उत्तर प्रदेश में योगी-राज: अभी तक तो असफल होता दिख रहा है

मेरी कुमाउंनी बोली (उत्तराखंड) में एक कहावत है: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब बताने से पहले सोचता हूं कि इसमें एक कड़ी और जोड़ दूं: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि चेलि थैं कै, चेलिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब कुछ यों समझ सकते हैं: किसी कार्य को निबटाने के लिए सास ने बहू (पुत्रवधु) से कहा; बहू ने उसे करने के लिए बेटी को कहा; अल्पवयस्क बेटी ने कार्य की गंभीरता समझे बिना कुत्ते से कहा; और कुत्ते ने स्वभाव के अनुकूल पूंछ हिला दिया। कार्य जैसा का तैसा रह गया।

शासन – अंतर नहीं दिखता

ऊपर्युक्त कहावत हमारे शासकीय तंत्र के चरित्र पर काफी हद तक लागू होती है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता सम्हाले योगी आदित्यनाथ को अब तीन माह होने को हैं। इस अल्पावधि में वे जनता की तमाम उम्मीदों को पूरा करते हुए दिखने लगें ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखता। फिर भी कुछ बातें हैं जिनकी झलक नये शासकीय तंत्र में दिखनी ही चाहिए थीं। मैं यह उम्मीद करता था कि जो भाजपा चुनावों के दौरान जोरशोर से कहती थी कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है और अपराधी खुले घूम रहे हैं उसी दल के नेता और कार्यकर्ता अब अपनी अराजकता दिखा रहे हैं। अगर आप समाचार माध्यमों पर विश्वास करें तो ऐसी वारदातें सुनने-देखने में आई हैं जिनमें किसी न किसी बहाने भाजपा के नेता-कार्यकर्ता कानून व्यवस्था अपने हाथ में लिए हों। बसपा एवं सपा की पूर्ववर्ती सरकारों में आपराधिक छवि वाले उनके कार्यकर्ता असामाजिक कृत्यों में लिप्त रहते थे। अब वैसा ही कुछ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं। नयी शासकीय व्यवस्था में भाजपा के लोगों को अनुशासित होकर आम जन के समक्ष दल की अच्छी छवि पेश करनी चाहिए थी। ऐसा हुआ क्या?

योगी जी ने जब सत्ता सम्हाली तो उन्होंने गरजते हुए घोषणा की कि अपराधी तत्व प्रदेश छोड़कर चले जायें अन्यथा वे सींखचों के पीछे जाने के लिए तैयार रहें। इस संदेश से अपराधियों के बीच भय की भावना जगनी चाहिए थी। ऐसा हुआ नहीं। आपराधिक घटनाएं कमोबेश वैसी ही हो रही हैं जैसी बीते समय में हो रही थीं। जो सपा शासन आपराधिक वारदातों के लिए बदनाम रही है वह भी अब कह रही है, “कहां हुए अपराध कम?”

मेरी जानकारी में योगी जी का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है। पूर्णतः अनुभवहीन व्यक्ति को समुचित निर्णय लेने में दिक्कत हो सकती है। हमारे लोकतंत्र में यह अघोषित परंपरा रही है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अनुभवहीन व्यक्ति के लिए पर्दे के पीछे से मार्गदर्शन करने वाला कोई न कोई रहता है। सुना ही होगा कि कैसे महिला ग्रामप्रधानों के कार्य संपादन उनके पतिवृंद करते आए हैं। बिहार में श्रीमती रावड़ी मुख्यमंत्री बनीं (बनाई गयीं) तो उनके पति लालू जी ही दरअसल राजकाज में मदद कर रहे थे। जब अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बिठाया गया था तो उनके पीछे पिता मुलायम जी का मार्गदर्शन था। लेकिन ऐसा कुछ योगी जी के साथ नहीं है यही मैं समझ रहा हूं। ऐसा नहीं कि इतिहास में सदैव अनुभवी ही सफल होते आये हों। कई बार एकदम नया व्यक्ति भी सफल शासक सिद्ध होते हैं। योगी जी उस श्रेणी में हैं ऐसा नहीं लगता।

प्रशासनिक तंत्र

योगी जी ने सत्ता पर काबिज होते ही अनेकानेक निर्देश अपने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए। उन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है इसे वे क्या समझ पाये हैं? और जो अधिकारी निर्देशों के अनुसार नहीं चल रहा हो उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गयी? लेख के आरंभ में जो मैंने सुनाया, “सास ने बहू से …” वह प्रशासनिक तंत्र पर लागू होता  है। मुख्यमंत्री शीर्षस्थ अधिकारियों को निर्देश देते हैं, वे कनिष्ठ अधिकारियों को, वे अपने मातहतों को, …।” ये सिलसिला चल निकलता है, और सबसे नीचले पायदान पर का व्यक्ति, “अरे ऐसे आदेश तो आते ही रहते हैं” की भावना से पुराने ढर्रे पर ही चलता रहता है। मेरी समझ में यही कारण होगा कि योगी-राज में अभी कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता है।  

निर्देशों की बात पर मुझे अपने वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक के रवैये का स्मरण हो आता है। बात सालों पहले की है जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था। मेरे विषय भौतिकी (फिज़िक्स) की प्रायोगिक कक्षा में वे अक्सर विलंब से पहुंचते थे। तब कहते थे, “अरे यार, भूल गये कि क्लास है।” कभी-कभी प्रयोगशाला-परिचर (लैब अटॆंडेंट) उन्हें बुलाने भी चला जाता था। मैं शिष्टता के नाते कुछ कहता नहीं था, लेकिन उनके भूलने को मैं “सुविधानुसार विस्मृति” (फ़गेटफ़ुलनेस ऑव्‍ कन्वीनिअंस) मानता था। मैं समझ नहीं पाता था कि जिस दायित्व के लिए व्यक्ति ने नियुक्ति स्वीकारी हो उसे उस दायित्व की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

योगीजी को यह क्यों कहना पड़ता है कि शिक्षक समय पर कक्षा में जायें, चिकित्सक परामर्श कक्ष में समय पर पहुंचें, पुलिस चौकी प्रभारी वारदात की एफ़आईआर दर्ज करें, आदि-आदि। यह तो संबधित अधिकारियों-कर्मियों के दायित्वों में निहित है। यह सब तो उन्हें करना ही करना है अपनी सेवा-शर्तों के अनुरूप। योगी जी को निर्देश निर्गत करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे दायित्वों के अनुसार कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर उन्हें अपने दायित्वों का ही ज्ञान न हो और उसमें रुचि ही न लें तो फिर शासकीय सेवा में क्यों हैं?

सरकारी ‘सेवा’ बल्लेबल्ले

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था क्यों घटिया दर्जे की है इसे समझना जरूरी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा उच्चतम श्रेणी की रहती है। ठीकठाक वेतन के अलावा कई प्रकार के लाभ और रियायतें, सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, आदि इस नौकरी की खासियतें हैं। जब इतना सब किसी को मिल रहा हो तो दायित्व-निर्वाह में ईमानदारी तो बरतनी ही चाहिए। परंतु दुर्भाग्य है कि नौकरी के लाभ तो सभी चाहते हैं किंतु बदले में निष्ठा से काम भी करें यह भावना प्रायः गायब रहती है।

निजी क्षेत्रों में व्यक्ति की अक्षमता माफ नहीं होती, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। लेकिन सरकारे नौकरी में निर्देश पर निर्देश दिए जाते हैं, या तबादला कर दिया जाता है, अथवा कुछ काल के लिए निलंबन। तबादला का मतलब यह है कि निकम्मेपन की जरूरत ‘यहां’ नहीं लेकिन ‘वहां’ है। वाह! लोगों को यह एहसास नहीं है कि निलंबन दंड नहीं होता है। यह तो महज एक प्रक्रिया है तथ्यों की छानबीन के लिए, ताकि दंडित करने न करने का निर्णय लिया जा सके। आम तौर पर 90 दिनों के अंतराल पर निलंबन वापस हो जाता है, और मुलाजिम बाइज्जत अपनी कुर्सी पर!

आजकल सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी देखी जाती है। इच्छुक जन हर प्रकार के हथकंडे अपनाते देखे जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी जन अपने-अपने चहेतों को नियुक्ति देते/दिलाते है। जातिवाद, भाई-भतीजाबाद, क्षेत्रवाद आदि की भूमिका अहम रहती है। जब नियुक्तियां ऐसी हों तो अच्छे की उम्मीद क्षीण हो जाती है।

सरकारी नियुक्तियां

नियुक्तियों में शैक्षिक एवं शारीरिक योग्यता (जहां और जैसी उसकी अहमियत हो) तो देखी जाती है, लेकिन किसी भी सरकारी विभाग में नियुक्तियों में आवेदक के बौद्धिक स्तर (इंटेलिजेंस कोशंट) एवं भावात्मक स्तर (इमोशनल कोशंट) का आकलन नहीं किया जाता है। मेरा मानना है कि इन दोनों का गंभीर आकलन नियुक्तियों में होना चाहिए। पुलिस बल में तो इनकी आवश्यकता कुछ अधिक ही है। ऐसे पुलिसकर्मियों की खबरें सुनने को मिलती हैं जिनकी हिरासत से अपराधी चकमा देकर भाग जाते हैं। साफ जाहिर है उनका बौद्धिक स्तर कम ही रहता है। इसी प्रकार वे कभी-कभी एफ़आइआर तक नहीं दर्ज करते हैं, खास तौर पर रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध, क्योंकि वे संवेदनशील नहीं होते हैं। हमें आम जनों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए यह भावना उनके मन में होनी चाहिए कि नहीं? अक्सर देखा गया है कि वे भुक्तभोगी का शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं।

जब संवेदेनाहीन व्यक्ति सरकारी तंत्र में हो तो वह आम जन के प्रति ही नहीं अपितु अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रति भी लापरवाह होता है। और यही इस उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह धारणा सरकारी मुलाजिमों के दिलों में गहरे बैठ चुकी है कि उन्हें उनके निकम्मेपन के लिए दंडित नहीं किया जायेगा। वस्तुतः प्रशासनिक तंत्र के संदर्भ में लापरवाही, कामचोरी, नकारापन, आदि सभी कुछ जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। एक बार नौकरी में घुस जाओ और जिन्दगी मजे में गुजार लो। बस अपने ऊपर के अधिकारियों को खुश रखो; काम करो या न, बस काम करते हुए-से दिखो।

पिछले 25-30 वर्षों में प्रदेश प्रशासनिक गिरावट के दौर से गुजर चुका है। उसे पटरी पर लाना आसान काम नहीं है। महज निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नही होने का यह योगी जी अभी तक समझ नहीं पाये हैं। उन्हें देखना चाहिए कि काम क्यों नहीं हो रहा है। यदि हो रहा है तो घटिया स्तर का क्यों हो रहा है। कुछ को दंडित करके दिखाएं; निलंबन से कुछ नहीं होने वाला।

निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नहीं होगा। निर्देश देना यानी “सास ने बहू से कहा, बाहू ने …”।

तंत्र वही है। उसका चरित्र अभी तो अपरिवर्तित ही है। इसलिए योगीराज की सफलता संदिग्ध है। – योगेन्द्र जोशी

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़। क्या वाकई छेड़छाड़ हो सकती है?

 

 

 

फ़रवरी-मार्च, 2017, के राज्यस्तरीय चुनाव

विगत फरवरी-मार्च में संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को अच्छी कामयाबी मिली थी खास तौर पर उत्तर प्रदेश में। इस राज्य में उसे उम्मीद से कहीं अधिक विधानसभा सीटें मिलीं और सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा को बहुत कम। बसपा तो उम्मीद लगाये बैठी थी कि इस बार वही सत्ता पर काबिज होगी। अपनी करारी हार से तिलमिलाई बसपा ने तुरंत ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। मायावतीजी ने दावा किया कि भाजपा ने ईवीएम के साथ छेड़खानी करके/करवाके सीटें पाई हैं।

उधर पंजाब में “आआपा” (आप) के संयोजक केजरीवालजी आश्वस्त थे कि सत्ता तो उन्हीं के हाथ में आनी है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के मुकाबिले वे कहीं के नहीं रहे। कांग्रेस अच्छे-खासे बहुमत के साथ सरकार बना गयी। केजरीवालजी ने भी ईवीएम के साथ छेड़खानी की बात कह दी और भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उनका तर्क या कुतर्क सुनिए: “भाजपा ने कांग्रेस को जिताया, क्योंकि वे स्वयं जीतते तो उनकी पोल खुल जाती। उन्होंने हमको हराने के लिए कांग्रेस को जिताया। वे हमको राजनीति से खत्म करना चाहते हैं, क्योंकि उनको असली खतरा हम से है।”

उत्तर प्रदेश की सपा ने भी अच्छा मौका देखा और “काम बोलता है के नारे से जनता को मूर्ख बना रहे” अखिलेश भैया ने भी बेचारी ईवीएम पर सारा दोष मढ़ दिया।

बेचारी ईवीएम! – छेड़खानी की शिकार?

ध्यान दें कि भाजपा (गठबंधन) की जीत उत्तर प्रदेश में ही अप्रत्याशित थी। उत्तराखंड में जीतना अप्रत्याशित नहीं था। पंजाब में तो उसका गठबंधन आआपा (आप) से भी पीछे रहा। गोवा तथा मणिपुर में तो वह कांग्रेस से पीछे रही: यह अलग बात है कि इन जगहों पर वह सरकार बनाने में सफल रही।

छेड़खानी की बात केवल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, एवं पंजाब के संदर्भ में की गई है। भाजपा ने कथित ईवीएम-छेड़खानी वहां क्यों नहीं की इसका उत्तर देने की विपक्षियों ने चिंता नहीं की ! छेड़खानी के विषय पर अधिक जानकारी इंटरनेट स्रोतों से मिल सकती है। उदाहरार्थ मायावतीजी के आरोपकेजरीवालजी की बातेंअखिलेश भैया की शंका और निर्वाचन आयोग की सफाई संबधित लिंकों से यहां प्राप्य हैं।

अब जो बहस मीडिया में, राजनीतिक दलों के बीच, उच्चतम न्यायालय में, और राष्ट्रपति महोद्य तक पहुंची है वह है कि ईवीएम भरोसेमंद नहीं हैं और हमें कागजी मतपत्रों पर लौट आना चाहिए। खैर, वर्षों पहले सकारण छोड़े जा चुके मतपत्रों के प्रयोग पर क्या लौट जाना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर निर्वाचन के विभिन्न पहलुओं पर निर्भर करता है। इस विषय पर मैं कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा हूं। मैं तो यहां मशीनों के साथ संभव छेड़खानी के विषय में कुछ कहना चाहता हूं।

आरंभिक टिप्पणी

मैं फिजिक्स एवं कंप्यूटर-विज्ञान का विश्वविद्यालयीय शिक्षक रह चुका हूं और आधुनिक अंकीय तकनीकी (digital technology) से वाकिफ़ हूं। इसलिए वस्तुनिष्ठ संभावनाओं की बात कर सकता हूं। कौन जीत रहा है और कौन नहीं से मेरा कोई सरोकार नहीं। दरअसल मैं तो नोटा (NOTA) का पक्षधर हूं, और पिछले 15-20 वर्षों से किसी भी दल को मत नहीं दे रहा; वोट डालता जरूर हूं।

आरंभ में ही यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य की बनाई ऐसी कोई मशीन/युक्ति नहीं है जिसके साथ छेड़छाड़ न हो सके। उसके लिए बस कुछ शर्तें हैं:

(1) छेड़छाड़ करने या उससे मन-माफ़िक काम लेने का इरादा हो।

(2) इच्छुक व्यक्ति या उसके मददगार को मशीन की कार्यप्रणाली की समुचित जानकारी हो।

(3) व्यक्ति/मददगार को वांछित अवसर तथा संसाधन उपलब्ध हों।

(1) छेड़छाड़ का इरादा

जहां तक इरादे का सवाल है ऐसा इरादा भारतीय राजनेता रखते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। जिस देश में येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने की होड़ मची हो, राजनेता बरसाती मेढकों की भांति दलों के बीच फुदकते हों, सिद्धांतहीन एवं बेमेल गठबंधनों से परहेज न हो, धर्म-जाति आदि की भावनाएं भड़काकर वोट बटोरें जायें, चुनाव में सफलता पाने हेतु मतदाताओं को पैसा, साड़ी आदि बांटने से परहेज न हो, वहां नेताओं का क्या भरोसा?

किंतु निर्वाचन आयोग (इलेक्शन कमिशन) भी किसी दल/विशेष के पक्ष में ऐसा इरादा रखता होगा इस बात में मुझे यक़ीन नहीं होता है। मेरा मानना है कि पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल के बाद आयोग अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। वह भाजपा या अन्य दल के दबाव में आकर ऐसा अनर्थ करेगा मैं नहीं मानता, भले ही मायावतीजी तथा केजरीवालजी ऐसा कहते हों।

मेरी जानकारी में ये मशीनें (ईवीएम) निर्वाचन आयोग की संपदा हैं। इनकी खरीद-फरोख्त, उपयोग, रखरखाव तथा सुरक्षा आदि की जिम्मेदारी पूरी तरह से आयोग की होती है। सरकारें उसके द्वारा मांगी गई मदद तो पूरी करती हैं, किंतु आयोग से बाहर के तकनीकी जानकार की पंहुच मशीनों तक नहीं हो सकती जब तक आयोग न चाहे। मतलब यह है कि मशीनों से छेड़छाड़ बिना आयोग की सांठगांठ के संभव नहीं।

तो क्या आयोग ने बीते मार्च के चुनाओं में दल-विशेष (उत्तर प्रदेश एवं उत्तरखंड में भाजपा एवं पंजाब में कांग्रेस) के पक्ष में इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ की थी? समाचार माध्यमों के अनुसार केजरीवालजी तो यही दावा करते हैं और मायावतीजी तथा अन्य नेता अप्रत्यक्ष रूप में आयोग पर यही आरोप लगा रहे हैं। यदि आयोग स्वयं इतना गिर चुका है तो किसी भी चुनाव क्या भरोसा?

कितने देशवासी होंगे जो आयोग को कटघरे में खड़ा करना चाहेंगे? व्यक्तिगत तौर पर मैं किसी भी नेता की तुलना में आयोग पर भरोसा करूंगा !

वोटिंग मशीनों की सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे स्थानीय प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होती है, जो चुनाओं के दौरान उसी के नियंत्रण में रहता है। फिर भी हो सकता है कि कहीं-कहीं प्रशासन मशीनों के साथ खिलवाड़ करे। लेकिन ऐसा लगभग हर निर्वाचन क्षेत्र में हुआ होगा और जानकार लोगों से तकनीकी मदद मिली होगी ऐसा मुझे नहीं लगता। अगर ऐसा है तो प्रादेशिक प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट माना जाएगा। क्या ऐसा हुआ होगा?

(2) डिजिटल डिवाइसेज़ (अंकीय युक्तियां)

किसी अंकीय (digital) युक्ति या मशीन को खराब करने लिए विशेषज्ञता की जरूरत नहीं। परंतु उससे जोड़तोड़ करके मनमाफिक काम लेना उसी व्यक्ति के लिए संभव है जो उसकी कार्यप्रणाली और उसके कलपुर्जों की भूमिका से भलीभांति परिचित हो। अतः ईवीएम से छेड़खानी किसी सिद्धहस्त व्यक्ति के बिना संभव नहीं।

किसी घटना के होने की सैद्धांतिक संभावना एक बात है और उसका वास्तविकता के धरातल पर घटित हो ही जाना नितांत दूसरी बात है।

इस विषय पर मैंने एक लेख 20 मार्च के अपने अन्य ब्लॉग में प्रस्तुत किया है।

(3) ईवीएम के साथ कैसे होगी छेड़छाड़?

अब आइए मुद्दे के तीसरे और असली पह्लू पर। अर्थात् ईवीएम के साथ छेड़खानी करने के अवसर और उसके लिए आवश्यक सामग्री/संसाधन।

मैंने ईवीएम के तकनीकी पक्ष की संक्षिप्त जानकारी पाने के लिए इंटरनेट स्रोतों को खंगाला। उदाहरण के तौर पर दो स्रोतों का उल्लेख कर रहा हूं: (1) विकीपीडिया (wikipedia) एवं (2) गिज़मोडो (gizmodo), जिनसे मिली जानकारी मुझे भरोसेमंद लगती है।

निम्नलिखित बिंदुओं पर गौर करें:

(क) ईवीएम मशीन

संक्षेप में यह बता दूं कि ईवीएम के दो घटक या इकाइयां होती हैं: (1) नियंत्रण इकाई (control unit), और (2) मतदान इकाई (balloting unit)। पहली इकाई मतदान अधिकारी के नियंत्रण में होती है और दूसरी इकाई से 15-20 फ़ुट लंबे केबल (तार) द्वारा जुड़ी होती है। इसी केबल के माध्यम से दोनों इकाइयों के बीच संकेतों का आदान-प्रदान होता है। मतदाता द्वारा दूसरी इकाई पर चुने गए बटन के अनुसार समुचित संकेत पहली इकाई को प्राप्त होता है और वह डाले गये मतों को अंकीय आंकड़ों के रूप में नियंत्रण इकाई की स्मृति (memory) में सुरक्षित (संचित, saved) रखता है। मतदान की समाप्ति पर अधिकारी उसे “स्विच-ऑफ़” करके मुहरबंद यानी सील कर देता है।

(ख) EPROM (ईप्रॉम) एवं EEPROM (ईईप्रॉम)

मेरी जानकारी के अनुसार इन मशीनों में सूचना-भंडारण (information storage) के लिए (1) ईप्रॉम (EPROM = Erasable Programmable Read-Only Memory), या (2)  ईईप्रॉम (EEPROM = Electrically Erasable Programmable Read-Only Memory) स्मृति-चिपों का प्रयोग होता है। इन चिपों में भंडारित जानकारी तब तक सुरक्षित रहती है जब तक कि उसे (1) पराबैंगनी विकिरण (ultraviolet radiation) द्वारा मिटाया न जाए (EPROM); या (2) उसके साथ संगति रखने वाले किसी डिजिटल युक्ति (digital device compatible with the memory chip) के द्वारा उसे मिटाया न जाए (EEPROM)। यह कार्य केवल जानकार व्यक्ति ही कर सकता है और वह भी तब जब उसे अवसर मिले। स्मृति-चिपों में भंडारित सूचना में मनमाफिक परिवर्तन करना संभव तो है किंतु आसान नहीं। इन तक पहुंच होनी चाहिए, वह कैसे होगी? चूंकि मतदान के बाद ईवीएम को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है और उसे केवल मत-गणना के समय ही “स्विच-ऑन” किया जाता है, अत: ऐसा अवसर मिल नहीं सकता। हां, सुरक्षाकर्मी ही लापरवाही बरतें तो बात अलग है।

(ग) रिमोट कंट्रोल

किसी मशीन में संचित सूचना को दूरस्थ संकेतन (remote signalling) द्वारा भी मनमाफिक बदला जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए उसे सक्रिय (active) अथवा तैयारी-अवस्था (standby mode) में होना चाहिए। इन अवस्थाओं में वह बाहर से रेडियोवेव (radio wave), माइक्रोवेव (microwave), अथवा प्रकाश-विद्युत (electro-optical) आदि सकेतन विधियों (signalling methods) के द्वारा सूचना-विनिमय (information exchange) के लिए तैयार हो सकता है। किंतु तब उसकी “पावर सप्लाइ ऑन” रहनी चाहिए। मेरी जानकारी में ईवीएम में दूरस्थ संकेतन की कोई व्यवस्था नहीं होती है। यानी ब्ल्यूटूथ  तकनीकी (bluetooth technique) अथवा इंटरनेट संकेतों (internet signals) सरीखे माध्यमों से उसमें संचित सूचना के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं। अगर ऐसी संकेतन विधि होती तो भी वह निरुपयोगी हो जाती, क्योंकि मतदान के बाद इन मशीनों को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है। मोबाइल फोन इस्तेमाल करने और    टीवी देखने वाले भी इस बात को समझते हैं कि टेलिविज़न स्विच-ऑफ करने के बाद रिमोट कंट्रोल निष्प्रभावी हो जाता है।

(घ) एलेक्ट्रॉनिक चिप पर गुप्त कूट

“आप” संयोजक केजरीवालजी का कहना है कि वे इंजीनियरिंग डिग्री-धारक हैं (आईआईटी, खड़कपुर)। इसीलिए वे वोटिंग मशीनों के साथ छेड़छाड का दावा बेझिझक करते हैं। सभी डिजिटल मशीनों के साथ छेड़छाड़ की जा सक्ती है यह मैं भी मानता हूं, किंतु कैसे, कब, किसके द्वारा, आदि प्रश्नों के उत्तर इतने आसान नहीं। इंजीनियरिंग डिग्री होना पर्याप्त नहीं, संबंधित मशीन (ईवीएम) की कार्यप्रणाली का व्यावहारिक ज्ञान/अनुभव होना जरूरी है, जो उन्हें होगा नहीं, क्योंकि वे इंजीनियरिंग व्यवसाय में शायद कभी नहीं रहे । उनकी शंका का समाधान जरूरी है।

केजरीवालजी कहते हैं कि वोटिंग मशीन बनाने में इस्तेमाल किए गए डिजिटल चिप्स (digital chips) में दल-विशेष के पक्ष में मतों की संख्या बढ़ाने हेतु गुप्त कूट (secret codes) इरादातन डाले गये हैं। उनके अनुसार वोटिंग मशीनों की प्रचालन तंत्र (प्रणाली, operating system) इन कूट-संकेतों का प्रयोग करते हुए किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में डाले गए मत को पहले से चुने गए किसी अन्य के खाते में स्थानांतरित कर सकती हैं। इसे उदाहरण से समझिए: 8वें क्रम का बटन दबाने पर वोट 8वें प्रत्याशी को मिले वोटों में जोड़ने के बजाय मशीन का सॉफ्टवेयर 5वें प्रत्याशी के मतों में जोड़ रहा हो। यह भी संभव है कि बीच-बीच में कुछ वोट 8वें के नाम पर ही सही दर्ज हो रहे हों। कदाचित ऐसा ही किसी अन्य – जैसे तीसरे क्रम वाले प्रत्याशी – के मामले में भी हो रहा हो। संभावनाएं कई तरीके की हो सकती हैं। कुल मिलाकर उक्त उदाहरण में 5वें को मिले वोट अधिक दर्ज हो रहे हों और दूसरों को उतने का घाटा हो रहा हो। मशीन के साथ ऐसी छेड़छाड़ गुप्त कूटों के प्रयोग से हो रही होगी।

पाठकों का ध्यान मैं इस बात की ओर खींचता हूं कि चिप-निर्माता कंपनियां अकेली एक अनूठी चिप नहीं बनाते। दरअसल एक जैसी चिपें हजारों/लाखों की संख्या में बाजार में उतारी जाती हैं। मतलब यह है कि सभी वोटिंग मशीनों में एक जैसी चिपें प्रयुक्त होती हैं, और यदि उनमें कोई गुप्त कूट हो तो वह सभी मशीनों पर एक ही प्रकार से कार्य करेगा। यह अवश्य संभव है कि मशीनों पर सक्रिय प्रचालन तंत्र (operating system/software) अलग-अलग मशीनों पर अलग-अलग हेराफेरी के लिए ढाला गया हो। अर्थात कोई ईवीएम 8वें बटन के वोट को 5वें में दर्ज करे तो कोई दूसरी मशीन उसे 9वीं पर दर्ज करे। साफ जाहिर है कि किसी दल विशेष के पक्ष में धांधली करनी हो तो यह पहले से मालूम होना चाहिए कि उसके प्रत्याशी के लिए निर्धारित बटन ईवीएम पर कौन-सा है। तब छेड़खानी करने वाला मशीन के प्रचालन तंत्र को उसी के अनुरूप निर्देश देकर चाहा गया मकसद पूरा कर सकता है।

यहां एक गंभीर शंका उठाई जा सकती है, जिसका संतोषप्रद समाधान केजरीवालजी के पास नहीं होगा। हर निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों की सूची एक जैसी नहीं होती है। दरअसल सूची के शीर्ष पर राष्ट्रीय दलों (AITC, BJP, BSP, CPI, CPI-M, INC, NCP) के प्रत्याशियों के नाम होते हैं, तत्पश्चात् प्रादेशिक (क्षेत्रीय) दलों के, फिर अन्य दलों के और अंत में स्वतंत्र प्रत्याशीगण। इन चारों में से प्रत्येक श्रेणी में प्रत्याशियों के नाम वर्णक्रमानुसार (alphabetically) सूचीबद्ध रहते हैं। चूंकि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशियों के नाम अलग-अलग होते हैं इसलिए किसी खास दल के सभी प्रत्याशी पूरे देश/प्रदेश में एक ही सुनिश्चित क्रम पर हों ऐसा विरल संयोग संभव नहीं। तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी (INC) प्रत्याशी (उदाहरणार्थ) यदि एक क्षेत्र में छठे क्रम पर हो तो दूसरे क्षेत्र में तीसरे या चौथे आदि पर हो सकता है। इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी के वोट किसी और को मिलें, अथवा दूसरों के वोट काग्रेस को मिलें ऐसी छेड़खानी ईवीएम के साथ तब तक संभव नहीं जब तक प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप न दे दिया गया हो। यह सब कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों की मशीनों के साथ अलग-अलग हेराफेरी करना होगी और वह भी जानकार व्यक्ति द्वारा।

निष्कर्ष यह है कि चिप पर संचित एक ही गुप्त कूट अथवा एक ही ऑपरेटिंग सिस्टम वाले मशीनों से अलग-अलग परिणाम मिलें ऐसी छेड़खानी संभव नहीं।

ईवीएम या मतपत्र (ballot paper) पर प्रत्याशियों के नामों के क्रम के बारे में जानकारी इंडियन एक्सप्रेस के लेख अथवा “कोरा” (quora.com) वेब-साइट पर से मिल सकती है।

(ङ) वीवीपीएटी (Voter Verified Paper Audit Trail) मशीन

पिछले चुनावों मे चुनाव आयोग ने कुछ मतदान केंद्रों पर वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों का भी प्रयोग किया था जिसका मुझे भी अनुभव हुआ। चूंकि मैंने नोटा (NOTA, ईवीएम पर अंतिम) बटन दबाया था, इसलिए मुझे मशीन पर संबंधित पर्ची 2-3 सेकंड के लिए देखने को मिली जो तुरंत ही एक संग्रह-डिब्बे में चली गई।

वीवीपीएटी के प्रयोग से मतदाता को तसल्ली हो जाती है कि उसका मत चुने हुए प्रत्याशी के पक्ष में ही पड़ा है। इनका असल सार्थक उपयोग तभी हो सकता है जब ईवीएम द्वारा प्रदर्शित वोटों और वीवीपीएटी की पर्चियों का मिलान वोटों की गिनती के समय किया जाये। लेकिन इनके इस्तेमाल से यह सिद्ध नहीं होता कि ईवीएम के साथ छेड़खानी नहीं हुई है। मेरा यह कथन इस संभावना पर आधारित है कि ईवीएम का ऑपरेटिंग सिस्टम बैलटिंग इकाई से प्राप्त जानकारी वीवीपीएटी तक तो सही-सही पहुंचाए, और उसके बाद वोटों में हेराफ़ेरी करे। ऐसा प्रोग्राम जानकार व्यक्ति लिख ही सकता है।

अंत में – कुंठाजनित  तर्क

दुनिया के अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस आदि सरीखे तकनीकी तौर पर विकसित देशों में ईवीएम इस्तेमाल नहीं होते हैं तो हमारे यहां क्यों इस्तेमाल हो रहे हैं यह सवाल आप पार्टी का निहायत बचकाना, तर्कहीन और हीनभावना का द्योतक है। क्या वे देश हमारे लिए मानक तय करेंगे? हमें अपने विचारों एवं जरूरतों के अनुसार चलना चाहिए या उनकी नकल आंख मूंद के करनी चाहिए? क्या हमारे देश में परमाणु विस्फोट, मिसाइल विकास, उपग्रह-प्रक्षेपण, चंद्रयान आदि उनके अनुसार हुए हैं? जो भी हमने किया है, कर रहे हैं और करेंगे वह हमारी आवश्यकता एवं हमारे संसाधन तय करेंगे।

चुनावों में वोटिंग मशीनों का प्रयोग हमारी आवश्यकता थी और मेरी जानकारी में उसकी तकनीकी भी देश में ही विकसित हुई है; हम उसे क्यों न इस्तेमाल करें? अमेरिका उसे इस्तेमाल नहीं करता इसलिए हमें भी उससे परहेज करना चाहिए क्या? हमारे अपने स्वतंत्र निर्णय नहीं होने चाहिए क्या? वस्तुतः विदेश, विदेशी वस्तुएं, विदेशी विचार आज भी हमें श्रेष्ठतर लगते हैं। अवश्य ही हमें उन देशों से बहुत कुछ सीखना चाहिए किंतु सब कुछ नहीं। हम भी किसी क्षेत्र में प्रथम हो सकते हैं यह विचार मन में क्यों नही आने देते हैं? – योगेन्द्र जोशी

गण्तंत्र दिवस 2017 – खोया अधिक और पाया कम

आज 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद शासकीय व्यवस्था के लिए स्वीकृत संविधान के प्रभावी होने के प्रथम दिन (सन् 2050) की स्मृति में मनाये जाने वाला राष्ट्रीय उत्सव।

इस अवसर पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी हृदय से शुभेच्छाएं।

विगत वर्ष की एक स्मराणीय बड़ी शासकीय घटना “विमुद्रीकरण अर्थात् नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों से अब कुछ हद तक देशवासी उबर चुके होंगे, और बचीखुची अड़चनों से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे यह मेरी आशा और अपेक्षा है।

देशवासी आज के दिन हर्षित होंगे ही। अपने लोकतंत्र की सफलता को लेकर काफी हद तक संतुष्ट एवं भावी काल के लिए आशान्वित होंगे ही। मैं स्वयं को एक अपवाद के रूप में देखता हूं। कदाचित कुछ गिनेचुने अन्य जन भी मेरी तरह सोचते होंगे। मैं इस दिन, और इसी प्रकार स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), पर खुद को संतुष्ट नहीं पाता।

क्या हमारे गणतंत्र की खामियां – जो भी रही हों – समय के साथ दूर हुयी हैं? क्या हमारी राजनीति दिन-ब-दिन सुधार की दिशा में अग्रसर हुई है? क्या जिन उद्येश्यों के साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई थी वे पूरे हुए हैं? या उनके पूरे होने की ओर हम संतोषप्रद तरीके से बढ़ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्न जब मेरे मन में उठते हैं तो मैं स्वयं को संतुष्ट नहीं देख पाता। मेरी सोच और दृष्टि में दोष है, अथवा वस्तुस्थिति ही जैसी होनी चाहिए उसके निकट नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अन्य जन ही मुझे दे सकते हैं।

इसके पहले कि मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूं मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कुछ लोगों की नजर में गणतंत्र (अंग्रेजी में रिपब्लिक) जनतंत्र/लोकतंत्र (डेमोक्रसी) का ही पर्याय है। हमारे गणतंत्र में देश के राज्य गणतांत्रिक इकाइयां हैं, जिनमें से प्रत्येक स्वयं में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाये है। मुझे शंका है कि संघशासित प्रदेश (यूनियन-गवर्न्ड टेरिटरी) एक इकाई वाली इस परिभाषा में आते हैं कि नहीं। वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं अतः “गण” की परिभाषा उन पर लागू नहीं होती है। अतः मेरे मत में देश को किंचित् परिवर्तित गणतंत्र कहना अधिक उचित होगा। अस्तु, इस बात को विशेष महत्त्व देने की जरूरत नहीं।

मेरा अनुभव मुख्यतः उत्तर प्रदेश और उस पर विशेषतया मेरे शहर वाराणसी पर आधारित हैं। हो सकता है अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर हो, लेकिन कुल मिलाकर हम शासकीय व्यवस्था के गिरावट के दौर से गुजर्र रहे हैं ऐसा मेरा मानना है।

वापस अपने उपर्युक्त शंकाओं/प्रश्नों पर। जीवन के सातवें (यानी साठ का दशक) पूरा करने के निकट पहुंचे वरिष्ठ नागरिक के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि मैंने राजनीति एवं लोकतंत्र की पर्याप्त समझ अर्जित की है। क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है में भेद कर सकने में मैं काफी हद तक सक्षम हूं। मुझे नेहरू-काल के अंतिम दिनों की याद है। याद है उस समय के चीनी आक्रमण की। याद है उस काल के पीएल480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आयातित जीरा सदृश लाल गेहूं की। याद है जब कांग्रेस ही एक प्रकार से देश में एकछत्र राज कर रही थी और “नेहरू के बाद कौन संभालेगा देश को” जैसी कुछ लोगों की चिंताओं की। याद है जब अन्य राजनैतिक दल अस्तित्व में आ रहे थे। किशोरावस्था से वयस्कता के सोपन पर चढ़ते हुए एक नागरिक के तौर पर शासकीय व्यवस्था की मेरी समझ तब नितांत अपरिपक्व रही होगी यह मैं स्वीकारता हूं। कालान्तर में नौकरी-पेशे (विश्वविद्यालय अध्यापन) में आने पर और प्रशासनिक/नागरिक व्यवस्था के संपर्क में आते-आते तथा मतदान का अधिकार पाते-पाते विषय की मेरी समझ में शनैः-शनैः परिपक्वता आते गयी । हाल के डेढ़-दो दशकों में तो विषय को समझने में रुचि विशेषतः बढ़ गयी। मेरे विचारों से अन्य जन सहमत हों मैं इस मुगालते में कभी नहीं रहता। मेरी शंकाएं:

(1) हमारे संविधान की प्रस्तावना में साफ उल्लिखित है कि हम देशवासी इस राष्ट्र को “पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के रूप में स्वीकारते हैं। पंथनिरपेक्ष शब्द श्रीमती गांधी ने संधोधन के तौर पर शामिल किया था। देश का स्वरूप बदला नहीं। देश को संविधान-निर्माताओं ने आरंभ में ही “सेक्युलर” क्यों नही कहा? यह बात विचारणीय है। खैर, मेरी आपत्ति है “समाजवादी” पर है। क्या देश को बाद के राजनेता समाजवाद की ओर ले गये? आज अमीर और गरीब की खाई तब से बहुत बढ़ गयी। क्या एक समाजवादी देश में यह होना चाहिए था?

(2) संविधान जातिमुकत होने की लालसा व्यक्त करता है। शुरुआती दौर में जाति और धर्म वोट के आधार पर नहीं होते थे। समय के साथ राजनीति में आयी नई पीढ़ी के नेताओं ने इन भावनाओं को भुनाकर वोटबैंक बना डाले। यही अपेक्षा की गयी थी क्या?

(3) पुराने जीवित बचे लोग बताते थे कि वोट पाने के लिए आज की तरह बेतहासा धन खर्च नहीं होता था। सुनते है कि अब सांसद/विधायक बनने के लिए करोड़ों दांव पर लगाये जाते हैं। यह भी कहा जाता कि पार्टियों के टिकट के लिए करोड़ों की बोली लगती है। यह हमारे नेताओं के सच्चरित्र होने का द्योतक है क्या?

(4) पिछले तीन-चार दशकों में धनबलियों, बाहुबलियों और आपराधिक छबि वालों की राजनीति में तादाद बढ़ती गयी है। सांसंदों/विधायकों में उनकी दागदार छवि वालों की संख्या 30% के आसपास बतायी जाती है। क्या ऐसा शुरुआती दौर में था?

(5) वर्तमान समय में राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों का एक ही सिद्धन्त रह गया है कि कोई सिद्धांत नहीं। विशुद्ध मौकापरस्ती। जहां लाभ उधर चलो की नीति। इसलिए दलबदलुओं की भरमार है सभी दलों में। जिसे जिताऊ समझते हैं उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। जो कल तक सेक्युलर था वह आज सांप्रदायिक बन जाता है, दक्षिणपंथी समाजवादी बन जाता है। सिद्धांतहीनता व्यक्तियों में ही नहीं दलों में होती है जो सिद्धांतहीनों का बढ़चढ़कर स्वागत करते हैं, बेशर्मी से अपने कदम सही ठहराते हुए।

(6) आज की राजनीति में परिवारवाद चरम पर है। और बड़ा बेहूदा तर्क (कुतर्क?) पेश किया जाता है। कहते है डाक्टर का बेटा-बेटी डाक्टर, वकील का बेटा-बेटी वकील, उद्यमी (बिज़नेसमैन) का बेटा-बेटी उद्यमी तो राजनेता का बेटा क्यों नहीं राजनेता हो सकता है? वाह ! मेरा सवाल है कि क्या राजनीति भी डाक्टरी, वकालत, उद्यमिता इत्यादि की तरह का ही धंधा है? जीवन-यापन और धन कमाने का व्यवसाय है क्या राजनीति? जिन व्यवसायों से तुलना की जाती हैं उसमें समाजसेवा या सामाजिक व्यवस्था को सुचारु और कुशल बनाने का ध्येय नहीं होता है। उन व्यवसाय में लगे हाथ कोई समाजसेवा करता है तो यह उसकी रुचि होती है न कि व्यवसाय के स्थापित एवं स्वीकृत उद्येश्य का कार्य। हर व्यवसाय में पहले अनुभव और योग्यता हासिल किये जाते हैं। इस पर भी गौर करें कि स्वाधीनता के बाद के भारत में जो नये नेता आये वे बाप-दादाओं की विरासत पर नहीं आये बल्कि अपने बल पर आये, लेकिन उन्होंने ही अपनी अगली पीढ़ी को विरासत के नाम पर आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता संघर्ष वाले कितने नेताओं की बहू-बेटियां राजनीति में हैं? तो आज के नेताओं के कितने हैं? सोचिये!

(7) आज वोट की राजनीति नकारात्मक है न कि सकारात्मक। दूसरे दलों में कमियां खोज-खोजकर वोट बटोरे जाते हैं। कोई यह नहीं कहता है कि देश/प्रदेश के दीर्घकालिक हितों के लिए उसकी क्या योजनाएं हैं। जनसंख्या, चिकित्सकीय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक गुणवत्ता की बातें करता है कोई? तो क्या ऐसी वोट की राजनीति ही वंछित लोकतंत्र है?

(8) लोकलुभावन वादों के साथ आज के नेता मैदान में उतरते हैं। कोई स्मार्ट्फोन बांटने की बात करता  है, तो कोई मुफ्त अनाज देने की, कोई मुफ़्त बिजली-पानी देने की बात करता है? इत्यादि। खजाना देश का लुटे और वोट तथा सत्तासुख हम भोगें इस नीति पर राजनैतिक चल रहे हैं। देश का भला ऐसे ही होगा क्या?

इस प्रकार के तमाम सवाल उठते हैं मन में। अब आप ही बतायें कि राजनीति की किस बात पर संतोष अनुभव किया जाये? – योगेन्द्र जोशी

गांधी जयन्ती (2016-10-02, शास्त्री जयन्ती भी): स्वच्छता दिवस राष्ट्र के स्तर पर

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है, 1869 में जन्मे महात्मा यानी मोहनदास करमचंद गांधी जी का जन्म-दिवस। संयोग से आज ही का दिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी (जन्म 1904) का जन्मदिवस है। इस दिन का महत्व मुख्यतः गांधी जी के कारण ही है और लोग उनका किसी न किसी बहाने स्मरण कर लेते हैं। लगे हाथ शास्त्री जी को भी याद कर लेते हैं। शास्त्री जी का जन्मदिन यदि किसी और दिन होता तो शायद कम ही लोगों को उनका ध्यान आता।

गांधी जी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता का श्रेय पूरा-पूरा नहीं तो काफी हद तक दिया जाता है। उन्हें अहिंसा का पुजारी माना जाता है, और लोग यह धारणा कई लोगों के बीच है कि उन्होंने “खड्ग बिना ढाल” के देश को आजादी दिला दी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं आजादी के लिए उन्हें अत्यधिक श्रेय नहीं देता। मेरा मानना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (सितंबर 1, 1939 से सितंबर 2, 1945 तक) के बाद ब्रिटेन (यूरोप के साथ) के हालात बिगड़ चुके थे और उसके लिए अपने सामाज्य को संभालना कठिन पड़ गया था। विगत 19वीं शताब्दी के मध्य के आगे-पीछे ही ब्रितानी शासन के अधीन के प्रायः सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते गये। भारत तो वैसे ही बड़ा देश था जिसको संभालना ब्रितानी हुकूमत के लिए मुश्किल हो चुका था, विशेषतः जब देश में सर्वत्र आज़ादी-आज़ादी के नारे लग रहे थे। आज़ादी की उस मांग के माहौल के लिए अकेले गांधी जी उत्तरदायी नहीं, बल्कि अनेक जनों का उसमें योग दान था।

स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधी जी के योगदान का आकलन भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न करेंगे ही। कुछ भी हो, गांधी जी को विश्व समुदाय ने आधुनिक काल के एक अतिविशिष्ट वक्तिव्य के धनी मानव के रूप में देखा। उनके विचारों का सर्वत्र प्रसार-प्रचार भी हुआ। कई देशों ने तो अपने खास-खास स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं भी स्थापित कर दीं, और राष्ट्र संघ ने 2014 में तो उस दिन को विश्व अहिंसा दिवस घोषित भी कर दिया।

शास्त्री जी कदाचित देश के कुशल प्रधानमंत्री सिद्ध हुए होते, किंतु वे अपनी असामयिक मृत्यु के कारण केवल डेड़ साल (9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक) ही उस पद पर रह सके। पाकिस्तान के साथ 1965 में छिड़ी जंग के बाद ताशकंद में भारत-पाक शान्ति समझौते के बाद संदिग्ध हालत में उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी यह बहुतों का मानना है। अस्तु, अगर वे जीवित रहते तो शायद अधिक चर्चित रहे होते। सन् 1965 के युद्धकाल में उन्होंने “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। मुझे याद है जब उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने को प्रेरित किया था। वे दिन थे जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और अमेरिका से “पीएल 480 योजना” के अंतर्गत जीरानुमा गेहूं देश में आयात हो रहा था।

कहने का तात्पर्य है कि 2 अक्टूबर का दिन गांधी जी के कारण ही चर्चा का विषय रहा है। विगत गांधी जयंतियों पर मैंने अपने ब्लॉग में उनके विचारों को लेकर अपनी धारणाओं पर लेख लिखे हैं। (देखें 08-10-02, 09-10-02, 10-10-01, 13-10-0214-10-02, एवं 14-10-08 के ब्लॉग-पोस्ट।)

स्वच्छ्ता के विचार का अभाव

इस बार गांधी जयन्ती अहिंसा दिवस के तौर पर चर्चा में नहीं है, बल्कि स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 में इसी दिन पर स्वच्छता की बात देश के सामने रखी। और इस बार इस दिन को राष्ट्र के स्तर पर स्वच्छता दिवस भी घोषित कर दिया (मैं शायद भूल नहीं कर रहा हूं)। यही इस बार मेरे लिए भी चर्चा का विषय है। तब से दो वर्ष बीत चुके हैं। उस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, किंतु उतनी नहीं जितनी उम्मेद की जाती थी। मीडिया के माध्यम से लोगों को इस बारे में जागरूक करने की कोशशें काफी हुई, परंतु जन समुदाय प्रेरित हुआ इसमें मुझे शंका है।

मैं स्वयं से अक्सर पूछता हूं कि क्या सामाजिक सरोकार की बातों पर किसी व्यक्ति के मन में स्वयं विचार नहीं आने चाहिए? मेरे मन में स्वच्छता की बात किसी के कहने से नहीं आई बल्कि बचपन से वह मौजूद रही है। और तदनुसार मैं अपने परिवेश को यथासंभव साफ़-सुथरा रखने की कोशिश करता हूं। जब हम (मैं एवं मेरी पत्नी) जहां-तहां गंदगी देखते हैं तो बड़ी कोफ़्त होती है। हम राह चलते कुछ खाते-पीते हैं तो उसका कचरा जेब में या झोली में डाल लेते हैं, या खाना-पीना करते ही नहीं। रेल-यात्रा के दौरान फ़र्श पर कचरा न गिरे इसका ध्यान रखते हैं। कचरा इकट्ठा करके कागज आदि में लपेट कर पास में रख लेते हैं, या कूड़ेदान में डाल आते हैं। परंतु हमने देखा है कि कई लोग मूंगफली ठूंगते है तो छिलके फ़र्श पर गिराते जाते हैं। बिस्कुट का रैपर फ़र्श पर डाल देते हैं। वाश-बेसिन पर हाथ-मुंह धोते हैं तो बेसिन में ठीक-से पानी बहाकर उसे साफ नहीं रखते। टायलेट में शौच के बाद फ़्लश करके एक बार भी मुड़कर नहीं देखते कि फ़्लश हुआ भी कि नहीं। इस प्रकार के तमाम अनुभव देखने को मिलते हैं।

समझ में नहीं आता कि सफाई का खयाल क्यों नहीं आता? क्या सफाई की बात के लिए किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है? क्या यह ऐसा विषय है कि उच्च शिक्षा हासिल करना पड़े। मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब होता है जब कोई व्यक्ति घर से गंतव्य के लिए निकलता है, और रास्ते में सड़क किनारे पेशाब करने से नहीं हिचकता है। ऐसा करते मैंने संभांत-से लगने वाले लोगों को भी देखा है। मेरे शहर वाराणसी में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में डेड़-दो घटे से अधिक का समय नहीं लगता। ऐसे में यदि आप घर से शौच करके निकलें तो गंतव्य तक आपको पेशाब की कोई परेशानी नहीं हो सकती। तब भी वांछित अपनाकर क्यों नहीं चलता कूई? सड़क किनारे पेशाब न करनी पड़े ऐसा क्यों नहीं आता मन में? राह चलते सड़क पर जहां-तहां थूक देना आम बात है। विदेशों में लोग पेपर नैपकिन लेकर चलते है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें थूककर पास के कूड़ेदान में फेंका जा सके, या जेब में रखा जा सके। क्यों ऐसा ही कोई तरीका देशवासियों को क्यों नहीं सूझता? कम से कम यह तो किया ही जा सकता है कि सड़क के किनारे घास-फूस या मिट्टी में थूका जाये। ध्यान रहे कि सड़क पर थूका गया साफ-साफ नजर आता है।

स्वच्छता-भाव बनाम सौन्दर्यबोध

मेरी धारणा है कि साफ-सफाई वास्तव में सौन्दर्य-बोध का अनन्य हिस्सा है, और आम भारतीयों में वह शायद बहुत कम है। यदि किसी को गंदगी देख बेचैनी नहीं होती, उस स्थल से भाग निकलने की उसकी इच्छा नहीं होती, अथवा तत्सदृश नकारात्मक प्रतिक्रिया उसके मन में नहीं जगती, तो उससे सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। चारों ओर गंदगी फैली हो ऐसे वातावरण से सांमजस्य बिठाने में बहुत से लोगों को दिक्कत नहीं होती। वे उसी वातावरण में जमीन में बैठ सकते हैं, गंदगी देखते हुए नाश्ता-पानी कर सकते हैं, इत्यादि। जब इन जनों को गंदगी खले ही नहीं तो उनसे सफाई की  उम्मीद कैसे की जा सकती है?

मेरा रोजमर्रा का अनुभव प्रमुखतया अपने शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है। मैंने जितने भी शहर देखे हैं उनमें वाराणसी सबसे गंदा और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार पाया है। (मैं अक्सर देश के विविध स्थलों की यात्रा कर लेता हूं।) दो वर्ष पहले जब स्वच्छता अभियान चला था तो लगा कि शहर के दिन बहुरेंगे। लेकिन कोई खास अंतर शहर में नहीं आया है। घरों से कूड़ा-उठान की व्यवस्था अवश्य है, लेकिन वह कूड़ा अक्सर सड़कों के किनारे गिरा दिया जाता है। यहां की व्यवस्था का वर्णन कर पाना मेरे लिए सरल नहीं है। शब्दों में वह बात नहीं होती जो प्रत्यक्ष दर्शन में है।

वाराणसी की गंदगी में कुछ योगदान तो आवारा गाय-सांड़ों का रहता है। यहां की गली-कूचों में कुछ लोग अपने निजी दूध के लिए अथवा उसके व्यवसाय के लिए गाय-भेंसे पालते हैं। मेरे घर के सामने की सड़क पर एक सज्जन (?) भी यह कार्य करते हैं। मेरी जानकारी के अनुसार शहर में पशु-पालन पर कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही गंदगी फैलाने के विरुद्ध कोई कानून है। अतः यह कार्य धड़ल्ले से चलता आ रहा है। इस कार्य में सड़क पर अतिक्रमण भी होता है। अवश्य ही अतिक्रमण के विरुद्ध कानून हैं, परंतु प्रशासन में कोई देखने वाला हो तब न? साल-छः महीने में अतिक्रमण दस्ता आ भी जाये तो पशुओं को सड़क से हटा लिया जाता है और फिर बाद में स्थिति पूर्ववत। ये पशु हैं जो गोबर की गंदगी तो फैलाते ही हैं, उसके अलावा सड़क के किनारे का कूड़ा भी इधर-उधर बिखेर देते हैं।

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बीते मार्च माह में उच्च न्यायालय ने राज्य (उत्तर प्रदेश) में पॉलिथीन की थैलियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। आरंभ में लगा था कि अब खुली जगहों पर प्लास्टिक नहीं बिखरा दिखेगा। साग-सब्जी, किराना आदि की दुकानों पर पॉलिथीन थैली का मिलना बंद हो गया। लेकिन महीना बीतते-बीतते पॉलिथीन वापस। अब पूरी तरह पहले की स्थिति है। क्या अदालत ने प्रतिबंध हटा दिया? शायद नहीं, क्योंकि अखबारों मे तद्विषयक कोई समाचार कभी नहीं छपा। मेरा ख्याल है कि प्रशासन की उदासीनता इसका कारण रहा है।

मेरे ही घर के नजदीक मुख्य मार्ग के किनारे सब्जी-सट्टी भी लगती है उसके साथ फुटकर सब्जी की दुकानें। ये लोग अपनी सड़ी-गली सब्जी सड़क पर बिखेर देते हैं न कि उसको एकत्रित रखने की व्यवस्था अपनाते हैं। यह सड़ी-गली सागसब्जी ऊपर बताये आवारा पशुओं का आहार होता है, किंतु गंदगी तो हो ही जाती है। साग-सब्जी की दुकानें शहर में सड़क पर यत्र-तत्र अतिक्रमण करके लगी रहती हैं और गंदगी के स्रोत बने रहते हैं। वाराणसी में तम्बाकूदार पान का बहुत चलन है। लोग पान खाकर कहीं भी पीक थूक देते है। वाहनों में बैठे हुए भी थूकते हैं। और तो और, कार में बैठे जन भी चलते हुए उसका द्वार खोलकर पीक थूकते हैं, किसी की परवाह किए बगैर। कहने का मतलब यह है कि किसी को सद्विचार नहीं सूझते; बस जिसको जो सुविधा हो वह करता है।

वाराणसी की जैसी विकट स्थिति और नगरों की नहीं होगी, लेकिन गंदगी सभी जगह देखने को मिलती है। हाल ही में मैं मुम्बई के पश्चिम भांडूप इलाके में 3 सप्ताह के प्रवास पर गया था। छुट्टा पशु न होने के बावजूद वहां भी खूब गंदगी देखने को मिली, खासकर जंगल-मंगल नामक सड़क पर। दिल्ली के कई इलाकों में भी मैंने गंदगी देखी है। चार साल पहले मैंने पुद्दुचेरी की यात्रा की थी। तब एक नाले के पास से गुजरने पर बदबू के साक्षात्कार हुए थे और गंदगी के भी।

दरअसल अपने देश में संसाधन आबादी के हिसाब से बहुत कम हैं। बहुत-से लोगों को शहरों में सड़क किनारे झुग्गी-झोंपड़ी में जीवन बिताना होता है। उनकी सबसे बड़ी समस्या येनकेन प्रकारेण जीवित रहने की होती है। सुबह से शाम तक जीवन-धारण के साधन जुटाने में ही जिंदगी गुजर जाती है। किसे फ़ुर्सत है कि सफाई की सोचे?

मोदी जी गांधी जी के स्वच्छता के विचार से प्रभावित रहे हैं और स्वच्छता अभियान के सिलसिले में उनका नाम लेते रहते हैं। किंतु वे भी यह भूल जाते हैं कि गांधी जी के हर विषय पर अपने स्पष्ट एवं लीक से हटकर विचार रहे हैं। गांधी जी 

(1) शारीरिक परिश्रम पर जोर देते थे, न कि मशीनों पर अधिकाधिक निर्भरता,

(2) समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित भेदभाव के विरुद्ध थे, किंतु स्वतंत्र भारत में ऐसा भेदभाव बढ़ रहा है,

(3) आर्थिक विषमता न्यूनतम रहे यह चाहते थे, किंतु यह विषमता दिनों-दिन बढ़ रही है,

(4) आत्मसंयम के पक्षधर थे और सत्य तथा निष्ठा पर जोर देते थे, जो आज के नेताओं और आम जनों से गायब हो रहे हैं,

(5) इसी प्रकार की अनेक बातें करते थे, लेकिन उन पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। – योगेन्द्र जोशी

गोरक्षा का सच: सड़कों पर आवारा गायें और सांड़ गोरक्षकों को नजर क्यों नहीं आते?

मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद हैं जब मेरे पिताजी ने गांव में गाय पाल रखी थी। चूंकि मेरी मां की पहले ही इहलोकलीला समाप्त हो चुकी थी, अतः गाय की देखभाल, दाना-पानी और दूध दुहने आदि के प्रायः सभी कार्य वे अकेले स्वयं ही करते थे। घर पर हम बच्चे यथासंभव उनका हाथ बंटा देते थे। उत्तराखंड के मेरे उस पहाड़ी गांव में गाय-बैलों की उस काल में काफी अहमियत थी, क्योंकि वे दूध के स्त्रोत के अतिरिक्त कृषि-कार्यों के लिए भी आवश्यक होते थे। उनके गोबर-मूत्र से बने खाद का प्रयोग खेतों में होता था। उस काल में हम रासायनिक खाद से अनभिज्ञ थे। हां, तो मैं बता रहा था कि मेरे पिताजी गाय दुहने का कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि गाय के थन से उतरने वाला आधा दूध उसके बच्चे – बछिया हो या बछड़ा – को मिले। प्रचलित परंपरा के अनुसार हम लोग बच्चा जनने के २२ दिनों तक गाय का दूध प्रयोग में नहीं लेते थे। उस अंतराल में गाय का बच्चा भरपूर दूध पा जाता था। बाद में आधा दूध उसका और आधा हमारा। उसको घास तथा खाद्य वनस्पति की मुलायम पत्तियां खाना सिखाया जाता था। वह भी एक समय था जब गायें या बैल बूढ़े होने पर भी पलते रहते थे। वे तब भी पूरी तरह निरुपयोगी नहीं होते थे क्योंकि उनका गोबर-मूत्र खाद के काम आता था। उन्हें छोड़ना चाहे कोई तो कहां छोड़ा जाता? छुट्टा छोड़ने का मतलब खेत चरने की छूट। (आवारा छोड़े गये पालतू पशुओं को वाराणसी में छुट्टा कहा जाता है।) मेरे पिताजी तो धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए गाय की सेवा कर्तव्य मानते थे। वे तो कुछएक शारीरिक व्याधियों के निराकरण हेतु भी पंचगव्य के सेवन में आस्था रखते थे।

     यह बात कोई पचास-पचपन वर्ष पहले की है। अब न मेरे पिताजी इस लोक में  रह गये हैं और न वे गायें और न ही मैं अब गांव में हूं। किंतु गाय-बैलों की उपयोगिता तो वहां अभी भी है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र के सीड़ीनुमा खेतों के लिए ट्रक्टर जैसे साधनों की व्यवस्था एवं उपयोग सामान्यतः संभव नहीं।

गोपालकों की गली सुन्दरपुर वाराणसी

 

 

 

 

 

 

वाराणसी में छुट्टा/आवारा गायें 

अब मैं आज के शहरों के गोवंश की बाबत अपने अनुभव की बात करता हूं। मेरा अनुभव मुख्यतया अपनी तथाकथित धार्मिक नगरी (वस्तुत: धर्म के नाम पर पाखंड में अनुरक्त) वाराणसी से जुड़ा है। फिर भी यह कह सकता हूं आवारा या छुट्टा गायों और सांड़ों को मैंने कई शहरों में देखा है और उन शहरों की स्थिति वाराणसी से परिमाणात्मक स्तर पर बेहतर हो सकती है किंतु गुणात्मक स्तर पर नहीं। निश्चय ही वाराणसी की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

जहां तक आवारा जानवरों का सवाल है उसमें गायें एवं साड़ों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशु भी देखने को मिल जाते हैं, जैसे सुअर, बकरे, गधे तथा खच्चर। आवारा कुत्तों को भी उसमें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा वाराणसी के कई मोहल्लों में और मंदिरों के आसपास बंदरों की फौज़ के दर्शन भी आपको हो जायेंगे। इन सबका कोई इलाज मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में होने से रहा; किसी को भी इस दुर्व्यवस्था से परहेज नहीं।

भारतीयों की खासियत यही है कि अवांछित वस्तुस्थिति से कैसे सामंजस्य बिठाएं इसे वे जन्म के तुरंत बाद ही सीख जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही चलते रहनी है।

     जहां तक गायों और साड़ों की बात है मैं बताता हूं वे कहां से आ टपकते हैं। दरअसल इस शहर के गली-कूचों में कई लोग गायें पालते हैं। कुछ ने ताजा एवं “शुद्ध” दूध के लिए निजी तौर पर एक या कभी दो गायें पाल रखी हैं। इसके अलावा कुछ का गोपालन करके दूध का कारोबार करना रोजी-रोटी का साधन है। ऐसे अधिकांश जनों ने अपने पुस्तैनी मकान को और उससे लगे गली-कूचे को ही इस कार्य हेतु प्रयोग में लिया है। इसके लिए कोई पक्का ढांचा गली में खड़ा नहीं करना पड़ता है। इसे आप अतिक्रमण कहेंगे या नहीं मैं नहीं जानता। किंतु प्रशासनिक तंत्र इस व्यवस्था को निर्लिप्त भाव से देखता है। यह भी सच है कि इन लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रशासन नहीं कर सकता। यों पिछले बीस-बाइस सालों से मैं वाराणसी में नये-नये आने वाले सक्षम (कानूनन सक्षम लेकिन व्यवहार में अक्षम!) अधिकारियों को सुनते आ रहा हूं कि शहर के किसी कोने में गोशालाएं स्थापित की जायेंगी। आज तक उस दिशा में कभी कोई प्रयास किया गया होगा ऐसा मैं नहीं समझता। अधिकारी दो-तीन वर्ष यहां की हवा में घुल चुके भांग के प्रभाव में रहते हैं, फिर चले जाते हैं।

इन गोपालकों में कुछ ऐसे होते हैं जो प्रातःकाल गाय दुहने के बाद उसे दिन भर के लिए छोड़ देते हैं। वह गाय सड़कों के किनारे की घास चरती है और सड़क के किनारे खुले में पड़े कूड़े-कचरे में कहीं कोई खाद्य सामग्री मिल जाये तो उसे भी खा जाती है। ऐसा खाद्य अक्सर पोलिथीन की थैलियों में रखकर लोग कूड़े में डाल देते हैं। खाद्य को खाते-खाते वह कभी-कभार पोलिथीन ही को निगल जाती है। मैं समझता हूं पोलिथीन खाने के मामले बहुत नहीं होते होंगे। अगर होते तो गायें और सांड़ आये दिन मर रहे होते। मैंने तो २-४ वर्षों तक इन जानवरों को सड़कों पर जीवित देखा है। सड़क पर विचरण करने वाली गाय संध्याकाल को अपने मालिक के पास लौट आती हैं। स्पष्ट है उसे पालने में गोपालक को कम मेहनत पड़ती है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये गायें बच्चे जनने की उम्र पार कर जाती हैं और दुधारू नहीं रह जाती हैं। गोपालक गोसेवक तो होते नहीं कि वे बूढ़े माता-पिता की भांति इन्हें पालें। उनका उद्देश्य तो उनसे दूध पाना होता है जिसे एक प्रकार से गोशोषण कहा जा सकता है। क्यों, यह भी मैं बताऊंगा। अशक्त तथा निरुपयोगी हो चुकीं इन गायों को छोड़ दिया जाता। बेघरबार इंसान की तरह इनका ठिकाना सड़कें हो जाती हैं। दुधारु अवस्था में इन्हें चारा भी मिल जाता था; वह अब कहां से इन्हें नसीब हो? ये हैं गायें जो सड़कों पर इधर-उधर घूमती फ़िरती हैं। जो कुछ भी सड़क में मिल जाये उसे खा लेती हैं। इनके गोबर को देखकर पता चलता है कि उसमें घास का अंश नाममात्र ही होता है। मेरे घर के प्रवेशद्वार (गेट) पर कभी-कभी कोई गाय गोबर कर जाती है। जब मैं उसे साफ करता हूं तो देखता हूं कि वह इंसान के मल के समान बदबू करता है। जिस गोबर से मैं बचपन से वाकिफ़ रहा हूं उस जैसा तो वह हरगिज नहीं होता है। पहले ही उम्र खा चुकी ऐसी गायें अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। मैंने ऐसी ही एक गाय की व्यथा लघुकथा के रूप में अपने अन्य चिट्ठा-आलेख में लिखी है। (देखें: कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा)

http://jindageebasyaheehai.wordpress.com/2014/09/06/

वाराणसी में आवारा सांड़

अब आइये अपनी नगरी की गलियों-सड़कों पर विचरण करते सांड़ों की बात पर। हिन्दी में एक कहावत है: “रांड़, सांड़, सीढ़ी औ’ सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी।” अर्थात्  सांड़ों की उपस्थिति इस नगरी में कोई नई बात नहीं। पहले वे कहां से आते थे मैं नहीं कह सकता, किंतु आजकल तो वे इन्हीं गोपालकों की देन हैं। होता यह है कि जब गाय बछिया जनती है तो उसे पाल लिया जाता है, क्योंकि वह दो-तीन सालों बाद दुधारू गाय बन सकती है। परंतु जब वह बछड़ा जनती है तो उसका क्या किया जाये? वह बैल बन सकता है। शहरों में किसे जरूरत है बैलों की? अब तो उनकी जरूरत गांवों में भी नहीं रह गयी; उनकी जगह ट्रैक्टर ले चुके हैं। इसलिए नवजात बछड़ा अवांछित होता है। फिर भी कुछ दिनों तक उसे भी पाला ही जाता है ताकि उसकी मौजूदगी से गाय दुहने में आसानी हो। गोपालक उसे यथासंभव कम दूध पीने देते हैं और जैसे ही गाय के थन से दूध उतरने लगता है उसे हटा दिया जाता है। गोपालक गाय को उससे दूर करना शुरू करते हैं और कालान्तर में वह बिना बछड़े के दूध देने लगती है। अपर्याप्त भोजन पाने वाला ऐसा बछड़ा अक्सर कुछ दिनों में मौत का शिकार हो जाता है। यदि वह नहीं मरता है तो उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है। उसकी किस्मत ठीक हुई तो सड़क किनारे की घास तथा अन्य चीजें खाकर जिन्दा रह जाता है और बाद के काल में सांड़ के तौर पर जीवित रहता है। अन्यथा वह भूख अथवा दुर्घटना का शिकार होकर परलोक सिधार जाता है।

तो यह है हमारे गोपालकों/गोसेवकों/गोशोषकों का सच।

     मेरे देशवासी, विशेषतः हिन्दू जन, इस तथ्य को स्वीकारने से कतराते हैं कि हम आडंबरों के साथ जीने के आदी हैं।  हमारी कथनी में आदर्श की खूब बातें होती हैं परन्तु करनी में हम वस्तुस्थिति का भरपूर शोषण करते हैं। गोसेवा एक ढकोसले से भिन्न नहीं है। कुछ ही लोग अपवाद होंगे जो इस कार्य को ईमानदारी से करते हों। – योगेन्द्र जोशी

स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर इसी ब्लॉग के लिए लि्खा था। किंतु इसे मैं अपने दूसरे चिट्ठे (http://jindageebasyaheehai.wordpress.com) पर पोस्ट कर बैठा। यह गलती कैसे हुई, मेरा ध्यान कहां था,  मैं कह नहीं सकता। आज नजर आने पर इसे वहां से यहां स्थानांतरित कर रहा हूं। पाठकों से क्षमायाचना।

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“मेरा मन हो स्वदेशी, मेरा तन हो स्वदेशी। मर जाऊं तो भी मेरा होवे कफ़न स्वदेशी।”

– पं राम प्रसाद बिस्मिल

“मेरी जीवनशैली हो विदेशी, मेरी भाषा हो विदेशी। या खुदा मौका मिले जो मुझे खुद बन जाऊं विदेशी।”

ऐसा सोचने वाले भी मिल जायेंगे देश में; कौन और कितने, अंदाजा लगाइये।

अपना देश भारत या इंडिया जो आप ठीक समझें 70वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। मुझसे यह अपेक्षा की जायेगी कि मैं देशवासियों को प्रणाम करूं, बधाई दूं, और भविष्य की मंगलकामना प्रेषित करूं। शुभकामना !

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15 अगस्त

आज देश को स्वाधीन हुए 69 वर्ष हो रहे हैं। इस दिन सर्वत्र जश्न मनाया जा रहा है। शीर्षस्थ पदों पर विराजमान राजनेता, उच्च प्रशासनिक अधिकारी, अपनी-अपनी संस्थाओं में ध्वजोत्तोलन करने, देश की उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान करने, और उपदेश देने के कार्य में लगे हैं।

क्या कोई उपलब्धियों का निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ आकलन करने को तैयार है? क्या उसके बारे में सुनने को भी तैयार है? या हकीकत जानने के बाद भी उसकी अनदेखी करके खुश होना चाहता है?

मेरी दृष्टि में हमने इस काल में बहुत कुछ खोया है। और पाया है वह इतना कम है कि उसे खोये हुए की भरपाई मानना उचित नहीं होगा। मेरे लेख से विचलित होकर कुछ लोग मुझे बुरा-भला भी कहेंगे। लेकिन यह कोई स्पष्ट नहीं करेगा कि मैं गलत कहां पर हूं।

चलिए मैं अपनी बात कहता हूं। यही स्वतंत्रता तो मुझे मिली है कि मैं अपने खयालात पेश करूं। जिसे नापसंद हो बह कान बंद कर लेगा। इस स्वतंत्र देश में लोग एक दूसरे के साथ गाली-गलौज कर सकते हैं। मैं तो यथासंभव शिष्ट भाषा में अपने बातें कहने की सोच रहा हूं।

उपलब्धियां

क्या हैं उपलब्धियां? हमारे राजनेता सीना तानकर कहने लगेंगे कि हमने नाभिकीय विस्फोट करके अपने को “न्यूक्लियर-पावर-संपन्न” देशों में शामिल किया है। अपनी मिसाइलें बनाकर दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया है। चंद्रमा में चन्द्रयान भेजकर अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है। मंगलयान की बात हमारे अंतरिक्ष अध्ययन/अभियान की योजना का अंग है। इस्रो (ISRO) जैसी हमारी संस्था उत्कृष्ट कार्य करके विश्व के कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ रही है। ओएनजीसी (ONGC) खनिज तेल की खोज अपने दम पर देश एवं विदेश में कर रही है। सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

अन्न उत्पादन के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बन चुके हैं। स्वातंत्र्य पूर्व हमारी स्थिति दयनीय थी। उस समय एवं उसके बाद भी कुछ समय तक अमेरिकी घटिया गेहूं (पीएल 480 योजना के तहत) पर हम निर्भर थे। आज देश में भोजन की कमी नहीं है।

शासकीय-प्रशासकीय तंत्र में अंकीय तकनीकी (digital technology) का प्रयोग बढ़ रहा है। बहुत से स्थलों पर कंप्यूटरीकृत वातावरण में कार्य हो रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकी के साथ रोग-निदान एवं रोगोपचार किया जा रहा है। यह देश के लिए क्या गर्व की बात नहीं है कि विदेशी भी चिकित्सा के लिए यहां आ रहे हैं? अवश्य है, लेकिन …

आज़ाद भारत (इंडिया?) में लोगों की संपन्नता बढ़ी है। लोगों के लिए अब सुख-सुविधा के साधन प्राप्त करना संभव हो गया है। सड़कों पर अनेक जन कारें दौड़ा रहे हैं यह क्या कभी सोचा भी जाता था? सड़कें फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन की बन रही हैं और फ़्लाइ-ओवरों का जाल बिछ रहा है। घर-घर में टीवी, फ़्रिज, धुलाई मशीन पहुंच रहे हैं। हर हाथ में अब स्मार्टफोन पहुंच रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं।

लेकिन सवाल है इन उपलब्धियों का लाभ किसको पूरा-पूरा या अधिकांशतः मिल रहा है? इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए।

उपर्युक्त और तत्सदृश जिन अन्य उपलब्धियों को राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी एवं बुद्धिजीवी गिना सकते हैं उनमें से अधिकतर स्वाभाविक रूप से होने ही थे। उनको होने देना एक प्रकार की विवशता ही थी। जब दुनिया भर में कंप्यूटरों एवं डिजिटल तकनीकी का प्रयोग होने लगा तो हम उससे कैसे अछूते रह सकते थे? जब उस तकनीक के माध्यम से विश्व में संपर्क-साधन हो रहा हो और उसके बिना व्यावसायिक कार्यकलाप असंभव-से होते जा रहे हों तो उसका हमारी भी आवश्यकता बनना स्वाभाविक ही था। समाज के सबसे आम आदमी का भला होगा इस विचार से इनको अपनाया गया होगा यह मैं नहीं मानता। हो सकता है गरीब व्यक्ति तक लाभ पहुंच रहा हो। तब उसे मैं “बिल्ली के भाग से छींका टूटने” के समान मानता हूं।

मैं दावा नहीं करता कि पूरे देश की स्थिति का मुझे पूर्ण ज्ञान है। मेरा अनुभव अधिकांशतः उत्तर प्रदेश और उसके भीतर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है जहां मैं रहता हूं। देश के अन्य शहरों से भी मैं कुछ हद तक वाकिफ़ हूं, क्योंकि मैं यदा-कदा देशाटन पर निकल पड़ता हूं। आजकल तो समाचार माध्यम तमाम तरह की जानकारी आम जन तक पहुंचा रहे हैं। इसलिए ध्यान देने वाले के लिए बहुत कुछ जानना आसान है।

इन उपलब्धियां का सीधा लाभ समाज के संपन्न वर्ग को हुआ है और उन्हीं के लिए बहुत कुछ हुआ है ऐसा मेरा मानना है। कार संस्कृति उन्हीं के लिए तो है। उन्हीं के लिए कार-उद्योग हैं। और जब कारें सड़क पर दौड़ें तो फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन सड़कें और फ़्लाई-ओवर बनने ही हैं। वे आम जनों की समस्या सुलझाने के लिए नहीं बनी हैं। यदि आम जन का हित हमारे देश के शासकों, नीतिनिर्धारकों के जेहन में होता तो सड़क के किनारे फ़ुटपाथ बन रहे होते, और सड़क पर पैदल चलने वालों का अधिकार पहले होता, उसके बाद वाहनों का जैसा कि विकसित देशों में होता है। वाराणसी में जितनी सड़कें पिछले तीनएक दशकों में बनी हैं उनके किनारे फ़ुटपाथ हैं ही नहीं।

चंद्रयान, मंगल-अभियान जैसी योजनाओं का आम जन के लिए कोई महत्व नहीं। एक वैज्ञानिक होने के बावजूद मैं इनको प्राथमिकता में निम्न स्तर पर रखना चाहूंगा। इनसे कहीं अधिक महत्व की समस्याएं देश के सामने हैं। इसलिए आम जन के सापेक्ष इनको उपलब्धि मानता अनुचित होगा।

अवश्य ही अनाज उत्पादन में हुई प्रगति प्रशंसनीय कही जायेगी। अन्यथा दुनिया भर में हो रहे व्यावसायिक परिवर्तन हमारे देश में होने ही थे। परिवर्तन न करते तो क्या करते? कैसे विश्व के सामने टिकते? वैश्विक परिवर्तन का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ना स्वाभाविक था।

मेरी निराशा

मेरी निराशा के मूल में उक्त उपलब्धियों की अर्थवत्ता कम या अधिक होना नहीं है। मैं स्वतंत्रता का आकलन उन बिन्दुओं के सापेक्ष करना चाहूंगा जिनको ध्यान में रखते हुए शासकीय व्यवस्था को उत्तरोत्तर बेहतर बनाने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता अर्जित की गयी थी। तब न डिजिटल टेक्नॉलॉजी थी, न उसको लेकर देश का कोई संकल्प। जिस उम्मीद को लेकर चले थे वह थी उत्तरोत्तर बेहतर शासकीय व्यवस्था की स्थापना। क्या हमारी व्यवस्था में सुधार हुआ है? कुल मिलाकर इस प्रश्न का क्या जवाब होगा?

जवाब आप स्वयं समझ लीजिए। मैं वस्तुनिष्ठ कुछ तथ्यों को आपके समक्ष रख रहा हूं।

जनसंख्या वृद्धि

     मेरी दृष्टि में देश की विकटतम समस्या निरंतर हो रही जनसंख्या वृद्धि है। उम्रदराज देशवासियों को याद होगा 1960 के दशक का समय जब उत्साह एवं गंभीरता से जनसंख्या पर अंकुश लगाने और परिवार-नियोजन के प्रयास किये गये थे। उसके परिणाम कितने अच्छे रहे होते यदि वे प्रयास यथावत चलते रहते? दुर्भाग्य था 1970 के दशक के पूर्वार्ध में संजय गांधी का असंवैधानिक शक्ति के रूप में अवतरित होना। उस व्यक्ति ने ऐसा सख्त रवैया अपनाया कि कार्यक्रम पटरी से उतर गया और राजनैतिक भूचाल आया आपात्काल के रूप में। जनसंख्या के मुद्दे से राजनेताओं/नौकरशाही ने मुख मोड़ लिया। तब से आज तक जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है, किंतु प्रयास बेमन से हो रहे हैं। आज तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों ने अवश्य प्रगति की है, लेकिन पहले से ही बहुत बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश, बिहार की आबादी पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है।

हमारे शासक यह भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन इतने नहीं कि बढ़ती आबादी को झेल सकें। हम मौजूदा नागरिकों को ही शिक्षित नहीं कर पा रहे, उनके स्वास्थ्य के लिए न पर्याप्त अस्पताल हैं और न डॉक्टर, कुपोषण अपनी जगह है, युवाओं के लिए रोजगार नहीं, रेल-बस सुविधा अपर्याप्त हैं, सबके लिए बिजली-पानी मुहैया नहीं करा सकते, इत्यादि। फिर भी जनसंख्या वृद्धि के प्रति लापरवाह हैं। यही हाल रहा तो अगले 10-15 सालों में हम चीन से आगे निकल जायेंगे। यही हमारी उपलब्धि होगी क्या?

इस विषय पर यह विचारणीय है कि जो संपन्न दंपती हैं उनके एक या अधिक से अधिक दो बच्चे हो रहे हैं। कुछ ने तो कोई बच्चा नहीं की नीति अपना ली है। लेकिन जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं, उनके 4-4, 6-6 बच्चे हो रहे। गरीबी और बढ़ती आबादी में गहरा संबंध है। आगे आप खुद सोचिए क्या होगा।

अनुशासनहीनता

      यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश देशवासियों के लिए स्वतंत्रता के माने हैं अनुशासनहीनता, स्वच्छंदता, उच्छृंखलता, निरंकुशता, आदि। कायदे-कानूनों को न मानना देशवासियों का शगल बन चुका है। वाराणसी में रहते मैं यही कहूंगा। अहिष्णुता इसी निरंकुशता की देन है। अंध-आस्था इसमें घी का कार्य करती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अर्थ लिए जाते हैं: “मेरी आस्था पहले, दूसरों का हित बाद में। आस्था के प्रदर्शन में कोई रुकावट न डाले चाहे उसकी जान चली जाये।” यह भावना यहां व्याप्त है। राजनीति अंकुश लगाने के बदले ऐसी आस्था को बढ़ावा देती है। संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों मे कहा गया है सरकारें अंधविश्वास समाप्त करने और लोगों में वैज्ञानिक सोच बढ़ाने के प्रयास करेंगी। हुए हैं ऐसे प्रयास?

कायदे-कानूनों का क्या महत्व है यह तो इसी से स्पष्ट है सड़क पर किसी वहन से दुर्घटना हो जाये तो उसे ही नहीं, गुजरने वाले हर वाहन को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसमें एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी भीड़ की भागीदारी होती है। कोई नहीं कहता कि यह क्या अनर्थ कर रहे हो। किसी पर चोरी का शक हो जाये तो उसे पीट-पीट्कर मारने पर किसी को आतमग्लानि नहीं होती है। ऐसी अनेकों वारदातें प्रकाश में आती हैं। आज तक प्रभावी शासकीय व्यवस्था विकसित नहीं हुई।

इसे भी क्या उपलब्धि कहेंगे?

शिक्षा

मेरी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 5 तक, 1950-60 के बीच के काल में) अपने गांव (अब उत्तराखंड में) के पास की सरकारी पाठशाला में हुई थी। तीन शिक्षक थे और पाठशाला का पक्का भवन। बहुत सुविधाएं नहीं थीं, फ़िर भी उसी में मैंने और मेरे सहछात्रों ने बहुत कुछ सीखा। कृषि की बातें, मिट्टी के खिलौने बनाना, सुलेख लिखना। आज भी उस समय की पुस्तकों के कुछ चित्र स्मृति पटल पर आ जाते हैं। उस काल में मेरी ही तरह अनेक लोगों ने गांवों में शिक्षा पाई और मेरी तरह विश्वविद्यालय के शिक्षक बने। आज क्या स्थिति है सरकारी स्कूलों की? कहीं, भवन नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं तो स्कूल से नदारद। छात्रों की स्थिति यह हो चुकी है कि पांचवीं पास करने के बाद भी पढ़-लिख नहीं सकते।

आज कोई भी सरकारी स्कूल में बच्चों को नहीं भेजना चाहता। निजी विद्यालयों – तथाकथित अंगरेजी माध्यम स्कूलों – की बाढ़ आ चुकी है। जो गरीब उनकी फ़ीस नहीं चुका सकता वही सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजता है।

जिस समय मैंने हाईस्कूल की परीक्षा दी (1962), मुझे एक दिन सुनने को मिला कि फलां परीक्षा केंद्र पर एक परीक्षार्थी नकल करते पकड़ा गया है। वह भी एक जमाना था नकल की एक भी घटना समाचार बनती थी। नकल करने से सभी डरते थे। आज क्या हाल हैं उत्तर प्रदेश, बिहार में? सामूहिक नकल का बोलबाला है। छात्र ही नहीं उनके अभिभावक, शिक्षक, पुलिस बल सब नकल करवाते देखे-सुने जाते हैं। सरकारें हैं कि नकल-माफ़ियाओं के सामने घुटने टेक देती हैं। जहां छात्र/छात्रा को विषय का ज्ञान तक न होने पर टॉपर बनाया जा सकता है (बिहार राज्य में), उस देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी?

हमारी सरकारों ने इंडिया और भारत के विभाजन को और पुष्ट किया है। एक तरफ संपन्न लोगों की अंगरेजी-आधारित शिक्षा है तो दूसरी समाज के कमजोर तबके के लिए क्षेत्रीय भाषा की कुव्यवस्थित शिक्षा। किसी को शर्म आती है? हमारी शिक्षा ऐसे ही चलनी चाहिए? यही उपलब्धि है हमारी? सोचें!

जिस अंगरेजी से मुक्त होने की स्वतंत्रता सेनानियों ने सोचा था आज वही अंगरेजी अपरिहार्य बन चुकी है, जीवन का आधार बन चुकी है। विडंबना नहीं है?

चिकित्सा व्यवस्था

देश में डॉक्टरों की कमी है। सरकारी खर्चे पर छात्र डॉक्टर बनते हैं, फिर  विदेशों की राह पकड़ने की कोशिश करते हैं, अन्यथा निजी अस्पतालों के चिकित्सक बनते हैं। सरकारी नौकरी में कम जाते हैं और जो जाते हैं प्राइवेट प्रैक्टिस से धन कमाने में जुट जाते हैं। बहुत कम (शायद ही कोई) होंगे जो ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हों। बहुत से तो महीनों सरकारी अस्पताल से गायब रहते हैं। कहने को सरकारी अस्पतालों में बहुत कुछ है, लेकिन हकीकत एकदम निराशाप्रद! हालात क्या होंगे यह इसी दृष्टांत से समझा जा सकता है कि अभी दो-चार दिन पहले एक गरीब का बच्चा इसलिए चल बसा कि वह परिवार 20 रुपये की घूस नर्स को नहीं दे पाया। कुछ समय पहले एक घटना के बारे में सुना जिसमें एक बच्चे के पैर के घाव का इलाज वार्डब्वॉय ने किया बाद में उस बच्चे का पैर काटना पड़ा। ऐसे मामलों में जांच समिति बैठा दी जाती है मामलों को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए। किसी कर्मचारी/डॉक्टर को दंडित किया जाता हो सुनने में नहीं आता है।

एक समय था जब सरकारी खर्चे पर सरकारी मुलाजिम का इलाज सरकारी अस्पताल में ही अनुमत था। तब सरकारी अस्पतालों की हालत कुछ बेहतर थी। जब से निजी अस्पतालों की सुविधा मुलाजिमों को मिलने लगी, स्थिति बदतर हो गयी।

डॉक्टरों ने धन कमाई का नायाब तरीका अपना लिया है। वे अनावश्यक जांच करवाते हैं और वह भी अपने “बंधे हुए” जांच-केंद्र पर। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था होने पर भी वहां भी यह होता है। जांच केंद्र से डॉक्टरों को रकम मिल जाती है। वाह क्या चरित्र है और हिपोक्रेटीज़ शपथ (Hippocratic oath) का सम्मान। स्थिति इतनी निराशाजनक पहले नहीं थी।

सड़क दुर्घटना एवं वाहन-चालन लाइसेंस

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कितनी भयावह है इसके आंकड़े अंतरजाल पर आसानी से मिल जायेंगे। यातायात के नियमों का पालन होता है कहीं? क्या पालन होगा जब नियम ही लोगों को मालूम नहीं हों। और मालूम भी हो तो उनके प्रति सम्मान किसके मन में है? नियमों का उल्लंघन अधिकांश लोग करते हैं। ट्वूह्वीलर वाहनों के लिए हेल्मेट का नियम है, कितने लोग उसे पहनते हैं? वाराणसी में तो अपवाद-स्वरूप ही पहनते हैं। पूछने पर न पहनने वाला कहता है “कोई देखता थोड़े है?” कारों में सीटबेल्ट का प्रावधान है, उसे भी चालक नहीं पहनते हैं, उत्तर वही। मतलब यह कि देखने वाला कोई न हो तो इनकी जरूरत नहीं।

यह हमारे लोगों का कायदे-कानूनों का सम्मान न करने की मानसिकता का द्योतक है।

आगे देखिए वाराणसी की सड़कों पर 12-14 वर्ष की आयु के बच्चे मोटर-वाहन चलाते दिख जायेंगे? उनके माता-पिता के लिए यह उपलब्धि होती है, वे इसमें अपनी प्रतिष्ठा देखते हैं, यह उनकी हैसियत का परिचायक होता है। नियमों को तोड़ना किसी की भी नजर में बुरा नहीं होता। ऐसी सोच के लिए जिम्मेदार कौन? कोई तो जिम्मेदार होगा?

हमारे यहां ड्राइविंग लाइसेंस आलू-प्याज की तरह खरीदे बेचे-खरीदे जाते हैं। अपने बनारस में तो मैंने ऐसा ही देखा। मेरा स्कूटर वाला लाइसेंस खत्म हो चुका है, अब जरूरत नहीं समझता। इसलिए आज की हालत क्या है मालूम नहीं। पर जब मैंने पहली बार लाइसेंस लिया तो न कोई लिखित और न कोई सड़क पर वाहन-चालन का परीक्षण। गये, लाइसेंस मांगा और मिल गया। कुछ पैसा मांगा मैंने दे दिया, गलत कहें या सही। तब मुझे लगा कि अंधा-लूला-बहरा, हर कोई लाइसेंस पा सकता है। दलाल को पैसा दीजिए साइसेंस आपके हाथ। मैं समझता हूं कि आज भी दलालों काम यथावत चल रहा होगा। क्या यही हमारी शासकीय व्यवस्था होनी चाहिए? फिर रोइये कि देश में सड़क हादसे बहुत होते हैं। अभी हाल में मेरे बेटे ने कनाडा में लाइसेंस लेना चाहा। वह प्रशिक्षण में एक-डेड़ लाख खर्च कर चुका था। वाहन चालन परीक्षण में असफल हो गया। गलती यह कि पार्किंग करने में सफेद रेखा को अगला पहिया छू गया। एक-दो ऐसी ही छोटी-मोटी गलतियां! बस इतना काफी था। यहां कोई सोच सकता है कि ऐसा भी कहीं होता है?

प्रशासनिक कुव्यवस्था

देश जब आज़ाद हुआ तो यह उम्मीद थी हम साफ-सुथरी एवं जनता के प्रति जवाबदेह शासकीय व्यवस्था विकसित करेंगे। किंतु ऐसा हुआ क्या? हमारी नौकरशाही जनता के सेवक रूप में खुद को नहीं देखती, बल्कि वह अपने को उनका मालिक समझती है। काम के प्रति लापरवाही, टालमटोल, घटिया काम और कदाचार को वह अपना अधिकार मानती है। आये दिन नये-नये घोटालों का खुलासा होता है, पर क्या मजाल कि किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता हो, दंडित किया जाता हो। अधिक से अधिक कुछ दिनों के लिए किसी को निलंबित करके शासन जनता की आंख में धूल झोंकता है। याद रहे निलंबन सजा नहीं होता है। यह तो जांच-पड़ताल की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। दंडित करने का काम तो न्यायालय करता है जहां मामला जाता ही नहीं और गया भी तो वर्षों तक कोई निर्णय नहीं होता है। उस बीच आरोपित कभी-कभी स्वर्ग (नरक?) भी सिधार जाता है।

सरकारी तंत्र में खूसखोरी आम बात है। मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कहते है कि अधिकारियों को देने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नही था इसलिए वह सरकारी नौकरी नहीं पा सका। नियुक्ति-पत्र तक तभी मिलता है जब आप पैसा खर्च करते हैं। सालों पहले में एक बार ट्रेजरी कार्यालय गया। वहां शरीर से कमजोर उम्रदराज पेंशनरों को बीस-बीस रुपये पेंशन-बुक में रखकर देते हुए देखा था। आज वह रेट 200-250 रुपये होगा। पिकेट-ड्यूटी पर लगे पुलिस-मैन को प्रतिबंधित गाड़ी आगे बढ़ने देने के लिए पैसे लेते हुए देखा है। लोग बताते हैं कि जब वे स्वयं 100-50 हजार की घूस देकर नौकरी पाये हैं तो उसकी भरपाई उन्हें ऐसी वसूली से ही करनी होती है।

कितना साफ-सुथरा शासन-तंत्र विकसित किया है आज के शासकों ने? पहले घूस लेना चोरी-छिपे होता है और अब खुलकर होता है। घूस के भी रेट बने हैं। मुझे कभी एक बुजुर्ग एंजीनियर ने बताया कि बेईमानी तो पहले भी होती थी पर इतनी नहीं। वे बताते थे कि किसी कार्य के खर्चे का आकलन (एस्टिमेट) बढ़ा-चढ़कर पेश किया जाता था जैसे 100 की जगह 120 रुपये। तब 100 का कार्य हो जाता था और 20 रुपया जेबों में जाता था। कार्य की गुणवत्ता बनी रहती थी। आजकल एस्टिमेट तो 120 रुपये का बनेगा और खर्चा केवल 50, शेष 70 जेबों में। कार्य की गुणवत्ता कैसी होगी सोच सकते हैं। यह वाराणसी की सड़कें देखकर समझ में आ जयेगा जो पहली बरसात को झेल जायें तो समझिए कि चमत्कार हो गया।

विदेश यात्रा को जीते-जी स्वर्ग यात्रा के समान देखने वाले हमारी प्रशासनिक अधिकारी मौके खोजते हैं कि किस बहाने विदेश जाया जाये। कभी वे वहां की कानून-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं तो कभी वहां के प्रशासन का अनुभव पाने, कभी खेल-आयोजन कैसे करते हैं इसे सीखने और कभी यातायत व्यवस्था की जानकारी लेने। कोई भी बहाना चलेगा, बस विदेश भ्रमण करने से मतलब। अब देखिए कल-परसों अपने प्रदेश के खेल मंत्री गये हैं ओलंपिक स्थल रियो द जनीरो कुश्ती खिलाड़ी नरसिंह यादव की हौसला आफ़जाई करने। विदेश भ्रमण का बहाना। सरकारी खर्चे पर इकनॉमी क्लास में तो वे जायेंगे नहीं, एक्जेक्टिव क्लास में जायेंगे। अपनी जेब से तो कुछ लगना नहीं। प्रदेश के खजाने की परवाह किसे? वाह!

इस प्रकार के अनेक उदाहरण आपको यत्रतत्र मिलेंगे। सब इसे जानते हैं, परंतु हर कोई आश्वस्त रहता है कि सुधार होना नहीं है।

यही उपलब्धि है न स्वतंत्र भारत की?

पुलिस तंत्र

स्वतंत्र भारत का शासकीय तंत्र सुधारने के प्रति आज के शासक कितने गंभीर हैं इसे समझना कठिन नहीं। वर्षों से प्रशासनिक सुधारों की बातें की जा रही है। लेकिन आज तक कुछ किया नहीं गया। पुलिस तंत्र में सुधार की बातें भी होती रही हैं, उसे भी टाला जा रहा है। उच्चतम न्यायालय इस बारे में बार-बार याद दिलाता आ रहा है, लेकिन शासक वर्ग को कोई रुचि नहीं। तो क्या देश के शासक अंगरेजों की भांति डंडे से जनता पर राज करना चाहते हैं? जी हां, वे सुधार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि जहां जनता से उन्हें असुविधा लगे उन पर डंडा बरसाकर चुप करा दो। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के कोई कारगर उपाय आज तक नहीं हुए। नित नये कानून बनाकर जनता को मूर्ख बनाते आ रहे हैं वे। कानूनों का कार्यान्वयन प्रभावी न हो इसका भी वह साथ में इंतजाम करते हैं। जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति वे टालते हैं, महीनों, वर्षों तक। त्वरित निर्णय का तो सवाल ही नहीं।

लचर न्यायिक व्यवस्था यथावत बनाये रखना भी शासकों का इरादा रहा है। दो रोज पूर्व ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि पिछले छः माह से न्यायालयों की नियुक्ति क्यों टाली जा रही है। सुधारों को टालना सरकारों की नीयत रही है।

राजनेतओं की साख

क्षमा करें यदि मैं यह कहूं आज के किसी राजनेता के प्रति मेरे मन में सम्मान नहीं है। यह सोचने की स्वतंत्रता मुझे है। मैं किसी को अपशब्द नहीं कहूंगा, मिलने पर सामान्य शिष्टाचार भी निभाऊंगा। लेकिन मेरे मन में उनके प्रति सम्मान हो इसकी बाध्यता कहीं नहीं है।

स्वतंत्रता के आरंभिक काल के राजनेताओं की तुलना में आज के राजनेताओं को किस स्तर पर रखेंगे आप? आकलन करते समय क्या आप सोचेंगे कि वे कितने अनुशासित हैं, देशहित के प्रति समर्पित हैं, सत्तालोलुपता कितनी है, आपराधिक वृत्ति के नेताओं के प्रति उनका क्या रवैया है, इत्यादि। मेरे अपने उत्तर हैं “निराश करने वाले”।

स्वार्थलिप्सा और सत्तालोलुपता हमारे राजनेताओं के चरित्र का अपरिहार्य अंग बन चुका है। सत्ता हथियाने के लिए सभी हथकंडे सभी दलों के नेता अपनाते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी करके सभी जातीयता, धार्मिकता, क्षेत्रियता की भावना उभाड़कर वोटबैंक बनाने में जुटे हुए हैं। है कोई राजनैतिक दल जो आपराधिक छबि वाले से परहेज करता हो,जो बाहुबल एवं धनबल का सहारा न लेता हो, जो तरह-तरह से मतदाताओं को न लुभाता हो (जैसे शराब पिलाना, पैसे की घूस देना)। जिन्हें आप साफ-सुथरे कहेंगे वे कैसे इस अनर्थ को सहते हैं।

राजनीति में सिद्धांतहीनता व्याप्त है। सुबह तक जो कम्युनल हो वह शाम तक सेक्युलर हो जाता है। कल तक जो समाजवादी हो वह आज दक्षिणपंथी बन जाता है। सिद्धांत बस एक है: जहां बेहतर अवसर दिखें वहां चल पड़ो। आप ऐसे सिद्धांतहीनों से क्या उम्मीद रखते हैं?

आज़ादी के 69 वर्ष बीतते-बीतते हमारे अधिकतर राजनैतिक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा परिवार की निजी व्यावसायिक संस्था बन चुके हैं। एक बेहद घटिया परंपरा इस क्षेत्र में स्थापित हो चुकी है। मुलायम सिंह, लालू यादव, मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि आदि सब उदाहरण हैं। अपने समय में ये लोग बाप-दादों के बल पर नेता नहीं बने थे, पर अब अपने परिवारी जनों को को राजनेता बनाने की परंपरा स्थापित कर रहे हैं, पूरी बेशर्मी के साथ। कार्यकर्ताओं की हैसियत बंधुआ मजदूर की बन चुकी है। कभी कांग्रेस इस श्रेणी में नहीं थी लेकिन अब वह सोनिया-राहुल-प्रियंका की निजी संपदा बन गयी है। क्या मजाल कि दल के मुखिया से कोई असहमत हो। जो असहमत हो वह दल से निकाला जायेगा या निकल जायेगा। दलों में न आंतरिक लोकतंत्र है और न वैकल्पिक नेतृत्व पनपने देने की परंपरा। इसमें आपको विरोधाभास नहीं दिखता कि आंतरिक लोकतंत्र के विरोधी देश का लोकतंत्र चला रहे हैं?

राजनीति में उत्तरोत्तर सुधार के बदले गिरावट आ रही है यह मेरी धारणा है।

वर्ष 1950 के आगे-पीछे चीन को भारत की तुलना में पिछड़ा एवं गरीब माना जाता था। आज वह हमसे मीलों आगे निकल चुका है, हर क्षेत्र में। उसकी “प्रति व्यक्ति (औसत) आय” (per capita income) हमारी (लगभग $1600) तुलना में करीब पांच गुना अधिक है| स्वतंत्रता के समय एक रुपया एक डॉलर के लगभग था। आज वह घटते-घटते $0.015 के बराबर हो चुका है। इस प्रकार की घटनाएं क्यों हुईं? हमारी शासकीय व्यवस्था में कहीं खोट रहा होगा न?

अंततः

     मैं उन देशवासियों को बधाई देता हूं जिनको विगत उपलब्धियां संतोशप्रद, आशाजनक लगती हैं। मुझे उनसे ईर्ष्या है कि काश मुझे भी ऐसा ही लगा होता।

लेख अपेक्षा से अधिक लंबा हो चला है। कहने को बहुत कुछ है, किंतु कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही चाहिए। अतः पटाक्षेप।

आप पाठकों को पुन: बधाई, शुभेच्छाएं। शान्तिः सर्वत्र प्रसरेत् । – योगेन्द्र जोशी

गांधी जयंती के अवसर पर जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (2)

मोदी तथा स्वच्छता अभियान

इस विषय पर एक आलेख मैंने गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को लिखा था ।

उसमें मैंने गांधी-चिंतन की कुछ बातों पर टिप्पणी करते हुए मोदी के स्वच्छता अभियान का जिक्र किया था और इस अभियान की सफलता पर शंका जताई थी । मैं अपनी शंका के कारण स्पष्ट करता हूं ।

मैं मोदी या अन्य किसी राजनेता का समर्थक नहीं रहा हूं, किंतु मोदी का फिलहाल प्रशंसक अवश्य हूं । कारण सीधा-सा यह है कि मोदी के कथनों तथा कार्यप्रणाली में मौलिकता है ओर वह घिसे-पिटे ढर्रे पर चलने वाले राजनेता एवं प्रधानमंत्री नहीं लगते हैं । मुझे लगता है कि वे सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल (Charles de Gaulle) की जैसी भूमिका निभाना चाहते हैं, जिन्होंने कुछ हद तक डिक्टेटरों सदृश व्यवहार करते हुए अपने-अपने देशों की आरंभिक प्रगति में महती भूमिका निभाई थी । मोदी स्पष्टतः दिखाई देने वाले नयेपन के साथ देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं और देश का स्वरूप बदलना चाहते हैं । उनकी विभिन्न योजनाएं और चंद रोज पहले घोषित स्वच्छता अभियान कितने सफल होंगे यह अभी कोई नहीं बता सकता । मैं इतना जरूर कहूंगा कि यदि सफलता मिली तो श्रेय मोदी को देना ही होगा, और यदि विफलता मिली तो दोष हमारी शासकीय व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र एवं आम जनों का कहा जाएगा, जो वांछित दायित्व न निभा पाए हों और जिन पर प्रधानमंत्री होने के बावजूद मोदी का अतिसीमित नियंत्रण है ।

स्वच्छता अभियानः चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

मामला स्वच्छता का हो या किसी और बात का, अभियान स्वयं में उद्येश्य की प्राप्ति नहीं करते । अभियानों का मुख्य मकसद लोगों को मुद्दे के प्रति सचेत करना और उन्हें समुचित दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है । यदि मकसद पूरा हो सका और समस्या को लेकर कुछ कर पाने की संभावना लोगों में निहित हो जाए तो अभियान की सार्थकता सिद्ध हो जाती है । अन्यथा अभियान अभियान मात्र बन कर रह जाता है । आप प्रतिदिन अभियान नहीं चला सकते और न ही आम जन उसमें रोज-रोज भागीदारी निभा सकते हैं । चूंकि इस अभियान में सामान्य लोगों के अलावा कई गण्यमान्य जन भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, इसलिए थोड़ी उम्मीद बनती जरूर है कि कुछ सार्थक परिणाम निकलेंगे । लेकिन कुछ समय पश्चात मौजूदा आरंभिक जोश ठंडा पड़ जाये तो आश्चर्य नहीं होगा । ऐसा प्रायः सभी अभियानों एवं आंदोलनों के साथ देखने को मिलता है । तब “चार दिनों की…”

जहां तक स्वच्छता का मामला है मैं समझ नहीं पाता कि अपनी तरफ से सफाई बरतने के लिए लोगों से अनुरोध क्यों करना पड़ता है । यह बात उनके जेहन में खुद-ब-खुद क्यों नहीं आती ? अपने परिवेश को स्वच्छ रखें इस आशय के संदेश कई स्थलों पर लिखे दिखते हैं, जैसे रेलवे प्लेटफार्मों पर और रेल के डिब्बे के भीतर, अथवा चौराहों पर अपने शहर को स्वच्छ रखें के संदेश । फिर भी गंदगी फैलाने वाले गंदगी फैलाते रहते हैं । संदेशों का कोई असर क्यों नहीं पड़ता ? सड़क के किनारे दीवारों पर अक्सर लिखा रहता है “यहां मूत्रत्याग या पेशाब न करें” फिर भी पेशाब करने वालों की कमी नहीं रहती । क्या अभियानों का असर वास्तव में पड़ता है ? शायद नहीं; कइयों को ये नौटंकियों सदृश लगते हैं, तमाशे के माफिक ! मैं इस समय मुम्बई, पश्चिम भांडुप, में हूं । मुझे तो यहां इस अभियान के संकेत तक नहीं दिखे । पता नहीं देश के किस-किस कोने में कुछ हुआ हो, मीडिया में छपी तस्वीरों से अधिक ।

फिर भी मैं मान लेता हूं कि मौजूदा जिस अभियान की शुरुआत मोदी ने की है, और जिसे जनसमर्थन मिल रहा है, वह लोगों को प्रेरित करेगा । तब सवाल है कि उसके अनुसार आम आदमी से क्या अपेक्षा की जाती है ? यही न कि लोग सड़कों, सार्वजनिक स्थलों, आदि पर गंदगी न फैलाएं । वे सड़कों पर पान की पीक नहीं थूकें, उनके किनारे खड़े होकर पेशाब नहीं करें, जहां-तहां कूड़ा नहीं फैंकें, नालियों में प्लास्टिक की थैलियां नहीं डालें, रेलगाड़ी के डिब्बों के फर्श पर मूंगफली के छिलके, बिस्कुट के रैपर नहीं गिराएं, इत्यादि । ऐसे तमाम कार्य करने के लिए आम जन, विशेषकर नौजवान, किशोरवय,  बालक-बालिकाएं प्रेरित की जा सकती हैं, किंतु नागरिकों का व्यक्तिगत योगदान पर्याप्त है क्या ?

प्रशासन की भूमिका

वस्तुतः सफाई कार्यक्रम में प्रमुखतया दो पक्षों की भागीदारी रहती हैः (1) पहले में जन-सामान्य हैं जिनके व्यक्तिगत योगदान की बात ऊपर की गई है, और (2) दूसरा संस्थाएं हैं जिनका दायित्व सार्वजनिक क्षेत्रों की साफ-सफाई की व्यवस्था करना है । घरों और व्यावसायिक कार्य-स्थलों से निकलने वाले कूड़े-कचरे के निस्तारण का दायित्व इन्हीं संस्थाओं का होता है । सड़कों, नालों, एवं पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों को समय-समय पर साफ करना संस्थाओं की जिम्मेदारी होती है । आम जन के उपयोग के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण भी संस्थाओं का ही कार्य होता है, न कि निजी तौर पर किसी व्यक्ति का ।

हमारे देश में ये संस्थाएं सामान्यतः प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा होती हैं । लेकिन वे गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्थाएं भी हो सकती है जिन्हें शासकीय नियमों के अनुरूप कार्य करने की अनुमति रहती है । “सुलभ इंटरनैशनल” ऐसी ही एक प्रतिष्ठित संस्था है जो सार्वजनिक उपयोग हेतु शौचालयों का निर्माण कराती आ रही है । जब कोई व्यक्ति जनहित में ऐसा ही कोई कार्य करे तो वह भी एक गैरसरकारी संस्था की तरह कार्य कर रहा होता है । उसका कार्य समाज के प्रति उदारता का परिचायक कहा जाएगा । किंतु यह स्वीकारा जाना चाहिए कि मूलतः सार्वजनिक सफाई प्रशासन की ही जिम्मेदारी होती है, भले ही वह अपने दम पर यह करे अथवा गैरसरकारी संस्थाओं से सहयोग लेकर चले ।

मैं देश के कई हिस्सों में बतौर पर्यटक के घूम-फिर चुका हूं । यह सभी जानते हैं कि हमारा देश विधिधताओं से भरा है । खानपान, पहनावा, स्थानीय रीतिरिवाज, भाषा-बोली, आदि में विविधता पाई जाती है । फिर भी मुझे यह देखना बेहद दिलचस्प लगा कि एक माने में सभी देशवासियों में समानता है, वह है स्वच्छता के प्रति उदासीनता या बेपरवाही । इस माने में संस्थाओं में भी काफी हद तक एकरूपता देखने को मिलती है । अवश्य ही कुछ जगहों पर मैंने पर्याप्त प्रशासनिक चुस्ती देखी है तो अन्यत्र उसकी सुस्ती ही सुस्ती । तदनुसार सड़कों, सार्वजनिक स्थलों में प्राप्य गंदगी की मात्रा में थोड़ा-बहुत अंतर जरूर रहता है, फिर भी गंदगी तो रहती ही है । उदाहरणार्थ देश में प्रायः सभी शहरों में जहां-तहां प्लास्टिक थैलियों का बिखरा होना, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर लगे रहना, दुर्गंध फैलाती बदबदाती नालियों की मौजूदगी, आदि आम बातें हैं । ये बातें प्रशासनिक उदासीनता के प्रमाण होते हैं । इसी प्रकार आम जनता का सफाई के प्रति रवैया भी कमोबेश एक जैसा ही है । यह है भारत की विविधता में एकता

वाराणसी का उदाहरण

मैं पिछले करीब 42 सालों से वाराणसी मैं रह रहा हूं । मैंने इस शहर को शनैः-शनैः दुर्व्यवस्था का शिकार होते देखा है । पहले सड़कें अधिक चौढ़ी नहीं थीं, फिर भी जाम की स्थिति नहीं पैदा होती थी । आज सड़कें दोहरी या अधिक चौढ़ी हैं, किंतु हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है । पहले कारें नहीं के बराबर थीं, आज इतनी हैं कि सर्वत्र धुआं-ध्वनि प्रदूषण फैल रहा है । पहले सड़कें 5-7 साल चल जाती थीं, अब 2-4 माह में ही उखड़ने लगती हैं । पहले कागज के थैले इस्तेमाल होते थे, अब उनकी जगह गंदगी के कारक प्लास्टिक की थैलियों ने ले ली है ।

मेरा मानना है कि वाराणसी में प्रशासन वस्तुस्थिति के प्रति उदासीन, निष्क्रिय, या बेपरवाह रहता है । संसाधनों तथा कार्यबल का अभाव उसे और पंगु बना देता है । अतः मुझे उससे उम्मीद नहीं है । न ही मैं आम जनता से कोई उम्मीद रखता हूं, जो “बनारस की मस्ती” के नाम पर अनुशासनहीनता बरतती है और नागरिक दायित्वों से बेखबर रहती है । ऐसे में अहम स्थलों में स्वच्छता के विभिन्न टापू उभर सकते हैं जहां निजी संस्थाएं अथवा प्रशासनिक तंत्र विशेष तौर पर प्रयासरत हों, किंतु वृहत्तर स्तर पर स्थिति दयनीय ही रहनी है ।

कुल मिलाकर मुझे लगता नहीं कि वाराणसी में प्रशासन और आम जनता से स्वच्छता की आशा की जा सकती है । देश में अन्यत्र भी स्थिति विशेष आशाप्रद होगी यह मैं नहीं सोच पाता । मैं ऐसा क्यों सोचता हूं इसे अपने निजी अनुभवों पर आधारित दो-एक उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी