गण्तंत्र दिवस 2017 – खोया अधिक और पाया कम

आज 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद शासकीय व्यवस्था के लिए स्वीकृत संविधान के प्रभावी होने के प्रथम दिन (सन् 2050) की स्मृति में मनाये जाने वाला राष्ट्रीय उत्सव।

इस अवसर पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी हृदय से शुभेच्छाएं।

विगत वर्ष की एक स्मराणीय बड़ी शासकीय घटना “विमुद्रीकरण अर्थात् नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों से अब कुछ हद तक देशवासी उबर चुके होंगे, और बचीखुची अड़चनों से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे यह मेरी आशा और अपेक्षा है।

देशवासी आज के दिन हर्षित होंगे ही। अपने लोकतंत्र की सफलता को लेकर काफी हद तक संतुष्ट एवं भावी काल के लिए आशान्वित होंगे ही। मैं स्वयं को एक अपवाद के रूप में देखता हूं। कदाचित कुछ गिनेचुने अन्य जन भी मेरी तरह सोचते होंगे। मैं इस दिन, और इसी प्रकार स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), पर खुद को संतुष्ट नहीं पाता।

क्या हमारे गणतंत्र की खामियां – जो भी रही हों – समय के साथ दूर हुयी हैं? क्या हमारी राजनीति दिन-ब-दिन सुधार की दिशा में अग्रसर हुई है? क्या जिन उद्येश्यों के साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई थी वे पूरे हुए हैं? या उनके पूरे होने की ओर हम संतोषप्रद तरीके से बढ़ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्न जब मेरे मन में उठते हैं तो मैं स्वयं को संतुष्ट नहीं देख पाता। मेरी सोच और दृष्टि में दोष है, अथवा वस्तुस्थिति ही जैसी होनी चाहिए उसके निकट नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अन्य जन ही मुझे दे सकते हैं।

इसके पहले कि मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूं मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कुछ लोगों की नजर में गणतंत्र (अंग्रेजी में रिपब्लिक) जनतंत्र/लोकतंत्र (डेमोक्रसी) का ही पर्याय है। हमारे गणतंत्र में देश के राज्य गणतांत्रिक इकाइयां हैं, जिनमें से प्रत्येक स्वयं में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाये है। मुझे शंका है कि संघशासित प्रदेश (यूनियन-गवर्न्ड टेरिटरी) एक इकाई वाली इस परिभाषा में आते हैं कि नहीं। वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं अतः “गण” की परिभाषा उन पर लागू नहीं होती है। अतः मेरे मत में देश को किंचित् परिवर्तित गणतंत्र कहना अधिक उचित होगा। अस्तु, इस बात को विशेष महत्त्व देने की जरूरत नहीं।

मेरा अनुभव मुख्यतः उत्तर प्रदेश और उस पर विशेषतया मेरे शहर वाराणसी पर आधारित हैं। हो सकता है अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर हो, लेकिन कुल मिलाकर हम शासकीय व्यवस्था के गिरावट के दौर से गुजर्र रहे हैं ऐसा मेरा मानना है।

वापस अपने उपर्युक्त शंकाओं/प्रश्नों पर। जीवन के सातवें (यानी साठ का दशक) पूरा करने के निकट पहुंचे वरिष्ठ नागरिक के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि मैंने राजनीति एवं लोकतंत्र की पर्याप्त समझ अर्जित की है। क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है में भेद कर सकने में मैं काफी हद तक सक्षम हूं। मुझे नेहरू-काल के अंतिम दिनों की याद है। याद है उस समय के चीनी आक्रमण की। याद है उस काल के पीएल480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आयातित जीरा सदृश लाल गेहूं की। याद है जब कांग्रेस ही एक प्रकार से देश में एकछत्र राज कर रही थी और “नेहरू के बाद कौन संभालेगा देश को” जैसी कुछ लोगों की चिंताओं की। याद है जब अन्य राजनैतिक दल अस्तित्व में आ रहे थे। किशोरावस्था से वयस्कता के सोपन पर चढ़ते हुए एक नागरिक के तौर पर शासकीय व्यवस्था की मेरी समझ तब नितांत अपरिपक्व रही होगी यह मैं स्वीकारता हूं। कालान्तर में नौकरी-पेशे (विश्वविद्यालय अध्यापन) में आने पर और प्रशासनिक/नागरिक व्यवस्था के संपर्क में आते-आते तथा मतदान का अधिकार पाते-पाते विषय की मेरी समझ में शनैः-शनैः परिपक्वता आते गयी । हाल के डेढ़-दो दशकों में तो विषय को समझने में रुचि विशेषतः बढ़ गयी। मेरे विचारों से अन्य जन सहमत हों मैं इस मुगालते में कभी नहीं रहता। मेरी शंकाएं:

(1) हमारे संविधान की प्रस्तावना में साफ उल्लिखित है कि हम देशवासी इस राष्ट्र को “पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के रूप में स्वीकारते हैं। पंथनिरपेक्ष शब्द श्रीमती गांधी ने संधोधन के तौर पर शामिल किया था। देश का स्वरूप बदला नहीं। देश को संविधान-निर्माताओं ने आरंभ में ही “सेक्युलर” क्यों नही कहा? यह बात विचारणीय है। खैर, मेरी आपत्ति है “समाजवादी” पर है। क्या देश को बाद के राजनेता समाजवाद की ओर ले गये? आज अमीर और गरीब की खाई तब से बहुत बढ़ गयी। क्या एक समाजवादी देश में यह होना चाहिए था?

(2) संविधान जातिमुकत होने की लालसा व्यक्त करता है। शुरुआती दौर में जाति और धर्म वोट के आधार पर नहीं होते थे। समय के साथ राजनीति में आयी नई पीढ़ी के नेताओं ने इन भावनाओं को भुनाकर वोटबैंक बना डाले। यही अपेक्षा की गयी थी क्या?

(3) पुराने जीवित बचे लोग बताते थे कि वोट पाने के लिए आज की तरह बेतहासा धन खर्च नहीं होता था। सुनते है कि अब सांसद/विधायक बनने के लिए करोड़ों दांव पर लगाये जाते हैं। यह भी कहा जाता कि पार्टियों के टिकट के लिए करोड़ों की बोली लगती है। यह हमारे नेताओं के सच्चरित्र होने का द्योतक है क्या?

(4) पिछले तीन-चार दशकों में धनबलियों, बाहुबलियों और आपराधिक छबि वालों की राजनीति में तादाद बढ़ती गयी है। सांसंदों/विधायकों में उनकी दागदार छवि वालों की संख्या 30% के आसपास बतायी जाती है। क्या ऐसा शुरुआती दौर में था?

(5) वर्तमान समय में राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों का एक ही सिद्धन्त रह गया है कि कोई सिद्धांत नहीं। विशुद्ध मौकापरस्ती। जहां लाभ उधर चलो की नीति। इसलिए दलबदलुओं की भरमार है सभी दलों में। जिसे जिताऊ समझते हैं उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। जो कल तक सेक्युलर था वह आज सांप्रदायिक बन जाता है, दक्षिणपंथी समाजवादी बन जाता है। सिद्धांतहीनता व्यक्तियों में ही नहीं दलों में होती है जो सिद्धांतहीनों का बढ़चढ़कर स्वागत करते हैं, बेशर्मी से अपने कदम सही ठहराते हुए।

(6) आज की राजनीति में परिवारवाद चरम पर है। और बड़ा बेहूदा तर्क (कुतर्क?) पेश किया जाता है। कहते है डाक्टर का बेटा-बेटी डाक्टर, वकील का बेटा-बेटी वकील, उद्यमी (बिज़नेसमैन) का बेटा-बेटी उद्यमी तो राजनेता का बेटा क्यों नहीं राजनेता हो सकता है? वाह ! मेरा सवाल है कि क्या राजनीति भी डाक्टरी, वकालत, उद्यमिता इत्यादि की तरह का ही धंधा है? जीवन-यापन और धन कमाने का व्यवसाय है क्या राजनीति? जिन व्यवसायों से तुलना की जाती हैं उसमें समाजसेवा या सामाजिक व्यवस्था को सुचारु और कुशल बनाने का ध्येय नहीं होता है। उन व्यवसाय में लगे हाथ कोई समाजसेवा करता है तो यह उसकी रुचि होती है न कि व्यवसाय के स्थापित एवं स्वीकृत उद्येश्य का कार्य। हर व्यवसाय में पहले अनुभव और योग्यता हासिल किये जाते हैं। इस पर भी गौर करें कि स्वाधीनता के बाद के भारत में जो नये नेता आये वे बाप-दादाओं की विरासत पर नहीं आये बल्कि अपने बल पर आये, लेकिन उन्होंने ही अपनी अगली पीढ़ी को विरासत के नाम पर आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता संघर्ष वाले कितने नेताओं की बहू-बेटियां राजनीति में हैं? तो आज के नेताओं के कितने हैं? सोचिये!

(7) आज वोट की राजनीति नकारात्मक है न कि सकारात्मक। दूसरे दलों में कमियां खोज-खोजकर वोट बटोरे जाते हैं। कोई यह नहीं कहता है कि देश/प्रदेश के दीर्घकालिक हितों के लिए उसकी क्या योजनाएं हैं। जनसंख्या, चिकित्सकीय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक गुणवत्ता की बातें करता है कोई? तो क्या ऐसी वोट की राजनीति ही वंछित लोकतंत्र है?

(8) लोकलुभावन वादों के साथ आज के नेता मैदान में उतरते हैं। कोई स्मार्ट्फोन बांटने की बात करता  है, तो कोई मुफ्त अनाज देने की, कोई मुफ़्त बिजली-पानी देने की बात करता है? इत्यादि। खजाना देश का लुटे और वोट तथा सत्तासुख हम भोगें इस नीति पर राजनैतिक चल रहे हैं। देश का भला ऐसे ही होगा क्या?

इस प्रकार के तमाम सवाल उठते हैं मन में। अब आप ही बतायें कि राजनीति की किस बात पर संतोष अनुभव किया जाये? – योगेन्द्र जोशी

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राजनैतिक दांवपेंच में माहिर मुलायम सिंह का अखिलेश को समाजवादी पार्टी सौंपने का नाटक

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दिनांक 16 जनवरी (2017)। हफ़्तों से चले आ रहे समाजवादी पार्टी के पारिवारिक नाटक का अंत हो गया। चुनाव आयोग ने भी घोषित कर दिया कि इस पारिवारिक “राजनैतिक” पार्टी के दो फाड़ हो चुके हैं जिसका बड़ा धड़ा अखिलेश के पाले में जा चुका है। आयोग के नियमानुसार यही गुट अब “समाजवादी पार्टी” कहलायेगा जिसका राष्ट्रीय अध्यक्ष मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव होंगे और गरीबों के गमनागन का साधन दोपहिया “साइकिल” बतौर चुनाव-चिह्न इस्तेमाल करने के वे ही हकदार होंगे। मुलायम सिंह और उनके अनुयायीयों (चाटुकार और पिछलग्गू?) को पार्टी के उस नाम से हाथ धोना पड़ा है जिसे उन्होंने प्रदेश की राजनीति में करीब ढाई दशक से पाला-पोसा और प्रायः अजेय दल के रूप में स्थापित किया। मुलायम सिंह, शिवपाल, अमर सिंह (?) तथा शेष विवश नेता अब क्या करेंगे ये वे ही ठीक-ठीक बता पायेंगे। निश्चय ही कई नेता होंगे जो असमंजस की स्थिति में होंगे कि किस धड़े का हिस्सा बनें।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो यह घटना बाप-बेटे के बीच की वर्चस्व की लड़ाई थी। अखिलेश अपनी “साफ-सुथरी” (कितनी साफ-सुथरी?) छवि को और चमकाने के चक्कर में रहे, इसलिए वे अपने सगे चाचा के उन चहेतों से छुटकारा चाहते थे जिनकी छवि आपराधिक बताई जाती है। दूसरी तरफ चाचा का सीधा-सादा उद्येश्य था किसी भी प्रकार से चुनावों में जीत हासिल करना और बहुमत हासिल करना। चाचा का तर्क सीधा था: हमें जिताऊ प्रत्याशी चाहिए चाहे वह आपराधिक छवि का ही क्यों न हो। स्पष्ट है कि चाचा-भतीजे में निभ नहीं रही थी। दूसरी तरफ एक पीढ़ी दूर के दूसरे चाचा अखिलेश के पक्ष में रहे और उनका मार्गदर्शन करते रहे। झगड़ा यादव परिवार के भीतर का था और वही समाजवादी पार्टी का झगड़ा भी बन गया था जिसमें किसी भी पार्टी सदस्य की कोई भूमिका नहीं रही, सिवाय अनुनय-विनय करने के, जिसमें आजम खां प्रमुख थे।

क्या मुलायम सिंह वास्तव में अखिलेश के विरुद्ध थे? मेरा व्यक्तिगत मत है कि ऐसा नहीं था।  पांच साल पहले अखिलेश को गद्दी पर किसने बिठाया? क्या खूबी थी अखिलेश में? तब तक तो अखिलेश का कोई शासकीय अनुभव भी न था। क्या सपा में अनुभवी नेताओं का अकाल था?

भारतीय लोकतंत्र में प्रायः सभी दलों में मुखिया जो चाहे वही होता है। अन्य नेताओं की औकाद बंधुआ मजदूरों की जैसी होती है। उन्हें हां में हां मिलाना होता है, अन्यथा जिसमें स्वाभिमान होता है वह पार्टी छोड़ देता है। मुखिया ही ताउम्र अध्यक्ष होता है या उसके परिवार का उसका चहेता। ऐसे दलों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसी परिवार के सदस्यों का हक होता है। तो उस समय भी अखिलेश की जगह शिवपाल को मुख्यमंत्री बनाना अधिक तार्किक होता। वर्षों से उनका साथ निभाते आ रहे लक्ष्मण जैसे भाई के स्थान पर अखिलेश को क्यों चुना? हो सकता है मुलायम सिंह के समक्ष धर्मसंकट रहा हो, पर अंत में उन्होंने पुत्रमोह में अखिलेश को वरीयता दी होगी यह मेरा सुविचारित मत है। वे भाई को गद्दी सौंपकर बेटे के भविष्य को दांव पर नहीं लगाना चाहते होंगे। पुत्रमोह से प्रायः सभी ग्रस्त रहते हैं, खासकर राजनीति में।

मुलायम सिंह राजनीति के चतुर खिलाड़ी रहे हैं। वे इतने मूर्ख नहीं हो सकते थे कि बेटे के सामने हार मान लें। मुलायम सिंह 77 वर्ष हो चुके हैं और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। इसलिए वे अपनी ढलती उम्र में समय रहते अखिलेश को सुस्थापित न करने की घोर गलती नहीं कर सकते थे। मतलब यह कि जो सपा परिवार (पार्टी कहें या परिवार कोई अंतर नहीं!) में हुआ वह सोचा-समझा नाटक था – देखने वालों में भ्रम पैदा करने के लिए।

मैं यही मानता हूं कि बाप-बेटे में मूक सहमति रही होगी कि कैसे नाटक खेला जाना है। उनके बीच अकेले में जो गुप्त बातें हुई होंगी उसका ब्योरा कौन दे सकता है भला?  मुलायम सिंह भली भांति जानते थे कि शिवपाल के खेमे के पार्टी-जनों – जिनमें कइयों की आपराधिक छवि रही है या अभी है – को साथ लेकर अखीलेश नहीं चल पायेंगे। उनकी मौजूदगी शिवपाल के हक में होती और वे अखिलेश को कमजोर भी कर सकते थे। मुलायम को यह भी याद रखना था कि शिवपाल और पार्टी के अनेक जन, जिन्हें अखिलेश नापसंद करते हैं, के उन पर एहसान हैं, क्योंकि उन्हीं के बल पर वे सपा को स्थापित कर सके और सफल हुए। उन सभी लोगों की नजर में मुलायम सिंह को उनका पक्षधर भी दिखना था और साथ में अपने बेटे को भी मजबूती देनी थी। तब रास्ता क्या था? यही न कि बाप-बेटा एक नाटक रचें जो सबको सच से दूर अंधेरे में रखे।

इस घटना को देख मुझे महाभारत का एक प्रकरण याद आता है। भीष्म पितामह कौरव-पांडव युद्ध में कौरवों (दुर्योधन आदि) की ओर से लड़े। यह सब जानते थे कि जब तक भीष्म जीवित रहेंगे तब तक पांडव युद्ध नहीं जीत सकते थे। यह स्वयं भीष्म ही थे जिन्होंने पांडवों को वह राज बताया कि कैसे वे मारे जा सकते हैं और पांडव जीत सकते हैं। कहने का मतलब यह कि भीष्म लड़ तो रहे थे युर्योधन की ओर से लेकिन युद्ध जिता रहे थे पांड़वों को। कुछ ऐसा ही मुलायम कर रहे थे। पक्ष लेते दिख रहे थे शिवपाल बगैरह का और छिपे तौर पर बेटे अखिलेश को आगे बढ़ा रहे थे।

दुर्भाग्य से नाटक का मंचन इतना अच्छा नहीं हो पाया कि वह हकीकत लगे। पैनी निगाह रखने वाले बहुत-से लोगों को अनुभव हो चुका है कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह बहुत कुछ सोच-समझके ही यह खेल खेले होंगे।

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अब बाप-बेटे एक हो गये हैं। अखिलेश पिता से आशीर्वाद ले लिए हैं और मुलायम सिंह ने उनको अपने समर्थकों की सूची दे दी है जिनको अखिलेश ने टिकट देना है। उस सूची में शिवपाल का भी नाम है जिसे अखिलेश अपनी सूची से बाहर कर चुके थे। कभी आपने ऐसा नेता देखा है जो अपने कार्यकर्ताओं को विरोधी खेमे से प्रत्याशी बनने की सिफ़ारिश करे? मुलायम मौके की नजाकत के हिसाब से ऐसा भी कर सकते हैं।

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पूरे घटनाक्रम से यही लगता था कि सपा दो धड़ों में बंट चुकी है और दोनों धड़े अपने-अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारेंगे। पर ऐसा हो नहीं रहा है। जरा गौर करिए इस लेख के आरंभ में प्रदर्शित अखिलेश के चुनावी बैनर पर, जिसमें पिता-पुत्र दोनों मौजूद हैं। दरअसल मुलायम सिंह अखिलेश की समाजवादी पार्टी के संरक्षक है और अब ताउम्र रेहेंगे।

भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ हो सकता है। लोकतंत्र के भारतीय मॉडल को मैं छद्म राजतंत्र कहता हूं, जो लोकतंत्र की मूल भावना के प्रतिकूल है। ऐसे लोकतंत्र को नकारा जाना चाहिए “नोटा” बटन के माध्यम से विरोध जताकर। – योगेन्द्र जोशी

 

स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर इसी ब्लॉग के लिए लि्खा था। किंतु इसे मैं अपने दूसरे चिट्ठे (http://jindageebasyaheehai.wordpress.com) पर पोस्ट कर बैठा। यह गलती कैसे हुई, मेरा ध्यान कहां था,  मैं कह नहीं सकता। आज नजर आने पर इसे वहां से यहां स्थानांतरित कर रहा हूं। पाठकों से क्षमायाचना।

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“मेरा मन हो स्वदेशी, मेरा तन हो स्वदेशी। मर जाऊं तो भी मेरा होवे कफ़न स्वदेशी।”

– पं राम प्रसाद बिस्मिल

“मेरी जीवनशैली हो विदेशी, मेरी भाषा हो विदेशी। या खुदा मौका मिले जो मुझे खुद बन जाऊं विदेशी।”

ऐसा सोचने वाले भी मिल जायेंगे देश में; कौन और कितने, अंदाजा लगाइये।

अपना देश भारत या इंडिया जो आप ठीक समझें 70वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। मुझसे यह अपेक्षा की जायेगी कि मैं देशवासियों को प्रणाम करूं, बधाई दूं, और भविष्य की मंगलकामना प्रेषित करूं। शुभकामना !

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15 अगस्त

आज देश को स्वाधीन हुए 69 वर्ष हो रहे हैं। इस दिन सर्वत्र जश्न मनाया जा रहा है। शीर्षस्थ पदों पर विराजमान राजनेता, उच्च प्रशासनिक अधिकारी, अपनी-अपनी संस्थाओं में ध्वजोत्तोलन करने, देश की उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान करने, और उपदेश देने के कार्य में लगे हैं।

क्या कोई उपलब्धियों का निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ आकलन करने को तैयार है? क्या उसके बारे में सुनने को भी तैयार है? या हकीकत जानने के बाद भी उसकी अनदेखी करके खुश होना चाहता है?

मेरी दृष्टि में हमने इस काल में बहुत कुछ खोया है। और पाया है वह इतना कम है कि उसे खोये हुए की भरपाई मानना उचित नहीं होगा। मेरे लेख से विचलित होकर कुछ लोग मुझे बुरा-भला भी कहेंगे। लेकिन यह कोई स्पष्ट नहीं करेगा कि मैं गलत कहां पर हूं।

चलिए मैं अपनी बात कहता हूं। यही स्वतंत्रता तो मुझे मिली है कि मैं अपने खयालात पेश करूं। जिसे नापसंद हो बह कान बंद कर लेगा। इस स्वतंत्र देश में लोग एक दूसरे के साथ गाली-गलौज कर सकते हैं। मैं तो यथासंभव शिष्ट भाषा में अपने बातें कहने की सोच रहा हूं।

उपलब्धियां

क्या हैं उपलब्धियां? हमारे राजनेता सीना तानकर कहने लगेंगे कि हमने नाभिकीय विस्फोट करके अपने को “न्यूक्लियर-पावर-संपन्न” देशों में शामिल किया है। अपनी मिसाइलें बनाकर दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया है। चंद्रमा में चन्द्रयान भेजकर अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है। मंगलयान की बात हमारे अंतरिक्ष अध्ययन/अभियान की योजना का अंग है। इस्रो (ISRO) जैसी हमारी संस्था उत्कृष्ट कार्य करके विश्व के कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ रही है। ओएनजीसी (ONGC) खनिज तेल की खोज अपने दम पर देश एवं विदेश में कर रही है। सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

अन्न उत्पादन के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बन चुके हैं। स्वातंत्र्य पूर्व हमारी स्थिति दयनीय थी। उस समय एवं उसके बाद भी कुछ समय तक अमेरिकी घटिया गेहूं (पीएल 480 योजना के तहत) पर हम निर्भर थे। आज देश में भोजन की कमी नहीं है।

शासकीय-प्रशासकीय तंत्र में अंकीय तकनीकी (digital technology) का प्रयोग बढ़ रहा है। बहुत से स्थलों पर कंप्यूटरीकृत वातावरण में कार्य हो रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकी के साथ रोग-निदान एवं रोगोपचार किया जा रहा है। यह देश के लिए क्या गर्व की बात नहीं है कि विदेशी भी चिकित्सा के लिए यहां आ रहे हैं? अवश्य है, लेकिन …

आज़ाद भारत (इंडिया?) में लोगों की संपन्नता बढ़ी है। लोगों के लिए अब सुख-सुविधा के साधन प्राप्त करना संभव हो गया है। सड़कों पर अनेक जन कारें दौड़ा रहे हैं यह क्या कभी सोचा भी जाता था? सड़कें फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन की बन रही हैं और फ़्लाइ-ओवरों का जाल बिछ रहा है। घर-घर में टीवी, फ़्रिज, धुलाई मशीन पहुंच रहे हैं। हर हाथ में अब स्मार्टफोन पहुंच रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं।

लेकिन सवाल है इन उपलब्धियों का लाभ किसको पूरा-पूरा या अधिकांशतः मिल रहा है? इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए।

उपर्युक्त और तत्सदृश जिन अन्य उपलब्धियों को राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी एवं बुद्धिजीवी गिना सकते हैं उनमें से अधिकतर स्वाभाविक रूप से होने ही थे। उनको होने देना एक प्रकार की विवशता ही थी। जब दुनिया भर में कंप्यूटरों एवं डिजिटल तकनीकी का प्रयोग होने लगा तो हम उससे कैसे अछूते रह सकते थे? जब उस तकनीक के माध्यम से विश्व में संपर्क-साधन हो रहा हो और उसके बिना व्यावसायिक कार्यकलाप असंभव-से होते जा रहे हों तो उसका हमारी भी आवश्यकता बनना स्वाभाविक ही था। समाज के सबसे आम आदमी का भला होगा इस विचार से इनको अपनाया गया होगा यह मैं नहीं मानता। हो सकता है गरीब व्यक्ति तक लाभ पहुंच रहा हो। तब उसे मैं “बिल्ली के भाग से छींका टूटने” के समान मानता हूं।

मैं दावा नहीं करता कि पूरे देश की स्थिति का मुझे पूर्ण ज्ञान है। मेरा अनुभव अधिकांशतः उत्तर प्रदेश और उसके भीतर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है जहां मैं रहता हूं। देश के अन्य शहरों से भी मैं कुछ हद तक वाकिफ़ हूं, क्योंकि मैं यदा-कदा देशाटन पर निकल पड़ता हूं। आजकल तो समाचार माध्यम तमाम तरह की जानकारी आम जन तक पहुंचा रहे हैं। इसलिए ध्यान देने वाले के लिए बहुत कुछ जानना आसान है।

इन उपलब्धियां का सीधा लाभ समाज के संपन्न वर्ग को हुआ है और उन्हीं के लिए बहुत कुछ हुआ है ऐसा मेरा मानना है। कार संस्कृति उन्हीं के लिए तो है। उन्हीं के लिए कार-उद्योग हैं। और जब कारें सड़क पर दौड़ें तो फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन सड़कें और फ़्लाई-ओवर बनने ही हैं। वे आम जनों की समस्या सुलझाने के लिए नहीं बनी हैं। यदि आम जन का हित हमारे देश के शासकों, नीतिनिर्धारकों के जेहन में होता तो सड़क के किनारे फ़ुटपाथ बन रहे होते, और सड़क पर पैदल चलने वालों का अधिकार पहले होता, उसके बाद वाहनों का जैसा कि विकसित देशों में होता है। वाराणसी में जितनी सड़कें पिछले तीनएक दशकों में बनी हैं उनके किनारे फ़ुटपाथ हैं ही नहीं।

चंद्रयान, मंगल-अभियान जैसी योजनाओं का आम जन के लिए कोई महत्व नहीं। एक वैज्ञानिक होने के बावजूद मैं इनको प्राथमिकता में निम्न स्तर पर रखना चाहूंगा। इनसे कहीं अधिक महत्व की समस्याएं देश के सामने हैं। इसलिए आम जन के सापेक्ष इनको उपलब्धि मानता अनुचित होगा।

अवश्य ही अनाज उत्पादन में हुई प्रगति प्रशंसनीय कही जायेगी। अन्यथा दुनिया भर में हो रहे व्यावसायिक परिवर्तन हमारे देश में होने ही थे। परिवर्तन न करते तो क्या करते? कैसे विश्व के सामने टिकते? वैश्विक परिवर्तन का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ना स्वाभाविक था।

मेरी निराशा

मेरी निराशा के मूल में उक्त उपलब्धियों की अर्थवत्ता कम या अधिक होना नहीं है। मैं स्वतंत्रता का आकलन उन बिन्दुओं के सापेक्ष करना चाहूंगा जिनको ध्यान में रखते हुए शासकीय व्यवस्था को उत्तरोत्तर बेहतर बनाने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता अर्जित की गयी थी। तब न डिजिटल टेक्नॉलॉजी थी, न उसको लेकर देश का कोई संकल्प। जिस उम्मीद को लेकर चले थे वह थी उत्तरोत्तर बेहतर शासकीय व्यवस्था की स्थापना। क्या हमारी व्यवस्था में सुधार हुआ है? कुल मिलाकर इस प्रश्न का क्या जवाब होगा?

जवाब आप स्वयं समझ लीजिए। मैं वस्तुनिष्ठ कुछ तथ्यों को आपके समक्ष रख रहा हूं।

जनसंख्या वृद्धि

     मेरी दृष्टि में देश की विकटतम समस्या निरंतर हो रही जनसंख्या वृद्धि है। उम्रदराज देशवासियों को याद होगा 1960 के दशक का समय जब उत्साह एवं गंभीरता से जनसंख्या पर अंकुश लगाने और परिवार-नियोजन के प्रयास किये गये थे। उसके परिणाम कितने अच्छे रहे होते यदि वे प्रयास यथावत चलते रहते? दुर्भाग्य था 1970 के दशक के पूर्वार्ध में संजय गांधी का असंवैधानिक शक्ति के रूप में अवतरित होना। उस व्यक्ति ने ऐसा सख्त रवैया अपनाया कि कार्यक्रम पटरी से उतर गया और राजनैतिक भूचाल आया आपात्काल के रूप में। जनसंख्या के मुद्दे से राजनेताओं/नौकरशाही ने मुख मोड़ लिया। तब से आज तक जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है, किंतु प्रयास बेमन से हो रहे हैं। आज तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों ने अवश्य प्रगति की है, लेकिन पहले से ही बहुत बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश, बिहार की आबादी पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है।

हमारे शासक यह भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन इतने नहीं कि बढ़ती आबादी को झेल सकें। हम मौजूदा नागरिकों को ही शिक्षित नहीं कर पा रहे, उनके स्वास्थ्य के लिए न पर्याप्त अस्पताल हैं और न डॉक्टर, कुपोषण अपनी जगह है, युवाओं के लिए रोजगार नहीं, रेल-बस सुविधा अपर्याप्त हैं, सबके लिए बिजली-पानी मुहैया नहीं करा सकते, इत्यादि। फिर भी जनसंख्या वृद्धि के प्रति लापरवाह हैं। यही हाल रहा तो अगले 10-15 सालों में हम चीन से आगे निकल जायेंगे। यही हमारी उपलब्धि होगी क्या?

इस विषय पर यह विचारणीय है कि जो संपन्न दंपती हैं उनके एक या अधिक से अधिक दो बच्चे हो रहे हैं। कुछ ने तो कोई बच्चा नहीं की नीति अपना ली है। लेकिन जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं, उनके 4-4, 6-6 बच्चे हो रहे। गरीबी और बढ़ती आबादी में गहरा संबंध है। आगे आप खुद सोचिए क्या होगा।

अनुशासनहीनता

      यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश देशवासियों के लिए स्वतंत्रता के माने हैं अनुशासनहीनता, स्वच्छंदता, उच्छृंखलता, निरंकुशता, आदि। कायदे-कानूनों को न मानना देशवासियों का शगल बन चुका है। वाराणसी में रहते मैं यही कहूंगा। अहिष्णुता इसी निरंकुशता की देन है। अंध-आस्था इसमें घी का कार्य करती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अर्थ लिए जाते हैं: “मेरी आस्था पहले, दूसरों का हित बाद में। आस्था के प्रदर्शन में कोई रुकावट न डाले चाहे उसकी जान चली जाये।” यह भावना यहां व्याप्त है। राजनीति अंकुश लगाने के बदले ऐसी आस्था को बढ़ावा देती है। संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों मे कहा गया है सरकारें अंधविश्वास समाप्त करने और लोगों में वैज्ञानिक सोच बढ़ाने के प्रयास करेंगी। हुए हैं ऐसे प्रयास?

कायदे-कानूनों का क्या महत्व है यह तो इसी से स्पष्ट है सड़क पर किसी वहन से दुर्घटना हो जाये तो उसे ही नहीं, गुजरने वाले हर वाहन को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसमें एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी भीड़ की भागीदारी होती है। कोई नहीं कहता कि यह क्या अनर्थ कर रहे हो। किसी पर चोरी का शक हो जाये तो उसे पीट-पीट्कर मारने पर किसी को आतमग्लानि नहीं होती है। ऐसी अनेकों वारदातें प्रकाश में आती हैं। आज तक प्रभावी शासकीय व्यवस्था विकसित नहीं हुई।

इसे भी क्या उपलब्धि कहेंगे?

शिक्षा

मेरी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 5 तक, 1950-60 के बीच के काल में) अपने गांव (अब उत्तराखंड में) के पास की सरकारी पाठशाला में हुई थी। तीन शिक्षक थे और पाठशाला का पक्का भवन। बहुत सुविधाएं नहीं थीं, फ़िर भी उसी में मैंने और मेरे सहछात्रों ने बहुत कुछ सीखा। कृषि की बातें, मिट्टी के खिलौने बनाना, सुलेख लिखना। आज भी उस समय की पुस्तकों के कुछ चित्र स्मृति पटल पर आ जाते हैं। उस काल में मेरी ही तरह अनेक लोगों ने गांवों में शिक्षा पाई और मेरी तरह विश्वविद्यालय के शिक्षक बने। आज क्या स्थिति है सरकारी स्कूलों की? कहीं, भवन नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं तो स्कूल से नदारद। छात्रों की स्थिति यह हो चुकी है कि पांचवीं पास करने के बाद भी पढ़-लिख नहीं सकते।

आज कोई भी सरकारी स्कूल में बच्चों को नहीं भेजना चाहता। निजी विद्यालयों – तथाकथित अंगरेजी माध्यम स्कूलों – की बाढ़ आ चुकी है। जो गरीब उनकी फ़ीस नहीं चुका सकता वही सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजता है।

जिस समय मैंने हाईस्कूल की परीक्षा दी (1962), मुझे एक दिन सुनने को मिला कि फलां परीक्षा केंद्र पर एक परीक्षार्थी नकल करते पकड़ा गया है। वह भी एक जमाना था नकल की एक भी घटना समाचार बनती थी। नकल करने से सभी डरते थे। आज क्या हाल हैं उत्तर प्रदेश, बिहार में? सामूहिक नकल का बोलबाला है। छात्र ही नहीं उनके अभिभावक, शिक्षक, पुलिस बल सब नकल करवाते देखे-सुने जाते हैं। सरकारें हैं कि नकल-माफ़ियाओं के सामने घुटने टेक देती हैं। जहां छात्र/छात्रा को विषय का ज्ञान तक न होने पर टॉपर बनाया जा सकता है (बिहार राज्य में), उस देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी?

हमारी सरकारों ने इंडिया और भारत के विभाजन को और पुष्ट किया है। एक तरफ संपन्न लोगों की अंगरेजी-आधारित शिक्षा है तो दूसरी समाज के कमजोर तबके के लिए क्षेत्रीय भाषा की कुव्यवस्थित शिक्षा। किसी को शर्म आती है? हमारी शिक्षा ऐसे ही चलनी चाहिए? यही उपलब्धि है हमारी? सोचें!

जिस अंगरेजी से मुक्त होने की स्वतंत्रता सेनानियों ने सोचा था आज वही अंगरेजी अपरिहार्य बन चुकी है, जीवन का आधार बन चुकी है। विडंबना नहीं है?

चिकित्सा व्यवस्था

देश में डॉक्टरों की कमी है। सरकारी खर्चे पर छात्र डॉक्टर बनते हैं, फिर  विदेशों की राह पकड़ने की कोशिश करते हैं, अन्यथा निजी अस्पतालों के चिकित्सक बनते हैं। सरकारी नौकरी में कम जाते हैं और जो जाते हैं प्राइवेट प्रैक्टिस से धन कमाने में जुट जाते हैं। बहुत कम (शायद ही कोई) होंगे जो ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हों। बहुत से तो महीनों सरकारी अस्पताल से गायब रहते हैं। कहने को सरकारी अस्पतालों में बहुत कुछ है, लेकिन हकीकत एकदम निराशाप्रद! हालात क्या होंगे यह इसी दृष्टांत से समझा जा सकता है कि अभी दो-चार दिन पहले एक गरीब का बच्चा इसलिए चल बसा कि वह परिवार 20 रुपये की घूस नर्स को नहीं दे पाया। कुछ समय पहले एक घटना के बारे में सुना जिसमें एक बच्चे के पैर के घाव का इलाज वार्डब्वॉय ने किया बाद में उस बच्चे का पैर काटना पड़ा। ऐसे मामलों में जांच समिति बैठा दी जाती है मामलों को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए। किसी कर्मचारी/डॉक्टर को दंडित किया जाता हो सुनने में नहीं आता है।

एक समय था जब सरकारी खर्चे पर सरकारी मुलाजिम का इलाज सरकारी अस्पताल में ही अनुमत था। तब सरकारी अस्पतालों की हालत कुछ बेहतर थी। जब से निजी अस्पतालों की सुविधा मुलाजिमों को मिलने लगी, स्थिति बदतर हो गयी।

डॉक्टरों ने धन कमाई का नायाब तरीका अपना लिया है। वे अनावश्यक जांच करवाते हैं और वह भी अपने “बंधे हुए” जांच-केंद्र पर। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था होने पर भी वहां भी यह होता है। जांच केंद्र से डॉक्टरों को रकम मिल जाती है। वाह क्या चरित्र है और हिपोक्रेटीज़ शपथ (Hippocratic oath) का सम्मान। स्थिति इतनी निराशाजनक पहले नहीं थी।

सड़क दुर्घटना एवं वाहन-चालन लाइसेंस

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कितनी भयावह है इसके आंकड़े अंतरजाल पर आसानी से मिल जायेंगे। यातायात के नियमों का पालन होता है कहीं? क्या पालन होगा जब नियम ही लोगों को मालूम नहीं हों। और मालूम भी हो तो उनके प्रति सम्मान किसके मन में है? नियमों का उल्लंघन अधिकांश लोग करते हैं। ट्वूह्वीलर वाहनों के लिए हेल्मेट का नियम है, कितने लोग उसे पहनते हैं? वाराणसी में तो अपवाद-स्वरूप ही पहनते हैं। पूछने पर न पहनने वाला कहता है “कोई देखता थोड़े है?” कारों में सीटबेल्ट का प्रावधान है, उसे भी चालक नहीं पहनते हैं, उत्तर वही। मतलब यह कि देखने वाला कोई न हो तो इनकी जरूरत नहीं।

यह हमारे लोगों का कायदे-कानूनों का सम्मान न करने की मानसिकता का द्योतक है।

आगे देखिए वाराणसी की सड़कों पर 12-14 वर्ष की आयु के बच्चे मोटर-वाहन चलाते दिख जायेंगे? उनके माता-पिता के लिए यह उपलब्धि होती है, वे इसमें अपनी प्रतिष्ठा देखते हैं, यह उनकी हैसियत का परिचायक होता है। नियमों को तोड़ना किसी की भी नजर में बुरा नहीं होता। ऐसी सोच के लिए जिम्मेदार कौन? कोई तो जिम्मेदार होगा?

हमारे यहां ड्राइविंग लाइसेंस आलू-प्याज की तरह खरीदे बेचे-खरीदे जाते हैं। अपने बनारस में तो मैंने ऐसा ही देखा। मेरा स्कूटर वाला लाइसेंस खत्म हो चुका है, अब जरूरत नहीं समझता। इसलिए आज की हालत क्या है मालूम नहीं। पर जब मैंने पहली बार लाइसेंस लिया तो न कोई लिखित और न कोई सड़क पर वाहन-चालन का परीक्षण। गये, लाइसेंस मांगा और मिल गया। कुछ पैसा मांगा मैंने दे दिया, गलत कहें या सही। तब मुझे लगा कि अंधा-लूला-बहरा, हर कोई लाइसेंस पा सकता है। दलाल को पैसा दीजिए साइसेंस आपके हाथ। मैं समझता हूं कि आज भी दलालों काम यथावत चल रहा होगा। क्या यही हमारी शासकीय व्यवस्था होनी चाहिए? फिर रोइये कि देश में सड़क हादसे बहुत होते हैं। अभी हाल में मेरे बेटे ने कनाडा में लाइसेंस लेना चाहा। वह प्रशिक्षण में एक-डेड़ लाख खर्च कर चुका था। वाहन चालन परीक्षण में असफल हो गया। गलती यह कि पार्किंग करने में सफेद रेखा को अगला पहिया छू गया। एक-दो ऐसी ही छोटी-मोटी गलतियां! बस इतना काफी था। यहां कोई सोच सकता है कि ऐसा भी कहीं होता है?

प्रशासनिक कुव्यवस्था

देश जब आज़ाद हुआ तो यह उम्मीद थी हम साफ-सुथरी एवं जनता के प्रति जवाबदेह शासकीय व्यवस्था विकसित करेंगे। किंतु ऐसा हुआ क्या? हमारी नौकरशाही जनता के सेवक रूप में खुद को नहीं देखती, बल्कि वह अपने को उनका मालिक समझती है। काम के प्रति लापरवाही, टालमटोल, घटिया काम और कदाचार को वह अपना अधिकार मानती है। आये दिन नये-नये घोटालों का खुलासा होता है, पर क्या मजाल कि किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता हो, दंडित किया जाता हो। अधिक से अधिक कुछ दिनों के लिए किसी को निलंबित करके शासन जनता की आंख में धूल झोंकता है। याद रहे निलंबन सजा नहीं होता है। यह तो जांच-पड़ताल की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। दंडित करने का काम तो न्यायालय करता है जहां मामला जाता ही नहीं और गया भी तो वर्षों तक कोई निर्णय नहीं होता है। उस बीच आरोपित कभी-कभी स्वर्ग (नरक?) भी सिधार जाता है।

सरकारी तंत्र में खूसखोरी आम बात है। मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कहते है कि अधिकारियों को देने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नही था इसलिए वह सरकारी नौकरी नहीं पा सका। नियुक्ति-पत्र तक तभी मिलता है जब आप पैसा खर्च करते हैं। सालों पहले में एक बार ट्रेजरी कार्यालय गया। वहां शरीर से कमजोर उम्रदराज पेंशनरों को बीस-बीस रुपये पेंशन-बुक में रखकर देते हुए देखा था। आज वह रेट 200-250 रुपये होगा। पिकेट-ड्यूटी पर लगे पुलिस-मैन को प्रतिबंधित गाड़ी आगे बढ़ने देने के लिए पैसे लेते हुए देखा है। लोग बताते हैं कि जब वे स्वयं 100-50 हजार की घूस देकर नौकरी पाये हैं तो उसकी भरपाई उन्हें ऐसी वसूली से ही करनी होती है।

कितना साफ-सुथरा शासन-तंत्र विकसित किया है आज के शासकों ने? पहले घूस लेना चोरी-छिपे होता है और अब खुलकर होता है। घूस के भी रेट बने हैं। मुझे कभी एक बुजुर्ग एंजीनियर ने बताया कि बेईमानी तो पहले भी होती थी पर इतनी नहीं। वे बताते थे कि किसी कार्य के खर्चे का आकलन (एस्टिमेट) बढ़ा-चढ़कर पेश किया जाता था जैसे 100 की जगह 120 रुपये। तब 100 का कार्य हो जाता था और 20 रुपया जेबों में जाता था। कार्य की गुणवत्ता बनी रहती थी। आजकल एस्टिमेट तो 120 रुपये का बनेगा और खर्चा केवल 50, शेष 70 जेबों में। कार्य की गुणवत्ता कैसी होगी सोच सकते हैं। यह वाराणसी की सड़कें देखकर समझ में आ जयेगा जो पहली बरसात को झेल जायें तो समझिए कि चमत्कार हो गया।

विदेश यात्रा को जीते-जी स्वर्ग यात्रा के समान देखने वाले हमारी प्रशासनिक अधिकारी मौके खोजते हैं कि किस बहाने विदेश जाया जाये। कभी वे वहां की कानून-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं तो कभी वहां के प्रशासन का अनुभव पाने, कभी खेल-आयोजन कैसे करते हैं इसे सीखने और कभी यातायत व्यवस्था की जानकारी लेने। कोई भी बहाना चलेगा, बस विदेश भ्रमण करने से मतलब। अब देखिए कल-परसों अपने प्रदेश के खेल मंत्री गये हैं ओलंपिक स्थल रियो द जनीरो कुश्ती खिलाड़ी नरसिंह यादव की हौसला आफ़जाई करने। विदेश भ्रमण का बहाना। सरकारी खर्चे पर इकनॉमी क्लास में तो वे जायेंगे नहीं, एक्जेक्टिव क्लास में जायेंगे। अपनी जेब से तो कुछ लगना नहीं। प्रदेश के खजाने की परवाह किसे? वाह!

इस प्रकार के अनेक उदाहरण आपको यत्रतत्र मिलेंगे। सब इसे जानते हैं, परंतु हर कोई आश्वस्त रहता है कि सुधार होना नहीं है।

यही उपलब्धि है न स्वतंत्र भारत की?

पुलिस तंत्र

स्वतंत्र भारत का शासकीय तंत्र सुधारने के प्रति आज के शासक कितने गंभीर हैं इसे समझना कठिन नहीं। वर्षों से प्रशासनिक सुधारों की बातें की जा रही है। लेकिन आज तक कुछ किया नहीं गया। पुलिस तंत्र में सुधार की बातें भी होती रही हैं, उसे भी टाला जा रहा है। उच्चतम न्यायालय इस बारे में बार-बार याद दिलाता आ रहा है, लेकिन शासक वर्ग को कोई रुचि नहीं। तो क्या देश के शासक अंगरेजों की भांति डंडे से जनता पर राज करना चाहते हैं? जी हां, वे सुधार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि जहां जनता से उन्हें असुविधा लगे उन पर डंडा बरसाकर चुप करा दो। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के कोई कारगर उपाय आज तक नहीं हुए। नित नये कानून बनाकर जनता को मूर्ख बनाते आ रहे हैं वे। कानूनों का कार्यान्वयन प्रभावी न हो इसका भी वह साथ में इंतजाम करते हैं। जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति वे टालते हैं, महीनों, वर्षों तक। त्वरित निर्णय का तो सवाल ही नहीं।

लचर न्यायिक व्यवस्था यथावत बनाये रखना भी शासकों का इरादा रहा है। दो रोज पूर्व ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि पिछले छः माह से न्यायालयों की नियुक्ति क्यों टाली जा रही है। सुधारों को टालना सरकारों की नीयत रही है।

राजनेतओं की साख

क्षमा करें यदि मैं यह कहूं आज के किसी राजनेता के प्रति मेरे मन में सम्मान नहीं है। यह सोचने की स्वतंत्रता मुझे है। मैं किसी को अपशब्द नहीं कहूंगा, मिलने पर सामान्य शिष्टाचार भी निभाऊंगा। लेकिन मेरे मन में उनके प्रति सम्मान हो इसकी बाध्यता कहीं नहीं है।

स्वतंत्रता के आरंभिक काल के राजनेताओं की तुलना में आज के राजनेताओं को किस स्तर पर रखेंगे आप? आकलन करते समय क्या आप सोचेंगे कि वे कितने अनुशासित हैं, देशहित के प्रति समर्पित हैं, सत्तालोलुपता कितनी है, आपराधिक वृत्ति के नेताओं के प्रति उनका क्या रवैया है, इत्यादि। मेरे अपने उत्तर हैं “निराश करने वाले”।

स्वार्थलिप्सा और सत्तालोलुपता हमारे राजनेताओं के चरित्र का अपरिहार्य अंग बन चुका है। सत्ता हथियाने के लिए सभी हथकंडे सभी दलों के नेता अपनाते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी करके सभी जातीयता, धार्मिकता, क्षेत्रियता की भावना उभाड़कर वोटबैंक बनाने में जुटे हुए हैं। है कोई राजनैतिक दल जो आपराधिक छबि वाले से परहेज करता हो,जो बाहुबल एवं धनबल का सहारा न लेता हो, जो तरह-तरह से मतदाताओं को न लुभाता हो (जैसे शराब पिलाना, पैसे की घूस देना)। जिन्हें आप साफ-सुथरे कहेंगे वे कैसे इस अनर्थ को सहते हैं।

राजनीति में सिद्धांतहीनता व्याप्त है। सुबह तक जो कम्युनल हो वह शाम तक सेक्युलर हो जाता है। कल तक जो समाजवादी हो वह आज दक्षिणपंथी बन जाता है। सिद्धांत बस एक है: जहां बेहतर अवसर दिखें वहां चल पड़ो। आप ऐसे सिद्धांतहीनों से क्या उम्मीद रखते हैं?

आज़ादी के 69 वर्ष बीतते-बीतते हमारे अधिकतर राजनैतिक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा परिवार की निजी व्यावसायिक संस्था बन चुके हैं। एक बेहद घटिया परंपरा इस क्षेत्र में स्थापित हो चुकी है। मुलायम सिंह, लालू यादव, मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि आदि सब उदाहरण हैं। अपने समय में ये लोग बाप-दादों के बल पर नेता नहीं बने थे, पर अब अपने परिवारी जनों को को राजनेता बनाने की परंपरा स्थापित कर रहे हैं, पूरी बेशर्मी के साथ। कार्यकर्ताओं की हैसियत बंधुआ मजदूर की बन चुकी है। कभी कांग्रेस इस श्रेणी में नहीं थी लेकिन अब वह सोनिया-राहुल-प्रियंका की निजी संपदा बन गयी है। क्या मजाल कि दल के मुखिया से कोई असहमत हो। जो असहमत हो वह दल से निकाला जायेगा या निकल जायेगा। दलों में न आंतरिक लोकतंत्र है और न वैकल्पिक नेतृत्व पनपने देने की परंपरा। इसमें आपको विरोधाभास नहीं दिखता कि आंतरिक लोकतंत्र के विरोधी देश का लोकतंत्र चला रहे हैं?

राजनीति में उत्तरोत्तर सुधार के बदले गिरावट आ रही है यह मेरी धारणा है।

वर्ष 1950 के आगे-पीछे चीन को भारत की तुलना में पिछड़ा एवं गरीब माना जाता था। आज वह हमसे मीलों आगे निकल चुका है, हर क्षेत्र में। उसकी “प्रति व्यक्ति (औसत) आय” (per capita income) हमारी (लगभग $1600) तुलना में करीब पांच गुना अधिक है| स्वतंत्रता के समय एक रुपया एक डॉलर के लगभग था। आज वह घटते-घटते $0.015 के बराबर हो चुका है। इस प्रकार की घटनाएं क्यों हुईं? हमारी शासकीय व्यवस्था में कहीं खोट रहा होगा न?

अंततः

     मैं उन देशवासियों को बधाई देता हूं जिनको विगत उपलब्धियां संतोशप्रद, आशाजनक लगती हैं। मुझे उनसे ईर्ष्या है कि काश मुझे भी ऐसा ही लगा होता।

लेख अपेक्षा से अधिक लंबा हो चला है। कहने को बहुत कुछ है, किंतु कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही चाहिए। अतः पटाक्षेप।

आप पाठकों को पुन: बधाई, शुभेच्छाएं। शान्तिः सर्वत्र प्रसरेत् । – योगेन्द्र जोशी

नोबेल शांति पुरस्कार मानवाधिकार तथा लोकतंत्र समर्थक लिउ जियाओबो को और चीन की नाराजगी

वर्ष 2010 का नोबेल शांति पुरस्कार

इस वर्ष का ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ चीन के 54 वर्षीय लिउ जियाओबो (Liu Xiaobo)  को दिया गया है । विगत 8 अक्टूबर इस बात की घोषणा ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा नार्वे की राजधानी ओस्लो में की गयी । मैंने यह समाचार बीबीसी-हिंदी वेबसाइट पर पढ़ा । यों आज के प्रायः सभी समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक सूचना माध्यमों ने इसकी चर्चा प्रमुखता से की है ।

इस वर्ष के पुरस्कार का समाचार अधिक दिलचस्प एवं महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लियाओबो चीन के नागरिक हैं और पिछले कई वर्षों से वे चीन में मानवाधिकार के हनन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में प्रमुख रहे हैं । 1989 में बीजिंग के तियाननमेन चौक में संपन्न हुई विरोध रैली में उनकी विशेष भूमिका रही थी । पिछले ही वर्ष उन्होंने बहुदलीय शासन व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में चाटंर-8 नाम का दस्तावेज तैयार किया था, जिसे चीनी सरकार ने अपराध मानते हुए उन्हें 11 साल की कारावास की सजा दे रखी है ।

नाराजगी चीन की

इस पुरस्कार से चीन बेहद नाखुश है । उसने जियाओबो को गंभीर अपराधी कहते हुए नॉर्वे के राजदूत को बुलाया और तुरंत अपना विरोध दर्ज किया । चीन ने आगाह किया है कि नार्वे के साथ उसके संबंध इस पुरस्कर से बिगड़ सकते हैं । लेकिन नार्वे ने स्पष्ट किया है कि नोबेल समिति एक स्वतंत्र संस्था है, और वह उसके निर्णयों को प्रभावित नहीं कर सकता । कहा जाता है कि चीन ने उस समिति पर काफी दबाव डाला था कि जियाओबो को पुरस्कर न दिया जाये । दरअसल उसकी नजर में, और कदाचित वहां के राष्ट्रवादी जनता की नजर में, यह पुरस्कार चीन को नीचा दिखाने और उसे निर्दय देश के रूप में पेश करने का प्रयास है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस पुरस्कार से विश्व भर में जियाओबो के पक्ष में जनमत बनने लगा है । हांक-कांग में उनके पक्ष में आवाज उठने लगी है । अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी उनको रिहा किए जाने की बात कही है । राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून के अनुसार यह पुरस्कार विश्व भर में मानवाधिकार स्थापना और सांस्कृतिक परिष्करण की आवश्यकता को रेखांकित करता है । वस्तुतः विश्व भर के राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है । जियाओबो की पत्नी लिउ जिया पुरस्कार से अतीव संतुष्ट है और उसने उन सभी की प्रशंसा की है जो जियाओबो के पक्ष में बोलते रहे हैं । अब नई खबर है कि उसे सरकार बीजिंग छोड़कर छोटे शहर जिनझाओ (Jinzhou), जहां जियाओबो जेल में हैं, जाने को विवश कर रही है

लोकतंत्र मानवाधिकार की गारंटी नहीं

उक्त पुरस्कार दो खास बातों को ध्यान में रखते हुए दिया गया हैः पहला शासन के स्तर पर मानवाधिकार हनन का विरोध, और दूसरा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पक्ष में जनमत बनाना, ताकि चीन की एकदलीय व्यवस्था समाप्त हो । मैं व्यक्तिगत तौर पर मानवाधिकार के पक्ष में हूं और उन सभी को

मेरा समर्थन है जो इस दिशा में सक्रिय हैं । किंतु मैं इस बात पर जोर डालता हूं कि मानवाधिकार का बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था से कोई सीधा रिश्ता नहीं हैं । यह कोई गारंटी नहीं है कि ऐसी व्यवस्था मानवाधिकार के लिए समर्पित हो । यह भी जरूरी नहीं है कि राजशाही अथवा एकदलीय शासन-पद्धति में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो ही । वस्तुतः बहुदलीय लोकतंत्र सभी मौकों पर सफल रहेगा यह मानना गलत है । अपना देश भारत इस बात का उदाहरण पेश करता है कि लोकतंत्र यदि अयोग्य हाथों में चला जाए तो वह घातक सिद्ध हो सकता है । अपने देश में मानवाधिकार हनन आम बात है । लेकिन चूंकि उसके शिकार कमजोर और असहाय लोग होते हैं और उसमें बलशाली लोग कारण होते हैं, अतः वे बखूबी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं । हमारे जनप्रतिनिधि जिसको चाहें उसे परेशान कर सकते हैं, प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी किसी भी निरपराध को सलाखों के पीछे भेज सकते हैं, न्यायिक व्यवस्था कमजोरों को न्याय नहीं दिला सकती है, और सरकार अपने विरोधियों पर कभी भी डंडे बरसा सकती है, इत्यादि । ये सब मानवाधिकार के विरुद्ध होते हैं, किंतु जांच-पड़ताल का कार्य करने वाले लीपापोती करके ‘जो हुआ’ उसे ‘नहीं हुआ’ घोषित कर देते हैं ।हमें यह भी समझना चाहिए कि पिछले तीस वर्षों में चीन ने भिभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, और कभी भारत से पिछड़ा रहा वह देश अब कहीं आगे निकल चुका है, उसके पीछे उसका अनुशासित एकदलीय शासन है । यदि भारत की तरह का लोकतंत्र वहां भी स्थापित हो जाए तो उसकी भी हालत बदतर हो जाएगी । हमारे यहां के लोकतंत्र में स्वतंत्रता का अर्थ है अनुशासनहीनता, निरंकुशता, नियम-कानूनों के प्रति निरादर भाव, आदि-आदि । हमारे राजनीतिक दलों के कोई सिद्धांत नहीं हैं, केवल सत्ता हथियाना और उस पर टिके रहने के लिए हर सही-गलत समझौता स्वीकारना उनकी प्रकृति बन चुकी है । क्या लोकतंत्र की हिमायत करते समय ऐसी बातों पर ध्यान दिया जाता है ? मैं इस पक्ष का हूं कि लोकतंत्र का समर्थन आंख मूंदकर नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह देखना निहायत जरूरी है कि संबंधित जनता और राजनेता लोकतंत्र की भावना को सही अर्थों में स्वीकारते हैं और उसके प्रति समर्पित हैं कि नहीं ? वास्तव में बुद्धिजीवी उसकी हिमायत महज इसलिए करते हैं कि आजकल लोकतंत्र का पक्ष लेना एक फैशन बन चुका है । कैसा लोकतंत्र, किसके द्वारा प्रबंधित लोकतंत्र, इन बातों पर विचार किए बिना ही वे उसकी हिमायत करते हैं ।

मेरी मान्यता है कि भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल आदि इस क्षेत्र के देश लोकतंत्र के लिए ढले ही नहीं हैं । इन देशों में लोकतंत्र की सफलता संदिग्ध है/रहेगी ।

और अंत में

इस बार के ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की जानकारी लेते समय मुझे पता चला कि यह पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ऑस्लो में दिये जाते हैं, और पुरस्कार के चयन का कार्य ‘नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट’ (Norwegian Nobel Institute) में अवस्थित ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा किया जाता है । अन्य सभी पुरस्कार-प्राप्त-कर्ताओं का चयन और उन्हें प्रदान करने का कार्य स्वेडन की राजधानी स्टॉकहोम में ही ‘नोबेल पुरस्कार समिति’ द्वारा किया जाता है । आल्फ्रेड नोबेल, जिनके नाम पर यह पुरस्कार दिये जाते हैं वस्तुतः नॉर्वे के थे, किंतु उनका कार्यक्षेत्र प्रमुखतया स्वेडन ही रहा । अपनी वसीहत में लिख गये थे शांति पुरस्कार की चयन-प्रक्रिया आदि नॉर्वे में ही संपन्न होवे । नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट के निदेशक गायर लुंडस्टाड (Geir Lundestad) ने पुरस्कार के संदर्भ में बताया है कि इस बार पुरस्कार के लिए प्रस्तावित नामों की संख्या 237 थी, जो विगत सभी वर्षों की तुलना में सर्वाधिक है । इनमें 38 संस्थाओं के नाम भी शामिल थे । – योगेन्द्र जोशी

विंस्टन चर्चिल, भारत की स्वाधीनता, लोकतंत्र और …(भाग 1)

(बीते स्वतंत्रता दिवस – 15 अगस्त – पर इस ब्लॉग पर प्रविष्ट लेख का पूरक)

विंस्टन चर्चिल

“Power will go to the hands of rascals, rogues and freebooters. All Indian leaders will be of low calibre and men of straw. They will have sweet tongues and silly hearts. They will fight amongst themselves for power and India will be lost in political squabbles.” (धूर्त, बदमाश, एवं लुटेरे हाथों में सत्ता चली जाएगी । सभी भारतीय नेता सामर्थ्य में कमजोर और महत्त्वहीन व्यक्ति होंगे । वे जबान से मीठे और दिल से नासमझ होंगे । सत्ता के लिए वे आपस में ही लड़ मरेंगे और भारत राजनैतिक तू-तू-मैं-मैं में खो जाएगा । स्रोत: http://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20090306021605AAtqICe)

ये शब्द विंस्टन चर्चिल के बताए जाते हैं, जो उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के पहले कथित तौर पर ब्रिटिश पार्लियामेंट में बोले थे । द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश प्रधान मंत्री रह चुके चर्चिल उस समय विपक्ष में हुआ करते थे । ब्रिटिश राजनीति में उनका विशिष्ट स्थान तो था ही, साहित्य में भी दखल रखते हुए वे नोबेल पुरस्कार पा चुके थे । उपर्युक्त शब्द क्या चर्चिल ने वास्तव में कहे थे इस बात पर जानकारों में मतभेद है ऐसा मुझे ‘विकीकोट्’ की वेबसाइट पर पढ़ने को मिला । (http://en.wikiquote.org/wiki/Winston_Churchill)उपर्युक्त बात चर्चिल ने वस्तुतः कही हों या नहीं, तथ्य यह है कि आज ये घटित होते हुए नजर आ रही हैं । असल में चर्चिल उस समय (1947) भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने के घोर विरोधी थे । इस संबंध में कुछ अधिक जानने की इच्छा से मैंने इंटरनेट खंगाला तो एक विस्तृत दस्तावेजः
http://www.winstonchurchill.org/learn/speeches/speeches-of-winston-churchill/105-our-duty-in-india
मुझे पढ़ने को मिला । Our Duty in India (March 18, 1931. Albert Hall, London) नाम के करीब 4 हजार शब्दों के इस दस्तावेज में चर्चिल ने भारत को स्वतंत्रता दिए जाने के सख्त विरोध में अपना पक्ष रखा था । चर्चिल बाद तक स्वतंत्रता के विरोधी रहे । मैं इसी से कुछ चुने वक्तव्यों को यहां उद्धरित कर रहा हूं:-

क्या सोच थी चर्चिल की भारत को लेकर?

“ब्रिटिश शासन का अधिकारियों के प्रति कड़ा निर्देश सदा से रहा है कि वे भारत में अपने वेतन/पेंशन तथा भत्तों के अलावा किसी और प्रकार का लाभ उठाने की कोशिश न करें ।”

इस कथन को अगर सिरे से खारिज कर दें तो बात अलग है, अन्यथा यह माना जाना चाहिए कि उनके अधिकारी आज की तरह घूसखोरी, गबन, घपलेबाजी आदि करके अपना घर नहीं भर रहे थे और सभी भारतीयों के प्रति समान व्यवहार करते थे । उनका इस देश पर राज हमें भले ही पसंद न हो, किंतु वह भरसक ईमानदारी का था इसे मानना पड़ेगा । क्या आज प्रशासनिक ईमानदारी रह गयी है कहीं ?

“प्रयास किया जाना चाहिए कि जनप्रतिनिधि होने का दावा करने वाले लोग आम जनता की मौलिक जरूरतों को समझते हों और उनके प्रति समर्पित हों । अतः उनको पहले ब्रिटिश शासन के ही अधीन राज्यस्तरीय राजकाज की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए ताकि वे अपनी काबिलियत सिद्ध कर सकें ।”

आज की शासकीय तस्वीर

मैं चर्चिल की बात से पूरा नहीं तो काफी हद तक सहमत हूं । भारतीय लोग राजतांत्रिक अथवा सामंती व्यवस्था के अधीन सदियों से जीते आ रहे थे । वे लोकतंत्र से परिचित थे ही नहीं । लोकतंत्र की पहली और प्रमुख आवश्यकता है कि लोग बराबरी के स्तर पर एक दूसरे को देखते हों और स्वतंत्र रूप से सोच-विचार के आदी हों । इस देश में बराबरी की भावना तो कभी रही ही नहीं । आम जनों के मन में इस भावना की जड़ें गहरी जमी हैं कि कुछ लोग एवं उनके परिवार राज करने के लिए जन्म लेते हैं, तो अधिसंख्य शासित होने के लिए जन्मते हैं । अपवादों को छोड़ सभी शासित होना अपनी नियति मानते आए हैं ।

यदि आप आज के राजनैतिक दलों पर गौर करें तो देखेंगे कि उनके भीतर तो लोकतंत्र है ही नहीं । वर्तमान काल में प्रायः हर दल एक व्यक्ति की निजी ‘कंपनी’ होती है, जिसमें कार्यकर्ता नामक के कर्मियों को मुखिया के आदेशों/निर्णयों के अनुसार चलना होता है । जो लोग अपने दलों में लोकतंत्र बर्दास्त नहीं कर सकते वे भला देश में क्या लोकतंत्र स्थापित करेंगे । चर्चिल का सोचना था कि जब राज्य स्तर पर नेता अपनी क्षमता एवं स्वच्छ कार्यशैली सिद्ध कर चुकेंगे, तब देश को आजादी दी जाए, लेकिन एक झटके में नहीं ।

‘ब्रैह्मिनों’ यानी ताकतवरों का राज

“भारत को ‘ब्रैह्मिनों’ के शासन पर छोड़ देना वहां के कमजोर तबके के प्रति हमारी क्रूरता का द्योतक होगी ।”

चर्चिल ने अपने भाषण में यत्रतत्र ‘ब्रैह्मिन’ शब्द का प्रयोग किया है । वे महात्मा गांधी से बहुत चिढ़ते थे और पंडित नेहरू को शासन पाने के लिए उतावला व्यक्ति कहते थे । चर्चिल को मालूम ही था कि स्वाधीनता संघर्ष केवल ‘ब्राह्मणों’ का अभियान नहीं था; उसकी अगुवाई तो गांधीजी कर रहे थे । अतः प्रसंग से स्पष्ट होता है कि ‘ब्रैह्मिन’ से उनका मतलब दलितेतर जातियों या सवर्णों से था न कि अकेले ब्राह्मणों से । उनका मानना था कि इन लोगों का व्यवहार कमजोर तबके के प्रति निंद्य ही रहेगा जैसा सदियों से होता आया है । गौर करें इन शब्दों परः“…‘ब्रैह्मिन’ जिन्होंने अपने करीब छः करोड़ साथी देशवासियों, जिन्हें वे अस्पृश्य कहते हैं, को अस्तित्व के मौलिक अधिकार से वंचित रखा है और जिन्हें हजारों सालों के दमन से अपनी दुःखद नियति को स्वीकारने का पाठ पढ़ाया है । वे इन छः करोड़ के साथ खा नहीं सकते, उनके साथ पी नहीं सकते, और उन्हें मनुष्य ही नहीं मानते । …” (… Brahmins who deny the primary rights of existence to nearly sixty millions of their own fellow countrymen whom they call ‘untouchable’, and whom they have by thousands of years of oppression actually taught to accept this sad position. They will not eat with these sixty millions, nor drink with them, nor treat them as human beings…) (अविभक्त भारत की जनसंख्या तब करीब 35 करोड़ थी ।)

अस्पृश्यता संबंधी अपने अनुभवों का संक्षिप्त लेखा-जोखा मैंने इसी ब्लॉग के पृष्ठ ‘अस्पृश्यताः मेरे अनुभव’ में प्रस्तुत किया है ।

“हम उन लोगों के लोकतंत्र की मांग नहीं स्वीकार सकते, जो अपने ही साथ के छः करोड़ को सदा के लिए पशुवत् जीने को विवश करते आये हैं ।”

“उनकी दशा दासों से भी बदतर है, क्योंकि उन्हें यह सिखाया गया है कि वे दैहिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्तर के समर्पण एवं दासत्व को स्वीकारें ।” (Their plight is worse than that of slaves, because they have been taught to consent not only to a physical but to a psychic servitude and prostration.)

मैं चर्चिल की इस बात को बखूबी समझता हूं । मैंने बचपन में अपने गांव में प्रचलित अस्पृश्यता को बेहद नजदीक से देखा है । तब उसके अर्थ की गंभीरता समझने की क्षमता मुझमें नहीं थी, किंतु अब लगता है कि वह अमानवीय तो था ही । संयोग/सौभाग्य से स्थिति कुछ हद तक बदली-सी लगती है, लेकिन दलितेतर जातियां के मन में बसी भेद की भावना अभी दूर नहीं हुई है ।

“ब्राह्मिनों (यानी सवर्णों) को सत्ता सौंपने पर भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी, तथा भ्रष्टाचार आदि पनपेंगे ।”

यह सब तो वास्तव में हो ही रहा है । इसे आप महज संयोग कह सकते हैं, अथवा यह मान सकते हैं कि चर्चिल को इस देश की वास्तविकताओं की अच्छी समझ थी ।

तो ये रहीं चर्चिल की कही कुछ बातें । आगे स्वाधीनता तथा लोकतंत्र से जुड़े मेरे अपने कतिपय अनुभवों का संक्षिप्त लेखा-जोखा प्रस्तुत है ।

मेरे अनुभव

अपने देश को स्वतंत्र हुए 63 वर्ष हो चुके हैं और तकरीबन यही मेरी भी उम्र है । बात तब की है जब स्वतंत्रता मिले 8-10 साल हो रहे थे । तब मैं उत्तराखंड के सुदूर क्षेत्र में अवस्थित अपने छोटे-से गांव के पास की सरकारी प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था । (उस पाठशाला का संक्षिप्त वर्णन इस ब्लॉग के ‘मेरी प्राथमिक पाठशाला’ पृष्ठ में शामिल है ।) देश एवं स्वतंत्रता के अर्थ हम बच्चे ठीक से तो नहीं समझते थे, किंतु उसकी चर्चा सुनकर एक प्रकार का गर्व महसूस करते थे । तब गांधी, नेहरू, पटेल, बोस आदि के नाम सुपरिचित लगने लगे थे । जैसा मुझे याद आता है, उन दिनों के.एम. मुंशी तथा बाद में वी.वी. गिरि उ.प्र. के राज्यपाल थे । शायद सम्पूर्णानंद मुख्यमंत्री एवं कमलापति त्रिपाठी शिक्षामंत्री थे । इस सरीखी जानकारी के बाबत हमारी स्थिति आज के सरकारी स्कूलों के बच्चों से कहीं बेहतर थी ।

शेष बातें लेख के अगले (कल प्रकाश्य) भाग में शामिल हैं । – योगेन्द्र जोशी

और भावी आर्थिक महाशक्ति की आज की तस्वीर:

स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त, बधाई !! लेकिन …

आज 15 अगस्त है, स्वाधीन राष्ट्र इंडिया दैट इज भारत का 64वां स्वतंत्रता दिवस ।

इस अवसर पर देशवासियों को मेरी ओर से बहुशः बधाइयां और ढेर सारी शुभकामनाएं ।

– योगेन्द्र जोशी

बधाई एवं मंगलकामनाएं प्रेषित करना मेरे लिए एक औपचारिकता है ।

ऐसे अवसरों पर शुभ-शुभ बोलना चाहिए, बुजुर्गों की यही सलाह रही है । हकीकत कुछ भी हो, मुंह के शब्द शुभ ही होने चाहिए । लेकिन …

लेकिन एक सवाल पिछले कुछ सालों से मेरे मन में हर ऐसे मौके पर उठने लगा है । इन ‘दिवसों’ की क्या वाकई कोई अहमियत है ? क्या मकसद पूरा होता है इन दिवसों को मनाने से ? 15 अगस्त के संदर्भ में तो यह सवाल और भी अहम हो जाता है । अपने देशवासियों को यह बताना क्यों जरूरी है कि यह देश कभी फिरंगियों का गुलाम रहा ? सच पूछें तो उससे पहले भी गुलाम रहता आया है । और कई मानों में तो आज भी गुलाम है ! इतिहास के छात्र के लिए तो यह सब जानना मजबूरी है; उसे तो वस्तुनिष्ठ तथ्यों को जानना ही होता है, चाहे वे सुखद हों अथवा पीड़ाप्रद । लेकिन स्वतंत्रता दिवस मनाकर किसी को भी इस तथ्य की याद दिलाना जरूरी क्यों है ?

आप कहेंगे कि इस दिन ‘जश्न’ मनाकर हम देशवासियों को प्रेरित करते हैं कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें, देश पर गर्व करें, उसे प्रगतिपथ पर ले चलें, कुछ ऐसा न कर बैठें कि वापस उस बीती गुलामी के हालतों पर वापस पहुंच जाएं, इत्यादि । यह सब कहना और सुनना आसान है और तर्कसम्मत भी लगता है । लेकिन क्या वाकई यह मकसद पूरा हो पाया है कभी ? क्या यह मकसद आगे भी पूरा हो पाएगा कभी ? क्या इस दिन जो कुछ कहा जाता है वह सब विशुद्ध औपचारिकता से अधिक कुछ और भी होता है ?

मंच से आदर्श भरी बातें कह देना वक्ताओं का और उसे सुन लेना श्रोताओं का फर्ज होता है । कई हिंदू परिवारों में श्रीसत्यनारायण कराई जाती है । न बांचने वाला एकाग्रचित्त एवं गंभीर होता है और न ही वे समस्त लोग जो कथा सुनने का स्वांग भर रहे होते हैं । कुछ वैसा ही इस दिवस पर भी होते हुए दिखता है मुझे । दोनों के कर्तव्य क्रमशः मंच के ऊपर और नीचे आंरभ होते हैं और वहीं समाप्त हो जाते हैं । उसके बाद अन्य 363 (कभी-कभी 364) दिनों की भांति यह दिन भी गुजर जाता है । ध्वजारोहण देख लिया, राष्ट्रगान गा-सुन लिया, ‘माननीय’ वक्ता की सतही देशभक्ति के उद्गार सुन लिये, और फिर देश को भूल अपने-अपने हितों को येनकेन प्रकारेण साधने को लौट पड़े । दूसरे दिन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पहुंचने पर न वक्ता को यह स्मरण रह जाता है और न श्रोता को ही कि बीते दिवस उसने देश के नाम पर कितनी कसमें खिलाईं या खाईं । अगर याद रहता होता तो इतनी दुर्व्यवस्था चारों ओर देखने को न मिलती ।

दावा किया जाता है कि स्वतंत्रता के बाद देश ने पर्याप्त तेजी से प्रगति की है । आज कहा जा सकता है कि देशवासियों के घरों में टेलीविजन, फ्रिज पहुंच चुके हैं, बहुतों के घरों में कारें आ चुकी हैं, अनेक हाथों में मोबाइल फोन पहुंच चुके हैं, इत्यादि । इन सब का होना बड़ी उपलब्धि नहीं है । यह सब तो देश पराधीन रहता तो भी होता ही । ऐसी प्रगति के पीछे व्यावसायिक संस्थाओं का हाथ होता है । अपने कारोबार को विश्व भर में फैलाना और जन-जन के हाथ में उनको पहुंचाकर मुनाफा कमाना उनका उद्येश्य होता है । देश की पराधीनता से उसका सीधा संबंध नहीं है । अंग्रेजों के जमाने में कुछ भी प्रगति नहीं हो रही थी, यह कहना गलत है । रेलें बिछाना, सड़कें बनाना, स्कूल-कालेज खोलना, अस्पताल बनाना आदि कार्य तो तब भी हो रहे थे । यह ठीक है कि हमने उस को कुछ गति दी । यह कहना कि देश ने परमाणु विस्फोट करके दुनिया को अपनी ताकत दिखा दी है, हम अब चंद्रमा पर पहुंचने को तैयार हैं, देश 8-9 प्रतिशत की आर्थिक प्रगति कर रहा है, इत्यादि, भी बहुत माने नहीं रखते हैं, क्योंकि स्वाधीनता संघर्ष जिन उद्येश्यों को लेकर चला था वह सब यह नहीं । यह सब अवश्य तब अधिक सार्थक होता यदि हम मूल उद्येश्यों से भटक न गये होते ।

मूल उद्येश्य ? क्या थे वे ? मैं अपनी समझ को स्पष्ट करता हूं । कदाचित् आप सहमत न हों । सहमत न होने में ही भलाई है, तब किसी प्रकार की पीड़ा मन में नहीं उपजती है । लेकिन मेरे लिए इन विचारों से मुक्त रह पाना संभव नहीं, क्योंकि वे स्वतःस्फूर्त हैं, न चाहते हुए भी मन में न जाने कहां से प्रवेश कर जाते हैं । हां तो उद्येश्य ? देश में गरीब-अमीर के बीच की खाई को पाटना, हर नागरिक को साक्षर ही नहीं अपितु सुशिक्षित बनाना, उन्हें समाज एवं देश प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाना, अंधविश्वासों में जी रहे लोगों में तार्किक/वैज्ञानिक चिंतन-सामर्थ्य जगाना, जनता को स्वच्छता एवं प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक बनाना, समाज में व्याप्त जातीय-धार्मिक-क्षेत्रीय भेदभाव मिटाना, स्वस्थ-सुदृण-त्वरित न्यायिक व्यवस्था स्थापित करना, शासन-प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त एवं भ्रष्टाचार-विमुक्त बनाना, इत्यादि, वे सभी बातें जिनकी चर्चा होने पर आम नागरिक का सिर आत्मविश्वास के साथ ऊपर उठ सके, न कि वह बचाव में बगलें झांकने लगे ।

लेकिन यह सब हो पाया है ? क्या हमारा लोकतंत्र सही दिशा में अग्रसर हो सका है ? मुझे उत्तर नहीं में ही मिलता है । काश, मैं भी उन भाग्यशालियों में होता जो देश की प्रगति के भ्रम में बखूबी जी रहे हैं !

हम ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाते जरूर हैं, किंतु इसके अर्थ कभी के भूल चुके हैं । आज देश के जो हालात हैं उनसे मैं यही निष्कर्ष निकाल पाया हूं कि अब स्वतंत्रता के अर्थ हैं मर्यादाओं से विमुक्त स्वेच्छाचारिता, जिसमें
अनुशासनहीनता है,
निरंकुशता है,
उच्छृंखलता है,
स्वार्थपूर्ति की खुली छूट है,
कायदे-कानूनों की अनदेखी है
और कार्यसंस्कृति का अभाव है ।
वस्तुतः इसके आगे भी ऐसा ही बहुत कुछ और, जिसे आप सोच सकते हैं

तीन रोज पहले मुझे अपने प्रातःकालीन अखबार में एक बुजुर्ग के उद्गार पढ़ने को मिले थे । शब्द थेः
“… आज के हालात का पता होता तो शायद बापू भी देश की आजादी के पक्ष में न होते । …”
(स्वाधीनता संघर्ष के साक्षी रह चुके वयोवृद्ध श्री सूबेदार मिश्र, अमर उजाला, 12 अगस्त 2010, पृष्ठ 5)

मुझे बचपन में अपनी स्वर्गीया मां से सुनीं कुछ बातें अब याद आती हैं । देश स्वतंत्र हो चुका है इसे कहने के साथ-साथ वह विक्टोरिया-राज की प्रशंसा करना भी नहीं भूलती थीं । इस विषय पर अतिरिक्त बातें अगली पोस्ट में लिखूंगा ।

चलते-चलते यह भी:
“The value of a man should be seen in what he gives and not in what he receives.”
– Albert Einstein (Ideas and Opinions, Rupa, 1992, p 62)
(व्यक्ति क्या देता है इससे उसकी महत्ता आंकी जानी चाहिए न कि वह क्या पाता है इससे । – आल्बर्त आइन्स्ताइन)

और एक तस्वीर भी:

– योगेन्द्र जोशी

सरकारी मितव्ययिता, राजसी ठाट और शशि थरूर का ‘कैटल क्लास’

पिछले कुछ दिनों से मैं समाचार माध्यमों के द्वारा प्रसारित एक खबर पर गौर कर रहा हूं । खबर है कि केंद्र सरकार के वर्तमान ‘माननीय’ विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने हवाई जहाजों के ‘इकॉनमी क्लास’ को ‘कैटल क्लास’ कहकर अपनी ही सरकार के ‘मितव्ययिता अभियान’ की खिल्ली उड़ाई है । (क्लिक करें एक तथा दो) देश में लगातार अबाध गति से बढ़ रही रोजमर्रा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए देश के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रालयों को सलाह दी है कि वे अपने खर्चों को घटायें । इस दिशा में एक कदम हवाई यात्राएं कम करने और आवश्यक होने पर ‘इक्जक्यूटिव क्लास’ के बदले ‘इकॉनमी क्लास’ में यात्रा करने की सलाह दी गयी है । श्रीमान् थरूर को यह सलाह रास नहीं आई और बोल पड़े कि वे ‘कैटल क्लास’ (‘इकॉनमी क्लास’) में यात्रा नहीं कर सकते ।

हवाई यात्रा के इकॉनमी क्लास को कैटल क्लास कहने पर श्री थरूर की खूब आलोचना हुई है । कैटल क्लास यानी गाय-भैंसों के लायक दर्जा ! एक अभिजात वर्ग के संपन्न व्यक्ति, जिसने अपनी जिंदगी का मूल्यवान समय अमेरिका में गुजारा हो और जो कांग्रेस पार्टी की मेहरबानी से देश वापसी पर पहली ही बार किसी प्रकार के कष्टप्रद राजनैतिक जीवन के अनुभव के बिना ही राजसी ठाट वाली राज्यमंत्री की कुर्सी पा गया हो, को तथाकथित कैटल क्लास कैसे स्वीकार्य हो सकता है ?

मेरी श्री थरूर के प्रति पूरी सहानुभूति है । बेचारे श्री थरूर की असल में कोई खास गलती नहीं है । गलती है तो यही कि उनका भाषाई ज्ञान ठीक नहीं है । वे यह भूल गये कि उनकी अंग्रेजी भारत मैं ठीक से नहीं समझी जा सकेगी । अपने देश में लोग अंग्रेजी के शब्दों का पहले अपनी भाषा में अनुवाद करते हैं और फिर अंग्रेजी वाक्यों का अर्थ निकालते हैं । वे नहीं जानते हैं कि कुछ शब्द/पदबंध अमेरिका में ऐसे अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं जिनसे अधिकांश हिंदुस्तानी अपरिचित नहीं रहते हैं । इस तथ्य का ज्ञान श्री थरूर को होना चाहिए था, जो उन्हें शायद नहीं है । होता भी कैसे जब जिंदगी अधिकांशतः अमेरिका में ही बीती हो । खोजने पर ऐसे कई अंग्रेजी शब्द/पदबंध मिल जायेंगे, जिनके शाब्दिक अर्थ अमेरिका में अस्वीकार्य होंगे, अथवा जिनके सही अर्थ हम हिंदुस्तानी शायद न जानते हों । ऐसा एक शब्द/पदबंध मेरे ध्यान में आ रहा है, और वह है ‘हॉट डाग्ज’ (hot dogs) जो पशु-मांस के बना एक प्रकार का भोज्य सैंडविच है, जिसका चलन यूरोप एवं अमेरिका में पर्याप्त है । अमेरिका में तो बैंगन को अक्सर ‘मैड ऐप्ल्’ (mad apple) अथवा एग्प्लांट (eggplant) कहते हैं, जिसका अनुमान हममें से कोई शायद ही लगा पाये । इसी प्रकार वहां की मुद्रा ‘डॉलर’ को कुछ लोग ग्रीनबैक (greenback) भी कहते हैं । वस्तुतः हमारी किताबी अंग्रेजी के कुछएक शब्द अमेरिका (और कभी-कभी ब्रिटेन) में कम या नहीं इस्तेमाल होते हैं । उनके बदले अन्य शब्द प्रचलन में हैं, जैसे okra (हमारी भिंडी या lady’s fingers), peanuts (हमारी मूंगफली या groundnuts), gas (हमारा petrol), आदि ।

और कैटल क्लास भी उपर्युक्त श्रेणी का एक पदबंध है जो अमेरिका में इकॉनमी क्लास इंगित करने के लिए प्रयोग में लिया जाता है । वे सहज भाव से कह सकते है कि अमुक व्यक्ति कैटल क्लास में यात्रा कर रहा है । किसी को बुरा नहीं लगेगा और न ही कोई कैटल शब्द के अर्थ का अनर्थ निकालेगा, इस तथ्य के बावजूद कि इकॉनमी क्लास एक असुविधाजनक व्यवस्था है जिसमें, अमेरिकियों के नजरिए से, लोग एक प्रकार से ठूंसे जाते हैं । पर अपने यहां तो शाब्दिक अर्थ लिए जायेंगे और तदनुसार किसी वक्तव्य की व्याख्या की जाएगी । श्री थरूर की गलती यही थी कि वे यह अंदाजा नहीं लगा सके कि उनका अमेरिकी अंग्रेजी ज्ञान अर्थ का अनर्थ कर सकता है ।

श्रीमान् थरूर को इस देश की वास्तविकता का ज्ञान शायद है ही नहीं । जिस अभावग्रस्त देश में लोग रेलगाड़ियों, बसों, आटोरिक्शों आदि में ठुंसकर आवागमन/यात्रा के आदी हों और जिनके लिए हवाई यात्रा साकार न हो सकने वाला एक सपना हो, उनके लिए हवाई यात्रा का इकॉनमी क्लास भला कैटल क्लास कैसे कहला सकता है ? एक अमेरिकी भले ही उसे कैटल क्लास कहे, आम हिंदुस्तानी के लिए तो वह अप्राप्य स्वर्गीय अनुभव की चीज है । कितने लोग हैं जो अपने देश में हवाई यात्रा करने की औकात रखते हों, अपने बल पर ! शायद पूरी आबादी का एक प्रतिशत (लगभग 1.15 करोड़) भी नहीं । जहां की करीब आधी आबादी दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में रातदिन खट रहा हो और जहां के लोग हवाई जहाज के भीतर का नजारा देखने के सुखद अवसर की भी कामना करने का साहस न रखते हों, वहां के लोगों के लिए इकॉनमी क्लास कैसे कैटल क्लास हो सकता है ? और हकीकत तो यह है कि सुख-सुविधओं के आदी अमेरिकी कुछ भी कहें, हवाई यात्रा तो अपने यहां की एसीयुक्त कार या बस और एसी-3 रेलयात्रा से तो कहीं अधिक सुखद होती है; आपकी सेवा में तत्पर कर्मचारी, चाय-नास्ते की उपलब्धता, शौचादि की सुविधा, मनोरंजन के लिए स्वतंत्र वीडियो, आदि । क्या ऐसी सुविधा को भेड़-बकरियों के योग्य व्यवस्था कहा जा सकता है ? भारतीय नजरिए से हरगिज नहीं । और वह कैसा जनप्रतिनिधि/सांसद जिसे आम आदमी की समझ का अंदाजा न हो और जो उनकी भावनाओं के अनुरूप बात करने की काबिलियत न रख्ता हो ? श्री शशि थरूर इसी अर्थ में अयोग्य ठहर जाते हैं । उनको विदेशों, विदेश-नीतियों के अनुरूप जितना भी ज्ञान हो, देशवासियों की आम सोच का ज्ञान नहीं है ।

यह सब तो मुद्दे का एक पहलू है, शशि थरूर को लेकर । परंतु गहराई में उतरें तो वास्तविकता अधिक ही चिंतनीय नजर आती है । कहते हैं कि अपने देश में लोकतंत्र है, पर मुझे ऐसा लगता नहीं । मैं तो यहां की व्यवस्था को लोकतांत्रिक राजतंत्र मानता हूं । यहां वोट के माध्यम से राजाओं, राजकुमारों और सामंतों का चुनाव होता है जनप्रतिनिधि का बिल्ला मिल जाने पर उनके राजसी ठाटबाट की व्यवस्था शुरु हो जाती है । आम जन कितने ही कष्टों में जी रही हो, भूखे पेट सो रही हो, विपन्नता से पे्ररित हो आत्महत्या करने को मजबूर हो रही हो, इन जनप्रतिनिधियों को विशेष सुख-सुविधाएं मिलनी ही चाहिए । उनकी सुरक्षा व्यवस्था में, उनकी उच्चतम स्तर की आवासीय सुविधा में, उनकी यात्रा आदि में लाखों-करोड़ों का खर्च होना उनका विशेषाधिकार बन जाता है । इन सब के अभाव में वे भला जनसेवा कैसे कर सकते हैं ! कुछ दिन पहले हवाई यात्रा को लेकर एक अन्य केंद्रीय मंत्री, श्री आनंद शर्मा, के मुख से निकले ये उद्गार मैंने सुने थेः ‘इकॉनमी क्लास में यात्रा करके मैं जनता का कार्य कुशलता से नहीं कर सकता । उनका मंतव्य शायद यह होगा कि इकॉनमी क्लास की यात्रा की थकान के बाद उनमें इतनी शारीरिक क्षमता नहीं रह जाती कि वे जनसेवा कर सकें । देशवासियों को स्मरण रहे कि पूर्व में रेलमंत्री, अपने श्रीमान् लालूप्रसाद जी की रेल-सैलून के पंचसितारा सुविधाओं से लैस होकर ही जनसेवा करते थे । उनकी उस सुविधा को वर्तमान रेलमंत्री, सुश्री ममतादीदी, ने नकार दिया है । कुछ समय पहले तक मंत्रीद्वय, श्री एस एम कृष्णा और श्री शशि थरूर स्वयं, पंचसितारा होटल में आवास लेकर ही जनसेवा करते रहे हैं । एक खबर (क्लिक करें) दो रोज पहले मैंने पढ़ी कि अपने सांसदों के बंगलों की साज-सज्जा में ही कई-कई करोड़ का खर्चा हाल में हुआ है ।

कुल मिलाकर जनप्रतिनिधि सामंतों-राजकुमारों के तुल्य जीवन जीते हैं । शायद ही कोई अपवाद मिले जहां जनप्रतिनिधि सही अर्थों में आम जनों में से एक हो और उनके जैसी जिंदगी जीने का विचार रखता हो । मेरी दृष्टि में सभी चुने हुए राजा-महाराजा हैं, जिनके लिए पंचसितारा सुविधा देशवासियों को करनी चाहिए, भले ही अधिसंख्य को भूखा सोना पड़े । यह बात और है कि महात्मा गांधी की सादगी का गुणगान करने में वे कभी न थकते हों – ऐसे व्यक्ति का गुणगान जिसके विचारों का रत्ती भर भी अनुकरण करना उन्हें स्वीकार्य नहीं । खैर, अपना देश तो विरोधाभासों की खान ही है ! – योगेन्द्र