वंदे मातरम् बोलना क्या देशप्रेम या राष्ट्रभक्ति का प्रमाण है? नहीं!

“वंदे मातरम्”

पिछले कुछ समय से कुछएक स्वघोषित राष्ट्रभक्त “वंदे मातरम्” बोलने-बुलवाने पर जोर दे रहे हैं। जो यह वचन (नारा) नहीं बोलता उसे राष्ट्रभक्ति-विहीन या उससे आगे देशद्रोही तक वे कहने से नहीं हिचकिचाते। इस श्रेणी के कुछ जन मारपीट पर भी उतर जाते हैं। कोई-कोई तो अति उत्साह में यहां तक कह बैठता है कि जो यह वचन नहीं बोलता उसे पाकिस्तान चला जाना चाहिए, गोया कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के स्वागत के लिए बैठा हो। वे भूल जाते हैं कि कोई भी देश अपने नागरिक को अन्य देश को जबरन नहीं भेज सकता भले ही बड़े से बड़ा अपराध कर बैठा हो। और सजा भी दी जानी हो तो उसका निर्णय अदालत ही कर सकती है।

मुझे इस कथन या नारे से कोई शिकायत नहीं। किंतु कोई मुझसे कहे कि बोलो “वंदे मातरम्”  तो मैं कदाचित नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि ऐसे शब्द समुचित अवसर पर सप्रयोजन ही बोले जाने चाहिए। जहां कहीं भी जब कभी बिना मकसद के ऐसे शब्द के बोले या बुलवाये जा रहे हों उसे मेरे मत में मूर्खता समझा जाना चाहिए। ऐसा क्यों यह बात उसे नहीं समझा सकते जो तार्किक तरीके से सोचना ही नहीं चाहता है तथा दुराग्रह से ग्रस्त है।

“वंदे मातरम्” शब्द तो एक प्रशिक्षित तोते से भी बुलवाए जा सकते हैं। 3-4 साल का बच्चा भी इसे स्पष्ट उच्चारित करके बोल देगा। परंतु तोते या बच्चे का ऐसा बोलना किसी गंभीर भाव के साथ हो सकता है क्या? वे शब्द जानते हैं लेकिन उसमें निहित अर्थ नहीं। बच्चे को भी इस कथन के भावार्थ वर्षों बाद ही समझ में आने लगता है।

राष्ट्रभक्ति/देशप्रेम दर्शाता है क्या “वंदे मातरम्”?

यह उक्ति हमको संदेश देती है कि देश की यह भूमि हमें जीवन-धारण के साधन एवं सुविधा प्रदान करती है। इस अर्थ में यह हमारी पालनकर्ता कही जाएगी। जन्मदाता माता जन्म तो देती है किंतु जिन संसाधनों से हमें पालती है वह देश की इसी भूमि से पाती है। अतः देश की भूमि स्वयं एक मां की भूमिका निभाती है। जैसे हम मां का सम्मान करते हैं, उसे प्रणाम करते हैं, उसकी वंदना करते हैं, ठीक वैसी ही भावना हम इस भूमि के प्रति रखें यह संदेश उक्त कथन में निहित हैं। यदि इस वचन को कहते हुए किसी के मन में उक्त भावना न उपजे, मन में देशहित की भावना न जन्म ले, तो इसे कहना निरुद्देश्य हो जाएगा।

किसी व्यक्ति के मुंख से निकले शब्दों से वास्तविकता के धरातल पर कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। हां वे शब्द किसी की भावनाओं को उत्तेजित या उत्प्रेरित जरूर कर सकते हैं। असल महत्व तो व्यक्ति के कृतित्व का रहता है। कहने का मतलब यह है कि व्यक्ति का आचरण यदि आपत्तिजनक हो तो “वंदे मातरम्” कहना सार्थक रह जाएगा क्या? यदि कोई इस वचन को बोलने के लिए दूसरे को मजबूर करे और मारपीट-गालीगलौंज पर उतर जाए तो उसका कृत्य वचन के अनुरूप काहा जाएगा, उसका आचरण जनहित में माना जाएगा? उसका कृत्य वस्तुतः कानून के विरुद्ध दंडनीय नहीं समझा जाएगा क्या? दुर्भाग्य से “वंदे मातरम्” पर जोर डालने वालों का आचरण इसी प्रकार का आपत्तिजनक देखने को मिलता है।

मेरा मंतव्य स्पष्ट है। यदि उक्त वचन बोलने वाले के मन में देश के लिए सम्मान भाव न हो, उसके हित यानी देश के नागरिकों के हित की भावना न हो तो “वंदे मातरम्” एक खोखला, अर्थहीन, मूर्खतापूर्ण वक्तव्य भर रह जाता है। आप ही सोचिए कोई इसे बोलने में तो देर न करे, किंतु घूसखोरी करे, सौंपी गई जिम्मेदारी न निभाए, या लापरवाही वरते या जनविरोधी या देशहित के प्रतिकूल आचरण करे तो उसके “वंदे मतरम्” बोल देने का महत्व ही क्या रह जाता है? इसीलिए मैं इस नारे को जबरन मुंह में ठूंसने का घोर वितोधी हूं।

संसद में चिढ़ाने वाले नारे

मेरी गंभीर शंका यह है कि “वंदे मातरम्”, “भारत माता की जय”, “जयहिंद” जैसे नारे राष्ट्रभक्ति के द्योतक नहीं हो सकते। किसी देश के लिए वचनों से अधिक कर्म माने रखते हैं। यदि संबंधित व्यक्ति का आचरण जनहित या देशहित में न हो तो ये नारे खोखले, आडंबरपूर्ण और निन्द्य माने जाएंगे। विगत 17-18 जून को, जब नवनिर्वाचित सदस्यगण शपथ ग्रहण की प्रक्रिया से गुजर रहे थे तब हमारी संसद में ऐसे नारे लग रहे थे।

नारे लगाने वाले कौन थे? मेरे अनुमान से वे प्रमुखतया सरकार चला रही भाजपा के दूसरी-तीसरी श्रेणी के नेता थे, जो अति उत्साह में भारतमाता से संबंधित नारे ही नहीं उसके भी आगे बढ़कर अपनी धार्मिक आस्था के अनुरूप “जै श्रीराम”, “जै बजरंगबली” जैसे नारे लगाने से बाज नहीं आ रहे थे। (अन्य दलों के सदस्यों ने भी कुछ भिन्न नारे लगाए।) सुनते हैं कि पीठासीन सभापति ने उन्हें नारों से बचने का अनुरोध किया था। लेकिन वह नेता ही क्या जो दूसरों की सुनता हो? गौर करें कि दल के शीर्ष श्रेणी के नेता स्वयं ऐसी हरकतें नहीं करते हैं, किंतु वे अपने दल के दोयम दर्जे के ऐसे नेताओं को नारों से बचने की हिदायत भी नहीं देते। भाजपा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ने उन्हें रोकना नहीं चाहिए था क्या?

संसद में विद्यमान अन्य धार्मिक आस्थाओं वाले सदस्य इन नारों को सुनना पसंद तो नहीं करते होंगे, लेकिन वे विरोध में कुछ कहना भी ठीक नहीं समझते होंगे। वे कदाचित संसद में शालीनता बरतना ठीक मानते होंगे और इन नारों को नजरअंदाज करते होंगे। वे वस्तुतः ठीक करते हैं, क्योंकि नारे लगाने वाले अपनी बचकानी हरकतों से देश का कोई हित नहीं साधते हैं, बस उन्हें संतुष्टि मिलती है “देखा मैंने नारे लगा दिए”, गोया कि किसी शेर से लड़ने की बहादुरी दिखाई हो।

स्वयं को “सेक्युलर” (धर्मनिरपेक्ष) कहने वाले देश की संसद जैसी जगह पर ऐसे नारों का लगना मेरी नजर में आपत्तिजनक लगता है। जो शासकीय व्यवस्था लोगों को संसद में ऐसी निरर्थक और आस्थाबोधक नारेबाजी की छूट देता है उसे मैं “स्यूडोसेक्युलर” मानना हूं।

संयोगवश किसी सोशल मीडिया चैनल पर मुझे पढ़ने को मिला: “ये नारे मुस्लिम समुदाय को चिढ़ाने के लिए लगाए जाते हैं।” मैं इस बात से सहमत हूं। मुझे मुस्लिम समुदाय के कुछ सदस्यों में यह चिन्ताजनक कमजोरी दिखती है कि वे नारों की अनदेखी करने के बजाय उन्हें अपने सामने पेश चुनौती के रूप में लेने लगते हैं। ऐसी कमजोरी अन्य समुदायों में मुझे नहीं दिखाई देती। गौर करें कि उसी शपथ कार्यक्रम में हैदरबाद के नवनिर्वाचित सांसद ने प्रतिक्रिया-स्वरूप “जै भीम”, “जै हिन्द” और “अल्लाहू अकबर” के नारे लगा दिये। उनके अलावा उ.प्र. के संभल क्षेत्र के सांसद ने तो साफ घोषित कर दिया कि “वंदे मातरम्” का नारा इस्लाम-विरोधी है।

शपथ-ग्रहण आयोजन की अधिक जानकारी उदाहरणार्थ द हिन्दू और टाइम्ज़ ऑफ़ इंडिया में मिल सकती है।

क्या है और क्या नहीं है इस्लामविरोधी

मुझे मुस्लिम समुदाय पर कभी-कभी तरस आता है। उनके धर्मगुरु कहते हैं “वंदे मातरम्” इस्लाम के विरुद्ध है, वह वर्जित है, इत्यादि। हजरत साहब के समय में जो चीजें थीं ही नहीं उनका इस्लाम के विरुद्ध होना किस आधार पर तय किया जा सकता है? असल में मुस्लिम धर्मगुरु सुविधा के हिसाब से चलते हैं। जिन बातों में उन्हें सुविधा होती है उसे वे स्वीकार्य मान लेते हैं और जिसके बिना काम बखूबी चल जाता है उसे वे इस्लाम-विरोधी कह देते हैं।

मैं मुस्लिम समुदाय के सामने अपनी कुछ शंकाएं रखता हूं;

(1) उन्हें अपने बच्चों को आधिनुक विज्ञान पढ़ाना चाहिए कि नहीं?

(2) यदि पढ़ाते हैं तो उन्हें यह सिखाया जाएगा कि इस संसार और उसके जीवों की सृष्टि 7 दिन में नहीं हुई, बल्कि वह सब अरबों-करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है। ऐसा करना इस्लामी दर्शन के विरुद्ध नहीं होगा क्या?

(3) यदि बच्चे आधुनिक विज्ञान पढ़ते और स्वीकरते हैं और कालांतर में उसी विज्ञान के आधार पर नौकरी-पेशे में जाते हैं तो ऐसा करना गैरइस्लामी नहीं होगा क्या? क्या ऐसी धर्मविरुद्ध शिक्षा स्वीकारनी चाहिए मुस्लिमों को?

(4) इतना ही नहीं इसी विज्ञान पर आधारित चिकित्सा और उससे जुड़ी दवाइयों का सेवन इस्लाम विरुद्ध नहीं होगा क्या?

(5) क्या आधुनिक टेक्नॉलॉजी पर आधारित सुविधाएं इस्लाम-विरुद्ध नहीं हैं, क्योंकि ये उस आधुनिक विज्ञान की देन हैं जो इस्लाम्मिक दर्शन से मेल नहीं खाता है।

इतने सब गैर-इस्लामिक बातों को स्वीकारने वाले यदि “वंदे मातरम्” बोल देंगे तो कौन-सा अनर्थ हो जाएगा? यह नारा इस्लामी दर्शन को तो नहीं नकारता है न? यह अल्लाह के वजूद को तो नकारता है क्या? मोहम्मद हजरत का निरादर करता है क्या? पांच बार की नमाज की मनाही करता है क्या?  इसाईयत एवं इस्लाम के आध्यात्मिक दर्शन के मूल में तो वही यहूदी दर्शन है, थोड़ा हेर-फेर के साथ! इसाई एवं यहूदी भी क्या इतना विरोध करते हैं?– योगेन्द्र जोशी

देश का संविधान-सम्मत नाम “इंडिया”; तब “भारत” नाम की जरूरत  क्यों आ पड़ी?

लंबे अंतराल से  मैं एक प्रश्न का उत्तर पाने की इच्छा रखते आया हूं। अभी तक मेरी दृष्टि में जानकारी का ऐसा स्रोत नहीं आया जो मेरी समस्या का संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत कर सके। समस्या है कि इस देश के दो नाम क्यों हैं? क्या दो नामों की कोई उपयोगिता है, विशेषतः जब प्रायः सर्वत्र एक ही नाम सुनने-पढ़ने में आ रहा हो। 

देश का संविधान अंगरेजी में लिखा गया है और उसी को उसकी प्रामाणिक प्रति माना जायेगा यह भी स्पष्ट किया गया है। किसी अन्य भाषा (तथाकथित बेचारी राजभाषा हिन्दी भी शामिल) में लिखित (अनूदित/अनुवादित) प्रति अमान्य होगी यदि कानूनी व्याख्या में अंगरेजी मूल और अन्य भाषा में कहीं फ़र्क दिखने में आवे।

अंगरेजी में लिखित इस संविधान के आरंभ में दिए गये PREAMBLE (प्रस्तावना, भूमिका, प्राक्कथन जो भी अनुवादकगण कहते हों) के शब्द ये हैं:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:

JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(हिन्दी में यों आरंभिक शब्द होंगे: “हम इंडिया के लोग …”

ध्यान दें कि इस PREAMBLE में “भारत” का प्रयोग या उल्लेख नहीं है। तब क्या इस देश को भारत कहना संवैधानिक दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जायेगा?

अगर हिन्दी में इस PREAMBLE के शब्द कहे जाने हों तो कैसे शुरुआत करेंगे? हम क्या यों आरंभ करेंगे: “हम इंडिया के लोग …” अथवा हम कहेंगे: “हम भारत के लोग …”? यहां यह प्रश्न उठेगा कि क्या किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा-शब्द (नाम, proper name) का अनुवाद किया जाता है? यह सभी जानते हैं कि किसी भी भाषा में बात करने पर व्यक्तिवाचक या भाववाचक संबोधन का अनुवाद नहीं किया जाता है। तब उक्त अनुवाद में इंडिया के बदले भारत कैसे कहा जा सकता है।

प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है जब हिन्दी अथवा देवनागरी लिपि वाली भाषाओं से इतर भाषाओं में इस देश का जिक्र किया जाना हो। यथा तमिल में क्या कहेंगे, सिन्धी में क्या कहेंगे, सिंहली (श्रीलंका की भाषा – विदेशी, संस्कृत शब्दों की बहुलता वाला) में क्या होगा, थाई (थाइलैंड की भाषा) में क्या होगा, इत्यादि इत्यादि। मेरी जानकारी के अनुसार संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि हिन्दी में “भारत” होगा। लिखा भी हो तो भी तमाम अन्य भारतीय/विदेशी भाषाओं में क्या कहेंगे यह तो नहीं ही स्पष्ट है।

ऐसी दुविधा किसी ऐसे देश के मामले में हो सकती है जिसके एकाधिक नाम हों। मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इस राष्ट्र को अनौपचारिक रूप से हिन्दुस्तान, हिंद, आदि कहा ही जाता है, उसी प्रकार भारत कहना भी अनौपचारिक तौर पर स्वीकार्य माना जायेगा। लेकिन कानूनी दस्तावेजों में भारत कहना अनुचित नहीं होगा क्या? देशवासी बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, लेकिन वे इस विसंगति की चर्चा क्यों नहीं करते हैं?

यह भी विचारणीय है कि प्राचीन काल में यहां के बाशिन्दों ने इस भूभाग को “भारत” नाम दिया। विष्णुपुराण में कहा गया है:

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। (विष्णुपुराण, 2.3.1)

अर्थात् जो देश (वर्ष – देश का पर्याय) समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है उसका नाम है भारत और उसकी संतानें हैं भारती ।

मेरा मानना है कि यह पौराणिक नाम “यूरोपवासियों” के संबोधन “इंडिया” से अधिक प्राचीन रहा ही होगा।

स्पष्ट है कि भारत नाम हमारे पुरखों ने प्राचीन काल में इस भूभाग को दिया था जो आज एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर स्थापित है। अंगरेजों ने अपने आधिपत्य के अधीन इस भूभाग को इंडिया कहा अपनी सुविधा से न कि यहां की जनता से पूछकर । उन्होंने “India as a sovereign nation” के तौर पर राज नहीं किया; यह तो उनके ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा था। हमने राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल की लेकिन अपना स्वयं का दिया हुआ नाम भूलकर उनके द्वारा दिया हुआ नाम स्वीकार कर लिया। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कोई विलायत में रहे और विलायतियों के उच्चारण की सुविधा के अनुसार उनके संबोधन को ही अपना नाम मान ले और अपने परिवार द्वारा प्रदत्त मूल नाम भूल जाए।

इस राष्ट्र को “भारत” संबोधित न कहकर “इंडिया” क्यों कहा गया यह मेरी समझ से परे है। यह ठीक है कि अंगरेजों ने इस देश को इंडिया कहा और शासकीय व्यवस्था में अपनी जरूरत के अनुसार अंगरेजी भाषा तथा अंगरेजियत का प्रसार किया। विडंबना यह है कि जब देश स्वतंत्र हुआ तो अंगरेजों से तो हम मुक्त हुए, लेकिन गुलामी की निशानी उनकी अन्य बातों के प्रति देशवासी सम्मोहित बने रहे। फलतः देश इंडिया बना रहा, भारत नहीं बन सका संविधान की दृष्टि में।

इस समय इस देश को भारत कहने वाले नगण्य हो चले हैं। अखबारों/टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाले विज्ञापनों में इंडिया ही प्रयुक्त होता है। प्र.मं. मोदी तक “डिजिटल इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” जैसे नारे गढ़ते हैं और उसके बाद उन नारों के हिन्दी रूपान्तरों मे भारत प्रयुक्त होता है। जब मौलिक रूप से “इंडिया” ही इस्तेमाल होना है तो “भारत” की आवश्यकता क्या है?

यहां इतना तो बता ही दें कि ‘केंद्र शासन की स्थापना के लिए 1949 में जिस अधिनियम को पारित किया गया उसके अनुच्छेद 1(1) का पाठ यों है (अंगरेजी में): “1(1) India, that is Bharat, shall be a Union of States”, जिसका हिन्दी रूपान्तर यों दिया जा सकता है: “इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का संघ होगा ।” ध्यान दें कि इस स्थल पर देश का नाम ‘इंडिया’ के साथ-साथ ‘भारत’ भी घोषित कर दिया है । ऐसा करने की आवश्यकता क्या थी यह भी मेरे समझ से परे है। ऐसा करना ही था तो जैसे संविधान के ४२वें संशोधन (1976) में “SECULAR” शब्द जोड़ा गया वैसे ही संविधान संशोधन के जरिये “भारत” शब्द भी जोड़ा जा सकता था। पर ऐसा किया नहीं गया। कारण? मेरे लिए अज्ञात! – योगेन्द्र जोशी

२७ सितंबर: शहीद भगतसिंह का जन्मदिन

भगत सिंह का जन्म कृषकों के एक सिख परिवार में बंगा (लायलपुर-अब पाकिस्तान) में 27 सितंबर 1907 को हुआ था। आपके परिवार में सभी देशभक्त, सुधारवादी तथा देश की आजादी के दीवाने थे। बड़ा होने पर …”
शेष के लिए समाचार पढ़ें – “दैनिक भास्कर” (क्लिक करें)

भगतसिंह का अंतिम पत्र अपने साथियों के नाम:

22 मार्च,1931,

“साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह”

मैं समझ नहीं पाता हूं कि वह कौन सी बात थी कि आज से ९०-१०० साल पूर्व कुछ लोग देश, समाज तथा जन्मभूमि के लिए अपने प्राण तक त्यागने को तैयार थे ? वह सब सच था, लेकिन आज के हालात देख विश्वास नहीं होता है कि ऐसे भी लोग कभी इस देश में पैदा हुए थे । आज त्याग की बात तो दूर, देश लूटने से भी कोई बाज नहीं आ रहा है । जिसको जहां मौका मिल रहा है वह केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगा है । इतना भी करने को लोग तैयार नहीं कि अपने हिस्से की जिम्मेदारी ही ईमानदारी से निभाएं, जिसके लिए समाज/शासन उन्हें वेतन देता है । अगर थोड़ी-सी निष्ठा होती, देश के हालात कुछ और होते । सरकारी तन्त्र का शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता, चिकित्सक ईमानदारी से मरीजों का इलाज करता, पुलिस वाला ईमानदारी से फ़र्ज निभाता, राजनेता आपराधिक वारदातों में न सरीक होते और न ऐसी वृत्तियों में संलग्न तत्त्वों को संरक्षण देते, न्यायिक व्यवस्था में ईमानदारी होती, तो देश की तस्वीर कुछ और होती । काश ऐसा होता !

आज भगतसिंह का जन्मदिन है । बहुत कम लोगों को मालूम होगा । क्रिकेट या सिनेजगत की के किसी विशिष्ठ व्यक्ति ‘सेलेब्रिटी’ अथवा किसी बड़े राजनेता की बार होती तो पता चलता । पर भगत सिंह का खयाल किसे होगा ? उस शहीद के प्रति मेरी श्रद्धा-भावना – योगेन्द्र जोशी

‘विहिप’ का ‘फरमान’: प्रत्येक परिवार चार बच्चे

विगत इक्कीस अक्टूबर के दैनिक वार्तापत्र ‘हिन्दुस्तान’ के मुखपृष्ठ पर एक समाचार देखने को मिला, शीर्षक थाः ‘विश्व हिन्दू परिषद का फतवा – दो अपने लिए, दो राष्ट्र के लिए’ । मुद्रित समाचार के अनुसार ‘धार्मिक संगठन विहिप’ ने एक नई मुहिम छेड़ने की योजना बना ली है, जिसके अनुसार वह हिन्दुओं को परिवार नियोजन न अपनाने की सलाह देगी, ताकि देश में अन्य धर्मावलंबियों (वस्तुतः मुस्लिमों) की लगातार बढ़ रही जनसंख्या उनसे आगे न बढ़ जाये और वे कालांतर में ‘अल्पसंख्यक’ न बन जायें । इस संदर्भ में वह कथित तौर पर यह नारा देगीः ‘प्रत्येक परिवार चार बच्चे – दो राष्ट्र के लिए, दो परिवार के लिए ।’ इसके साथ ही वह तरह-तरह की योजनाओं पर काम कर रही है, जिससे उसका संदेश जनसमुदाय तक पहुंचे और जिनके माध्यम से वह लोगों को अपने पक्ष में लाने में सफल हो सके । इन सभी बातों का संक्षेप उस समाचार में दिया गया है ।

विहिप का फ़रमान

समाचार: विहिप का फ़रमान

मैं दावा नहीं कर सकता कि वह समाचार एकदम पुख्ता है, पर यही मानकर चल रहा हूं कि एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में छपे होने के कारण वह सर्वथा मिथ्या नहीं होगा, भले ही ब्यौरा बढ़चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया हो । मैंने सोचा कि विहिप की वेबसाइट (http://www.vhp.org/) पर अधिक जानकारी मिल सकेगी, किंतु निराश होना पड़ा क्योंकि वेबसाइट पर पहुंच (एक्सेस) की अनुमति नहीं है या फिर वह गलत स्थान पर पहुंचा देती है । । कदाचित् वह पंजीकृत सदस्यों के लिए ही उपलब्ध है । माइक्रोसाफ्ट द्वारा नियंत्रित संबंधित एक ‘ग्रूप’ मुझे दिखा, परंतु उस पर केवल विहिप के सांविधानिक उद्येश्य ही मिल सके । बताता चलूं कि वहां उल्लिखित बातें प्रभावी तथा आदर्श थीं । हकीकत में वे खुद विहिप के लिए अब कितनी मान्य हैं इस पर मुझे शंका अवश्य है, क्योंकि प्रायः सभी संगठन आदर्श धारणाओं के साथ जन्म लेते हैं और समय के साथ विकारग्रस्त होकर रास्ता भटक जाते हैं । अस्तु ।

मैं आगे कुछ कहूं इससे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी किसी भी धार्मिक संगठन के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है । चूंकि यह देश स्वतंत्र है, हमें अपनी बातें कहने की छूट है, अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार चलने और उनको प्रसारित-प्रचारित करने का हमें अधिकार है, अतः अधिक कुछ उनके प्रतिपक्ष में कहना निरर्थक है ।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो विहिप, एवं व्यापक स्तर पर हिन्दू संगठनों, की चिंता जायज है । अभी तक यह देश हिन्दूबहुल देश रहा है । अघोषित तौर पर ही सही, यह एक प्रकार से हिन्दू राष्ट्र है इस आश्वस्तिभाव के साथ हिन्दू समाज जीता आ रहा है । कम से कम मैं ऐसा महसूस करता हूं । मेरी यह बात कइयों को नागवार लगेगी यह भी मैं जानता हूं । अब यदि वे हिन्दू कभी किसी भी कारण से अल्पसंख्यक हो चलें तो उनके लिए यह अवश्य असह्य, पीड़ादायक और भविष्य के प्रति निराशाप्रद अनुभव सिद्ध होगा । परंतु क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है, और यदि हां, तो क्या उसका समाधान जनसंख्या-वृद्धि में ही है जैसे सवाल अवश्य उठाये जा सकते हैं ।

मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि जो नारा कथित तौर पर विहिप देने जा रही है उसे आज का मध्यम तथा उच्च वर्ग कुछ भी महत्त्व नहीं देने जा रहे हैं, भले ही वे सिद्धांततः विहिप के पक्षधर हों । मेरा आकलन है कि भौतिक संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ते और आधुनिकता का आवरण ओढ़ते हुये ये वर्ग समाज एवं देश के लिए उतना समर्पित नहीं हैं जितना लोग दावा करते होंगे । ये वर्ग अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए ही देश के लिए कुछ करते हैं । ये अपने हितों का त्याग करने नहीं जा रहे हैं । आज स्थिति यह है इन वर्गों का प्रायः हर व्यक्ति स्वयं को अपने व्यावसायिक क्षेत्र में स्थापित करने और सुसंपन्न जीवन जीने की ललक के साथ आगे बढ़ रहा है । वे दिन अब बीत चुके हैं जब वे बच्चों की चाहत में कुछ भी खोने को तैयार हो जाते थे । लेकिन वे आज ‘हम दो हमारे दो के हिमायती भी नहीं रह गये हैं । अब तो वे अपने पेशे की सफलता के लिए और अधिकाधिक अर्थोपार्जन के लिए वच्चों तक का त्याग करने को तैयार हैं । अतः आप देख रहे होंगे कि आज उन नौजवान-नवयुवतियों की संख्या बढ़ रही है जिनके मात्र एक बच्चा है । उनका तर्क सीधा-सा है कि भले ही एक बच्चा हो, पर उसकी परवरिश और शिक्षा उच्चतम स्तर की होनी चाहिए । इतना ही नहीं, अब तो कुछ नवदम्पती एक भी बच्चा नहीं की बात सोचने लगे हैं । क्या विहिप का लक्ष इन वर्गों के लोग हैं ? कम से कम ये लोग विहिप के कहने पर ऐसा त्याग नहीं करने जा रहे हैं ।

तब किसको लक्ष करने जा रही है विहिप ? जाहिर है कि समाज के पिछड़े, अशिक्षित, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर ही विहिप का प्रभाव पड़ सकता है । यही वे लोग हैं जो धर्म के नाम पर सरलता से बहकाये जा सकते हैं । यदि आप ध्यान से देखें तो पायेंगे कि सभी धर्मावलंबियों के निशाने पर इसी तबके के लोग होते हैं । चाहे इसाई धर्मप्रचारक हों या बौद्ध धर्मगुरु सभी इस तबके को अपने प्रभाव में लाने में जुटे हैं । और धर्म के नाम पर उनसे अधिकाधिक संतान पैदा करने के लिए कहेंगे तो वह ऐसा कर सकते हैं । वस्तुतः इस वर्ग में आज भी आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे चाहे, वे हिंदू हों या मुस्लिम या कोई और । यह एक निर्विवाद तथ्य है कि समाज के संपन्न समुदायों में जनसंख्या वृद्धि की समस्या नहीं है । अपने देश में सर्वाधिक संपन्न पारसी समुदाय के लोग हैं और उनकी जनसंख्या नहीं वढ़ रही है यह उनके लिए खासी चिंता की बात बनी हुयी है । जिस भी तबके में शिक्षा-संपन्नता है वहां जनसंख्या नहीं वढ़ रही है । तो क्या विहिप का लक्ष्य समाज के सबसे निचला वर्ग है ?

इस समय इतना ही । अभी बहुत कुछ और है कहने को । बहस जारी रहेगी । – योगेन्द्र