क्या यीशु मसीह (Jesus Christ) का जन्म २५ दिसंबर को हुआ था? शायद नहीं!

आज क्रिसमस का पर्व है, 25 दिसंबर, जिसे ईसाई समुदाय के लोग यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर मनाते हैं।

     इस अवसर पर मैं सर्वप्रथम देशवासियों को, विशेष तौर पर अपने ईसाई बंधुओं को, बधाई एवं शुभेच्छाएं देना चाहता हूं।

विषय का आरंभ करने से पहले मैं यह बाताना चाहूंगा कि ईसाई धर्म जिस व्यक्ति के विचारधारा पर आधारित है उसका असल नाम यीशु (Jesus)  है। मेरा खयाल है कि यह नाम हेब्रू (Hebrew, इज़्राइलवासियों की भाषा, जिसमें यहूदियों के धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं) के उच्चारण के अनुरूप है। ध्यान दें कि यूरोप की भाषाओं में लैटिन (Latin) अल्फाबेट J का उच्चारण अंग्रेजी के अनुरूप (यानी ) हो यह आवश्यक नहीं, जैसे जर्मन भाषा में)। ग्रीक (यूनानी) मूल के शब्द क्राइस्ट (Christ) का शब्दिक अर्थ होता है मसीह/मसीहा। यह विशेष उपाधि के तौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो सामन्य से कहीं ऊपर उठ चुका हो और जिसे “बचाने वाला” कहा जाये। यीशू को लोगों ने मानवता को बचाने वाले के तौर पर देखा और उन्हें मसीह का दर्जा दे दिया।

मैं सुनता आया हूं कि यीशु मसीह का असली जन्मदिन वस्तुतः किसी को भी ठीक-ठीक नहीं मालूम है। इस विषय पर विस्तार से बहुत कुछ लिखा-कहा गया है। मुझे इस बारे में “Live Science” नाम की ई-पत्रिका का एक लेख पढ़ने को मिला है –

 http://www.livescience.com/42976-when-was-jesus-born.html

मैं उसी के आधार पर अधोलिखित बातें लिख रहा हूं।

लेख कहता है कि रोमन कैथोलिक चर्च ने काफी सोच-विचार के बाद 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर चुना था। दरअसल प्राचीन काल में जब ईसाई धर्म रोम तक पहुंचा तो धर्मप्रवर्तकों ने संघर्ष का रास्ता न चुन कर रोमन जनता को मिलमिलाप से अपने धर्म की ओर खींचना ठीक समझ। रोमन लोग (तथाकथित पैगन Pagans)  उस काल में अपने शनि देवता (Deity Saturn) के नाम पर सैटर्नालिया (Saturnalia) नाम के त्योहार को उत्तरायण (winter solstice) के मौके पर मनाते थे। धर्मप्रवर्तकों ने इसे यीशु के जन्मदिन के नाम पर मनाना आरंभ कर दिया ताकि वहां की परंपरा और ईसाई मान्यता में तालमेल बैठ सके। (अन्यथा ईसाई धर्म में शनि देवता की कोई मान्यता नहीं।) 25 दिसंबर चुनने के अन्य कारण भी कदाचित रहे होंगे।

कोई नहीं जानता कि यीशु क जन्म किस शताब्दी और तारीख पर हुआ था। विषय के जानकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ का मानना है कि उनका जन्म 6 से 4 बीसी (BC = before Christ) में हुआ होगा। बाइबिल की एक कथानुसार तब यूडिया (Judea ) के शासक हैरॉड (Herod) को यीशु के बेथलेहम (Bethlehem) में अपने शत्रु के रूप में पैदा होने का अंदेशा था, इसलिए उसने उस स्थान के आसपास के उस काल में पैदा हुए सभी बच्चों को मरवा डाला। (बेथलेहम यूडिया के अंदर स्थित था।) चूंकि हैरॉड स्वयं 4 बीसी में दिवंगत हो गया, अतः कथानुसार ईशु का जन्म 4 बीसी या पहले हुआ होगा, न कि शून्य बीसी में।

लेकिन इतिहासज्ञ उक्त कथा को सही नहीं मानते।

यीशु के जन्म के संदर्भ में कथा प्रचलित है कि उस समय एक नक्षत्र (बेथलेहम नक्षत्र Star of Bethlehem) आकाश मे दिखाई दिया था। लंदन की रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोशाइटी (Royal Astronomical Society) के खगोलविद कॉलिन हम्फ़्रीज़ (Colin Humphreys) का दावा है कि उक्त तारा वस्तुतः अतिमंद गति से चल रहा एक धूमकेतु रहा होगा जिसका उल्लेख चीनी खगोलविदों ने 5 बीसी में देखा था। अतः जन्मवर्ष 5 बीसी हो सकता है।

अन्य खगोलविद डेव रेनके (Dave Reneke) के अनुसार यीशु का जन्म 2 बीसी (जून 17) में हुआ होगा शुक्र तथा वृहस्पति ग्रह साथ आ गये होंगे और दोनों ने मिलकर तेज रोशनी के तारे का भ्रम पैदा किया होगा। रेनके ने कंप्यूटर माडल के आधार पर यह बात कही है।

दूसरे खगोलविदों के अनुसार इस प्रकार की घटना 7 बीसी (अक्टूबर माह) में हुई थी जब वृहस्पति एवं शनि ग्रह ने साथ-साथ आकर तेज प्रकाश के तारे का भ्रम पैदा किया।

धर्मवेत्तओं के अनुसार यीशु का जन्म वसंत ऋतु में हुआ था। बाइबिल की कथा के अनुसार यीशु के जन्म के समय गड़रिये अपनी भेड़ों को घास के मैदानों में चरा रहे थे। यह घटना जाड़ों में नहीं हो सकती है। – योगेन्द्र जोशी

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – असुरक्षा की सार्वत्रिक भावना

(नवंबर २० की पोस्ट के आगे) वस्तुतः तथाकथित धर्मरक्षकों की चिंता धर्म को परिभाषित करने और उसमें जनसमुदाय को संलग्न होने की प्रेरणा देना नहीं है । जो मैं देखता आ रहा हूं उसके अनुसार धर्म अपना असली अर्थ खोकर एक सामुदायिक पहचान भर बन के रह गया है । जैसे किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता उसकी पहचान बनती है, ठीक वैसे ही धर्म भी मानव समाज में एक वृहत् समुदाय का सदस्य होने की पहचान प्रदान करता है । कभी पहनावा तो कभी नाम और कभी ‘धार्मिक’ कर्मकांड हमें सामूहिक पहचान प्रदान करते हैं । दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर सिर पर पगड़ी धारण कर ली तो सिख हो गये और बिना मूंछ के दाढ़ी बढ़ाकर सिर पर विशिष्ट टोपी पहन ली या बुरका ओड़ लिया तो मुस्लिम हो गये । माथे पर तिलक या बिंदी लगाकर मंदिर प्रसाद चढ़ाने पर हिंदू कहलाने लगे अन्यथा हर ‘संडे’ चर्च में ‘सर्मन’ सुनने चले या गले में क्रास धारण कर लिया तो इसाई । कुछ इसी प्रकार के प्रतीक हमारे हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि होने की पहचान बनाते हैं । बस । हमारा आचरण क्या है यह माने नहीं रखता है । वास्तव में सामूहिक पहचान के कई आधार हम अपनाते हैं । कभी जाति में, तो कभी क्षेत्रीयता में, और कभी भाषा में अपनी पहचान खोजते हैं । शेष के लिए क्लिक करें >>

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – क्या अर्थ है धर्म का?

(नवंबर 2 की पोस्ट के आगे) करीब दो सप्ताह पहले मैंने ‘विहिप’ के ‘फरमान’, (उसे आप आदेश, अनुरोध, सलाह, प्रस्ताव आदि जो ठीक समझें कह सकते हैं) का जिक्र किया था । विहिप ने कहा था कि हिंदू कुछ समय में अल्पसंख्यक हो जायेंगे, अतः उन्हें अधिक बच्चे पैदा करके अपनी जनसंख्या बढ़ानी चाहिये । वस्तुतः उनके दो बच्चे अपने लिए और दो ‘राष्ट्र’ के नाम होने चाहिए ।

समाचार पढ़ने पर मेरे मन में अनेकों सवाल उठने लगे । मुझे उनका समुचित उत्तर मिल नहीं पा रहा था । क्या विहिप वाकई परेशान है ? क्या उसने सोच-समझ कर ही नारा दिया है ? अविश्वास का कारण मुझे नहीं दिखा, इसलिए वे सवाल मुझे परेशान करते रहे । आगे पढ़्ने के लिए क्लिक करें >>