उत्तर प्रदेश में योगी-राज: अभी तक तो असफल होता दिख रहा है

मेरी कुमाउंनी बोली (उत्तराखंड) में एक कहावत है: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब बताने से पहले सोचता हूं कि इसमें एक कड़ी और जोड़ दूं: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि चेलि थैं कै, चेलिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब कुछ यों समझ सकते हैं: किसी कार्य को निबटाने के लिए सास ने बहू (पुत्रवधु) से कहा; बहू ने उसे करने के लिए बेटी को कहा; अल्पवयस्क बेटी ने कार्य की गंभीरता समझे बिना कुत्ते से कहा; और कुत्ते ने स्वभाव के अनुकूल पूंछ हिला दिया। कार्य जैसा का तैसा रह गया।

शासन – अंतर नहीं दिखता

ऊपर्युक्त कहावत हमारे शासकीय तंत्र के चरित्र पर काफी हद तक लागू होती है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता सम्हाले योगी आदित्यनाथ को अब तीन माह होने को हैं। इस अल्पावधि में वे जनता की तमाम उम्मीदों को पूरा करते हुए दिखने लगें ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखता। फिर भी कुछ बातें हैं जिनकी झलक नये शासकीय तंत्र में दिखनी ही चाहिए थीं। मैं यह उम्मीद करता था कि जो भाजपा चुनावों के दौरान जोरशोर से कहती थी कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है और अपराधी खुले घूम रहे हैं उसी दल के नेता और कार्यकर्ता अब अपनी अराजकता दिखा रहे हैं। अगर आप समाचार माध्यमों पर विश्वास करें तो ऐसी वारदातें सुनने-देखने में आई हैं जिनमें किसी न किसी बहाने भाजपा के नेता-कार्यकर्ता कानून व्यवस्था अपने हाथ में लिए हों। बसपा एवं सपा की पूर्ववर्ती सरकारों में आपराधिक छवि वाले उनके कार्यकर्ता असामाजिक कृत्यों में लिप्त रहते थे। अब वैसा ही कुछ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं। नयी शासकीय व्यवस्था में भाजपा के लोगों को अनुशासित होकर आम जन के समक्ष दल की अच्छी छवि पेश करनी चाहिए थी। ऐसा हुआ क्या?

योगी जी ने जब सत्ता सम्हाली तो उन्होंने गरजते हुए घोषणा की कि अपराधी तत्व प्रदेश छोड़कर चले जायें अन्यथा वे सींखचों के पीछे जाने के लिए तैयार रहें। इस संदेश से अपराधियों के बीच भय की भावना जगनी चाहिए थी। ऐसा हुआ नहीं। आपराधिक घटनाएं कमोबेश वैसी ही हो रही हैं जैसी बीते समय में हो रही थीं। जो सपा शासन आपराधिक वारदातों के लिए बदनाम रही है वह भी अब कह रही है, “कहां हुए अपराध कम?”

मेरी जानकारी में योगी जी का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है। पूर्णतः अनुभवहीन व्यक्ति को समुचित निर्णय लेने में दिक्कत हो सकती है। हमारे लोकतंत्र में यह अघोषित परंपरा रही है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अनुभवहीन व्यक्ति के लिए पर्दे के पीछे से मार्गदर्शन करने वाला कोई न कोई रहता है। सुना ही होगा कि कैसे महिला ग्रामप्रधानों के कार्य संपादन उनके पतिवृंद करते आए हैं। बिहार में श्रीमती रावड़ी मुख्यमंत्री बनीं (बनाई गयीं) तो उनके पति लालू जी ही दरअसल राजकाज में मदद कर रहे थे। जब अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बिठाया गया था तो उनके पीछे पिता मुलायम जी का मार्गदर्शन था। लेकिन ऐसा कुछ योगी जी के साथ नहीं है यही मैं समझ रहा हूं। ऐसा नहीं कि इतिहास में सदैव अनुभवी ही सफल होते आये हों। कई बार एकदम नया व्यक्ति भी सफल शासक सिद्ध होते हैं। योगी जी उस श्रेणी में हैं ऐसा नहीं लगता।

प्रशासनिक तंत्र

योगी जी ने सत्ता पर काबिज होते ही अनेकानेक निर्देश अपने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए। उन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है इसे वे क्या समझ पाये हैं? और जो अधिकारी निर्देशों के अनुसार नहीं चल रहा हो उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गयी? लेख के आरंभ में जो मैंने सुनाया, “सास ने बहू से …” वह प्रशासनिक तंत्र पर लागू होता  है। मुख्यमंत्री शीर्षस्थ अधिकारियों को निर्देश देते हैं, वे कनिष्ठ अधिकारियों को, वे अपने मातहतों को, …।” ये सिलसिला चल निकलता है, और सबसे नीचले पायदान पर का व्यक्ति, “अरे ऐसे आदेश तो आते ही रहते हैं” की भावना से पुराने ढर्रे पर ही चलता रहता है। मेरी समझ में यही कारण होगा कि योगी-राज में अभी कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता है।  

निर्देशों की बात पर मुझे अपने वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक के रवैये का स्मरण हो आता है। बात सालों पहले की है जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था। मेरे विषय भौतिकी (फिज़िक्स) की प्रायोगिक कक्षा में वे अक्सर विलंब से पहुंचते थे। तब कहते थे, “अरे यार, भूल गये कि क्लास है।” कभी-कभी प्रयोगशाला-परिचर (लैब अटॆंडेंट) उन्हें बुलाने भी चला जाता था। मैं शिष्टता के नाते कुछ कहता नहीं था, लेकिन उनके भूलने को मैं “सुविधानुसार विस्मृति” (फ़गेटफ़ुलनेस ऑव्‍ कन्वीनिअंस) मानता था। मैं समझ नहीं पाता था कि जिस दायित्व के लिए व्यक्ति ने नियुक्ति स्वीकारी हो उसे उस दायित्व की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

योगीजी को यह क्यों कहना पड़ता है कि शिक्षक समय पर कक्षा में जायें, चिकित्सक परामर्श कक्ष में समय पर पहुंचें, पुलिस चौकी प्रभारी वारदात की एफ़आईआर दर्ज करें, आदि-आदि। यह तो संबधित अधिकारियों-कर्मियों के दायित्वों में निहित है। यह सब तो उन्हें करना ही करना है अपनी सेवा-शर्तों के अनुरूप। योगी जी को निर्देश निर्गत करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे दायित्वों के अनुसार कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर उन्हें अपने दायित्वों का ही ज्ञान न हो और उसमें रुचि ही न लें तो फिर शासकीय सेवा में क्यों हैं?

सरकारी ‘सेवा’ बल्लेबल्ले

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था क्यों घटिया दर्जे की है इसे समझना जरूरी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा उच्चतम श्रेणी की रहती है। ठीकठाक वेतन के अलावा कई प्रकार के लाभ और रियायतें, सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, आदि इस नौकरी की खासियतें हैं। जब इतना सब किसी को मिल रहा हो तो दायित्व-निर्वाह में ईमानदारी तो बरतनी ही चाहिए। परंतु दुर्भाग्य है कि नौकरी के लाभ तो सभी चाहते हैं किंतु बदले में निष्ठा से काम भी करें यह भावना प्रायः गायब रहती है।

निजी क्षेत्रों में व्यक्ति की अक्षमता माफ नहीं होती, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। लेकिन सरकारे नौकरी में निर्देश पर निर्देश दिए जाते हैं, या तबादला कर दिया जाता है, अथवा कुछ काल के लिए निलंबन। तबादला का मतलब यह है कि निकम्मेपन की जरूरत ‘यहां’ नहीं लेकिन ‘वहां’ है। वाह! लोगों को यह एहसास नहीं है कि निलंबन दंड नहीं होता है। यह तो महज एक प्रक्रिया है तथ्यों की छानबीन के लिए, ताकि दंडित करने न करने का निर्णय लिया जा सके। आम तौर पर 90 दिनों के अंतराल पर निलंबन वापस हो जाता है, और मुलाजिम बाइज्जत अपनी कुर्सी पर!

आजकल सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी देखी जाती है। इच्छुक जन हर प्रकार के हथकंडे अपनाते देखे जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी जन अपने-अपने चहेतों को नियुक्ति देते/दिलाते है। जातिवाद, भाई-भतीजाबाद, क्षेत्रवाद आदि की भूमिका अहम रहती है। जब नियुक्तियां ऐसी हों तो अच्छे की उम्मीद क्षीण हो जाती है।

सरकारी नियुक्तियां

नियुक्तियों में शैक्षिक एवं शारीरिक योग्यता (जहां और जैसी उसकी अहमियत हो) तो देखी जाती है, लेकिन किसी भी सरकारी विभाग में नियुक्तियों में आवेदक के बौद्धिक स्तर (इंटेलिजेंस कोशंट) एवं भावात्मक स्तर (इमोशनल कोशंट) का आकलन नहीं किया जाता है। मेरा मानना है कि इन दोनों का गंभीर आकलन नियुक्तियों में होना चाहिए। पुलिस बल में तो इनकी आवश्यकता कुछ अधिक ही है। ऐसे पुलिसकर्मियों की खबरें सुनने को मिलती हैं जिनकी हिरासत से अपराधी चकमा देकर भाग जाते हैं। साफ जाहिर है उनका बौद्धिक स्तर कम ही रहता है। इसी प्रकार वे कभी-कभी एफ़आइआर तक नहीं दर्ज करते हैं, खास तौर पर रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध, क्योंकि वे संवेदनशील नहीं होते हैं। हमें आम जनों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए यह भावना उनके मन में होनी चाहिए कि नहीं? अक्सर देखा गया है कि वे भुक्तभोगी का शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं।

जब संवेदेनाहीन व्यक्ति सरकारी तंत्र में हो तो वह आम जन के प्रति ही नहीं अपितु अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रति भी लापरवाह होता है। और यही इस उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह धारणा सरकारी मुलाजिमों के दिलों में गहरे बैठ चुकी है कि उन्हें उनके निकम्मेपन के लिए दंडित नहीं किया जायेगा। वस्तुतः प्रशासनिक तंत्र के संदर्भ में लापरवाही, कामचोरी, नकारापन, आदि सभी कुछ जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। एक बार नौकरी में घुस जाओ और जिन्दगी मजे में गुजार लो। बस अपने ऊपर के अधिकारियों को खुश रखो; काम करो या न, बस काम करते हुए-से दिखो।

पिछले 25-30 वर्षों में प्रदेश प्रशासनिक गिरावट के दौर से गुजर चुका है। उसे पटरी पर लाना आसान काम नहीं है। महज निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नही होने का यह योगी जी अभी तक समझ नहीं पाये हैं। उन्हें देखना चाहिए कि काम क्यों नहीं हो रहा है। यदि हो रहा है तो घटिया स्तर का क्यों हो रहा है। कुछ को दंडित करके दिखाएं; निलंबन से कुछ नहीं होने वाला।

निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नहीं होगा। निर्देश देना यानी “सास ने बहू से कहा, बाहू ने …”।

तंत्र वही है। उसका चरित्र अभी तो अपरिवर्तित ही है। इसलिए योगीराज की सफलता संदिग्ध है। – योगेन्द्र जोशी

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़। क्या वाकई छेड़छाड़ हो सकती है?

 

 

 

फ़रवरी-मार्च, 2017, के राज्यस्तरीय चुनाव

विगत फरवरी-मार्च में संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को अच्छी कामयाबी मिली थी खास तौर पर उत्तर प्रदेश में। इस राज्य में उसे उम्मीद से कहीं अधिक विधानसभा सीटें मिलीं और सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा को बहुत कम। बसपा तो उम्मीद लगाये बैठी थी कि इस बार वही सत्ता पर काबिज होगी। अपनी करारी हार से तिलमिलाई बसपा ने तुरंत ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। मायावतीजी ने दावा किया कि भाजपा ने ईवीएम के साथ छेड़खानी करके/करवाके सीटें पाई हैं।

उधर पंजाब में “आआपा” (आप) के संयोजक केजरीवालजी आश्वस्त थे कि सत्ता तो उन्हीं के हाथ में आनी है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के मुकाबिले वे कहीं के नहीं रहे। कांग्रेस अच्छे-खासे बहुमत के साथ सरकार बना गयी। केजरीवालजी ने भी ईवीएम के साथ छेड़खानी की बात कह दी और भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उनका तर्क या कुतर्क सुनिए: “भाजपा ने कांग्रेस को जिताया, क्योंकि वे स्वयं जीतते तो उनकी पोल खुल जाती। उन्होंने हमको हराने के लिए कांग्रेस को जिताया। वे हमको राजनीति से खत्म करना चाहते हैं, क्योंकि उनको असली खतरा हम से है।”

उत्तर प्रदेश की सपा ने भी अच्छा मौका देखा और “काम बोलता है के नारे से जनता को मूर्ख बना रहे” अखिलेश भैया ने भी बेचारी ईवीएम पर सारा दोष मढ़ दिया।

बेचारी ईवीएम! – छेड़खानी की शिकार?

ध्यान दें कि भाजपा (गठबंधन) की जीत उत्तर प्रदेश में ही अप्रत्याशित थी। उत्तराखंड में जीतना अप्रत्याशित नहीं था। पंजाब में तो उसका गठबंधन आआपा (आप) से भी पीछे रहा। गोवा तथा मणिपुर में तो वह कांग्रेस से पीछे रही: यह अलग बात है कि इन जगहों पर वह सरकार बनाने में सफल रही।

छेड़खानी की बात केवल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, एवं पंजाब के संदर्भ में की गई है। भाजपा ने कथित ईवीएम-छेड़खानी वहां क्यों नहीं की इसका उत्तर देने की विपक्षियों ने चिंता नहीं की ! छेड़खानी के विषय पर अधिक जानकारी इंटरनेट स्रोतों से मिल सकती है। उदाहरार्थ मायावतीजी के आरोपकेजरीवालजी की बातेंअखिलेश भैया की शंका और निर्वाचन आयोग की सफाई संबधित लिंकों से यहां प्राप्य हैं।

अब जो बहस मीडिया में, राजनीतिक दलों के बीच, उच्चतम न्यायालय में, और राष्ट्रपति महोद्य तक पहुंची है वह है कि ईवीएम भरोसेमंद नहीं हैं और हमें कागजी मतपत्रों पर लौट आना चाहिए। खैर, वर्षों पहले सकारण छोड़े जा चुके मतपत्रों के प्रयोग पर क्या लौट जाना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर निर्वाचन के विभिन्न पहलुओं पर निर्भर करता है। इस विषय पर मैं कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा हूं। मैं तो यहां मशीनों के साथ संभव छेड़खानी के विषय में कुछ कहना चाहता हूं।

आरंभिक टिप्पणी

मैं फिजिक्स एवं कंप्यूटर-विज्ञान का विश्वविद्यालयीय शिक्षक रह चुका हूं और आधुनिक अंकीय तकनीकी (digital technology) से वाकिफ़ हूं। इसलिए वस्तुनिष्ठ संभावनाओं की बात कर सकता हूं। कौन जीत रहा है और कौन नहीं से मेरा कोई सरोकार नहीं। दरअसल मैं तो नोटा (NOTA) का पक्षधर हूं, और पिछले 15-20 वर्षों से किसी भी दल को मत नहीं दे रहा; वोट डालता जरूर हूं।

आरंभ में ही यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य की बनाई ऐसी कोई मशीन/युक्ति नहीं है जिसके साथ छेड़छाड़ न हो सके। उसके लिए बस कुछ शर्तें हैं:

(1) छेड़छाड़ करने या उससे मन-माफ़िक काम लेने का इरादा हो।

(2) इच्छुक व्यक्ति या उसके मददगार को मशीन की कार्यप्रणाली की समुचित जानकारी हो।

(3) व्यक्ति/मददगार को वांछित अवसर तथा संसाधन उपलब्ध हों।

(1) छेड़छाड़ का इरादा

जहां तक इरादे का सवाल है ऐसा इरादा भारतीय राजनेता रखते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। जिस देश में येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने की होड़ मची हो, राजनेता बरसाती मेढकों की भांति दलों के बीच फुदकते हों, सिद्धांतहीन एवं बेमेल गठबंधनों से परहेज न हो, धर्म-जाति आदि की भावनाएं भड़काकर वोट बटोरें जायें, चुनाव में सफलता पाने हेतु मतदाताओं को पैसा, साड़ी आदि बांटने से परहेज न हो, वहां नेताओं का क्या भरोसा?

किंतु निर्वाचन आयोग (इलेक्शन कमिशन) भी किसी दल/विशेष के पक्ष में ऐसा इरादा रखता होगा इस बात में मुझे यक़ीन नहीं होता है। मेरा मानना है कि पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल के बाद आयोग अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। वह भाजपा या अन्य दल के दबाव में आकर ऐसा अनर्थ करेगा मैं नहीं मानता, भले ही मायावतीजी तथा केजरीवालजी ऐसा कहते हों।

मेरी जानकारी में ये मशीनें (ईवीएम) निर्वाचन आयोग की संपदा हैं। इनकी खरीद-फरोख्त, उपयोग, रखरखाव तथा सुरक्षा आदि की जिम्मेदारी पूरी तरह से आयोग की होती है। सरकारें उसके द्वारा मांगी गई मदद तो पूरी करती हैं, किंतु आयोग से बाहर के तकनीकी जानकार की पंहुच मशीनों तक नहीं हो सकती जब तक आयोग न चाहे। मतलब यह है कि मशीनों से छेड़छाड़ बिना आयोग की सांठगांठ के संभव नहीं।

तो क्या आयोग ने बीते मार्च के चुनाओं में दल-विशेष (उत्तर प्रदेश एवं उत्तरखंड में भाजपा एवं पंजाब में कांग्रेस) के पक्ष में इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ की थी? समाचार माध्यमों के अनुसार केजरीवालजी तो यही दावा करते हैं और मायावतीजी तथा अन्य नेता अप्रत्यक्ष रूप में आयोग पर यही आरोप लगा रहे हैं। यदि आयोग स्वयं इतना गिर चुका है तो किसी भी चुनाव क्या भरोसा?

कितने देशवासी होंगे जो आयोग को कटघरे में खड़ा करना चाहेंगे? व्यक्तिगत तौर पर मैं किसी भी नेता की तुलना में आयोग पर भरोसा करूंगा !

वोटिंग मशीनों की सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे स्थानीय प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होती है, जो चुनाओं के दौरान उसी के नियंत्रण में रहता है। फिर भी हो सकता है कि कहीं-कहीं प्रशासन मशीनों के साथ खिलवाड़ करे। लेकिन ऐसा लगभग हर निर्वाचन क्षेत्र में हुआ होगा और जानकार लोगों से तकनीकी मदद मिली होगी ऐसा मुझे नहीं लगता। अगर ऐसा है तो प्रादेशिक प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट माना जाएगा। क्या ऐसा हुआ होगा?

(2) डिजिटल डिवाइसेज़ (अंकीय युक्तियां)

किसी अंकीय (digital) युक्ति या मशीन को खराब करने लिए विशेषज्ञता की जरूरत नहीं। परंतु उससे जोड़तोड़ करके मनमाफिक काम लेना उसी व्यक्ति के लिए संभव है जो उसकी कार्यप्रणाली और उसके कलपुर्जों की भूमिका से भलीभांति परिचित हो। अतः ईवीएम से छेड़खानी किसी सिद्धहस्त व्यक्ति के बिना संभव नहीं।

किसी घटना के होने की सैद्धांतिक संभावना एक बात है और उसका वास्तविकता के धरातल पर घटित हो ही जाना नितांत दूसरी बात है।

इस विषय पर मैंने एक लेख 20 मार्च के अपने अन्य ब्लॉग में प्रस्तुत किया है।

(3) ईवीएम के साथ कैसे होगी छेड़छाड़?

अब आइए मुद्दे के तीसरे और असली पह्लू पर। अर्थात् ईवीएम के साथ छेड़खानी करने के अवसर और उसके लिए आवश्यक सामग्री/संसाधन।

मैंने ईवीएम के तकनीकी पक्ष की संक्षिप्त जानकारी पाने के लिए इंटरनेट स्रोतों को खंगाला। उदाहरण के तौर पर दो स्रोतों का उल्लेख कर रहा हूं: (1) विकीपीडिया (wikipedia) एवं (2) गिज़मोडो (gizmodo), जिनसे मिली जानकारी मुझे भरोसेमंद लगती है।

निम्नलिखित बिंदुओं पर गौर करें:

(क) ईवीएम मशीन

संक्षेप में यह बता दूं कि ईवीएम के दो घटक या इकाइयां होती हैं: (1) नियंत्रण इकाई (control unit), और (2) मतदान इकाई (balloting unit)। पहली इकाई मतदान अधिकारी के नियंत्रण में होती है और दूसरी इकाई से 15-20 फ़ुट लंबे केबल (तार) द्वारा जुड़ी होती है। इसी केबल के माध्यम से दोनों इकाइयों के बीच संकेतों का आदान-प्रदान होता है। मतदाता द्वारा दूसरी इकाई पर चुने गए बटन के अनुसार समुचित संकेत पहली इकाई को प्राप्त होता है और वह डाले गये मतों को अंकीय आंकड़ों के रूप में नियंत्रण इकाई की स्मृति (memory) में सुरक्षित (संचित, saved) रखता है। मतदान की समाप्ति पर अधिकारी उसे “स्विच-ऑफ़” करके मुहरबंद यानी सील कर देता है।

(ख) EPROM (ईप्रॉम) एवं EEPROM (ईईप्रॉम)

मेरी जानकारी के अनुसार इन मशीनों में सूचना-भंडारण (information storage) के लिए (1) ईप्रॉम (EPROM = Erasable Programmable Read-Only Memory), या (2)  ईईप्रॉम (EEPROM = Electrically Erasable Programmable Read-Only Memory) स्मृति-चिपों का प्रयोग होता है। इन चिपों में भंडारित जानकारी तब तक सुरक्षित रहती है जब तक कि उसे (1) पराबैंगनी विकिरण (ultraviolet radiation) द्वारा मिटाया न जाए (EPROM); या (2) उसके साथ संगति रखने वाले किसी डिजिटल युक्ति (digital device compatible with the memory chip) के द्वारा उसे मिटाया न जाए (EEPROM)। यह कार्य केवल जानकार व्यक्ति ही कर सकता है और वह भी तब जब उसे अवसर मिले। स्मृति-चिपों में भंडारित सूचना में मनमाफिक परिवर्तन करना संभव तो है किंतु आसान नहीं। इन तक पहुंच होनी चाहिए, वह कैसे होगी? चूंकि मतदान के बाद ईवीएम को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है और उसे केवल मत-गणना के समय ही “स्विच-ऑन” किया जाता है, अत: ऐसा अवसर मिल नहीं सकता। हां, सुरक्षाकर्मी ही लापरवाही बरतें तो बात अलग है।

(ग) रिमोट कंट्रोल

किसी मशीन में संचित सूचना को दूरस्थ संकेतन (remote signalling) द्वारा भी मनमाफिक बदला जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए उसे सक्रिय (active) अथवा तैयारी-अवस्था (standby mode) में होना चाहिए। इन अवस्थाओं में वह बाहर से रेडियोवेव (radio wave), माइक्रोवेव (microwave), अथवा प्रकाश-विद्युत (electro-optical) आदि सकेतन विधियों (signalling methods) के द्वारा सूचना-विनिमय (information exchange) के लिए तैयार हो सकता है। किंतु तब उसकी “पावर सप्लाइ ऑन” रहनी चाहिए। मेरी जानकारी में ईवीएम में दूरस्थ संकेतन की कोई व्यवस्था नहीं होती है। यानी ब्ल्यूटूथ  तकनीकी (bluetooth technique) अथवा इंटरनेट संकेतों (internet signals) सरीखे माध्यमों से उसमें संचित सूचना के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं। अगर ऐसी संकेतन विधि होती तो भी वह निरुपयोगी हो जाती, क्योंकि मतदान के बाद इन मशीनों को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है। मोबाइल फोन इस्तेमाल करने और    टीवी देखने वाले भी इस बात को समझते हैं कि टेलिविज़न स्विच-ऑफ करने के बाद रिमोट कंट्रोल निष्प्रभावी हो जाता है।

(घ) एलेक्ट्रॉनिक चिप पर गुप्त कूट

“आप” संयोजक केजरीवालजी का कहना है कि वे इंजीनियरिंग डिग्री-धारक हैं (आईआईटी, खड़कपुर)। इसीलिए वे वोटिंग मशीनों के साथ छेड़छाड का दावा बेझिझक करते हैं। सभी डिजिटल मशीनों के साथ छेड़छाड़ की जा सक्ती है यह मैं भी मानता हूं, किंतु कैसे, कब, किसके द्वारा, आदि प्रश्नों के उत्तर इतने आसान नहीं। इंजीनियरिंग डिग्री होना पर्याप्त नहीं, संबंधित मशीन (ईवीएम) की कार्यप्रणाली का व्यावहारिक ज्ञान/अनुभव होना जरूरी है, जो उन्हें होगा नहीं, क्योंकि वे इंजीनियरिंग व्यवसाय में शायद कभी नहीं रहे । उनकी शंका का समाधान जरूरी है।

केजरीवालजी कहते हैं कि वोटिंग मशीन बनाने में इस्तेमाल किए गए डिजिटल चिप्स (digital chips) में दल-विशेष के पक्ष में मतों की संख्या बढ़ाने हेतु गुप्त कूट (secret codes) इरादातन डाले गये हैं। उनके अनुसार वोटिंग मशीनों की प्रचालन तंत्र (प्रणाली, operating system) इन कूट-संकेतों का प्रयोग करते हुए किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में डाले गए मत को पहले से चुने गए किसी अन्य के खाते में स्थानांतरित कर सकती हैं। इसे उदाहरण से समझिए: 8वें क्रम का बटन दबाने पर वोट 8वें प्रत्याशी को मिले वोटों में जोड़ने के बजाय मशीन का सॉफ्टवेयर 5वें प्रत्याशी के मतों में जोड़ रहा हो। यह भी संभव है कि बीच-बीच में कुछ वोट 8वें के नाम पर ही सही दर्ज हो रहे हों। कदाचित ऐसा ही किसी अन्य – जैसे तीसरे क्रम वाले प्रत्याशी – के मामले में भी हो रहा हो। संभावनाएं कई तरीके की हो सकती हैं। कुल मिलाकर उक्त उदाहरण में 5वें को मिले वोट अधिक दर्ज हो रहे हों और दूसरों को उतने का घाटा हो रहा हो। मशीन के साथ ऐसी छेड़छाड़ गुप्त कूटों के प्रयोग से हो रही होगी।

पाठकों का ध्यान मैं इस बात की ओर खींचता हूं कि चिप-निर्माता कंपनियां अकेली एक अनूठी चिप नहीं बनाते। दरअसल एक जैसी चिपें हजारों/लाखों की संख्या में बाजार में उतारी जाती हैं। मतलब यह है कि सभी वोटिंग मशीनों में एक जैसी चिपें प्रयुक्त होती हैं, और यदि उनमें कोई गुप्त कूट हो तो वह सभी मशीनों पर एक ही प्रकार से कार्य करेगा। यह अवश्य संभव है कि मशीनों पर सक्रिय प्रचालन तंत्र (operating system/software) अलग-अलग मशीनों पर अलग-अलग हेराफेरी के लिए ढाला गया हो। अर्थात कोई ईवीएम 8वें बटन के वोट को 5वें में दर्ज करे तो कोई दूसरी मशीन उसे 9वीं पर दर्ज करे। साफ जाहिर है कि किसी दल विशेष के पक्ष में धांधली करनी हो तो यह पहले से मालूम होना चाहिए कि उसके प्रत्याशी के लिए निर्धारित बटन ईवीएम पर कौन-सा है। तब छेड़खानी करने वाला मशीन के प्रचालन तंत्र को उसी के अनुरूप निर्देश देकर चाहा गया मकसद पूरा कर सकता है।

यहां एक गंभीर शंका उठाई जा सकती है, जिसका संतोषप्रद समाधान केजरीवालजी के पास नहीं होगा। हर निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों की सूची एक जैसी नहीं होती है। दरअसल सूची के शीर्ष पर राष्ट्रीय दलों (AITC, BJP, BSP, CPI, CPI-M, INC, NCP) के प्रत्याशियों के नाम होते हैं, तत्पश्चात् प्रादेशिक (क्षेत्रीय) दलों के, फिर अन्य दलों के और अंत में स्वतंत्र प्रत्याशीगण। इन चारों में से प्रत्येक श्रेणी में प्रत्याशियों के नाम वर्णक्रमानुसार (alphabetically) सूचीबद्ध रहते हैं। चूंकि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशियों के नाम अलग-अलग होते हैं इसलिए किसी खास दल के सभी प्रत्याशी पूरे देश/प्रदेश में एक ही सुनिश्चित क्रम पर हों ऐसा विरल संयोग संभव नहीं। तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी (INC) प्रत्याशी (उदाहरणार्थ) यदि एक क्षेत्र में छठे क्रम पर हो तो दूसरे क्षेत्र में तीसरे या चौथे आदि पर हो सकता है। इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी के वोट किसी और को मिलें, अथवा दूसरों के वोट काग्रेस को मिलें ऐसी छेड़खानी ईवीएम के साथ तब तक संभव नहीं जब तक प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप न दे दिया गया हो। यह सब कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों की मशीनों के साथ अलग-अलग हेराफेरी करना होगी और वह भी जानकार व्यक्ति द्वारा।

निष्कर्ष यह है कि चिप पर संचित एक ही गुप्त कूट अथवा एक ही ऑपरेटिंग सिस्टम वाले मशीनों से अलग-अलग परिणाम मिलें ऐसी छेड़खानी संभव नहीं।

ईवीएम या मतपत्र (ballot paper) पर प्रत्याशियों के नामों के क्रम के बारे में जानकारी इंडियन एक्सप्रेस के लेख अथवा “कोरा” (quora.com) वेब-साइट पर से मिल सकती है।

(ङ) वीवीपीएटी (Voter Verified Paper Audit Trail) मशीन

पिछले चुनावों मे चुनाव आयोग ने कुछ मतदान केंद्रों पर वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों का भी प्रयोग किया था जिसका मुझे भी अनुभव हुआ। चूंकि मैंने नोटा (NOTA, ईवीएम पर अंतिम) बटन दबाया था, इसलिए मुझे मशीन पर संबंधित पर्ची 2-3 सेकंड के लिए देखने को मिली जो तुरंत ही एक संग्रह-डिब्बे में चली गई।

वीवीपीएटी के प्रयोग से मतदाता को तसल्ली हो जाती है कि उसका मत चुने हुए प्रत्याशी के पक्ष में ही पड़ा है। इनका असल सार्थक उपयोग तभी हो सकता है जब ईवीएम द्वारा प्रदर्शित वोटों और वीवीपीएटी की पर्चियों का मिलान वोटों की गिनती के समय किया जाये। लेकिन इनके इस्तेमाल से यह सिद्ध नहीं होता कि ईवीएम के साथ छेड़खानी नहीं हुई है। मेरा यह कथन इस संभावना पर आधारित है कि ईवीएम का ऑपरेटिंग सिस्टम बैलटिंग इकाई से प्राप्त जानकारी वीवीपीएटी तक तो सही-सही पहुंचाए, और उसके बाद वोटों में हेराफ़ेरी करे। ऐसा प्रोग्राम जानकार व्यक्ति लिख ही सकता है।

अंत में – कुंठाजनित  तर्क

दुनिया के अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस आदि सरीखे तकनीकी तौर पर विकसित देशों में ईवीएम इस्तेमाल नहीं होते हैं तो हमारे यहां क्यों इस्तेमाल हो रहे हैं यह सवाल आप पार्टी का निहायत बचकाना, तर्कहीन और हीनभावना का द्योतक है। क्या वे देश हमारे लिए मानक तय करेंगे? हमें अपने विचारों एवं जरूरतों के अनुसार चलना चाहिए या उनकी नकल आंख मूंद के करनी चाहिए? क्या हमारे देश में परमाणु विस्फोट, मिसाइल विकास, उपग्रह-प्रक्षेपण, चंद्रयान आदि उनके अनुसार हुए हैं? जो भी हमने किया है, कर रहे हैं और करेंगे वह हमारी आवश्यकता एवं हमारे संसाधन तय करेंगे।

चुनावों में वोटिंग मशीनों का प्रयोग हमारी आवश्यकता थी और मेरी जानकारी में उसकी तकनीकी भी देश में ही विकसित हुई है; हम उसे क्यों न इस्तेमाल करें? अमेरिका उसे इस्तेमाल नहीं करता इसलिए हमें भी उससे परहेज करना चाहिए क्या? हमारे अपने स्वतंत्र निर्णय नहीं होने चाहिए क्या? वस्तुतः विदेश, विदेशी वस्तुएं, विदेशी विचार आज भी हमें श्रेष्ठतर लगते हैं। अवश्य ही हमें उन देशों से बहुत कुछ सीखना चाहिए किंतु सब कुछ नहीं। हम भी किसी क्षेत्र में प्रथम हो सकते हैं यह विचार मन में क्यों नही आने देते हैं? – योगेन्द्र जोशी

गण्तंत्र दिवस 2017 – खोया अधिक और पाया कम

आज 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद शासकीय व्यवस्था के लिए स्वीकृत संविधान के प्रभावी होने के प्रथम दिन (सन् 2050) की स्मृति में मनाये जाने वाला राष्ट्रीय उत्सव।

इस अवसर पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी हृदय से शुभेच्छाएं।

विगत वर्ष की एक स्मराणीय बड़ी शासकीय घटना “विमुद्रीकरण अर्थात् नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों से अब कुछ हद तक देशवासी उबर चुके होंगे, और बचीखुची अड़चनों से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे यह मेरी आशा और अपेक्षा है।

देशवासी आज के दिन हर्षित होंगे ही। अपने लोकतंत्र की सफलता को लेकर काफी हद तक संतुष्ट एवं भावी काल के लिए आशान्वित होंगे ही। मैं स्वयं को एक अपवाद के रूप में देखता हूं। कदाचित कुछ गिनेचुने अन्य जन भी मेरी तरह सोचते होंगे। मैं इस दिन, और इसी प्रकार स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), पर खुद को संतुष्ट नहीं पाता।

क्या हमारे गणतंत्र की खामियां – जो भी रही हों – समय के साथ दूर हुयी हैं? क्या हमारी राजनीति दिन-ब-दिन सुधार की दिशा में अग्रसर हुई है? क्या जिन उद्येश्यों के साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई थी वे पूरे हुए हैं? या उनके पूरे होने की ओर हम संतोषप्रद तरीके से बढ़ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्न जब मेरे मन में उठते हैं तो मैं स्वयं को संतुष्ट नहीं देख पाता। मेरी सोच और दृष्टि में दोष है, अथवा वस्तुस्थिति ही जैसी होनी चाहिए उसके निकट नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर अन्य जन ही मुझे दे सकते हैं।

इसके पहले कि मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूं मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कुछ लोगों की नजर में गणतंत्र (अंग्रेजी में रिपब्लिक) जनतंत्र/लोकतंत्र (डेमोक्रसी) का ही पर्याय है। हमारे गणतंत्र में देश के राज्य गणतांत्रिक इकाइयां हैं, जिनमें से प्रत्येक स्वयं में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाये है। मुझे शंका है कि संघशासित प्रदेश (यूनियन-गवर्न्ड टेरिटरी) एक इकाई वाली इस परिभाषा में आते हैं कि नहीं। वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं अतः “गण” की परिभाषा उन पर लागू नहीं होती है। अतः मेरे मत में देश को किंचित् परिवर्तित गणतंत्र कहना अधिक उचित होगा। अस्तु, इस बात को विशेष महत्त्व देने की जरूरत नहीं।

मेरा अनुभव मुख्यतः उत्तर प्रदेश और उस पर विशेषतया मेरे शहर वाराणसी पर आधारित हैं। हो सकता है अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर हो, लेकिन कुल मिलाकर हम शासकीय व्यवस्था के गिरावट के दौर से गुजर्र रहे हैं ऐसा मेरा मानना है।

वापस अपने उपर्युक्त शंकाओं/प्रश्नों पर। जीवन के सातवें (यानी साठ का दशक) पूरा करने के निकट पहुंचे वरिष्ठ नागरिक के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि मैंने राजनीति एवं लोकतंत्र की पर्याप्त समझ अर्जित की है। क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है में भेद कर सकने में मैं काफी हद तक सक्षम हूं। मुझे नेहरू-काल के अंतिम दिनों की याद है। याद है उस समय के चीनी आक्रमण की। याद है उस काल के पीएल480 योजना के अंतर्गत अमेरिका से आयातित जीरा सदृश लाल गेहूं की। याद है जब कांग्रेस ही एक प्रकार से देश में एकछत्र राज कर रही थी और “नेहरू के बाद कौन संभालेगा देश को” जैसी कुछ लोगों की चिंताओं की। याद है जब अन्य राजनैतिक दल अस्तित्व में आ रहे थे। किशोरावस्था से वयस्कता के सोपन पर चढ़ते हुए एक नागरिक के तौर पर शासकीय व्यवस्था की मेरी समझ तब नितांत अपरिपक्व रही होगी यह मैं स्वीकारता हूं। कालान्तर में नौकरी-पेशे (विश्वविद्यालय अध्यापन) में आने पर और प्रशासनिक/नागरिक व्यवस्था के संपर्क में आते-आते तथा मतदान का अधिकार पाते-पाते विषय की मेरी समझ में शनैः-शनैः परिपक्वता आते गयी । हाल के डेढ़-दो दशकों में तो विषय को समझने में रुचि विशेषतः बढ़ गयी। मेरे विचारों से अन्य जन सहमत हों मैं इस मुगालते में कभी नहीं रहता। मेरी शंकाएं:

(1) हमारे संविधान की प्रस्तावना में साफ उल्लिखित है कि हम देशवासी इस राष्ट्र को “पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के रूप में स्वीकारते हैं। पंथनिरपेक्ष शब्द श्रीमती गांधी ने संधोधन के तौर पर शामिल किया था। देश का स्वरूप बदला नहीं। देश को संविधान-निर्माताओं ने आरंभ में ही “सेक्युलर” क्यों नही कहा? यह बात विचारणीय है। खैर, मेरी आपत्ति है “समाजवादी” पर है। क्या देश को बाद के राजनेता समाजवाद की ओर ले गये? आज अमीर और गरीब की खाई तब से बहुत बढ़ गयी। क्या एक समाजवादी देश में यह होना चाहिए था?

(2) संविधान जातिमुकत होने की लालसा व्यक्त करता है। शुरुआती दौर में जाति और धर्म वोट के आधार पर नहीं होते थे। समय के साथ राजनीति में आयी नई पीढ़ी के नेताओं ने इन भावनाओं को भुनाकर वोटबैंक बना डाले। यही अपेक्षा की गयी थी क्या?

(3) पुराने जीवित बचे लोग बताते थे कि वोट पाने के लिए आज की तरह बेतहासा धन खर्च नहीं होता था। सुनते है कि अब सांसद/विधायक बनने के लिए करोड़ों दांव पर लगाये जाते हैं। यह भी कहा जाता कि पार्टियों के टिकट के लिए करोड़ों की बोली लगती है। यह हमारे नेताओं के सच्चरित्र होने का द्योतक है क्या?

(4) पिछले तीन-चार दशकों में धनबलियों, बाहुबलियों और आपराधिक छबि वालों की राजनीति में तादाद बढ़ती गयी है। सांसंदों/विधायकों में उनकी दागदार छवि वालों की संख्या 30% के आसपास बतायी जाती है। क्या ऐसा शुरुआती दौर में था?

(5) वर्तमान समय में राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों का एक ही सिद्धन्त रह गया है कि कोई सिद्धांत नहीं। विशुद्ध मौकापरस्ती। जहां लाभ उधर चलो की नीति। इसलिए दलबदलुओं की भरमार है सभी दलों में। जिसे जिताऊ समझते हैं उसे अपनी ओर खींच लेते हैं। जो कल तक सेक्युलर था वह आज सांप्रदायिक बन जाता है, दक्षिणपंथी समाजवादी बन जाता है। सिद्धांतहीनता व्यक्तियों में ही नहीं दलों में होती है जो सिद्धांतहीनों का बढ़चढ़कर स्वागत करते हैं, बेशर्मी से अपने कदम सही ठहराते हुए।

(6) आज की राजनीति में परिवारवाद चरम पर है। और बड़ा बेहूदा तर्क (कुतर्क?) पेश किया जाता है। कहते है डाक्टर का बेटा-बेटी डाक्टर, वकील का बेटा-बेटी वकील, उद्यमी (बिज़नेसमैन) का बेटा-बेटी उद्यमी तो राजनेता का बेटा क्यों नहीं राजनेता हो सकता है? वाह ! मेरा सवाल है कि क्या राजनीति भी डाक्टरी, वकालत, उद्यमिता इत्यादि की तरह का ही धंधा है? जीवन-यापन और धन कमाने का व्यवसाय है क्या राजनीति? जिन व्यवसायों से तुलना की जाती हैं उसमें समाजसेवा या सामाजिक व्यवस्था को सुचारु और कुशल बनाने का ध्येय नहीं होता है। उन व्यवसाय में लगे हाथ कोई समाजसेवा करता है तो यह उसकी रुचि होती है न कि व्यवसाय के स्थापित एवं स्वीकृत उद्येश्य का कार्य। हर व्यवसाय में पहले अनुभव और योग्यता हासिल किये जाते हैं। इस पर भी गौर करें कि स्वाधीनता के बाद के भारत में जो नये नेता आये वे बाप-दादाओं की विरासत पर नहीं आये बल्कि अपने बल पर आये, लेकिन उन्होंने ही अपनी अगली पीढ़ी को विरासत के नाम पर आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता संघर्ष वाले कितने नेताओं की बहू-बेटियां राजनीति में हैं? तो आज के नेताओं के कितने हैं? सोचिये!

(7) आज वोट की राजनीति नकारात्मक है न कि सकारात्मक। दूसरे दलों में कमियां खोज-खोजकर वोट बटोरे जाते हैं। कोई यह नहीं कहता है कि देश/प्रदेश के दीर्घकालिक हितों के लिए उसकी क्या योजनाएं हैं। जनसंख्या, चिकित्सकीय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक सुधार, प्रशासनिक गुणवत्ता की बातें करता है कोई? तो क्या ऐसी वोट की राजनीति ही वंछित लोकतंत्र है?

(8) लोकलुभावन वादों के साथ आज के नेता मैदान में उतरते हैं। कोई स्मार्ट्फोन बांटने की बात करता  है, तो कोई मुफ्त अनाज देने की, कोई मुफ़्त बिजली-पानी देने की बात करता है? इत्यादि। खजाना देश का लुटे और वोट तथा सत्तासुख हम भोगें इस नीति पर राजनैतिक चल रहे हैं। देश का भला ऐसे ही होगा क्या?

इस प्रकार के तमाम सवाल उठते हैं मन में। अब आप ही बतायें कि राजनीति की किस बात पर संतोष अनुभव किया जाये? – योगेन्द्र जोशी

राजनैतिक दांवपेंच में माहिर मुलायम सिंह का अखिलेश को समाजवादी पार्टी सौंपने का नाटक

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दिनांक 16 जनवरी (2017)। हफ़्तों से चले आ रहे समाजवादी पार्टी के पारिवारिक नाटक का अंत हो गया। चुनाव आयोग ने भी घोषित कर दिया कि इस पारिवारिक “राजनैतिक” पार्टी के दो फाड़ हो चुके हैं जिसका बड़ा धड़ा अखिलेश के पाले में जा चुका है। आयोग के नियमानुसार यही गुट अब “समाजवादी पार्टी” कहलायेगा जिसका राष्ट्रीय अध्यक्ष मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव होंगे और गरीबों के गमनागन का साधन दोपहिया “साइकिल” बतौर चुनाव-चिह्न इस्तेमाल करने के वे ही हकदार होंगे। मुलायम सिंह और उनके अनुयायीयों (चाटुकार और पिछलग्गू?) को पार्टी के उस नाम से हाथ धोना पड़ा है जिसे उन्होंने प्रदेश की राजनीति में करीब ढाई दशक से पाला-पोसा और प्रायः अजेय दल के रूप में स्थापित किया। मुलायम सिंह, शिवपाल, अमर सिंह (?) तथा शेष विवश नेता अब क्या करेंगे ये वे ही ठीक-ठीक बता पायेंगे। निश्चय ही कई नेता होंगे जो असमंजस की स्थिति में होंगे कि किस धड़े का हिस्सा बनें।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो यह घटना बाप-बेटे के बीच की वर्चस्व की लड़ाई थी। अखिलेश अपनी “साफ-सुथरी” (कितनी साफ-सुथरी?) छवि को और चमकाने के चक्कर में रहे, इसलिए वे अपने सगे चाचा के उन चहेतों से छुटकारा चाहते थे जिनकी छवि आपराधिक बताई जाती है। दूसरी तरफ चाचा का सीधा-सादा उद्येश्य था किसी भी प्रकार से चुनावों में जीत हासिल करना और बहुमत हासिल करना। चाचा का तर्क सीधा था: हमें जिताऊ प्रत्याशी चाहिए चाहे वह आपराधिक छवि का ही क्यों न हो। स्पष्ट है कि चाचा-भतीजे में निभ नहीं रही थी। दूसरी तरफ एक पीढ़ी दूर के दूसरे चाचा अखिलेश के पक्ष में रहे और उनका मार्गदर्शन करते रहे। झगड़ा यादव परिवार के भीतर का था और वही समाजवादी पार्टी का झगड़ा भी बन गया था जिसमें किसी भी पार्टी सदस्य की कोई भूमिका नहीं रही, सिवाय अनुनय-विनय करने के, जिसमें आजम खां प्रमुख थे।

क्या मुलायम सिंह वास्तव में अखिलेश के विरुद्ध थे? मेरा व्यक्तिगत मत है कि ऐसा नहीं था।  पांच साल पहले अखिलेश को गद्दी पर किसने बिठाया? क्या खूबी थी अखिलेश में? तब तक तो अखिलेश का कोई शासकीय अनुभव भी न था। क्या सपा में अनुभवी नेताओं का अकाल था?

भारतीय लोकतंत्र में प्रायः सभी दलों में मुखिया जो चाहे वही होता है। अन्य नेताओं की औकाद बंधुआ मजदूरों की जैसी होती है। उन्हें हां में हां मिलाना होता है, अन्यथा जिसमें स्वाभिमान होता है वह पार्टी छोड़ देता है। मुखिया ही ताउम्र अध्यक्ष होता है या उसके परिवार का उसका चहेता। ऐसे दलों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसी परिवार के सदस्यों का हक होता है। तो उस समय भी अखिलेश की जगह शिवपाल को मुख्यमंत्री बनाना अधिक तार्किक होता। वर्षों से उनका साथ निभाते आ रहे लक्ष्मण जैसे भाई के स्थान पर अखिलेश को क्यों चुना? हो सकता है मुलायम सिंह के समक्ष धर्मसंकट रहा हो, पर अंत में उन्होंने पुत्रमोह में अखिलेश को वरीयता दी होगी यह मेरा सुविचारित मत है। वे भाई को गद्दी सौंपकर बेटे के भविष्य को दांव पर नहीं लगाना चाहते होंगे। पुत्रमोह से प्रायः सभी ग्रस्त रहते हैं, खासकर राजनीति में।

मुलायम सिंह राजनीति के चतुर खिलाड़ी रहे हैं। वे इतने मूर्ख नहीं हो सकते थे कि बेटे के सामने हार मान लें। मुलायम सिंह 77 वर्ष हो चुके हैं और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। इसलिए वे अपनी ढलती उम्र में समय रहते अखिलेश को सुस्थापित न करने की घोर गलती नहीं कर सकते थे। मतलब यह कि जो सपा परिवार (पार्टी कहें या परिवार कोई अंतर नहीं!) में हुआ वह सोचा-समझा नाटक था – देखने वालों में भ्रम पैदा करने के लिए।

मैं यही मानता हूं कि बाप-बेटे में मूक सहमति रही होगी कि कैसे नाटक खेला जाना है। उनके बीच अकेले में जो गुप्त बातें हुई होंगी उसका ब्योरा कौन दे सकता है भला?  मुलायम सिंह भली भांति जानते थे कि शिवपाल के खेमे के पार्टी-जनों – जिनमें कइयों की आपराधिक छवि रही है या अभी है – को साथ लेकर अखीलेश नहीं चल पायेंगे। उनकी मौजूदगी शिवपाल के हक में होती और वे अखिलेश को कमजोर भी कर सकते थे। मुलायम को यह भी याद रखना था कि शिवपाल और पार्टी के अनेक जन, जिन्हें अखिलेश नापसंद करते हैं, के उन पर एहसान हैं, क्योंकि उन्हीं के बल पर वे सपा को स्थापित कर सके और सफल हुए। उन सभी लोगों की नजर में मुलायम सिंह को उनका पक्षधर भी दिखना था और साथ में अपने बेटे को भी मजबूती देनी थी। तब रास्ता क्या था? यही न कि बाप-बेटा एक नाटक रचें जो सबको सच से दूर अंधेरे में रखे।

इस घटना को देख मुझे महाभारत का एक प्रकरण याद आता है। भीष्म पितामह कौरव-पांडव युद्ध में कौरवों (दुर्योधन आदि) की ओर से लड़े। यह सब जानते थे कि जब तक भीष्म जीवित रहेंगे तब तक पांडव युद्ध नहीं जीत सकते थे। यह स्वयं भीष्म ही थे जिन्होंने पांडवों को वह राज बताया कि कैसे वे मारे जा सकते हैं और पांडव जीत सकते हैं। कहने का मतलब यह कि भीष्म लड़ तो रहे थे युर्योधन की ओर से लेकिन युद्ध जिता रहे थे पांड़वों को। कुछ ऐसा ही मुलायम कर रहे थे। पक्ष लेते दिख रहे थे शिवपाल बगैरह का और छिपे तौर पर बेटे अखिलेश को आगे बढ़ा रहे थे।

दुर्भाग्य से नाटक का मंचन इतना अच्छा नहीं हो पाया कि वह हकीकत लगे। पैनी निगाह रखने वाले बहुत-से लोगों को अनुभव हो चुका है कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह बहुत कुछ सोच-समझके ही यह खेल खेले होंगे।

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अब बाप-बेटे एक हो गये हैं। अखिलेश पिता से आशीर्वाद ले लिए हैं और मुलायम सिंह ने उनको अपने समर्थकों की सूची दे दी है जिनको अखिलेश ने टिकट देना है। उस सूची में शिवपाल का भी नाम है जिसे अखिलेश अपनी सूची से बाहर कर चुके थे। कभी आपने ऐसा नेता देखा है जो अपने कार्यकर्ताओं को विरोधी खेमे से प्रत्याशी बनने की सिफ़ारिश करे? मुलायम मौके की नजाकत के हिसाब से ऐसा भी कर सकते हैं।

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पूरे घटनाक्रम से यही लगता था कि सपा दो धड़ों में बंट चुकी है और दोनों धड़े अपने-अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारेंगे। पर ऐसा हो नहीं रहा है। जरा गौर करिए इस लेख के आरंभ में प्रदर्शित अखिलेश के चुनावी बैनर पर, जिसमें पिता-पुत्र दोनों मौजूद हैं। दरअसल मुलायम सिंह अखिलेश की समाजवादी पार्टी के संरक्षक है और अब ताउम्र रेहेंगे।

भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ हो सकता है। लोकतंत्र के भारतीय मॉडल को मैं छद्म राजतंत्र कहता हूं, जो लोकतंत्र की मूल भावना के प्रतिकूल है। ऐसे लोकतंत्र को नकारा जाना चाहिए “नोटा” बटन के माध्यम से विरोध जताकर। – योगेन्द्र जोशी

 

नोटों का विमुद्रीकरण (demonetization): सार्थक एवं निरर्थक टिप्पणियां और वह जो केंद्र सरकार ने किया होता।

 

विमुद्रीकरण की खबर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी जी ने मंगलवार 8 नवंबर की संध्या, यानी रात्रि प्रथम प्रहर, उस दिन तक प्रचलित 500 एवं 1000 के नोटों के विमुद्रीकरण की जो अप्रत्याशित घोषणा की उसके लिए देशवासी तैयार नहीं थे। इसमें दो राय नहीं कि जिस उद्देश्य से यह निर्णय सरकार ने लिया उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। यह जरूर है कि बहुत से लोगों को इस निर्णय से परेशानी हुई है। बहुतों के लिए विमुद्रीकरण की खबर निराशा/हताशा का संदेश बनकर भी आई। खबर की ठीक-ठीक जानकारी का अभाव जनलेवा भी साबित हुई यह भी सुनने में आ रहा है। अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह निःसंदेह खेदजनक था। मैं ऐसी स्थिति के पीछे उन लोगों की गलती कहूंगा जिन्होंने नोटों के बंद होने की आधी-अधूरी जानकारी अन्य जनों को देकर भ्रम की स्थिति पैदा की।

कुछ लोगों का कहना है कि नोटों के प्रचलन को बंद करने की सूचना समय पर दी गयी होती तो उन्हें संभलने का अवसर मिला होता। उन लोगों को समझना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा गया था जिससे उन लोगों को संभलने का अवसर ही न मिले जिन्होंने अघोषित धनराशि घरों में जमा कर रखी हो। यह अवश्य है कि ऐसा करने पर उन लोगों को भी परेशानी हो गयी जिनका पैसा उस श्रेणी का नहीं था और जिन्होंने किसी न किसी आवश्यकता के अंतर्गत उसे घर में रखा था।

सरकार ने यह किया होता

     सरकार योजना को पूर्णतः गोपनीय रख सकी यह सराहनीय था। पूरी तैयारी करीब छः महीने पहले से चल रही थी फिर भी वह इस क़दर गोपनीय बनी रही इसके लिए संबधित अधिकारी-गण बधाई के पात्र हैं। तैयारी में कहीं कुछ कमी रह जाना आश्चर्य की बात नहीं है। मेरी समझ में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखी गयी होतीं तो बेहतर होता:

(1) अगर उक्त घोषणा मंगल की रात्रि न करके गुरुवार की रात्रि की गयी होती तो शायद लोगों को कम असुविधा होती। दूसरे दिन शुक्रवार बैंक शेष तैयारी करने के लिए लेनदेन के लिए बंद रहते जैसा कि बुधवार को हुआ था। कई कार्यालयों में सप्ताहांत (शनिवार, रविवार) पर छुट्टी रहती हैं और कुछ के लिए शनिवार के दिन द्वितीय शनिवार (सेकंड सैटरडे) की छुट्टी रहती है, अतः लोगों को काम पर जाने की अफरातफ़री झेलते हुए तुरंत नोट बदलने की जल्दीबाजी न होती। लोगों को आश्वस्त होकर वस्तुस्थिति समझने और उसके साथ सामंजस्य बिठाने का समय मिल गया होता। बैंक खोले ही गये हैं तब भी खोले गये होते।

(2) अच्छा होता कि बैंकों के एटीएम से एक-दो दिन पहले से ही केवल सौ के नोट दिए जाते ताकि सौ के नोटों का मुद्राचलन अधिक हो गया होता। पूरी तरह गुप्त रखे अभियान की भनक इतने से न लगती। अफवाह या अनुमानबाजी का दौर चलता तो भी बैंकों का कारोबार बंद रहने से उनके माध्यम से पुराने नोटों को ठिकाने लगाना संभव न होता। कालाधन और जगह खपाना भी इतनी जल्दी संभव न होता। आजकल बहुत से लोगों की आदत छोटे नोट रखने की कम हो गयी है। वे लेनदेन में तुरंत 5 सौ का नोट पेश कर देते हैं। टोलप्लाज़ाओं पर यही तो हुआ था। देना 40-50 रुपये और पेश किये जा रहे थे 5 सौ के नोट। हर व्यक्ति को 4-4 सौ के नोट लौटाना टोलप्लाज़ा के लिए संभव न था। बाद में यह चुंगी बंद की गयी। वही आदेश आरंभ में ही आ गया होता तो लोग आतंकित न होते और जाम की स्थिति न बनती।

(3) 5 सौ, 2 हजार के नोटों के साथ 1 हजार के नोट को भी बैंको को मिले होते तो अच्छा होता। 1 हजार का नोट तो सरकार लाने वाली ही है। पहले ही ले आती तो जहां 2 हजार को छुट्टा करने के लिए 4 पांच-पांच सौ के नोट चाहिए वहीं केवल 2 एक-एक हजार के नोटों की जरूरत होती।

(4) निजी अस्पतालों जैसी संस्थाओं को भी पुराने नोट स्वीकारने की अनुमति दी गयी होती तो लोगों को राहत रहती। बहुत से लोग अस्पतालों के खर्चे को लेकर परेशान रहे।

आलोचनाओं का दौर

अस्तु जो होना था हो चुका है। किसी योजना के कार्यान्वयन में भूल-चूक हो ही सकती है। उतने भर से योजना को निरर्थक नहीं कहा जा सकता।

टीवी चैनलों पर जो देखने-सुनने को मुझे मिला उससे यही लगा कि अधिकांश आम जनों ने सरकार के इस कदम को अच्छा कदम बताया। यह भी सभी ने स्वीकारा कि दो-चार दिनों की परेशानी अवश्य सबको हो रही है। कुछ की परेशानी अवश्य ही गंभीर रही और अभी है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए और शादी-व्याह की तैयारी में जुटे लोगों को बेहद परेशानी हो रही है यह भुक्तभोगी कहते हुए सुने जा रहे हैं। योजना की सही जानकारी न होने के कारण किसी ने दम तोड़ दिया या आत्महत्या कर ली ऐसी पीड़ाप्रद खबरें भी सुनने को मिल रही हैं।

जनसामान्य से हटकर जिस प्रकार की आलोचनाएं विपक्षी राजनेताओं की हैं वह मुझे हैरान करती है:

माननीय मुलायम जी चाहते थे कि नोटों का प्रचलन बंद होने की बात हफ़्ता भर पहले बता देना चाहिए था ताकि लोग अपना इंतजाम कर सके होते। इंतजाम ही न कर पाते इसी के लिए तो 6 माह से चल रही कवायद को गुप्त रखा गया था यह बात उनकी समझ में नहीं आ रही।

बहन मायावती जी क्या बोल रहीं है यह शायद वह स्वयं नहीं जानतीं। कहती हैं भाजपा ने सौ सालों का इंतिजाम कर लेने के बाद दूसरों को परेशानी में डालने के लिए ऐसा कदम उठाया है। वह क्या यह भी समझती हैं कि सौ साल के इंतिजाम का मतलब क्या है? क्या कोई ऐसी व्यवस्था कर सकता है? क्या वह बता सकती हैं उन्हें यह बात कब और कैसे पता चलीं? क्यों नहीं उन्हेंने समय पर भंडाफोड़ किया योजना का और भाजपा के इरादों का? राष्ट्रीय स्तर की राजनेत्री होते हुए उन्हें अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए।

केजरीवाल जी के कहने ही क्या! वे सोचते हैं कि मोदी न होते तो वही देश के प्रधानमंत्री होते। बस मोदी जी ही उनकी राह के रोड़ा हैं। उनकी लड़ाई बस मोदी और केवल मोदी से है। इसलिए उन्हें रात-दिन सोते-जागते केवल मोदी की ही बातें सूझती हैं। वे कहते कि तीन माह पहले भाजपा के लोगों का कालाधन ठिकाने लगा दिया गया और उसके बाद दूसरों की परेशानी बना यह योजना सामने लाई गयी। सितंबर तक बैंकों में करोड़ों जमा इसीलिए हुए। वे यह भूल गये कि पैसा जमा करने की योजना तो सरकार सबके लिए थी केवल भाजपा के लोगों के लिए नहीं थी। आगे क्या होगा यह केजरी जी भी नहीं जानते होंगे। लगता है मायावती जी की तरह क्या हो रहा है यह उन्हें भी मालूम था, फिर भी वे इस दौरान चुप्पी साधे रहे। आश्चर्य है।

श्री राहुल गांधी को “पप्पू” की उपाधि ऐसे ही नहीं मिली है। पुराने नोट बदलवाने में कितनी परेशानी “गरीब” लोगों को हो रही है इसका वे बखान नहीं कर पा रहे। लोगों की इस परेशानी में शरीक होने के लिए वे भी बैंक पहुंच गये। वे यह भूल गये कि उनकी सुरक्षा में लगे कर्मी जनता की परेशानी में इजाफा ही कर रहे होंगे। गरीबों को परेशानी तो पग-पग पर होती है, वे कहां-कहां पहुंचते हैं पता नहीं।

इधर सुश्री ममता बनर्जी ने भी अपनी भड़ास निकाली है। वे कहती हैं कि यह योजना गरीबों के विरुद्ध है। लोगों की रोजी-रोटी खत्म हो गयी है, कामधंधे चौपट हो रहे हैं, इत्यादि-इत्यादि।

     उक्त राजनेता तथा अन्य नेता सब मुहिम को गरीब विरोधी मान रहे है। गरीबॊ को होने वाली अड़चन के लिए सब चिंतित है। इस देश में है कोई राजनेता जो गरीबों की चिंता न करता हो। गरीबों की चिंता में वे कितने दुबला रहे हैं यह तो इन लोगों की काया से स्पष्ट जाता है। ये गरीब ही तो हैं जिन पर इनके और इनके दलों का अस्तित्व टिका है। गरीब न हों तो यह किसकी सेवा करेंगे? इसलिए जय गरीब, जय गरीबी। गरीबी, तू कभी छोड़ के न जाना।

     गरीबों की चिंता करने वाले ये नेता बता सकते हैं कि गरेबओं के बच्चों के लिए बने सरकारी स्कूलों की दशा क्या है? अस्पतालों में उनका इलाज डाक्टर करता है या अन्य कर्मी? गरीबों के साथ इन नेताओं के अधीन पुलिस का क्या व्यवहार होता है यह इनको पता है क्या? रेलगाड़ियों के जनरल डिब्बी में वे कैसे ठुंसे रहते हैं इस बात सुध ली कभी इन्होंने? ऐसे तमाम सवालों का इनके पास है कोई जवाब?

इस बार परेशानी इन नेताओं को हो रही है और बहाना कर रहे हैं गरीबों की दिक्कतों का। वाह!

अपने देश में विपक्ष एक ही बात पर जोर देता है: “हम विपक्षी हैं। हमारा कर्तव्य है कि पक्ष जो कहे-करे उसे कोसते फिरें। हम विकल्पों की बात नहीं करेंगे।”

     अपने-अपने दल के शीर्षस्थ ये नेता स्वयं कालेधन के विरुद्ध क्या कदम उठाते अगर उनको यह मौका मिलता इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहेगा, क्योंकि उनकी कोई योजना ही नहीं। लगता है वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।

     राहुल जी को इस विषय में कुछ नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आजतक उन्हीं की पार्टी सरकार चला रही थी। – योगेन्द्र जोशी

रिओ ओलंपिक पदक एवं खजाने की लूट: अंधेर नगरी चौपट राजा

Opening Rio Olympics 2016

अगस्त 5 से 21, 2016, तक चले सत्रह-दिवसीय रियो ओलंपिक खेलों में आरंभिक 13-14 दिनों तक तो भारतीय दल का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उस दौरान मेरी पत्नी एवं मुझ सरीखे कुछ लोगों को लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि 118-सदस्यीय भारतीय खिलाड़ियों के दल को एक भी पदक न मिले। (इस बार का दल अपेक्षया बड़ा था 2012 के 83-सदस्यीय दल की तुलना में।)

(विभिन्न देशों द्वारा प्राप्त पदकों की तालिका लेख के अंत में दी गयी है।)

दो पदकों पर जश्न

खैर देशवासियों की किस्मत अच्छी रही कि पहला पदक महिला कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक पाने में कामयाब रहीं। देश की जनता इस उपलब्धि पर इतनी खुश हुई कि जैसे ओलंपिक के सभी पदक देश की झोली में आ गये हों। लोग तुरंत जश्न मनाने में जुट गये। हरियाणा सरकार ने बिना देर किये साक्षी को 2.50 करोड़ का पुरस्कार भी दे डाला। भारतीय रेलवे ने भी समय गंवाये बिना 50/60 लाख के इनाम की घोषणा कर डाली और साथ में नौकरी में पदोन्नति भी। सुनने में आया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं अनूठे व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी ने भी दिल खोल के ईनाम देने का ऐलान कर दिया, एक करोड़ की राशि देने के वादे के साथ। (देखिए इकनॉमिक-टाइम्ज़ तथा इंडियन-एक्सप्रेस)

साक्षी की उपलब्धि पर देशवासी झूम ही रहे थे कि खबर आई कि बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधु प्रतिस्पर्धा के क्वार्टर-फ़ाइनल की बाधा पर करके सेमी-फ़ाइनल में पहुंच गयीं हैं। बाद में सेमी-फ़ाइनल की बाधा पार करके उन्होंने अपने नाम एक पदक  पक्का कर लिया। इसके बाद देशवासियों को उम्मींद होने लगी कि स्वर्ण पदक उनके नाम होना है। स्वर्ण पदक लिए भजन-पूजन, हवन-यज्ञ और दुआओं का दौर भे चल पड़ा ताकि उन टोटकों से पदक की गारंटी में शक ही न रहे। दुर्भाग्य कि इन टोटकों ने कोई कमाल नहीं दिखाया और जैसा कहा जाता है विश्व की खिलाड़ी नंबर एक के सामने वह कमजोर ही रहीं। कुछ भी हो रजत पदक को तो वह बटोर के ले ही आईं । खैर पदकों के लिए तरसते देश के लिए यह मरुभूमि में पानी पाने की खुशी से कम नहीं था।

कांस्य पदक विजेता को 2.50 करोड़ तो रजत पदक विजेता का “रेट” अधिक होना ही था। तेलंगाना सरकार ने 3 करोड़ तो कुछ ऐसी या कम राशि आन्ध्र सरकार ने भी उनकी झोली में डाल दिए। केजरीवाल जी क्यों पीछे रहते? उन्होंने भी दिल खोल के पुरस्कृत कर दिया। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार सिंधु को करीब 13 करोड़ की प्राप्ति हुई। समाचार है कि विज्ञापन कंपनियां उनसे अनुबंध के लिए कतार में खड़े हो चुके हैं।

इन दो खिलाड़ियों के लिए स्वागतार्थ समारोह और जलूस भी अपूर्व रहे। स्वागत में तो दीपा कर्माकर (जिमिनास्ट में चतुर्थ स्थान-प्राप्त) भी शामिल की गयीं यद्यपि उन पर खास धनवर्षा नहीं हुई।

पदक तालिका में इंडिया दैट इज़ भारत

उक्त रिओ ओलंपिक में भारत की स्थिति कितनी दयनीय रही इस हेतु मैंने उपलब्ध पदक-तालिका का अध्ययन किया और जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न देशों की स्थिति के लिये एक सूचकांक M/P = मेडल (पदक) संख्या प्रति लाख पोप्युलेशन (जनसंख्या) भी परिभाषित किया है। (देखिए तालिका लेख के अंत में।) तालिका में उन देशों के नाम नहीं हैं जिनको एक भी पदक नहीं मिला है।

गौरतलब है कि 6 स्वर्ण के साथ 11 पदक जीत कर 16वें क्रम पर स्थित जमैका (आबादी केवल 28 लाख) जैसे छोटे देश के लिए M/P = 0.3929 सर्वाधिक है। दरअसल छोटे देशों के लिए M/P अपेक्षया अधिक है। क्रम में 67वें स्थान पर भारत के लिए न्यूनतम, 0.0002 है। उसके ऊपर नाइजीरिया है M/P = 0.0005 के साथ। अन्य सभी देशों के लिए यह 0.0010 से अधिक है।

इस सूचकांक को मैं महत्वपूर्ण इसलिए मानता हूं क्योंकि सांख्यकीय सिद्धांतों के अनुसार मानव-कार्यकलाप के किसी भी क्षेत्र में दक्ष लोगों की संख्या आबादी के लगभग अनुपात में होगी ऐसी उम्मीद सामान्यतः की जाती है। इसे शब्दशः नहीं लिया जा सकता है किंतु बहुत बड़ी आबादी वाले देश में अधिक दक्ष लोग तो होने ही चाहिए। इसलिए भारत जैसा देश दो पदक भी मुश्किल से पा सका इसके निहितार्थ पर चिंतन तो होना ही चाहिए।

खजाने का दुरुपयोग

देश के नाम अधिक पदक नहीं आये इसका देशवासियों के लिए भावनात्मक महत्व है, किंतु इससे देश की व्यवस्था और खुशहाली पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। मुझे जिस बात पर घोर आपत्ति है वह है पदक-प्राप्त दोनों खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने के लिए सरकारों द्वारा राजकोष यानी खजाना लुटाना । अधोलिखित बातों पर जरा विचार करें।

(1) मुझे याद नहीं आता कि पहले कभी खिलाड़ियों पर रातोंरात करोंड़ों रुपये लुटाये गये हों। एक समय था जब देश में क्रिकेट बेहद लोकप्रिय था (आज भी है), लेकिन खेल के माध्यम से उसके खिलाड़ी लाखों नहीं कमा सके (तब लाख ही बहुत होता था)। उनमें से अधिकतर स्टेट बैंक या रेलवे में नौकरी करते थे। उस काल में विज्ञापनों की दुनिया इतनी चमकदार नहीं थी। लेकिन आज के समय में विज्ञापन-दाता कंपनियां दिल खोल कर पैसा खर्च कर रही हैं और अपने विज्ञापनों के लिए लब्धप्रतिष्ठ खिलाड़ियों और सिने-टीवी कर्मियों आदि के साथ करोड़ों का अनुबंध स्वीकरती हैं। अब ऐसे खिलाड़ियों को नौकरी नहीं करनी होती है। जहां तक मेरा अनुमान है सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन की करोड़ों की संपदा उनके व्यवसाय एवं विज्ञापनों से प्राप्त हुई है। ये दो नाम मात्र उदाहरण के लिए हैं, अन्यथा सूची तो लंबी होगी। सरकारी खजानों से उनको बहुत मिला हो मुझे नहीं लगता। जैसा पहले कहा है विज्ञापन-प्रदाता कंपनियां पदक-प्राप्त खिलाड़ियों से अनुबंध के लिए आतुर रहती हैं। अस्तु, चाहे पहले हो या आज, खिलाड़ियों पर सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाना उचित नहीं कहा जायेगा।

(2) मैं सोचता हूं कि 6 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 16 पदक जीतने वाले जमैका की सरकार ने खिलाड़ियों को कितने करोड़ों से नवाजा होगा? तुलना के लिए ध्यान रहे कि भारत की अनुमानित आबादी 130 करोड़ से ऊपर है और जमैका की मात्र 28 लाख। वहां की प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय है करीब 8000 डॉलर और भारत की करीब 5000 डॉलर।

(3) मेरे मन में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि कई अन्य देशों की तरह अपने यहां भी 15-16 खिलाड़ियों ने पदक जीता होता तो उनको सरकारी खजानों से कितना-कितना मिला होता? और हमारे विशिष्ठ व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी तब अपने खजाने से कितनों पर कितना लुटाते? ध्यान दें जिन दो पदक विजेताओं को उन्होंने करोड़ों से पुरस्कृत किया है उनका दिल्ली राज्य से सीधा संबंध नहीं। यह सवाल भी मेरे मन में उठता है कि क्या परिणाम होते यदि सभी राज्य सरकारें दिल खोलकर खजाना लुटाने चल देतीं? तब ये खिलाड़ी दो दिन में ही कितने करोड़ों के मालिक हो जाते?

(४) मेरी दृष्टि में सर्वाधिक आपत्तिजनक है राज्य के खजानों को लेकर सरकारों का रवैया। किसी जमाने में राजे-महाराजे राजकीय कोशों के मालिक होते थे। उनके लिए खजाना अपनी निजी संपत्ति होती थी। उसे जैसे चाहें वे खर्च करते थे। वे किसी पर खुश हो गये तो उसे गले का हार दे देते थे या खजांची को आदेश देते थे कि स्वर्ण मुद्राओं से उसे नवाजा जाये। क्या लोकतंत्र में शासन चलाने वाला जनप्रतिनिधि-मंडल अर्थात मंत्री-परिषद के साथ मुख्यमंत्री खजाने का मालिक होता है जिसे जैसे चाहे अपनी मरजी से खर्ज करे? अथवा वे राजकोष के रखवाले या संरक्षक होते हैं जिनसे अपेक्षा रहती है कि वे जनहित में उस कोष का इस्तेमाल करें – जनहित जो जनता की समझ में भी आवे? बिना किसी पूर्वनिर्धारित नियमों के जैसी मरजी हुई वैसे खजाना लुटा देने को भी जनहित कह देना न्यायसंगत कहा जायेगा क्या? जिन सरकारों ने खिलाड़ियों पर खुल कर खजाना लुटाया उन्होंने किन कायदे-कानूनों के तहत ये सब किया?

(4) मेरी आपत्ति और भी गंभीर हो जाती है जब ये सरकारें स्कूलों, अस्पतालों, की हालत सुधारने में धन खर्च नहीं करतीं, वेतन बचाने के चक्कर में खाली पड़े पदों को नहीं भरतीं, असंपन्न किसानों के छोटे-मोटे कर्जों को माफ़ करके उन्हें आत्महत्या से नहीं बचाती। सरकारी लापरवाही से हुए हादसों में परिवारों के कमाऊ सदस्य चल बसते हैं, सरकारें उनके लिए भी 2-3 लाख का मुवावजा बहुत समझती हैं। और खिलाड़ियों पर करोड़ों? वाह मेरे देश का लोकतंत्र! जरा सोचिए सफ़ाई कर्मियों को तनख्वाह देने में केजरीवाल जी जल्दी नहीं करते परंतु खिलाड़ियों पर धन लुटाने में उन्हें देर नहीं लगती।

(5) प्रबुद्ध जन इस तथ्य पर विचार करें कि विश्व का सर्वाधिक चर्चित पुरस्कार भी गत वर्ष केवल 6.5 करोड़ का था। वह भी स्वीडन की सरकार नहीं बल्कि आल्फ़्रेड नोबेल की दानराशि से स्वीडिश अकादमी देती है। मेरी जानकारी में किसी नोबेल पुरस्कार विजेता पर संबंधित देश की सरकार धनवर्षा नहीं करती। क्या हमारी कोई सरकार धनवर्षा करेगी यदि कोई नोबेल पुरस्कार जीते? इस पर भी गौर करें कि केंद्रीय सरकार का सबसे बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार भी केवल 25 लाख रुपये का है। प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार (साहित्य) मात्र 11 लाख रुपये का है। देश में बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार गैर-सरकारी संस्था इंफ़ोसिस साइंस फ़ाउन्डेशन देती है वह भी 55 लाख का है। तब सवाल उठता है कि क्या ओलंपिक पदक की अहमियत विज्ञान, साहित्य आदि की उपलब्धियों से बड़ी है?

अंधेर नगरी

ऐसी विकृत शासकीय व्यवस्था को भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी ने कभी “अंधेर नगरी चौपट राजा” के विशेषण से संबोधित किया था।

Olympic Medals Tally

गोरक्षा का सच: सड़कों पर आवारा गायें और सांड़ गोरक्षकों को नजर क्यों नहीं आते?

मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद हैं जब मेरे पिताजी ने गांव में गाय पाल रखी थी। चूंकि मेरी मां की पहले ही इहलोकलीला समाप्त हो चुकी थी, अतः गाय की देखभाल, दाना-पानी और दूध दुहने आदि के प्रायः सभी कार्य वे अकेले स्वयं ही करते थे। घर पर हम बच्चे यथासंभव उनका हाथ बंटा देते थे। उत्तराखंड के मेरे उस पहाड़ी गांव में गाय-बैलों की उस काल में काफी अहमियत थी, क्योंकि वे दूध के स्त्रोत के अतिरिक्त कृषि-कार्यों के लिए भी आवश्यक होते थे। उनके गोबर-मूत्र से बने खाद का प्रयोग खेतों में होता था। उस काल में हम रासायनिक खाद से अनभिज्ञ थे। हां, तो मैं बता रहा था कि मेरे पिताजी गाय दुहने का कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि गाय के थन से उतरने वाला आधा दूध उसके बच्चे – बछिया हो या बछड़ा – को मिले। प्रचलित परंपरा के अनुसार हम लोग बच्चा जनने के २२ दिनों तक गाय का दूध प्रयोग में नहीं लेते थे। उस अंतराल में गाय का बच्चा भरपूर दूध पा जाता था। बाद में आधा दूध उसका और आधा हमारा। उसको घास तथा खाद्य वनस्पति की मुलायम पत्तियां खाना सिखाया जाता था। वह भी एक समय था जब गायें या बैल बूढ़े होने पर भी पलते रहते थे। वे तब भी पूरी तरह निरुपयोगी नहीं होते थे क्योंकि उनका गोबर-मूत्र खाद के काम आता था। उन्हें छोड़ना चाहे कोई तो कहां छोड़ा जाता? छुट्टा छोड़ने का मतलब खेत चरने की छूट। (आवारा छोड़े गये पालतू पशुओं को वाराणसी में छुट्टा कहा जाता है।) मेरे पिताजी तो धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए गाय की सेवा कर्तव्य मानते थे। वे तो कुछएक शारीरिक व्याधियों के निराकरण हेतु भी पंचगव्य के सेवन में आस्था रखते थे।

     यह बात कोई पचास-पचपन वर्ष पहले की है। अब न मेरे पिताजी इस लोक में  रह गये हैं और न वे गायें और न ही मैं अब गांव में हूं। किंतु गाय-बैलों की उपयोगिता तो वहां अभी भी है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र के सीड़ीनुमा खेतों के लिए ट्रक्टर जैसे साधनों की व्यवस्था एवं उपयोग सामान्यतः संभव नहीं।

गोपालकों की गली सुन्दरपुर वाराणसी

 

 

 

 

 

 

वाराणसी में छुट्टा/आवारा गायें 

अब मैं आज के शहरों के गोवंश की बाबत अपने अनुभव की बात करता हूं। मेरा अनुभव मुख्यतया अपनी तथाकथित धार्मिक नगरी (वस्तुत: धर्म के नाम पर पाखंड में अनुरक्त) वाराणसी से जुड़ा है। फिर भी यह कह सकता हूं आवारा या छुट्टा गायों और सांड़ों को मैंने कई शहरों में देखा है और उन शहरों की स्थिति वाराणसी से परिमाणात्मक स्तर पर बेहतर हो सकती है किंतु गुणात्मक स्तर पर नहीं। निश्चय ही वाराणसी की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

जहां तक आवारा जानवरों का सवाल है उसमें गायें एवं साड़ों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशु भी देखने को मिल जाते हैं, जैसे सुअर, बकरे, गधे तथा खच्चर। आवारा कुत्तों को भी उसमें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा वाराणसी के कई मोहल्लों में और मंदिरों के आसपास बंदरों की फौज़ के दर्शन भी आपको हो जायेंगे। इन सबका कोई इलाज मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में होने से रहा; किसी को भी इस दुर्व्यवस्था से परहेज नहीं।

भारतीयों की खासियत यही है कि अवांछित वस्तुस्थिति से कैसे सामंजस्य बिठाएं इसे वे जन्म के तुरंत बाद ही सीख जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही चलते रहनी है।

     जहां तक गायों और साड़ों की बात है मैं बताता हूं वे कहां से आ टपकते हैं। दरअसल इस शहर के गली-कूचों में कई लोग गायें पालते हैं। कुछ ने ताजा एवं “शुद्ध” दूध के लिए निजी तौर पर एक या कभी दो गायें पाल रखी हैं। इसके अलावा कुछ का गोपालन करके दूध का कारोबार करना रोजी-रोटी का साधन है। ऐसे अधिकांश जनों ने अपने पुस्तैनी मकान को और उससे लगे गली-कूचे को ही इस कार्य हेतु प्रयोग में लिया है। इसके लिए कोई पक्का ढांचा गली में खड़ा नहीं करना पड़ता है। इसे आप अतिक्रमण कहेंगे या नहीं मैं नहीं जानता। किंतु प्रशासनिक तंत्र इस व्यवस्था को निर्लिप्त भाव से देखता है। यह भी सच है कि इन लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रशासन नहीं कर सकता। यों पिछले बीस-बाइस सालों से मैं वाराणसी में नये-नये आने वाले सक्षम (कानूनन सक्षम लेकिन व्यवहार में अक्षम!) अधिकारियों को सुनते आ रहा हूं कि शहर के किसी कोने में गोशालाएं स्थापित की जायेंगी। आज तक उस दिशा में कभी कोई प्रयास किया गया होगा ऐसा मैं नहीं समझता। अधिकारी दो-तीन वर्ष यहां की हवा में घुल चुके भांग के प्रभाव में रहते हैं, फिर चले जाते हैं।

इन गोपालकों में कुछ ऐसे होते हैं जो प्रातःकाल गाय दुहने के बाद उसे दिन भर के लिए छोड़ देते हैं। वह गाय सड़कों के किनारे की घास चरती है और सड़क के किनारे खुले में पड़े कूड़े-कचरे में कहीं कोई खाद्य सामग्री मिल जाये तो उसे भी खा जाती है। ऐसा खाद्य अक्सर पोलिथीन की थैलियों में रखकर लोग कूड़े में डाल देते हैं। खाद्य को खाते-खाते वह कभी-कभार पोलिथीन ही को निगल जाती है। मैं समझता हूं पोलिथीन खाने के मामले बहुत नहीं होते होंगे। अगर होते तो गायें और सांड़ आये दिन मर रहे होते। मैंने तो २-४ वर्षों तक इन जानवरों को सड़कों पर जीवित देखा है। सड़क पर विचरण करने वाली गाय संध्याकाल को अपने मालिक के पास लौट आती हैं। स्पष्ट है उसे पालने में गोपालक को कम मेहनत पड़ती है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये गायें बच्चे जनने की उम्र पार कर जाती हैं और दुधारू नहीं रह जाती हैं। गोपालक गोसेवक तो होते नहीं कि वे बूढ़े माता-पिता की भांति इन्हें पालें। उनका उद्देश्य तो उनसे दूध पाना होता है जिसे एक प्रकार से गोशोषण कहा जा सकता है। क्यों, यह भी मैं बताऊंगा। अशक्त तथा निरुपयोगी हो चुकीं इन गायों को छोड़ दिया जाता। बेघरबार इंसान की तरह इनका ठिकाना सड़कें हो जाती हैं। दुधारु अवस्था में इन्हें चारा भी मिल जाता था; वह अब कहां से इन्हें नसीब हो? ये हैं गायें जो सड़कों पर इधर-उधर घूमती फ़िरती हैं। जो कुछ भी सड़क में मिल जाये उसे खा लेती हैं। इनके गोबर को देखकर पता चलता है कि उसमें घास का अंश नाममात्र ही होता है। मेरे घर के प्रवेशद्वार (गेट) पर कभी-कभी कोई गाय गोबर कर जाती है। जब मैं उसे साफ करता हूं तो देखता हूं कि वह इंसान के मल के समान बदबू करता है। जिस गोबर से मैं बचपन से वाकिफ़ रहा हूं उस जैसा तो वह हरगिज नहीं होता है। पहले ही उम्र खा चुकी ऐसी गायें अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। मैंने ऐसी ही एक गाय की व्यथा लघुकथा के रूप में अपने अन्य चिट्ठा-आलेख में लिखी है। (देखें: कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा)

http://jindageebasyaheehai.wordpress.com/2014/09/06/

वाराणसी में आवारा सांड़

अब आइये अपनी नगरी की गलियों-सड़कों पर विचरण करते सांड़ों की बात पर। हिन्दी में एक कहावत है: “रांड़, सांड़, सीढ़ी औ’ सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी।” अर्थात्  सांड़ों की उपस्थिति इस नगरी में कोई नई बात नहीं। पहले वे कहां से आते थे मैं नहीं कह सकता, किंतु आजकल तो वे इन्हीं गोपालकों की देन हैं। होता यह है कि जब गाय बछिया जनती है तो उसे पाल लिया जाता है, क्योंकि वह दो-तीन सालों बाद दुधारू गाय बन सकती है। परंतु जब वह बछड़ा जनती है तो उसका क्या किया जाये? वह बैल बन सकता है। शहरों में किसे जरूरत है बैलों की? अब तो उनकी जरूरत गांवों में भी नहीं रह गयी; उनकी जगह ट्रैक्टर ले चुके हैं। इसलिए नवजात बछड़ा अवांछित होता है। फिर भी कुछ दिनों तक उसे भी पाला ही जाता है ताकि उसकी मौजूदगी से गाय दुहने में आसानी हो। गोपालक उसे यथासंभव कम दूध पीने देते हैं और जैसे ही गाय के थन से दूध उतरने लगता है उसे हटा दिया जाता है। गोपालक गाय को उससे दूर करना शुरू करते हैं और कालान्तर में वह बिना बछड़े के दूध देने लगती है। अपर्याप्त भोजन पाने वाला ऐसा बछड़ा अक्सर कुछ दिनों में मौत का शिकार हो जाता है। यदि वह नहीं मरता है तो उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है। उसकी किस्मत ठीक हुई तो सड़क किनारे की घास तथा अन्य चीजें खाकर जिन्दा रह जाता है और बाद के काल में सांड़ के तौर पर जीवित रहता है। अन्यथा वह भूख अथवा दुर्घटना का शिकार होकर परलोक सिधार जाता है।

तो यह है हमारे गोपालकों/गोसेवकों/गोशोषकों का सच।

     मेरे देशवासी, विशेषतः हिन्दू जन, इस तथ्य को स्वीकारने से कतराते हैं कि हम आडंबरों के साथ जीने के आदी हैं।  हमारी कथनी में आदर्श की खूब बातें होती हैं परन्तु करनी में हम वस्तुस्थिति का भरपूर शोषण करते हैं। गोसेवा एक ढकोसले से भिन्न नहीं है। कुछ ही लोग अपवाद होंगे जो इस कार्य को ईमानदारी से करते हों। – योगेन्द्र जोशी