अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

गण्तंत्र दिवस 2017 – खोया अधिक और पाया कम

आज 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद शासकीय व्यवस्था के लिए स्वीकृत संविधान के प्रभावी होने के प्रथम दिन (सन् 2050) की स्मृति में मनाये जाने वाला राष्ट्रीय उत्सव।

इस अवसर पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी हृदय से शुभेच्छाएं।

विगत वर्ष की एक स्मराणीय बड़ी शासकीय घटना “विमुद्रीकरण अर्थात् नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों से अब कुछ हद तक देशवासी उबर चुके होंगे, और बचीखुची अड़चनों से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे यह मेरी आशा और अपेक्षा है।

देशवासी आज के दिन हर्षित होंगे ही। अपने लोकतंत्र की सफलता को लेकर काफी हद तक संतुष्ट एवं भावी काल के लिए आशान्वित होंगे ही। मैं स्वयं को एक अपवाद के रूप में देखता हूं। कदाचित कुछ गिनेचुने अन्य जन भी मेरी तरह सोचते होंगे। मैं इस दिन, और इसी प्रकार स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), पर खुद को संतुष्ट नहीं पाता।

क्या हमारे गणतंत्र की खामियां – जो भी रही हों – समय के साथ दूर हुयी हैं? क्या हमारी राजनीति दिन-ब-दिन सुधार की दिशा में अग्रसर हुई है? क्या जिन उद्येश्यों के साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई थी वे पूरे हुए हैं? या उनके पूरे होने की ओर हम संतोषप्रद तरीके से बढ़ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्न जब मेरे मन में उठते हैं तो मैं स्वयं को संतुष्ट नहीं देख पाता। मेरी सोच और दृष्टि में दोष है, अथवा वस्तुस्थिति ही जैसी होनी चाहिए उसके निकट नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अन्य जन ही मुझे दे सकते हैं।

इसके पहले कि मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूं मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कुछ लोगों की नजर में गणतंत्र (अंग्रेजी में रिपब्लिक) जनतंत्र/लोकतंत्र (डेमोक्रसी) का ही पर्याय है। हमारे गणतंत्र में देश के राज्य गणतांत्रिक इकाइयां हैं, जिनमें से प्रत्येक स्वयं में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाये है। मुझे शंका है कि संघशासित प्रदेश (यूनियन-गवर्न्ड टेरिटरी) एक इकाई वाली इस परिभाषा में आते हैं कि नहीं। वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं अतः “गण” की परिभाषा उन पर लागू नहीं होती है। अतः मेरे मत में देश को किंचित् परिवर्तित गणतंत्र कहना अधिक उचित होगा। अस्तु, इस बात को विशेष महत्त्व देने की जरूरत नहीं।

मेरा अनुभव मुख्यतः उत्तर प्रदेश और उस पर विशेषतया मेरे शहर वाराणसी पर आधारित हैं। हो सकता है अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर हो, लेकिन कुल मिलाकर हम शासकीय व्यवस्था के गिरावट के दौर से गुजर्र रहे हैं ऐसा मेरा मानना है।

वापस अपने उपर्युक्त शंकाओं/प्रश्नों पर। जीवन के सातवें (यानी साठ का दशक) पूरा करने के निकट पहुंचे वरिष्ठ नागरिक के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि मैंने राजनीति एवं लोकतंत्र की पर्याप्त समझ अर्जित की है। क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है में भेद कर सकने में मैं काफी हद तक सक्षम हूं। मुझे नेहरू-काल के अंतिम दिनों की याद है। याद है उस समय के चीनी आक्रमण की। याद है उस काल के पीएल480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आयातित जीरा सदृश लाल गेहूं की। याद है जब कांग्रेस ही एक प्रकार से देश में एकछत्र राज कर रही थी और “नेहरू के बाद कौन संभालेगा देश को” जैसी कुछ लोगों की चिंताओं की। याद है जब अन्य राजनैतिक दल अस्तित्व में आ रहे थे। किशोरावस्था से वयस्कता के सोपन पर चढ़ते हुए एक नागरिक के तौर पर शासकीय व्यवस्था की मेरी समझ तब नितांत अपरिपक्व रही होगी यह मैं स्वीकारता हूं। कालान्तर में नौकरी-पेशे (विश्वविद्यालय अध्यापन) में आने पर और प्रशासनिक/नागरिक व्यवस्था के संपर्क में आते-आते तथा मतदान का अधिकार पाते-पाते विषय की मेरी समझ में शनैः-शनैः परिपक्वता आते गयी । हाल के डेढ़-दो दशकों में तो विषय को समझने में रुचि विशेषतः बढ़ गयी। मेरे विचारों से अन्य जन सहमत हों मैं इस मुगालते में कभी नहीं रहता। मेरी शंकाएं:

(1) हमारे संविधान की प्रस्तावना में साफ उल्लिखित है कि हम देशवासी इस राष्ट्र को “पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के रूप में स्वीकारते हैं। पंथनिरपेक्ष शब्द श्रीमती गांधी ने संधोधन के तौर पर शामिल किया था। देश का स्वरूप बदला नहीं। देश को संविधान-निर्माताओं ने आरंभ में ही “सेक्युलर” क्यों नही कहा? यह बात विचारणीय है। खैर, मेरी आपत्ति है “समाजवादी” पर है। क्या देश को बाद के राजनेता समाजवाद की ओर ले गये? आज अमीर और गरीब की खाई तब से बहुत बढ़ गयी। क्या एक समाजवादी देश में यह होना चाहिए था?

(2) संविधान जातिमुकत होने की लालसा व्यक्त करता है। शुरुआती दौर में जाति और धर्म वोट के आधार पर नहीं होते थे। समय के साथ राजनीति में आयी नई पीढ़ी के नेताओं ने इन भावनाओं को भुनाकर वोटबैंक बना डाले। यही अपेक्षा की गयी थी क्या?

(3) पुराने जीवित बचे लोग बताते थे कि वोट पाने के लिए आज की तरह बेतहासा धन खर्च नहीं होता था। सुनते है कि अब सांसद/विधायक बनने के लिए करोड़ों दांव पर लगाये जाते हैं। यह भी कहा जाता कि पार्टियों के टिकट के लिए करोड़ों की बोली लगती है। यह हमारे नेताओं के सच्चरित्र होने का द्योतक है क्या?

(4) पिछले तीन-चार दशकों में धनबलियों, बाहुबलियों और आपराधिक छबि वालों की राजनीति में तादाद बढ़ती गयी है। सांसंदों/विधायकों में उनकी दागदार छवि वालों की संख्या 30% के आसपास बतायी जाती है। क्या ऐसा शुरुआती दौर में था?

(5) वर्तमान समय में राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों का एक ही सिद्धन्त रह गया है कि कोई सिद्धांत नहीं। विशुद्ध मौकापरस्ती। जहां लाभ उधर चलो की नीति। इसलिए दलबदलुओं की भरमार है सभी दलों में। जिसे जिताऊ समझते हैं उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। जो कल तक सेक्युलर था वह आज सांप्रदायिक बन जाता है, दक्षिणपंथी समाजवादी बन जाता है। सिद्धांतहीनता व्यक्तियों में ही नहीं दलों में होती है जो सिद्धांतहीनों का बढ़चढ़कर स्वागत करते हैं, बेशर्मी से अपने कदम सही ठहराते हुए।

(6) आज की राजनीति में परिवारवाद चरम पर है। और बड़ा बेहूदा तर्क (कुतर्क?) पेश किया जाता है। कहते है डाक्टर का बेटा-बेटी डाक्टर, वकील का बेटा-बेटी वकील, उद्यमी (बिज़नेसमैन) का बेटा-बेटी उद्यमी तो राजनेता का बेटा क्यों नहीं राजनेता हो सकता है? वाह ! मेरा सवाल है कि क्या राजनीति भी डाक्टरी, वकालत, उद्यमिता इत्यादि की तरह का ही धंधा है? जीवन-यापन और धन कमाने का व्यवसाय है क्या राजनीति? जिन व्यवसायों से तुलना की जाती हैं उसमें समाजसेवा या सामाजिक व्यवस्था को सुचारु और कुशल बनाने का ध्येय नहीं होता है। उन व्यवसाय में लगे हाथ कोई समाजसेवा करता है तो यह उसकी रुचि होती है न कि व्यवसाय के स्थापित एवं स्वीकृत उद्येश्य का कार्य। हर व्यवसाय में पहले अनुभव और योग्यता हासिल किये जाते हैं। इस पर भी गौर करें कि स्वाधीनता के बाद के भारत में जो नये नेता आये वे बाप-दादाओं की विरासत पर नहीं आये बल्कि अपने बल पर आये, लेकिन उन्होंने ही अपनी अगली पीढ़ी को विरासत के नाम पर आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता संघर्ष वाले कितने नेताओं की बहू-बेटियां राजनीति में हैं? तो आज के नेताओं के कितने हैं? सोचिये!

(7) आज वोट की राजनीति नकारात्मक है न कि सकारात्मक। दूसरे दलों में कमियां खोज-खोजकर वोट बटोरे जाते हैं। कोई यह नहीं कहता है कि देश/प्रदेश के दीर्घकालिक हितों के लिए उसकी क्या योजनाएं हैं। जनसंख्या, चिकित्सकीय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक गुणवत्ता की बातें करता है कोई? तो क्या ऐसी वोट की राजनीति ही वंछित लोकतंत्र है?

(8) लोकलुभावन वादों के साथ आज के नेता मैदान में उतरते हैं। कोई स्मार्ट्फोन बांटने की बात करता  है, तो कोई मुफ्त अनाज देने की, कोई मुफ़्त बिजली-पानी देने की बात करता है? इत्यादि। खजाना देश का लुटे और वोट तथा सत्तासुख हम भोगें इस नीति पर राजनैतिक चल रहे हैं। देश का भला ऐसे ही होगा क्या?

इस प्रकार के तमाम सवाल उठते हैं मन में। अब आप ही बतायें कि राजनीति की किस बात पर संतोष अनुभव किया जाये? – योगेन्द्र जोशी

स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर इसी ब्लॉग के लिए लि्खा था। किंतु इसे मैं अपने दूसरे चिट्ठे (http://jindageebasyaheehai.wordpress.com) पर पोस्ट कर बैठा। यह गलती कैसे हुई, मेरा ध्यान कहां था,  मैं कह नहीं सकता। आज नजर आने पर इसे वहां से यहां स्थानांतरित कर रहा हूं। पाठकों से क्षमायाचना।

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“मेरा मन हो स्वदेशी, मेरा तन हो स्वदेशी। मर जाऊं तो भी मेरा होवे कफ़न स्वदेशी।”

– पं राम प्रसाद बिस्मिल

“मेरी जीवनशैली हो विदेशी, मेरी भाषा हो विदेशी। या खुदा मौका मिले जो मुझे खुद बन जाऊं विदेशी।”

ऐसा सोचने वाले भी मिल जायेंगे देश में; कौन और कितने, अंदाजा लगाइये।

अपना देश भारत या इंडिया जो आप ठीक समझें 70वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। मुझसे यह अपेक्षा की जायेगी कि मैं देशवासियों को प्रणाम करूं, बधाई दूं, और भविष्य की मंगलकामना प्रेषित करूं। शुभकामना !

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15 अगस्त

आज देश को स्वाधीन हुए 69 वर्ष हो रहे हैं। इस दिन सर्वत्र जश्न मनाया जा रहा है। शीर्षस्थ पदों पर विराजमान राजनेता, उच्च प्रशासनिक अधिकारी, अपनी-अपनी संस्थाओं में ध्वजोत्तोलन करने, देश की उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान करने, और उपदेश देने के कार्य में लगे हैं।

क्या कोई उपलब्धियों का निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ आकलन करने को तैयार है? क्या उसके बारे में सुनने को भी तैयार है? या हकीकत जानने के बाद भी उसकी अनदेखी करके खुश होना चाहता है?

मेरी दृष्टि में हमने इस काल में बहुत कुछ खोया है। और पाया है वह इतना कम है कि उसे खोये हुए की भरपाई मानना उचित नहीं होगा। मेरे लेख से विचलित होकर कुछ लोग मुझे बुरा-भला भी कहेंगे। लेकिन यह कोई स्पष्ट नहीं करेगा कि मैं गलत कहां पर हूं।

चलिए मैं अपनी बात कहता हूं। यही स्वतंत्रता तो मुझे मिली है कि मैं अपने खयालात पेश करूं। जिसे नापसंद हो बह कान बंद कर लेगा। इस स्वतंत्र देश में लोग एक दूसरे के साथ गाली-गलौज कर सकते हैं। मैं तो यथासंभव शिष्ट भाषा में अपने बातें कहने की सोच रहा हूं।

उपलब्धियां

क्या हैं उपलब्धियां? हमारे राजनेता सीना तानकर कहने लगेंगे कि हमने नाभिकीय विस्फोट करके अपने को “न्यूक्लियर-पावर-संपन्न” देशों में शामिल किया है। अपनी मिसाइलें बनाकर दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया है। चंद्रमा में चन्द्रयान भेजकर अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है। मंगलयान की बात हमारे अंतरिक्ष अध्ययन/अभियान की योजना का अंग है। इस्रो (ISRO) जैसी हमारी संस्था उत्कृष्ट कार्य करके विश्व के कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ रही है। ओएनजीसी (ONGC) खनिज तेल की खोज अपने दम पर देश एवं विदेश में कर रही है। सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

अन्न उत्पादन के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बन चुके हैं। स्वातंत्र्य पूर्व हमारी स्थिति दयनीय थी। उस समय एवं उसके बाद भी कुछ समय तक अमेरिकी घटिया गेहूं (पीएल 480 योजना के तहत) पर हम निर्भर थे। आज देश में भोजन की कमी नहीं है।

शासकीय-प्रशासकीय तंत्र में अंकीय तकनीकी (digital technology) का प्रयोग बढ़ रहा है। बहुत से स्थलों पर कंप्यूटरीकृत वातावरण में कार्य हो रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकी के साथ रोग-निदान एवं रोगोपचार किया जा रहा है। यह देश के लिए क्या गर्व की बात नहीं है कि विदेशी भी चिकित्सा के लिए यहां आ रहे हैं? अवश्य है, लेकिन …

आज़ाद भारत (इंडिया?) में लोगों की संपन्नता बढ़ी है। लोगों के लिए अब सुख-सुविधा के साधन प्राप्त करना संभव हो गया है। सड़कों पर अनेक जन कारें दौड़ा रहे हैं यह क्या कभी सोचा भी जाता था? सड़कें फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन की बन रही हैं और फ़्लाइ-ओवरों का जाल बिछ रहा है। घर-घर में टीवी, फ़्रिज, धुलाई मशीन पहुंच रहे हैं। हर हाथ में अब स्मार्टफोन पहुंच रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं।

लेकिन सवाल है इन उपलब्धियों का लाभ किसको पूरा-पूरा या अधिकांशतः मिल रहा है? इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए।

उपर्युक्त और तत्सदृश जिन अन्य उपलब्धियों को राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी एवं बुद्धिजीवी गिना सकते हैं उनमें से अधिकतर स्वाभाविक रूप से होने ही थे। उनको होने देना एक प्रकार की विवशता ही थी। जब दुनिया भर में कंप्यूटरों एवं डिजिटल तकनीकी का प्रयोग होने लगा तो हम उससे कैसे अछूते रह सकते थे? जब उस तकनीक के माध्यम से विश्व में संपर्क-साधन हो रहा हो और उसके बिना व्यावसायिक कार्यकलाप असंभव-से होते जा रहे हों तो उसका हमारी भी आवश्यकता बनना स्वाभाविक ही था। समाज के सबसे आम आदमी का भला होगा इस विचार से इनको अपनाया गया होगा यह मैं नहीं मानता। हो सकता है गरीब व्यक्ति तक लाभ पहुंच रहा हो। तब उसे मैं “बिल्ली के भाग से छींका टूटने” के समान मानता हूं।

मैं दावा नहीं करता कि पूरे देश की स्थिति का मुझे पूर्ण ज्ञान है। मेरा अनुभव अधिकांशतः उत्तर प्रदेश और उसके भीतर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है जहां मैं रहता हूं। देश के अन्य शहरों से भी मैं कुछ हद तक वाकिफ़ हूं, क्योंकि मैं यदा-कदा देशाटन पर निकल पड़ता हूं। आजकल तो समाचार माध्यम तमाम तरह की जानकारी आम जन तक पहुंचा रहे हैं। इसलिए ध्यान देने वाले के लिए बहुत कुछ जानना आसान है।

इन उपलब्धियां का सीधा लाभ समाज के संपन्न वर्ग को हुआ है और उन्हीं के लिए बहुत कुछ हुआ है ऐसा मेरा मानना है। कार संस्कृति उन्हीं के लिए तो है। उन्हीं के लिए कार-उद्योग हैं। और जब कारें सड़क पर दौड़ें तो फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन सड़कें और फ़्लाई-ओवर बनने ही हैं। वे आम जनों की समस्या सुलझाने के लिए नहीं बनी हैं। यदि आम जन का हित हमारे देश के शासकों, नीतिनिर्धारकों के जेहन में होता तो सड़क के किनारे फ़ुटपाथ बन रहे होते, और सड़क पर पैदल चलने वालों का अधिकार पहले होता, उसके बाद वाहनों का जैसा कि विकसित देशों में होता है। वाराणसी में जितनी सड़कें पिछले तीनएक दशकों में बनी हैं उनके किनारे फ़ुटपाथ हैं ही नहीं।

चंद्रयान, मंगल-अभियान जैसी योजनाओं का आम जन के लिए कोई महत्व नहीं। एक वैज्ञानिक होने के बावजूद मैं इनको प्राथमिकता में निम्न स्तर पर रखना चाहूंगा। इनसे कहीं अधिक महत्व की समस्याएं देश के सामने हैं। इसलिए आम जन के सापेक्ष इनको उपलब्धि मानता अनुचित होगा।

अवश्य ही अनाज उत्पादन में हुई प्रगति प्रशंसनीय कही जायेगी। अन्यथा दुनिया भर में हो रहे व्यावसायिक परिवर्तन हमारे देश में होने ही थे। परिवर्तन न करते तो क्या करते? कैसे विश्व के सामने टिकते? वैश्विक परिवर्तन का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ना स्वाभाविक था।

मेरी निराशा

मेरी निराशा के मूल में उक्त उपलब्धियों की अर्थवत्ता कम या अधिक होना नहीं है। मैं स्वतंत्रता का आकलन उन बिन्दुओं के सापेक्ष करना चाहूंगा जिनको ध्यान में रखते हुए शासकीय व्यवस्था को उत्तरोत्तर बेहतर बनाने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता अर्जित की गयी थी। तब न डिजिटल टेक्नॉलॉजी थी, न उसको लेकर देश का कोई संकल्प। जिस उम्मीद को लेकर चले थे वह थी उत्तरोत्तर बेहतर शासकीय व्यवस्था की स्थापना। क्या हमारी व्यवस्था में सुधार हुआ है? कुल मिलाकर इस प्रश्न का क्या जवाब होगा?

जवाब आप स्वयं समझ लीजिए। मैं वस्तुनिष्ठ कुछ तथ्यों को आपके समक्ष रख रहा हूं।

जनसंख्या वृद्धि

     मेरी दृष्टि में देश की विकटतम समस्या निरंतर हो रही जनसंख्या वृद्धि है। उम्रदराज देशवासियों को याद होगा 1960 के दशक का समय जब उत्साह एवं गंभीरता से जनसंख्या पर अंकुश लगाने और परिवार-नियोजन के प्रयास किये गये थे। उसके परिणाम कितने अच्छे रहे होते यदि वे प्रयास यथावत चलते रहते? दुर्भाग्य था 1970 के दशक के पूर्वार्ध में संजय गांधी का असंवैधानिक शक्ति के रूप में अवतरित होना। उस व्यक्ति ने ऐसा सख्त रवैया अपनाया कि कार्यक्रम पटरी से उतर गया और राजनैतिक भूचाल आया आपात्काल के रूप में। जनसंख्या के मुद्दे से राजनेताओं/नौकरशाही ने मुख मोड़ लिया। तब से आज तक जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है, किंतु प्रयास बेमन से हो रहे हैं। आज तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों ने अवश्य प्रगति की है, लेकिन पहले से ही बहुत बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश, बिहार की आबादी पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है।

हमारे शासक यह भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन इतने नहीं कि बढ़ती आबादी को झेल सकें। हम मौजूदा नागरिकों को ही शिक्षित नहीं कर पा रहे, उनके स्वास्थ्य के लिए न पर्याप्त अस्पताल हैं और न डॉक्टर, कुपोषण अपनी जगह है, युवाओं के लिए रोजगार नहीं, रेल-बस सुविधा अपर्याप्त हैं, सबके लिए बिजली-पानी मुहैया नहीं करा सकते, इत्यादि। फिर भी जनसंख्या वृद्धि के प्रति लापरवाह हैं। यही हाल रहा तो अगले 10-15 सालों में हम चीन से आगे निकल जायेंगे। यही हमारी उपलब्धि होगी क्या?

इस विषय पर यह विचारणीय है कि जो संपन्न दंपती हैं उनके एक या अधिक से अधिक दो बच्चे हो रहे हैं। कुछ ने तो कोई बच्चा नहीं की नीति अपना ली है। लेकिन जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं, उनके 4-4, 6-6 बच्चे हो रहे। गरीबी और बढ़ती आबादी में गहरा संबंध है। आगे आप खुद सोचिए क्या होगा।

अनुशासनहीनता

      यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश देशवासियों के लिए स्वतंत्रता के माने हैं अनुशासनहीनता, स्वच्छंदता, उच्छृंखलता, निरंकुशता, आदि। कायदे-कानूनों को न मानना देशवासियों का शगल बन चुका है। वाराणसी में रहते मैं यही कहूंगा। अहिष्णुता इसी निरंकुशता की देन है। अंध-आस्था इसमें घी का कार्य करती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अर्थ लिए जाते हैं: “मेरी आस्था पहले, दूसरों का हित बाद में। आस्था के प्रदर्शन में कोई रुकावट न डाले चाहे उसकी जान चली जाये।” यह भावना यहां व्याप्त है। राजनीति अंकुश लगाने के बदले ऐसी आस्था को बढ़ावा देती है। संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों मे कहा गया है सरकारें अंधविश्वास समाप्त करने और लोगों में वैज्ञानिक सोच बढ़ाने के प्रयास करेंगी। हुए हैं ऐसे प्रयास?

कायदे-कानूनों का क्या महत्व है यह तो इसी से स्पष्ट है सड़क पर किसी वहन से दुर्घटना हो जाये तो उसे ही नहीं, गुजरने वाले हर वाहन को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसमें एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी भीड़ की भागीदारी होती है। कोई नहीं कहता कि यह क्या अनर्थ कर रहे हो। किसी पर चोरी का शक हो जाये तो उसे पीट-पीट्कर मारने पर किसी को आतमग्लानि नहीं होती है। ऐसी अनेकों वारदातें प्रकाश में आती हैं। आज तक प्रभावी शासकीय व्यवस्था विकसित नहीं हुई।

इसे भी क्या उपलब्धि कहेंगे?

शिक्षा

मेरी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 5 तक, 1950-60 के बीच के काल में) अपने गांव (अब उत्तराखंड में) के पास की सरकारी पाठशाला में हुई थी। तीन शिक्षक थे और पाठशाला का पक्का भवन। बहुत सुविधाएं नहीं थीं, फ़िर भी उसी में मैंने और मेरे सहछात्रों ने बहुत कुछ सीखा। कृषि की बातें, मिट्टी के खिलौने बनाना, सुलेख लिखना। आज भी उस समय की पुस्तकों के कुछ चित्र स्मृति पटल पर आ जाते हैं। उस काल में मेरी ही तरह अनेक लोगों ने गांवों में शिक्षा पाई और मेरी तरह विश्वविद्यालय के शिक्षक बने। आज क्या स्थिति है सरकारी स्कूलों की? कहीं, भवन नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं तो स्कूल से नदारद। छात्रों की स्थिति यह हो चुकी है कि पांचवीं पास करने के बाद भी पढ़-लिख नहीं सकते।

आज कोई भी सरकारी स्कूल में बच्चों को नहीं भेजना चाहता। निजी विद्यालयों – तथाकथित अंगरेजी माध्यम स्कूलों – की बाढ़ आ चुकी है। जो गरीब उनकी फ़ीस नहीं चुका सकता वही सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजता है।

जिस समय मैंने हाईस्कूल की परीक्षा दी (1962), मुझे एक दिन सुनने को मिला कि फलां परीक्षा केंद्र पर एक परीक्षार्थी नकल करते पकड़ा गया है। वह भी एक जमाना था नकल की एक भी घटना समाचार बनती थी। नकल करने से सभी डरते थे। आज क्या हाल हैं उत्तर प्रदेश, बिहार में? सामूहिक नकल का बोलबाला है। छात्र ही नहीं उनके अभिभावक, शिक्षक, पुलिस बल सब नकल करवाते देखे-सुने जाते हैं। सरकारें हैं कि नकल-माफ़ियाओं के सामने घुटने टेक देती हैं। जहां छात्र/छात्रा को विषय का ज्ञान तक न होने पर टॉपर बनाया जा सकता है (बिहार राज्य में), उस देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी?

हमारी सरकारों ने इंडिया और भारत के विभाजन को और पुष्ट किया है। एक तरफ संपन्न लोगों की अंगरेजी-आधारित शिक्षा है तो दूसरी समाज के कमजोर तबके के लिए क्षेत्रीय भाषा की कुव्यवस्थित शिक्षा। किसी को शर्म आती है? हमारी शिक्षा ऐसे ही चलनी चाहिए? यही उपलब्धि है हमारी? सोचें!

जिस अंगरेजी से मुक्त होने की स्वतंत्रता सेनानियों ने सोचा था आज वही अंगरेजी अपरिहार्य बन चुकी है, जीवन का आधार बन चुकी है। विडंबना नहीं है?

चिकित्सा व्यवस्था

देश में डॉक्टरों की कमी है। सरकारी खर्चे पर छात्र डॉक्टर बनते हैं, फिर  विदेशों की राह पकड़ने की कोशिश करते हैं, अन्यथा निजी अस्पतालों के चिकित्सक बनते हैं। सरकारी नौकरी में कम जाते हैं और जो जाते हैं प्राइवेट प्रैक्टिस से धन कमाने में जुट जाते हैं। बहुत कम (शायद ही कोई) होंगे जो ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हों। बहुत से तो महीनों सरकारी अस्पताल से गायब रहते हैं। कहने को सरकारी अस्पतालों में बहुत कुछ है, लेकिन हकीकत एकदम निराशाप्रद! हालात क्या होंगे यह इसी दृष्टांत से समझा जा सकता है कि अभी दो-चार दिन पहले एक गरीब का बच्चा इसलिए चल बसा कि वह परिवार 20 रुपये की घूस नर्स को नहीं दे पाया। कुछ समय पहले एक घटना के बारे में सुना जिसमें एक बच्चे के पैर के घाव का इलाज वार्डब्वॉय ने किया बाद में उस बच्चे का पैर काटना पड़ा। ऐसे मामलों में जांच समिति बैठा दी जाती है मामलों को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए। किसी कर्मचारी/डॉक्टर को दंडित किया जाता हो सुनने में नहीं आता है।

एक समय था जब सरकारी खर्चे पर सरकारी मुलाजिम का इलाज सरकारी अस्पताल में ही अनुमत था। तब सरकारी अस्पतालों की हालत कुछ बेहतर थी। जब से निजी अस्पतालों की सुविधा मुलाजिमों को मिलने लगी, स्थिति बदतर हो गयी।

डॉक्टरों ने धन कमाई का नायाब तरीका अपना लिया है। वे अनावश्यक जांच करवाते हैं और वह भी अपने “बंधे हुए” जांच-केंद्र पर। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था होने पर भी वहां भी यह होता है। जांच केंद्र से डॉक्टरों को रकम मिल जाती है। वाह क्या चरित्र है और हिपोक्रेटीज़ शपथ (Hippocratic oath) का सम्मान। स्थिति इतनी निराशाजनक पहले नहीं थी।

सड़क दुर्घटना एवं वाहन-चालन लाइसेंस

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कितनी भयावह है इसके आंकड़े अंतरजाल पर आसानी से मिल जायेंगे। यातायात के नियमों का पालन होता है कहीं? क्या पालन होगा जब नियम ही लोगों को मालूम नहीं हों। और मालूम भी हो तो उनके प्रति सम्मान किसके मन में है? नियमों का उल्लंघन अधिकांश लोग करते हैं। ट्वूह्वीलर वाहनों के लिए हेल्मेट का नियम है, कितने लोग उसे पहनते हैं? वाराणसी में तो अपवाद-स्वरूप ही पहनते हैं। पूछने पर न पहनने वाला कहता है “कोई देखता थोड़े है?” कारों में सीटबेल्ट का प्रावधान है, उसे भी चालक नहीं पहनते हैं, उत्तर वही। मतलब यह कि देखने वाला कोई न हो तो इनकी जरूरत नहीं।

यह हमारे लोगों का कायदे-कानूनों का सम्मान न करने की मानसिकता का द्योतक है।

आगे देखिए वाराणसी की सड़कों पर 12-14 वर्ष की आयु के बच्चे मोटर-वाहन चलाते दिख जायेंगे? उनके माता-पिता के लिए यह उपलब्धि होती है, वे इसमें अपनी प्रतिष्ठा देखते हैं, यह उनकी हैसियत का परिचायक होता है। नियमों को तोड़ना किसी की भी नजर में बुरा नहीं होता। ऐसी सोच के लिए जिम्मेदार कौन? कोई तो जिम्मेदार होगा?

हमारे यहां ड्राइविंग लाइसेंस आलू-प्याज की तरह खरीदे बेचे-खरीदे जाते हैं। अपने बनारस में तो मैंने ऐसा ही देखा। मेरा स्कूटर वाला लाइसेंस खत्म हो चुका है, अब जरूरत नहीं समझता। इसलिए आज की हालत क्या है मालूम नहीं। पर जब मैंने पहली बार लाइसेंस लिया तो न कोई लिखित और न कोई सड़क पर वाहन-चालन का परीक्षण। गये, लाइसेंस मांगा और मिल गया। कुछ पैसा मांगा मैंने दे दिया, गलत कहें या सही। तब मुझे लगा कि अंधा-लूला-बहरा, हर कोई लाइसेंस पा सकता है। दलाल को पैसा दीजिए साइसेंस आपके हाथ। मैं समझता हूं कि आज भी दलालों काम यथावत चल रहा होगा। क्या यही हमारी शासकीय व्यवस्था होनी चाहिए? फिर रोइये कि देश में सड़क हादसे बहुत होते हैं। अभी हाल में मेरे बेटे ने कनाडा में लाइसेंस लेना चाहा। वह प्रशिक्षण में एक-डेड़ लाख खर्च कर चुका था। वाहन चालन परीक्षण में असफल हो गया। गलती यह कि पार्किंग करने में सफेद रेखा को अगला पहिया छू गया। एक-दो ऐसी ही छोटी-मोटी गलतियां! बस इतना काफी था। यहां कोई सोच सकता है कि ऐसा भी कहीं होता है?

प्रशासनिक कुव्यवस्था

देश जब आज़ाद हुआ तो यह उम्मीद थी हम साफ-सुथरी एवं जनता के प्रति जवाबदेह शासकीय व्यवस्था विकसित करेंगे। किंतु ऐसा हुआ क्या? हमारी नौकरशाही जनता के सेवक रूप में खुद को नहीं देखती, बल्कि वह अपने को उनका मालिक समझती है। काम के प्रति लापरवाही, टालमटोल, घटिया काम और कदाचार को वह अपना अधिकार मानती है। आये दिन नये-नये घोटालों का खुलासा होता है, पर क्या मजाल कि किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता हो, दंडित किया जाता हो। अधिक से अधिक कुछ दिनों के लिए किसी को निलंबित करके शासन जनता की आंख में धूल झोंकता है। याद रहे निलंबन सजा नहीं होता है। यह तो जांच-पड़ताल की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। दंडित करने का काम तो न्यायालय करता है जहां मामला जाता ही नहीं और गया भी तो वर्षों तक कोई निर्णय नहीं होता है। उस बीच आरोपित कभी-कभी स्वर्ग (नरक?) भी सिधार जाता है।

सरकारी तंत्र में खूसखोरी आम बात है। मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कहते है कि अधिकारियों को देने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नही था इसलिए वह सरकारी नौकरी नहीं पा सका। नियुक्ति-पत्र तक तभी मिलता है जब आप पैसा खर्च करते हैं। सालों पहले में एक बार ट्रेजरी कार्यालय गया। वहां शरीर से कमजोर उम्रदराज पेंशनरों को बीस-बीस रुपये पेंशन-बुक में रखकर देते हुए देखा था। आज वह रेट 200-250 रुपये होगा। पिकेट-ड्यूटी पर लगे पुलिस-मैन को प्रतिबंधित गाड़ी आगे बढ़ने देने के लिए पैसे लेते हुए देखा है। लोग बताते हैं कि जब वे स्वयं 100-50 हजार की घूस देकर नौकरी पाये हैं तो उसकी भरपाई उन्हें ऐसी वसूली से ही करनी होती है।

कितना साफ-सुथरा शासन-तंत्र विकसित किया है आज के शासकों ने? पहले घूस लेना चोरी-छिपे होता है और अब खुलकर होता है। घूस के भी रेट बने हैं। मुझे कभी एक बुजुर्ग एंजीनियर ने बताया कि बेईमानी तो पहले भी होती थी पर इतनी नहीं। वे बताते थे कि किसी कार्य के खर्चे का आकलन (एस्टिमेट) बढ़ा-चढ़कर पेश किया जाता था जैसे 100 की जगह 120 रुपये। तब 100 का कार्य हो जाता था और 20 रुपया जेबों में जाता था। कार्य की गुणवत्ता बनी रहती थी। आजकल एस्टिमेट तो 120 रुपये का बनेगा और खर्चा केवल 50, शेष 70 जेबों में। कार्य की गुणवत्ता कैसी होगी सोच सकते हैं। यह वाराणसी की सड़कें देखकर समझ में आ जयेगा जो पहली बरसात को झेल जायें तो समझिए कि चमत्कार हो गया।

विदेश यात्रा को जीते-जी स्वर्ग यात्रा के समान देखने वाले हमारी प्रशासनिक अधिकारी मौके खोजते हैं कि किस बहाने विदेश जाया जाये। कभी वे वहां की कानून-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं तो कभी वहां के प्रशासन का अनुभव पाने, कभी खेल-आयोजन कैसे करते हैं इसे सीखने और कभी यातायत व्यवस्था की जानकारी लेने। कोई भी बहाना चलेगा, बस विदेश भ्रमण करने से मतलब। अब देखिए कल-परसों अपने प्रदेश के खेल मंत्री गये हैं ओलंपिक स्थल रियो द जनीरो कुश्ती खिलाड़ी नरसिंह यादव की हौसला आफ़जाई करने। विदेश भ्रमण का बहाना। सरकारी खर्चे पर इकनॉमी क्लास में तो वे जायेंगे नहीं, एक्जेक्टिव क्लास में जायेंगे। अपनी जेब से तो कुछ लगना नहीं। प्रदेश के खजाने की परवाह किसे? वाह!

इस प्रकार के अनेक उदाहरण आपको यत्रतत्र मिलेंगे। सब इसे जानते हैं, परंतु हर कोई आश्वस्त रहता है कि सुधार होना नहीं है।

यही उपलब्धि है न स्वतंत्र भारत की?

पुलिस तंत्र

स्वतंत्र भारत का शासकीय तंत्र सुधारने के प्रति आज के शासक कितने गंभीर हैं इसे समझना कठिन नहीं। वर्षों से प्रशासनिक सुधारों की बातें की जा रही है। लेकिन आज तक कुछ किया नहीं गया। पुलिस तंत्र में सुधार की बातें भी होती रही हैं, उसे भी टाला जा रहा है। उच्चतम न्यायालय इस बारे में बार-बार याद दिलाता आ रहा है, लेकिन शासक वर्ग को कोई रुचि नहीं। तो क्या देश के शासक अंगरेजों की भांति डंडे से जनता पर राज करना चाहते हैं? जी हां, वे सुधार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि जहां जनता से उन्हें असुविधा लगे उन पर डंडा बरसाकर चुप करा दो। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के कोई कारगर उपाय आज तक नहीं हुए। नित नये कानून बनाकर जनता को मूर्ख बनाते आ रहे हैं वे। कानूनों का कार्यान्वयन प्रभावी न हो इसका भी वह साथ में इंतजाम करते हैं। जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति वे टालते हैं, महीनों, वर्षों तक। त्वरित निर्णय का तो सवाल ही नहीं।

लचर न्यायिक व्यवस्था यथावत बनाये रखना भी शासकों का इरादा रहा है। दो रोज पूर्व ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि पिछले छः माह से न्यायालयों की नियुक्ति क्यों टाली जा रही है। सुधारों को टालना सरकारों की नीयत रही है।

राजनेतओं की साख

क्षमा करें यदि मैं यह कहूं आज के किसी राजनेता के प्रति मेरे मन में सम्मान नहीं है। यह सोचने की स्वतंत्रता मुझे है। मैं किसी को अपशब्द नहीं कहूंगा, मिलने पर सामान्य शिष्टाचार भी निभाऊंगा। लेकिन मेरे मन में उनके प्रति सम्मान हो इसकी बाध्यता कहीं नहीं है।

स्वतंत्रता के आरंभिक काल के राजनेताओं की तुलना में आज के राजनेताओं को किस स्तर पर रखेंगे आप? आकलन करते समय क्या आप सोचेंगे कि वे कितने अनुशासित हैं, देशहित के प्रति समर्पित हैं, सत्तालोलुपता कितनी है, आपराधिक वृत्ति के नेताओं के प्रति उनका क्या रवैया है, इत्यादि। मेरे अपने उत्तर हैं “निराश करने वाले”।

स्वार्थलिप्सा और सत्तालोलुपता हमारे राजनेताओं के चरित्र का अपरिहार्य अंग बन चुका है। सत्ता हथियाने के लिए सभी हथकंडे सभी दलों के नेता अपनाते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी करके सभी जातीयता, धार्मिकता, क्षेत्रियता की भावना उभाड़कर वोटबैंक बनाने में जुटे हुए हैं। है कोई राजनैतिक दल जो आपराधिक छबि वाले से परहेज करता हो,जो बाहुबल एवं धनबल का सहारा न लेता हो, जो तरह-तरह से मतदाताओं को न लुभाता हो (जैसे शराब पिलाना, पैसे की घूस देना)। जिन्हें आप साफ-सुथरे कहेंगे वे कैसे इस अनर्थ को सहते हैं।

राजनीति में सिद्धांतहीनता व्याप्त है। सुबह तक जो कम्युनल हो वह शाम तक सेक्युलर हो जाता है। कल तक जो समाजवादी हो वह आज दक्षिणपंथी बन जाता है। सिद्धांत बस एक है: जहां बेहतर अवसर दिखें वहां चल पड़ो। आप ऐसे सिद्धांतहीनों से क्या उम्मीद रखते हैं?

आज़ादी के 69 वर्ष बीतते-बीतते हमारे अधिकतर राजनैतिक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा परिवार की निजी व्यावसायिक संस्था बन चुके हैं। एक बेहद घटिया परंपरा इस क्षेत्र में स्थापित हो चुकी है। मुलायम सिंह, लालू यादव, मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि आदि सब उदाहरण हैं। अपने समय में ये लोग बाप-दादों के बल पर नेता नहीं बने थे, पर अब अपने परिवारी जनों को को राजनेता बनाने की परंपरा स्थापित कर रहे हैं, पूरी बेशर्मी के साथ। कार्यकर्ताओं की हैसियत बंधुआ मजदूर की बन चुकी है। कभी कांग्रेस इस श्रेणी में नहीं थी लेकिन अब वह सोनिया-राहुल-प्रियंका की निजी संपदा बन गयी है। क्या मजाल कि दल के मुखिया से कोई असहमत हो। जो असहमत हो वह दल से निकाला जायेगा या निकल जायेगा। दलों में न आंतरिक लोकतंत्र है और न वैकल्पिक नेतृत्व पनपने देने की परंपरा। इसमें आपको विरोधाभास नहीं दिखता कि आंतरिक लोकतंत्र के विरोधी देश का लोकतंत्र चला रहे हैं?

राजनीति में उत्तरोत्तर सुधार के बदले गिरावट आ रही है यह मेरी धारणा है।

वर्ष 1950 के आगे-पीछे चीन को भारत की तुलना में पिछड़ा एवं गरीब माना जाता था। आज वह हमसे मीलों आगे निकल चुका है, हर क्षेत्र में। उसकी “प्रति व्यक्ति (औसत) आय” (per capita income) हमारी (लगभग $1600) तुलना में करीब पांच गुना अधिक है| स्वतंत्रता के समय एक रुपया एक डॉलर के लगभग था। आज वह घटते-घटते $0.015 के बराबर हो चुका है। इस प्रकार की घटनाएं क्यों हुईं? हमारी शासकीय व्यवस्था में कहीं खोट रहा होगा न?

अंततः

     मैं उन देशवासियों को बधाई देता हूं जिनको विगत उपलब्धियां संतोशप्रद, आशाजनक लगती हैं। मुझे उनसे ईर्ष्या है कि काश मुझे भी ऐसा ही लगा होता।

लेख अपेक्षा से अधिक लंबा हो चला है। कहने को बहुत कुछ है, किंतु कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही चाहिए। अतः पटाक्षेप।

आप पाठकों को पुन: बधाई, शुभेच्छाएं। शान्तिः सर्वत्र प्रसरेत् । – योगेन्द्र जोशी

देश का संविधान-सम्मत नाम “इंडिया”; तब “भारत” नाम की जरूरत  क्यों आ पड़ी?

लंबे अंतराल से  मैं एक प्रश्न का उत्तर पाने की इच्छा रखते आया हूं। अभी तक मेरी दृष्टि में जानकारी का ऐसा स्रोत नहीं आया जो मेरी समस्या का संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत कर सके। समस्या है कि इस देश के दो नाम क्यों हैं? क्या दो नामों की कोई उपयोगिता है, विशेषतः जब प्रायः सर्वत्र एक ही नाम सुनने-पढ़ने में आ रहा हो। 

देश का संविधान अंगरेजी में लिखा गया है और उसी को उसकी प्रामाणिक प्रति माना जायेगा यह भी स्पष्ट किया गया है। किसी अन्य भाषा (तथाकथित बेचारी राजभाषा हिन्दी भी शामिल) में लिखित (अनूदित/अनुवादित) प्रति अमान्य होगी यदि कानूनी व्याख्या में अंगरेजी मूल और अन्य भाषा में कहीं फ़र्क दिखने में आवे।

अंगरेजी में लिखित इस संविधान के आरंभ में दिए गये PREAMBLE (प्रस्तावना, भूमिका, प्राक्कथन जो भी अनुवादकगण कहते हों) के शब्द ये हैं:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:

JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(हिन्दी में यों आरंभिक शब्द होंगे: “हम इंडिया के लोग …”

ध्यान दें कि इस PREAMBLE में “भारत” का प्रयोग या उल्लेख नहीं है। तब क्या इस देश को भारत कहना संवैधानिक दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जायेगा?

अगर हिन्दी में इस PREAMBLE के शब्द कहे जाने हों तो कैसे शुरुआत करेंगे? हम क्या यों आरंभ करेंगे: “हम इंडिया के लोग …” अथवा हम कहेंगे: “हम भारत के लोग …”? यहां यह प्रश्न उठेगा कि क्या किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा-शब्द (नाम, proper name) का अनुवाद किया जाता है? यह सभी जानते हैं कि किसी भी भाषा में बात करने पर व्यक्तिवाचक या भाववाचक संबोधन का अनुवाद नहीं किया जाता है। तब उक्त अनुवाद में इंडिया के बदले भारत कैसे कहा जा सकता है।

प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है जब हिन्दी अथवा देवनागरी लिपि वाली भाषाओं से इतर भाषाओं में इस देश का जिक्र किया जाना हो। यथा तमिल में क्या कहेंगे, सिन्धी में क्या कहेंगे, सिंहली (श्रीलंका की भाषा – विदेशी, संस्कृत शब्दों की बहुलता वाला) में क्या होगा, थाई (थाइलैंड की भाषा) में क्या होगा, इत्यादि इत्यादि। मेरी जानकारी के अनुसार संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि हिन्दी में “भारत” होगा। लिखा भी हो तो भी तमाम अन्य भारतीय/विदेशी भाषाओं में क्या कहेंगे यह तो नहीं ही स्पष्ट है।

ऐसी दुविधा किसी ऐसे देश के मामले में हो सकती है जिसके एकाधिक नाम हों। मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इस राष्ट्र को अनौपचारिक रूप से हिन्दुस्तान, हिंद, आदि कहा ही जाता है, उसी प्रकार भारत कहना भी अनौपचारिक तौर पर स्वीकार्य माना जायेगा। लेकिन कानूनी दस्तावेजों में भारत कहना अनुचित नहीं होगा क्या? देशवासी बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, लेकिन वे इस विसंगति की चर्चा क्यों नहीं करते हैं?

यह भी विचारणीय है कि प्राचीन काल में यहां के बाशिन्दों ने इस भूभाग को “भारत” नाम दिया। विष्णुपुराण में कहा गया है:

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। (विष्णुपुराण, 2.3.1)

अर्थात् जो देश (वर्ष – देश का पर्याय) समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है उसका नाम है भारत और उसकी संतानें हैं भारती ।

मेरा मानना है कि यह पौराणिक नाम “यूरोपवासियों” के संबोधन “इंडिया” से अधिक प्राचीन रहा ही होगा।

स्पष्ट है कि भारत नाम हमारे पुरखों ने प्राचीन काल में इस भूभाग को दिया था जो आज एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर स्थापित है। अंगरेजों ने अपने आधिपत्य के अधीन इस भूभाग को इंडिया कहा अपनी सुविधा से न कि यहां की जनता से पूछकर । उन्होंने “India as a sovereign nation” के तौर पर राज नहीं किया; यह तो उनके ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा था। हमने राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल की लेकिन अपना स्वयं का दिया हुआ नाम भूलकर उनके द्वारा दिया हुआ नाम स्वीकार कर लिया। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कोई विलायत में रहे और विलायतियों के उच्चारण की सुविधा के अनुसार उनके संबोधन को ही अपना नाम मान ले और अपने परिवार द्वारा प्रदत्त मूल नाम भूल जाए।

इस राष्ट्र को “भारत” संबोधित न कहकर “इंडिया” क्यों कहा गया यह मेरी समझ से परे है। यह ठीक है कि अंगरेजों ने इस देश को इंडिया कहा और शासकीय व्यवस्था में अपनी जरूरत के अनुसार अंगरेजी भाषा तथा अंगरेजियत का प्रसार किया। विडंबना यह है कि जब देश स्वतंत्र हुआ तो अंगरेजों से तो हम मुक्त हुए, लेकिन गुलामी की निशानी उनकी अन्य बातों के प्रति देशवासी सम्मोहित बने रहे। फलतः देश इंडिया बना रहा, भारत नहीं बन सका संविधान की दृष्टि में।

इस समय इस देश को भारत कहने वाले नगण्य हो चले हैं। अखबारों/टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाले विज्ञापनों में इंडिया ही प्रयुक्त होता है। प्र.मं. मोदी तक “डिजिटल इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” जैसे नारे गढ़ते हैं और उसके बाद उन नारों के हिन्दी रूपान्तरों मे भारत प्रयुक्त होता है। जब मौलिक रूप से “इंडिया” ही इस्तेमाल होना है तो “भारत” की आवश्यकता क्या है?

यहां इतना तो बता ही दें कि ‘केंद्र शासन की स्थापना के लिए 1949 में जिस अधिनियम को पारित किया गया उसके अनुच्छेद 1(1) का पाठ यों है (अंगरेजी में): “1(1) India, that is Bharat, shall be a Union of States”, जिसका हिन्दी रूपान्तर यों दिया जा सकता है: “इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का संघ होगा ।” ध्यान दें कि इस स्थल पर देश का नाम ‘इंडिया’ के साथ-साथ ‘भारत’ भी घोषित कर दिया है । ऐसा करने की आवश्यकता क्या थी यह भी मेरे समझ से परे है। ऐसा करना ही था तो जैसे संविधान के ४२वें संशोधन (1976) में “SECULAR” शब्द जोड़ा गया वैसे ही संविधान संशोधन के जरिये “भारत” शब्द भी जोड़ा जा सकता था। पर ऐसा किया नहीं गया। कारण? मेरे लिए अज्ञात! – योगेन्द्र जोशी

भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

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इस दिवस पर देशवासियों के प्रति शुभकामना व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य बनता है । तदनुरूप उक्त संदेश सभी को स्वीकार्य होवे । किंतु इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने और देश के भविष्य के प्रति आशान्वित होने का कोई विश्वसनीय आधार मुझे कहीं नहीं दिखता । देश की जो निराशाप्रद स्थिति मुझे वर्षों से दिखती आ रही है, उसकी ओर मेरा ध्यान इस मौके पर कुछ अधिक ही चला जाता है । मुझे लगता है कि आंख मूंदकर खुश होने के बजाय देशवासियों को तनिक गंभीरता से अपनी राजनैतिक उपलब्धियों पर विचार करना चाहिए । उन्हें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या साड़ेछः दशक पूर्व हासिल की गयी स्वाधीनता का उपयोग हम एक स्वस्थ एवं जनहित पर केंद्रित लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था स्थापित करने में कर पाये ? इस अवसर पर कई प्रश्न मेरे मन में उठते हैं जिनके उत्तर मुझे नकारात्मक ही मिलते हैं । मेरी बातें सुन मुझ पर पूर्वाग्रह-ग्रस्त होने का आरोप लग सकता है । क्या मैं वाकई गलत हूं; मेरी बातों में कोई सार नहीं; मैं निराशावादी हूं ?

भारतीय संविधान कहता है:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved constitute India into a SOVEREIGN  SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens

JUSTICE …

LIBERTY …

EQUALITY …

FRATERNITY …

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT, AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(SECULAR ‘kCn 1976 ds 42osa la’kks/ku esa tksM+k x;k A)

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाबत कुछ प्रश्न उठाता हूं । हमारी तत्संबंधित उपलब्धियां क्या हैं ? परमाणु परीक्षण, मिसाइल तकनीकी, उपग्रह प्रक्षेपण, और चंद्रयान अभियान या अन्य विकास कार्यों को मैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बेहतरी के संकेतक नहीं मानता । ऐसे विकास कार्य तो राजशाही, तानाशाही, लोकशाही अथवा किसी भी अन्य शासकीय तंत्र में होते ही रहते हैं । हर एक तंत्र में शासक अपने को मजबूत करने में लगा ही रहता है । चीन इसका उदाहरण है जो इन सब मामलों में हमसे कहीं आगे है । मेरे सवाल सीधे-सीधे अपने लोकतंत्र से जुड़े हैं कि क्या उसकी गुणवत्ता उत्तरोत्तर बढ़ी है; क्या वह आम जन की आकांक्षाओं के अनुरूप है, आदि । चलिए एक-एक सवाल पर विचार करें:

कहां है लोकतंत्र ? मूल भावना का अभाव

हमने बहुदलीय शासन पद्धति स्वीकारी है, जिसके अनुसार व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक दलों को प्राप्त हुई है । उनसे अपेक्षा रही है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृड़ ही नहीं करेंगे, बल्कि उसकी मर्यादाओं का पूर्णतः सम्मान करेंगे । लेकिन जिन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उन्होंने ही लोकतांत्रिक प्रणाली का दायित्व संभाल रखा है । क्या इसमें विरोधाभास नहीं है ? आज के प्रमुख दलों में कितने हैं जो शपथ लेकर कह सकें कि उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है ? प्रायः हरएक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा उसके परिवार की निजी राजनैतिक जागीर बना हुआ है और उसके कार्यकर्ता तोते की भांति मुखिया के कथनों को उच्चारित करना अपना धर्म मानते हैं ।

कहां है लोकतंत्र ? सत्ता हथियाने की होड़

सत्ता हथियाना ही सभी दलों का एकमेव लक्ष बन चुका है । सत्ता क्यों चाहिए ? देश का स्वरूप आने वाले 20-30 सालों में क्या होगा इसके चिंतन से प्रेरित होकर सत्ता नहीं पाना चाहते । देश की कोई भावी तस्वीर उनके मन में नहीं उभरती है, बल्कि उनकी नजर पांचसाला सत्ता पर रहती है कि कैसे वे भरपूर सत्तासुख भोगें और और सत्ता से तमाम सही-गलत लाभ बटोर सकें । यही वजह है कि उनके पास देश के लिए कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, और न ही वे किसी सिद्धांत पर टिके रहते हैं । चुनाव में जिसका विरोध करें उसी से हाथ मिलाकर सत्ता पर बैठने से कोई नहीं हिचकता है । हर प्रकार का समझौता, हर प्रकार का गठबंधन उन्हें स्वीकार्य है, बशर्ते कि वह उनके निजी हित में हो, देशहित दरकिनार करते हुए ।

कहां है लोकतंत्र ? क्षेत्रीय दलों का उदय

जोड़तोड़ से सत्ता में भागीदारी पाने, और अपनी शर्तों पर दूसरे दलों से मोलभाव करने की क्षमता बटोरनेे के लिए क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ है । स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक ऐसे दलों का जन्म नहीं  हुआ था ऐसा मैं समझता हूं । कदाचित डीएमके पहला ऐसा दल था जो क्षेत्रीय दल के रूप में हिंदीविरोध के साथ जन्मा था । अन्य दल बाद में ही उभरे जब नेताओं को लगने लगा कि इस रास्ते से उनकी कीमत बढ़ जाएगी । इन दलों ने केंद्र की सत्ता को कमजोर ही किया । हाल के समय में गठबंधन-धर्म जैसा शब्द गढ़ा गया और राष्ट्रधर्म को दरकिनार कर इस धर्म को अहमियत मिलने लगी । इन दलों ने कुछ भी करने की छूट की शर्त पर गठबंधन बनाए रखने की घातक परंपरा को जन्म दिया है । क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र है ?

अहंकारग्रस्त सांसद-विधायक

जनता के द्वारा बतौर प्रतिनिधि के चुन लिए जाने के बाद हमारे राजनेता स्वयं को पांच-साला राजा समझने लगते हैं । विनम्रता तो उनमें मुश्किल से ही मिलेगी । वे किसी भी विषय पर जनता की राय जानने के लिए क्षेत्र में नहीं जाते हैं, बल्कि दल एवं मुखिया की बात ही उनके लिए माने रखती है । जब वे अपने हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं और जनता विरोध करती है तो अहंकार के साथ कह देते हैं कि हम चुनकर आए हैं । हिम्मत हो तो आप भी चुनकर आओ हमें रोक लो । मतलब यह कि हम अब राजा हैं और अपनी मरजी से चलेंगे । नेताओं की ऐसी सोच कभी भी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं कही जा सकती है । हिम्मत तो उन्हें होनी चाहिए कि अपने मतदाताओं के बीच जाकर उनके विचार जानें । ऐसा वे कभी नहीं करते । कहना ही पड़ेगा कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान नहीं उपज पाता है ।

सेक्यूलरिज्म का ढिंढोरा

सेक्यूलरिज्म, जिसे हिंदी में धर्मनिरपेक्षता कहा गया है, के अर्थ क्या होते हैं यह शायद ही किसी राजनेता को मालूम हो । यह शब्द वे तोते की तरह बिना सोचे-समझे कही भी बोल देते हैं । उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह शब्द यूरोपीय देशों में गढ़ा गया जहां शासकीय व्यवस्था को ईसाई धर्म के प्रभाव के मुक्त करने का अभियान चला था । फलतः वहां इस विचारधारा ने जन्म लिया कि लोकतंत्र में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, और शासन के नियम-कानून में देश और समाज के समग्र हित के अनुसार बनने चाहिए न कि किसी धर्म के मतानुसार । जब नेहरू-आंबेडकर ने हिन्दू भावना के विरुद्ध हिन्दू कोड बिल पारित करवाया तो उनकी सोच यही थी कि कालांतर मे कॉमन सिवल कोड देश में स्थापित किया जाऐगा । लेकिन ऐसा हो न सका और अब संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों के होते हुए भी यह कभी होगा नहीं । हमने ‘सेक्युलर’ शब्द का आयात का तो कर लिया, किंतु उसकी भावना अपनाई नहीं । वस्तुत यह देश मल्टीरिलीजस या बहुधर्मी है न कि धर्मनिरपेक्ष, क्योंकि हमारे कुछ कानून धर्मसापेक्ष ही हैं । फिर कैसे हम स्वयं को सेक्युलर कहें । यह आत्मप्रवंचना है ।

अल्पसंख्यकवाद

इस देश में सेक्युलर का व्यावहारिक अर्थ अल्पसंख्यक हितों की बात करना हो चुका है । बहुसंख्यकों की चर्चा करना सेक्युलर न होना समझा जाता है । और दिलचस्प बात तो यह है कि जब भी अल्पसंख्यक शब्द राजनेताओं के मुख से निकलता है तो उनका इशारा प्रायः मुसलिम समुदाय से ही होता है । देश में सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से तो कुछ सही अर्थ में अल्पसंख्यक हैं । परंतु उनकी बात शायद ही कभी कोई राजनेता करता है । दरअसल सबसे कमजोर आर्थिक एवं शैक्षिक दशा में होने के बावजूद मुसलिम समुदाय चुनावी नजर से अत्यधिक अहम समुदाय है, क्योंकि वह चुनाव परिणामों में उलटफेर कर सकता है । उनकी इसी ताकत को देखते हुए हमारे कई राजनैतिक दलों की नीति उनके हितों की जबरन बातें करना रही है । उनको अपने पक्ष में करने के लिए वे हर चारा उनके सामने डालते आ रहे हैं, और उन्हें वोट बैंक के रूप में देखते हैं । उनके वास्तविक हितों में शायद ही किसी की दिलचस्पी होगी । मुझे तो पूरा संदेह है कि ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि वे कभी ऊपर उठें और प्रलोभनों से मुक्त हो पाएं । इस प्रकार का घटिया अल्पसंख्यकवाद मेरी नजर में लोकतंत्र के विरुद्ध है ।

नेतागण – अनुकरणीय दृष्टांतों का अभाव

हमारे राजनेताओं का अहंकार तब खुलकर सामने आता है जब वे कानूनों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते हैं । वे अदालतों के आदेशों/निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते है । वे भले ही मुख से न बोलें, किंतु उनका इशारा इस ओर सदैव रहता है कि उन्हें कानूनों के ऊपर होने का ‘विशेषाधिकार’ होना चाहिए, क्योंकि वे राजा से कम नहीं हैं । इस प्रकार का रवैया स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में देखने को नहीं मिलता था । तब के नेता नैतिक स्तर पर कहीं अधिक ऊपर थे । कहने का अर्थ है कि इस क्षेत्र में भी गिरावट ही आई है । होना तो यह चाहिए था कि नेता जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करें, वे अपने संयत व्यवहार से उन्हें प्रेरित करें । यही सब बातें हैं जिससे जनता में उनके प्रति सम्मानभाव घटता जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं हैं । क्या वे इन बातों को समझ पाएंगे ।

बढ़ता भ्रष्टाचार और लचर न्याय प्रणाली

कोई यह दावा कर सकता है कि समय बीतने के साथ देश में भ्रष्टाचार घटा है ? जो इसका उत्तर हां में दें मैं उनसे माफी ही मांग सकता हूं । शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जहां उल्टे-सीधे काम न होते हों, लेकिन दंडित कोई नहीं होता । यह राजनेताओं समेत सभी मानते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है, लेकिन तमाशा देखिए कि भ्रष्टाचारी कोई सिद्ध नहीं होता है, गोया कि यह भी कोई दैवी चमत्कार हो । दरअसल हमारी न्यायप्रणाली है ही ऐसी कि आरोपी को बचाने के लिए उसने तमाम रास्ते दिए हैं । रसूखदार व्यक्ति किसी न किसी बहाने मामले को सालों लटका लेता है और दंड से बच जाता है । क्या यही अपने लोकतंत्र से अपेक्षित था ?

लोकपाल, आरटीआई, एवं आपराधिक राजनीति

हमारे देश के मौजूदा राजनेता भ्रष्टाचार के प्रति कितने संजीदा हैं यह उनके लोकपाल के मामले को टालने एवं आरटीआई से अपने दलों को मुक्त रखने के इरादे से स्पष्ट है । इसी प्रकार वे राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध भी कारगर उपाय नहीं अपनाना चाहते हैं । जिन आपराधिक छवि के नेताओं के बल पर वे सत्ता हासिल करते आ रहे हैं आज उन्हें वे बचाने की जुगत में लगे हैं । मेरा विश्वास है कि शुरुवाती दौर में राजनीति इतनी अस्वच्छ नहीं थी । समय के साथ आपराधिक छवि के लागों की पैठ जो शुरू हुई तो आज संसद तथा विधानसभाओं में उनका बोलबाला दिखाई देता है । जब ऐसे नेता और उनको बचाने वाले नेता संसद में तो अपराधमुक्त राजनीति कहां से आएगी ? इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें ?

चुनावी एवं प्रशासनिक सुधार

मुझे अब विश्वास हो चला है कि हमारे नेता ऐसे कोई उपाय नहीं करना चाहते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे पर उनकी मनमर्जी पर अंकुश लगाए । मैं अब मानता हूं कि उनमे परस्पर यह मुक सहमति बनी है कि ऐसे किसी भी कानून का हममें कोई न कोई किसी न किसी बहाने विरोध करता रहेगा ताकि वह कानून पास न हो सके । ऊंची-ऊंची बातें होती रहती हैं लेकिन ठोस कुछ किसी को नहीं करना है । यही वजह है कि चुनाव, न्याय-व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, तथा पुलिस तंत्र में सुधार आज तक नहीं हुए हैं और न आगे होने हैं । यही हमारी उपलब्धि है क्या ?

इंडिया बनाम भारत

स्वतंत्र हिंतुस्तान की सबसे त्रासद और दुःखद घटना है इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटवारा । ये देश की चिंताजनक प्रगति है कि यहां दो समांतर व्यवस्थाएं साथ-साथ चल रही हैं । एक व्यवस्था है देश के समर्थ एवं संपन्न वर्ग के लिए और दूसरी है बचेखुचे कमजोर लोगों के लिए । चाहे शिक्षा हो, चिकित्सा हो, यातायात हो या कुछ और, दोनों के लिए असमान व्यवस्था कायम हुई हैं । तर्क दिया जाता है कि लोकतंत्र में तो लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम पाने का अधिकार है । संविधान में जिस EQUALITY की बात कही गई हैं उसके निहितार्थ क्या हैं यह मैं समझ नहीं पाता ।

स्वतंत्रता यानी अनुशासनहीनता

अंत में । क्या ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार्य हो सकती है जिसमें व्यक्तियों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न हो, जहां मर्यादाएं न हों ? लेकिन बहुत से लोगों के लिए स्वतंत्रता के अर्थ हैं अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, जो मर्जी वह करने का अधिकार, कानूनों का उल्लंघन, आदि । हमारा लोकतंत्र लोगों को दायित्यों का एहसास दिलाने का कार्य नहीं कर सका है । लोगों को कार्य-संस्कृति, दूसरों के प्रति संवेदना, देश-समाज के प्रति कर्तव्य का पाठ कोई नहीं पड़ा सका है । सभी को खुली छूट जैसे मिली हो ।

ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठते हैं । ये सब बातें व्यापक बहस के विषय के हैं, किंतु इनसे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि यह देश सही दिशा में नहीं जा रहा है ।

मेरी दृष्टि में चंद्रमा पर यान उतार देना उतना महत्व नहीं रखता जितना सड़क पर कूड़ा बीनने वाले को उस दशा से मुक्त करना । – योगेन्द्र जोशी

क्रिक्रेट, क्रिक्रेट, बस क्रिक्रेट, और कुछ नहीं!

         पिछले 10-12 दिनों से टेलीविजन चैनलों पर मुझे क्रिक्रेट में स्पॉट फिक्सिंग के समाचारों के अलावा कुछ और सुनने को मिल ही नहीं रहा था । देश-विदेश में इस बीच बहुत कुछ हो गया, परंतु टीवी चैनलों को क्रिक्रेट के अलावा कुछ और समाचार सूझ ही नहीं रहे थे । देश में कहीं हत्या में 7 जनों के परिवार का सफाया हो रहा था तो कहीं गोदाम जल रहा था । अमेरिका में कहीं तूफान ने तबाही मचाई तो कहीं पुल टूट गया । ऐसी अनेक खबरें रही होंगी, किंतु टीवी चैनलों को क्रिक्रेट से फुरसत ही नहीं थी । श्रीसंत, विंदु दारासिंह, मयप्पन, श्रीनिवासन, आदि । बस घूमफिर कर इन्हीं को लेकर खबरें । यों कहिए कि उनके लिए क्रिक्रेट एक तरफ और सारा जहां दूसरी तरफ, फिर भी क्रिक्रेट भारी । या खुदा क्या कभी ऐसा भी कोई दिन आयेगा जब क्रिक्रेट का भूत ‘इंडियावासियों’के दिलोदिमाग से भाग जाये ?

दुर्योग से 25 की तारीख पर नक्सल आतंकियों ने क्रांग्रेस पार्टी की रैली पर ऐसा कहर बरपाया कि पूरा देश हिल गया । टीवी चैनलों को भी कुछ देर के लिए अपना बल्ला थामकर इस नये दुःसमाचार का प्रसारण करना ही पड़ा । पर ऐसा नहीं कि क्रिक्रेट-समाचार उन्होंने छोड़ दिया हो, बस थोड़ा विराम के साथ, कुछ कम जोश के साथ प्रसारण चलता रहा । इस देश में तो क्रिक्रेट की चर्चा के बिना ‘न्यूज’का आरंभ अथवा अंत सोचा ही नहीं जा सकता है ।

          बहुत से लोगों के मुख से मैंने सुना है कि इस देश के लिए क्रिक्रेट ‘रिलीजन’ बन चुका है, यानी एक ऐसी चीज जिसके बिना आप जीवन ही व्यर्थ समझने लगें, ऐसी चीज जो आपके तार्किक चिंतन की सामर्थ्य ही छीन ले । जैसे आप रिलीजन के मामले में सवाल नहीं उठाते हैं (वह रिलीजन ही क्या जिस पर आस्थावान शंकास्पद प्रश्न पूछने लगे), वैसे ही आप आंख मूदकर क्रिक्रेट का पक्ष लेते हैं, उसके अंधभक्त बने रहते हैं । कभी यह सवाल नहीं पूछते कि क्रिक्रेट की ऐसी दिवानगी भली चीज है क्या ? मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो सब कुछ छोड़ क्रिक्रेट मैच के लिए टीवी पर चिपक जाते हैं; कमरे में बैठे-बैठे कंमेंटेटर बन जाते हैं; तालियां पीटने लगते हैं; खिलाड़ी के खेल में मीनमेख निकालते हैं; आदि-आदि ।

         देश में क्रिक्रेट की दीवानगी इस कदर फैली है कि कुछ लोग खिलाड़ियों को पूजते पाए जाते हैं, उन्हें भगवान कहने लगते हैं (ऐसा करना स्वयं भगवान का निरादर करना तो नहीं होगा ? किसी और खेल के मामले में मैंने ऐसा समर्पण भाव नहीं देखा !) । वे टीम-विशेष की जीत क लिए पूजापाठ करने बैठ जाते जाते हैं; प्रिय टीम की हार पर उपद्रव मचाने से भी नहीं कतराते हैं; और मामला इंडिया-पाकिस्तान का हो तो कहना ही क्या । जैसे शराबी बिना शराब के बेचैन हो जाता है; जुआबाज बिना जुआ खेले रह नहीं पाता; नशेड़ी नशे के बिना जी नहीं पाता; वैसे ही क्रिक्रेट के दीवाने क्रिक्रेट के खेल के बिना रह नहीं सकते ।

         ऐसा पागलपन समाज के लिए ठीक है क्या ? क्या दुनिया में और खेल नहीं हैं क्या ? बच्चों-युवाओं को अन्य खेलों के प्रति प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए क्या ? ऐसे अनेकों प्रश्न मेरे दिमाग में उठते रहते हैं । ये सवाल लोगों के दिमाग में क्यों नहीं उठते ? मैं तो क्रिक्रेट का खेल सपने में भी नहीं देख सकता, जागृत अवस्था में तो सवाल ही नहीं !

जिस आई पी एल की आजकल धूम मची है वह खेल नहीं है । वह किसी के लिए जुआ है तो और के लिए धनकमाई का एक और धंधा है । खिलाड़ियों की नीलामी की जाती है तो यों ही नहीं । जब यह एक बिजनेस बन चुका हो जिसके रास्ते सभी संबंधित पक्ष पैसा कमाना चाहते हों तो वहां उल्टा-सीधा बहुत कुछ होना ही है । अधिकाधिक दर्शकों को आकर्षित करने के लिए टीवी चैनलों पर रातदिन प्रसारण करना ही होगा । ऐसे में अन्य समाचार गौण बन जाएं तो आश्चर्य ही क्या ? सट्टेबाजी तो आदमी के धन-लोलुपता का सीधा परिणाम है । तीन-चार दिन पहले और कल फिर स्थानीय अखबार में खबर थी कि वाराणसी के श्मशान घाटों (हरिश्चंद्र एवं मणिकर्णिका) पर आने वाले शवों को लेकर भी सट्टेबाजी की जा रही है कि घंटे भर में कितने शव आएंगे । सट्टेबाजी आदमी के चरित्र में है, लेकिन यह वहां नहीं दिखती जहां अधिक लोग मामले में दिलचस्पी नहीं दिखाते । चूंकि क्रिक्रेट में दिलचस्पी लाखों-करोड़ों की है इसलिए यह सट्टे के लिए बेहतर धंधा है ।

चूंकि अब क्रिक्रेट कमाई का लाजवाब धंधा बन चुका है, अतः संबंधित पक्ष चाहेंगे कि इसको खूब प्रचारित-प्रसारित किया जाए और अधिक से अधिक लोगों को इसकी ओर खींचा जाए । इस क्रिक्रेट में चियर गर्ल्स क्यों शामिल होती हैं? सोचिए । क्रिकेट को लोगों के दिमाग में ठूंसने में टीवी चैनलों एवं समाचारपत्रों की भूमिका बहुत अहम हो चुकी है । क्या वजह है कि वे कहलाते तो न्यूज चैनल हैं लेकिन हकीकत में क्रिक्रेट चैनल बन के रह गये हैं । इन चैनलों का काम होना चाहिए कि सभी प्रकार के समाचार वे प्रसारित करें, किंतु जैसा मैं कह चुका हूं पिछले कुछ दिनों से वे केवल क्रिक्रेट की ही बात करते रहे हैं । अगर उनसे पूछा जाए कि ऐसा क्यों है तो वे रटा-रटाया तर्क (कुतर्क?) पेश करेंगे: “दर्शक तो क्रिक्रेट के बारे में ही सुनना चाहते हैं, और हम वही तो दिखायेंगे जो वे चाहते हैं ।”ठीक है, पर अपने को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया को लोगों में क्रिक्रेट की दिवानगी बढ़ने का काम करना चाहिए या उन्हें यह समझाना चाहिए कि अति ठीक नहीं । इसी अति का नतीजा है जो हम आज देख रहे हैं । न हम दीवाने होते और न ही क्रिक्रेट अन्य सभी खेलों को निरर्थक बना देता । क्रिक्रेट की दीवानगी बढ़ाने में टीवी चैनलों की जबरदस्त भूमिका रही है इसे कोई नकार नहीं सकता है । मुझे तो यह शंका होने लगी है कि इन चैनलों को भी बीसीसीआई (BCCI) द्वारा कुछ अनुचित लाभ पहुचाया जाता होगा । मेरे पास प्रमाण नहीं है, लेकिन क्रिक्रेट और केवल क्रिक्रेट की बात वे यों ही नहीं करते होंगे । – योगेन्द्र जोशी

“हुजूर, केाई बात नहीं, अब आगे ऐसा मत करना !”

अभी-अभी टीवी चैनल पर निराशाप्रद समाचार सुनने को मिला कि पाकिस्तानी सेना ने भारत के साथ स्वीकृत नियंत्रण रेखा (लाइन अव् कंट्रोल) को पार कर हमारे दो सैनिकों को शहीद कर गये । पाक सैनिकों ने जम्मू कश्मीर में ‘उड़ी’ के पास कोई 500-600 मीटर अंदर घुसकर इस वारदात को अंजाम दिया । समाचार के अनुसार इस घटना का एक घृणास्पद पहलू यह है कि वे एक शहीद का सिर काट ले गये । यह सब अंतरराष्ट्रीय संधियों के विरुद्ध है ।

अपने देश ने इस घटना पर ‘कड़ा’ विरोध जताया है । पिछले लंबे समय से पाकिस्तान की हरकतें कुछ ऐसी ही रही हैं । भारत के साथ पाकिस्तान सदैव शांति एवं मित्रता स्थापित करने का नाटक करता है, और अपनी सरकार सदैव उसके प्रति सदाशयता दर्शाती रहती है । पाक धोखा देता आया है और अपनी सरकार नजरअंदाज करती आई है । कुछ गंभीर घटित होता है तो कड़ा विरोध जता दिया जाता है । क्या मतलब है कड़े विरोध का यह बात आज तक स्पष्ट नहीं हो सकी है । “आइंदा हम ऐसी हरकत बर्दास्त नहीं करेंगे” कहना क्या माने रखता है कि जब हर बार वही शब्द दोहराए जायें और वास्तविकता के धरातल पर चीजें जस की तस देखने में आती हों ? मैत्री स्थापित करने की बात फिर पूर्ववत् चल निकल पड़ती है ।

कड़ा विरोध तभी सार्थक है जब उस में कोई चेतावनी निहित हो कि फिर ऐसा हुआ तो अमुक परिणाम होंगे । लेकिन भारत सरकार का कड़ा विरोध सदैव एक रस्मअदायगी साबित होती है जिसे, पाकिस्तान कोई अहमियत नहीं देता है । ऐसा लगता है कि जैसे सरकार कहना चाहती हो, “हुजूर, केाई बात नहीं, अब आगे ऐसा मत करना !”

 बात गंभीरता से सोचने की है कि अब पाकिस्तान को लिफ्ट देना पूरी तौर पर बंद हो । पाकिस्तान पहले अपनी हरकतें सदा-सदा के लिए बंद करें तब और तब बात आगे चलेगी, नहीं तो हरगिज नहीं । – योगेन्द्र जोशी

15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस – कैसी स्वतंत्रता, कैसा जश्न?

कल ही की बात है । निकट में रहने वाले समाज के कमजोर तबके में शामिल मेरे हमउम्र पड़ोसी ने चलते-चलाते अपने शहर की दुर्दशा का दुखड़ा सुना डाला । “देखिए टूटी-फूटी सड़कें, अभी साल भर भी बने नहीं हुआ; जहां-तहां कूड़े का ढेर जमा हो चला है, कोई उठाने वाला नहीं; नालियां या तो हैं नहीं या फिर मलवे से पटी हैं और बदबदा रही हैं; चारों तरफ दुर्व्यवस्था फैली हुई है; लगता नहीं कि कहीं सरकार जैसी भी कोई चीज है । सुनता हूं कि कल स्वतंत्रता दिवस है । मैं तो निपट अनपढ़, कुछ जानता नहीं लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि इससे अच्छा तो अंगरेजों का राज था ।

मैं शहर के हालात से पूरी तरह परिचित हूं । उसकी बातों से असहमत नहीं हो सकता था । मैं स्वयं महसूस करता हूं कि आज के स्वशासन से तो अंगरेजों का राज बेहतर था

न मेरे उस पड़ोसी ने और न ही मैंने अंगरेजों का राज देखा । हम तो 1947 की इसी तारीख के आगे-पीछे पैदा हुए थे । हमारे माता-पिता तथा अन्य बुजुर्गों ने उसका कुछ अनुभव अवश्य पाया था, दादा-परदादा तो उन्हीं के राज में पैदा हुए और दिवंगत हुए । उनमें से अधिकतर अब इस लोक में रहे नहीं कि आज के और बीते जमाने के बीच तुलना कर सकें । हमने अंगरेजी राज के अच्छाई-बुराई की बातें उन्हीं के मुख से सुनी थीं । और जो सुना वह यही था कि जहां तक रोजमर्रा के राजकाज का सवाल है वह तब बेहतर था आज की तुलना में ।

***

यह सच है कि अंगरेज भारतीयों को अपनी बराबरी में नहीं रखते थे । वह शासक थे और उसके अनुरूप उन्होंने अपने लिए विशेषाधिकार नियत कर रखे थे । आप उनका विरोध नहीं कर सकते थे । लेकिन यह भी सच है कि आम आदमी को अंगरेज से सीधा पंगा लेने की जरूरत भी नहीं थी । वह अपने काम में लगा रहता, तो अंगरेज अपने राजकाज को संभालता था । और जब तक आम आदमी उसके काम में व्यवधान नहीं डाल रहा हो वह बुरा नहीं था ।

बुजुर्गों के मुख से हमने सुना है । समाज में तब आज की जैसी अराजकता नहीं थी । आज की जैसी चोरी-छिनैती, छेडखानी, दबंगई तब नहीं थी । आप पुलिस से मदद की उम्मीद कर सकते थे, बशर्ते कि आपकी शिकायत किसी अंगरेज के विरुद्ध न हो । तब भ्रष्टाचार आज के जैसा खुल्लमखुल्ला नहीं होता था । लोगों में शर्मोहया रहती थी । लोग शासन से तो डरते ही थे, समाज की टीका-टिप्पणियों से भी भय खाते थे ।

तब स्कूल-कालेजों की भरमार नहीं थी, लेकिन जो थे वहां शिक्षक पढ़ाते थे, मुफ्त की तनख्वाह नहीं बटोरते थे । क्या मजाल कि कहीं नकल हो । पढ़ाई का स्तर कहीं बेहतर था । तब अस्पताल भी बहुत कम थे, लेकिन जो थे उनमें इलाज होता था; डाक्टर घर पर आज की तरह निजी प्रैक्टिस नहीं करते थे । पुलिस कमजोर व्यक्ति को मनमाने तरीके से सलाखों के पीछे नहीं डाल देती थी । पर आज ? कमजोर पर डंडा चला देती है और रसूखदार की जी-हजूरी करने लगती है । आम आदमी को सरकारी दफ्तरों में आज की तरह घूस नहीं देनी पड़ती थी । नागरिक कार्यों की तब की गुणवत्ता आज से कहीं बेहतर थी । उस जमाने के पुल, सड़कें, भवन आदि कहीं अधिक टिकाऊ थे यह आज भी देखने में आ रहा है । आज तो हालात यह है कि ये सब चीजें बनते-बनते ही टूटने लगती हैं, बावजूद इसके कि तकनीकें कहीं अधिक उन्नत हो चुकी हैं ।

तुलना करें तो पाएंगे कि तब भले ही व्यवस्था अपर्याप्त थी पर जो थी वह गुणवत्ता में बेहतर थी ।

मगर राज अंगरेजों का था । इसलिए अस्वीकार्य था ।

***

आज राजकाज की गुणवत्ता की गिरावट किसी से छिपी नहीं है । चारों तरफ असंतोष व्याप्त है । फिर भी हम इठला रहे हैं, क्योंकि राज हमारे लोगों का है (हमारा नहीं!!) । चाहे जितना भी बुरा हो, है तो अपने लोगों का !! इसलिए खुशी मनाना जरूरी है ।

लेकिन यह सवाल तो जायज है कि देश की स्वतंत्रता से जो उम्मीदें लेकर संघर्ष किया गया था वह क्या पूरी हुईंं । अधोलिखित कुछएक बिंदुओं पर विचार करें:

1- ममता ने एक निरीह किसान को सलाखों के पीछे डाल दिया क्योंकि उसने एक सीधा-सा सवाल पूछने की हिमाकत कर दी । अंगरेज क्या इससे बुरा करता ?

2- मायावती स्वयं को दलितों की मसीहा कहती हैं, लेकिन उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए रचनात्मक कुछ कर दिखाने के बजाय करोड़ों रुपयों में अपनी ही मूर्तियां लगावाना अधिक जरूरी मानती रहीं । क्या यही स्वतंत्रता के माने हैं ?

3- किसी मनचले ने मायावती की बेजान प्रस्तर मूर्ति तोड़ दी तो अखिलेश सरकार हरकत में आ गई और रातोंरात नयी मूर्ति उस स्थल पर लग गई । लेकिन आए-दिन कितने ही जीते-जागते मनुष्यों की हत्या हो रही है, और पुलिस एफआईआर तक लिखने को तैयार नहीं होती । हिन्दुस्तानी और अंगरेज के बीच भेदभाव अंगरेजी राज में था, किंतु यहां तो कमजोर-बलवान के बीच भी वही चल रहा है ।

4- अंगरेजों पर यह इलजाम लगता रहा है कि उन्होंने ‘बाटो और राज करो’ की नीति अपनाई । उन्होंने क्या किया कह नहीं सकता, लेकिन हमारे राजनेता तो ऐसा खुलकर कर रहे हैं !! किस दल ने लोगों को जातीयता, धार्मिकता, भाषा एवं क्षेत्रीयता के आधार पर नहीं बांटा है ? कौन उनकी भावनाओं का शोषण करते हुए अपने-अपने वोट बैंक स्थापित नहीं किए बैठा है ?

5- लोकतंत्र की बात करने वाले राजनेताओं के दलों में क्या लोकतंत्र है ? क्या वे किसी परिवार अथवा व्यक्ति की प्राइवेट कंपनी बनकर नहीं रह गये हैं ?

6- क्या यह बिडंबना नहीं है कि लोकतांत्रिक देश की बागडोर एक नौकरशाह के हाथ में है, जो कभी भी जनप्रनिनिधि नहीं रहा है, जिसने कभी कोई जनांदोलन में भाग नहीं लिया है, और जिसने कभी भी आम लोगों के बीच जाकर तथा समस्याओं को सुनकर उनका निराकरण नहीं किया है ?

7- देश स्वतंत्र हुए 65 साल हो चुके हैं और हालात यह है कि दुनिया के

(1) सर्वाधिक निरक्षर अपने देश में हैं;
(2) सर्वाधिक कुपोषित बच्चे यहीं पल रहे हैं;
(3) सर्वाधिक कुष्ठरोगी अपने यहीं हैं;
(4) सबसे अधिक आर्थिक विषमता इसी जगह व्याप्त है, समाजवाद आधारित अर्थतंत्र की वकालत करने वाले देश में;
(5) चीन कभी भारत से पिछड़ा देश माना जाता था, आज वह हमसे कहीं आगे निकल चुका है और अमेरिका को टक्कर दे रहा है; इत्यादि ।

8- दरअसल हमने स्वतंत्रता शब्द के अर्थ बदल डाले हैं । आज स्वतंत्रता का मतलब है, अनुशासनहीनता, लापरवाही, मुफ्तखोरी, और मनमरजी । जिसमें हिम्मत है भ्रष्टाचार में लिप्त होवे और नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाये । किसी को न भय है और न शर्मोहया ।

9- इस समय देश एक प्रकार की अराजकता के दौर से गुजर रहा है । आसाम की घटना, मुंबई का दंगा, नक्सलवाद, और आए दिन की छोड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं निराश करने वाली बातें हैं ।

***

मेरी दृष्टि में परिस्थितियां जश्न मनाने के योग्य नहीं हैं । देशवासियों को गंभीर आत्मचिंतन करने की जरूरत है, न कि “सारे जहां से अच्छा …” सरीखा गीत गा लिया, तिरंगा फहरा दिया, आदर्श बातों से भरा भाषण दे दिया या सुन लिया, और फिर सब कुछ भुला दिया ।

मेरी नजर में खुश होने के पर्याप्त कारण नहीं हैं, और मेरा जश्न मनाने का मन नहीं है ।

प्रार्थना है कि सद्विचारों का संचार हो ! – योगेन्द्र जोशी

लोकसभा के 60 वर्ष एवं ‘कार्टून कथा’ – वाकई सफल है अपना लोकतंत्र?

संसद के 60 वर्ष

कल रविवार 13 मई के दिन देश के दोनों सदनों की बैठक चल रही थी । संसद ने ‘सफलता पूर्वक’ 60 वर्ष पूरे कर लिए हैं । इसी उपलक्ष्य पर विशेष बैठक कल के साप्ताहिक अवकाश यानी रविवार के दिन आयोजित हुई थी । चुने गये कुछ सांसदों ने अपने-अपने उद्गार प्रस्तुत किए । दिन भर की कार्यवाही देखने-सुनने में मेरी खास दिलचस्पी नहीं थी । दो-चार सदस्यों के विचार सुन लिए, उतने से ही चर्चा का लुब्बेलुआब समझ में आ गया था । हमारा संविधान उत्कृष्टतम है और हमारा लोकतंत्र सफल है ऐसा मत कमोबेश सभी संसद-सदस्यों का था ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा था ।

संसद की कार्यवाही देख मेरे मन में प्रश्न उठता है कि अपना लोकतंत्र क्या वाकई सफल है? सफलता की कैसे व्याख्या की जानी चाहिए? देश की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था किन उद्येश्यों को पूरा करने में सफल हुई है? कुुछ सांसदों ने असफलताओं की ओर भी इशारा किया । फिर भी वे इस बात पर संतुष्ट दिखाई दिए कि तमाम कमियों के बावजूद अपना लोकतंत्र सफल है ।

सफल लोकतंत्र, वाकई?

हां, अपना लोकतंत्र सफल है इस माने में कि मतदाता निर्भीक होकर मतदान में भाग ले सकते हैं । जाति, धर्म, लिंग अथवा क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है; सबको समान अधिकार प्राप्त हैं । हमारे निर्वाचन आयोग ने अपने सांविधानिक अधिकारों और दायित्वों के अनुरूप कार्य करने में काफी हद तक सफलता पाई है । उसकी कार्यप्रणाली में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है । अवश्य ही आयोग प्रशंसा एवं शाबाशी का पात्र है । किंतु इस कार्य में राजनेताओं, विशेषकर सांसदों, की रचनात्मक भूमिका रही है ऐसा दावा करना सही नहीं होगा । संसद के माध्यम से जिस प्रकार के सुधारों की वकालत आयोग करता रहा है उनमें सांसदों ने वांछित रुचि नहीं दिखाई है । बल्कि उनका रवैया कुछ हद तक टालने या रोड़ा अटकाने की ही रही है ।

यह भी सच है कि अपना लोकतंत्र अभी तक लड़खड़ाया नहीं है । अभी इस लोकतंत्र के प्रति विद्रोह नहीं दिखाई देता है । किंतु इस संभावना से हम इंकार नहीं कर सकते हैं कि भविष्य में स्थिति बदतर हो सकती है, यदि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यकुशलता, ईमानदारी और दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता लाने के प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते हैं ।

लोगों के मतदान में रुचि लेना और निर्वाचन आयोग की सफलता को ही लोकतंत्र की सफलता का मापदंड नहीं माना जा सकता है । निर्वाचन कार्य तो लोकतांत्रिक कार्यसूची का केवल आरंभिक कदम भर होता है । उसके बाद सभी कुछ तो जनप्रतिनिधियों के दायित्व-निर्वाह पर निर्भर करता है । अगर वह संतोषप्रद न हो तब हमें सफलता पर सवाल उठाने चाहिए ।

लोकतंत्र का उद्येश्य केवल यह नहीं है कि जनता संसद में जनप्रतिनिधियों को बिठा दे । मूल आवश्यकता यह है कि वे जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में प्रयासरत हों; कि वे जनता की समस्याओं को हल करें; कि वे कुशल, समर्पित एवं संवेदनशील प्रशासन देश को दें; कि वे जनता के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें; इत्यादि । वस्तुतः इस प्रकार के कई सवाल उठाए जा सकते हैं जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जाना चाहिए । कहां खड़ा है हमारा लोकतंत्र? कुछ सवाल हैं मेरे मन में ।

मेरे सवाल-जवाब

प्रश्नः मेरा आरंभिक प्रश्न यह है कि हमारे मौजूदा सांसद (और राज्यों के स्तर पर विधायक) नैतिकता, आचरण, जनहित की चर्चा, आदि की दृष्टि से क्या उन सांसदों से बेहतर सिद्ध हो रहे हैं जो संसद के आरंभिक दौर में उसके सदस्य बने । आम जन से जो सम्मान सांसदों को तब प्राप्त था क्या उसके बराबर सम्मान आज के सांसदों को मिल रहा है? लोकतंत्र की सफलता तो तभी मानी जानी चाहिए, जब संसद बेहतर और बेहतर नजर आने के लिए प्रयत्नशील हो । क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः क्या संसद में होने वाली बहसों का स्तर पहले की तुलना में बेहतर हुआ है? क्या सांसद हर बात पर हंगामा खड़ा करने के बजाय धैर्यपूर्वक सार्थक चर्चा में भाग लेते हैं, और अपने बातों के प्रति अन्य को सहमत करने के प्रयास करते हैं? क्या वे संसद के भीतर बहुमत को समझते हैं और उसका सम्मान करते हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः संसद/विधानसभाओं में आपराधिक छवि एवं वैसी मानसिकता के सदस्यों की संख्या समय के साथ घटी है क्या? हमारे सांसद जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हैं क्या? अपनी सामूहिक छबि के प्रति क्या वे जागरूक दिखाई देते हैं क्या? अपनी ही संसद के बनाए कानूनों का वे सभी सम्मान करते हैं क्या?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनैतिक दलों में क्या आंतरिेक लोकतंत्र है? कांग्रेस पार्टी अपने 126 साल पुराने इतिहास पर गर्व करती है, किंतु वह भूल जाती है कि उसका चरित्र पिछले 4-5 दशकों में पूरी तरह बदल चुका है । अब यह पूरी तरह गांधी-नेहरु परिवार पर केंद्रित है । उसमें कभी मतभेदों के लिए जगह हुआ करती थी, किंतु आज मुुखिया ने जो कह दिया वह सबके लिए वेदवाक्य बन जाता है । पिछले 4 दशकों में जिन दलों ने जन्म लिया वे अब किसी न किसी नेता की ‘प्राइवेट कंपनी’ बन कर रह गए हैं । उनमें मुखिया की बात शिरोधार्य करना कर्तव्य समझा जाता है । चाहे डीएमके हो या एआइएडीएमके या त्रृृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, नैशनल कांफरेंस, बसपा, सपा, राजद आदि आदि, सब इसी रोग के शिकार हैं । जो दल आंतरिक लोकतंत्र से परहेज रखते हैं उनसे सफल लोकतंत्र की उम्मींद नहीं की जा सकती है । क्या मेरी बातें गलत हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधि संसद/विधानसभाओं में अपने-अपने दलों की नीतियों का समर्थन करते हैं न कि लोगों की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिनकी नुमाइंदगी का वे दावा करते हैं । वे दल द्वारा जारी ‘ह्विप’ के अधीन कार्य करते हैं न कि अपने मतदाताओं के मत के अनुसार । लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि को यह विवशता नहीं होनी चाहिए कि दल की नीति का वह समर्थन करे ही भले उसे वह नीति अनुचित लगे । क्या मैं अनुचित कह रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधियों के संसद में उपस्थित रहने और कार्यवाही में सक्रिय तथा सार्थक भागीदारी निभाने की मौजूदा तस्वीर संसद के आरंभिक दिनों की अपेक्षा बेहतर कही जा सकती है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे दायित्वों के प्रति ईमानदार, समय पर कार्य निष्पादित करने वाली, और जनता के प्रति संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करें । अलावा इसके वे भ्रष्ट, लापरवाह, कार्य टालने वाले प्रशासनिक कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक/दंडात्मक कार्यवाही करें । लेकिन हम पाते हैं कि प्रशासन में भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ता जा रहा है । इस संदर्भ में सरकारें चलाने वाले सांसदों का रवैया क्या संतोषप्रद रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे सांसदों ने कानून तो बहुत बनाए हैं? किंतु क्या उन्होंने कभी इस बात की चिंता की है कि उनका ठीक से पालन नहीं हो रहा है? त्वरित कानूनी कार्यवाही की व्यवस्था क्या बीते 60 सालों में की गयी है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः इस देश में पुलिस बल सत्तासीन राजनेताओं के इशारे पर उनकी असफलताओं के विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर डंडा चलाने का काम करती है । उनकी कार्यप्रणाली ब्रिटिश राज से भी बदतर है और उनके नियम-कानून आज भी अंग्रेजी काल के हैं । आम आदमी पुलिस बल को खौफ के नजरिये से देखता है, उसे एक मित्र संस्था के रूप में नहीं । पुलिस की छबि सुधारने के लिए सांसदों/विधायकों ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं । तब भी लोकतंत्र को सफल माना जाए?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे राजनेता सत्ता पाने और उस पर चिपके रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति करते आ रहे हैं । वे जनता की भावनाओं को उभाड़ने के लिए बेतुके और गैरजरूरी मुद्दे उठाने से नहीं हिचकते हैं । संसद में उठा ‘कार्टून’ मुद्दा इसका ताजा उदाहरण है । वे जनभावनाओं के ‘आहत’ होने की बात करते हैं, भले ही जनता को मुद्दे की जानकारी ही न हो और वह उसे तवज्जू ही न दे । ऐसा लगता है कि वे “तुम्हें आहत होना चाहिए” का संदेश फैलाकर जनभावनाओं का शोषण करते हैं और अपना वोट बैंक मजबूत करते हैं । क्या मैं गलत कर रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः आम जनता में राजनेताओं की साख गिरी है इस बात की ओर वे स्वयं यदाकदा इशारा कर जाते हैं । कौन है जिम्मेदार? गिरती हुई साख क्या सफल लोकतंत्र का संकेतक है?
उत्तरः नहीं ।

निष्कर्ष

मेरे जेहन में अभी ये सवाल उठे हैं । ऐसे तमाम अन्य सवाल पूछे जा सकते हैं, और जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जा सकता है । कुल मिलाकर मैं भारतीय लोकतंत्र को सफल नहीं कहूंगा, क्योंकि यह जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है । अवश्य ही यह ध्वस्त नहीं हो रहा है । इस बात का श्रेय जनता को जाता है जो धैर्यवान है और लोकतंत्र में आस्था रखती है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी

दो-तीन रोज पहले संविधान-लेखन से संबंधित नेहरू-आंबेदकर को लेकर तत्कालीन विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा 1949 में अंकित एक कार्टून बना हंगामा खड़ा किया था । यह कार्टून एनसीआरटी की 11-12वीं की पुस्तक में शामिल है । और यही विवाद का विषय था । अधिक जानकारी के लिए देखें ‘डेलीन्यूज’ अथवा ‘बीबीसी’, और ‘कार्टून-अकैडेमी’ । मेरी जानकारी में कार्टून यह हैः

अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

आज देश को स्वाधीन हुए 64 साल हो रहे हैं । इस मौके पर कुछ लोग – मेरा खयाल है कि बहुत नहीं – उत्साहित हो रहे होंगे, उमंग में होंगे, प्रगति करते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहे राष्ट्र का सपना देख रहे होंगे, इत्यादि । मैं सोचता हूं कि कदाचित् अधिकांश जनों की नजर में यह दिवस औपचारिकता में मनाए जाने वाला दिन हो चुका होगा । और मेरे जैसे कुछ गिने-चुने जनों – जिन्हें आप भ्रमित या सनकी मानने में देरी नहीं करेंगे – की दृष्टि में यह अपनी सार्थकता खो चुका दिवस बनकर रह गया है । मुझे इस दिन कुछ भी नया नजर नहीं आता । कुछ ऐसा नहीं देख पाता हूं जो मुझे आशान्वित कर सके । सोचने लगता हूं कि क्या यह देश ऐसे ही चलता रहेगा ?

देश को आजाद हुए इतना समय बीत चुका है, जिसमें दो पीढ़ियां पैदा हो चुकी हैं । जिन्होंने देश को आजादी पाते देखा था उनमें से कई अब इस धरती पर नहीं रहे, और जो अभी हैं उनके अपने भविष्य के लिए इस आजादी के सार्थकता समाप्तप्राय मानी जा सकती है । स्वाधीनता की अर्थवत्ता तो उनके लिए है जिन्हें जिंदगी का सफर अभी तय करना है । क्या वे उस भारत को देख पाएंगे जिसका सपना उन लोगों ने देखा था, जिन्होंने छोटी-छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी तक कुर्बानियां दी थीं ? मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती । पिछले करीब चार दशकों से मैं इस देश के लोकतंत्र को देख रहा हूं, और इसकी गुणवत्ता में लगातार आ रही गिरावट को अनुभव करता आ रहा हूं । आज की तस्वीर वह नहीं है जिसे स्वाधीनता-संग्रामियों ने 1947 में अपने-अपने जेहन में संजोयी थी ।

कुछ लोग विभिन्न क्षेत्रों में देश की प्रगति की चर्चा करते हुए जरूर संतोष जताएंगे । वे लोग मेरे जैसे ‘वैचारिक अल्पसंख्यकों’ की सोच को बेतुकी, बेमानी, हास्यास्पद और निराधार इत्यादि कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे । वे कहेंगे कि देश ने न्यूक्लियर टेक्नालाजी (नाभिकीय तकनीकी) में महारत हासिल करके दुनिया को अपनी क्षमता दिखा दी है । उसने अपनी स्वयं की संचार सैटेलाइट एवं राकेट तकनीकी विकसित कर डाले हैं । देश अपने द्वारा विकसित मिसाइलों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हो रहा है । और इन बातों के आगे जाकर, 8-9 फीसदी आर्थिक विकास दर से बढ़ते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहा है । इस प्रकार तमाम दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए देश की स्वाधीनता एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता सिद्ध करेंगे ।

निःसंदेह इस प्रकार की उपलब्धियों का अपना महत्त्व है, जिसे मैं अस्वीकार नहीं करता । किंतु ये स्वतंत्रता की सार्थकता एवं लोकतंत्र की सफलता के आकलन के लिए उपयुक्त मापदंड नहीं माने जा सकते । स्वाधीनता संग्रामियों ने इस विचार के साथ संधर्ष नहीं किया था कि एक दिन देश सफल पोखरन विस्फोट कर पाएगा, या अग्नि मिसाइल विकसित करके अपनी क्षमता दिखा पाएगा, या चंद्रमा पर चंद्रयान उतारने में सफलता प्राप्त कर लेगा, इत्यादि । अगर देश आजाद न हुआ होता तो भी ऐसी चीजें शायद इस देश में हो जातीं, क्योंकि अंग्रेजों के लिए यह विशाल देश ऐसे वैज्ञानिक तंत्रों के विकास के लिए उपयुक्त भूक्षेत्र होता । वे अपनी सामरिक एवं संचार संबंधी आवश्यकताओं के लिए ऐसा कदाचित् करते ही, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने रेल पटरियों का जाल देश में विछाया, टेलीफोन एवं तारघरों की स्थापना की, विद्युत् आपूर्ति आंरभ की । इन सबकी शुरुआत स्वतंत्र भारत में नहीं हुई; हमने जो विरासत में पाया उसे आगे बढ़ाया । इस प्रकार के विकास कार्य विदेशी शासक भी अपने हित-साधन में अवश्य करते यह मेरी समझ कहती है । ऐसा होता या न इस बात की अहमियत उतनी नहीं जितनी वे बातें जिनका मैं जिक्र करने जा रहा हूं ।

याद रहे स्वाधीनता संघर्ष का मूल लक्ष्य था ऐसी शासकीय व्यवस्था स्थापित करना जो पूर्णतः देशवासियों के हाथ में हो, जिस पर हमारे देशवासियों का नियंत्रण हो, जो जनाकांक्षाओं के अनुरूप होतत्कालीन जननेताओं का सपना था ऐसे भारत का निर्माण करना, जहां लोगों के बीच समानता हो, लोग शिक्षित हों, जाति, धर्म एवं क्षेत्र के नाम पर सामाजिक भेदभाव न हो, न्यायिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त हो ताकि न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़े, भ्रष्टाचार न हो, राजनीति में पारदर्शिता और शुचिता हो, चिकित्सा सेवा निर्धनों को भी मिल सके, आर्थिक विषमता न्यूनतम हो, और जहां सरकारें जरूरतमंदों पर सबसे अधिक ध्यान दे । इस प्रकार के अनेकों बिंदु गिनाए जा सकते हैं जिनके आधार पर शासकीय व्यवस्था की सफलता का आकलन किया जाना चाहिए । ये वे बिंदु हैं जिनकी अहमियत आम आदमी की जिंदगी में हर क्षण बनी रहती है । चंद्रयान जैसे अभियानों से आम आदमी की जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता है ।

अवश्य ही किसी राष्ट्र के पुनर्निमाण के लिए 64 वर्ष का समय बहुत नहीं है । किंतु यह इतना समय तो है ही कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व सही दिशा में आगे वढ़ रहा है इस बात के प्रति देशवासी आश्वस्त हो पायें । क्या आज के हालात बेहतर कल का विश्वास दिला पा रहे हैं ? यह देश दो भागों में – इंडिया एवं भारत – में बंट चुका है इसे अब खुलकर कहा जाने लगा है । क्यों ? क्या देश में राजनीति में साफ-सुथरे छवि वाले नेताओं की संख्या घट नहीं रही है, और उसमें आपराधिक छवि के लोगों की संख्या क्या लगातार नहीं बढ़ रही है ? क्या जातीय, धार्मिक एवं क्षेत्रीय आधार पर लोगों को बांटकर अपने-अपने वोटबैंक बनाने की प्रवृत्ति घटने के बजाय बढ़ नही रही है ? क्या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार दिन-ब-दिन बढता नहीं जा रहा है ? क्या पुलिस बल लोगों की सहायक संस्था बनने के बजाय सत्तासीन राजनेताओं के हाथ में दमन का हथियार नहीं बन रहा है ? किसी ने सरकारी नीतियों एवं कार्यशैली का विरोध किया नहीं कि उस पर पुलिस का डंडा चल जाता है ! क्या सरकारी शिक्षा-संस्थानों की व्यवस्था चरमरा नहीं रही है, और उनकी जगह ‘प्राइवेट’ संस्थानों ने नहीं ले ली है, जो केवल पैसे वालों को शिक्षा देने और धनोपार्जन करने में विश्वास करती हैं ? क्या चिकित्सा व्यवस्था भी निजी व्यवसाय नहीं बन चका है, जिसका लाभ केवल राजनेताओं, सरकारी कर्मचारियों एवं अमीरों को मिल सकता है किंतु आम आदमी को नहीं ? उसके लिए जो अस्पताल हैं उनके हाल छिपे नहीं है ।

ये तो सवालों की बानगी है, असल में इस प्रकार के अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं और उनका उत्तर मुझे नकारात्मक और बेचैन करने वाला ही मिलता है । अगर आपको ऐसा कुछ भी नहीं लगता है, और चारों ओर अच्छा ही अच्छा नजर आता है तो मैं आपको भाग्यशाली मानता हूं । काश कि मेरी ‘वैचारिक दृष्टि’ इतनी धुंधली हो पाती कि हकीकत नजर न आ सके !

यह कैसा लोकतंत्र है इस पर गौर करिए । हमारे जनप्रतिनिधियों की विकृत सोच क्या है यह बताता हूं । कांग्रेस के नेता तो अब खुलकर कहते हैं कि आम आदमी का सोचने का अधिकार उसके वोट डालने तक ही सीमित है । उसके बाद उसकी सोच 5 साल तक जनप्रतिनिधि के हाथ गिरवी हो जाती है । क्या सही है और क्या गलत, क्या होना चाहिए और क्या नहीं, कैसे कानून बनने चाहिए और कैसे नहीं इन बातों पर अपनी राय देने का उसे अधिकार नहीं है; उसके विचारों की कोई अहमियत नहीं है । केवल प्रनिनिधि ही सोचने का अधिकार रखता है, और उसे भी अपने दल की विचारधारा के अनुसार ही मत व्यक्त करने का अधिकार है । उनके अनुसार हमारा संविधान कहता है (?) कि चुन लिए जाने के बाद समस्त अधिकार जनप्रतिनिधि को मिल जाते हैं और आम आदमी न मत व्यक्त कर सकता है न उसको लेकर विरोध प्रकट कर सकता है । सत्तासीन दल जो कहेगा उसे ही आम आदमी को अपनी राय समझनी होगी । कुल मिलाकर उसके विचारों का अपने लोकतंत्र कोई स्थान नहीं है । क्या लोकतंत्र की इसी परिभाषा प्रतिष्ठापित करने के लिए स्वाधीनता हासिल की गयी थी ?

सोचें और तनिक अपने वैचारिक ‘कोकून’ से बाहर निकलकर भी देखें । वंदे मातरम् । – योगेन्द्र जोशी