त्रिजन्मद शिशु  यानी  थ्री-पेरेंट  चाइल्ड (3-parent child) संबंधी समाचार

“त्रिजन्मद” मेरा अपना सुझाया शब्द है। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कितना सही होगा इसके बारे में आश्वस्त नहीं हूं। इसके अर्थ स्पष्ट कर दूं: यह उस शिशु के लिए विशेषण है जिसके जन्म में तीन व्यक्तियों की भूमिका रही हो।

इधर दो-चार दिनों से वैज्ञानिक खोजों/आविष्कारों संबंधी समाचारों में एक यह भी है कि जॉर्डन (युर्दान) देश के एक दम्पती की संतानें जिवित नहीं रह पा रही थीं, क्योंकि महिला (मां) की “जीन-संरचना” में एक दोष प्रवेश कर चुका था। पहले चार गर्भधारणों की नियति गर्भपात में हो गयी। पांचवें मौके पर बच्ची पैदा हुई जो मस्तिष्क एवं मांसपेशियों के गंभीर “लाइ” लक्षण (Leigh Syndrome) से पीड़ित थी और छ: वर्ष तक ही जीवित रह सकी। उसके बाद बेटे का जन्म हुआ और वह भी उसी रोग से पीड़ित होकर शैशवावस्था में ही चल बसा। जांच से पता चला कि महिला के डिम्बों में मौजूद “माइटोकॉंड्रिया” नामक जैविक इकाइयां दूषित हो चुकी हैं।

उक्त दम्पती ने समस्या के निराकरण के लिए अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क के न्यू होप फ़र्टिलिटी सेंटर के चिकित्सक जॉन झांग (John Zhang) से संपर्क किया। डा. झांग ने एक विधि अपनाई जिससे वह एक स्वस्थ बच्चे की मां बन सकी। उसी से जुड़ी जानकारी यहां प्रस्तुत है। अधिक विवरण ब्रितानी विज्ञान पत्रिका “न्यू साइंटिस्ट”  में छपे लेख से अथवा अन्य स्रोतों से मिल सकती है।

जीवधारियों का शरीर जैविक कोशिकाओं (सेल) से बना होता है जिसका ढांचा और जिसमें घटित होने वाली प्रक्रियाएं काफी जटिल होती हैं। मोटे तौर पर कहा जाये तो सेल का बाहरी आवरण एक झिल्ली (मेम्ब्रेन) से बना होता है जिसके भीतर अपेक्षया छोटा नाभिक (न्यूक्लियस) रहता है जो द्रव पदार्थ (साइटोप्लाज़्म – पानी और उसमें मौजूद प्रोटीन तथा अन्य जैविक तत्व) में तैरता रहता है। इसी द्रव में माइटोकोंड्रिया नामक इकाइयां होती हैं जिन्हें सेल का पॉवर हाउस कहा जाता है। सेल के कार्य और विकास के लिए वांछित ऊर्जा का नियंत्रण यही इकाइयां करती हैं। (देखें साथ का चित्र।)

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जीवों की भ्रूण रचना में मादा के डिम्ब और नर के शुक्राणु की भूमिका रहती है। डिम्ब स्वयं में एक मादा के जैविक सेल के माफिक होता है किंतु जिसका नाभिक सामान्य सेल का एक प्रकार से आधा होता है। इसी प्रकार नर का शुक्राणु उसके सेल का नाभिक भर होता है किंतु एक प्रकार से मात्र उसका आधा। निषेचन (फ़र्टिलाइज़ेशन) की प्रक्रिया में शुक्राणु डिम्ब में प्रवेश करके उसके नाभिक के साथ मिल कर उसे पूर्ण बना देता है। यही नाभिक है जिसमें मादा और नर के गुण मिश्रित रहते हैं। इस प्रकार बने नये जैविक सेल की प्रक्रियाएं उन्हीं माइटोकॉंड्रिया से नियंत्रित होती हैं जो मादा के डिम्ब से आये हुए होते हैं। ऐसा जैविक सेल जब भ्रूण की शेष प्रक्रिया से गुजरता है तो उसमें मादा (मां) और नर (पिता) के गुण नाभिक के माध्यम से मिलते हैं किन्तु उसके विकास की प्रक्रिया उस माइटोकॉंड्रिया से नियंत्रित होती है जो शुद्ध रूप से मादा से प्राप्त होता है। इस इकाई में अगर दोष हो तो उसके परिणाम संतान में दिखाई देंगे। इस प्रकार मां ऐसे दोषों की वाहक होती है।

न्यू साइंटिस्ट के जिस लेख का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें जॉर्डन के एक दंपति के नवजात बच्चे के जनमने के लिए अपनाई गयी विधि का व्योरा है जिसके मां के माइटोकॉंड्रिया में अज्ञात कारणों से दोष आ चुका था और उसकी पहले की संतानें जीवित नहीं रह सकीं। इसकी प्रबल संभावना थी कि आगे की संतानें भी जीवित नहीं रहेंगी। अमेरिकी चिकित्सक जॉन झांग ने मेक्सिको देश में जाकर संबंधित प्रयोग किया, क्योंकि अमेरिका में उस विधि का प्रयोग वर्जित है। मेक्सिको के तत्संबंधित नियम शिथिल हैं। भावी मां के डिम्ब से उसका नाभिक निकाला गया (अनुसंधान प्रयोगशाला में)। उसे किसी अन्य महिला के डिम्ब के नाभिक के स्थान पर स्थापित कर दिया गया। डिम्ब में विद्यमान अन्य पदार्थ यथावत बने रहे। इस प्रकार ऐसा डिम्ब तैयार किया गया जिसका नाभिक मां का था लेकिन दोषहीन माइटोकॉंड्रिया अन्य महिला का था। फिर इसका निषेचन पिता के शुक्राणु से किया गया और निषेचित कोशिका, जिसे अब भ्रूण कहा जायेगा, को मां के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया। प्रयोगशाला में डिम्ब के निषेचन प्रक्रिया को संपन्न करना वैज्ञानिक भाषा में “इन-वीट्रो” निषेचन (in vitro fertilization) कहा जाता है।

समुचित अंतराल के बाद मां ने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया जो अब पांच माह का है।

चूंकि उस बच्चे की उत्पत्ति के लिए आवश्यक भ्रूण के लिये शुक्राणु पिता से लिए गये, डिम्ब-नाभिक मां से तथा माइटोकॉंड्रिया अन्य महिला से अतः उसके तीन जनक माने गये। तदनुसार उसे “थ्री-पेरेंट चाइल्ड” कहा गया है। – योगेन्द्र जोशी

‘पिकनिक स्पाट’ बन चुके तीर्थस्थल और उत्तराखंड की आपदा

उत्तराखंड में अतिवृष्टि ने पिछले कुछ दिनों से जो तबाही मचा रखी है उससे चारधाम-यात्रियों को बचाने एवं स्थानीय नागरिकों को उबारने में कितना समय अभी लगेगा कहना मुश्किल है । वहां जो कुछ घटा उसके लिए कौन जिम्मेदार है यह सवाल जोरशोर से पूछा जा रहा है । क्या दुर्घटना रोकी जा सकती थी ? क्या जानमाल की जो हानि हुई उससे बचा जा सकता था ? ऐसे सवालों के उत्तर में कहने को मेरे पास बहुत कुछ है । अभी मैं इस बात पर ध्यान खींचना चाहता हूं कि हमारे तीर्थस्थल अब तीर्थस्थल नहीं रह गए हैं, बल्कि वे पिकनिक स्पाट बन चुके हैं । जानमाल के मौजूदा नुकसान का एक कारण उनका पिकनिक स्पाट बनना भी है ।

उत्तराखंड मेरा पुस्तैनी राज्य है, जिसके बागेश्वर जिले में मेरा गांव है जो अब निर्जन-सा हो चुका है, क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए बाहर निकल चुके हैं । मेरे आरंभिक कुछ वर्ष वहीं बीते हैं । वहां के जनजीवन, पहाड़ों-नदियों की प्रकृति, धूप-वर्षा-बर्फबारी, ऊबड़-खाबड़ रास्ते, आदि से मेरा बचपन से ही परिचय रहा है । मुझे वे दिन याद हैं जब वहां सड़कों का जाल नहीं बिछा था और मीलों पैदल चलकर गंतव्य तक पहुंचना होता था । बिजली कैसी होती है, टेलीफोन क्या होता है, रेडियो से क्या करते हैं, जैसे सवाल मन में उठा करते थे । उनके प्रति जिज्ञासा रहती थी परंतु उन्हें देखने का मौका अपने पास न था । परंतु देखते ही देखते वहां बहुत कुछ बदल गया, और मैं खुद उस गांव से कहीं दूर पैंसठ-वर्षीय वरिष्ठ नागरिक बन गया । जो बदलाव हुए उसकी कीमत कम नहीं रही, जिसे अब हम सभी को चुकाना है, आपदाओं को झेलकर ।

उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) में रहने के बावजूद मेरे और आसपास के गांवों के लोगों में इक्कादुक्का ही उस समय (देश की स्वतंत्रता के पहले तथा बाद के दिनों) ऐसे रहे होंगे, जिन्होंने बदरीनाथ-केदारनाथ की तीर्थयात्रा करने का साहस जुटाया होगा । मैं इतना जानता हूं कि मेरे ताऊजी ऐसे बिरले लोगों में से एक थे । तब इस यात्रा को दुर्गम माना जाता था । यात्रा के लिए हफ्ता नहीं महीना लगता था । पुण्यार्जन के प्रति उत्सुक व्यक्ति बाल-बच्चों को साथ नहीं ले जाता था, बल्कि 45-50 की आयु पा लेने और गृहस्थ जीवन के दायित्वों से कुछ हद तक मुक्त होने के बाद ही तीर्थयात्रा की सोचता था । उत्साही व्यक्ति यह मानकर चलता था कि मार्ग में उसकी सहायता कर सकने वाला शायद ही कोई मिले, बावजूद इस तथ्य के कि स्थानीय लोगों के बीच बटोहियों के आतिथ्य की परंपरा रही । लूटपाट-धोखाधड़ी की बातें अपवाद थीं; लोग धर्मभीरु होते थे । व्यक्ति इस भावना के साथ यात्रा पर निकलता था कि न लौट पाने को परिवार के सदस्य उसकी जीवन-मुक्ति के तौर पर देखेंगे ।

धार्मिक प्रवृत्ति के वही मेरे ताऊजी उससे पहले कैलास-मानसरोवर की यात्रा भी कर चुके थे; कब यह मुझे ठीक-से नहीं मालूम, शायद सन् 1949-50  की बात रही होगी, जब मैं एक-दो साल का रहा हूंगा । उन दिनों तिब्बत पर आधुनिक चीन का आधिपत्य नहीं था । उसकी सीमाएं हम लोगों के लिए खुली थीं; पासपोर्ट-वीजा जैसे दस्तावेजों को कोई जानता न था; तिब्बत के लामाओं का व्यवसाय स्थानीय लोगों के साथ चलता था । उस यात्रा पर ताऊजी धोती-स्वेटर-कोट पहने, खाने-पीने का कुछ सामान दो-एक कंबल के साथ लादे, और पांव में उन दिनों प्रचलित भूरे रंग के कैनवास के जूते पहने निकले थे, जैसा मैंने सुना है । आसपास का कोई परिचित व्यक्ति साथ था भी कि नहीं यह मुझे नहीं मालूम । न लौट पाना कदाचित् अपनी नियति हो सकती है इस भावना से वे चल दिए थे । पता नहीं कितने दिन उन्हें लगे होंगे; महीना भर तो लगा ही होगा । वह भी एक समय था जब कष्ट सहकर पुण्य कमाने की प्रबल इच्छा के साथ तीर्थयात्रा पर निकलते थे लोग ।

लेकिन अब ? तीर्थयात्रा की तत्कालीन अवधारणा आज विलुप्त हो चुकी है । आज तो सुविधाप्रद साधनों से तीर्थस्थलों तक पहुंचा जाता है । खानेपीने एवं ठहरने के पूरे इंतिजाम देखने को मिलते हैं । लोग तो सपरिवार निजी वाहन से मंदिरों के प्रवेशद्वार तक पहुंच जाते हैं । तीर्थयात्राओं के नाम पर पर्यटन उद्योग आगे बढ़ रहा है । परिणाम ? मंदिरों के इर्दगिर्द की जमीन होटल-धर्मशाला-सड़कों आदि से पट चुके हैं । दुर्गम स्थल के मंदिर-देवालय दुर्गम नहीं रहे । जहां पहुंचने की हिम्मत पहले इक्कादुक्का लोग जुटा पाते थे, वहां अब भीड़ पहुंच रही है । बरसात में उफनाती जिन नदियों को बहा ले जाने के लिए कभी केवल मिट्टी और पत्थर भर मिलते थे उनके सामने अब यात्रिकों की भीड़ और नदी के एकदम किनारे के मकान मिलते हैं । पर्वतीय क्षेत्रों में मकान एकदम नदी किनारे नहीं होते थे । जो होते भी थे उनसे नदी के बहाव में रुकावट नहीं होती थी । इतना अधिक अतिक्रमण भी तो नहीं था ! हिमालय की कमजोर पहाड़ियों पर बने राजमार्गों ने बचीखुची कसर दूर कर दी ।

जब तीर्थस्थल पिकनिक स्पाट बन चुके हों तो बेचारी नदियां करें भी क्या ? – योगेन्द्र जोशी

सोमेश्वर (उत्तराखंड) के निकट कोशी नदी किनारे पहाड़ी ढलान पर एक गांव। दोनों ओर झाड़ियों और उसके बाद खेतों के बीच नदी स्पष्ट नहीं दिख रही।

सोमेश्वर (उत्तराखंड) के निकट कोशी नदी किनारे पहाड़ी ढलान पर एक गांव। दोनों ओर झाड़ियों और उसके बाद खेतों के बीच नदी स्पष्ट नहीं दिख रही।