“मेरा भारत महान्” – तथाकथित संत-महात्माओं के लिए उपजाऊ भूक्षेत्र

२५ अप्रैल २०१८. जोधपुर की एक निचली अदालत ने स्वघोषित “संत” आसाराम को उम्रकैद की सजा सुना दी।

आसाराम के हजारों अनुयायियों के लिए यह समाचार बेहद तकलीफदेह एवं अविश्वसनीय रहा है। उन्होंने आसाराम को दोषी मानने से ही इंकार कर दिया।

मेरा मन इस विषय पर बहुत कुछ कहने को हो रहा है। लेकिन बहुत कुछ नहीं लिख सकता। मन में आने वाले विचार स्वतःस्फूर्त एवं तीव्रगति के होते हैं, किंतु उन्हें शब्दों में बांधकर दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करना एक धीमी प्रक्रिया होती है खासकर मुझ जैसे अकुशल लेखक के लिए।

अपने इस आलेख का आरंभ में महाभारत में वर्णित एक प्रकरण से करता हूं: उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है। युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उन्हें सलाह देते हैं कि उन्हें जनता के हित में राजकाज चलाना चाहिए। वार्तालाप के सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधुओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34

(यथोपर्युक्त)

पहले श्लोक के अनुसार अनेक जन गेरुआ वस्त्र धारण करके घूमते रहते हैं। वे लोग अनेक बंधनों से बंधे हुए मिथ्या ही दूसरों से दान पाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर रहे होते हैं।

यहां स्पष्ट कर दूं कि गेरुआ वस्त्र प्रतीक है उन तौर-तरीकों का जो ये लोग अपनाते हैं। वे तरह-तरह से पहन-ओढ़ कर और स्वांग रचते हुए असामान्य दिखने का प्रयास करते हैं ताकि आम जन उन्हें अलौकिक ज्ञान एवं सामर्थ्य के साधु-महात्मा-संत के तौर पर स्वीकारने लगें। अगले श्लोक में वस्तुस्थिति अधिक स्पष्ट है:

दूसरा श्लोक बताता है कि दूषित (काषाय) मन के साथ गेरुआ/केसरिया चोला पहनना स्वार्थसिद्धि का साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरमुंडों का मिथ्या  धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है।

दूषित मन यानी जिस में मैल हो, खोट हो, दूसरों को मूर्ख बनाने की लालसा हो।

मैंने संन्यास धर्म को लेकर चार लेखों की एक शृंखला २०१६ में लिखी थी अपने अन्य ब्लॉग में। उनमें ये बातें विस्तार से स्पष्ट की गई हैं।

ये बातें महाभारत काल की हैं। कदाचित् तब झूठ और फरेब का इतना बोलबाला नहीं रहा होगा। अधिकांश जन धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने से डरते होंगे। परंतु आज कलियुग है कलियुग ! धर्म के नाम पर ठगी आम बात हो चली है। लोगों के मन में पाप छिपा रहता है, लेकिन वे इस प्रकार व्यवहार करते है कि जैसे उन जैसा संत पुरुष मिलना मुश्किल है। और यही पर आज की कहानी शुरू होती है। अनेक प्रश्न मेरे मन में उठते हैं।

संत कहलाने का अधिकारी कौन?

प्रथम प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है कि संत-महात्मा कौन होते हैं। क्या वह व्यक्ति संत-महात्मा कहलाने का अधिकारी हो सकता है जो आम जनों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए अपना “आध्यात्मिक” साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं और भौतिक संसार के आधुनिकतम सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं? जरा याद करिए ४००-६०० वर्ष पूर्व के उन उपदेशकों को जिन्हें आज भी लोग संत-महात्मा के नाम पर स्मरण करते हैं और पूजते हैं। गुरु नानकजी, संत रविदासजी, संत कबीर आदि क्या थे? क्या उन्होंने आज के इन आध्यात्मिक “गुरुओं” की भांति अपनी जागीरें खड़ी की थीं? रविदासजी/रैदासजी जूते बनाते/मरम्मत करते थे। संत कबीरदासजी जुलाहे का कार्य करते थे। अपना कार्य वे सामान्य आदमी की तरह करते रहते थे और साथ ही ईश्वर-भक्ति एवं ज्ञान की बातें करते थे जो लोगों को प्रभावित करती थीं। उनका जीवन सरल एवं सादगी से भरा रहता था।

लेकिन आज के इन अध्यात्म के ठेकेदारों को देखिए कि कैसे ऐशोआराम की जिन्दगी जीते हैं, एकदम बेशर्मी के साथ।

विवेकशून्य लोगों का “बाबा-प्रेम”

दूसरा प्रश्न है कि वे क्या बातें हैं जिनके लिए लोग इन “बाबाओं” की शरण में पहुंचते हैं और खुद की सोचने-समझने की बुद्धि खो बैठते है। इसमें बिल्कुल भी संशय नहीं है कि इन बाबाओं को सम्मोहित करने की कला आती है। वे अपने हावभाव एवं भांति-भाति के नाटकीय व्यवहार से कइयों को आकर्षित करने में सफल होते हैं। लेकिन जनता यह क्यों नहीं समझ पाती जो व्यक्ति इस संसार के भोगविलास में लिप्त हो और स्वयं आध्यात्मिक मार्ग से भटक चुका हो दूसरों को कैसे आध्यात्मिक मार्ग दिखा सकता है? जो व्यक्ति पूरी बेशर्मी से स्वयं को भगवत्‍-अवतार घोषित किए बैठा हो कितना पुण्यात्मा होगा वह?

मुझे अक्सर आम लोगों की नादानी पर दुःख होता है और उन पर तरस भी आता है कि परमात्मा ने उनको इतनी सामान्य बुद्धि भी नहीं दे रखी है वे समझ सकें ऐसे ढोंगी बाबा स्वयं सुख भोगने के लिए उनकी मूर्खता का लाभ उठा रहे हैं। यों अपने समाज में दूसरों को तरह-तरह से मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं है। राजनेता सब्जबाग दिखाकर लोकतंत्र के नाम पर सत्तासुख भोगता है। कुछ लोग जनता के धन को माह-दोमाह में ही दूना-तिगुना करने का दावा करके लूटते हैं। प्रशासनिक तंत्र में जनता को लूटने का भ्रष्टाचार का खेल चलता ही है। बहुत से मौकों पर हम असहाय हो सकते हैं और कुछ कर न पायें। किंतु इन बाबाओं के चंगुल में फंसने की विवशता क्योंकर होती है?

स्त्रीजाति के प्रति विशेष लगाव?

तीसरी बात जो सर्वाधिक महत्व की है और जिस पर स्त्रीजाति को विशेष ध्यान देना चाहिए वह है कि अनेक मौकों पर स्त्री पुरुष के पतन का कारण बनती है। जासूसी क्षेत्र में यह सुविख्यात है कि पुरुषों को कर्तव्यच्युत करने के लिए स्त्रियों का भरपूर सहारा लिया जाता है। प्राचीन चिंतकों ने धर्मभ्रष्ट न हों इसके लिए पुरुषों को स्त्रियों के सान्निध्य से बचने की सलाह दी है। अनेक पौराणिक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं जिसमें पुरुषों का तप भंग करने के लिए स्त्रियों की मदद ली गई हो। मेरे कहने का तात्पर्य बहुत स्पष्ट है। ये बाबा इन तथ्यों को क्या जानते नहीं हैं? तो फिर क्यों स्त्री-अनुयायियों की फौज खड़ी करते हैं? और स्त्रियां स्वयं इन बातों को क्यों नहीं समझ पातीं? साफ जाहिर है कि इन बाबाओं के असल उद्येश्य ही यौन-सुख भोगना होता है और उनकी पूरी योजना ही उसी के लिए ढली रहती है। लेकिन दुःख तब होता है जब in अनुयायी-स्त्रियों में कुछएक स्वयं को अपने “भगवान्” बाबा भोगने के लिए समर्पित कर देती हैं और शेष बाबा को  निर्दोष कहने में देर नहीं करतीं। क्या यह नहीं समझ में आता है कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के २४ घंटों की चर्या पर नजर नहीं रख सकता? परोक्ष में कोई क्या कर रहा है कोई बता ही नहीं सकता। मां-बाप अपनी संतान के क्रियाकलापों के बारे में आश्वस्त नहीं हो सकते। पति-पत्नी भी एक दूसरे के चरित्र की गारंटी नही ले सकते। किसी के अपराधों का लेखा-जोखा रखना सामान्य व्यक्ति के लिए संभव ही नहीं। इसलिए किसी बाबा के निर्दोष होने का आश्वासन कोई अनुयायी भला कैसे दे सकता है? इस बात को याद रखना चाहिए।

राजनेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका

चौथी बात जिसका उल्लेख करना आवश्यक है वह है कि जब बाबा लोग अनुयायियों की ऐसी फौज खड़ी करते हैं जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र सोच रह ही नहीं जाती है तब चुनावों में इन बाबाओं की भूमिका अहम हो जाती है। यह गौर करने की बात है कि चुनावों के मौसम में राजनेता अथवा उनके दल के मुखिया का इन बाबाओं की शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि उनके समर्थकों के वोट पाए जा सकें। बाबाओं के प्रति राजनैतिक दलों का इस प्रकार का रवैया उनको स्थापित करने में मदद करता है। बाबाओं और राजनेता का ऐसा गठजोड़ दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में सत्ता कैसे हथियाई जाए यही सबसे महत्व की चीज बन चुकी है। यह देशहित में होगा क्या यह प्रश्न कोई भी स्वयं से नही पूछता।

जब बाबाओं से राजनेता उपकृत होते हैं तो बदले में बाबा भी उनसे बहुत कुछ पाने की अपेक्षा करते हैं। उनको सस्ते में जमीन दी जा सकती है ताकि आश्रम स्थापित हो सकें। उनके कुकर्मों पर शासन पर्दा डाल सके यह भी एक दुष्परिणाम होता है। इतना ही नहीं प्रशासनिक अधिकारी भी उनकी शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि वे बाबाओं के माध्यम से शासकों से प्रोन्नति में लाभ ले सकें अथवा मुंहमांगा कार्यस्थल पा सकें। इस प्रकार बाबाओं, राजनेताओं, एवं प्रशसनिक अधिकारियों का ऐसा गठजोड़ तैयार होता है जो देश के लिए घातक होता है। इस गठजोड़ के सभी घटक परस्पर एक-दूसरे को बचाते हैं। यही इस देश में होता आ रहा है।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि धर्म एवं अध्यात्म के नाम पर इतने बाबाओं का अवतरण इसी देश में क्यों हुआ है। अन्य देशों की स्थिति इतनी दयनीय नहीं है। आस्था के नाम पर अंधविश्वास हमारे समाज में जड़े जमा चुका है।

अंत में एक वाकये का जिक्र भी लगे हाथ कर लेता हूं।

अपने विश्वविद्यालय में मेरे एक सहकर्मी शिक्षक हुआ करते थे, लगभग मेरे हमउम्र। कुछ वर्षों पूर्व वे सेवानिवृत्त हो गये। (मैंने पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले थी।) वे जब कार्यरत थे तभी ओशो (आरंभ में भगवान्‍?) रजनीश के अनुयायी बन गए और कत्थई (maroon) रंग के वस्त्र पहनने लगे थे। वि.वि. में ये परिधान शायद नहीं पहनते होंगे। वे अपने “अध्यात्मिक” कार्यक्रमों में मुझे भी अक्सर आमंत्रित करते थे। बिल्कुल दिलचस्पी न होते हुए भी मैं कभी-कभार शिष्टाचार या सदाशयता के नाते उनके कार्यक्रमों में चला जाता था।

जब ओशो रजनीश का देहावसान हो गया और उनका सामाज्य विवादों में घिर गया तो वे हरियाणा के यमुनानगर के किसी “गुरु” की शरण में पहुंच गये। मुझे भी अनुयायी बनने के लिए प्रेरित करते रहते थे। मेरे घर पर अपने गुरु के गुणगान की पत्रिकाएं देते रहते थे। मैं पत्रिकाएं स्वीकार तो कर लेता था लेकिन पढ़ता नहीं था। (मैं किसी भी बाबा/गुरु को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता !) पिछले कुछ समय से उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई है। पता चला कि सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने गुरु के “पूर्णकालिक” भक्त हो गए। यह भी पता चला कि अपनी पेंशन भी गुरु को समर्पित कर दिए हैं। सुनने में आया कि उनकी पत्नी बेटे की शादी करने का अनुरोध करती रहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अब कोई दिलचस्पी नहीं। जिस पत्नी के साथ उन्होंने जीवन के ४०-४५ वर्ष बिताए उसकी भी उन्हें परवाह नहीं रही; बच्चों की बात छोड़िए।

यह घटना है वि.वि. स्तर के एक उच्चशिक्षित व्यक्ति के गुरु-शरण में जाने की, उस गुरु की जो स्वयं गार्हस्थ्य जीवन जी रहे हैं, दूसरों की कमाई के बल पर। जब ऐसा व्यक्ति भ्रमित हो सकता है तो आम आदमी कैसे बच सकता है? – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

Advertisements

रिओ ओलंपिक पदक एवं खजाने की लूट: अंधेर नगरी चौपट राजा

Opening Rio Olympics 2016

अगस्त 5 से 21, 2016, तक चले सत्रह-दिवसीय रियो ओलंपिक खेलों में आरंभिक 13-14 दिनों तक तो भारतीय दल का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उस दौरान मेरी पत्नी एवं मुझ सरीखे कुछ लोगों को लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि 118-सदस्यीय भारतीय खिलाड़ियों के दल को एक भी पदक न मिले। (इस बार का दल अपेक्षया बड़ा था 2012 के 83-सदस्यीय दल की तुलना में।)

(विभिन्न देशों द्वारा प्राप्त पदकों की तालिका लेख के अंत में दी गयी है।)

दो पदकों पर जश्न

खैर देशवासियों की किस्मत अच्छी रही कि पहला पदक महिला कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक पाने में कामयाब रहीं। देश की जनता इस उपलब्धि पर इतनी खुश हुई कि जैसे ओलंपिक के सभी पदक देश की झोली में आ गये हों। लोग तुरंत जश्न मनाने में जुट गये। हरियाणा सरकार ने बिना देर किये साक्षी को 2.50 करोड़ का पुरस्कार भी दे डाला। भारतीय रेलवे ने भी समय गंवाये बिना 50/60 लाख के इनाम की घोषणा कर डाली और साथ में नौकरी में पदोन्नति भी। सुनने में आया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं अनूठे व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी ने भी दिल खोल के ईनाम देने का ऐलान कर दिया, एक करोड़ की राशि देने के वादे के साथ। (देखिए इकनॉमिक-टाइम्ज़ तथा इंडियन-एक्सप्रेस)

साक्षी की उपलब्धि पर देशवासी झूम ही रहे थे कि खबर आई कि बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधु प्रतिस्पर्धा के क्वार्टर-फ़ाइनल की बाधा पर करके सेमी-फ़ाइनल में पहुंच गयीं हैं। बाद में सेमी-फ़ाइनल की बाधा पार करके उन्होंने अपने नाम एक पदक  पक्का कर लिया। इसके बाद देशवासियों को उम्मींद होने लगी कि स्वर्ण पदक उनके नाम होना है। स्वर्ण पदक लिए भजन-पूजन, हवन-यज्ञ और दुआओं का दौर भे चल पड़ा ताकि उन टोटकों से पदक की गारंटी में शक ही न रहे। दुर्भाग्य कि इन टोटकों ने कोई कमाल नहीं दिखाया और जैसा कहा जाता है विश्व की खिलाड़ी नंबर एक के सामने वह कमजोर ही रहीं। कुछ भी हो रजत पदक को तो वह बटोर के ले ही आईं । खैर पदकों के लिए तरसते देश के लिए यह मरुभूमि में पानी पाने की खुशी से कम नहीं था।

कांस्य पदक विजेता को 2.50 करोड़ तो रजत पदक विजेता का “रेट” अधिक होना ही था। तेलंगाना सरकार ने 3 करोड़ तो कुछ ऐसी या कम राशि आन्ध्र सरकार ने भी उनकी झोली में डाल दिए। केजरीवाल जी क्यों पीछे रहते? उन्होंने भी दिल खोल के पुरस्कृत कर दिया। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार सिंधु को करीब 13 करोड़ की प्राप्ति हुई। समाचार है कि विज्ञापन कंपनियां उनसे अनुबंध के लिए कतार में खड़े हो चुके हैं।

इन दो खिलाड़ियों के लिए स्वागतार्थ समारोह और जलूस भी अपूर्व रहे। स्वागत में तो दीपा कर्माकर (जिमिनास्ट में चतुर्थ स्थान-प्राप्त) भी शामिल की गयीं यद्यपि उन पर खास धनवर्षा नहीं हुई।

पदक तालिका में इंडिया दैट इज़ भारत

उक्त रिओ ओलंपिक में भारत की स्थिति कितनी दयनीय रही इस हेतु मैंने उपलब्ध पदक-तालिका का अध्ययन किया और जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न देशों की स्थिति के लिये एक सूचकांक M/P = मेडल (पदक) संख्या प्रति लाख पोप्युलेशन (जनसंख्या) भी परिभाषित किया है। (देखिए तालिका लेख के अंत में।) तालिका में उन देशों के नाम नहीं हैं जिनको एक भी पदक नहीं मिला है।

गौरतलब है कि 6 स्वर्ण के साथ 11 पदक जीत कर 16वें क्रम पर स्थित जमैका (आबादी केवल 28 लाख) जैसे छोटे देश के लिए M/P = 0.3929 सर्वाधिक है। दरअसल छोटे देशों के लिए M/P अपेक्षया अधिक है। क्रम में 67वें स्थान पर भारत के लिए न्यूनतम, 0.0002 है। उसके ऊपर नाइजीरिया है M/P = 0.0005 के साथ। अन्य सभी देशों के लिए यह 0.0010 से अधिक है।

इस सूचकांक को मैं महत्वपूर्ण इसलिए मानता हूं क्योंकि सांख्यकीय सिद्धांतों के अनुसार मानव-कार्यकलाप के किसी भी क्षेत्र में दक्ष लोगों की संख्या आबादी के लगभग अनुपात में होगी ऐसी उम्मीद सामान्यतः की जाती है। इसे शब्दशः नहीं लिया जा सकता है किंतु बहुत बड़ी आबादी वाले देश में अधिक दक्ष लोग तो होने ही चाहिए। इसलिए भारत जैसा देश दो पदक भी मुश्किल से पा सका इसके निहितार्थ पर चिंतन तो होना ही चाहिए।

खजाने का दुरुपयोग

देश के नाम अधिक पदक नहीं आये इसका देशवासियों के लिए भावनात्मक महत्व है, किंतु इससे देश की व्यवस्था और खुशहाली पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। मुझे जिस बात पर घोर आपत्ति है वह है पदक-प्राप्त दोनों खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने के लिए सरकारों द्वारा राजकोष यानी खजाना लुटाना । अधोलिखित बातों पर जरा विचार करें।

(1) मुझे याद नहीं आता कि पहले कभी खिलाड़ियों पर रातोंरात करोंड़ों रुपये लुटाये गये हों। एक समय था जब देश में क्रिकेट बेहद लोकप्रिय था (आज भी है), लेकिन खेल के माध्यम से उसके खिलाड़ी लाखों नहीं कमा सके (तब लाख ही बहुत होता था)। उनमें से अधिकतर स्टेट बैंक या रेलवे में नौकरी करते थे। उस काल में विज्ञापनों की दुनिया इतनी चमकदार नहीं थी। लेकिन आज के समय में विज्ञापन-दाता कंपनियां दिल खोल कर पैसा खर्च कर रही हैं और अपने विज्ञापनों के लिए लब्धप्रतिष्ठ खिलाड़ियों और सिने-टीवी कर्मियों आदि के साथ करोड़ों का अनुबंध स्वीकरती हैं। अब ऐसे खिलाड़ियों को नौकरी नहीं करनी होती है। जहां तक मेरा अनुमान है सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन की करोड़ों की संपदा उनके व्यवसाय एवं विज्ञापनों से प्राप्त हुई है। ये दो नाम मात्र उदाहरण के लिए हैं, अन्यथा सूची तो लंबी होगी। सरकारी खजानों से उनको बहुत मिला हो मुझे नहीं लगता। जैसा पहले कहा है विज्ञापन-प्रदाता कंपनियां पदक-प्राप्त खिलाड़ियों से अनुबंध के लिए आतुर रहती हैं। अस्तु, चाहे पहले हो या आज, खिलाड़ियों पर सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाना उचित नहीं कहा जायेगा।

(2) मैं सोचता हूं कि 6 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 16 पदक जीतने वाले जमैका की सरकार ने खिलाड़ियों को कितने करोड़ों से नवाजा होगा? तुलना के लिए ध्यान रहे कि भारत की अनुमानित आबादी 130 करोड़ से ऊपर है और जमैका की मात्र 28 लाख। वहां की प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय है करीब 8000 डॉलर और भारत की करीब 5000 डॉलर।

(3) मेरे मन में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि कई अन्य देशों की तरह अपने यहां भी 15-16 खिलाड़ियों ने पदक जीता होता तो उनको सरकारी खजानों से कितना-कितना मिला होता? और हमारे विशिष्ठ व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी तब अपने खजाने से कितनों पर कितना लुटाते? ध्यान दें जिन दो पदक विजेताओं को उन्होंने करोड़ों से पुरस्कृत किया है उनका दिल्ली राज्य से सीधा संबंध नहीं। यह सवाल भी मेरे मन में उठता है कि क्या परिणाम होते यदि सभी राज्य सरकारें दिल खोलकर खजाना लुटाने चल देतीं? तब ये खिलाड़ी दो दिन में ही कितने करोड़ों के मालिक हो जाते?

(४) मेरी दृष्टि में सर्वाधिक आपत्तिजनक है राज्य के खजानों को लेकर सरकारों का रवैया। किसी जमाने में राजे-महाराजे राजकीय कोशों के मालिक होते थे। उनके लिए खजाना अपनी निजी संपत्ति होती थी। उसे जैसे चाहें वे खर्च करते थे। वे किसी पर खुश हो गये तो उसे गले का हार दे देते थे या खजांची को आदेश देते थे कि स्वर्ण मुद्राओं से उसे नवाजा जाये। क्या लोकतंत्र में शासन चलाने वाला जनप्रतिनिधि-मंडल अर्थात मंत्री-परिषद के साथ मुख्यमंत्री खजाने का मालिक होता है जिसे जैसे चाहे अपनी मरजी से खर्ज करे? अथवा वे राजकोष के रखवाले या संरक्षक होते हैं जिनसे अपेक्षा रहती है कि वे जनहित में उस कोष का इस्तेमाल करें – जनहित जो जनता की समझ में भी आवे? बिना किसी पूर्वनिर्धारित नियमों के जैसी मरजी हुई वैसे खजाना लुटा देने को भी जनहित कह देना न्यायसंगत कहा जायेगा क्या? जिन सरकारों ने खिलाड़ियों पर खुल कर खजाना लुटाया उन्होंने किन कायदे-कानूनों के तहत ये सब किया?

(4) मेरी आपत्ति और भी गंभीर हो जाती है जब ये सरकारें स्कूलों, अस्पतालों, की हालत सुधारने में धन खर्च नहीं करतीं, वेतन बचाने के चक्कर में खाली पड़े पदों को नहीं भरतीं, असंपन्न किसानों के छोटे-मोटे कर्जों को माफ़ करके उन्हें आत्महत्या से नहीं बचाती। सरकारी लापरवाही से हुए हादसों में परिवारों के कमाऊ सदस्य चल बसते हैं, सरकारें उनके लिए भी 2-3 लाख का मुवावजा बहुत समझती हैं। और खिलाड़ियों पर करोड़ों? वाह मेरे देश का लोकतंत्र! जरा सोचिए सफ़ाई कर्मियों को तनख्वाह देने में केजरीवाल जी जल्दी नहीं करते परंतु खिलाड़ियों पर धन लुटाने में उन्हें देर नहीं लगती।

(5) प्रबुद्ध जन इस तथ्य पर विचार करें कि विश्व का सर्वाधिक चर्चित पुरस्कार भी गत वर्ष केवल 6.5 करोड़ का था। वह भी स्वीडन की सरकार नहीं बल्कि आल्फ़्रेड नोबेल की दानराशि से स्वीडिश अकादमी देती है। मेरी जानकारी में किसी नोबेल पुरस्कार विजेता पर संबंधित देश की सरकार धनवर्षा नहीं करती। क्या हमारी कोई सरकार धनवर्षा करेगी यदि कोई नोबेल पुरस्कार जीते? इस पर भी गौर करें कि केंद्रीय सरकार का सबसे बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार भी केवल 25 लाख रुपये का है। प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार (साहित्य) मात्र 11 लाख रुपये का है। देश में बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार गैर-सरकारी संस्था इंफ़ोसिस साइंस फ़ाउन्डेशन देती है वह भी 55 लाख का है। तब सवाल उठता है कि क्या ओलंपिक पदक की अहमियत विज्ञान, साहित्य आदि की उपलब्धियों से बड़ी है?

अंधेर नगरी

ऐसी विकृत शासकीय व्यवस्था को भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी ने कभी “अंधेर नगरी चौपट राजा” के विशेषण से संबोधित किया था।

Olympic Medals Tally

असहिष्णुता पर निरर्थक बहस

अहिष्णुता मानव समाज के लिए कोई नयी बात नहीं है। यह तो मानव स्वभाव का अपरिहार्य हिस्सा रही है। कोई समाज और कोई काल नहीं रहा जब असहिष्णूता नहीं रही है। उसके स्वरूप और मात्रा में अवश्य ही उतार-चढ़ाव होते रहे हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों का जिक्र मिलता है जो उसी असहिष्णुता का द्योतक है। सभ्य समाज में इस पर काफी हद तक आत्मनियंत्रण रखते आये हैं लोग। फिर भी कुछ अपवाद बने गिने-चुने लोगों की दूसरे लोगों के प्रति घृणा असहिष्णुता के रूप में यदा-कदा प्रदर्शित हो ही जाती है। जिस देश में 120-25 करोड़ लोग रहते हों वहां ऐसे सिरफिरे हजारों में हों तो आश्चर्य नहीं।

इधर अहिष्णुता की बात जिस तरह की जा रही है वह हैरान करने वाली है, गोया कि उसमें अप्रत्याशित तौर पर इजाफा हो गया हो। कितनी नयी घटनाएं हो गयी हैं कि कहा जाये कि ऐसा अनर्थ पहले से नहीं होता आया है? बेमतलब की इस बहस में लोगों को कूदते देख मुझे समझ नहीं आता कि ये बुद्धिजीवी हैं या उधमी जन।

मुझे अब, इन दो-चार दिनों में, लगने लगा है कि मोदी – मेरी दृष्टि में बेचारे मोदी – को निशाना बना रहे हैं ये सब, मानो कि सब मोदी ही करवा रहा है। दोष देना ही है तो राज्य सरकारों को भी दोष क्यों नहीं देते जहां वारदातें होती हैं? गुजरात में हुई 2002 की घटना ने बेचारे मोदी को ऐसा बदनाम कर दिया कि अब वे ही हर असामाजिक घटना के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

ठीक है; पर मोदी से क्या उम्मीद कर रहे हैं ये लोग? साफ-साफ बतायें कि मोदी ऐसी बातों पर नियंत्रण कैसे करें? क्या वे रोज चीखते हुए कहें कि बस अब ये सब बंद करो? क्या आपराधिक सोच वाले को उपदेश देकर रोका जा सकता है? इस देश में तो ऐसे उपदेशकों की सदा से भरमार रही है, फिर भी क्या लोग सुधर पाये हैं?

आप अपराध कर चुके व्यक्ति को सजा दे सकते है, किंतु उस व्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं जो मन में अपराध का इरादा पाले बैठा हो – मंशा जो उजागर न हुई हो? क्या आप मानव-बम बनने को तैयार व्यक्ति को अपना इरादा छोड़ने को कह सकते हैं? इस देश से आईएसआईएस में शामिल होने गये युवाओं को अग्रिम तौर पर पहचान सके आप?

मुझे लगने लगा है कि कुछ बुद्धिजीवी मोदीफोबिया से ग्रस्त हैं और उन्हें केवल मोदी और उनकी टीम के लोगों में ही दोष दिखते हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक लेखक ने कह दिया था कि मोदी प्र.मं. बने तो वे देश छोड़ देंगे। दुराग्रह से पीड़ित व्यक्ति के बोल सहिष्णुता के द्योतक हैं क्या? क्या यह माना जाये कि वे सब विकृत सोच के लोग थे जिन्होंने मोदी को कुर्सी पर पहुंचाया, और यह कि केवल उक्त लेखक महोदय ऐसी विद्वता रखते थे कि किसी की योग्यता का आकलन केवल वही सही-सही कर सक्ते हैं? बाद में वे बोले कि वे भावुकतावश वह सब कह बैठे। क्या असहिष्णुता की जोर-शोर से की जा रही बात भी उसी भावुकता का द्योतक नहीं हो सकता? क्या जो बातें कही जा रही  हैं वे वस्तुनिष्ठ है या महज वैयक्तिक भावुकताजनित?

इन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि आये दिन देश में तमाम असामाजिक घटनाएं होती आ रही हैं। कही कोई किसी का कत्ल कर दे रहा है शत्रुतावश या लूटपाट या रंगदारी में, कहीं अपहरण की घटनाएं हो रही हैं, आये दिन स्त्रीजाति का दुष्कर्म हो रहा है, कहीं पुलिस ज्यादती में लोग प्राण खो रहे हैं, कहीं कोई दबंग कमजोर को दबा रहा है, राह चलते छोटी-मोटी बात पर ही लोगों की जान ले ली जा रही है, आदि-आदि। लेकिन ये सब घटनाएं उनको सह्य नजर आती हैं; किंतु दो-तीन अन्य अप्रिय घटनाएं हो गयीं तो देश असहिष्णु हो गया। कमाल करते हैं ये बुद्धिजीवी।

और समाचार माध्यमों का रवैया देखिए कि किसी घटना की चर्चा घंटों या दिनों तक होती है और किसी घटना का जिक्र तक नहीं होता है। लगता है कि वे चुन-चुन कर जनता के सामने पेश करते हैं घटनाओं को। ऐसी पत्रकारिता को निष्पक्ष कहें क्या? पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर तो पेड-न्यूज़ का आरोप भी लगता आया है। देश के सामने जो गंभीर समस्याएं हैं उन पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं ये लोग? पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर बहस हो रही है। यह विश्व के समक्ष गंभीर समस्या है। इस मुद्दे पर अच्छी-खासी कारगर बहस क्यों नहीं हो रही है? मुद्दे एक नहीं अनेक मिलेंगे, पर सनसनीखेज समाचार नहीं बनेंगे। मीडिया उनमें दिलचस्पी नहीं लेता है।

जब कोई बात हिन्दुओं की मान्यताओं के विरुद्ध की जाये तो उसे चुपचाप सुन लिया जाना चाहिए ऐसा सहिष्णुता के पक्षधर मानते हैं; किंतु जब अन्य धर्मावलंबियों के मान्यताओं के विरुद्ध हो तो उसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।

देश के सामने अनेकों गंभीर समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं, यथा अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, करोड़ों लोगों की गरीबी, 45-50% बच्चों का कुपोषण, बदहाल सरकारी स्कूल, अस्पताल जहां गरीबों को इलाज नसीब नहीं होता, आदि-आदि। बुद्धिजीवियों को इन पर बहस करनी चाहिए और उसके लिए अभियान छेड़ना चाहिए। किंतु उनका पेट तो भरा रहता है। उन्हें इन समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता है, उनके काम तो हो ही जाते हैं। उनकी समस्या केवल असुरक्षा है जिसका सामना उन्हें करना पड़ सकता है। लगता है कि मामला निहित स्वार्थ से प्रेरित है।

कुछ भी हो वे बतायें कि अगर वे मोदी की जगह होते तो कौन-सा जादुई डंडा घुमाते कि सर्वत्र सहिष्णुता का राज हो जाता? अच्छा होगा कि वे उस रास्ते की सलाह मोदी को दें जिसे वे खुद अपनाते। सुस्पष्ट कार्ययोजना की प्रस्तुति होनी चाहिए। कोई अपराध न कर सके यह कैसे हो यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए । महज ये नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए जैसी बातों से काम नहीं चलेगा। – योगेन्द्र जोशी

Tags:

शौचालय पहले या देवालय? बात-बात पर धर्म/संस्कृति के नाम पर आाहत होना

          अभी चंद रोज पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने एक बयान देकर हिन्दुओं को धार्मिक रूप से “आहत” कर दियाइससे पहले कांग्रेसी नेता एवं मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसा ही बयान दिया था । बहुत से लोग तब भी नाखुश हुए थे । लेकिन इस बार मामला कुछ लोगों को अधिक गंभीर लगा, क्योंकि मोदी कथित तौर पर कट्टर हिन्दूवादी नेता की छवि रखते हैं, अतः उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी । लोग भूल जाते हैं कि तरह-तरह के कभी शिष्ट तो कभी अशिष्ट बयान तो राजनेता देते ही रहते हैं । उनकी जबान पर इस स्वतंत्र “इंडिया दैट इज भारत” राष्ट्र में कोई रोक नहीं है । दरअसल कुछ और चीजें देश की जनता को मिले या न जो मुख में जो आया उसे बक देने की स्वतंत्रता तो सबको मिली ही है । क्यों न कोई इसका फायदा उठाए ? आम आदमी – मेरा मतलब “आप” पार्टी के सदस्य से नहीं है – कुछ कहे तो मीडिया उसे जनजन तक नहीं पहुंचाएगा, परंतु मोदी सरीखा व्यक्ति कुछ कहे और उसकी चर्चा न हो यह असंभव ही है ।

मोदी का बयान ठीक था या अनुचित यह कह पाना कठिन है, क्योंकि हम सब इन चीजों को अपने-अपने नजरिये से देखते हैं और “मेरे विचार ही सही हैं” का भाव रखते हैं । व्यक्तिगत तौर पर मुझे आपत्ति की कोई बात नहीं लगती, जिसके कारण हैं । लेकिन मोदी के कथित धुरविरोधी तोगड़िया बेहद नाखुश हैं । देखें बीबीसी समाचार

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_indiabol_ss.shtml

खबर है कि इस सिलसिले में “मानवाधिकार पार्टी” के प्रवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, वाराणसी, की अदालत में याचिका दाखिल कर रखी है, जिसकी सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

(देखें http://khabar.ibnlive.in.com/news/109403/12)

मेरी समझ में नहीं आता कि अपने देशवासी (हिंदू हों या मुस्लिम, सिख, इसाई, आदि) बात-बात पर “हमारी धार्मिक भावना आहत हुई है” का हल्ला मचाना क्यों शुरू कर देते हैं । अदालतें भी ऐसे वाद को बहस के लिए कैसे स्वीकार लेती हैं, यह जानते हुए कि अंततः कुछ निकलना नहीं है, सिवाय न्यायाधीश के समय की बरवादी के ? इतना ही नहीं मोदी के कथन के संदर्भ में कैसे कोई दावा कर सकता है कि सभी हिंदू आहत हुए हैं ? मैं भी एक हिंदू हूं और मैं मोदी का समर्थक न होते हुए भी उसके उक्त वक्तव्य का समर्थन करता हूं । दरअसल जिन दो-चार लोगों से मैंने पूछा किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की । सवाल उठता है कि जो व्यक्ति आपत्ति करता है वह कैसे पूरे हिंदू समुदाय (या किसी अन्य धार्मिक समुदाय) की भावनाओं का ठेका ले लेता है ?

हिंदू समाज की विशेषता यह है कि हम जहां-तहां मंदिर खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी लेते हैं । जो देवालय पहले से ही अस्तित्व में हैं क्या वे पर्याप्त नहीं हैं ? उससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि हम देवी-देवताओं को देवालयों में ही क्यों खोजते हैं ? जिन के घरों में पूजाघर हैं वे भी अपने घर में स्थापित देवी-देवताओं को देवालयों में क्यों खोजते हैं ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि लोग उसी देवता की महत्ता को अलग-अलग देवालयों में स्थापित होने पर अलग-अलग प्रकार से आंकते हैं ? लोगों को अक्सर कहते हुए सुनता हूं कि इस मंदिर के हनुमानजी यह मनोकामना पूरी करते हैं और उस मंदिर के हनुमानजी उस मनोकामना को, गोया कि हनुमानजी भी कई हों और वे अलग-अलग प्रकार से पेश आते हों । कहने का मतलब यह है कि देवी-देवतोओं की पूजा-अर्चना तो घर में भी उसी श्रद्धा से की जा सकती है जो देवालयों में संभव है । पुरातन मंदिरों का महत्व कुछ हद तक समझ में आता है, क्योंकि वे प्रायः पौराणिक कथाओं से संबद्ध होते हैं, जैसे शक्तिपीठों के देवी मंदिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि । लेकिन जो नित नये मंदिर स्थापित होते हैं उनके साथ तो ऐसी बात भी नहीं रहती ।

कहने का मतलब यह है कि देवालयों की वैसी आवश्यकता वस्तुतः नहीं है जैसी जनसुविधाओं एवं सामुदायिक संस्थाओं की यथा अस्पताल, स्कूल-कालेज एवं शौचालय । इनके संदर्भ में अपने देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है । कहा जाता है कि शौचालयों के मामले में तो अपना देश कुछ अविकसित देशों से भी पीछे है । और तब कोई यदि शौचालयों की वकालत करे तो क्या गलत करता है ? हाल के वर्षों में कितने देवालय बने हैं मैं कह नहीं सकता, किंतु बनते जरूर हैं और आगे भी बनेंगे यह सत्य है । आप दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देख लीजिए, कितना पुराना है ? कितना विशाल और भव्य है यह ? जितना खर्च इसे बनाने में लगा होगा उसमें न जाने कितनी जनसुविधाओं की व्यवस्था देश के कोने-कोने में संभव हो सकती थी । यह सही है कि यह स्वयं में पर्यटक-आकर्षण बन सकता है, किंतु यह जनसामान्य की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करता । और इसे फिलहाल तो धार्मिक आस्था वालों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है ।

यों तो उपसना स्थल अन्य धार्मिक समुदायों के भी बनते हैं, लेकिन वे जहां-जहां, जब-तब नहीं बनते रहते हैं । वे योजनावद्ध तरीके से, पर्याप्त आकार के, और स्थानीय सामुदायिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बनते हैं । लेकिन हिंदू मंदिर कब-कहां रातोरात खड़े कर दिये जाएंगे कहना मुश्किल है । कम से कम मैं अपने शहर बनारस में यही देखता आ रहा हूं । मैंने तो यह भी महसूस किया है कि कभी-कभी इन मंदिरों की आड़ में अतिक्रमण करने में भी किसी की आस्था आहत नहीं होती है । सड़क के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर रातोंरात एक मूर्ति रख दो, उस पर पुष्पादि चढ़ाना आंरभ कर दो, तो राह चलते अन्य जन भी फूलपत्र चढ़ाना शुरू कर देंगे । फिर उसे थोड़ा बढ़ा दो और उसके बगल में छोटा-मोटा कारोबार करना आरंभ कर दो, मंदिर को बीच-बीच में बढ़ाने का काम करो और साथ में अपना करोबार भी । इस प्रकार अतिक्रमण सफल हो जाता है । कुछ ऐसा घटित होते मैंने देखा है । इस बात को मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं:

हाल में अपने शहर वाराणसी में प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर सड़कों को चौढ़ी करने का सफल अभियान छेड़ा है । दिखावटी अभियान तो कई बार पहले भी छेड़े गए, किंतु वे कभी प्रभावी नहीं रहे । इस बार वाकई गंभीरता दिखी । उसी के परिणामस्वरूप यहां के करीब 500 मीटर के लंका-नरिया सड़क का नजारा ही बदल गया । पहले जो सड़क करीब 20-22 फुट चौड़ी थी अब करीब 35-40 फुट चौढ़ी हो गई है । मुझे इस शहर में रहते 40 वर्ष से अधिक हो चुके हैं । मैं उक्त सड़क के बारे में यही सोचता था कि शहर पुराने ढर्रे का है, इसलिए यहां के हिसाब से ये सड़क बनी ही ऐसी होगी । सोचा न था कि सड़क के किनारे के मकान-दुकान तो अतिक्रमण की देन हैं । अब जाना कि सड़क के एक सिरे से दूसरे तक लगभग 15 फुट चौढ़ी पट्टी अतिक्रमित थी । असली दिलचस्प पहलू तो यह है कि चौड़ीकरण के बाद अतिक्रमित भूमि पर बने 3-4 मंदिर भी खुले में – असल में अब नये बने डिवाइडर पर या उसके निकट – नजर आने लगे । मैं एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Mid-Road Temple-1

तस्वीर में दिखाए मंदिरनुमा ढांचे की सीध में पहले मिठाई की दुकान थी जो अब करीब 15 फुट पीछे चली गयी है । अब लगता है इस ढांचे में रखे शिवलिंग की कद्र भी करने वाला कोई नहीं । ये सभी कोई प्राचीन मंदिर नहीं हैं, बल्कि आस्था के नाम पर बनाये गये अवैधानिक ढांचे हैं । हमारी आस्था हमें अतिक्रमण से नहीं रोकती । आस्था के नाम पर प्रशासन भी इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करता ।

लोग चाहते हैं कि उनकी भावनाओं को अन्य जन ठेस न पहुचाएं । परंतु वे स्वयं दूसरों की भावनाओं की कद्र करना क्यों भूल जाते हैं ? वे क्यों इसे अपना अधिकार समझते हैं कि आस्था के नाम पर उन्हें हर चीज की छूट हो, भले ही उससे दूसरों को घोर असुविधा हो । मेरे शहर वाराणसी में धर्मकर्म के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन होते रहते हैं जिससे सड़कों पर जाम लगता है । कई मौकों पर सड़क घेरकर पूजा-पंडाल तन जाते हैं, दूसरों की परवाह किए बिना । सर्वाधिक आपत्तिजनक तो यह होता है कि लाउडस्पीकरों से शोर मचाया जाता है । मेरे घर के पास ही एक मंदिर है और उसी के सामने सड़क पार एक अस्पताल है । आये दिन मंदिर में कोई न कोई आयोजन होता है और उसके साथ लाउडस्पीकरों से कानफाड़ू शोर । सोचिए कि अस्पताल के मरीजों का क्या हाल होता होगा जहां शोर मचाना मनाही रहती है ।

आपत्तियां अनेकों हैं । हम श्रीगंगा नदी के प्रदूषण की चर्चा करते हैं और उसके नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद भी कर चुके हैं, लेकिन उसमें गंदगी गिराने से नहीं हिचकते हैं । उसमें अधजले शव तक बहा देते हैं । नवरात्र की दुर्गा-प्रतिमाएं विसर्जित तो की ही जाती हैं, अब शहर वाराणसी में कालीपूजा, सरस्वतीपूजा, गणेशपूजा, विश्वकर्मापूजा आदि अनेकों पूजाओं के नाम पर स्थापित प्रतिमाएं भी श्रीगंगा को समर्पित की जाती हैं । और यह सब होता है आस्था के नाम पर ।

आस्था के इन तमाम खेलों पर कोई आपत्ति उठाता है, या उस पर टिप्पणी करता है तो लोग आक्रोषित हो उठते हैं । देवालयों की आवश्यकता नहीं है, हमें आवश्यकता है शौचालयों की ऐसा कहने पर तुरंत भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है का राग अलापना शुरू हो जाता है । लोगों को विवेकशील होकर विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में क्या पहले शामिल होना चाहिए और क्या बाद में । – योगेन्द्र जोशी 

My words on October 2 – Gandhi Jayanti and International Nonviolence Day

Mahatma, the Naked Fakir

I hold Mahatma Gandhi, the so-called Naked Fakir, in great reverence. I count him to be one of those few 10-20 historical persons for whom I have a special sense of respect. These include, Buddha, Socrates, and Christ, etc. I do that not because they were perfect human beings, or superhumans, or God- incarnates. In my opinion, they were mortals like us, but with a distinctly different personality. They were people having determination, compassion, sensitive to the miseries and ills of life, and commitment to some cause. I believe that they had their own weaknesses and that they might have had committed trivial wrongs in their own times, yet they had strength of character that dwarfed their weaknesses. And these points made them nearly singular in the society.

Today is October 2, Gandhi Jayanti and International Nonviolence Day. Gandhi is remembered and respected almost exclusively for his commitment and advocacy to nonviolence. But my respect for him is based more on other aspects of his life. In Indian history Mahavir and Buddha were perhaps the greatest advocates of nonviolence and compassion not only for human beings but also for all living beings. Gandhi was not the first to advocate nonviolence. True that he was perhaps the first to advocate that in the wider political context.

Ahimsa, Nonviolence

I should point out here that ancient Indian pieces of literature talk about of Ahimsa – the opposite of Himsa. This is translated to nonviolence in English. But the two are not synonymous, because Ahimsa has much wider scope. It refers to abstaining from any ill towards others – all living beings, in fact!  It refers to avoidance of commitment of an ill in action (कर्मणा, Karmana), in speech (वाचा, Vacha), and in thought (मनसा, Manasa). I do not believe the term ‘nonviolence’ connotes that much.

We mostly relate violence to actions that physically harm a person, damage their property, etc. Physical damage of any kind is definitely so obvious that people will always criticize violence. Is uttering foul words to somebody not equally bad? It may have deep-rooted effect on one’s psyche. I do not know if violence also refers to speaking words that hurt others. But I emphasize that when we talk of Ahimsa we also mean that one should avoid harbouring ill thoughts about others. You may argue that that is immaterial simply because others cannot know about it unless it gets translated to a speech or to an action. That is true, but the person concerned knows what he thinks and thinks not. I can imagine some human actions the knowledge of which may remain secret to others except to the person herself/himself. One can well imagine such things as I do.

Well, that is how I define Ahimsa, somewhat different than nonviolence. Anyway my interest here lies not in defining this term. What I find strange is that people the world over know Gandhi only in the context of violence. Is that the most important aspect of Gandhi’s personality, his philosophy of earthly life? Perhaps not! We conveniently ignore many other things which he was committed to. But Ahimsa or nonviolence, whatever you call it, is most talked about because practically every human being fears violence and strives to evade that. Violence is something that can indiscriminately harm any human being; no one can be safe if violence spreads anywhere.

Gandhi: There’s more than Ahimsa 

But other positive aspects of Gandhi’s life are considered to be not as much important as Ahimsa. What are these? I am not one who has devotedly and in detail studied Gandhi. My knowledge and understanding of him are limited, but they suffice for me to present some comments. We must remember that Gandhi also advocated many things like:

  1. Respect for physical labour. He teaches us that one should not shirk physical labour oneself. One must also respect all fellow humans engaged in work demanding physical labour.
  2. Social and economic equality. It is true that all human beings are not born equal, their physical and mental abilities often differing remarkably. But Gandhi advocates that a civilized society should take steps to reduce economic disparity. People poorer in competence must be helped by those better-off. Likewise we must treat all human beings equal and extend respect to everyone. All this does not mean we ignore anybody’s wrongs.
  3. Avoiding exploitation of the weaker in the society. Exploitation is definitely the most damaging to the society. Most ills of the society originate from this instinct of humans. Not paying adequately for somebody’s service is a weakness of most of us. But we must remember that we also are bestowed with wisdom. If we decide we can become superior beings. How many value that?
  4. Compassion for fellow humans. Gandhi was of the opinion that people committed only to their self-interests cannot form a truly civilized society. He favoured that we must all take care of the larger good of the society. How many people feel compassionate towards others? How many are willing to extend helping hand to a needy person? Perhaps not even those who can afford that.
  5. Truth and honesty These were perhaps closest to Gandhi’s heart. But how many of us have in practice a reasonable appreciation for these virtues? No one can become a perfect human being, but one can still avoid becoming totally dishonest. The rampant corruption and dishonesty in our society shows we have no respect for these virtues. Where are we vis a vis Gandhi?
  1. Setting imitable examples. There is a saying “महाजनो येन गतः सः पन्था (महाभारत)” (follow the path set by the great – Mahabharat). Who is great? The term महाजन (Mahajan) or the great refers to one who has a distinct position in the society, is known for character and integrity, is respected for being helpful to others, etc.  Such people are followed by others, and therefore they have the sacred responsibility of setting examples before others. At present do we have people in our society who set imitable examples before others? The responsibility lies first on those who are higher in position in the society. Unfortunately, things are far from what Gandhi would have expected of us.

These are some points that come to my mind on this occasion of Gandhi Jayanti. One can present similar more points.

What I find discouraging is that while we emphasis Gandhi’s nonviolence, we almost ignore other things that Gandhi stands for. All these other things are not less important, remember!

बाबागिरी का खूबसूरत धंधा बनाम आसाराम बापू पर लगे आारोप

निवेदन

सर्वप्रथम मैं राजनेताओं एवं ‘संत-महात्माओं’ के समर्पित भक्तों से क्षमायाचना करता हूं, क्योंकि मैं जो कहने जा रहा हूं उससे वे आहत अनुभव कर सकते हैं । उनसे यही निवेदन है कि वे आगे न पढ़े । उनके आहत होने की संभवना से मैं अपनी बात कहना बंद नहीं कर सकता । किसी को बातें बेहद घटिया लग सकती हैं तो कुछ को उनमें तथ्य नजर आ सकते हैं । कोई भी व्यक्ति सबके मन की नहीं कर सकता है । अतः जिसे पसंद न हो वह खुद ही दूर हो जाए यह नीति ही ठीक है ।

asaram bapu

सम्मान खोती जमाअतें

समाज के दो जमाअतों के प्रति मेरे मन में मुश्किल से कुछ – यों कहिए कि बहुत ही कम – सम्मान बचा है । पहली है राजनेताओं की जमाअत और दूसरी है उन लोगों की जो अध्यात्म के नाम पर दुकानें खोलकर स्वयं को भगवान, महात्मा, संत, संन्यासी, आदि उपाधियों से संबोधित करवाते हैं । यह मेरा दुर्भाग्य है कि इस इक्कीसवीं सदी में शायद ही कोई भारतीय राजनेता दिखाई देता है जिसे मैं सम्मानीय समझ सकूं । सामान्य शिष्टाचार के नाते मैं किसी के प्रति अपशब्द प्रयोग नहीं करना चाहूंगा, किंतु मन में श्रद्धाभाव नहीं उपजता यह बात तो कह ही सकता हूं । यही बात तथाकथित साधु-संतों के बारे में भी कहता हूं । दुर्भाग्य से किसी ऐसे व्यक्ति के दर्शन नहीं हुए जो मुझे अपने सत्कर्मों से प्रभावित कर सका हो । अभी मैं यहां पर राजनेताओं के बारे में कुछ नहीं कह रहा हूं ।

आरोप से घिरे आसाराम बापू

आजकल मीडिया में आसाराम बापू छाए हुए हैं कथित दुष्कर्म के आरोपों से घिरे हुए । असल मामला क्या है यह घर बैठे भला मैं कैसे ठीक-से जान सकता हूं ? मेरे पास महाभारत के संजय – प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र के ‘कमेंटेटर’ – की भांति दिव्यदृष्टि होती तो मामले का सही-सही ज्ञान मुझे बैठे-बैठे हो जाता । काश! कि ऐसा होता ।

आसाराम पर टिप्पणी करने से पहले मैं इस तथ्य का उल्लेख करना चाहता हूं कि आधुनिक काल भौतिकता और उपभोक्तावाद का है । बहुत से मनुष्यों को इस बात का भली-भली ज्ञान हो चला है कि जीवन के सुखदुःख सब इसी जीवन में भोगने होते हैं; इसके आगे कुछ है भी यह कोई माने नहीं रखता है । मनुष्य का पुनीत कर्तव्य है इस जीवन को यथासंभव सुख से जिये और अधिकाधिक सुखोपार्जन के लिए जो भी व्यवसाय ठीक लगे उसे अपना ले । इसी कारण आज वह सब खुलकर होते दिखाई दे रहा है, जिससे लोग कभी पाप कहते हुए बचते थे और जिसे ज्ञानी-धर्मात्मा नरक का मार्ग बतलाते थे । नरक-स्वर्ग, पाप-पुण्य, जन्म-परजन्म जैसे शब्द अब अपनी अहमियत काफी कुछ खो चुके हैं ।

इस धरती पर ऊपर वाले की सृष्टि में निरीह, धर्मभीरु, चिंतनक्षमता में कमजोर, और सरलता से सम्मोहित हो सकने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है । वे धर्मभीरु तो हैं किंतु धर्म की समझ नहीं रखते हैं, और आसानी से बहकावे में आ जाते हैं । उनकी कमजोरी का लाभ लेने के लिए कुछ अतिचतुर लोगों ने लाभप्रद व्यवसाय के तौर पर धर्म-अध्यात्म की दुकानें खोल ली हैं, और उन निरीह जनों के बल पर सुखभोग कर रहे हैं । वे जब तक इन निरीह जनों का शोषण सीमा के भीतर करते हैं तब तक दुकान बढ़िया चलती है, लेकिन जब कभी आत्मसंयम खोकर अमर्यादित आचरण कर बैठते हैं तो समस्या से घिर जाते हैं । आसाराम ऐसे ही ‘दुकानदार’ हैं जो दुर्भाग्य से अपनी अति के जाल में फंस गये हैं ।

बाबागिरी का कलयुगी धंधा

धर्म-अध्यात्म की दुकान खोलने/चलाने, जिसे में बाबागिरी कहता हूं, में सफल होने के लिए

(1) आपमें संबंधित हुनर होना आवश्यक है । बिना हुनर के तो किसी भी व्यवसाय में सफल नहीं हुआ जा सकता है ।

(2) दूसरा व्यक्ति में वह अदम्य इच्छाशक्ति होनी चाहिए की आप अपने हुनर का लाभ उठाने में हरगिज नहीं हिचकिचाएंगे । मान लें कि कोई लोगों के बटुए पर सफाई से हाथ फेर सकता है, लेकिन उसका मन गवाही न दे तो वह उसे नहीं कर सकता ।

(3) बाबागिरी के लिए व्यक्ति में लोगों को सम्मोहित करने की सामर्थ्य होनी चाहिए । अपने हावभाव, आधे-अधूरे अध्यात्मज्ञान, धार्मिक कथाओं की रोचक प्रस्तुति, लोगों की रुच्यानुसार भजन-कीर्तन गायन-वादन में भागीदारी, आदि से उनका मन मोहने की कला आनी ही चाहिए । परचून की दुकान के लिए शिष्ट व्यवहार काफी होता है, लेकिन बाबागिरी के लिए अभिनय-क्षमता भी जरूरी है ।

(4) बाबागिरि के माध्यम से सुखभोग की इच्छा रखने वाले में धैर्य का होना आवश्यक है । कोई यह न समझे कि वह रातोंरात बहुत कुछ पा जाएगा । जिस प्रकार फैक्टरी स्थापित करते समय उससे लाभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, केवल बाद में लाभ मिलने लगता है, वैसे ही बाबागिरी में भी होता है । आरंभ में स्वयं को लोगों के समक्ष ऐसे प्रस्तुत करना होता है कि व्यक्ति अलौकिक शक्ति का धनी है । अगर वह सफल हो गया तो एक-एककर निरीह जन उससे जुड़ने लगेंगे । उतावलापन हानिकर होता है ।

(5) जब लोग जुड़ने लगते हैं तो कोशिशें होती हैं कि राजनेता और उच्चाधिकारी भी बाबा के मायाजाल में फंसें, जो वक्त-बेवक्त बाबा का ही नहीं उसके ‘भक्तों’ का भी काम कर देेते हैं और उसका श्रेय बाबा को मिलता है । इससे अनुयायी ‘ब्रेन-वाश्ड’ हो जाते हैं और वे हर कष्ट से बाबा को उबारने में लग जाते हैं । ऐसे ही चेलों ने आसाराम को बचाने की कोशिश की होगी कानून को ताक पर रखकर !

(6) स्मरण रहे कि राजनेतागण वोट को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं । अनुयायियों की तादाद बढ़ाकर बाबा भय या भ्रम पैदा कर सकता है कि राजनेता अनुयायिओं का वोटबैंक खो सकते हैं । तब वे उसके पक्ष में बोलने को विवश हो जाते हैं और उसे पाकसाफ घोषित करने लगते हैं ।

(7) समय बीतने के साथ बाबा को सभी सुखसाधन मिल जाते हैं, जब अनुयायी उसपर बहुत कुछ न्यौछावर करने लगते हैं । स्थापित हो चुकने पर भी बाबा को अति से बचना चाहिए । जब तक वह समझदारी और सावधानी से बाबागिरी का सुख भोगता है कोई गंभीर टिप्पणी नहीं करता ।

(8) यदि कोई बाबागिरी के रास्ते कामपिपासा भी शांत करने की इच्छा करे तो उसके सामने खतरा अवश्य रहता है । अन्यथा यह मुमकिन है कि ब्रेन-वाश्ड हो चुके ‘भक्तों’ की भीड़ में समर्पित व्यक्ति मिल जाएं जो स्वेच्छया सहयोग दें और स्वयं को उपकृत समझें न कि ठगा हुआ । लेकिन कभी-कभी धोखा भी हो सकता है, जैसा लगता है आसाराम के साथ इस बार हो गया । मनुष्य ऐसी चूक कर बैठता है ।

(9) बाबागिरी में लगे तथाकथित संत अपने अनुयायियों का चुनाव नहीं करता, बल्कि वह तो चाहता है कि अधिक से अधिक लोग उससे जुड़ें । उसकी ‘अलौकिक’ शक्तियों से आकर्षित होकर कोई भी ‘भक्त’ बन जाता है । बाबा की तथाकथित शक्ति से कुछ पाने की लालसा में आपराधिक मानसिकता वाले भी उसकी भीड़ में शामिल हो लेते हैं । ऐसे अनुयायी काफी काम के होते हैं, जब कभी बाबा पर बाहरी तत्व ‘हमला’ बोलें तो ये खुद उपद्रव पर उतर आते हैं । आसाराम के ‘भक्तों’ में ऐसे लोग भी शामिल हैं यह मीडियाकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार से स्पष्ट है । आसाराम के लिए धरना-प्रदर्शन करने वाले इसी प्रकार के लोग हैं ।

(10) समझदार बाबा उल्टासीधा काम करने से पहले अपनी ऐसी छवि बनाता है कि उसके ‘ब्रेन-वाश्ड’ अनुयायी उसमें देवता के दर्शन पाएं । (वैसे कुछ देवता खुद में खुराफाती रहे हैं जैसे इंद्र जिसके बारे में तमाम पौराणिक कथाएं हैं ।) तत्पश्चात् बाबा कुछ भी करे वह उन लोगों को निर्दोष ही दिखेगा ।

कौन सच्चा, आसाराम या वह नाबालिग?

अब मैं आसाराम पर लगे मौजूदा आरोपों के संदर्भ में कुछएक शब्द कहता हूं । यह तो तय है कि आसाराम एवं उस नाबालिक लड़की में कोई एक तो दोषी है ही । जो कहते हैं कि आसाराम निर्दोष हैं वे प्रकारांतर से यह स्वीकारते हैं कि वह लड़की झूठ बोल रही है । वे खुले शब्दों में भले ही कुछ न कहें, उनका मंतव्य तो यही निकलता है कि वह मक्कार, बदचलन, बिकाऊ और साजिश में शरीक लड़की है । असल बात क्या है यह तो आसाराम और वह ही जानते हैं । जांचकर्ता तो उपलब्ध साक्षों के आधार पर निष्कर्ष निकाल सकते हैं, वह भी तब जब साक्ष बचे भी हों और ईमानदारी से जांच हो, जिसकी उम्मीद मैं तो नहीं करता । इसलिए सही बात जानना आसान नहीं ।

फिर भी मैं लड़की पर 99% भरोसा करूंगा और आसाराम पर मात्र 1% । इसके कई कारण हैं जिनमें

प्रथम तो यही है कि मेरी बाबा लोगों के प्रति नकारात्मक धारणा रही है ।

दूसरा मैं मानता हूं कि हमारे समाज में लड़िकयां ऐसे मामले की शिकार होने के बावजूद रिपोर्ट करने से कतराती हैं; यहां तक कि वे मां-बाप से तक नहीं बोल पाती हैं ।

तीसरा झूठा आरोप लगाकर अपनी ही बेइज्जती कराने वाली लड़कियां समाज में कम ही मिलेंगी, और वह लड़की शायद ही ऐसी खुराफाती हो ।

चौथा झूठा आरोप लगाकर आसाराम जैसे रसूखदार आदमी से पंगा लेने की हिम्मत उसने अकारण जुटा ली हो इसे मैं असंभव-सा मानता हूं । आसाराम तो करोड़ों की फीस देकर वकीलों की फौज की मदद ले सकते हैं, उनके सामने उसकी क्या औकाद ?

पांचवां आसाराम का कहना कि उन्हें साजिशन फंसाया जा रहा है बेमानी है, क्यों ऐसा तर्क तो हर अपराधी देता है ।

छटा आसाराम खुद को संत-महात्मा कहलवाते हैं, लेकिन इस बीच उन्होंने अपने बचाव के लिए तरह-तरह हथकंडे अपनाए । पाकसाफ एवं संत जैसा आदमी पुलिस से क्यों घबड़ाएगा भला ?

सातवां मेरी जानकारी के अनुसार आसाराम का विगत जीवन संदिग्ध रहा है ।

अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि आसाराम दोषी भी हों तो भी लचर न्यायिक व्यवस्था के चलते वे इस जीवन में दंडित नहीं होंगे । – योगेन्द्र जोशी

विडंबना

मानव समाज की विडंबना है कि यहां सच बोलने वाले को कहना होता है, “मैं झूठ नहीं बोलता ।”, और यही वक्तव्य झूठ बोलने वाले के मुख से भी निकलता है। कौन सच्चा तथा कौन नहीं यह जानना अक्सर कठिन होता है, और कभी-कभी तो असंभव भी ।

Tags:

भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

Untitled

इस दिवस पर देशवासियों के प्रति शुभकामना व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य बनता है । तदनुरूप उक्त संदेश सभी को स्वीकार्य होवे । किंतु इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने और देश के भविष्य के प्रति आशान्वित होने का कोई विश्वसनीय आधार मुझे कहीं नहीं दिखता । देश की जो निराशाप्रद स्थिति मुझे वर्षों से दिखती आ रही है, उसकी ओर मेरा ध्यान इस मौके पर कुछ अधिक ही चला जाता है । मुझे लगता है कि आंख मूंदकर खुश होने के बजाय देशवासियों को तनिक गंभीरता से अपनी राजनैतिक उपलब्धियों पर विचार करना चाहिए । उन्हें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या साड़ेछः दशक पूर्व हासिल की गयी स्वाधीनता का उपयोग हम एक स्वस्थ एवं जनहित पर केंद्रित लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था स्थापित करने में कर पाये ? इस अवसर पर कई प्रश्न मेरे मन में उठते हैं जिनके उत्तर मुझे नकारात्मक ही मिलते हैं । मेरी बातें सुन मुझ पर पूर्वाग्रह-ग्रस्त होने का आरोप लग सकता है । क्या मैं वाकई गलत हूं; मेरी बातों में कोई सार नहीं; मैं निराशावादी हूं ?

भारतीय संविधान कहता है:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved constitute India into a SOVEREIGN  SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens

JUSTICE …

LIBERTY …

EQUALITY …

FRATERNITY …

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT, AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(SECULAR ‘kCn 1976 ds 42osa la’kks/ku esa tksM+k x;k A)

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाबत कुछ प्रश्न उठाता हूं । हमारी तत्संबंधित उपलब्धियां क्या हैं ? परमाणु परीक्षण, मिसाइल तकनीकी, उपग्रह प्रक्षेपण, और चंद्रयान अभियान या अन्य विकास कार्यों को मैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बेहतरी के संकेतक नहीं मानता । ऐसे विकास कार्य तो राजशाही, तानाशाही, लोकशाही अथवा किसी भी अन्य शासकीय तंत्र में होते ही रहते हैं । हर एक तंत्र में शासक अपने को मजबूत करने में लगा ही रहता है । चीन इसका उदाहरण है जो इन सब मामलों में हमसे कहीं आगे है । मेरे सवाल सीधे-सीधे अपने लोकतंत्र से जुड़े हैं कि क्या उसकी गुणवत्ता उत्तरोत्तर बढ़ी है; क्या वह आम जन की आकांक्षाओं के अनुरूप है, आदि । चलिए एक-एक सवाल पर विचार करें:

कहां है लोकतंत्र ? मूल भावना का अभाव

हमने बहुदलीय शासन पद्धति स्वीकारी है, जिसके अनुसार व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक दलों को प्राप्त हुई है । उनसे अपेक्षा रही है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृड़ ही नहीं करेंगे, बल्कि उसकी मर्यादाओं का पूर्णतः सम्मान करेंगे । लेकिन जिन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उन्होंने ही लोकतांत्रिक प्रणाली का दायित्व संभाल रखा है । क्या इसमें विरोधाभास नहीं है ? आज के प्रमुख दलों में कितने हैं जो शपथ लेकर कह सकें कि उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है ? प्रायः हरएक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा उसके परिवार की निजी राजनैतिक जागीर बना हुआ है और उसके कार्यकर्ता तोते की भांति मुखिया के कथनों को उच्चारित करना अपना धर्म मानते हैं ।

कहां है लोकतंत्र ? सत्ता हथियाने की होड़

सत्ता हथियाना ही सभी दलों का एकमेव लक्ष बन चुका है । सत्ता क्यों चाहिए ? देश का स्वरूप आने वाले 20-30 सालों में क्या होगा इसके चिंतन से प्रेरित होकर सत्ता नहीं पाना चाहते । देश की कोई भावी तस्वीर उनके मन में नहीं उभरती है, बल्कि उनकी नजर पांचसाला सत्ता पर रहती है कि कैसे वे भरपूर सत्तासुख भोगें और और सत्ता से तमाम सही-गलत लाभ बटोर सकें । यही वजह है कि उनके पास देश के लिए कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, और न ही वे किसी सिद्धांत पर टिके रहते हैं । चुनाव में जिसका विरोध करें उसी से हाथ मिलाकर सत्ता पर बैठने से कोई नहीं हिचकता है । हर प्रकार का समझौता, हर प्रकार का गठबंधन उन्हें स्वीकार्य है, बशर्ते कि वह उनके निजी हित में हो, देशहित दरकिनार करते हुए ।

कहां है लोकतंत्र ? क्षेत्रीय दलों का उदय

जोड़तोड़ से सत्ता में भागीदारी पाने, और अपनी शर्तों पर दूसरे दलों से मोलभाव करने की क्षमता बटोरनेे के लिए क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ है । स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक ऐसे दलों का जन्म नहीं  हुआ था ऐसा मैं समझता हूं । कदाचित डीएमके पहला ऐसा दल था जो क्षेत्रीय दल के रूप में हिंदीविरोध के साथ जन्मा था । अन्य दल बाद में ही उभरे जब नेताओं को लगने लगा कि इस रास्ते से उनकी कीमत बढ़ जाएगी । इन दलों ने केंद्र की सत्ता को कमजोर ही किया । हाल के समय में गठबंधन-धर्म जैसा शब्द गढ़ा गया और राष्ट्रधर्म को दरकिनार कर इस धर्म को अहमियत मिलने लगी । इन दलों ने कुछ भी करने की छूट की शर्त पर गठबंधन बनाए रखने की घातक परंपरा को जन्म दिया है । क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र है ?

अहंकारग्रस्त सांसद-विधायक

जनता के द्वारा बतौर प्रतिनिधि के चुन लिए जाने के बाद हमारे राजनेता स्वयं को पांच-साला राजा समझने लगते हैं । विनम्रता तो उनमें मुश्किल से ही मिलेगी । वे किसी भी विषय पर जनता की राय जानने के लिए क्षेत्र में नहीं जाते हैं, बल्कि दल एवं मुखिया की बात ही उनके लिए माने रखती है । जब वे अपने हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं और जनता विरोध करती है तो अहंकार के साथ कह देते हैं कि हम चुनकर आए हैं । हिम्मत हो तो आप भी चुनकर आओ हमें रोक लो । मतलब यह कि हम अब राजा हैं और अपनी मरजी से चलेंगे । नेताओं की ऐसी सोच कभी भी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं कही जा सकती है । हिम्मत तो उन्हें होनी चाहिए कि अपने मतदाताओं के बीच जाकर उनके विचार जानें । ऐसा वे कभी नहीं करते । कहना ही पड़ेगा कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान नहीं उपज पाता है ।

सेक्यूलरिज्म का ढिंढोरा

सेक्यूलरिज्म, जिसे हिंदी में धर्मनिरपेक्षता कहा गया है, के अर्थ क्या होते हैं यह शायद ही किसी राजनेता को मालूम हो । यह शब्द वे तोते की तरह बिना सोचे-समझे कही भी बोल देते हैं । उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह शब्द यूरोपीय देशों में गढ़ा गया जहां शासकीय व्यवस्था को ईसाई धर्म के प्रभाव के मुक्त करने का अभियान चला था । फलतः वहां इस विचारधारा ने जन्म लिया कि लोकतंत्र में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, और शासन के नियम-कानून में देश और समाज के समग्र हित के अनुसार बनने चाहिए न कि किसी धर्म के मतानुसार । जब नेहरू-आंबेडकर ने हिन्दू भावना के विरुद्ध हिन्दू कोड बिल पारित करवाया तो उनकी सोच यही थी कि कालांतर मे कॉमन सिवल कोड देश में स्थापित किया जाऐगा । लेकिन ऐसा हो न सका और अब संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों के होते हुए भी यह कभी होगा नहीं । हमने ‘सेक्युलर’ शब्द का आयात का तो कर लिया, किंतु उसकी भावना अपनाई नहीं । वस्तुत यह देश मल्टीरिलीजस या बहुधर्मी है न कि धर्मनिरपेक्ष, क्योंकि हमारे कुछ कानून धर्मसापेक्ष ही हैं । फिर कैसे हम स्वयं को सेक्युलर कहें । यह आत्मप्रवंचना है ।

अल्पसंख्यकवाद

इस देश में सेक्युलर का व्यावहारिक अर्थ अल्पसंख्यक हितों की बात करना हो चुका है । बहुसंख्यकों की चर्चा करना सेक्युलर न होना समझा जाता है । और दिलचस्प बात तो यह है कि जब भी अल्पसंख्यक शब्द राजनेताओं के मुख से निकलता है तो उनका इशारा प्रायः मुसलिम समुदाय से ही होता है । देश में सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से तो कुछ सही अर्थ में अल्पसंख्यक हैं । परंतु उनकी बात शायद ही कभी कोई राजनेता करता है । दरअसल सबसे कमजोर आर्थिक एवं शैक्षिक दशा में होने के बावजूद मुसलिम समुदाय चुनावी नजर से अत्यधिक अहम समुदाय है, क्योंकि वह चुनाव परिणामों में उलटफेर कर सकता है । उनकी इसी ताकत को देखते हुए हमारे कई राजनैतिक दलों की नीति उनके हितों की जबरन बातें करना रही है । उनको अपने पक्ष में करने के लिए वे हर चारा उनके सामने डालते आ रहे हैं, और उन्हें वोट बैंक के रूप में देखते हैं । उनके वास्तविक हितों में शायद ही किसी की दिलचस्पी होगी । मुझे तो पूरा संदेह है कि ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि वे कभी ऊपर उठें और प्रलोभनों से मुक्त हो पाएं । इस प्रकार का घटिया अल्पसंख्यकवाद मेरी नजर में लोकतंत्र के विरुद्ध है ।

नेतागण – अनुकरणीय दृष्टांतों का अभाव

हमारे राजनेताओं का अहंकार तब खुलकर सामने आता है जब वे कानूनों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते हैं । वे अदालतों के आदेशों/निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते है । वे भले ही मुख से न बोलें, किंतु उनका इशारा इस ओर सदैव रहता है कि उन्हें कानूनों के ऊपर होने का ‘विशेषाधिकार’ होना चाहिए, क्योंकि वे राजा से कम नहीं हैं । इस प्रकार का रवैया स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में देखने को नहीं मिलता था । तब के नेता नैतिक स्तर पर कहीं अधिक ऊपर थे । कहने का अर्थ है कि इस क्षेत्र में भी गिरावट ही आई है । होना तो यह चाहिए था कि नेता जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करें, वे अपने संयत व्यवहार से उन्हें प्रेरित करें । यही सब बातें हैं जिससे जनता में उनके प्रति सम्मानभाव घटता जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं हैं । क्या वे इन बातों को समझ पाएंगे ।

बढ़ता भ्रष्टाचार और लचर न्याय प्रणाली

कोई यह दावा कर सकता है कि समय बीतने के साथ देश में भ्रष्टाचार घटा है ? जो इसका उत्तर हां में दें मैं उनसे माफी ही मांग सकता हूं । शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जहां उल्टे-सीधे काम न होते हों, लेकिन दंडित कोई नहीं होता । यह राजनेताओं समेत सभी मानते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है, लेकिन तमाशा देखिए कि भ्रष्टाचारी कोई सिद्ध नहीं होता है, गोया कि यह भी कोई दैवी चमत्कार हो । दरअसल हमारी न्यायप्रणाली है ही ऐसी कि आरोपी को बचाने के लिए उसने तमाम रास्ते दिए हैं । रसूखदार व्यक्ति किसी न किसी बहाने मामले को सालों लटका लेता है और दंड से बच जाता है । क्या यही अपने लोकतंत्र से अपेक्षित था ?

लोकपाल, आरटीआई, एवं आपराधिक राजनीति

हमारे देश के मौजूदा राजनेता भ्रष्टाचार के प्रति कितने संजीदा हैं यह उनके लोकपाल के मामले को टालने एवं आरटीआई से अपने दलों को मुक्त रखने के इरादे से स्पष्ट है । इसी प्रकार वे राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध भी कारगर उपाय नहीं अपनाना चाहते हैं । जिन आपराधिक छवि के नेताओं के बल पर वे सत्ता हासिल करते आ रहे हैं आज उन्हें वे बचाने की जुगत में लगे हैं । मेरा विश्वास है कि शुरुवाती दौर में राजनीति इतनी अस्वच्छ नहीं थी । समय के साथ आपराधिक छवि के लागों की पैठ जो शुरू हुई तो आज संसद तथा विधानसभाओं में उनका बोलबाला दिखाई देता है । जब ऐसे नेता और उनको बचाने वाले नेता संसद में तो अपराधमुक्त राजनीति कहां से आएगी ? इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें ?

चुनावी एवं प्रशासनिक सुधार

मुझे अब विश्वास हो चला है कि हमारे नेता ऐसे कोई उपाय नहीं करना चाहते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे पर उनकी मनमर्जी पर अंकुश लगाए । मैं अब मानता हूं कि उनमे परस्पर यह मुक सहमति बनी है कि ऐसे किसी भी कानून का हममें कोई न कोई किसी न किसी बहाने विरोध करता रहेगा ताकि वह कानून पास न हो सके । ऊंची-ऊंची बातें होती रहती हैं लेकिन ठोस कुछ किसी को नहीं करना है । यही वजह है कि चुनाव, न्याय-व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, तथा पुलिस तंत्र में सुधार आज तक नहीं हुए हैं और न आगे होने हैं । यही हमारी उपलब्धि है क्या ?

इंडिया बनाम भारत

स्वतंत्र हिंतुस्तान की सबसे त्रासद और दुःखद घटना है इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटवारा । ये देश की चिंताजनक प्रगति है कि यहां दो समांतर व्यवस्थाएं साथ-साथ चल रही हैं । एक व्यवस्था है देश के समर्थ एवं संपन्न वर्ग के लिए और दूसरी है बचेखुचे कमजोर लोगों के लिए । चाहे शिक्षा हो, चिकित्सा हो, यातायात हो या कुछ और, दोनों के लिए असमान व्यवस्था कायम हुई हैं । तर्क दिया जाता है कि लोकतंत्र में तो लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम पाने का अधिकार है । संविधान में जिस EQUALITY की बात कही गई हैं उसके निहितार्थ क्या हैं यह मैं समझ नहीं पाता ।

स्वतंत्रता यानी अनुशासनहीनता

अंत में । क्या ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार्य हो सकती है जिसमें व्यक्तियों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न हो, जहां मर्यादाएं न हों ? लेकिन बहुत से लोगों के लिए स्वतंत्रता के अर्थ हैं अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, जो मर्जी वह करने का अधिकार, कानूनों का उल्लंघन, आदि । हमारा लोकतंत्र लोगों को दायित्यों का एहसास दिलाने का कार्य नहीं कर सका है । लोगों को कार्य-संस्कृति, दूसरों के प्रति संवेदना, देश-समाज के प्रति कर्तव्य का पाठ कोई नहीं पड़ा सका है । सभी को खुली छूट जैसे मिली हो ।

ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठते हैं । ये सब बातें व्यापक बहस के विषय के हैं, किंतु इनसे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि यह देश सही दिशा में नहीं जा रहा है ।

मेरी दृष्टि में चंद्रमा पर यान उतार देना उतना महत्व नहीं रखता जितना सड़क पर कूड़ा बीनने वाले को उस दशा से मुक्त करना । – योगेन्द्र जोशी