निर्वाचन आयोग की दोषपूर्ण कार्यशैली और दोहरे मतदान की संभावना

[इस आलेख में उल्लिखित चुनाव संबंधी अनुभव का कथा रूपांतर अन्यत्र प्रस्तुत किया गया है ।]

हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में वाराणसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यहां से भाजपा के बहुचर्चित प्रत्याशी और देश के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे और उनको चुनौती दे रहे थे आप पार्टी के नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के अजय राय, सपा के कैलाश चौरसिया, तथा बसपा के विजय जायसवाल । वैसे मैदान में कुल 42प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे जिनमें अधिकतर वे थे जिनका नाम पहले कभी न सुना गया था और न चुनाव के बाद ही सुना गया । अज्ञात श्रेणी के ऐसे प्रत्याशी चुनाव क्यों लड़ते होंगे यह मेरी समझ मैं कभी नहीं आया । ऐसे प्रत्याशियों का योगदान चुनाव प्रक्रिया को पेचीदा बनाने के अलावा कुछ भी रचनात्मक रहता होगा यह मैं नहीं सोच सकता । वाराणसी में प्रत्याशियों की इतनी बड़ी संख्या के लिए हर निर्वाचन स्थल पर तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था करनी पड़ी थी । ज्ञातव्य है कि एक वोटिंग मशीन में केवल 16बटनों का प्रावधान रहता है । मैं समझता हूं कि  मतदाताओं को मशीन पर अपने मनपसंद प्रत्याशी का नाम/चुनाव-चिह्न खोजने में अवश्य दिक्कत हुई होगी ।

सुना जाता है कि चेन्नै में भी 42प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे । अवश्य ही ऐसे “फिजूल”के प्रत्याशी चुनाव की गंभीरता का सम्मान नहीं करते और संविधान द्वारा प्रदत्त चुनाव लड़ने की आजादी का मखौल उड़ाते हैं । आयोग और देश की विधायिका को चाहिए कि ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोके जाने का रास्ता खोजें, अथवा उन्हें गंभीरता बरतने के लिए प्रेरित करें ।

इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र का रुतवा हासिल कर चुके वाराणसी का मैं तथा मेरी पत्नी दशकों से मतदाता हैं । हम दोनों लंबे अर्से से अपने मतदान का प्रयोग करते आ रहे हैं । पिछले बारह-तेरह वर्षों से मैंने किसी के भी पक्ष में मतदान न करने की नीति अपना रखी है । (पत्नी अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेती हैं !) मेरा मानना है कि अपने लोकतंत्र में छा चुके तमाम दोषों के लिए अपनी मौजूदा राजनैतिक जमात ही जिम्मेदार है । आप कभी एक को तो कभी दूसरे को मत देकर चुने गए जनप्रतिनिधि तो बदल सकते हैं, किंतु राजनैतिक बिरादरी का स्वरूप नहीं बदल सकते हैं । इसलिए चाहे मोदी आवें, या राहुल अथवा केजरीवाल, वस्तुस्थिति उल्लेखनीय तरीके से बदलने वाली नहीं है । मैं आमूलचूल बदलाव का हिमायती हूं । मुझे “नोटा”बटन में ही उम्मीद दिखती है, इसलिए उसी को इस्तेमाल करता हूं । अब तो नोटा बटन है, पहले उसके बदले एक फार्म (फॉर्म 17ए आयोग के नियम 49-ओ के अंतर्गत) भरना होता था ।

दो-दो मतदाता सूचियां

चुनाव में भाग लेने के लिए मतदान केंद्र पर पहुंचने पर पता चला कि वहां दो परस्पर भिन्न मतदाता सूचियों के अनुसार मतदान हो रहा है । हमें यह देख हैरानी हुई कि एक तरफ इन सूचियों से कुछ मतदाताओं के नाम गायब थे तो दूसरी तरफ कुछ के नाम दोनों में ही मौजूद थे । मतदान की प्रक्रिया दो कमरों संपन्न की जा रही थी – पहले कमरे में एक सूची तो दूसरे में  अगली सूची के अनुसार । साफ जाहिर में कि कुछ मतदाता दो बार मत दे सकते थे, बशर्ते कि वे उंगली पर लगाए गये निशान को मिटा सकें । हम दोनों का ही नाम सही फोटो के साथ दोनों सूचियों में मौजूद थे ।

मैंने तो पहली सूची के अनुसार मत दे दिया, लेकिन मेरी पत्नी को यह कहकर संबंधित मतकर्मियों ने लौटा दिया कि वे कालोनी की मतदाता होती थीं लेकिन स्थान छोड़ देने के कारण अब वह मतदाता नहीं रहीं । इसके लिए उन्होंने “विलोपित”श्रेणी का जिक्र किया । खैर पत्नी महोदया लाइन में लगकर दूसरे कमरे में मतदान कर आईं जहां मैं भी जा सकता था ।

यह हमारी समझ से परे था कि क्यों मेरी पत्नी “विलोपित”हो गईं जब कि मैं “विलोपित”नहीं हुआ । इससे अधिक अहम सवाल यह है कि हूबहू एक ही विवरण के साथ दो सूचियां कैसे बनाई गई थीं और क्यों इस्तेमाल हो रही थीं । मैं स्वयं देख चुका था कि मुझसे संबंधित विवरण दोनों में एकसमान था ।

दोहरा मतदान

मैं कह चुका हूं कि एक ही मतदाता का नाम दो-दो सूचियों में मौजूद होने पर दोहरे मतदान की गुंजाइश बनती है । इस बात का एहसास मुझे दूसरे दिन एक युवक से भेंट होने पर हुआ । उसने मुझे बताया कि वह एक बार पहली सूची के अनुसार वोट डालकर घर लौटा; पपीते की चेप से उसने उंगली पर लगा निशान मिटाया; और फिर दूसरी सूची के अनुसार वोट डाल आया । यह भी बता दूं कि वह किसी और मतदान केंद्र का मतदाता था । इसका मतलब यह हुआ कि दो-दो (या अधिक?) सूचियों का प्रयोग कई मतदान केंद्रों पर हो रहा था ।

मुझे शंका है कि चुनाव उतने साफ-सुथरे नहीं होते है जितना दावा किया जाता है । कहीं मतदाताओं के नाम ही गायब रहते हैं तो कहीं दोहरा मतदान भी कुछ लोग कर लेते हैं । निर्वाचन आयोग को इस संदर्भ में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है । – योगेन्द्र जोशी

चुनाव आयोग का राहुल गांधी से सवाल – क्या हो राहुल का जवाब

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

 

बेचारे राहुल गांधी, कांग्रेस के स्टार प्रचारक और लगभग सर्वेसर्वा । बुलंदशहर के हालिया दंगों को लेकर उन्होंने जो उल्टासीधा बोल दिया वह अब उनके गले की हड्डी बन गया है । (देखें 29 अक्टूबर की पोस्टसमझ में नहीं आता कि उन्होंने जो कुछ कहा वह निहायत नादानी में कह दिया या सोचसमझकर । इस बात को शायद वह भी खुद ठीक से नहीं जानते होंगे । बस जोशोखरोश में मन में कुछ आया और बोल गए, आगा-पीछा देखे बिना ।

राहुल गांधी अभी राजनीति में कच्चे खिलाड़ी हैं । कांग्रेसजन तो उन्हीं को आगे करने में उतावले हैं, और उनकी नजर में वे ही प्रधानमंत्री पद के योग्यतम व्यक्ति हैं, क्योंकि वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के वंशज हैं और राजनीति में निपुणता उनको उनसे विरासत में मिली हैं । वे भूल जाते हैं धनसंपदा-जमीन-जायदाद तो कानूनन विरासत में मिलती है, लेकिन किसी विषय में महारत या नैपुण्य नहीं । खैर, होगी क्रांग्रेसजनों की भी कोई मजबूरी !

इन बातों पर लंबी बहस संभव है । मुझे अभी उसमें पड़ने की जरूरत नहीं है । मेरी चिंता तो इस बात को लेकर है कि चुनाव आयोग ने उनसे उनके उपरिकथित दंगों के संदर्भ में स्पष्टीकरण मांग डाला है, जिसका उत्तर वे अभी तक नहीं दे पाए और जिसके लिए उन्होंने हफ्ते भर की मोहलत और मांगी है । जो कहा उसके लिए वे कुछ ऐसी सफाई देना चाहेंगे कि उन्हें शर्मसार न होना पड़े । क्रांग्रेसजन तो अभी तक उनका बचाव करते ही आ रहे हैं । उनकी भी कुछ किरकिरी होनी लाजिमी है । इस मौके पर मेरे दिमाग में एक स्पष्टीकरण सूझ रहा है । काश! कि यह उन तक पहुंच जाए । यों उनके पास तो एक से एक धुरंधर कानूनी सलाहकार होंगे । उन्हीं की पार्टी में अनेकों हैं । फिर भी विधिवेत्ता कभी-कभी चूक कर जाते हैं, जैसे जेठमलानी आत्मविश्वास की अतिशयता में बापू आसाराम को बचाने के चक्कर में बिना किसी प्रमाण के उस नाबालिग को ही दिमागी तौर पर असंयत बता बैठे, जिसने आसाराम पर आरोप लगाए हैं । हां, तो मेरी सफाई कुछ यों है:

“मेरे पास एक आदमी आया था जिसका कहना था कि वह अमुक खुफिया एजेंसी में कार्यरत है । मैं झूठ नहीं बोलूगा; मैंने उस पर भरोसा कर लिया । मुझे लगा कि यह व्यक्ति मुझ तक यों ही नहीं पहुंच गया होगा । उस आदमी को मेरी उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था से गुजरना ही पड़ा होगा । सुरक्षाकर्मियों ने अवश्य ही उसके बारे में पूरी जांच की होगी और उसके दावे को सही पाया होगा । मैं खुद अपने से मिलने वालों की जांच कभी नहीं करता, सो इस बार भी वैसा करने की जरूरत नहीं थी । उस व्यक्ति ने मुझे जो बताया वह सब जगजाहिर है । उसने वह सब मुझे बताना चाहिए था या नहीं इसका ख्याल तो उसे रहा ही होगा । उसे तो अपने खुफिया तंत्र के सर्विस-रूल्स मालूम ही होंगे । उसने जो कुछ बताया वह क्यों बताया, जब इस सवाल पर मैंने गंभीरता से विचार किया तो यही समझ में आया कि दंगों के दुष्परिणामों की हकीकत देश की जनता के सामने आनी चाहिए । लोगों को जानने का हक है इसीलिए तो हम आर.टी.आई. कानून लाए थे । जब देश में कोई आंतकी घटना होती है तो उसे छिपाते नहीं हैं । उसकी चर्चा करते हैं और पाकिस्तानी आई.एस.आई. की भूमिका की बात करते हैं । ठीक उसी तर्ज पर मैंने वे बातें कहीं जिनकी सफाई मुझसे मांगी जा रही है । इसे यदि मेरी गलती मानी जाती है तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं । अगर गलती उस खुफिया-कर्मी की है तो उसकी सफाई वही दे सकता है । और यदि वह व्यक्ति खुफियाकर्मी ही नहीं था तो गलती मेरे सुरक्षकर्मियों की है और वे ही उसकी सफाई दे सकते है ।”

जाहिर में कि पूरा मामला लंबीचौढ़ी जांच का बन जाता है । उसके लिए एक जांच कमिशन होना चाहिए जिसके नतीजे सालों में आएं । अंततः मामला रफादफा हो जाए । मेरी दिली तमन्ना है कि ऐसा ही हो ! – योगेन्द्र जोशी