चीनी मोबाइल-ऐपों पर प्रतिबंध – गनीमत कि मेरे पास एक भी नहीं

साम्यवादी (Communist) देश चीन के साथ हाल में पैदा हुई कड़ुवाहट और सीमा पर अतिक्रमण के साथ उसकी युद्ध के लिए गंभीर तैयारी को देखते हुए केन्द्र सरकार ने उस देश से आर्थिक संबंधों को यथासंभव सीमित करने का निर्णय लिया है। उस दिशा में चीनी कंपनियों की देश में आर्थिक क्रियाकलापों में भागीदारी घटाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। उसी दिशा में एक कदम हें चीन में बने आधुनिक मोबाइल फोनों के “ऐपों” (अप्लिकेशन प्रोग्राम, application software) पर प्रतिबंध लगा दिया जाना। ऐसे ऐपों की कुल संख्या उनसठ (५९) है। यह सूची यहां प्रदर्शित है।

प्रतिबंधित चीनी मोबाइल ऐप (Apps)

जब यह समाचार मैंने पढ़ा तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा जगी कि देख लूं कि मेरे स्मार्टफोन में कौन-कौन से मौजूद हैं। संलग्न हैं ऐपों को प्रदर्शित करने वाले “स्क्रीन-शॉट” की तस्वीरः

मेरे सक्रिय मोबाइल ऐप

My MobileApps

गिनने पर मेरे स्मार्ट्फोन के ऐपों की संख्या ६२ निकली। और मुझे आश्चर्य हुआ कि प्रतिबंधित ऐपों में से एक भी मेरे फोन पर मौजूद नहीं। इसका मतलब यह हुआ कि कोई भी ऐप मेरे काम का नहीं। या यों कहिए कि मेरी निगाह में वे कभी आये नहीं। मैं आवश्यकता पड़ने में इंटरनेट पर उपयुक्त ऐप की तलाश करता हूं, परंतु डाउनलोड करने में सावधानी बरतता हूं। मैं छानबीन कर लेता हूं कि ऐप सुरक्षित तो है। अधिकतर कार्य में लैपटॉप पर करता हूं खास तौर पर ऑनलाइन लेनदेन के काम में।

उक्त प्रतिबंधित ऐपों में से अधिकांश का तो नाम मैंने कभी सुना भी नहीं। कोई काम का होता तो कभी न कभी उसे इंटरनेट पर खोजकर “डाउनलोड” कर चुका होता। इन ऐपों की कुछ न कुछ उपयोगिता होगी ही कि उन पर प्रतिबंध से चीनी आईटी कंपनियों को भारी भरकम घाटा उठाना पड़ रहा है।

ऐसी क्या खूबी है इनमें कि दुनिया दीवानी है और मैं उनसे अनजान पड़ा हूं। मेरे पास अधिक छानबीन करने का न तो समय है न सामर्थ्य। फिर भी सोचा कि दो-तीन ऐप के बारे में देख तो लूं कि वे किस काम के हैं, क्या खूबी है उनमें। सबसे पहले मैंने टिकटॉक (TikTok) को चुना क्योंकि इसका नाम मैं सुनते आ रहा था और प्रतिबंध लगने पर कदाचित सर्वाधिक चर्चित ऐप यही रहा। टिकटॉक को लेकर अपना दुःख व्यक्त करते एक युवती का वीडियो मैंने देखा। युवती सचमुच में दुःखी थी या वह अभिनय कर रही थी इसमें मुझे शंका है।

टिकटॉक (TikTok)

Tik Tok को चीनी कंपनी बाइटडांस (ByteDance) ने विकसित किया है। मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि यह कमोबेश वही कार्य करता है जो आपका स्मार्टफोन कैमरा कर लेता है यानी “वीडियो क्लिप” (video clip) बनाना। फर्क यह है कि टिकटॉक की तस्वीरें कहीं अधिक स्पष्ट और जीवंत होती हैं। यह छोटे-छोटे वीडियो-क्लिप बनाने में काम आता है, आम तौर पर तीन-चार सेकंड और अधिकतम साठ सेकंड। इसके लिए ऐप में आरंभ में ही समय-अंतराल चुनने का विकल्प रहता होगा। इतना ही नहीं टिकटॉक में वीडियो के साथ पृष्ठभूमि का संगीत भी मिश्रित कर सकते हैं। इस कार्य के किए विविध म्यूज़िक-क्लिपों में से चुनने का विकल्प टिकटॉक प्रदान करता है। स्पष्ट है कि इतने सब की व्यवस्था आपके फोन पर हो नहीं सकती। इसके लिए टिकटॉक का सर्वर ही आपके काम आता है। यहीं पर उससे खतरे की संभावना रहती है। आप के फोन के कौन से आंकड़े (data) उस सर्वर तक पहुंचते हैं कहना मुश्किल है। बहुत कुछ ऑनलाइन करना होता है। खैर, यह ऐप विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध है। मुझे जो जानकारी मिली उसके अनुसार खुद चीन में टिकटॉक नहीं चलता है। इसका मौलिक चीनी संस्करण डॉयिन (Douyin) चीन की जनता पहले से इस्तेमाल कर रही है।

बायडू मैप्स (Baidu maps)

दूसरा ऐप जिसके बारे में मैंने जानकारी जुटाई वह है बायडू मैप्स। यह चीन की बायडू (Baidu) कंपनी का उत्पाद है। इसे मैं गूगल मैप का चीनी संस्करण कहूंगा। अर्थात् यह वांछित स्थानों का नक्शा और सेटेलाइट तस्वीरें प्रदान करता है। गुणवत्ता की दृष्टि से इसकी तस्वीरें कहीं अधिक बेहतर कही जायेंगी। दूसरे शब्दों में नक्शे एवं तस्वीरें उच्चस्तरीय स्पष्टता (high definition) की रहती हैं। कहा जाता है कि इसके द्वारा मिली तस्वीरों का निरीक्षण बारीकी से किया जा सकता हैं। दावा किया जाता है कि मैप में सड़कें ही नहीं बल्कि उनके किनारे के मकानों, पेड़-पौधों आदि की तस्वीरें पूरी भी बारीकी से प्रदर्शित होती हैं। पढा तो मैंने यह भी कि कुछ भवनों की भीतरी तस्वीरें भी देखने को मिल सकती हैं। बायडू मैप में चीन की अपनी जीपीएस (GPS) प्रणाली भी एकीकृत है। इसलिए यह वाहन-चालकों को यात्रा-संबंधी सुविधा भी प्रदान करता है। अन्य प्रणालियां पहले से प्रचलन में हैं किंतु यह चीनी ऐप स्पष्टता के नजरिये से अधिक आकर्षक एवं उपयोगी कहा जा सकता है। चूंक़ि मैपों की विस्तृत जानकारी अर्थात् तत्संबंधित आंकड़े किसी स्मार्टफोन की सीमित स्मृति (memory) पर भंडारित रखना संभव नहीं, अतः केंद्रीय सर्वर उपयोक्ता के फोन की मदद करता है। इस कारण से सर्वर की पहुंच उपयोक्ता के फोन की गोपनीय सामग्री तक रहती है।

यूसी ब्राउज़र (UC browser)

मैंने जिन तीन इंटरनेट ऐप्स को जांचने के लिए चुना उनमें अंतिम है यूसी ब्राउज़र (UC browser)| इंटरनेट सर्फिंग के लिए ब्राउजरों की कोई कमी आईटी क्षेत्र में नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट अपने विंडोज़ प्रचालन प्रणाली (operating system) के अभिन्न घटक के तौर पर आईई (इंटरनेट एक्सप्लोरर internet explorer) जोड़कर देता है। किंतु बहुत से लोग गूगल क्रोम (Google chrome) अथवा (Mozilla firefox) या इन जैसे ही किसी अन्य निःशुल्क ब्रौउज़र का इस्तेमाल करते हैं। ऐप्पल आइइओएस) (Apple iOS) के साथ सफारी (safari) का प्रयोग सामान्य बात है। हरएक की अपने खूबियां एवं कमियां हैं। इसी कड़ी में चीनी आईटी कंपनी यूसीवेब (UCWeb) का यूसी ब्राउज़र (UC browser) उपयोक्ताओं को निःशुल्क उपलब्ध है।

यूसी ब्राउज़र के बारे में कहा जाता है कि यह काफी तेज है अन्य ब्राउज़रों की तुलना में। डाउनलोड एवं उपलोड करने की गति अधिक बताई जाती है। ऐसा यह डेटा-कंप्रेशन (data compression) तकनीकी के इस्तेमाल से करता है। इस तकनीक का अर्थ है किसी फाइल का बाइटों में आकार उसमें निहित जानकारी को प्रभावित किए बिना छोटा करना ताकि डाउनलोड/उपलोड कम समय में हो जाये। कई उपयोक्ता अपनी भारी-भरकम फाइलों को किसी को भेजने या उपलोड करने में इस तकनीक का प्रयोग करते हैं। इस कार्य के लिए फाइल “ज़िप” (zip) करने हेतु अप्लिकेशन प्रोग्राम अर्थात् ऐप उप्लब्ध है। इसके विपरीत जिप की गई फाइल की प्राप्ति को उसके मूल (original) रूप में वापस पाने के लिए उसे “अनज़िप” (anzip) किया जाता। प्रचलित ब्राउज़र आम तौर पर यह सब नहीं करते। लेकिन यूसी ब्राउज़र करता है। चूंकि प्रचलित स्मार्टफोन इतने समर्थ नहीं होते इसलिए यह कार्य यह ब्राउज़र यूसी-वेब के केंद्रीय सर्वर के साथ मिलकर करता है। यही इसके खतरे का कारण बन सकता है, क्योंकि सर्वर उपयोक्ता के मोबाइल के गोपनीय आंकड़े चुरा सकता है।

यूसी ब्राउज़र चीन, भारत, एवं इंडोनेशिया में अधिक प्रचलित है, न कि अन्य देशों में। कई देशों में अपनी भाषा में अप्लिकेशन प्रोग्राम उपलब्ध रहते हैं शायद अन्य देशों की दिलचस्पी कम हो।

भारतीय आईटी पेशेवर

भारत के आईटी (information technology) के पेशेवर दुनिया भर में छाए हुए हैं और उनकी सभी जगह अच्छी साख है, चीन के पेशेवरों से कम नहीं शायद उनसे भी अधिक। लेकिन उनकी यह कमजोरी रही है कि वे पहले से स्थापित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी सेवा देते रहे हैं। भारत के कंप्यूटर युग के शुरुआती दौर में इन्फोसिस, एचसीएल, टीसीएस, विप्रो आदि जैसी दिग्गज कंपनियां स्थापित हुईं, लेकिन मेरे ध्यान में कोई कंपनी नहीं जो हाल के वर्षॉं में स्थापित हुई हो शीर्ष की कंपनियों में स्थान पा सकी हो। यहां के पेशेवरों ने विभिन्न संगठनों के कार्य-निष्पादन (working) के लिए प्रोग्राम विकसित किए हैं, जैसे भारतीय रेलवे, बैंक आदि। किंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि इन पेशेवरों ने आम आदमी के रोजमर्रा उपयोग के लिए आईटी प्रोग्राम विकसित करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई है और वे भारतीय भाषाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहे हैं। आपको शायद ही किसी संस्था की वेबसाइट भारतीय भाषाओं में मिले। राज्य सरकारों के राजकाज की भाषाएं क्षेत्रीय घोषित हैं, लेकिन उनका “ऑनलाइन” कार्य प्रायः अंग्रेजी में ही दिखाई देता है। इसके विपरीत चीनी पेशेवरों ने चीनी जनता के लिए चीनी (मेंडरिन) भाषा में अप्लिकेशन प्रोग्राम विकसित किए हैं। चीन के लोग यथासंभव चीनी भाषा का प्रयोग करते हैं अतः ऐसे प्रोग्राम लोकप्रिय होते रहे हैं। दुनिया वाले इन प्रोग्रामों के (अंग्रेजी संस्करण) अधिक न भी इस्तेमाल करें तब भी करोड़ों में उनके यहां उपयोगकर्ता मिल ही जायेंगे। भारतीय जन समुदाय देशज प्रोग्रामों के बदले अंग्रेजी में प्राप्य प्रोग्रामों में रुचि रखता है भले ही वे चीन में विकसित हों। इस मामले में हम कभी भी चीन की बराबरी नहीं कर सकते।

मुझे यह देख कोफ़्त होती है कि भारतीय युवा नये-नये ऐपों का आकर्षण झेल नहीं पाते है। आईटी आधारित नये-नये शौक पालने में उन्हें देर नहीं लगती। नयी चीजों के प्रति अति उत्साह हानिकर भी हो सकता है इसे नजरअंदाज करना उचित नहीं। – योगेन्द्र जोशी

 

पुनर्जन्म हिटलर का – चीन में पुरुषों के आनुवंशिक कूट-संकलन

शी जिनपिंग बनाम अडॉल्फ हिटलर

हिटलर कुख्यात शासक माना जाता है। शासकीय व्यवस्था में जहां कहीं ऐसा व्यक्ति दिखता है जो अपनी जिद में किसी भी हद तक जाने को तैयार हो, अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की सोचता हो, उसे हिटलर की संज्ञा दे दी जाती है। हिटलर यहूदियों पर अत्याचार के लिए जाना जाता है; उन्हें गैस-चैंबर में ठूंसकर मारा गया यह इलजाम हिटलर पर लगाया जाता है। हिटलर दुनिया पर राज करना चाहता था और जर्मन “श्रेष्ठता” स्थापित करना चाहता था। लेकिन उसका अंत जर्मनी की बरबादी एवं विभाजन के साथ हुआ।

हिटलर की मृत्यु विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय १९४५ में हुई। तब से बहुत कुछ बदल चुका है। उस काल में डिजिटल तकनीकी जैसी कोई चीज नहीं थी। आज यह तकनीकी पर्याप्त विकसित है और राष्ट्रों की व्यवस्था काफी हद तक इसी तकनीकी पर निर्भर है। शांति स्थापित करना हो या युद्ध लड़ना हो निर्भरता इसी तकनीकी पर आ ठहरती है। इसलिए आज जिसे हिटलर कहा जाना हो उसके तौर-तरीके बीते जमाने के हिटलर से भिन्न होंगे ही। लेकिन ऐसे व्यक्ति की सोच तथा इरादे भिन्न नहीं होंगे। अपने इन विचारों के परिप्रेक्ष में मुझे चीन की साम्यवादी (कम्यूनिस्ट) पार्टी के महासचिव एवं देश के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) में मुझे हिटलर की छवि दिखाई देती है।

आठ-दस रोज पहले मुझे न्यूयॉर्क-टाइम्ज़ (New York Times)  की वेबसाइट पर एक लेख (अंग्रेजी में) पढ़ने को मिला। शीर्षक था

“China Is Collecting DNA From Tens Of Millions of Men And Boys, Using U.S. Equipment”

लेख की लेखिका हैं चीनी मूल की सुइ-ली वी (Sui-Lee Wee) जो बेजिंग में न्यू-यॉर्क टाइम्ज़ की संवाददाता हैं। उक्त लेख का आरंभिक अनुच्छेद/वाक्य ये हैः

“The police in China are collecting blood samples from men and boys from across the country to build a genetic map of its roughly 700 million males, giving the authorities a powerful new tool for their emerging high-tech surveillance state.”

जिसका हिंदी अनुवाद कुछ यों होगाः

“करीब 70 करोड़ पुरुषों के आनुवंशिक कूट तैयार करने के लिए चीन की पुलिस देश के कोने-कोने से आदमियों एवं बालकों से खून के नमूने इकट्ठा कर रही है जिससे उच्च तकनीक की निगरानी/चौकसी की उभरती प्रणाली अधिकारियों को मिल सके।”

क्या मकसद है इस पूरी कवायद का? मैं यही समझता हूं कि जीवन-पर्यन्त चीन के राष्ट्रपति बन चुके शी जिनपिंग हर प्रकार का विरोध कुचल सकें और स्वयं को दुनिया का सबसे ताकतबर नेता बन सकें। उनके अरमान अमेरिका के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र होने का “पद” छीन सकें। मकसद कमोबेश वही है जो हिटलर के थे। शी जिनपिंग हिटलर के आधुनिक अवतार हैं। 

इस लेख के कुछएक बिंदुओं को मैं पाठकों के सामने रख रहा हूं। जो किया जा रहा है और जो उसके संभावित उपयोग/दुरुपयोग होंगे उसका आकलन वे स्वयं कर सकते हैं।

लेख में ऑस्ट्रेलियन स्ट्रीटिजिक पॉलिसी इंस्टिट्यूट (Australian Strategic Policy Institute) का जिक्र करते हुए कहा गया है कि चीन में 2017 से ही नमूने संकलित करने का कार्य चल रहा है। इससे निर्मित आंकड़ाकोष (database) से किसी व्यक्ति के खून, लार एवं अन्य शारीरिक तत्वों के अध्ययन द्वारा उसके रिश्तेदारों का पता लग जायेगा।

इस कार्य में अमेरिका की थर्मो-फिशर कंपनी परीक्षण-किट मुहैया करा रही है।

इस परियोजना (प्रॉजेक्ट) का उद्येश्य चीन की आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से  लोगों, विशेषतः लक्षित प्रजाति समुदायों (ethnic communities), को नियंत्रण में रखने की विधियों को विस्तार देना है। उन्नत कैमरों, मुखाकृति पहचान, और कृतिम बुद्धि (AI) का इस्तेमाल पुलिस बल पहले से ही कर रहा है।

पुलिस का कहना है उन्हें ऐसे आंकड़ाकोष की आवश्यकता है। इसकी मदद से अपराधियों को पकड़ना आसान होगा। कुछ अधिकारी एवं देश के बाहर के मानवाधिकार समूह चिंता व्यक्त करते हैं कि निजता में हस्तक्षेप और असहमतों (असंतुष्टों, dissidents) के संबंधियों को परेशान करने में इसका दुरुपयोग होगा। ये नमूने व्यक्ति की सहमति के साथ नहीं लिए जा रहे हैं। अधिकारवादी शासन में किसी का असहमत होना माने नहीं रखता। वैसे अधिकांश लोग विरोध में है।

“ह्यूमन राइट्स वॉच” की माया वांग (Maya Wang) के अनुसार किसी सक्रिय जन से कौन अतिनिकटता से संबंधित है यह पता लगाने का विचार ही सिहरन पैदा करता है।

यह कार्यक्रम स्कूलों में भी चल रहा है। जो कोई खून का नमूना नहीं देगा उसके परिवार को “काली सूची” (black household) दर्ज होगा और उसे शासन-प्रदत्त लाभों से वंचित होना पड़ेगा।

नजर रखना चीनी पुरुषों पर

मान्यता है पुरुषों में अपराधी अधिक होते हैं। लेख में एक उदाहरण दिया है कि किस प्रकार जीन-तकनीकी के प्रयोग से चीनी मंगोलिया के 11 किशोरियोँ-युवतियों के हत्यारे को 2016 में पकड़ा गया। हत्यारे का DNA नमूना तो मिला लेकिन उसकी पहचान नहीं हो पाई। 2016 घूस के मामले में एक व्यक्ति पकड़ा गया जिसका DNA नमूना उस अपराधी के सन्निकट था। इस DNA परीक्षण से उस अपराधी तक पहुंचना संभव हुआ जो इस व्यक्ति से संबंधित निकला।

चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा आनुवंशिक आंकड़ा भंडार है। संदिग्ध अपराधियों के आंकड़े इकट्ठे किए जाते रहे हैं ताकि वे कहीं अस्थिरता न फैलाएं। पुलिस ने उईगर (वीगुर, Uyghurs) मुस्लिम समुदाय तथा तिब्बतियों के आंकड़ों को खास तौर पर एकत्रित किया है ताकि उन पर साम्यवादियों (communists) का नियंत्रण बना रहे। हाल में पुरुषॉ के आनुवंशिक नमूने लेने में तत्परता बढ़ गयी है। आबादी के 5 से 10 प्रतिशत पुरुषों के नमूने इकट्ठा करने का लक्ष है। इनकी मदद से अन्य पुरुषों (संबंधीजनों) के DNA चरित्र की जानकारी मिल जाएगी। पुलिस ने डॉंग्लान एवं गुआंक्शी क्षेत्र से करीब 10% पुरुषों के नमूना पा लिये हैं।

परिक्षण-साधन चीन की कंपनियों से खरीदे गये लेकिन कुछ का ऑर्डर अमेरिकी थर्मो-फिशर को भी मिला। थर्मो-फिशर को विशेष चिन्हक (gene-marker) के लिए चुना है ऐसा कंपनी का दावा है। आनुवंशिक चिह्नकों को चीनी मानव-प्रजातियों विशेष तौर पर वीगुर मुस्लिमों एवं तिब्बतियों को ध्यान में रखकर चुना गया है। थर्मो-फिशर के परीक्षण-साधन के संदर्भ में वैज्ञानिकों, नीतिशास्त्रीजनों (ethicists), मानवाधिकारवादियों का मत है कि इस विधा का दुरुपयोग सामाजिक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।

निजता एवं सहमति

अभी आंकड़ा-भडांर बढ़ाया जा रहा है, किंतु इसका उपयोग शुरू हो चुका है। चीनी पुलिस का एक तंत्र “डीएनए स्काईनेट” (DNA Skynet) है जिसमें इसका इस्तेमाल चौकसी (surveillance) के लिए होने जा रहा है। शार्प आई (Sharp Eye) नामक परियोजना में इसे इस्तेमाल किया जाएगा।

चीन के लोग उनके इंटरनेट-प्रयोग तथा अन्य कार्यों में सरकरी दखलंदाजी को स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन मौजूदा DNA नमूनों के मामले में विरोध अवश्य दिख रहा है। इस मामले में अभी कोई कानून नहीं है। मार्च माह में चीन की शीर्ष सभा (Parliament) में दो प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि जैसे-जैसे तकनीकी आगे बढ़ती है वैसे-वैसे उपयोक्ताओं के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। [चीन में विरोध तो कर नहीं सकते, सरकार की मेहरवानी की आस रहती है।]

अधिकारी देहाती क्षेत्रों में नमूने लेने के लिए चुपचाप आगे बढ़ रहे है जहां इस प्रोग्राम और उसके निहितार्थ की समझ लोगों में नहीं है। इन इलाकों में अधिकारी गर्वान्वित दिखाए देते हैं और स्कूलों के बच्चों के खून-नमूने लेते हुए फोटो प्रचारित करते हैं। इन फोटो में दिख रहे लोग खून के नमूने लेने का प्रयोजन शायद ही ठीक से समझते हैं। साक्षात्कारों एव सोशल मीडिया की पोस्टों से लगता है कि नमूना न देने पर सजा हो सकती है।

जियांग नाम के कम्प्यूटर एन्जीनियर के कथनानुसार खून का नमूना देने के लिए उसे अपने गांव जाने को कहा गया। वह अस्पताल गया और उसे भुगतान करना पड़ा था। न उसने नमूना लेने का कारण पूछा और न ही उसे बताया गया। चीनी लोगों को अपना पहचान पत्र सदैव साथ रखना पड़ता है इसलिए अधिकारियों से पहचान छिप नहीं सकती।

जनसामान्य के अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों का कहना है कि आनुवंशिकी विज्ञान ने चीनी अधिकारियों को नापसंद जनों पर अभियोग चलाने के मौके दे दिये हैं। उन्हें शंका है कि DNA आंकड़े को असंतुष्टों [राजनैतिक dissidents] के विरुद्ध पुख्ता सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता। बीजिंग पुलिस ने कुछ मामलों में ऐसा प्रयोग किया भी है।

निजता के पक्षधर एक चीनी नागरिक ली वेइ (Li Wei) की बात लेख में पेश है। ली का कहना है कि खून या लार आदि के ममूने पुलिस के पास हों तो वे आपराधिक बारदाद के स्थान पर छोड़े जा सकते हैं और उनका दुरुपयोग व्यक्ति को फंसाने में हो सकता है। अपने खुद का अनुभव उन्होंने बताया कि कैसे एक होटल में पुलिस उनके पास पहुंची और पुलिस स्टेशन चलने की और DNA नमूने की मांग करने लगी। उन्होंने मना किया; उन्हें मारा-पीटा गया, पर वे माने नहीं।

ऐंबर वांग (Amber Wang) तथा लियु यी (Liu Yi) के शोधकार्य का लेख को योगदान रहा है। लेख में कई फोटो शामिल हैं जिन्हें मैं यहां नहीं प्रस्तुत कर रहा हूं। उनके लिए मूल लेख देखना पड़ेगा। – योगेंद्र जोशी

कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई

कोरोना संक्रमण

पूरी दुनिया इस समय ऐसी विपदा झेल रही है जिसकी दूर-दूर तक किसी को आशंका नहीं थी। चीन से चले कोरोना (COVID-19) नामक विषाणु ने अनेक विश्व-नागरिकों को तेजी से रोगग्रस्त कर दिया है और उनमें से कई काल के गाल में भी समा गए हैं। यह विषाणु कहां से आया, कैसे पैदा हुआ, जैसे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। विश्वसमुदाय में कई जन मिल जाएंगे जो इसे चीनियों के उस खानपान से जोड़कर देखते हैं जिसमें कुछ भी अखाद्य नहीं होता यदि वह विषैला न हो तो। कहते हैं कि वहां कुत्ते-बिल्ली, मेढक-सांप, चूहे-चमगादड़, आदि सभी का मांस भक्षणीय माना जाता है। कदाचित इस विषाणु का स्रोत चमगादड़ है। कदाचित!

लेकिन लोग इस संभावना से आगे चलकर भी देखते हैं। कइयों को शंका है कि यह चीन की किसी चूक का दुष्परिणाम है; अथवा चीन ने यह विषाणु जैविक हथियार के तौर पर ईजाद किया है और जानबूझ कर अनेक देशों के लोगों को संक्रमित कर दिया है। अपनी बात सिद्ध करने को किसी के पास पुख्ता प्रमाण नहीं हैं; बस चीन पर अविश्वास ही उनकी सोच का आधार है।

इसमें दो राय नहीं कि इस विषाणु का फैलाव बड़ी तेजी से हुआ और हो रहा है। यह माना जा रहा है कि यह रोगियों के छींकने पर, सांस की प्रक्रिया में और बोलते वक्त नाक-मुंह से निकले अत्यंत सूक्ष्म जलबिंदुओं (ड्रॉपलेट) में स्थित विषाणुओं से एकदूसरे में फैलता है।

अभी उपचार का कोई कारगर तरीका खोजा नहीं जा सका है। दुनिया के सभी कोनों में भांति-भांति के तरीके अपनाए जा रहे हैं, शायद कोई कारगर सिद्ध हो जाए। प्रभावी दवा के अभाव में एकदूसरे के संपर्क से बचना ही वांछित तरीका है। इसके लिए कई देशों ने “लॉकडाउन” का रास्ता अपना लिया है जिसके तहत लोगों को घरों में सीमित रहने की सलाह दी गई है और कई उद्यमों और कार्यालयों को फिलवक्त अस्थाई बंदी झेलनी पड़ रही है। अपने देश में भी प्रधानमंत्री ने २४ तारीख की अर्धरात्रि से त्रिसाप्ताहिक लॉकडाउन घोषित किया है।

आर्थिक हानि

दैनिक मजदूर इस बंदी के कारण अपने मूल स्थान गांवघरों को लौटने को मजबूर हो चुके हैं। वे लोग बेहद परेशानी झेल रहे हैं। लोगों को सभंलने के लिए २४ घंटे का समय तो मोदीजी को देना ही चाहिए था। निर्णय के कार्यान्वयन में उतावलापन न दिखाते तो रोग के प्रसार में खास फर्क न पड़ता। मैं घर से दूर कुछ करने में असमर्थ हूं। घर पर भी होता तो वृद्धावस्था आड़े आती। चंदे के रूप थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद की जा सकती वह मैं कर रहा हूं।

पूरे विश्व के भयावह आर्थिक हानि और मंदी के दौर से गुजरने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं। आने वाले समय में उक्त विषाणु मानव समाज को किस हालात में छोड़ेगा यह पूर्णतः अनिश्चित है।

मैं स्वयं कैसे इस मौजूदा हालात से तालमेल बिठा रहा हूं इसे बताने का मन हुआ सो लिख रहा हूं।

लॉकडाउन – आवागमन बंद

हम, (पत्नी तथा मैं) इस समय महानगर बेंगलूरु में हैं, अपने बेटे-बहू-पोते के पास अपने स्थाई निवास वाले शहर वाराणसी से करीब २००० किलोमीटर दूर। आये तो थे केवल महीने भर के लिए और बीते माह (मार्च) की २२ तारीख हवाई टिकट से लौटना था। लेकिन अब यहीं फंसकर रह गये हैं। असल में उस दिन (२२ ता.) के लिए अपने प्रधान मंत्री मोदीजी ने एक-दिवसीय “जनता कर्फ्यू” की घोषणा कर दी। वाराणसी के मेरे मित्रों की सलाह थी कि वहां हवाई अड्डे से घर आने के लिए टैक्सी वगैरह की उपलब्धता की समस्या हो सकती है, अतः उस दिन की यात्रा टाल देना ही उचित होगा। हवाई सेवा वाली कंपनी भी बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा निरस्त करने के या यात्रा की तिथि आगे बढ़ाने की सुविधा दे ही रही थी।

हमने भी सोचा कि अगले २३, २४, या २५ ता. निकलना बेहतर होगा। दरअसल हम वाराणसी यथाशीघ्र पहुंचना चाहते थे ताकि २५ ता. से आरंभ हो रहे नवरात्र पर्व पर वहां रहें और नौ-दिवसीय फलाहारी उपवास पर रह सकें जिसकी समुचित व्यवस्था यहां पर नहीं हो पा रही थी। वाराणसी के स्थायी बाशिंदा होने के कारण हमारे लिए वहां वांछित व्यवस्था करना आसान था। उपवास तो अभी भी चल रहा है किंतु रात्रि भोजन में अन्नाहार अपना लिया है। संयोग से २४ ता. की अर्धरात्रि से लॉकडाउन हो गया और यात्रा की संभावना फिलवक्त समाप्त हो गई।

हम बेंगलूरु के जिस बहु-आवासीय परिसर में रह रहे हैं वह काफी बड़ा है। २३ बहुमंजीले इमारतों में अनुमानतः २००० फ्लैट होंगे और निवासियों की संख्या ६००० से अधिक ही होगी।  परिसर के चारों ओर टहलने में करीब आधा घंटा लग जाता है। आजकल बमुश्किल चार-छः लोग टहलते दिखते हैं जब मैं बाहर निकलता हूं। अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में दुबके रह रहे हैं।

अभी लॉकडाउन की शुरुआत है, इसलिए लोग ऊब नहीं रहे होंगे। लेकिन सोशल मीडिया में कुछ लोगों की बेचैनी के वीडियो देखने को मिल रहे हैं। इन पर विश्वास नहीं होता, पर यदि ऐसा हो तो आश्चर्य भी नहीं होगा। कुछ लोगों को घर पर समय बिताना (या समय काटना!) वास्तव में कठिन होता है। इसका कारण है रोजमर्रा के कामधंधे से जुड़े कार्यों से मुक्त होने पर कुछ नया करने के उत्साह का अभाव। जब कामधंधे से भिन्न रुचियों का अभाव हो तो क्या करूं, क्या करूं की बेचैनी स्वाभाविक होती है।

दिनचर्या बदल-सी गई है

सौभाग्य से मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। मेरी रुचियों में पर्याप्त विविधता है। इसलिए मेरे लिए २४ घंटे का समय व्यतीत करना कठिन काम नहीं रहता। यहां घर से दूर भी मेरी सुनियोजित दिनचर्या है।

प्रातःकाल थोड़ा विलंब से उठना हो पाता है, छः-पौनेछः बजे। वाराणसी में होता तो पांचः-पौनेपांच बजे तक उठ जाता। उसके बाद शौच-स्नानादि का कार्य संपन्न करता हूं। पश्चात थोड़ा-बहुत्त प्राणायाम एवं यौगिक व्यायाम भी संपादित कर लेता हूं। इस बीच पत्नी महोदया भी स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर नित्यपूजा (संप्रति संक्षिप्त) में लग जाती हैं और मैं नहाने का कार्य पूरा करने स्नानागार चला जाता हूं। चूंकि रोजमर्रा के कपड़े अपने-अपने हाथ से धोने की हम दोनों की आदत है, अतः नहाने में थोड़ा अधिक समय लग जाता है। मेरे नहाने-धोने के दौरान परिवार का कोई एक सदस्य चाय तैयार कर लेता है।

यहां हिंदी समाचार-पत्र मुश्किल से मिलते हैं और आजकल तो वह भी संभव नहीं। कागज पर छपा समाचार-पत्र पढ़ना मुझे आसान एवं आरामदेह लगता है। मेरी आदत वर्षों से ‘दैनिक जागरण’ के वाराणसी संस्करण पढ़ने की बन चुकी है और उसकी ई-प्रतिलिपि (ई-पेपर) से मेरा काम चल जाता है। चाय की चुस्कियों के साथ तथा उसके कुछ समय बाद तक मेरा ई-पेपर पढ़ना जारी रहता है।

घड़ी की सुइयां अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं और इतना सब करते-करते साड़ेदस-ग्यारह बज जाते हैं। तब मैं बाहर निकलता हूं आधा-पौनघंटे के लिए  टहलने। मैं वाराणसी में होता तो यह कार्य प्रातः-काल ही कर चुकता, किंतु यहां यह दोपहर तक हो पाता है। टहलना मेरे नित्यकर्मों का एक अनिवार्य हिस्सा रहता है जिसकी सलाह मुझे अपने डाक्टर से मिली है। आजकल यहां आसमान साफ है लॉकडाउन की मेहरबानी से जिसने प्रदूषण स्तर बहुत घटा दिया है। इसलिए धूप एकदम चटक रहती है, परंतु उससे मुझे कोई परेशानी नहीं होती। दिन का शेष समय लैपटॉप पर लेखन-पठन, टेलीविज़्-समाचार सुनने, अथवा पोते के साथ खेलने आदि में गुजर जाता है। इनके अतिरिक्त घर के भीतर छिटपुट कामों में अन्य सदस्यों को सहयोग देने में भी बीतता है।

कुल मिलाकर लॉकडाउन के इस काल में २४ घंटे का समय व्यतीत करना मेरे लिए कोई समस्या नहीं रहती। मेरा कष्ट इस बात को लेकर है कि यदि में अपने स्थाई निवास वाराणसी में होता तो घर-बाहर के विविध कार्य निबटा रहा होता, जैसे अपने अहाते के छोटेबड़े पौधों या गमलों में लगे पौधों की काटछांट, करने, उन्हें खादपानी देने का काम कर लेता। या घर के भीतर भी घर-गृहस्थी से जुड़े काम निकल ही जाते हैं; उनका भी समाधान निकालता। या किसी पुस्तक अथवा पत्रिका का अध्ययन कर लेता। यहां पर वह सब न पा सकने की विवशता तो है ही। देखिए कब तक यह सब चलता है। – योगेंद्र जोशी

11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

बेटे की करतूत – बाप की शर्मिंदगी (चीन की खबर)

“चीनी सेना के एक जनरल और गायक ने उस जोड़े से माफ़ी मांगी है जिसे उनके पुत्र ने सड़क पर हुई लड़ाई के दौरान पीट दिया था.”
ये हैं बीबीसी की इंटरनेट साइट (BBC website) पर छ्पी एक खबर के आरंभिक शब्द। खबर के अनुसार चीनी सेना के एक जनरल के बेटे और उसके साथी का सड़क पर एक दंपती से झगड़ा हो गया, जिसके बाद उन्होंने दंपती की पिटाई कर दी। घायल पति-पत्नी को अस्पताल में भरती कराना पड़ा। जनरल महोदय स्वयं अस्पताल पहुंचे जहां उन्होंने माफ़ी मांगते हुए ये शब्द भी बोले:
“पिता के तौर पर मैं अपने पुत्र के व्यवहार की ज़िम्मेदारी लेता हूं. मैं इतना शर्मिंदा हूं कि अब आप चाहें तो मेरी पिटाई कर दें. मैं अपने बेटे की ग़लतियों का पक्ष नहीं लूंगा.”

उक्त समाचार यह भी बताता है कि ऐसी ही एक घटना पिछ्ले वर्ष भी हुई थी जिसमें एक पुलीस उच्चाधिकारी के बेटे ने दो छात्रों को रौंदा था, जिसमें एक की बाद में मौत हो गयी। मीडिया में तब भी खूब चर्चा हुई थी और अपराधी को सजा भी दी गयी।

समाचार के अनुसार चीन में भी भारत की तरह उच्चपदस्थ अधिकारियों के बच्चे अपने बाप का रुतवा दिखाकर अपराधों से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन वहां के सख्त कानून के सामने वे हारमान हो जाते हैं। अपने यहां तो ऐसे बिगड़ैल युवकों के उच्च संबंध उन्हें बचाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं, और ये युवक बच निकलते हैं। यहां के बापों का माफ़ी मांगना तो असंभव-सा है। चीन में अपने बच्चों की गलत हरकतों के लिए माफ़ी तो मांगी जाती है। यहां तो चोरी और उपर से सीनाजोरी चलती है। कुछ फ़र्क तो है ही चीन और अपने महान्‌ देश में! – योगेन्द्र जोशी