीति में हैं? तो आज के नेताओं के कितने हैं? सोचिये!

(7) आज वोट की राजनीति नकारात्मक है न कि सकारात्मक। दूसरे दलों में कमियां खोज-खोजकर वोट बटोरे जाते हैं। कोई यह नहीं कहता है कि देश/प्रदेश के दीर्घकालिक हितों के लिए उसकी क्या योजनाएं हैं। जनसंख्या, चिकित्सकीय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक गुणवत्ता की बातें करता है कोई? तो क्या ऐसी वोट की राजनीति ही वंछित लोकतंत्र है?

(8) लोकलुभावन वादों के साथ आज के नेता मैदान में उतरते हैं। कोई स्मार्ट्फोन बांटने की बात करता  है, तो कोई मुफ्त अनाज देने की, कोई मुफ़्त बिजली-पानी देने की बात करता है? इत्यादि। खजाना देश का लुटे और वोट तथा सत्तासुख हम भोगें इस नीति पर राजनैतिक चल रहे हैं। देश का भला ऐसे ही होगा क्या?

इस प्रकार के तमाम सवाल उठते हैं मन में। अब आप ही बतायें कि राजनीति की किस बात पर संतोष अनुभव किया जाये? – योगेन्द्र जोशी

विडंबना: उच्च अदालतों का स्वदेशी नामकरण किंतु देश का नाम इंडिया ही रहेगा

हाईकोर्टों के नाम-परिवर्तन का निर्णय

बॉम्बे एवं मद्रास उच्च न्यायालयों का नाम बदलकर क्रमशः मुम्बई तथा चेन्नै न्यायालय करने के निर्णय को केन्द्र सरकार की कैबिनेट कमिटी (काबिना समिति?) ने मंजूरी दे दी है ऐसा समाचार मीडिया में देखने-पढ़ने को मिल रहा है । समाचार के अनुसार विचार तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के नाम के स्वदेशीकरण का भी था, किंतु वह अभी शायद उस आदेश में शामिल नहीं है । समाचार कितना पुष्ट है यह मैं नहीं जानता, किंतु निराधार तो नहीं ही होना चाहिए । मैंने तत्संबंधित समाचार हिन्दी में दैनिक जागरण एवं दैनिक भाष्कर नामक अखबारों में पढ़ा । अंगरेजी अखबारों में भी उक्त समाचार उपलब्ध है । उदाहरणार्थ द हिन्दू में इस शीर्षक के साथ समाचार छपा हैः Now, Bombay, Madras and Calcutta High Courts to bear city names.

उक्त समाचार को ब्रितानी अखबार दि टेलीग्राफ ने Bombay and Madras High Courts to abandon British colonial names शीर्षक के साथ समाचार को प्रमुखता दी है । इस शीर्षक के अनुसार अदालतों के ब्रितानी उपनिवेशीय नामों को हटाकर उनको देशज यानी स्वदेशी नाम देना जनभावना के अनुरूप है । अखबार ने शिवसेना नेता अरविन्द सावन्त के हवाले से कहा है “यह तो सरकारी मुलाजिम हैं जिन्होंने समस्या पैदा की है । अदालतें भी बदलाव चाहती हैं । सरकार की नौकरशाही ऐसा करना नहीं चाहती है । इसमें अभी और पांच वर्ष लग सकते हैं ।”

नाम बदलने की परंपरा

अपने देश में राज्यों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है । अभी कुछ दिन पूर्व हरियाणा के शहर गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्रामकर दिया गया । इस बदलाव पर लोगों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त की थीं । नाम बदलाव का सरकारी तर्क था कि यह उसका प्राचीन नाम रहा है । रहा होगा, लेकिन आज तक तो वहां के लोग शहर को गुड़गांव ही कहते आ रहे हैं । नाम बदलाव का विचार किसके दिमाग की उपज थी और उसके विषय में कितनों के विचार जाने गये यह मुझे नहीं मालूम ।

एक बार मैंने जिज्ञासावश कुछ नाम-परिवर्तनों को इंटरनेट (अंतरजाल) पर खोजा था । उनमें से कुछ का उल्लेख करना समीचीन होगाः

राज्य असम (आसाम), ओडिशा (उड़ीसा), पश्चिम बंग (वैस्ट बंगाल), पुदुच्चेरी (पांडुचेरी)|

शहर कन्याकुमारी (केप कोमारिन), कोज़ीकोड (कालीकट), कोलकाता (कैलकटाध्कलकत्ता), गुवाहाटी (गौहाटी), चेन्नै (मद्रास), तिरुअनंतपुरम (त्रिवेन्द्रम), पणजी (पंजिम), पुणे (पूना), बंगलूरु (बैंगलोर), मुम्बई (बॉम्बे), विशाखापत्तनम (वालटेयर), विजयपुर (बीजापुर)| (पुराने नाम कोष्ठकों में)

परिवर्तित नामों की सूची लंबी होगी; उसे ढूंढ़ने का अधिक प्रयास मैंने नहीं किया । कई शहरों के राजमार्गों के नाम भी बदले ही गये होंगे । अपने उत्तर प्रदेश राज्य के हाल ये हैं एक सरकार किसी जिले का पसंदीदा नाम चुनती है तो दूसरी सरकार उसे बदलने की कोशिश करती है । संस्थानों के साथ भी यह खिलवाड़ होता रहता है ।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस दल की नीति रही थी (अभी भी होगी) कि हर नयी संस्था, मार्ग, पुल, आदि का नाम यथासंभव प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एवं उनके वंशजों के नाम पर होवे, गोया कि यह देश उस एकल परिवार की बपौती हो । जनोपयोगी योजनाओं के साथ भी यही किया गया । अब मौजूदा सरकार यथासंभव उन्हें बदलने की कोशिश कर रही है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । मुझे याद आता है कि कभी दिल्ली के कनॉट सर्किल एवं कनॉट प्लेस को इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के नाम पर नया नाम दिया गया था । वे नाम किसी को याद भी हैं इस पर मुझे शंका है । दिल्ली जाइए और उन्हीं पुराने नामों को लोकमुख से सुनिए ।

नाम-परिवर्तनो की आम जनों में कितनी स्वीकार्यता है इस पर मुझे शंका है । यह देश की आवश्यकता है या महज वोट के खातिर जनता को लुभाने की कोशिश ? या सामाजिक सक्रियता के शौकीन और “राष्ट्रीयता” की भावना से उत्साहित लोगों के मांग का परिणाम ?

अंगरेजी का वर्चस्व ठीक, अंगरेजी नाम नहीं !

वापस बात उच्च न्यायालयों के नाम परिवर्तन के मुद्दे पर । अधिकतर लोग अदालतों को न्यायालय न कहकर कोर्ट ही कहते हैं यह मेरा मानना है । बहुत हुआ तो उन्हें अदालत कह दिया । न्यायालय तो आम बोलचाल में कम ही लोग कहते है । आज के अंगरेजी स्कूलों में पढ़े युवाओं को तो यह शब्द मालूम न हो तो आश्चर्य नहीं होगा ।

नाम बदलने का विचार राजनेताओं से शुरु होता है और जनभावनाओं के उभार के रूप में आगे बढ़ता है । बदलाव के पीछे बहुत गंभीर कारण रहते हों और बदलाव की उपयोगिता को आंका जाता हो ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जैसा आरंभ में उल्लिखित द टेलीग्राफ अखबार में कहा गया है नाम-परिवर्तन के पीछे का सशक्त तर्क यह है कि अंगरेज उपनिवेश काल की पहचान रखने वाले नामों का देशीकरण होना चाहिए । मैं स्वयं इसका पक्षधर हूं किंतु इस कार्य में विसंगति कितनी है इस पर विचार किए बिना नहीं ।

गुड़ खाये और गुलगुले से परहेज

(पाठकवृन्द क्षमा करें मुझे मुहावरा ठीक-से याद नहीं ।) अंगरेजी विरासत के तौर पर जो नाम देश में प्रचलित हैं उनको देशज नामों से संबोधित किया जाए यह बात कहने-सुनने में अच्छी लगती है । परंतु इस कार्य में मुझे विसंगति के दर्शन होते हैं । जिस देश में पग-पग पर अंगरेजी का साक्षत्कार होता हो, प्रायः सभी दस्तावेजी कार्य अंगरेजी में किए जाते हों, जिस देश का संविधान अंगरेजी में हो, उच्चतम न्यायालय का कार्य अंगरेजी में होता हो, अंगरेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही हो, देशज भाषाओं के विद्यालय बंद होने के कगार पर हों, वहां अंगरेजी नामों को बदलने का औचित्य ही क्या है । अब तो हालात यह हैं कि हिन्दीभाषी हिन्दी में अपनी बात नहीं कह सकते बिना अंगरेजी शब्दों के प्रयोग के । जब देशवासियों को अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं तो अंगरेजी नामों से परहेज क्यों ?

यह देश है ही विचित्र । यदि नाम ही बदलना है तो सबसे पहले देश का नाम बदला जाना चाहिए । इस देश का नाम “भारत” होना चाहिए या “इंडिया”?  इंडिया नाम अंगरेजों का दिया हुआ है न कि इस देश का मौलिक या प्राचीन नाम है । विष्णुपुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को भारतवर्ष या भारत कहा गया है । तब हम इसे भारत क्यों नहीं कहते ? सब जगह इंडिया ही क्यों सुनने को मिलता है ? यहां तक कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी भी अपने नारे इंडिया के नाम ही गढ़ते है, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, आदि-आदि । ऐसी स्थिति में अदालतों और अन्य संस्थाओं के अंगरेजी नाम हटाने का आडंबर क्यों ?

पहले इस देश का नाम “भारत” किया जाना चाहिए तब अन्य नाम बदलने का तुक बनता है । इस बारे में मेरे अपने तर्क हैं और प्राचीन ग्रंथों का आधार भी, जिनकी चर्चा मैंने अपने ब्लॉग (दिनांक 15 जून 2016) में की है ।

अदालतों के ब्रितानी नाम बदल दो किंतु देश को इंडिया ही कहते रहो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है । – योगेन्द्र जोशी

और प्रसंग से कुछ हटकर   

यह देश भारत, जिसे विदेशी ही नहीं देशवासी भी इंडिया नाम से संबोधित करना पसंद करते हैं, विविधताओं, विचित्रताओं, विसंगतियों और विरोधाभासों का देश है । यहां इतना कुछ एक साथ देखने को मिल सकता है जो विश्व के किसी अन्य देश में संभव नहीं लगता, न चीन में और न ही संयुक्त राज्य अमरीका  में; छोटे देशों में तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती । अतः मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि अपने आप में अद्भुत, अद्वितीय, अनूठे देश में जन्मा हूं मैं, जिसे प्राचीन मनीषियों ने भारतवर्ष नाम दिया था और जिस नाम से मैं स्वयं इसे संबोधित करना चाहूंगा । – योगेन्द्र जोशी

15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस – कैसी स्वतंत्रता, कैसा जश्न?

कल ही की बात है । निकट में रहने वाले समाज के कमजोर तबके में शामिल मेरे हमउम्र पड़ोसी ने चलते-चलाते अपने शहर की दुर्दशा का दुखड़ा सुना डाला । “देखिए टूटी-फूटी सड़कें, अभी साल भर भी बने नहीं हुआ; जहां-तहां कूड़े का ढेर जमा हो चला है, कोई उठाने वाला नहीं; नालियां या तो हैं नहीं या फिर मलवे से पटी हैं और बदबदा रही हैं; चारों तरफ दुर्व्यवस्था फैली हुई है; लगता नहीं कि कहीं सरकार जैसी भी कोई चीज है । सुनता हूं कि कल स्वतंत्रता दिवस है । मैं तो निपट अनपढ़, कुछ जानता नहीं लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि इससे अच्छा तो अंगरेजों का राज था ।

मैं शहर के हालात से पूरी तरह परिचित हूं । उसकी बातों से असहमत नहीं हो सकता था । मैं स्वयं महसूस करता हूं कि आज के स्वशासन से तो अंगरेजों का राज बेहतर था

न मेरे उस पड़ोसी ने और न ही मैंने अंगरेजों का राज देखा । हम तो 1947 की इसी तारीख के आगे-पीछे पैदा हुए थे । हमारे माता-पिता तथा अन्य बुजुर्गों ने उसका कुछ अनुभव अवश्य पाया था, दादा-परदादा तो उन्हीं के राज में पैदा हुए और दिवंगत हुए । उनमें से अधिकतर अब इस लोक में रहे नहीं कि आज के और बीते जमाने के बीच तुलना कर सकें । हमने अंगरेजी राज के अच्छाई-बुराई की बातें उन्हीं के मुख से सुनी थीं । और जो सुना वह यही था कि जहां तक रोजमर्रा के राजकाज का सवाल है वह तब बेहतर था आज की तुलना में ।

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यह सच है कि अंगरेज भारतीयों को अपनी बराबरी में नहीं रखते थे । वह शासक थे और उसके अनुरूप उन्होंने अपने लिए विशेषाधिकार नियत कर रखे थे । आप उनका विरोध नहीं कर सकते थे । लेकिन यह भी सच है कि आम आदमी को अंगरेज से सीधा पंगा लेने की जरूरत भी नहीं थी । वह अपने काम में लगा रहता, तो अंगरेज अपने राजकाज को संभालता था । और जब तक आम आदमी उसके काम में व्यवधान नहीं डाल रहा हो वह बुरा नहीं था ।

बुजुर्गों के मुख से हमने सुना है । समाज में तब आज की जैसी अराजकता नहीं थी । आज की जैसी चोरी-छिनैती, छेडखानी, दबंगई तब नहीं थी । आप पुलिस से मदद की उम्मीद कर सकते थे, बशर्ते कि आपकी शिकायत किसी अंगरेज के विरुद्ध न हो । तब भ्रष्टाचार आज के जैसा खुल्लमखुल्ला नहीं होता था । लोगों में शर्मोहया रहती थी । लोग शासन से तो डरते ही थे, समाज की टीका-टिप्पणियों से भी भय खाते थे ।

तब स्कूल-कालेजों की भरमार नहीं थी, लेकिन जो थे वहां शिक्षक पढ़ाते थे, मुफ्त की तनख्वाह नहीं बटोरते थे । क्या मजाल कि कहीं नकल हो । पढ़ाई का स्तर कहीं बेहतर था । तब अस्पताल भी बहुत कम थे, लेकिन जो थे उनमें इलाज होता था; डाक्टर घर पर आज की तरह निजी प्रैक्टिस नहीं करते थे । पुलिस कमजोर व्यक्ति को मनमाने तरीके से सलाखों के पीछे नहीं डाल देती थी । पर आज ? कमजोर पर डंडा चला देती है और रसूखदार की जी-हजूरी करने लगती है । आम आदमी को सरकारी दफ्तरों में आज की तरह घूस नहीं देनी पड़ती थी । नागरिक कार्यों की तब की गुणवत्ता आज से कहीं बेहतर थी । उस जमाने के पुल, सड़कें, भवन आदि कहीं अधिक टिकाऊ थे यह आज भी देखने में आ रहा है । आज तो हालात यह है कि ये सब चीजें बनते-बनते ही टूटने लगती हैं, बावजूद इसके कि तकनीकें कहीं अधिक उन्नत हो चुकी हैं ।

तुलना करें तो पाएंगे कि तब भले ही व्यवस्था अपर्याप्त थी पर जो थी वह गुणवत्ता में बेहतर थी ।

मगर राज अंगरेजों का था । इसलिए अस्वीकार्य था ।

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आज राजकाज की गुणवत्ता की गिरावट किसी से छिपी नहीं है । चारों तरफ असंतोष व्याप्त है । फिर भी हम इठला रहे हैं, क्योंकि राज हमारे लोगों का है (हमारा नहीं!!) । चाहे जितना भी बुरा हो, है तो अपने लोगों का !! इसलिए खुशी मनाना जरूरी है ।

लेकिन यह सवाल तो जायज है कि देश की स्वतंत्रता से जो उम्मीदें लेकर संघर्ष किया गया था वह क्या पूरी हुईंं । अधोलिखित कुछएक बिंदुओं पर विचार करें:

1- ममता ने एक निरीह किसान को सलाखों के पीछे डाल दिया क्योंकि उसने एक सीधा-सा सवाल पूछने की हिमाकत कर दी । अंगरेज क्या इससे बुरा करता ?

2- मायावती स्वयं को दलितों की मसीहा कहती हैं, लेकिन उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए रचनात्मक कुछ कर दिखाने के बजाय करोड़ों रुपयों में अपनी ही मूर्तियां लगावाना अधिक जरूरी मानती रहीं । क्या यही स्वतंत्रता के माने हैं ?

3- किसी मनचले ने मायावती की बेजान प्रस्तर मूर्ति तोड़ दी तो अखिलेश सरकार हरकत में आ गई और रातोंरात नयी मूर्ति उस स्थल पर लग गई । लेकिन आए-दिन कितने ही जीते-जागते मनुष्यों की हत्या हो रही है, और पुलिस एफआईआर तक लिखने को तैयार नहीं होती । हिन्दुस्तानी और अंगरेज के बीच भेदभाव अंगरेजी राज में था, किंतु यहां तो कमजोर-बलवान के बीच भी वही चल रहा है ।

4- अंगरेजों पर यह इलजाम लगता रहा है कि उन्होंने ‘बाटो और राज करो’ की नीति अपनाई । उन्होंने क्या किया कह नहीं सकता, लेकिन हमारे राजनेता तो ऐसा खुलकर कर रहे हैं !! किस दल ने लोगों को जातीयता, धार्मिकता, भाषा एवं क्षेत्रीयता के आधार पर नहीं बांटा है ? कौन उनकी भावनाओं का शोषण करते हुए अपने-अपने वोट बैंक स्थापित नहीं किए बैठा है ?

5- लोकतंत्र की बात करने वाले राजनेताओं के दलों में क्या लोकतंत्र है ? क्या वे किसी परिवार अथवा व्यक्ति की प्राइवेट कंपनी बनकर नहीं रह गये हैं ?

6- क्या यह बिडंबना नहीं है कि लोकतांत्रिक देश की बागडोर एक नौकरशाह के हाथ में है, जो कभी भी जनप्रनिनिधि नहीं रहा है, जिसने कभी कोई जनांदोलन में भाग नहीं लिया है, और जिसने कभी भी आम लोगों के बीच जाकर तथा समस्याओं को सुनकर उनका निराकरण नहीं किया है ?

7- देश स्वतंत्र हुए 65 साल हो चुके हैं और हालात यह है कि दुनिया के

(1) सर्वाधिक निरक्षर अपने देश में हैं;
(2) सर्वाधिक कुपोषित बच्चे यहीं पल रहे हैं;
(3) सर्वाधिक कुष्ठरोगी अपने यहीं हैं;
(4) सबसे अधिक आर्थिक विषमता इसी जगह व्याप्त है, समाजवाद आधारित अर्थतंत्र की वकालत करने वाले देश में;
(5) चीन कभी भारत से पिछड़ा देश माना जाता था, आज वह हमसे कहीं आगे निकल चुका है और अमेरिका को टक्कर दे रहा है; इत्यादि ।

8- दरअसल हमने स्वतंत्रता शब्द के अर्थ बदल डाले हैं । आज स्वतंत्रता का मतलब है, अनुशासनहीनता, लापरवाही, मुफ्तखोरी, और मनमरजी । जिसमें हिम्मत है भ्रष्टाचार में लिप्त होवे और नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाये । किसी को न भय है और न शर्मोहया ।

9- इस समय देश एक प्रकार की अराजकता के दौर से गुजर रहा है । आसाम की घटना, मुंबई का दंगा, नक्सलवाद, और आए दिन की छोड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं निराश करने वाली बातें हैं ।

***

मेरी दृष्टि में परिस्थितियां जश्न मनाने के योग्य नहीं हैं । देशवासियों को गंभीर आत्मचिंतन करने की जरूरत है, न कि “सारे जहां से अच्छा …” सरीखा गीत गा लिया, तिरंगा फहरा दिया, आदर्श बातों से भरा भाषण दे दिया या सुन लिया, और फिर सब कुछ भुला दिया ।

मेरी नजर में खुश होने के पर्याप्त कारण नहीं हैं, और मेरा जश्न मनाने का मन नहीं है ।

प्रार्थना है कि सद्विचारों का संचार हो ! – योगेन्द्र जोशी

पद्म पुरस्कार, राष्ट्रमंडल खेल, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, बहुत कुछ और भी

26 जनवरी? गणतंत्र दिवस?

अपने देश का गणतंत्र दिवस, अर्थात् 26 जनवरी, कल बीत चुका । इस दिन स्कूली बच्चों को मिठाई खाने को मिलती है, अतः स्वाभाविक है कि उनके लिए यह एक खास खुशी का दिन होता है । इसके अलावा क्या महत्त्व है इस दिन का मैं समझ नहीं पाता । झंडोत्तोलन एवं उसके साथ भाषणबाजी, तथा दिल्ली में इंडिया गेट के पास जश्न मनाने के अलावा क्या कुछ सार्थक भी होता है इस दिन ? मैं इस दिन को ईद-क्रिसमस-होली जैसे त्योहार या बुद्ध-नानक-अंबेडकर जैसी जयंती के तौर पर नहीं देख पाता हूं । मेरी दृष्टि में यह दिन आत्मावलोकन तथा कल के लिए संकल्प लेने का दिन है । किंतु कहीं कोई संकल्प नहीं दिखता । इसके पहले और इसके बाद का इस देश का हर दिन यथावत् गुजरना है यह मैं भली भांति जानता हूं । मुझे कहीं भी संतोष तथा उत्साह का आधार नहीं दिखता है, इसलिए निराशा का अनुभव होता है । मैं देशवासियों से अपनी इस निराशा और उसकी अभिव्यक्ति के लिए क्षमा-याचना करता हूं । मैं अपनी निराशा पर लगाम लगा नहीं सकता; यह मेरी मजबूरी है । परंतु देशवासियों की खुशी, आशा और उत्साह के लिए उन्हें बधाई तथा शुभाकांक्षाएं प्रेषित अवश्य करता हूं ।

मेरी निराशा के अनेकों कारण हैं । उनका विस्तार से वर्णन करना मेरे लिए संभव नहीं, किंतु कुछएक बातें जो बस आजकल में मुझे देखने-जानने को मिलीं उन्होंने मुझे विचलित अवश्य किया है । क्या इस विशाल राष्ट्र के नागरिकों को मालूम भी है कि 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस का मतलब क्या, क्यों और कब से है ? बहुतों को नहीं मालूम ! होली-ईद आदि सबके लिए माने नहीं रखते, लेकिन 26 जनवरी एवं 15 अगस्त तो हर नागरिक के पर्व हैं । पर ऐसा वास्तव में है नहीं । बीते इसी दिन एक समाचार चैनल (टीवी) पर मेरी निगाह पड़ी तो देखा कि उसमें इस जानकारी के बाबत कार्यक्रम बना रही प्रस्तोता दिल्ली पुलिस के कांस्टेबलों/उपनिरीक्षकों/निरीक्षकों के उत्तर एकत्रित कर रही थीं । पूछे गये प्रश्नों के जवाब ? मत पूछिए ! कइयों को पता नहीं । कोई बगलें झांक रहा है, तो कोई उल्टा-सीधा उत्तर दे रहा है, और कोई तो उत्तर के लिए अधिकारियों से बात करने को कहता है, गोया कि कोई गुप्त बात पूछी जा रही हो । प्रस्तोता ने आगे लखनऊ पुलिस के हाल दिखाए – और भी बदतर । शेष कार्यक्रम देखने की मेरी हिम्मत नहीं रही; टीवी ऑफ कर दिया । जब पुलिस के जवानों के ये हाल हों तो आम जन की स्थिति क्या होगी ?

राष्ट्रीय सम्मान: पद्म-पुरस्कार

बीते 26 जनवरी को देश के सर्वोच्च सम्मान के प्रतीक पद्म-पुरस्कार भी वितरित किये गये ‘सुयोग्य’ व्यक्तियों को । सुयोग्य ? क्या परिभाषा है इस योग्यता का ? सदा की भांति ये पुरस्कार भी विवादों से घिरे हैं । सर्वाधिक विवादास्पद कदाचित् एनआरआई संत सिंह चटवाल का है जिसे पद्मविभूषण या पद्मभूषण से लोक कार्य (पब्लिक अफेअर्स) हेतु नवाजा गया है । क्यों, कौन हैं ये चटवाल साहब, क्या है इनके योगदान ‘लोक कार्य’ इस देश के भीतर ? मीडिया की खबरों से उनकी ‘योग्यता’ का पता मुझे नहीं चला पाया । आप में से शायद कोई जानता हो । ये अप्रवासी भारतीय हैं और अमेरिका में होटल व्यवसाय में संलग्न हैं । उनके व्यवसाय का इस देश से क्या लेना-देना ? और ऐसे अप्रवासी भारतीय व्यवसायी अनेकों हैं । इन पर कुछ समय पूर्व 90 लाख डालर के बैंक घोटाले में संलिप्तता का आरोप लगा था और ये पकड़े भी गये । बाद में इन्हें रिहा कर दिया गया । केस पूरी तरह बंद हो चुका या अभी उसमें कुछ बचा है मालूम नहीं । कुछ भी हो विवादास्पद एवं धूमिल छवि वाले को पुरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए । यह माना जा रहा है कि पद्म-पुरस्कार समिति में कोई प्रभावशाली व्यक्ति रहा है जिसने इनका नाम येनकेन प्रकारेण ‘घुसेड़ा’ है । आश्चर्य नहीं है, प्रभावशालिता इस देश में कुछ भी अनर्थ करा सकती है ।

पुरस्कार के लिए चयनित नामों में एक नाम श्री जानकी बल्लभ शास्त्री का भी था, साहित्य तथा शिक्षा में योगदान के लिए । शास्त्री जी बिहार के वयोवृद्ध वरिष्ठ लेखक बताये जाते हैं । उन्होंने पुरस्कार स्वीकारने से मना कर दिया, यह कहते हुए कि जीवन के इस पड़ाव पर इतने लंबे इंतजार के बाद मिले पुरस्कार को स्वीकारने का कोई औचित्य नहीं है । बात भी सही है । कुछ लोगों को जिंदगी भर के योगदान के बाद पुरस्कार मिलता है, तो खेल तथा अभिनय के क्षेत्रों में पहली-दूसरी कामयाबी पर ही पुरस्कारों की झड़ी लगा दी जाती है । क्रिकेट तो जैसे देश की जान हो । अजब है इस देश का रवैया । आगे इतना और कि पिछले 2008 के ओलंपिक खेलों के कांस्य पदक विजेता सुरेन्दर कुमार (नाम लेने में गलती तो नहीं ?) ने भी पद्म की आस लगाई थी । उसने कहा कि कई अन्य खिलाड़ी ये पुरस्कार पा चुके हैं, जब कि वे उससे अधिक ‘योग्य’ नहीं थे और न ही वरिष्ठ । उसने देश की सरकार से जानना चाहा है कि पुरस्कारों के लिए नामों का चयन होता कैसे है ?

पुरस्कारों का चयन होता कैसे है ? अखबार में मैंने पढ़ा था कि पुरस्कारों के लिए केंद्र सरकार एक समिति गठित करती है, जिस के पास विभिन्न राज्य सरकारें, स्वयंसेवी संगठन, संसद सदस्य आदि ‘योग्य’ व्यक्तियों के नामों की संस्तुति करके भेजते हैं । इतना सब तो ठीक लगता है, लेकिन समस्या यह है कि समिति इन नामों के अतिरिक्त अपनी मनमर्जी से किसी का भी नाम पुरस्कृत नामों की सूची में डाल सकती है । यहीं पर आकर समिति की कार्यशैली संदेहास्पद हो जाती है । किस आधार पर कोई नाम चुना जाता है, सुयोग्यता का आकलन किस आधार पर करती है समिति, किन विशेषज्ञों से राय ली जाती है, इत्यादि प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं । लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाले देश में अपारदर्शिता तथा मनमर्जी को क्षम्य नहीं माना जा सकता ।

पुरस्कारों के नाम पर मुझे विश्व-विख्यात ‘नोबेल’ पुरस्कारों पर ध्यान जाता है । अक्टूबर मास में घोषित इन पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पूरे साल चलती है । तमाम स्रोतों से नाम आमंत्रित किए जाते हैं और व्यक्तियों की योग्यता का आधार पूछा जाता है । नोबेल समिति अपनी ओर से तमाम सावधानियां बरतती है । हर विषय के विशेषज्ञों के दल का सहारा लिया है, तब जाकर नाम चुने जाते हैं । कठोर प्रक्रिया के बावजूद कभी-कभी वहां भी विवाद उठ खड़ा होता है । और अपने यहां ? पुरस्कार कैसे तय होते हैं यही स्पष्ट नहीं हो पाता ।

(अधिक जानकारी के लिए देखें –
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6134141.html
http://beta.thehindu.com/news/national/article94840.ece
http://www.aromaticflavors.com/padma-awards-did-sant-singh-chatwal-use-influence-to-find-place-list-of-awardees/)

आगामी राष्ट्रमंडल खेल

खेलों की बात पर मेरा ध्यान देश में होने वाले आगामी राष्ट्रमंडल खेलों पर जाता है । खेदजनक खबर है कि ‘राष्ट्रमंडल खेल परिसंघ (कॉमनवेल्थ गेम्ज फेडरेशन) के वेबसाइट पर प्रदर्शित मानचित्र में कश्मीर तथा गुजरात के कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान में दिखाया गया है । ये खेल इस बार भारत में आगामी अक्टूबर माह में होने हैं, लेकिन दिल्ली में बैठी संबंधित आयोजन समिति को इस चूक का पता ही नहीं । देश के प्रति चिंता तथा समर्पण के ये हैं हाल । इन खेलों के आयोजन के लिए आवश्यक ढांचागत तैयारी की असंतोषजनक स्थिति पर भी सवाल उठते रहे हैं । परिसंघ के कार्याधिकारी माइक हूपर (Mike Hooper) भी एक बार असंतोष प्रकट कर चुके हैं । ये खेल सफलतापूर्वक संपन्न हो भी पाएंगे इस बात पर कई जनों को संदेह है । आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहे (सच है यह, या एक मजाक?) इस देश के लिए जब यही आयोजन भारी पड़ रहा हो तब सोचिए कि ओलंपिक आयोजित कर सकते हैं हम कभी ?

(अधिक जानकारी के लिए देखें –
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Commonwealth-Games-map-shows-JK-Gujarat-in-Pak/articleshow/5502129.cms
http://www.zeenews.com/news599091.html)

केंद्रीय मंत्रालय

मैं विषय बदलता हूं । इधर कन्या भ्रूण-हत्या के प्रति जनजागरण के लिए तैयार महिला एवं बालविकास मंत्रालय के एक विज्ञापन ने भी विवाद खड़ा कर दिया है । उस विज्ञापन में एक स्थान पर कपिलदेव की तस्वीर है तो दूसरी जगह पाकिस्तान के एक पूर्व फौजी अधिकारी, तनवीर महमूद अहमद की तस्वीर छपी है । सवाल उठता है कि यह तस्वीर किस आधार पर चुनी गयी ? किसकी तस्वीर है यह क्या संबंधित लोगों को मालूम ही न था ? मंत्रालय के किसी व्यक्ति ने ध्यान ही नहीं दिया ? उसे अपने ही एक फौजी की तस्वीर मान लिया गया ? आम आदमी की तस्वीर लगाने का इरादा तो मंत्रालय का रहा नहीं होगा; किसी रिक्शा चलाने या ईंटा ढोने वाले की तस्वीर में तो दिलचस्पी नहीं होगी । अवश्य ही प्रतिष्ठित चेहरे (जैसे कपिलदेव) की जरूरत रही होगी । खैर, भूल हुई, लेकिन मंत्री महोदया सुश्री कृष्णा तीरथ इस पर खेद जताने के बजाय ‘तो क्या हुआ, संदेश तो सही जा रहा न ?’ कहने लगीं । उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ् आडियो-विजुअल पब्लिसिटी, डीएवीपी, को ही जिम्मेदार ठहरा दिया । अंत में प्रधानमंत्री कार्यालय ने हस्तक्षेप किया । बताया जा रहा है कि अब निचले स्तर के किसी कर्मचारी को बतौर बलि के बकरे को तलाशा जा रहा है ।

(अधिक जानकारी के लिए देखें –
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6132016.html)

चर्चा में तो आजकल सबसे अधिक शरद पवार हैं जो कृषि मंत्रालय का भट्टा बैठाने पर तुले हैं खाद्य-सामग्री की बढ़ती कीमतों पर ‘वाहवाही’ लूट रहे हैं । आम आदमी की दिन भर की कमाई भोजन जुटाने में ही खर्च हो जा रही है । परंतु उस तकलीफ का एहसास सत्तासीन लोगों को हो सके तब न ? जिनकी आमदनी लाखों में हो उनके लिए आटा पचास रुपये किलो भी हो जाय तो क्या फर्क पड़ता है ? पवार साहब ने जिन्दगी में कभी गेहूं-धान की बाली भी देखी होगी मुझे शंका है, किंतु कृषि नीति जरूर नियंत्रित करते हैं । इधर विदेश मंत्री श्रीमान् कृष्णाजी भी चर्चा में रहते हैं, किंतु उनसे आगे श्री शशि थरूर हैं जो अमेरिका स्थित यूएनओ कार्यालय की कार्यशैली के रंग में यूं रंगे हैं कि भूल गये कि वे इस देश के धुप्पल में बन गये राज्यमंत्री हैं । अधिक कहना बेमानी है ।

कहानी खतम नहीं हुई । कहने को बहुत कुछ और भी है, अपने ‘विफल गणतंत्र’ को लेकर । लेकिन आज के लिए इतना काफी है । आगे की बातें आगे की पोस्टों में । (आप विफल कहने पर बिफरेंगे जरूर, पर आकलन तो अपना-अपना है भई, क्या करें ?) – योगेन्द्र जोशी

नवगठित केंद्रीय सरकार – यूपीए (संप्रग) की या कांग्रेस की?

काफी जद्दोजेहद के बाद अंततः केंद्र की सरकार गठित हो ही गयी । पिछली बार की तरह इस बार भी कांग्रेस पार्टी ही सरकार का नेतृत्व कर रही है । इस बार उसे अन्य दलों को गठबंधन में शामिल करने में वैसा प्रयास नहीं करना पड़ा जैसा पिछली बार करना पड़ा । इस दफे घटकों की संख्या भी अपेक्षया कम है, और यह उम्मीद की जाती है कि कांग्रेस को अपनी नीतियों को लागू करने में कम दिक्कतें झेलनी पड़ेंगी । वास्तव में इस बार यह देखना दिलचस्प रहा कि पारंपरिक विरोध के विपरीत अन्य दलों ने उसका समर्थन करने का निर्णय लिया । उनमें एक प्रकार से समर्थन देने की जैसे होड़ मची थी । बिन मांगे ही वे समर्थन देने की बात करने लगे । हमें सरकार में शामिल करो या न, हमारा समर्थन तो आपको मिलेगा ही, कोई खास शर्त थोपे बगैर । कहना चाहिए कि कांग्रेस की किस्मत चमक उठी । जो कभी विरोध करते थे उन्हें अपनी औकात का अंदाजा इस कदर पहले के चुनावी दंगलों में नहीं हुआ । लगता है ‘अति सर्वत्र वर्जितम्’ की बात उनके दिमाग में घर कर गयी और अति अहंकार नहीं दिखाना चाहिए ऐसा वे समझने लगे हैं ।

फिर भी कांग्रेस के लिए सब कुछ आसान नहीं था अपने पुराने सहयोगी डीएमके को मनाना उसके लिए आसान नहीं था । डीएमके समर्थन देने के लिए तो तैयार थी, लेकिन सरकार में शामिल होने के लिए केवल अपनी शर्तों पर तैयार थी । कांग्रेस शर्तें न मान सके तो कोई बात नहीं, समर्थन तो हम देंगे ही सरकार से बाहर रहकर ऐसा उक्त पार्टी कहती रही । सरकार में शामिल होने की उसकी शर्त पेचीदा थी – ढेर सारे मंत्रीपद और माननीय करुणानिधि के पूरे कुनबे को उसमें जगह देना । शर्तें आसान नहीं थी, लेकिन बेचारी कांग्रेस करती क्या ? चुनाव के पूर्व के उसके साथ के गठजोड़ की अनदेखी कर पुरानी मित्रता तोड़ने का कलंक अपने माथे नहीं लगने देना चाहती थी । अन्यथा समर्थकों और सरकार में शामिल होने को तैयार दलों की कमी थोड़े ही थी । लेकिन अपनी विश्वसनीयता बनाये रखकर वह संगी-साथियों को यह संदेश देना चाहती थी कि देखो बीच रास्ते में धोखा मत दे बैठना । शर्तें मानकर उसने गठबंधन के स्थायित्व का भरोसा तो दे ही दिया है ।

डीएमके को मुंहमांगा, 7 मंत्रीपद, देने से कांग्रेस को परेशानी तो हुई ही । अपना लोकतंत्र देखिये कि 543 लोकसभा सदस्यों में सिर्फ 18 सदस्यों वाली डीएमके के 39 प्रतिशत सदस्य मंत्री बन गये, 78 की संख्या वाले मंत्रीपरिषद् के करीब 9 प्रतिशत । उससे अधिक सीटों (19) के साथ लोकसभा पहुंची तृणमूल कांग्रेस की फरमाइश को कांग्रेस पार्टी भला कैसे अनुचित मान सकती थी ? उसे भी मनोनुकूल 7 मंत्रीपद देना उसकी विवशता थी । दोनों दलों को ढेर सारे मंत्रीपद देने का मतलब था अपने हाथ में कम पद रखना । बेचारे कांग्रेसी सदस्यों के लिए तब बचता ही क्या । लोकसभा के कुल सदस्य संख्या के करीब 15 प्रतिशत के आसपास मंत्रियों की संख्या रखने के उसके प्रयास का मतलब ही यही होता कि अपने लिए कम पदों से संतोष करना । यह तो उस पार्टी के आंतरिक लोकतांत्रिक स्वरूप में है कि वहां कोई खुलकर असंतोष व्यक्त नहीं करता । सब हाईकमान के वफादार होते हैं और कुछ मिले तो खुश न मिले तो भी खुश । (मन में निराशा हो भी तो उसे कह नहीं सकते न !) इन दलों के साथ समझौते के प्रयास में वह यह भी भूल गयी कि उसका एक मित्र दल नैशनल कांफरेंस छूटा जा रहा । जम्मू-कश्मीर के डा. फारूख साहब ने कह ही दिया कि हमें तो कोई पूछ ही नहीं रहा, सो हम चले आईपीएल मैच देखने ।

खैर किसी प्रकार सरकार तो बन ही गयी । लेकिन एक सवाल मेरे जेहन में अनुत्तरित रह गया । यह सरकार कांग्रेस की है या
यूपीए की ?
मुझे तो यही लगा कि सरकार तो कांग्रेस की ही है और वह दूसरों का साथ पाने में उनकी शर्तें सुन रही थी, तथाकथित सहयोगी दलों की मंत्रीपदों को लेकर सौदेबाजी पर रियायत पाने की कोशिश कर रही थी, और वे दल स्वयं उससे अधिकाधिक एंठने के प्रयास में लगे थे । निर्णय कांग्रेस ले रही थी और उस निर्णय की स्वीकार्यता पर वे दल अपनी राय दे रहे थे । ऐसा लग रहा था कि सरकार बनाना और चलाना तो कांग्रेस का फर्ज है । दलों का रवैया कुछ ऐसा था: देश की चिंता तो कांग्रेस को करना है, हमें तो सत्ता से मतलब जिसमें भागीदारी देना और कितना देना यह कांग्रेस हमें बताये तो हम जवाब दें । क्या इसी को गठबंधन सरकार कहा जाना चाहिए ? क्या सरकार बनाने में सबकी भूमिका एकसमान नहीं होनी चाहिए थी । अवश्य कांग्रेस बड़ी पार्टी है और उसको नेतृत्व की जिम्मेवारी देना समझ में आती है, पर उसके साथ लेनदेन भला कैसा । संबंधित सभी दलों को मिलकर मंत्रीपरिषद् के आकार और उसके सदस्यों का चयन करना चाहिए था । लेकिन यहां तो तस्वीर कुछ वैसी ही उभर रही थी जैसे आजकल शहरों में ‘पेइंग गेस्ट’ की आधुनिक व्यवस्था में होता है । आपका पेइंग गेस्ट आपके परिवार के सदस्य की तरह नजर आता है, पर वह परिवार का सदस्य होता नहीं । जब तक सब ठीक चलता है वह सदस्य की तरह व्यवहार करता है, और जब उसको असंतोष होता है तो वह कोई नई जगह तलाश लेता है । रिश्ता पूरी तरह ‘गिव एंड टेक’ के सिद्धांत पर टिका रहता है । – योगेन्द्र

लोकतंत्र की व्यथाकथा, ग्यारह – निरर्थक अभियान ‘मतदान अवश्य करो’ का

आगामी लोकसभा के लिए आयोजित करीब एक मास के मतदान कार्यक्रम के बाद अंततः चुनाव प्रक्रिया का अंतिम चरण बीते 13 तारीख संपन्न हो ही गया । जनता जितनी भागीदारी निभाने के लिए अधिकृत थी उतनी उसने निभा ली, कुछ ने किसी प्रत्याशी के पक्ष में वोट देकर तो कुछ ने नकारात्मक मत व्यक्त करके । कुछ ने तो खुलकर बहिष्कार भी कर दिखाया और शेष ने उदासीनता व्यक्त करते हुए चुप बैठना ठीक समझा । अब सरकार किसकी बनेगी और कैसे बनेगी यह दो-चार दिनों में पता चल ही जायेगा । हो सकता है सरकार का गठन किसी भी दल के लिए औरों के ‘अवसरवाद-प्रेरित सहयोग’ के बावजूद आसान काम न हो । लेकिन अंत में जोड़-तोड़ में कोई न कोई तो सफल होगा ही ऐसी उम्मींद की जानी चाहिए । हां, इतना अवश्य है कि कोई भी सरकार आवे, वह पुराने घिसे-पिटे ढर्रे पर ही चलेगी, ‘किसी प्रकार से पांच साल खींचो और जैसे देश की गाड़ी आज तक चलती रही है वैसे चलाते रहे’ की तर्ज पर । देश की तस्वीर न कोई बदलने वाला है, और न किसी में वैसा करने का इरादा है, और न ही किसी में काबिलियत ही है । बस कुर्सी पर बैठने वाले चेहरे नये होंगे, ढर्रा नया नहीं होगा । अस्तु, अपने देशवासियों के प्रति मेरी शुभेच्छाएं ।

इस बार के चुनावों का एक दिलचस्प पहलू मेरी नजर में यह था कि मतदाताओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभियान चलाये गये । फिर भी मतदान प्रतिशत सर्वत्र संतोषप्रद रहा यह कहना ठीक नहीं होगा । ये अभियान मतदाताओं को मतकेंद्रों तक खींच ले जाने में किंचित् भी सफल हुए होंगे इसमें मुझे शंका है । मेरी दृष्टि में तो ये अर्थहीन प्रयास थे । मेरे इस विचार के आधार हैं । मैं समझ नहीं पाया कि किसी व्यक्ति को मतदान के दिन क्यों यह स्मरण दिलाना पड़ता है कि उसे वोट डालना है या डालना चाहिए । किसी व्यक्ति को याद कब दिलाना पड़ता है ? तभी न कि जब उसके ध्यान से कोई बात उतर गयी हो ? जैसे बाजार में खरीदारी करते वक्त किसी सामान का ध्यान न रहे । अपने मित्र से मिलने का वादा आपने किया हो और व्यस्तता के कारण ऐन मौके पर उसका खयाल ही न रहे । ऐसे कह कुछ मौके हो सकते हैं जब किसी को याद दिलाना पड़े । किंतु किसी अध्यापक को यह बताने जरूरत पड़े कि उसके छात्र कक्षा में प्रतीक्षारत हैं, या किसी चिकित्सक को ध्यान दिलाना पड़े कि उसे बहिरंग में पहुंचना है, या ऐसे ही किसी मामले में व्यक्ति को याद दिलाने की बात उठे तो ऐसा प्रयास हास्यास्पद कहा जायेगा । अपने दायित्व से बचने के ऐसे तमाम मामलों के पीछे के कारणों की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए । मतदान कार्यक्रम ऐसा नहीं कि कोई मतदान करना ही भूल जाये । टीवी चैनलों और अखबारों के संपर्क में जो हो उसे मतदान का ध्यान ही न रहे ऐसा सोचना बेमानी है । और जिस बेचारे की पहुंच इन माध्यमों तक हो ही न उसके लिए तो ये निःसंदेह निरर्थक कहे जायेंगे । तात्पर्य यह है कि बार-बार याद दिलाने की वाकई कोई अर्थवत्ता नहीं ।

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लोकतंत्र की व्यथाकथा, दस – अपर्याप्त मतदान प्रतिशत, कारण?

इस बार अपने देश का लोकसभा चुनाव पिछले चुनावों से काफी भिन्न-सा नजर आ रहा है । यूं तो पिछले कुछ वर्षों से बहुचरणीय चुनाव प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिसके पीछे मतदान से संबंधित सुरक्षा की समस्या प्रमुख कारण माना जाता है, तथापि इस बार का चुनाव अपेक्षया अतिदीर्घकालिक हो चुका है । अलग-अलग क्षेत्रों में अप्रैल १६, २३, तथा ३०, और मई ७ एवं १३ को संपन्न होने वाले चुनावों के बीच एक-एक सप्ताह का अंतर वाकई बहुत अधिक है । किंतु निर्वाचन आयोग के तत्संबंधित निर्णय के अपने कारण हैं ।

दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि चुनाव अप्रैल-मई की गर्मी में हो रहे हैं और इस बार यह गर्मी कुछ अधिक ही मालूम पड़ रही है ।

तीसरी दिलचस्प बात यह है कि इस बार निर्वाचन आयोग और अन्य संस्थाओं ने लोगों को मतदान के कर्तव्य की खूब याद दिलायी है । अखबारों और टीवी चैनलों पर बीच-बीच में यही संदेश देखने-सुनने को मिल रहा है कि आप वोट अवश्य दीजिए, कि पप्पू मत बनिए, कि यह आपका अधिकार है, कि सही व्यक्ति को चुनकर लोकसभा में भेजिए, इत्यादि ।

और चौथा रोचक तथ्य यह है कि मतदाताओं को प्रेरित करने के तमाम प्रयासों के बावजूद मतदान प्रतिशत कई स्थानों पर बहुत कम, निराशाजनक, तथा चिंतनीय स्तर पर पहुंच चुका है । कई राज्यों में यह प्रतिशत ४५ के आसपास रहा है । लखनऊ और कानपुर जैसे महानगरों में यह ४० से भी नीचे चला गया । क्या कारण रहे हैं ? चर्चा तो यही है कि भीषण गर्मी के कारण लोगों ने आराम फरमाना अधिक ठीक समझा । क्या वाकई बात इतनी सीधी है ? या मामला अधिक गंभीर है । इस पर विचार होना चाहिए ।

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(लोकतंत्र की व्यथाकथा, छः:) परिवारवाद से उपजे या ऊपर से थोपे गये राजनेता !

मुझे उन लोगों से ईर्ष्या होती है जो यह मानते हैं कि हमारी डिमॉक्रेसी ‘मैच्योर’ हो रही है, राजनैतिक दल और आम जनता अब समझदार होती जा रही है, लोकतंत्र स्वस्थ एवं पुष्ट हो रहा है । मेरी कामना है कि काश! ऐसे आशाप्रद विचार मेरे मन में भी घर कर जाते । लेकिन जो अब मुझे दिखाई दे रहा है और जिस गिरावट को मैं विगत दशकों से देख रहा हूं उसके चलते आंखें मूंदकर लोकतंत्र के सुखद सपने नहीं देख पाता । और यही वजह है कि नकारात्मक वोट की वकालत करता हूं; शायद यह रास्ता अब काम करे ।

अपनी बात की शुरुआत में विगत बुधवार (१ अप्रैल) के दिन प्रसारित ‘रेडियो बीबीसी’ के एक कार्यक्रम से करता हूं । उक्त कार्यक्रम में रेडियो श्रोताओं का देश के जाने-माने चुनाव विश्लेषक श्री योगेन्द्र यादव के साथ टेलीफोन के माध्यम से संपन्न वार्तालाप प्रस्तुत किया गया था । आधे घंटे के उस कार्यक्रम में श्रोताओं ने मौजूदा राजनैतिक वातावरण को लेकर अपनी चिंताएं-शंकाएं मेहमान वक्ता के सामने रखी थीं । बातों का विस्तृत विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, शायद बीबीसी पर अभी भी सुनने को मिल जाये । जो-जो बातें पूछी या कही गयीं उनमें मुझे श्रोताओं का असंतोष ही नजर आ रहा था । उस परिचर्चा में सर्वाधिक महत्त्व की जो बात मैंने सुनी वह यह थी कि अब राजनैतिक दलों में उन ‘नेताओं’ की बाढ़ आ गयी है जिनका पूर्व में कोई राजनैतिक अनुभव नहीं रहा । शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, पांच:) मतदान करना अधिकार है, बाध्यता नहीं

मैं समाचार माध्यमों पर सुनता आ रहा हूं कि लोगों को मतदान करने का लोकतांत्रिक अधिकार मिला है, जिसका उपयोग करते हुए उन्हें अधिकाधिक संख्या में वोट डालना चाहिए । यह भी सुनता हूं कि उन्हें साफ-सुथरे और ईमानदार प्रत्याशी को वोट देना चाहिए । क्या पहचान है अच्छे प्रत्याशी की और कहां से लायें ऐसा व्यक्ति इस बात पर मैं अभी बहस नहीं करने जा रहा हूं । मैं यह जानना चाहता हूं कि यदि आप किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करना चाहें, और ऐसा करने के आपके ठोस कारण होंगे ही, तब आप क्या करेंगे ।

जब ‘हमें वोट डालने का अधिकार मिला है’ जैसी बात कही जाती है तो इसके यह अर्थ कदापि नहीं कि मतदान करना आपकी बाध्यता या अनिवार्यता है । अधिकार का अर्थ है आप स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं किसी के भी पक्ष में । परंतु किसी के पक्ष में खड़ा न होने का विकल्प भी इस अधिकार में निहित है । इसमें किसी को वोट देने की वाध्यता नहीं है । मैंने इस अधिकार में निहित विकल्पों के मद्देनजर ही किसी को भी वोट न देने का निर्णय लिया है, क्योंकि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से मेरा मोहभंग हो चुका है । वस्तुतः ऐसा में पिछले दो-एक चुनावी ‘पर्वों’ से कर रहा हूं । ऐसा करने के मेरे खास कारण हैं, जिनकी विस्तार से चर्चा मैं करूंगा भी, भविष्य में । अभी यह बता दूं कि मैं बीस-पच्चीस वर्षों से मतदान करता आया हूं और वह भी पूरे उत्साह से । लेकिन मैं देख रहा हूं कि अपने देश की राजनीति में लगातार गिरावट आती जा रही है । एक विशेषज्ञ की भांति मैं राजनीति की बात नहीं कर सकता, किंतु उस विषय पर बिल्कुल भी समझ नहीं रखता ऐसा भी नहीं है । देश में क्या चल रहा है इसे तो मैं कोई चालीस साल से देख ही रहा हूं । अपने अनुभवों और आकलनों पर ही मेरा निर्णय आधारित है, सोच-समझकर लिया गया निर्णय । मेरा विचार किसी के कहने, बहलाने या भ्रमित करने पर आधारित नहीं है । हां, इस निर्णय का कार्यान्वयन कैसे हो यह मेरे लिए अवश्य एक समस्या थी और है । शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, चारः) लोकतांत्रिक ढांचा, भावना नहीं

(१० फरवरी, २००९ की पोस्ट से आगे) लोकतांत्रिक शासन-पद्धति की शुरुआत निःसंदेह मतदान से होती है । हमारे देश में वयस्क लोगों को मतदान करने का अधिकार है और निर्वाचन आयोग यथासंभव ईमानदारी से प्रयास करता है कि हर व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग निर्भय होकर कर सके । यह भी सच है कि लोग मतदान करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे इस अधिकार का सोच-समझ कर इस्तेमाल करते हैं । क्या उन्हें इस बात की ठीक-ठीक समझ है कि उन्हें किस व्यक्ति के पक्ष में मत डालना चाहिए और वह किस आधार पर ? मैं यही अनुभव करता हूं कि लोग वोट डालते अवश्य हैं, किंतु सही निर्णय नहीं लेते हैं । या यूं कहिये कि वे सही निर्णय ले नहीं सकते हैं । इस बात को मैं अधिक स्पष्ट करूंगा, परंतु उससे पहले यह सवाल कि क्या मतदान प्रक्रिया का निर्विघ्न संपन्न हो जाना और मतदाता का निर्वाचन स्थल से संतुष्ट होकर लौटना ही सफल लोकतंत्र की पहचान है । क्या उसके बाद पांच वर्ष तक जो शासन चले उसकी गुणवत्ता का कोई मतलब नहीं ? उस पूरे अंतराल में जनप्रतिनिधियों का आचरण क्या रहा, उन्होंने अपने निजी हितों के ऊपर आम आदमी के हितों को तवज्जू दी कि नहीं, शासकीय व्यवस्था ने समाज के किस वर्ग को सर्वाधिक महत्त्व दिया, लोकतंत्र के कर्णधारों ने कुशल, ईमानदार तथा संवेदनशील प्रशासन स्थापित किया या नहीं आदि ऐसे सवाल हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है । यदि इनके उत्तर संतोषप्रद न रहे हों अथवा नकारात्मक रहे हों तो हमें स्वीकार लेना चाहिए कि लोकतंत्र सफल नहीं हो पाया । तब क्षण भर ठहरकर पूरी पद्धति की समीक्षा करनी चाहिए और तदनुसार सुधार की पहल करनी चाहिए । कौन करेगा सुधार, कौन लायेगा परिवर्तन ? यदि असफलता दिखती है तो उसके लिए किसे जिम्मेदार कहा जायेगा इसका स्पष्ट उत्तर दिया जाना चाहिए । क्या यह सब कारगर तरीके से हो रहा है ?

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी मतदान की प्रक्रिया के आरंभ से उसके समापन तक ही सीमित है । उसके आगे शेष कार्य तो राजनेताओं पर निर्भर करता है जिन्हें चुना जाता है और जिनको विधायिका का दायित्व निभाना होता है । जनता की प्रत्यक्ष भूमिका तो मतदान-प्रक्रिया के दौरान के कुछेक दिनों की होती है, उसके बाद सब कुछ राजनेताओं के हाथ में रहता है । जनता का तो फिर पांच वर्ष तक उन पर कोई नियंत्रण ही नहीं होता । नियंत्रण तो दूर की बात, उनसे सामान्य संवाद तक नहीं हो पाता । तब अगर वे जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य न करें, बल्कि अपनी मनमर्जी से चलें तो क्या लोकतंत्र सफल कहा जायेगा ? यदि किसी व्यक्ति को ऐसी व्यवस्था अस्वीकार्य लगे तो क्या उसे मतदान करते रहना चाहिए ? ऐसे लोकतंत्र के विरुद्ध अपनी भावना वह कैसे व्यक्त करे ? मुझे मतदान न करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नजर नहीं आता । मौजूदा व्यवस्था में ‘मैं किसी को भी वोट नहीं देना चाहता हूं’ इस आशय का विकल्प चुनावों में हमारे यहां उपलब्ध ही नहीं है । अतः असंतोष अनुभव करने पर मतदान से विरत रहने का मैं पक्षधर हूं । जो संतुष्ट हो उसके मतदान का अवश्य अर्थ है । शेष के लिए यहां क्लिक करें >>