क्या यीशु मसीह (Jesus Christ) का जन्म २५ दिसंबर को हुआ था? शायद नहीं!

आज क्रिसमस का पर्व है, 25 दिसंबर, जिसे ईसाई समुदाय के लोग यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर मनाते हैं।

     इस अवसर पर मैं सर्वप्रथम देशवासियों को, विशेष तौर पर अपने ईसाई बंधुओं को, बधाई एवं शुभेच्छाएं देना चाहता हूं।

विषय का आरंभ करने से पहले मैं यह बाताना चाहूंगा कि ईसाई धर्म जिस व्यक्ति के विचारधारा पर आधारित है उसका असल नाम यीशु (Jesus)  है। मेरा खयाल है कि यह नाम हेब्रू (Hebrew, इज़्राइलवासियों की भाषा, जिसमें यहूदियों के धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं) के उच्चारण के अनुरूप है। ध्यान दें कि यूरोप की भाषाओं में लैटिन (Latin) अल्फाबेट J का उच्चारण अंग्रेजी के अनुरूप (यानी ) हो यह आवश्यक नहीं, जैसे जर्मन भाषा में)। ग्रीक (यूनानी) मूल के शब्द क्राइस्ट (Christ) का शब्दिक अर्थ होता है मसीह/मसीहा। यह विशेष उपाधि के तौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो सामन्य से कहीं ऊपर उठ चुका हो और जिसे “बचाने वाला” कहा जाये। यीशू को लोगों ने मानवता को बचाने वाले के तौर पर देखा और उन्हें मसीह का दर्जा दे दिया।

मैं सुनता आया हूं कि यीशु मसीह का असली जन्मदिन वस्तुतः किसी को भी ठीक-ठीक नहीं मालूम है। इस विषय पर विस्तार से बहुत कुछ लिखा-कहा गया है। मुझे इस बारे में “Live Science” नाम की ई-पत्रिका का एक लेख पढ़ने को मिला है –

 http://www.livescience.com/42976-when-was-jesus-born.html

मैं उसी के आधार पर अधोलिखित बातें लिख रहा हूं।

लेख कहता है कि रोमन कैथोलिक चर्च ने काफी सोच-विचार के बाद 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर चुना था। दरअसल प्राचीन काल में जब ईसाई धर्म रोम तक पहुंचा तो धर्मप्रवर्तकों ने संघर्ष का रास्ता न चुन कर रोमन जनता को मिलमिलाप से अपने धर्म की ओर खींचना ठीक समझ। रोमन लोग (तथाकथित पैगन Pagans)  उस काल में अपने शनि देवता (Deity Saturn) के नाम पर सैटर्नालिया (Saturnalia) नाम के त्योहार को उत्तरायण (winter solstice) के मौके पर मनाते थे। धर्मप्रवर्तकों ने इसे यीशु के जन्मदिन के नाम पर मनाना आरंभ कर दिया ताकि वहां की परंपरा और ईसाई मान्यता में तालमेल बैठ सके। (अन्यथा ईसाई धर्म में शनि देवता की कोई मान्यता नहीं।) 25 दिसंबर चुनने के अन्य कारण भी कदाचित रहे होंगे।

कोई नहीं जानता कि यीशु क जन्म किस शताब्दी और तारीख पर हुआ था। विषय के जानकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ का मानना है कि उनका जन्म 6 से 4 बीसी (BC = before Christ) में हुआ होगा। बाइबिल की एक कथानुसार तब यूडिया (Judea ) के शासक हैरॉड (Herod) को यीशु के बेथलेहम (Bethlehem) में अपने शत्रु के रूप में पैदा होने का अंदेशा था, इसलिए उसने उस स्थान के आसपास के उस काल में पैदा हुए सभी बच्चों को मरवा डाला। (बेथलेहम यूडिया के अंदर स्थित था।) चूंकि हैरॉड स्वयं 4 बीसी में दिवंगत हो गया, अतः कथानुसार ईशु का जन्म 4 बीसी या पहले हुआ होगा, न कि शून्य बीसी में।

लेकिन इतिहासज्ञ उक्त कथा को सही नहीं मानते।

यीशु के जन्म के संदर्भ में कथा प्रचलित है कि उस समय एक नक्षत्र (बेथलेहम नक्षत्र Star of Bethlehem) आकाश मे दिखाई दिया था। लंदन की रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोशाइटी (Royal Astronomical Society) के खगोलविद कॉलिन हम्फ़्रीज़ (Colin Humphreys) का दावा है कि उक्त तारा वस्तुतः अतिमंद गति से चल रहा एक धूमकेतु रहा होगा जिसका उल्लेख चीनी खगोलविदों ने 5 बीसी में देखा था। अतः जन्मवर्ष 5 बीसी हो सकता है।

अन्य खगोलविद डेव रेनके (Dave Reneke) के अनुसार यीशु का जन्म 2 बीसी (जून 17) में हुआ होगा शुक्र तथा वृहस्पति ग्रह साथ आ गये होंगे और दोनों ने मिलकर तेज रोशनी के तारे का भ्रम पैदा किया होगा। रेनके ने कंप्यूटर माडल के आधार पर यह बात कही है।

दूसरे खगोलविदों के अनुसार इस प्रकार की घटना 7 बीसी (अक्टूबर माह) में हुई थी जब वृहस्पति एवं शनि ग्रह ने साथ-साथ आकर तेज प्रकाश के तारे का भ्रम पैदा किया।

धर्मवेत्तओं के अनुसार यीशु का जन्म वसंत ऋतु में हुआ था। बाइबिल की कथा के अनुसार यीशु के जन्म के समय गड़रिये अपनी भेड़ों को घास के मैदानों में चरा रहे थे। यह घटना जाड़ों में नहीं हो सकती है। – योगेन्द्र जोशी

शौचालय पहले या देवालय? बात-बात पर धर्म/संस्कृति के नाम पर आाहत होना

          अभी चंद रोज पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने एक बयान देकर हिन्दुओं को धार्मिक रूप से “आहत” कर दियाइससे पहले कांग्रेसी नेता एवं मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसा ही बयान दिया था । बहुत से लोग तब भी नाखुश हुए थे । लेकिन इस बार मामला कुछ लोगों को अधिक गंभीर लगा, क्योंकि मोदी कथित तौर पर कट्टर हिन्दूवादी नेता की छवि रखते हैं, अतः उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी । लोग भूल जाते हैं कि तरह-तरह के कभी शिष्ट तो कभी अशिष्ट बयान तो राजनेता देते ही रहते हैं । उनकी जबान पर इस स्वतंत्र “इंडिया दैट इज भारत” राष्ट्र में कोई रोक नहीं है । दरअसल कुछ और चीजें देश की जनता को मिले या न जो मुख में जो आया उसे बक देने की स्वतंत्रता तो सबको मिली ही है । क्यों न कोई इसका फायदा उठाए ? आम आदमी – मेरा मतलब “आप” पार्टी के सदस्य से नहीं है – कुछ कहे तो मीडिया उसे जनजन तक नहीं पहुंचाएगा, परंतु मोदी सरीखा व्यक्ति कुछ कहे और उसकी चर्चा न हो यह असंभव ही है ।

मोदी का बयान ठीक था या अनुचित यह कह पाना कठिन है, क्योंकि हम सब इन चीजों को अपने-अपने नजरिये से देखते हैं और “मेरे विचार ही सही हैं” का भाव रखते हैं । व्यक्तिगत तौर पर मुझे आपत्ति की कोई बात नहीं लगती, जिसके कारण हैं । लेकिन मोदी के कथित धुरविरोधी तोगड़िया बेहद नाखुश हैं । देखें बीबीसी समाचार

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_indiabol_ss.shtml

खबर है कि इस सिलसिले में “मानवाधिकार पार्टी” के प्रवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, वाराणसी, की अदालत में याचिका दाखिल कर रखी है, जिसकी सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

(देखें http://khabar.ibnlive.in.com/news/109403/12)

मेरी समझ में नहीं आता कि अपने देशवासी (हिंदू हों या मुस्लिम, सिख, इसाई, आदि) बात-बात पर “हमारी धार्मिक भावना आहत हुई है” का हल्ला मचाना क्यों शुरू कर देते हैं । अदालतें भी ऐसे वाद को बहस के लिए कैसे स्वीकार लेती हैं, यह जानते हुए कि अंततः कुछ निकलना नहीं है, सिवाय न्यायाधीश के समय की बरवादी के ? इतना ही नहीं मोदी के कथन के संदर्भ में कैसे कोई दावा कर सकता है कि सभी हिंदू आहत हुए हैं ? मैं भी एक हिंदू हूं और मैं मोदी का समर्थक न होते हुए भी उसके उक्त वक्तव्य का समर्थन करता हूं । दरअसल जिन दो-चार लोगों से मैंने पूछा किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की । सवाल उठता है कि जो व्यक्ति आपत्ति करता है वह कैसे पूरे हिंदू समुदाय (या किसी अन्य धार्मिक समुदाय) की भावनाओं का ठेका ले लेता है ?

हिंदू समाज की विशेषता यह है कि हम जहां-तहां मंदिर खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी लेते हैं । जो देवालय पहले से ही अस्तित्व में हैं क्या वे पर्याप्त नहीं हैं ? उससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि हम देवी-देवताओं को देवालयों में ही क्यों खोजते हैं ? जिन के घरों में पूजाघर हैं वे भी अपने घर में स्थापित देवी-देवताओं को देवालयों में क्यों खोजते हैं ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि लोग उसी देवता की महत्ता को अलग-अलग देवालयों में स्थापित होने पर अलग-अलग प्रकार से आंकते हैं ? लोगों को अक्सर कहते हुए सुनता हूं कि इस मंदिर के हनुमानजी यह मनोकामना पूरी करते हैं और उस मंदिर के हनुमानजी उस मनोकामना को, गोया कि हनुमानजी भी कई हों और वे अलग-अलग प्रकार से पेश आते हों । कहने का मतलब यह है कि देवी-देवतोओं की पूजा-अर्चना तो घर में भी उसी श्रद्धा से की जा सकती है जो देवालयों में संभव है । पुरातन मंदिरों का महत्व कुछ हद तक समझ में आता है, क्योंकि वे प्रायः पौराणिक कथाओं से संबद्ध होते हैं, जैसे शक्तिपीठों के देवी मंदिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि । लेकिन जो नित नये मंदिर स्थापित होते हैं उनके साथ तो ऐसी बात भी नहीं रहती ।

कहने का मतलब यह है कि देवालयों की वैसी आवश्यकता वस्तुतः नहीं है जैसी जनसुविधाओं एवं सामुदायिक संस्थाओं की यथा अस्पताल, स्कूल-कालेज एवं शौचालय । इनके संदर्भ में अपने देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है । कहा जाता है कि शौचालयों के मामले में तो अपना देश कुछ अविकसित देशों से भी पीछे है । और तब कोई यदि शौचालयों की वकालत करे तो क्या गलत करता है ? हाल के वर्षों में कितने देवालय बने हैं मैं कह नहीं सकता, किंतु बनते जरूर हैं और आगे भी बनेंगे यह सत्य है । आप दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देख लीजिए, कितना पुराना है ? कितना विशाल और भव्य है यह ? जितना खर्च इसे बनाने में लगा होगा उसमें न जाने कितनी जनसुविधाओं की व्यवस्था देश के कोने-कोने में संभव हो सकती थी । यह सही है कि यह स्वयं में पर्यटक-आकर्षण बन सकता है, किंतु यह जनसामान्य की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करता । और इसे फिलहाल तो धार्मिक आस्था वालों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है ।

यों तो उपसना स्थल अन्य धार्मिक समुदायों के भी बनते हैं, लेकिन वे जहां-जहां, जब-तब नहीं बनते रहते हैं । वे योजनावद्ध तरीके से, पर्याप्त आकार के, और स्थानीय सामुदायिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बनते हैं । लेकिन हिंदू मंदिर कब-कहां रातोरात खड़े कर दिये जाएंगे कहना मुश्किल है । कम से कम मैं अपने शहर बनारस में यही देखता आ रहा हूं । मैंने तो यह भी महसूस किया है कि कभी-कभी इन मंदिरों की आड़ में अतिक्रमण करने में भी किसी की आस्था आहत नहीं होती है । सड़क के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर रातोंरात एक मूर्ति रख दो, उस पर पुष्पादि चढ़ाना आंरभ कर दो, तो राह चलते अन्य जन भी फूलपत्र चढ़ाना शुरू कर देंगे । फिर उसे थोड़ा बढ़ा दो और उसके बगल में छोटा-मोटा कारोबार करना आरंभ कर दो, मंदिर को बीच-बीच में बढ़ाने का काम करो और साथ में अपना करोबार भी । इस प्रकार अतिक्रमण सफल हो जाता है । कुछ ऐसा घटित होते मैंने देखा है । इस बात को मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं:

हाल में अपने शहर वाराणसी में प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर सड़कों को चौढ़ी करने का सफल अभियान छेड़ा है । दिखावटी अभियान तो कई बार पहले भी छेड़े गए, किंतु वे कभी प्रभावी नहीं रहे । इस बार वाकई गंभीरता दिखी । उसी के परिणामस्वरूप यहां के करीब 500 मीटर के लंका-नरिया सड़क का नजारा ही बदल गया । पहले जो सड़क करीब 20-22 फुट चौड़ी थी अब करीब 35-40 फुट चौढ़ी हो गई है । मुझे इस शहर में रहते 40 वर्ष से अधिक हो चुके हैं । मैं उक्त सड़क के बारे में यही सोचता था कि शहर पुराने ढर्रे का है, इसलिए यहां के हिसाब से ये सड़क बनी ही ऐसी होगी । सोचा न था कि सड़क के किनारे के मकान-दुकान तो अतिक्रमण की देन हैं । अब जाना कि सड़क के एक सिरे से दूसरे तक लगभग 15 फुट चौढ़ी पट्टी अतिक्रमित थी । असली दिलचस्प पहलू तो यह है कि चौड़ीकरण के बाद अतिक्रमित भूमि पर बने 3-4 मंदिर भी खुले में – असल में अब नये बने डिवाइडर पर या उसके निकट – नजर आने लगे । मैं एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Mid-Road Temple-1

तस्वीर में दिखाए मंदिरनुमा ढांचे की सीध में पहले मिठाई की दुकान थी जो अब करीब 15 फुट पीछे चली गयी है । अब लगता है इस ढांचे में रखे शिवलिंग की कद्र भी करने वाला कोई नहीं । ये सभी कोई प्राचीन मंदिर नहीं हैं, बल्कि आस्था के नाम पर बनाये गये अवैधानिक ढांचे हैं । हमारी आस्था हमें अतिक्रमण से नहीं रोकती । आस्था के नाम पर प्रशासन भी इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करता ।

लोग चाहते हैं कि उनकी भावनाओं को अन्य जन ठेस न पहुचाएं । परंतु वे स्वयं दूसरों की भावनाओं की कद्र करना क्यों भूल जाते हैं ? वे क्यों इसे अपना अधिकार समझते हैं कि आस्था के नाम पर उन्हें हर चीज की छूट हो, भले ही उससे दूसरों को घोर असुविधा हो । मेरे शहर वाराणसी में धर्मकर्म के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन होते रहते हैं जिससे सड़कों पर जाम लगता है । कई मौकों पर सड़क घेरकर पूजा-पंडाल तन जाते हैं, दूसरों की परवाह किए बिना । सर्वाधिक आपत्तिजनक तो यह होता है कि लाउडस्पीकरों से शोर मचाया जाता है । मेरे घर के पास ही एक मंदिर है और उसी के सामने सड़क पार एक अस्पताल है । आये दिन मंदिर में कोई न कोई आयोजन होता है और उसके साथ लाउडस्पीकरों से कानफाड़ू शोर । सोचिए कि अस्पताल के मरीजों का क्या हाल होता होगा जहां शोर मचाना मनाही रहती है ।

आपत्तियां अनेकों हैं । हम श्रीगंगा नदी के प्रदूषण की चर्चा करते हैं और उसके नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद भी कर चुके हैं, लेकिन उसमें गंदगी गिराने से नहीं हिचकते हैं । उसमें अधजले शव तक बहा देते हैं । नवरात्र की दुर्गा-प्रतिमाएं विसर्जित तो की ही जाती हैं, अब शहर वाराणसी में कालीपूजा, सरस्वतीपूजा, गणेशपूजा, विश्वकर्मापूजा आदि अनेकों पूजाओं के नाम पर स्थापित प्रतिमाएं भी श्रीगंगा को समर्पित की जाती हैं । और यह सब होता है आस्था के नाम पर ।

आस्था के इन तमाम खेलों पर कोई आपत्ति उठाता है, या उस पर टिप्पणी करता है तो लोग आक्रोषित हो उठते हैं । देवालयों की आवश्यकता नहीं है, हमें आवश्यकता है शौचालयों की ऐसा कहने पर तुरंत भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है का राग अलापना शुरू हो जाता है । लोगों को विवेकशील होकर विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में क्या पहले शामिल होना चाहिए और क्या बाद में । – योगेन्द्र जोशी 

23 मार्च, ‘दि अर्थ ऑवर, यानी पृथ्वी के नाम एक घंटा: है इसकी कोई अहमियत?

आज के दिन (अंताराष्ट्रीय मौसम दिवस – International Meteorological Day) संध्याकाल विश्व में ‘अर्थ ऑवर’ मनाया जाता है । अर्थात् दुनिया के प्रायः सभी देशों में रात्रि प्रथम प्रहर 8:30 बजे से घंटे भर के लिए रोशनियां बंद कर दी जाती हैं । यह दिवस अब 9 वर्ष पुराना हो चला है ।

          क्या है इस दिवस की अहमियत? यों दावा तो यही किया जाता है कि इसके माध्यम से इस धरती के बाशिंदों को ऊर्जा की अधिकाधिक बचत करने और जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस) पर अपनी निर्भरता घटाने का संदेश जाता है । और यह भी कि ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोतों को व्यवहार में लिया जाना चाहिए । जहां तक नये ऊर्जा स्रोतों का प्रश्न है, इस प्रकार के प्रयास तो विभिन्न देशों में चल ही रहे हैं और उसमें सामान्यतः आम आदमी का हाथ कम ही रहता है, क्योंकि इस प्रकार के प्रयास सरकारें अथवा संस्थाएं ही सामान्यतः कर पाती हैं ।

          आम आदमी तो ऊर्जा की बचत ही कर सकता है । दूसरे शब्दों में यह दिवस आम जनों को ऊर्जा की मितव्ययिता का संदेश देता है । मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई संदेश लोगों तक वास्तव में पहुंचता भी है ? और क्या वे इस संदेश को ग्रहण करते हैं ? यह ठीक है कि आज के दिन घंटे भर के लिए घर-बाहर की रोशनी बंद कर देंगे, लेकिन क्या उसके एवज में मोमबत्ती सरीखे प्रकाश-स्रोतों का इस्तेमाल नहीं करेंगे ? क्या उतने समय फ्रिज, ए.सी., टी.वी. जैसे विद्युच्चालित उपकरण भी बंद रखेंगे ? मामला केवल रोशनी बंद रखने तक सीमित नहीं है । आपको बिजली की खपत यथासंभव कम करनी है । क्या लोग तैयार हैं ? संदेश का असल मकसद क्या वे समझ पाते हैं, उसे ग्रहण करते हैं और तदनुरूप व्यवहार करते हैं ? मुझे संदेह है कि मुद्दे के प्रति समर्पण भाव से अपनी भूमिका स्वीकारते हुए ऐसा करने का विचार कम ही लोगों के मन में उपजता होगा ।

          और असल बात तो यह है कि यह दिन केवल प्रतीकात्मक है ऊर्जा की खपत घटाने के पक्ष में । वस्तुतः यह कार्य तो चौबीसों घंटे, 365 दिन चलना चाहिए । कितने लोग हैं जो जीवन में मितव्ययिता बरतते होंगे ? घरों में अनावश्यक बिजली-बल्ब न जलें इसका खयाल कितनों को रहता है ? ए.सी. जैसे सुविधा-भोग के साधन कितने लोग नहीं चाहते हैं ? कितने लोग निजी वाहनों के प्रयोग से बचते हैं ? कितनों के मन में यह विचार आता है कि जहां तक संभव हो साइकिल जैसे साधन प्रयोग में लेने चाहिए ? कितने लोग यह जानकारी रखते हैं कि ‘स्टैंड-बाई की अवस्था में छोड़े गये उपकरणों के साथ भी बिजली की खपत होती है जिसे रोका जा सकता है ? कितनों को मालूम है कि कैसे भोजन बनाते समय गैस की खपत घटाई जा सकती है ?

और मैं तो यह सवाल पूछता हूं कि आदमी धनोपार्जन करता ही क्यों है ? क्या समाजसेवा के लिए ? नहीं, भौतिक सुख-सुविधा के साधन जुटाने के लिए । और यदि वह मितव्ययिता ही बरतने लगे तो अपने धन का उपभोग करेगा कैसे ? उसे ढेर-सी धन-दौलत की जरूरत ही क्या रह जाएगी यदि वह कम से कम खर्चापानी चलाने का इच्छुक हो । स्मरण रहे कि आदमी के प्रायः सभी क्रियाकलाप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऊर्जा पर निर्भर होते हैं, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी जीवाश्म इंधनों से मिल रहा है । यह भी अनुमान है कि अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जो वृद्धि हो रही है वह ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरा करने भर के लिए भी पर्याप्त नहीं है ।

मेरा कहने का आशय यह है कि अर्थ ऑवर का संदेश यह समझा जाना चाहिए कि हमें मितव्ययिता अपनाते हुए सादगी भरी जीवनशैली अपनानी चाहिए, न कि एक-दूसरे की नकल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग में लेना चाहिए । मनुष्य और अन्य जीवधारियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को रहने योग्य यदि छोड़ना हो तो हमें भोगवाद से बचना होगा । कितने लोग हैं जो इस विचार से सहमत होंगे ? शायद गिनेचुने ही, बस !! – योगेन्द्र जोशी

आया मौसम वर्षफल का (नववर्ष 2013)

ख्रिस्तीय वर्ष 2013 का आगाज हो चुका है । इस मौके पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी शुभाकांक्षाएं ।

नववर्ष के आगमन पर लोगों के मन में आने वाला समय कैसा रहेगा खुद के लिये तथा समाज-देश के लिए यह जानने की उत्कंठा होती है । लोग समझते हैं कि भविष्य की तस्वीर खींची जा सकती है । वे समझते हैं कि कुछ विशेषज्ञ भविष्य की घटनाओं को ‘पढ़ने’ की काबिलियत रखते हैं । लोगों की उत्कंठा शांत करने के लिए देश में बहुत से ‘एक्सपर्टों’ का जन्म हुआ है जिन्होंने भविष्यवाणी की अलग-अलग विधियां इजाद की हैं या अपनाई हैं । इनमें सबसे अधिक प्रचलित जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित है । और इसी का सरलतर संस्करण मात्र जन्मतिथि के विचार पर आधारित विधि है जिसके परिणामों की जानकारी कई अखबारों/पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाती हैं ।

विगत 28 दिसंबर के ‘अमर उजाला’ के साथ उपलब्ध ‘रुपायन’ नाम के परिशिष्ट के पन्ने जब मैंने पलटे तो पाया कि उसके आरंभ से अंत तक के सभी पृष्ठों में नाम के प्रथम अक्षर पर आधारित वर्षफल का ब्योरा छपा पड़ा है और कुछ नहीं । और परसों, 30 दिसंबर, के समाचारपत्र ‘हिंदुस्तान’ का भी एक पृष्ठ उसी प्रकार की भविष्यवाणी से भरा था, इस बार जन्ममाह पर आधारित । वस्तुतः ऐसे वर्षफल कई पत्र-पत्रिकाओं में दिसंबर-जनवरी के इस मौसम में और टेलीविजन चैनलों पर पढ़ने को मिल जाते हैं । इतना ही नहीं, बाजार में अलग-अलग नामराशियों के वर्षफलों के विस्तार से चर्चा वाली पुस्तिकाएं भी उपलब्ध हो जाती हैं ।

ऐसी प्रकाशित जानकारी देखकर मेरे मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठ जाता है कि इन वर्षफलों की वाकई में कोई अहमियत है ? क्या लोग कही गई बातों पर विश्वास करते होंगे ? या ऐसी बातों को महज मनोरंजन के नाते पढ़ते होंगे ? मनोरंजन के लिए हम हास्य कविताएं सुनते हैं, व्यंगलेख पढ़ते हैं, बेतुकी हरकतों वाले वचकानी हेसी वाले टीवी सीरियल देखते हैं, इत्यादि । ठीक वैसे ही ये राशिफल, वर्षफल भी पढ़े जाते होंगे, लेकिन गंभीरता से इन्हें शायद ही कोई लेता होगा ।

इन्हें गंभीरता से लिया भी नहीं जा सकता है, क्योंकि इनका कोई तर्कसम्मत आधार है ही नहीं । बस ऐसा होता है यह कहते हुए इनको सही ठहराने की कोशिश की जाती है । और वैसे भी ये बातें अनुभव में सही ठहरती नहीं । भला कैसे सही हो सकती हैं । एक ही राशिनाम अथवा जन्मदिन वाले अनेक लोग इस धरती पर पैदा हुए होंगे, जिनकी पारिवारिक पुष्ठभूमि में कोई समता नहीं होगी; उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वाथ्य तथा क्षमता में समानता की कोई संभावना नहीं; उनके परिवेश अलग-अलग होंगे; उनकी शिक्षा-दीक्षा में भी परस्पर भेद होगा ही; व्यावसायिक दृष्टि से भी उनमें समानता की उम्मीद की नहीं जा सकती है; इत्यादि । तब कैसे एक ही वर्षफल सबके लिए स्वीकार्य हो सकता है ?

इसके अतिरिक्त इस पर भी गौर करें कि लोगों के नाम राशियों के अनुसार हों यह आवश्यक नहीं । मैंने सुना है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में तो राशिनाम प्रयोग में न रखने को प्रचलन है, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा करने पर उम्र घटती है । आजकल तो लोग खोज-खोजकर ऐसा नाम रखने लगे हैं जिसे किसी ने सुना ही न हो – एकदम नया, दुनिया में अकेले एक व्यक्ति का । वैसे भी यह संभावना भी रहती है कि राशि पर आधारित नाम अच्छा लगे । मेरे उत्तराखंडीय समाज में राशिनाम का चलन है, फिर भी मेरा स्वयं का नाम मेरे पिताश्री ने कुछ हटकर चुना था । ऊपर मैंने रूपायन का उल्लेख किया ह, जिसमें नाम के प्रथम अक्षर के वर्षफल के साथ किसी सिनेतारिका अथवा महिला खिलाड़ी का उदाहरण भी दे रखा है । उन्हीं में शामिल है एक मुस्लिम महिला का नाम । मुझे पूरा विश्वास है कि इस्लाम धर्मावलंबियों में महीने की तारीखों के अनुसार नाम रखने की कोई परंपरा नहीं है । अगर होगी भी तो वह ‘हिजरी’ कलेंडर पर आधारित होगा न कि ख्रिस्तीय कलेंडर पर । तब संबंधित भविष्यवक्ता ने अपनी विधि उस महिला पर भी कैसे इस्तेमाल कर दी होगी ?

और गहराई से सोचने पर मन में सवाल उठता है कि कार्य-कारण (कॉज एंड इफेक्ट) के जिस सिद्धांत का उपयोग तार्किक विवेचना में किया जाता है वह ऐसी भविष्यवाणियों के मामले में कहीं नजर नहीं आता है । सवाल यह है किसी दिन विशेष पर पैदा हुए व्यक्ति का भविष्य किस प्रक्रिया के द्वारा जन्मतिथि निर्धारित करती है ।

कुल मिलाकर ऐसी कवायद की अहमियत शुद्ध मनोरंजन के अलावा कुछ और नहीं हो सकती है । भौतिकी (फिजिक्स) के अनुसार तो भविष्य जाना ही नहीं जा सकता है !! – योगेन्द्र जोशी

 

विजयादशमी के पर्व पर व्यक्त विचार: बेचारा रावण

विजयादशमी के पावन पर्व पर
सभी देशवासी एवं विदेशवासी भारतीयों को
मेरी मंगलकामनाएं

आज विजयादशमी का पर्व संपन्न हो चुका है । देश भर में अपने-अपने तरीके से इस मनाया गया है । इस पर्व पर देश के कई भागों में रावण के पुतले के दहन की परंपरा प्रचलन में है । कहा जाता है कि जब भगवान् श्रीराम ने रावण का वध करके लंका पर विजय पाई और वे अयोध्या लौटे तब नगरवासियों ने हर्षोल्लास के साथ विजय पर्व मनाया था । उसी घटना की स्मृति में यह पर्व रावण-दहन के रूप में मनाया जाता है ।

विजयादशमी बुराई के ऊपर अच्छाई की, असत्य के ऊपर सत्य की, अनर्थ के ऊपर अर्थ की, कदाचार के ऊपर सदाचार की, स्वोपकार के ऊपर परोपकार की, जीर के रूप में देखा जाता है । रावण को बुराई के प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत करते हुए उसका दहन किया जाता है, और उस दहन को समाज में व्याप्त बुराइयों के खात्मे के संकेत के तौर पर देखा जाता है । रावण-दहन समाज की बुराइयों के खात्मे के संकल्प की याद दिलाता है, ऐसा समझा जा सकता है ।

क्या रावण-दहन वाकई में बुराइयों को दूर करने का संकल्प व्यक्त करता है, और क्या यह लोगों को अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे पाता है ? या यह एक विशुद्ध उत्सव भर है जिसे हम साल में इस दिन मनाते हैं और फिर अगले साल के उत्सव का इंतजार करते हैं । भले ही हम विजयादशमी के दिन संपन्न रावण-दहन की व्याख्या तरह-तरह से करें, हकीकत यह है कि यह भी होली-राखी के पर्व की तरह ही महज एक पर्व है – आज मनाया और साल भर के लिए भूल गए ।

मुझे नहीं लगता है कि लेखों-व्याख्यानों में कही जाने वाली ‘अच्छाई की जीत एवं बुराई की हार’ जैसी औपचारिक बातें वास्तविक जीवन से कोई ताल्लुक रखती हैं । मुझे तो यह मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों की तरह का एक और कार्यक्रम लगता है । बड़े-बड़े पुतले जलाओ, पटाखे छोड़ो, आतिशबाजी दिखओ, और एक दर्शनीय नजारा जुटी हुई भीड़ के सामने पेश करो, बस । बुद्धिजीवीगण राहण-दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर भले ही दर्ज करें, आम जन के लिए तो यह एक तमाशा भर है, जिसे देखने बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी भीड़ में शामिल होते हैं । रावण-दहन के बाद जिंदगी अपने ढर्रे पर चल निकलती है । जिसे घूस लेना है वह लेता रहेगा, जिसे दूसरे की संपदा हथियानी है वह हथियाएगा, जिसे कमजोर का शोषण करना है वह करता रहेगा, जिसे गुंडई-बदमाशी करनी है वह करेगा ही है । रावण का पुतला जले या न यह सब यथावत् चलता रहेगा । समाज में अच्छाई-बुराई का मिश्रण चलता रहेगा । फिर किस बात को लेकर बुराई पर अच्छाई की जीत कहें ? बुराई का प्रतीक तो जल जाता है, लेकिन बुराई बनी रहती है ! इस संसार का यही सच है ।

मैंने एसे अवसरों पर लोगों को कहते सुना है और लेखों में पढ़ा है कि हमें ‘यह करना चाहिए, वह करना चाहिए; ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए’ आदि-आदि । क्या वयस्क मनुष्य इतना नादान होता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं का ज्ञान ही न हो ? अगर विशेषज्ञता स्तर की बात हो तो संभव है कि आम आदमी को बहुत कुछ समझाना पड़े । जैसे आदमी को यह बताने की आवश्यकता होती है कि हृद्रोग से कैसे बचा जाए, इंटरनेट कैसे काम करता है, केमिस्ट्री में पॉलिमराइजेशन क्या होता है, भौतिकी का सापेक्षता सिद्धांत क्या है, इत्यादि । लेकिन एक व्यक्ति के समाज के प्रति क्या कर्तव्य हैं यह भी कोई बताने की चीज है ? क्या यह भी किसी से कहा जाना चाहिए कि उसे नियम-कानूनों का पालन करना चाहिए और अपराध नहीं करना चाहिए । हम सब ये बातें बखूबी जानते हैं, लेकिन आदत से बाज नहीं आते हैं ।

इसमें दो राय नहीं कि यदि सभी लोग अपने-अपने हिस्से के कर्तव्य निभाएं तो समाज में बुराइयां ही न रहें । लेकिन ऐसा होता नहीं है । किसको क्या करना चाहिए यह तो सभी बता देते हैं, परंतु यह कोई नहीं बताता कि जब कोई कर्तव्य-पालन नहीं करता तो क्या करें । मुझे आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बता सके कि तब क्या करें । आप अपराध करने वाले को सजा दे सकते हैं (वह भी इस देश में कम ही होता है !), लेकिन वह अपराध ही न करे, उस प्रवृत्ति से बचे, इसके लिए कोई क्या करे ? कुछ नहीं कर सकते न ! तब भ्रष्टाचार यथावत् बना रहेगा ।

रावण हर वर्ष जलेगा । बार-बार जलने के लिए उसे अस्तित्व में बना रहना है । रावण की अहमियत बनी रहे इसके लिए भ्रष्टाचार को भी बने रहना है । बेचारा रावण, समाज उसे बार-बार मरने को मजबूर करते आ रहे हैं । हा हा हा … ! जय हिंद – योगेन्द्र जोशी

मध्यम वर्ग की बढ़ती संपन्नता का अभिशाप – बीजिंग में कारें और यातायात एवं प्रदूषण समस्या

चंद रोज पहले मेरी नजर बीबीसी की एक खबर पर पड़ी, जिसका विवरण इस वेब-पेज पर उपलब्ध  है: http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2010/12/101224_beijing_car_pp.shtml चीन की राजधानी बीजिंग में कारों की बढ़ती आबादी और तज्जन्य यातायात की गंभीर होती जा रही समस्या के बारे में थी वह खबर । मेरी नजर में खबर रोचक ही नहीं बल्कि चिंतनीय  भी थी, क्योंकि उसके निहितार्थ गंभीर हैं । महानगरीय यातायात (ट्रैफिक) की समस्या तो विकसित हो रहे सभी देशों में देखने को मिल रही है, और यह बात कोई नयी खबर अब रह नहीं गयी है । संदर्भगत खबर मेरे लिए इसलिए अहम थी, क्योंकि बीजिंग के राजमार्ग की तस्वीर कुछ हद तक मेरी कल्पना से परे की थी । मैं अभी तक चीन को विकास के संदर्भ में अमेरिका के नजदीक नहीं समझता था और नहीं सोचता था कि सड़क के फ्लाइओवरों के इतने लंबे-चौढ़े जाल वहां भी विकसित हो चुके होंगे और यह भी कि रात के प्रथम प्रहर – समय यही रहा होगा – उन पर कारों की इतनी जबर्दस्त भीड़ दौड़ रही होगी, जैसा खबर के साथ की तस्वीर में दिख रहा था ।
खबर का असल मुद्दा बीजिंग की गंभीर होती यातायात समस्या थी । यह बताया गया है कि बीजिंग की सड़कों पर कारों का बोझ तेजी से न बढ़े इसके उपाय खोजे जा रहे हैं । इस दिशा में अपनाया गया पहला और कारगर उपाय है कारों की विक्री पर आंशिक रोक । नगर प्रशासन ने घोषित किया है कि बीजिंग के बाशिंदों को 2011 में केवल 2 लाख 40 कारें खरीदने की अनुमति होगी । यह संख्या पिछले साल खरीदी गयीं तकरीबन 7 लाख कारों के मुकाबले लगभग एक-तिहाई है । उक्त सरकारी निर्णय से जनता और निवेशक, दोनों, नाखुश हैं – जनता इसलिए कि उसकी निजी कार रखने की ख्वाहिश पर अड़ंगा लगता है, और निवेशक इसलिए कि उनके लाभ कमाने के अवसर घटते हैं । इस समय कार-डीलरों के पास भीड़ लगी हुई है, ताकि लोग प्रतिबंध के प्रभावी होने से पहले ही अपने अरमान पूरे कर सकें ।

संप्रति बीजिंग यातायात एवं प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है । सड़कें तेजी से बढ़ती कारों की संख्या को किस हद तक बरदास्त कर सकेंगी यह एक कठिन सवाल उठ चुका है । सड़कों का चौड़ीकरण और फ्लाईओवरों का जाल भी एक सीमा से अधिक संभव नहीं है । इसलिए कारों की संख्या अंधाधुंध न बढ़ने पाए इसके लिए प्रयास तो होने ही चाहिए । यही वहां का नगर प्रशासन करने जा रहा है । यह तो गनीमत है कि चीन में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है, अन्यथा इस प्रकार का कथित प्रतिबंध संभव न होता । अपने देश में तो ऐसे प्रतिबंध का स्वागत धरना, प्रदर्शन, तोड़फोड़ तथा आगजनी के द्वारा होता, लेकिन बीजिंग में यह सब संभव नहीं है ।

इस संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि बीते दो-ढाई शताब्दियों में परवान चढ़ी औद्योगिक प्रगति का सीधा-सा परिणाम यह रहा कि पूरी दुनिया में एक नई वैश्विक संस्कृति ने जन्म लिया । वे जीवन मूल्य जो सदियों से अलग-अलग क्षेत्रों एवं समाजों में आदर पा रहे थे एक-एककर धराशायी हो गये । उसके साथ ही विश्व में सर्वत्र भोगवादी जीवनशैली ने अपने पांव पसारे । आज सर्वत्र अधिकाधिक तेजी से आर्थिक विकास की होड़ लगी है जिसके केंद्र में है उत्तरोत्तर आगे बढ़ता उपभोक्तावाद । आर्थिक प्रगति का मतलब ही है कि उपभोग्य वस्तुओं का अधिकाधिक उत्पादन हो । उनका उत्पादन बढ़े इसके लिए आवश्यक है कि उनकी खपत बढ़े और विशाल से विशालतर आकार लेता एक ऐसा संपन्न वर्ग समाज में पैदा होवे जो उन वस्तुओं का उपभोग करे । आज के युग में इस उद्येश्य से औद्योगिक संस्थाएं लगातार इस प्रयास में लगी हुई हैं कि नित नये आकर्षक उत्पाद बाजार में उतारे जाएं । इतना ही नहीं, कारों की भांति जो वस्तुएं टिकाऊ प्रकृति की हों उनके नये-नये मॉडल उपभोक्ता के समक्ष ‘परोसे’ जाएं । संस्थाओं द्वारा खपत बढ़ाने के लिए मति ‘मूड़’ सकने वाले विज्ञापनों को सहारा लिया जाता है और लोगों को उधार या कर्ज जैसी तात्कालिक मदद उपलब्ध कराते हुए भोगवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है । इस दिशा में किए जा रहे सभी प्रयत्न सफल हो रहे हैं । लोगों की संपन्नता बढ़ रही है और उसके साथ वे सुविधाभोग के आदी होते जा रहे हैं । कुल मिलाकर उपभोक्तावाद सफल हो चला है । यह बात अलग है कि जहां एक ओर संपन्न वर्ग का आकार बढ़ रहा है तो वहीं विपन्न लोगों की संख्या भी कम नहीं हो रही है । कम से कम भारत जैसे देश के तो यही हालात हैं । शायद चीन में भी गरीबों की संख्या बहुत नहीं घट रही होगी । असल बात तो यह है कि वहां के असली हालातों की सटीक खबर कम ही मिल पाती है ।

अस्तु, इस समय सभी विकासशील देशों में निजी कारों की ललक तेजी से बढ़ रही है । इन देशों की ऊंची विकास दर के फलस्वरूप आर्थिक रूप से जो संपन्न मध्यम वर्ग उभर कर आ रहा है वह सुखसुविधाओं के तमाम साधन जुटाने में लगा है और उन साधनों में कारें प्रमुख हैं । दिलचस्प बात यह है कि कार जैसे तमाम आधुनिक साधन सुखसुविधा के लिए ही नहीं जुटाये जाते हैं, बल्कि ये सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रबल आधार भी बन चुके हैं । लोग कारें केवल इसलिए नहीं खरीदते हैं कि ये उनके दैनिक जीवन में सुविधाजनक सिद्ध होते हैं । वे तो इस बात से भी पे्ररित होते हैं कि उनके पड़ोसी, सहयोगी अथवा नाते-रिश्तेदार के पास कार है । हर कोई बराबरी ही नहीं बल्कि इन तमाम लोगों के आगे निकलना चाहता है संपन्नता में और फिर उसके प्रदर्शन में । शायद ही कोई तुलना किए बिना स्वयं में संतुष्ट रहने की कला सीखना चाहता होगा । सर्वत्र आगे निकल जाने की होड़ मची है और कारें उसका एक परिणाम है ।

वैसे भी संपन्नता खुद में एक सामाजिक समस्या है । जी हां, क्योंकि आप यदि संपन्न है तो करेंगे क्या अपनी संपन्नता का ? कोई भी दान करने के लिए धन नहीं कमाता है । हां अपने अर्जित धन का एक छोटा हिस्सा दान में दे जरूर सकता है, किंतु ऐसे मामले नियम नहीं, अपवाद होते हैं । संपन्नता है तो धन का उपभोग व्यक्ति करेगा ही, सुविधाएं जुटाएगा ही, कार खरीदेगा ही । और तब पैदा होती हैं तरह-तरह की समस्याएं । जहां व्यक्ति श्रमहीनता के जीवन के कारण रोगी बन जाता है, वहीं वह प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा करता है, कार का उपभोग करते हुए ट्रैफिक-जाम के प्रति योगदान करता है । याद रहे अपने लिए सुख-साधन जुटाते वक्त शायद ही कोई व्यक्ति इस बात पर विचार करता होगा कि कहीं इस सबसे अन्य लोगों को असुविधा तो नहीं होगी । “समस्या पैदा हों तो हों मुझसे क्या मतलब” यह आम जीवन दर्शन है । इस संदर्भ में मेरी प्रार्थना है, “सर्वे भद्राणि पश्यन्तु” । – योगेन्द्र जोशी

वर्ष 2011 की भविष्यवाणी – राशिनाम को लेकर की गयी बेतुकी कवायद

बात 2011 के वर्षफल की

ज्योतिष् एक विवादास्पद विषय माना जाता है । दुनिया में बहुत-से लोग ज्योतिषीय भविष्यवाणी में विश्वास करते हैं । अपने देश में आस्थावानों की संख्या अपेक्षया अधिक ही है । यहां तो बहुत से सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार करने की ही परंपरा रही है । ऐसे बहुत ही कम लोग मिलेंगे जो ज्योतिष् पर आधारित भविष्यवाणियों को सिरे से नकार दें । लोगों में व्याप्त विश्वास के कारण ही देश के समाचार माध्यमों पर ज्योतिष् संबंधी बातों की भरमार देखने को मिलती है । अब चंद घंटों के भीतर नये कलेंडर वर्ष का आगमन होने जा रहा है । यह उपयुक्त काल है जब टेलीविजन चैनल, पत्र-पत्रिकाएं एवं समाचारपत्र अपने पृष्ठों में नये वर्ष की संभावनाओं की भविष्यवाणियां भी शामिल करें – भविष्यवाणियां जो कहीं व्यक्तियों से संबंध रखती हैं तो कहीं व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय संदर्भ में कही जाती हैं । किसकी क्या सफलता/असफलता रहेगी, राजनैतिक गतिविधियां क्या रहेंगी, प्राकृतिक आपदाएं कितनी विकट होंगी, आदि की बातें । वह सब कितना सच सिद्ध होगा और कितना झूठ यह तो समय बीतने पर ही स्पष्ट हो पाएगा, किंतु कुछ बातें तो जाहिरा तौर पर ही बेतुकी नजर आती है । मैं भविष्यवाणियों के ऐसे ही एक वाकये की बात करने जा रहा हूं ।

मेरे हिंदी दैनिक समाचारपत्र के साथ एक साप्ताहिक परिशिष्ट भी नियमतः आया करता है । आज के अंक के साथ जो परिशिष्ट मिला है वह वर्ष 2011 के लिए ज्योतिषीय भविष्यवाणी को समर्पित है । इसमें बारहों राशियों से संबंधित लोगों के भविष्य की प्रमुख दशा-दिशा की बातें कही गयी हैं । प्रत्येक राशि के लोगों के बारे में अगले वर्ष की संभावनाओं की चर्चा के साथ ही देश केे स्तर पर ख्यात एक-एक हस्ती के बारे में भी दो-चार शब्द कहे गये हैं । जैसा सोचा जा सकता है हमारे देश में सर्वाधिक महत्त्व फिल्मी हस्तियों की दिया जाता है, और उसी के अनुरूप उक्त परिशिष्ट में 12 में से 10 फिल्मी दुनिया से ही चुनी गयी हैं, तकरीबन सभी तारिकाएं, जिनमें से एक मुस्लिम समुदाय की है । इनके अतिरिक्त मात्र एक महिला खेल-कूद की दुनिया से है – बैडमिंटन के क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय स्तर की मौजूदा नामी खिलाड़ी । और दूसरी अपने देश की शीर्षस्थ यानी नंबर एक दलित राजनेत्री (बोलचाल में राजनेता) ।

राशिनाम

जिन भविष्यवाणियों पर मैं टिप्पणी कर रहा हूं वह पूरी तरह राशिनामों पर आधारित है । मतलब यह है कि आपकी राशि क्या है यह आपके नाम के प्रथम अक्षर पर निर्भर करता है । जैसे चू, चे चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ में से किसी एक से आरंभ होने वाले नाम वाले व्यक्ति की राशि मेष होगी । क्या इसका मतलब यह है कि नाम से किसी की राशि निर्धारित होती है ? जी नहीं, नाम से राशि निर्धारित नहीं होती है, बल्कि राशि के अनुसार नाम चुना जाना चाहिए यह ज्योतिषीय परंपरा है । ज्योतिषियों का सुझाव रहता है कि व्यक्ति (तकनीकी भाषा में जातक) का नाम उसकी राशि को ध्यान में रखकर चुना जाना चाहिए, और यह राशि वस्तुतः चंद्र-राशि होती है । चंद्र-राशि वह राशि है जिसमें चंद्रमा उस काल में स्थित होता है जब ‘जातक’ जन्म लेता है । सुविधा एवं व्यक्ति की राशि का त्वरित ज्ञान हो सके इस प्रयोजन से ज्योतिषियों ने वर्णमाला के विभिन्न अक्षरों (समुचित स्वर-मात्रा के साथ) को इन राशियों से संबद्ध किया गया है । साफ जाहिर है कि जातक के जन्म का सही-सही समय का हिसाब रखा जाना चाहिए और राशि की गणना करते हुए जातक का नामकरण किया जाना चाहिए ।

परंतु नामकरण की यह व्यवस्था व्यापक नहीं है । मेरा अनुमान है कि यह परंपरा ब्राह्मणों तक सीमित है और वह भी शायद सर्वत्र नहीं । मेरी जानकारी के अनुसार पूर्वांचल में राशिनाम का उल्लेख केवल जन्मकुंडली में रहता है, और व्यक्ति को संबोधित करने के लिए कोई ‘अच्छा-सा’ वैकल्पिक नाम चुना जाता है । मैंनं इस आम धारणा के बारे में भी सुना है कि राशिनाम से किसी को संबोधित करने से उसकी उम्र घटती है । वस्तुतः बच्चों का नामकरण बिरले लोग ही राशि को ध्यान में रखकर करते हैं । भले ही राशिनाम क्या होना चाहिए यह लोग जानते हों, लेकिन वे अपनी पसंद से नाम ही चुनते हैं । इसलिए जब आप व्यक्तियों के नाम सुनकर ही राशि की बात करते हैं तो ज्योतिषीय विसंगति के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं । पहले यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि प्रश्नगत कोई नाम राशि पर आधारित है भी कि नहीं । उक्त मौलिक सिद्धांत पर ध्यान दिए बिना ही नाम के आधार पर भविष्यवाणी करना लोगों को मूर्ख बनाने से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है

मेरे विचार में शायद ही किसी फिल्मी हस्ती का नाम उसकी राशि से संबंधित हो । वे सब आवश्यकतानुसार आकर्षक नाम चुनने से नहीं हिचकते हैं । मैंने कहा कि ज्योतिषीय चर्चा में एक मुस्लिम महिला भी शामिल की गयी है । मुझे पूरा विश्वास है कि उसका नाम राशि पर विचार के साथ नहीं रखा गया होगा । मेरी जानकारी में मुस्लिम समाज में हिंदू ज्योतिष् की मान्यता नहीं है । यह भी मैंने कहा है कि एक दलित राजनेत्री के बारे में भी कुछ बातें कही गयी हैं । क्या जन्म के समय उस राजनेता के तब के ‘गरीब’ माता-पिता ने पंडितजी से सलाह करके उसका नाम रखा होगा ? दलित और वह भी गरीब, भला कौन पंडित मुंह लगाएगा ? उसके राशिनाम पर भी मुझे शंका है । असल बात तो यह है कि आजकल लोग शब्दकोश में खोज-खोज कर नितांत नये-नये लुभावन नाम अपने बच्चों के लिए चुनने लगे हैं । गौर करें तो कई बार अ से आरंभ होने वाले नामों की भरमार देखने को मिलती है । किसी-किसी दौर में तो कुछ नाम अत्यधिक लोकप्रिय हो जाते हैं और उस दौर के लोगों में वह नाम आम दिखाई देता है । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत कम ऐसे नाम सुनने में आयेंगे जो ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार हों ।

सौर मास आधारित राशि

ऐसी स्थिति में नाम पर आधारित भविष्यवाणी का अर्थ ही क्या रह जाता है ? चलते-चलते एक बात और । पाश्चात्य ज्योतिष् में सूर्य पर आधारित राशि का प्रचलन है । अर्थात् व्यक्ति के जन्म के समय सूर्य जिस राशि में हो वही व्यक्ति की राशि कहलाती है । पाश्चात्य ज्योतिष् में एक कलेंडर माह के 27-28 तारीख के आसपास सूर्य नयी राशि में प्रवेश करता है और तीसएक दिन उस राशि में रहता है । इस काल में जन्मे सभी लोग एक ही राशि में माने जाते हैं और उनके लिए कमोबेश एक ही वर्षफल मान्य रहता है । किंतु इसी बीच चंद्रमा बारहों राशियों का चक्रमण कर चुका होता है और भारतीय ज्योतिष् के अनुसार बारह प्रकार की भविष्यवाणियां उन लोगों के लिए क्रमशः बताई जाती हैं । है न विसंगति ? कौन-सी पद्धति वस्तुतः सही है । इतना ही नहीं भारतीय ज्योतिष् में सूर्य एक राशि से दूसरे में संक्रमण कलेंडर माह के करीब 14-15 तारीख के आसपास करता है, जैसे 14-15 जनवरी में वह मकर राशि में प्रवेश करता है (माघ मास) । तदनुसार दो महीनों की उक्त तारीखों के बीच जन्मे व्यक्तियों की ‘सौर-राशि’ एक रहती है, जो पाश्चात्य पद्धति से मेल नहीं खाती । फिर सही क्या है ?

मीडिया में वर्णित ज्योतिषीय बातें सार्थक होती हैं यह बात संदेहास्पद है, किंतु वे मनोरंजन का अच्छा मसाला जरूर बनाते हैं । लोग विश्वास न भी करें तो भी चाव से ऐसी बातें पढ़ते हैं, और एकबारगी उसे सच मानकर प्रमुदित भी हो लेते हैं, एक प्रकार की तसल्ली पा लेते हैं । परंतु गंभीरता से इन बातों को लेने का कोई तुक नहीं बनता । पाठकवृंद इस बात के लिए क्षमा करें कि मैं इन्हें ऊटपटांग बातें मानता हूं । – योगेन्द्र जोशी

आज 21 जून फादर्स डे – जून का तृतीय रविवार

आज ‘फादर्स डे’ (Fathers’ day) है । मदर्स डे की भांति यह भी पश्चिम से अपने देश में आयातित एक और पर्व-दिवस है, और उसी की तरह हालिया डेड़-दो दशकों में देश के मध्यम तथा उच्च वर्गीय शहरी नवयुवाओं में लोकप्रिय हो चला है । इसे क्यों और कैसे मनाया जाए जैसे कुछ सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए, इसलिए कि अपने यहां तो उत्सवों और दिवसों की पहले से ही भरमार है । उनकी तुलना में इन आयातित दिवसों को अधिक अहमियत देना क्या उचित माना जा सकता है इस बात की समीक्षा की जानी चाहिए । अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने से पहले मैं इस ‘दिवस’ के बारे में उपलब्ध किंचित् जानकारी का संक्षेप में जिक्र करना समीचीन समझता हूं ।

कहा जाता है कि ‘फादर्स डे’ मनाने का विचार प्रथम बार एक अमेरिकी महिला, सोनारा लुई स्मार्ट (Sonora Louise Smart), के मन में तब आया जब वह वेस्ट वर्जीनिया के फेयरमॉंट नगर ( Fairmont, West Virginia) के एक चर्च (आज का Central United Methodist Church) में धर्मोपदेश सुन रही थीं । उपदेष्टा ने अपने कथनों में प्रसंगवश ‘मदर्स डे’ की चर्चा की थी । उस चर्चा से प्रेरित होकर सुश्री सोनारा को विचार आया था कि क्यों नहीं मदर्स डे की भांति फादर्स डे भी मनाया जाए, जिस दिन लोग अपने पिताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें । वस्तुतः सोनारा अपने पिता से बहुत प्रभावित रहीं, जिनके प्रति उनके मन में अपार सम्मान था । मां की छत्रछाया तो वह किशोरावस्था में ही खो चुकी थीं और उनके जीवन का अधिकांश भाग पिता के ही संरक्षण एवं सान्निध्य में बीता था । फादर्स डे के मूल में यही तथ्य कारगर था ।

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मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, दिस डे, दैट डे …

बीते कल ‘मदर्स डे’ था, मई मास का दूसरा रविवार । मीडिया में इसका खूब जिक्र था, खूब प्रचार था । शहरी नवयुवाओं-नवयुवतियों ने खूब उत्साह से इसे मनाया होगा ऐसा मेरा अनुमान है । ग्रामीण अंचलों में इसका ‘क्रेज’ अभी शायद नहीं पहुंचा है । मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे आदि कुछ दिवस हैं जो हालिया वर्षों में पश्चिम से अपने देश में आयातित हुए हैं, कोई दो-ढाई दशक पहले । वैसे देश में दिवसों की कोई कमी कभी नहीं रही । कभी किसी ‘महापुरुष’ के जन्मदिन के नाम पर, तो कभी देश की किसी स्मरणीय उपलब्धि के नाम पर, और कभी किसी राष्ट्रीय/अंताराष्ट्रीय समस्या के प्रति जागरूकता फैलाने के नाम पर, इत्यादि । अधिकांश दिवस राष्ट्रीय महत्त्व रखते हैं, परंतु दिखावे के शौकीन आधुनिक संपन्न शहरी नवयुवाओं-युवतियों के मन में उनके प्रति विशेष आकर्षण नहीं रहता । किंतु ‘सामाजिक संबंधों’ को औपचारिकता का जामा पहनाने वाले उक्त दिवस अवश्य आकर्षण रखने लगे हैं ।

‘मदर्स डे’ नाम से कोई पर्व या उत्सव अपने देश में कभी मनाया जाता रहा हो ऐसा मेरी जानकारी में तो नहीं है । अन्य प्राच्य देशों में भी कहीं इस प्रकार के किसी दिवस का जिक्र सुनने को नहीं मिलता है । मैंने अंतरजाल से जानकारी जुटाई तो पता चला कि आजकल के ‘मदर्स डे’ का इतिहास पुराना नहीं है । वैसे इस बात का उल्लेख किया जाता है कि प्राचीन काल में यूनान में ‘मातृ उत्सव’ मनाने का चलन था । इसे वहां वसंत ऋतु में देवी-देवताओं की जननी ‘रीआ’ (Rhea), धनधान्य एवं वंशवृद्धि की देवी, की पूजा के रूप में मनाया जाता था । रोम में वही देवी ‘ऑप्स’ (Ops) के नाम से पुकारी तथा पूजी जाती थी । ‘एशिया माइनर’ क्षेत्र में उक्त देवी ‘सिबली’ (Cybele) के नाम से पुकारी जाती थी ।

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पदासीन व्यक्ति के चरणस्पर्श: कितना उचित?

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यहां आरंभ में दिये गये छबिचित्र पर गौर करें । चित्र किस अखबार में छपा है और किस प्रसंग से संबंद्ध है यह चित्र में ही अंकित है । चित्र में शिल्पकला में निपुण एक उम्रदराज व्यक्ति को देश की माननीया राष्ट्रपति महोदया के चरणस्पर्श करते हुए दिखाया गया है । मुझे तो राष्ट्रपति महोदया भी से चरणस्पर्श की प्रक्रिया को सहज रूप से स्वीकार करती हुयी लगती हैं । दिखाये गये कलाकार महोदय संभवतः माननीया राष्ट्रपतिजी के समवयस्क हों और स्वयं में अपने क्षेत्र में लब्धप्रतिष्ठ एवं सम्मानित व्यक्ति हों । (मैं उन्हें नहीं जानता, और जानने को तो राष्ट्रपति महोदया के बारे में भी मुझे कुछ मालूम न होता, यदि वे देश के सर्वोच्च पद पर न पहुंचीं होतीं !) अखबार में उक्त चित्र देख मेरे मन में एक प्रश्न उठा थाः किसको किसके चरणस्पर्श करने चाहिए थे ?

मुझे याद है कि बचपन में मेरे पिताजी ने मुझे यह समझाया था कि हर किसी के चरणस्पर्श नहीं किये जा सकते हैं । ऐसा केवल रिश्ते में बड़े, अतिनिकट के पारिवारिक संबंधियों, यथा माता-पिता, चाचा-मामा आदि, के साथ ही स्वीकार्य है । अथवा अपने गुरु के चरणस्पर्श किये जाने चाहिए या उस महात्मा के जो अपने आध्यात्मिक एवं दार्शनिक ज्ञान के आधार पर समाज में गुरु के तुल्य का दर्जा पा चुका हो । कुछ इसी प्रकार की बातें उन्होंने कही थीं, और हिदायत दी थी कि हरएक के प्रति आदरभाव को व्यक्त करने का यह रास्ता मैं न अपनाऊं । और मैंने उनके द्वारा सुझाये विचार को ही स्वयं अपनाया और ध्यान में रखा कि ऐरा-गैरा कोई भी मेरे पांव न छुए, मेरे पढ़ाये छात्र भी नहीं । शेष के लिए क्लिक करें >>