विडंबना: उच्च अदालतों का स्वदेशी नामकरण किंतु देश का नाम इंडिया ही रहेगा

हाईकोर्टों के नाम-परिवर्तन का निर्णय

बॉम्बे एवं मद्रास उच्च न्यायालयों का नाम बदलकर क्रमशः मुम्बई तथा चेन्नै न्यायालय करने के निर्णय को केन्द्र सरकार की कैबिनेट कमिटी (काबिना समिति?) ने मंजूरी दे दी है ऐसा समाचार मीडिया में देखने-पढ़ने को मिल रहा है । समाचार के अनुसार विचार तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के नाम के स्वदेशीकरण का भी था, किंतु वह अभी शायद उस आदेश में शामिल नहीं है । समाचार कितना पुष्ट है यह मैं नहीं जानता, किंतु निराधार तो नहीं ही होना चाहिए । मैंने तत्संबंधित समाचार हिन्दी में दैनिक जागरण एवं दैनिक भाष्कर नामक अखबारों में पढ़ा । अंगरेजी अखबारों में भी उक्त समाचार उपलब्ध है । उदाहरणार्थ द हिन्दू में इस शीर्षक के साथ समाचार छपा हैः Now, Bombay, Madras and Calcutta High Courts to bear city names.

उक्त समाचार को ब्रितानी अखबार दि टेलीग्राफ ने Bombay and Madras High Courts to abandon British colonial names शीर्षक के साथ समाचार को प्रमुखता दी है । इस शीर्षक के अनुसार अदालतों के ब्रितानी उपनिवेशीय नामों को हटाकर उनको देशज यानी स्वदेशी नाम देना जनभावना के अनुरूप है । अखबार ने शिवसेना नेता अरविन्द सावन्त के हवाले से कहा है “यह तो सरकारी मुलाजिम हैं जिन्होंने समस्या पैदा की है । अदालतें भी बदलाव चाहती हैं । सरकार की नौकरशाही ऐसा करना नहीं चाहती है । इसमें अभी और पांच वर्ष लग सकते हैं ।”

नाम बदलने की परंपरा

अपने देश में राज्यों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है । अभी कुछ दिन पूर्व हरियाणा के शहर गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्रामकर दिया गया । इस बदलाव पर लोगों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त की थीं । नाम बदलाव का सरकारी तर्क था कि यह उसका प्राचीन नाम रहा है । रहा होगा, लेकिन आज तक तो वहां के लोग शहर को गुड़गांव ही कहते आ रहे हैं । नाम बदलाव का विचार किसके दिमाग की उपज थी और उसके विषय में कितनों के विचार जाने गये यह मुझे नहीं मालूम ।

एक बार मैंने जिज्ञासावश कुछ नाम-परिवर्तनों को इंटरनेट (अंतरजाल) पर खोजा था । उनमें से कुछ का उल्लेख करना समीचीन होगाः

राज्य असम (आसाम), ओडिशा (उड़ीसा), पश्चिम बंग (वैस्ट बंगाल), पुदुच्चेरी (पांडुचेरी)|

शहर कन्याकुमारी (केप कोमारिन), कोज़ीकोड (कालीकट), कोलकाता (कैलकटाध्कलकत्ता), गुवाहाटी (गौहाटी), चेन्नै (मद्रास), तिरुअनंतपुरम (त्रिवेन्द्रम), पणजी (पंजिम), पुणे (पूना), बंगलूरु (बैंगलोर), मुम्बई (बॉम्बे), विशाखापत्तनम (वालटेयर), विजयपुर (बीजापुर)| (पुराने नाम कोष्ठकों में)

परिवर्तित नामों की सूची लंबी होगी; उसे ढूंढ़ने का अधिक प्रयास मैंने नहीं किया । कई शहरों के राजमार्गों के नाम भी बदले ही गये होंगे । अपने उत्तर प्रदेश राज्य के हाल ये हैं एक सरकार किसी जिले का पसंदीदा नाम चुनती है तो दूसरी सरकार उसे बदलने की कोशिश करती है । संस्थानों के साथ भी यह खिलवाड़ होता रहता है ।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस दल की नीति रही थी (अभी भी होगी) कि हर नयी संस्था, मार्ग, पुल, आदि का नाम यथासंभव प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एवं उनके वंशजों के नाम पर होवे, गोया कि यह देश उस एकल परिवार की बपौती हो । जनोपयोगी योजनाओं के साथ भी यही किया गया । अब मौजूदा सरकार यथासंभव उन्हें बदलने की कोशिश कर रही है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । मुझे याद आता है कि कभी दिल्ली के कनॉट सर्किल एवं कनॉट प्लेस को इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के नाम पर नया नाम दिया गया था । वे नाम किसी को याद भी हैं इस पर मुझे शंका है । दिल्ली जाइए और उन्हीं पुराने नामों को लोकमुख से सुनिए ।

नाम-परिवर्तनो की आम जनों में कितनी स्वीकार्यता है इस पर मुझे शंका है । यह देश की आवश्यकता है या महज वोट के खातिर जनता को लुभाने की कोशिश ? या सामाजिक सक्रियता के शौकीन और “राष्ट्रीयता” की भावना से उत्साहित लोगों के मांग का परिणाम ?

अंगरेजी का वर्चस्व ठीक, अंगरेजी नाम नहीं !

वापस बात उच्च न्यायालयों के नाम परिवर्तन के मुद्दे पर । अधिकतर लोग अदालतों को न्यायालय न कहकर कोर्ट ही कहते हैं यह मेरा मानना है । बहुत हुआ तो उन्हें अदालत कह दिया । न्यायालय तो आम बोलचाल में कम ही लोग कहते है । आज के अंगरेजी स्कूलों में पढ़े युवाओं को तो यह शब्द मालूम न हो तो आश्चर्य नहीं होगा ।

नाम बदलने का विचार राजनेताओं से शुरु होता है और जनभावनाओं के उभार के रूप में आगे बढ़ता है । बदलाव के पीछे बहुत गंभीर कारण रहते हों और बदलाव की उपयोगिता को आंका जाता हो ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जैसा आरंभ में उल्लिखित द टेलीग्राफ अखबार में कहा गया है नाम-परिवर्तन के पीछे का सशक्त तर्क यह है कि अंगरेज उपनिवेश काल की पहचान रखने वाले नामों का देशीकरण होना चाहिए । मैं स्वयं इसका पक्षधर हूं किंतु इस कार्य में विसंगति कितनी है इस पर विचार किए बिना नहीं ।

गुड़ खाये और गुलगुले से परहेज

(पाठकवृन्द क्षमा करें मुझे मुहावरा ठीक-से याद नहीं ।) अंगरेजी विरासत के तौर पर जो नाम देश में प्रचलित हैं उनको देशज नामों से संबोधित किया जाए यह बात कहने-सुनने में अच्छी लगती है । परंतु इस कार्य में मुझे विसंगति के दर्शन होते हैं । जिस देश में पग-पग पर अंगरेजी का साक्षत्कार होता हो, प्रायः सभी दस्तावेजी कार्य अंगरेजी में किए जाते हों, जिस देश का संविधान अंगरेजी में हो, उच्चतम न्यायालय का कार्य अंगरेजी में होता हो, अंगरेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही हो, देशज भाषाओं के विद्यालय बंद होने के कगार पर हों, वहां अंगरेजी नामों को बदलने का औचित्य ही क्या है । अब तो हालात यह हैं कि हिन्दीभाषी हिन्दी में अपनी बात नहीं कह सकते बिना अंगरेजी शब्दों के प्रयोग के । जब देशवासियों को अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं तो अंगरेजी नामों से परहेज क्यों ?

यह देश है ही विचित्र । यदि नाम ही बदलना है तो सबसे पहले देश का नाम बदला जाना चाहिए । इस देश का नाम “भारत” होना चाहिए या “इंडिया”?  इंडिया नाम अंगरेजों का दिया हुआ है न कि इस देश का मौलिक या प्राचीन नाम है । विष्णुपुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को भारतवर्ष या भारत कहा गया है । तब हम इसे भारत क्यों नहीं कहते ? सब जगह इंडिया ही क्यों सुनने को मिलता है ? यहां तक कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी भी अपने नारे इंडिया के नाम ही गढ़ते है, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, आदि-आदि । ऐसी स्थिति में अदालतों और अन्य संस्थाओं के अंगरेजी नाम हटाने का आडंबर क्यों ?

पहले इस देश का नाम “भारत” किया जाना चाहिए तब अन्य नाम बदलने का तुक बनता है । इस बारे में मेरे अपने तर्क हैं और प्राचीन ग्रंथों का आधार भी, जिनकी चर्चा मैंने अपने ब्लॉग (दिनांक 15 जून 2016) में की है ।

अदालतों के ब्रितानी नाम बदल दो किंतु देश को इंडिया ही कहते रहो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है । – योगेन्द्र जोशी

और प्रसंग से कुछ हटकर   

यह देश भारत, जिसे विदेशी ही नहीं देशवासी भी इंडिया नाम से संबोधित करना पसंद करते हैं, विविधताओं, विचित्रताओं, विसंगतियों और विरोधाभासों का देश है । यहां इतना कुछ एक साथ देखने को मिल सकता है जो विश्व के किसी अन्य देश में संभव नहीं लगता, न चीन में और न ही संयुक्त राज्य अमरीका  में; छोटे देशों में तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती । अतः मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि अपने आप में अद्भुत, अद्वितीय, अनूठे देश में जन्मा हूं मैं, जिसे प्राचीन मनीषियों ने भारतवर्ष नाम दिया था और जिस नाम से मैं स्वयं इसे संबोधित करना चाहूंगा । – योगेन्द्र जोशी

असहिष्णुता पर निरर्थक बहस

अहिष्णुता मानव समाज के लिए कोई नयी बात नहीं है। यह तो मानव स्वभाव का अपरिहार्य हिस्सा रही है। कोई समाज और कोई काल नहीं रहा जब असहिष्णूता नहीं रही है। उसके स्वरूप और मात्रा में अवश्य ही उतार-चढ़ाव होते रहे हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों का जिक्र मिलता है जो उसी असहिष्णुता का द्योतक है। सभ्य समाज में इस पर काफी हद तक आत्मनियंत्रण रखते आये हैं लोग। फिर भी कुछ अपवाद बने गिने-चुने लोगों की दूसरे लोगों के प्रति घृणा असहिष्णुता के रूप में यदा-कदा प्रदर्शित हो ही जाती है। जिस देश में 120-25 करोड़ लोग रहते हों वहां ऐसे सिरफिरे हजारों में हों तो आश्चर्य नहीं।

इधर अहिष्णुता की बात जिस तरह की जा रही है वह हैरान करने वाली है, गोया कि उसमें अप्रत्याशित तौर पर इजाफा हो गया हो। कितनी नयी घटनाएं हो गयी हैं कि कहा जाये कि ऐसा अनर्थ पहले से नहीं होता आया है? बेमतलब की इस बहस में लोगों को कूदते देख मुझे समझ नहीं आता कि ये बुद्धिजीवी हैं या उधमी जन।

मुझे अब, इन दो-चार दिनों में, लगने लगा है कि मोदी – मेरी दृष्टि में बेचारे मोदी – को निशाना बना रहे हैं ये सब, मानो कि सब मोदी ही करवा रहा है। दोष देना ही है तो राज्य सरकारों को भी दोष क्यों नहीं देते जहां वारदातें होती हैं? गुजरात में हुई 2002 की घटना ने बेचारे मोदी को ऐसा बदनाम कर दिया कि अब वे ही हर असामाजिक घटना के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

ठीक है; पर मोदी से क्या उम्मीद कर रहे हैं ये लोग? साफ-साफ बतायें कि मोदी ऐसी बातों पर नियंत्रण कैसे करें? क्या वे रोज चीखते हुए कहें कि बस अब ये सब बंद करो? क्या आपराधिक सोच वाले को उपदेश देकर रोका जा सकता है? इस देश में तो ऐसे उपदेशकों की सदा से भरमार रही है, फिर भी क्या लोग सुधर पाये हैं?

आप अपराध कर चुके व्यक्ति को सजा दे सकते है, किंतु उस व्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं जो मन में अपराध का इरादा पाले बैठा हो – मंशा जो उजागर न हुई हो? क्या आप मानव-बम बनने को तैयार व्यक्ति को अपना इरादा छोड़ने को कह सकते हैं? इस देश से आईएसआईएस में शामिल होने गये युवाओं को अग्रिम तौर पर पहचान सके आप?

मुझे लगने लगा है कि कुछ बुद्धिजीवी मोदीफोबिया से ग्रस्त हैं और उन्हें केवल मोदी और उनकी टीम के लोगों में ही दोष दिखते हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक लेखक ने कह दिया था कि मोदी प्र.मं. बने तो वे देश छोड़ देंगे। दुराग्रह से पीड़ित व्यक्ति के बोल सहिष्णुता के द्योतक हैं क्या? क्या यह माना जाये कि वे सब विकृत सोच के लोग थे जिन्होंने मोदी को कुर्सी पर पहुंचाया, और यह कि केवल उक्त लेखक महोदय ऐसी विद्वता रखते थे कि किसी की योग्यता का आकलन केवल वही सही-सही कर सक्ते हैं? बाद में वे बोले कि वे भावुकतावश वह सब कह बैठे। क्या असहिष्णुता की जोर-शोर से की जा रही बात भी उसी भावुकता का द्योतक नहीं हो सकता? क्या जो बातें कही जा रही  हैं वे वस्तुनिष्ठ है या महज वैयक्तिक भावुकताजनित?

इन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि आये दिन देश में तमाम असामाजिक घटनाएं होती आ रही हैं। कही कोई किसी का कत्ल कर दे रहा है शत्रुतावश या लूटपाट या रंगदारी में, कहीं अपहरण की घटनाएं हो रही हैं, आये दिन स्त्रीजाति का दुष्कर्म हो रहा है, कहीं पुलिस ज्यादती में लोग प्राण खो रहे हैं, कहीं कोई दबंग कमजोर को दबा रहा है, राह चलते छोटी-मोटी बात पर ही लोगों की जान ले ली जा रही है, आदि-आदि। लेकिन ये सब घटनाएं उनको सह्य नजर आती हैं; किंतु दो-तीन अन्य अप्रिय घटनाएं हो गयीं तो देश असहिष्णु हो गया। कमाल करते हैं ये बुद्धिजीवी।

और समाचार माध्यमों का रवैया देखिए कि किसी घटना की चर्चा घंटों या दिनों तक होती है और किसी घटना का जिक्र तक नहीं होता है। लगता है कि वे चुन-चुन कर जनता के सामने पेश करते हैं घटनाओं को। ऐसी पत्रकारिता को निष्पक्ष कहें क्या? पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर तो पेड-न्यूज़ का आरोप भी लगता आया है। देश के सामने जो गंभीर समस्याएं हैं उन पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं ये लोग? पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर बहस हो रही है। यह विश्व के समक्ष गंभीर समस्या है। इस मुद्दे पर अच्छी-खासी कारगर बहस क्यों नहीं हो रही है? मुद्दे एक नहीं अनेक मिलेंगे, पर सनसनीखेज समाचार नहीं बनेंगे। मीडिया उनमें दिलचस्पी नहीं लेता है।

जब कोई बात हिन्दुओं की मान्यताओं के विरुद्ध की जाये तो उसे चुपचाप सुन लिया जाना चाहिए ऐसा सहिष्णुता के पक्षधर मानते हैं; किंतु जब अन्य धर्मावलंबियों के मान्यताओं के विरुद्ध हो तो उसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।

देश के सामने अनेकों गंभीर समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं, यथा अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, करोड़ों लोगों की गरीबी, 45-50% बच्चों का कुपोषण, बदहाल सरकारी स्कूल, अस्पताल जहां गरीबों को इलाज नसीब नहीं होता, आदि-आदि। बुद्धिजीवियों को इन पर बहस करनी चाहिए और उसके लिए अभियान छेड़ना चाहिए। किंतु उनका पेट तो भरा रहता है। उन्हें इन समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता है, उनके काम तो हो ही जाते हैं। उनकी समस्या केवल असुरक्षा है जिसका सामना उन्हें करना पड़ सकता है। लगता है कि मामला निहित स्वार्थ से प्रेरित है।

कुछ भी हो वे बतायें कि अगर वे मोदी की जगह होते तो कौन-सा जादुई डंडा घुमाते कि सर्वत्र सहिष्णुता का राज हो जाता? अच्छा होगा कि वे उस रास्ते की सलाह मोदी को दें जिसे वे खुद अपनाते। सुस्पष्ट कार्ययोजना की प्रस्तुति होनी चाहिए। कोई अपराध न कर सके यह कैसे हो यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए । महज ये नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए जैसी बातों से काम नहीं चलेगा। – योगेन्द्र जोशी

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सावधान, महाराजाधिराज पधार रहे हैं! तीन बार स्थगित हो चुका प्रधानमंत्री का वाराणसी आगमन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बीते 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र (अर्थात मेरे नगर) वाराणसी आने वाले थे । ऐन वक्त पर उनका आगमन निरस्त हो गया । कारण बताया जाता है कि रेलवे की औद्यागिक संस्था डी.एल.डब्ल्यू. (डीजल लोकोमोटिव वर्क्स) यानी डि.रे.का. (डीजल रेल कारखाना) में मोदीजी के संबोधन के लिए बनाए गए विशाल पंडाल की सजावट में लगे किसी श्रमिक की दुर्घटनावश मृत्यु हो गई । शायद यह वास्तविक कारण रहा हो । कुछ ऐसी ही एक दुर्घटना दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की रैली में पहले कभी हुई थी । रैली चलती रही और बाद में केजरीवाल की काफी आलोचना हुई थी । ऐसे मातमी माहौल में भाषणबाजी करने पर मोदीजी की भी आलोचना होती अवश्य । मोदी जी के दौरों के बारे में जानकारी यहां और यहां प्राप्य है ।

मोदी जी विगत कुछ महीनों से वाराणसी नहीं आ पा रहे हैं । उन्हें विगत 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी आना था । इस बार प्रस्तावित उनके विविध कार्यक्रमों में से एक था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) चिकित्सा संस्थान के नियंत्रण में चलने वाले ‘ट्रॉमा सेंटर’ का उद्घाटन । आधुनिक एवं उन्नत दर्जे का यह ‘अभिघात केंद्र’ पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने किस्म की प्रथम चिकित्सकीय व्यवस्था है । मोदी जी को अपने गोद लिए गांव, जयापुर, भी जाना था । संयोग कहिए या दुर्योग, कि उक्त तारीख की पूर्व रात्रि जो बारिश आंरभ हुई वह अगले दिन (16 तारीख) डेड़-दो बजे तक चलती रही । इस बारिश की बजह से डीएलडब्ल्यु परिसर में बनाये गए विशाल पंडाल की स्थिति दयनीय हो गई । मोदी जी को सुनने के लिए कीचड़मय पंडाल के नीचे भीड जुट भी पायेगी इसमें शंका होने के कारण मोदी जी का वाराणसी दौरा निरस्त कर दिया गया । लेकिन कहा यही जाता है पानी से भीगे पंडाल में बिजली का कंरेंट लगने से वहां कार्य कर रहे एक मजदूर की मृत्यु हो गयी । असली कारण क्या रहा होगा यह प्रशासन ही बता सकती है ।

असल में मोदी जी को पिछले माह 28 जून को वाराणसी आना था । तब भी ऐन मौके पर अतिवृष्टि के कारएा उनका वाराणसी दौरा रद किया गया था । इस माह के 16 जुलाई का दौरा उसी रद दौरे के ऐवज में था, और वह भी फलित नहीं हो सका । अब फिर भविष्य में किसी दिन उनके आने का कार्यक्रम होगा । इस पावस ऋतु में उनका भावी दौरा फिर से निरस्त हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । दोनों ही तारीखों पर अतिवृष्टि के कारण उनके दौरे निरस्त करने पड़े थे । संयोग देखिए उक्त तारीखों के आगे-पीछे कोई खास बारिश नहीं हुई । असल में 16 तारीख की दोपहर बारह-एक बजे तक पानी बरसना बंद हो चुका था, लेकिन तब तक उनका कार्यक्रम निरस्त घोषित हो चुका था । कल 22 तारीख थी और मेरे इलाके में 16 के बाद तब तक  पानी ही नहीं बरसा । शहर में हो सकता है कहीं थोड़े-बहुत छीटे पड़े होंगे ।

यह भी उल्लेखनीय है कि 12 अक्टूबर 2014 को भी मोदी जी का दौरा होना था । तब देश के पूर्वी समुद्र तट पर आए हुदहुद तूफान के कारण यहां का मौसम खराब हो गया था और उनका आगमन नहीं हो पाया । इस प्रकार हाल में उनके तीन प्रस्तावित वाराणसी-दौरे निरस्त हुए । इस अंतराल में वे 11 नवंबर एवं 25 दिसंबर को वाराणसी आए थे लेकिन तब तक बी.एच.यू. स्थित अभिघात केंद्र (ट्रॉमा सेंटर) का कार्य पूरा नहीं हो सका था ।

अखबार में छपी खबर के अनुसार जिन निरस्त दौरों का जिक्र ऊपर किमोदी के वाराणसी दौरेया गया है उन पर 30-35 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं । बात सही होनी चाहिए । कहा जा रहा है कि डी.एल.डब्ल्यू में विशाल पंडाल खड़ा करने में 9 करोड़ की लागत आई । उस पंडाल में विदेशी वाटरप्रूफ कनात-शामियाना इस्तेमाल हुआ था ऐसा सुना जाता है ।

मैं समझ नहीं पाता कि मोदी जी के दौरे पर इतनी विशाल राशि खर्चने की क्यों आवश्यकता है । यह सब उस मोदी जी के लिए जो दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी देखी है, वे गरीब परिवार में पले-बढ़े हैं । क्या बचपन की गरीबी के कारण अब वे शानोशौकत, दिखावा, तामझाम के शौकीन हो चले हैं । उनकी सुरक्षा मात्र पर तो यह राशि खर्च नहीं हो रही होगी ऐसा मेरा सोचना है । अगर सुरक्षा का इतना बड़ा सवाल है तो उन्हें वाराणसी आना ही नहीं चाहिए । बरसात के मौसम में जलजमाव होना सामान्य बात है । ऐसे में यह दौरा बरसात में रखा भी नहीं जाना चाहिए था ।

गरीबी और गरीबों की बात करने वाले मोदी जी को समझना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि में कई गरीबों का भला हो सकता है । उन्होंने अपना दौरा सादगी के संदेश के साथ संपन्न करना चाहिए था । लेकिन अब वे गरीब कहां जो उसका दर्द समझें ।

मोदी जी के दौरे पर धन का अपव्यय तो होता ही है, साथ में आम जनता को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं । दिक्कतों का अनुभव स्वयं मुझे हुआ है । बीते नवंबर में मेरे एक मित्र सपत्नीक भोपाल से आए थे । संयोग से उनके रेलगाड़ी से लौटने की तारीख वही थी जब मोदी जी का यहां कार्यक्रम चल रहा था । मेरे घर के पास के मुख्य मार्ग, बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. सड़क, पर वाहनों का आवागमन ठप था । आटोरिक्शा की दिक्कत हो सकती है इसका अंदाजा मुझे था । मैंने प्रातःकाल ही पास के चौराहे पर जाकर आटोरिक्शा वालों से समाधान पुछा था । तब उन्होंने बताया कि मुख्य मार्ग पर तो वाहन खड़े मिलेंगे नहीं, परंतु गलीकूचों के भीतर जरूर खड़े रहेंगे और आपको कोई न कोई मिल ही जाएगा । उस दिन स्टेशन जाने के लिए मैंने कोई छेड़-दो घंटे का अतिरिक्त समय निर्धारित कर रखा था । जब समय आने पर मैंने आटोरिक्शे खोजे जो कहीं कोई नहीं दिखा । इससे तनाव बढ़ा कि 10 कि.मी. दूर स्टेशन कैसे जाया जाए । तभी ध्यान में आया कि मेरे पासपड़ोस में रहने वाले और आटोट्रॉली से सामान ढोने का धंधा करने वाले कुछ मदद कर सकेंगे । संयोग से उस समय एक नौजवान घर पर मिल गया । उसकी मदद से मित्र को गली-कूचों से होते हुए स्टेशन तक छोड़ पाना संभव हो सका ।

दूसरा अनुभव बीते दिसंबर माह के 25 तारीख का है जब मेरे बेटा-बहू विदेश से वाराणसी आए हुए थे । वे मात्र 5-6 दिन के संक्षिप्त अंतराल के लिए यहां आए थे और अपना कार्यक्रम पहले से तय किए हुए थे । उस दिन आटोरिक्शा से उन्हें कहीं निकलना था । वाहन न मिलने के कारण उन्हें पैदल ही गंतव्य तक जाना पड़ा ।

और तीसरा अनुभव बीते 15 तारीख का है जब मोदी के 16 तारीख के आगमन की तैयारी चल रही थी । मुझे उस दिन कार्यवशात् लंका जाना पड़ा था । बी.एच.यू. प्रवेशद्वार के आसपास का इलाका लंका कहलाता है । यहीं से बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. मार्ग आरंभ होता है । मैं लंका पहुंच तो गया, किंतु कालांतर में जब लौटने लगा तो देखा कि विश्वविद्यालय प्रवेशद्वार के आसपास जबरदस्त जाम लगा है । जाम की समस्या तो वाराणसी में रहती ही है, लेकिन यह जाम पुलिस के 20-30 जीपों के कारण था जो अगले दिन मोदी जी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के चक्कर में नगरवासियों के लिए आफत पैदा किए हुए थे । गनीमत थी कि मैं साइकिल से गया था । उस जाम से साइकिल घसीटते हुए अगल-अगल के गली-कूचों से होकर मैं किसी तरह बी.एच.यू. परिसर में पहुंचा और वहां से लंबा रास्ता लेते हुए घर पहुंचा । लंका से आने में सामान्यतः जहां दसएक मिनट लगते हैं वहां इस बार आधे घंटे से अधिक का समय मुझे लगा ।

लोग लोकतंत्र के प्रशंसा-गीत गाते रहते हैं कि इसमें सभी नागरिक बराबर होते हैं । अवश्य ही मतदान के समय सभी बराबर होते हैं । सभी लाइन में लगते हैं और नंबर आने पर ही मत डालते हैं । मेरी जानकारी में विशिष्ट/अतिविशिष्ट जन भी उसी लाइन में लगते हैं । किंतु वोट डालने के बाद गैरबराबरी वापस लौट आती है । चुने गये राजनेता आम आदमी नहीं रह जाते हैं । उनके लिए सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ विशेष होता है जिनको पाने का सपना भी आम आदमी नहीं देख सकता ।

मैं अपने देश के लोकतंत्र को निर्वाचित राजशाही कहता हूं । लंबे अरसे से चले आ रही राजशाही विश्व में अब कम ही रह गए हैं । लगभग सभी प्रतीकात्मक रह गए हैं जिसमें राजा/रानी  की सक्रियता नहीं के बराबर होती है । वे सामान्यतः वंशानुगत होते थे, अर्थात राजा/रानी के बाद उनके बेटे-बेटियां सत्ता संभालती थीं/हैं । हमारे देश में ऐसा राजतंत्र अब रहा नहीं । लेकिन इस देश में लोकतंत्र ने जो स्वरूप धारण किया हुआ है वह राजशाही का ही बदला स्वरूप है, नया अवतार है । इस नये राजतंत्र में राजा जनता के मतों के आधार पर चुना जाता है, एक बार में केवल 5 साल के लिए । जो चुनकर गद्दी हासिल कर लेता है वह राजा हो जाता है विशेष अधिकारों से सुसंपन्न । एक प्रकार से देखा जाए तो वह मनमरजी से राजकाज कर सकता है । पूरी व्यवस्था उसके हाथ में होती है । अगर वह अपनी पुलिस को कहे कि अपराधी को पकड़ो तो वह पकड़ेगी, अगर कहे कि उसे छूना मत तो नहीं छुएगी । वह निरपराध को जेल में डाल सकता है, जिसे यह भ्रम हो सकता है कि कानून उसे बचाएगा, यह भूलते हुए कि पूरा शासकीय तंत्र तो लोकतंत्र के उस राजा के हाथ में रहेगा । उसे निरपराध सिद्ध कौन करेगा ? उस 5 साल में राजा बहुत कुछ कर सकता है, जो चाहे वह । प्रशासनिक तंत्र इस राजा के चेहरे के भाव पढ़कर कार्य करता है । पुलिस-प्रशासन जनता की समस्याओं की चिंता कम राजा की चिंता अधिक करता है ।

सरकार चलाने वालों को मैं तीन वर्गों में बांटता हूंः

(1) प्रथम महाराजाधिराज जिसमें राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री शामिल किए जा सकते हैं ।

(2) द्वितीय महाराजा जिसमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री सरीखे राजनेता सम्मिलित किए जा सकते हैं ।

(3) तृतीय वर्ग राजाओं का जिसमें मंत्रियों को गिना जा सकता है ।

अन्य जनप्रतिनिधियों में से कुछ को मैं दरवारी कहता हूं जो राजा की कृपा पाने में प्रयासरत रहते हैं । उन्हें राजा का साथ देना होता है, बदले में राजा उन्हें विविध तरीकों से उपकृत करता है । उनके लिए राजा का विरोध करना वर्जित रहता है । जो दरवारी नहीं बन पाते हैं उन्हें अगली बार के राजा की प्रतीक्षा रहती है ।

इनको मैं राजा-महाराजा क्यों कहता हूं ? इसलिए कि वे राजा-महाराजाओं वाली सुख-सुविधाओं के हकदार होते हैं । सुरक्षा के नाम पर इनके लिए इंतजामात देखिए । पुलिसबल की पूरी ताकत इनके लिए तैनात रहती है । मरणासन्न मरीज का एंबुलेंस तक उनके रास्ते में नहीं आ सकता है । उनके रोगों के इलाज के लिए सर्वोत्तम अस्पताल/चिकित्सक रातदिन उपलब्ध रहते हैं । इलाज भी मुफ्त में । वे जब चाहें विदेश जा सकते हैं, अपनी गांठ का धेला खर्च किए बिना । मुफ्त का मकान, विजली-पानी चौबीसों घंटे । लोकतंत्र के ऐसे राजा-महाराजा जब अपनी दौरे पर निकलते हैं तो रातोंरात सड़कें समतल हो जाती हैं, सड़कों से कूड़ा गायब हो जाता है, बदबदाती नालियां साफ हो जाती है, और न जाने क्या-क्या नहीं हो जाता है । एक व्यक्ति के लिए इतना सब प्रजा के लिए क्यों नहीं ? आम आदमी सोच सकता है ऐसे विशेषाधिकार की ? इन्हें राजा न कहूं तो क्या कहूं ?

ऐसी राजकीय व्यवस्था में मोदी जी के वाराणसी आगमन की तैयारी पर करोड़ो खर्च हो जाए तो किसे कोफ्त होगी । कहते है डी.एल.डब्ल्यू के क्रीडांगन (स्पोर्ट्स ग्राउंड) की जमीन पंडाल की बजह से खराब हालत में हैं । सरकारी धन की बरबादी से इस देश में किसी को कचोटन नहीं होती है; अपनी जेब से थोड़े ही जा रहा हैं !

जीवन के आरंभ में गरीबी झेल चुके लोग जब कुरसी पर बैठते हैं तो वे अपने अतीत की चर्चा वोट बटोरने के लिए करते हैं,  न कि अतीत को याद करके जनता की सेवा के लिए । बीते समय की अपनी गरीबी को भी वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और जनता उनके सम्मोहन में फंस जाती है । क्या करें, कुरसी की तासीर ही कुछ ऐसी होती है ! – योगेन्द्र जोशी

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निर्वाचन आयोग की दोषपूर्ण कार्यशैली और दोहरे मतदान की संभावना

[इस आलेख में उल्लिखित चुनाव संबंधी अनुभव का कथा रूपांतर अन्यत्र प्रस्तुत किया गया है ।]

हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में वाराणसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यहां से भाजपा के बहुचर्चित प्रत्याशी और देश के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे और उनको चुनौती दे रहे थे आप पार्टी के नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के अजय राय, सपा के कैलाश चौरसिया, तथा बसपा के विजय जायसवाल । वैसे मैदान में कुल 42प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे जिनमें अधिकतर वे थे जिनका नाम पहले कभी न सुना गया था और न चुनाव के बाद ही सुना गया । अज्ञात श्रेणी के ऐसे प्रत्याशी चुनाव क्यों लड़ते होंगे यह मेरी समझ मैं कभी नहीं आया । ऐसे प्रत्याशियों का योगदान चुनाव प्रक्रिया को पेचीदा बनाने के अलावा कुछ भी रचनात्मक रहता होगा यह मैं नहीं सोच सकता । वाराणसी में प्रत्याशियों की इतनी बड़ी संख्या के लिए हर निर्वाचन स्थल पर तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था करनी पड़ी थी । ज्ञातव्य है कि एक वोटिंग मशीन में केवल 16बटनों का प्रावधान रहता है । मैं समझता हूं कि  मतदाताओं को मशीन पर अपने मनपसंद प्रत्याशी का नाम/चुनाव-चिह्न खोजने में अवश्य दिक्कत हुई होगी ।

सुना जाता है कि चेन्नै में भी 42प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे । अवश्य ही ऐसे “फिजूल”के प्रत्याशी चुनाव की गंभीरता का सम्मान नहीं करते और संविधान द्वारा प्रदत्त चुनाव लड़ने की आजादी का मखौल उड़ाते हैं । आयोग और देश की विधायिका को चाहिए कि ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोके जाने का रास्ता खोजें, अथवा उन्हें गंभीरता बरतने के लिए प्रेरित करें ।

इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र का रुतवा हासिल कर चुके वाराणसी का मैं तथा मेरी पत्नी दशकों से मतदाता हैं । हम दोनों लंबे अर्से से अपने मतदान का प्रयोग करते आ रहे हैं । पिछले बारह-तेरह वर्षों से मैंने किसी के भी पक्ष में मतदान न करने की नीति अपना रखी है । (पत्नी अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेती हैं !) मेरा मानना है कि अपने लोकतंत्र में छा चुके तमाम दोषों के लिए अपनी मौजूदा राजनैतिक जमात ही जिम्मेदार है । आप कभी एक को तो कभी दूसरे को मत देकर चुने गए जनप्रतिनिधि तो बदल सकते हैं, किंतु राजनैतिक बिरादरी का स्वरूप नहीं बदल सकते हैं । इसलिए चाहे मोदी आवें, या राहुल अथवा केजरीवाल, वस्तुस्थिति उल्लेखनीय तरीके से बदलने वाली नहीं है । मैं आमूलचूल बदलाव का हिमायती हूं । मुझे “नोटा”बटन में ही उम्मीद दिखती है, इसलिए उसी को इस्तेमाल करता हूं । अब तो नोटा बटन है, पहले उसके बदले एक फार्म (फॉर्म 17ए आयोग के नियम 49-ओ के अंतर्गत) भरना होता था ।

दो-दो मतदाता सूचियां

चुनाव में भाग लेने के लिए मतदान केंद्र पर पहुंचने पर पता चला कि वहां दो परस्पर भिन्न मतदाता सूचियों के अनुसार मतदान हो रहा है । हमें यह देख हैरानी हुई कि एक तरफ इन सूचियों से कुछ मतदाताओं के नाम गायब थे तो दूसरी तरफ कुछ के नाम दोनों में ही मौजूद थे । मतदान की प्रक्रिया दो कमरों संपन्न की जा रही थी – पहले कमरे में एक सूची तो दूसरे में  अगली सूची के अनुसार । साफ जाहिर में कि कुछ मतदाता दो बार मत दे सकते थे, बशर्ते कि वे उंगली पर लगाए गये निशान को मिटा सकें । हम दोनों का ही नाम सही फोटो के साथ दोनों सूचियों में मौजूद थे ।

मैंने तो पहली सूची के अनुसार मत दे दिया, लेकिन मेरी पत्नी को यह कहकर संबंधित मतकर्मियों ने लौटा दिया कि वे कालोनी की मतदाता होती थीं लेकिन स्थान छोड़ देने के कारण अब वह मतदाता नहीं रहीं । इसके लिए उन्होंने “विलोपित”श्रेणी का जिक्र किया । खैर पत्नी महोदया लाइन में लगकर दूसरे कमरे में मतदान कर आईं जहां मैं भी जा सकता था ।

यह हमारी समझ से परे था कि क्यों मेरी पत्नी “विलोपित”हो गईं जब कि मैं “विलोपित”नहीं हुआ । इससे अधिक अहम सवाल यह है कि हूबहू एक ही विवरण के साथ दो सूचियां कैसे बनाई गई थीं और क्यों इस्तेमाल हो रही थीं । मैं स्वयं देख चुका था कि मुझसे संबंधित विवरण दोनों में एकसमान था ।

दोहरा मतदान

मैं कह चुका हूं कि एक ही मतदाता का नाम दो-दो सूचियों में मौजूद होने पर दोहरे मतदान की गुंजाइश बनती है । इस बात का एहसास मुझे दूसरे दिन एक युवक से भेंट होने पर हुआ । उसने मुझे बताया कि वह एक बार पहली सूची के अनुसार वोट डालकर घर लौटा; पपीते की चेप से उसने उंगली पर लगा निशान मिटाया; और फिर दूसरी सूची के अनुसार वोट डाल आया । यह भी बता दूं कि वह किसी और मतदान केंद्र का मतदाता था । इसका मतलब यह हुआ कि दो-दो (या अधिक?) सूचियों का प्रयोग कई मतदान केंद्रों पर हो रहा था ।

मुझे शंका है कि चुनाव उतने साफ-सुथरे नहीं होते है जितना दावा किया जाता है । कहीं मतदाताओं के नाम ही गायब रहते हैं तो कहीं दोहरा मतदान भी कुछ लोग कर लेते हैं । निर्वाचन आयोग को इस संदर्भ में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है । – योगेन्द्र जोशी

भारतीय राजनीति में माफी मांगने का नाटक

मौजूदा भारतीय राजनीति में सब कुछ जायज है और सब कुछ क्षम्य । आप चौराहे पर जाकर किसी को झूठे ही बदनाम कर आएं और फिर उस व्यक्ति से माफी मांग लें तो आपका अपराध माफ । ऐसा लगता है कि माफी मांगने से किया गया अपराध ‘न किया हुआ’ हो जाता है । माफी के रास्ते बदनाम करने का काम भी आप कर लेते हैं और साथ में बिना किसी घाटे के छूट भी जाते हैं । यह सब ऐसा ही है जैसे कि आप पापकर्म भी करिए और गंगास्नान करके उस पाप से मुक्त भी हो जाइए । वाह क्या नाटकबाजी है, निहायत बेशर्मी के साथ ।

मैं राजनेताओं के माफी मांगने को एक मजाक से अधिक कुछ नहीं समझता । मुझे उस व्यक्ति पर तरस आता है जिसके विरुद्ध कुछ कहा जाता है और माफी मांगे जाने पर संतुष्ट हो जाता है । ऐसा करना यह दर्शाता है कि वह व्यक्ति भी कही गई बातों को गंभीरता से नहीं लेता है । लगता है कि माफी मांगे जाने से उसके अहंभाव को तसल्ली हो जाती है, जिसके आगे उसे कुछ नहीं चाहिए ।

मैं मानता हूं कि माफी मांगने और माफी पा जाने की जो परंपरा हाल में चली है उसने राजनेताओं में यह भावना भर दी है कि ऊलजलूल, निरंर्थक, अप्रासंगिक, बकबास कर लो और फिर जरूरत पडने पर माफी भी मांग लो । उनका उल्टासीधा बोलना भी हो जाए और बदले में उनके किरुद्ध कुछ काररवाई भी न होने पाये । अगर मामलों को गंभीरता से लिया जा रहा होता तो राजनीति में लोग अपनी जबान पर लगाम लगाने को मजबूर होते । लेकिन ऐसा होता नहीं ।

मेरा मत है कि किसी का माफी मांगना तभी कोई अर्थ रखता है जब उसे इस बात का अहसास हो कि उसने वाकई गलत कार्य किया है, जब उसे अपने किए पर आत्मग्लानि हो, जब उसे घटना पर शर्मिदंगी अनुभव हो, जब उसके मन मैं यह संकल्पभाव जगे कि उसके हाथों ऐसा अनुचित कर्म फिर न होने पाए । ऐसा व्यक्ति ही क्षमा का हकदार होता है । धर्मशास्त्रों के अनुसार ऐसा व्यक्ति ही पापमुक्त होता है । लेकिन हमारी राजनीति में माफी मांगने वाले के चेहरे पर आत्मग्लानि के भाव नहीं दिखते । वह कुछ इस अंदाज में माफी मांगता है कि जैसे कहना चाहता हो, “तू कह रहा है न, चल माफी मांग लेता हूं । तुझे भी तसल्ली हो जाएगी । मेरे बाप क्या जाता है !”

ऐसे में माफी मांगना महज एक रस्मअदायगी बन के रह जाती है । व्यक्ति के मन में जो दुर्भावना रहती है और उसके आचरण में जो दुर्जनता छिपी होती है वह ऐसी माफी के बाद भी यथावत बनी रहती हैं ।

क्षमायाचना का आत्मग्लानि के भाव से गहन संबंध है इस तथ्य को राजनेता नहीं तो कम से कम आम आदमी तो समझे । – योगेन्द्र जोशी

 

 

“सचिन, सचिन, सचिन …” का जाप अंततः खत्म हुआ भारत रत्न के राष्ट्रीय सम्मान के साथ

Sachin & Rao   सर्वत्र छाया सचिनगुणगान !

पिछले कुछ दिनों से टेलिविजन समाचार चैनलों, विशेषतः हिन्दी चैनलों, पर और कई अखबारों में सचिन छाए हुए हैं । जिधर देखो सचिन की महानता का गुणगान चल रहा है, और उनको देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान “भारत रत्न” दिए जाने की मांग जोर-शोर से उठती रही है ।

जिधर देखो उधर “सचिन” , “सचिन”, “सचिन” …। “क्रिकेट के भगवान सचिन”, “क्रिकेट के महानायक सचिन”, “सचिन, गॉड ऑफ क्रिकेट ”, आदि-आदि । आगे “सचिन”, पीछे “सचिन”, अगल “सचिन”, बगल “सचिन”। बस केवल “सचिन”। मैं समाचार चैनलों को खोजता रहा इस उम्मीद के साथ कि कहीं कोई सार्थक समाचार प्रसारित कर रहा हो जिसे देखूं-सुनूं । प्रायः निराश ही रहा । दुनिया में रोज कुछ न कुछ तो घटता ही रहता है, कहीं अच्छा तो कहीं बुरा, कभी अधिक अहम तो कभी कुछ कम । लेकिन “सचिन” के नाम पर सभी चैनल सब कुछ भूल गए । केवल “सचिन” की चर्चा । माफ करें कि मुझे कहना पड़ रहा है कि “सचिन”, “सचिन”, “सचिन” … सुनते-सुनते मेरे तो कान पक गये ।

क्रिकेट की दीवानगी स्पष्ट कर दूं कि मुझे “सचिन” से कोई शिकायत नहीं है । व्यक्तिगत तौर पर मैं क्रिकेट को एक घटिया, उबाऊ, और समय की बरबादी वाला खेल मानता हूं । मुझे याद नहीं कि मैंने आज तक कभी मैदान में अथवा टी.वी. पर्दें पर क्रिकेट मैच देखा हो, शायद छात्र-जीवन में भी नहीं । लेकिन अनेकों भारतीय क्रिकेट देखते हैं । मुझे इसमें कोई दोष नहीं दिखता । मैं नहीं देखता, किंतु कई – सब नहीं – क्रिकेट देखते हैं पूरी तल्लीनता से । निःसंदेह इस देश में क्रिकेट इंग्लैंड से भी अधिक लोकप्रिय बन चुका है ।

मुझे दिक्कत तब महसूस होती है जब लोग दीवाने ही नहीं, बल्कि उसके आगे पागलपन की हद पर पहुंच जाते हैं । यह पागलपन “सचिन” को लेकर भी मुझे देखने को मिल रहा है । मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा पागलपन क्यों । कल ही एक समाचार चैनल पर देख रहा था कि किस तरह कुछ युवतियां “सचिन” की तस्वीर सजा के “जै सचिन बाबा …” (“जय जगदीश हरे …” की तर्ज पर) का “भजन” गा रही थीं । ये सब मुझे दिमागी दिवालियापन ही लगता है ।

किसी व्यक्ति के हुनर या कला की तारीफ करना, उसका प्रशंसक होना, समुचित अवसर के अनुकूल उसकी चर्चा करना ठीक है । लेकिन सब कुछ भुला के उसी का यशोगान करना ठीक लगता है क्या ?

सचिन को भारत रत्न का सम्मान “सचिन” के मामले में तो बात कहीं अधिक आगे तक बढ़ी है “भारत रत्न का सम्मान दो” की मांग के रूप में । हर तरफ से आवाज उठने लगी । मौजूदा सरकार के शीर्षस्थ प्रबंधक तो पहले से ही “सचिन” के कायल रहे हैं । उन्होंने और अधिक देर किये बिना उक्त सम्मान “सचिन” पर निछावर भी कर दिया । (भारत रत्न सम्मान-सूची देखें यहां अथवा यहां)

लगे हाथ एक और व्यक्ति को भी भारत रत्न का सम्मान मिल गया – वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.एन.आर. राव, जिनका कार्यक्षेत्र रसायन(केमिस्ट्री)-भौतिकी(फिजिक्स) रहा है । भौतिकी विषय का अध्यापक/वैज्ञानिक होने के नाते मैं प्रो. राव के बारे में थोड़ा-बहुत जानता हूं, लेकिन मुझे शंका है कि रसायन-भौतिकी से इतर क्षेत्रों के कम ही वैज्ञानिक उनके बारे में जानते होंगे । तब भला आम जन उनके बारे में कितना जानते होंगे यह समझा जा सकता है ।

वस्तुतः आम लोग राजनेताओं, फिल्मी हस्तियों और चर्चित खिलाड़ियों को छोड़ अन्य क्षेत्रों के लोगों को कम ही जानते हैं । “सचिन” के लिए भारत रत्न का जैसा हल्ला मचाया जा रहा था वैसा प्रो. राव के लिए कोई नहीं मचा सकता है, फिर भी उन्हें यह सम्मान मिल ही गया । निःसंदेह वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक हैं और देश-विदेश से अनेकों सम्मान/पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं । वे स्वयं राजनेताओं के बारे क्या सोचते हैं इसे देखिये:

“….why the hell these idiots, these politicians have given so little for us. Inspite of that, we scientists have done something,” Prof. Rao said, losing his cool.

अब प्रो. राव यह अवश्य कहते हैं कि यह तो वे मजाक में कह गये थे । कोई व्यक्ति कम गंभीरता से बोलता है और कब मजाक में यह जान पाना इस ‘महान’ देश में संभव नहीं ! भारत रत्न की मांग औरों के लिए भी सचिन के भारत रत्न की चर्चा सर्वत्र बारंबार पूरे जोर-शोर से हुई और उन्हें चहुं ओर से बधाइयां भी मिल गयीं । उसके बाद और लोगों को भारत रत्न क्यों नहीं जैसे सवाल उठने लगे हैं । यों पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेई, बंग राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु एवं राजनीति में दलितों को स्थापित करने वाले कांसीराम के लिए पिछले कुछ समय से इस सम्मान की मांग उठती आ रही है । अब बाजपेई जी के लिए भा.ज.पा. अधिक मुखर होकर नये सिरे से मांग कर रही है, जिसका समर्थन कई अन्य लोग कर रहे हैं । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाजपेई के साथ राममनोहर लोहिया एवं कर्पूरी ठाकुर की भी वकालत कर डाली है । एक बात दिलचस्प है । सचिन के लिए भरत रत्न की मांग जितने जोरशोर से चारों ओर से हुई है वह अपने आप में अद्वितीय है । ऐसा हल्ला शायद आज तक किसी व्यक्ति के लिए देश के इतिहास में अभी तक नहीं मचा था । यह हल्ला क्रिकेट के प्रति कुछ लोगों का अनन्य लगाव और सचिन के प्रति पागलपन का द्योतक है । मैं इसका विरोधी हूं, लेकिन किसी के पागलपन का इलाज भला मैं कैसे कर सकता हूं ? सचिन को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए यह बात जनता दल (यू) के शिवानंद तिवारी अपने तर्कों के साथ कह चुके हैं । ऐसे बहुत जन हैं जो पूछते हैं कि हॉकी के ‘जादूगर’ ध्यानचंद को यह सम्मान क्यों नहीं दिया गया । भारत रत्न – समुचित प्रक्रिया का अभाव बहुत-से लोगों का मत है कि “भारत रत्न” का सम्मान बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यह निश्चित करना मुश्किल है कि कौन इसके योग्य है और कौन नहीं । वस्तुतः यह कुछ हद तक राजनीति की चपेट में आ चुका है । मेरी जानकारी में इस सम्मान के योग्य पात्र के चुनाव की कोई कारगर और विवादमुक्त प्रक्रिया है भी नहीं । बहुत कुछ राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री की मरजी पर निर्भर करता है । जिस प्रकार पहले कभी राजे-महाराजे उस व्यक्ति को स्वेच्छया पुरस्क्त कर देते थे जिससे वे खुश हो जाते थे, कुछ उसी प्रकार केंद्र सरकार करती है ।

सचिन के मामले से यह स्पष्ट होता है कि जिसके पीछे इस सम्मान की मांग करने वाले समर्थकों की फौज खड़ी हो जाए वह सम्मान पा जाता है । यह भी निश्चित है कि यदि केंद्र में अगली बार भा.ज.पा.-नीत सरकार बन गई तो बाजपेई जी को भारत रत्न का सम्मान मिल जाएगा ।

अभी तक की स्थिति यह है कि एक वर्ष में अधिकतम 3 व्यक्तियों को ही यह सम्मान दिया जा सकता है । इस स्म्मान के स्थापना के समय देश की जनसंख्या मात्र 30 करोड़ से कम थी । आज वह 4 गुनी हो चुकी है । समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय लोगों की संख्या 4 गुनी से भी अधिक हो चुकी है, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, खेल-कूद, विविध कलाओं आदि के क्षेत्र में यही स्थिति है । तब क्या भारत रत्न सम्मानों की संख्या भी 4 गुनी यानी 12 नहीं कर देनी चाहिए ?

मैं स्वयं को इस योग्य नहीं मानता कि किसे भारत रत्न मिले यह बता सकूं । इतना कहना काफी है कि सचिन ने क्रिकेट से लगभग सन्यास लेने के साथ ही भारत रत्न पा लिया तो एक अध्याय बंद हुआ । मैं उम्मीद करता हूं कि दो-चार दिन और मीडिया पर सचिन-चर्चा होगी और फिर वक्त-बेवक्त “सचिन-चालीसा” मुझे नहीं सुननी पड़ेगी । कुछ तो सुकून मिलेगा ! – योगेन्द्र जोशी

पुनश्च:

आज के अखबार की खबर है कि बिहार के कैमूर जिले में “भगवान सचिन” के नाम पर बने मंदिर में उक्त “भगवान” की मूर्ति का अनावरण गायक मनोज तिवारी द्वारा किया गया है । इस मंदिर में लोग नये “भगवान” की पूजा अर्चना करेंगे और कदाचित अपने दु:ख-दर्दों से मुक्ति की प्रार्थना कर सकेंगे ।

मेरा देश वाकई महान है ।

यहां जो व्यक्ति असाधारण उपलब्धि पा लेता है और तमाम लोगों का चहेता बन जाता है वह अंततः भगवान का दर्जा पा जाता है । यह देशवासियों में व्याप्त हीन भावना का द्योतक है कि लोग स्वयं को ऐसे व्यक्ति के समक्ष दीन-हीन पाता है और स्वयं को बराबरी पर सोच ही नहीं सकता है । भक्तों की दृष्टि में तो बाबा आसाराम-बाबा साई भी भगवान हैं !

राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना देशहित में होगा या …?

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

आलोचना राहुल गांधी की

यदि मैं राहुल गांधी पर कोई नकारात्मक या आलोचनात्मक टिप्पणी करूं तो कांग्रेसजन आगबबूला हो जाएंगे । चूंकि प्रायः सभी लोग कहते हैं कि इस देश में अपनी बात कहने का सबको हक है, इसलिए मैं भी कुछ कहने की हिम्मत कर रहा हूं । शायद दो-चार ऐसे लोग मिल जाएं जो मुझसे सहमत हों । तब यह समझूंगा कि मेरी बात सौ फीसद मिथ्या नहीं मानी जा रही, अन्यथा खुद के खयालात पर शक होने लगेगा ।

मेरी नजर में राहुल गांधी राजनैतिक दृष्टि से नितांत अपरिपक्व हैं । वे नहीं जानते कि उन्हें क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं । लगता है उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की भी जानकारी नहीं । अपने भाषणों में वे अपने एवं अपने परिवार की बातें जरूरत से अधिक करते है, परिवार के तथाकथित त्याग की चर्चा करते हैं, गोया कि लोग, यानी आगामी चुनावों के मतदाता, अपने समस्त कष्टों को भूलकर उनकी पार्टी को सत्ता सोंप देंगे ।

आगामी (2014) केंद्रीय सरकार का प्रधानमंत्री

कह नहीं सकता कि अगली सरकार कांग्रेस की अगुवाई में बनेगी या नहीं । मुझे नहीं लगता कि इस पार्टी को खास सफलता मिलेगी । उनके नाम उपलब्धियों की तुलना में विफलताएं कहीं अधिक हैं । जनता शायद उन्हें वोट देना पसंद न करे । तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं बनेगा, यदि बनेगा तो कैसे ये सवाल अभी पूर्णतः अनुत्तरित हैं । जिसका जन्म अभी हुआ नहीं उस तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी इसकी संभावना मेरे मत में क्षीण है । हो सकता है भाजपा अधिक सीटें ले जाए, लेकिन अपर्याप्त । मुझे डर है कि वह सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में समर्थन जुटाने में असफल रहेगी । क्या पता अन्य दल तथाकथित “सेक्युलरिज्म” के नाम पर उसे रोकने की कोशिश में एकजुट हो जाएं । इस देश में सेक्युलरिज्म का फेबिकॉल दुश्मनों को भी आपस में जोड़ सकता है । इसलिए अंततः घूमफिर के कांग्रेस के हाथ में ही कमान आ जाए, किंतु उसकी स्थिति इस बार काफी कमजोर रहेगी ।

अगर जोड़तोड़ करके कांग्रेस ने सत्ता संभाल ही ली तो उसका प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह बात फिलहाल भविष्य के गर्त में ही छिपी है । मेरा मानना है राहुल गांधी इस पद को स्वीकार नहीं करेंगे । मैं उन्हें मूर्ख तो मानता हूं (क्षमा करें यदि आपको बुरा लगे तो), लेकिन वे महामूर्ख नहीं हैं कि इस समय खाहमखाह जोखिम उठाएं और अपना भविष्य दांव पर लगाएं । परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं हैं, भले ही कांग्रेस-नीत सरकार बन जाए ।

यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार ही सभी निर्णय लेता है । वह परिवार ही अंततोगत्वा बताएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा । राहुल गांधी को यह जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे “हां” या “न” कहें । अन्य लोगों को यह अधिकार नहीं है । अतः जिसे यह परिवार कहेगा उसे प्रधानमंत्री का पद सम्हालना ही पड़ेगा ।  और इस कार्य के लिए अपने मनमोहन जी से बेहतर कौन हो सकता है ? उन जैसा समर्पित व्यक्ति भला कौन हो सकता है । कांग्रेसजन लाख कहें कि उनकी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री का चयन चुनाव जीतकर आए सांसद करते हैं, हकीकत में ऐसा है नहीं ।

आन्तरिक लोकतंत्र का अभाव

दरअसल भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है देश के अधिकांश दल किसी न किसी व्यक्ति या परिवार की बपौती बनकर रह गये हैं, जहां संपूर्ण अधिकार मुखिया या उसके परिवार में निहित रहते हैं । कांग्रेस ही में यह नहीं है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही कहानी है प्रायः सभी दलों की है । एनसीपी के फारूख अब्दुला, अकाली दल का बादल परिवार, लोकदल के अजीत सिंह, सपा के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती, राजद के लालू यादव, लोजपा के रामविलास पासवान, त्रिणमूल की ममता, बीजद के बीजू पटनायक, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, एमएनएस के राज ठाकरे, डीएमके के करुणानिधि, एआईएडीएमके की जयललिता, तथा अन्य कई दलों की यही कहानी है । इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नाम की चीज ही नहीं है, लेकिन वे लोकतंत्र की बात करते अवश्य हैं । खैर, मेरे कहने से क्या होता है !

मैंने कहा कि मैं राहुल गांधी को कुछ हद तक मूर्ख मानता हूं, क्योंकि वे कई मौकों पर बेसिरपैर की बातें कर जाते हैं । कांग्रेसजनों की खूबी यह है कि वे हर हाल में उनकी बातें सही ठहराते हैं । राहुल भला कैसे गलत हो सकते हैं ? वे हमारे नेता हैं जो भी कहते है सही कहते है, दूसरे लोग ही गलत समझते हैं । वाह रे राजनैतिक दर्शन ! किसी लोकतांत्रिक दल में यह हो ही नहीं सकता कि किसी एक सदस्य की सभी बातों को समवेत स्वर में सही कहा जा सके । किसी विशिष्ट व्यक्ति के साथ अन्य सदस्यों की यदाकदा असहमति हो यह किसी भी लोकतांत्रिक दल के लिए स्वाभाविक है । राहुल गांधी की गलतियों को कांग्रेसजन कभी भी सहजतया क्यों नहीं स्वीकारते ?

तथ्यहीन उद्गार

मेरा राहुल गांधी के प्रति जो नजरिया है उसके कारण स्पष्ट करना चाहूंगा । हाल में इंदौर की रैली में उन्होंने कुछ बातें कहीं जो हास्यास्पद अथवा आपत्तिजनक, और उनकी अपर्याप्त जानकारी के द्योतक मानी जा सकती हैं । मैं उदाहरण पेश करता हूं:

(1) राहुल गांधी भाजपा का नाम नहीं लेते हैं, किंतु जब वे सांप्रदायिक ताकतों की बात करते हैं तो इशारा भाजपा की ओर ही रहता है । उनकी बातों से लगता है कि देश में सभी दंगे भाजपा ही कराती है । क्या कभी यह बातें प्रमाणित हुई हैं ? इन दंगों के दौरान केंद्र सरकार ओैर राज्य सरकारें कहां सोई रहती हैं ? और जब शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो क्या वे भी भाजपा-प्रायोजित होते हैं ? देश के तथाकथित “सेक्युलरवादी दल” सभी दंगों के लिए आंतरिक कारणों के तौर पर भाजपा और बाह्य कारणों के तौर पर पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” को जिम्मेदार मानते हैं बिना असंदिग्ध प्रमाणों के ।

(2) राहुल गांधी दंगों के संदर्भ में बिना नाम लिए भाजपा को समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने और मारकाट मचाने वाली पार्टी कहते हैं । उसी रौ में वह अनर्गल बोल जाते हैं: “इन लोगों ने मेरी दादी को मारा, मेरे पिता को मारा, और अब मुझे भी मार डालेंगे ।” कौन हैं उनके वक्तव्य के “ये लोग” ? किसकी ओर इशारा है उनका ? क्या उनको यह मालूम नहीं कि उनके दादी-पिता किसी दंगे के शिकार नहीं हुए । वे कुछ हद तक अपनी ही गलतियों से मारे गये । कैसे ? क्या वे इस हकीकत को नहीं जानते कि उनकी दादी, इंदिरा गांधी, ने सेना को अमृतसर के स्वर्णमंदिर में घुसकर भिंडरावाले का सफाया करने का आदेश दिया था ? सिखों की दृष्टि में यह मंदिर को अपवित्र करने की घटना थी । इससे दो-चार सिख उनकी जान के दुश्मन बन गये थे । कहा जाता है कि उनकी दादी को अपनी सुरक्षा में समुचित तबदीली की सलाह दी गयी थी जो उन्होंने नहीं मानी । उसी तंत्र से एक सिख ने गुस्से में उनकी जान ले ली थी ? कौन जिम्मेदार था ? इसी प्रकार श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के विरुद्ध वहां की सरकार को उनके पिता, राजीव गांधी, ने भारतीय सेना की टुकड़ी भेजी थी । कई तमिलों की नजर में यह उनके तमिल-बंधुओं के विरुद्ध कदम था । और उन्हीं में से एक ने मानव-बम बनकर उनकी जान ले ली ? भाषण हेतु मंच पर वे लोग पहुंचे कैसे ? किसकी गलती थी ?

(3) मुजफ्फरपुर के हालिया दंगों के सिलसिले में जो बात राहुल गांधी ने कही उसे मैं अक्षम्य और आपत्तिजनक मानता हूं । क्या कहा यह आरंभ में दिए न्यूज-क्लिप से स्पष्ट है । राहुल गांधी को किस खुफिया अधिकारी ने कथित बातें बताईं और किस हैसियत से ? क्या खुफिया अधिकारी इतने मूर्ख होते हैं कि सरकार का हिस्सा न होते हुए भी राहुल गांधी को खुफिया जानकारी दें ? इसके अलावा उसने अपने उच्चाधिकारियों को समुचित रिपोर्ट दी ? नहीं ! इसके अलावा यह कहना कि पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” वहां के 10-15 नौजवानों के संपर्क में है कहां तक सही है ? क्या वे सच बोल रहे हैं या जनता को महज मूर्ख बना रहे हैं ? देश में अनेक जन उनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं । तब क्या उन्हें सोच-समझकर नहीं बोलना चाहिए ?

राहुल गांधी: प्रधानमंत्री बन गये तो?

मुझे लगता है कि राहुल गांधी यदि सचमुच में प्रधानमंत्री बन गये तो इस देश का बंटाधार ही होगा ! जो व्यक्ति ऐतिहासिक तथ्यों को न जानता हो, जो भावनाओं में बह जाता हो तथा अपने परिवार का गुणगान करने लगता हो, और शब्दों को नापतौलकर न बोल पाता हो, वह क्या सफल प्रधानमंत्री हो सकेगा ? ऐसे व्यक्ति को समुचित सलाह देने वाले साथ हों तो समस्या नहीं होगी । लेकिन आज की कांग्रेस की यह परंपरा बन चुकी है कि राहुल गांधी कुछ गलत भी बोल जाएं तो उसका भी कांग्रेसजन एक सुर से समर्थन करते हैं । उनकी कोई भी बात न काटी जाए यह उस दल की नीति बन चुकी है । तात्पर्य यह है कि तब उस दल में कौन होगा जो सही सलाह दे ?

मैं भाजपा का पक्षधर नहीं हूं । उसे मैं वोट नहीं देता । दरअसल मैं पिछले 10-12 सालों से किसी भी दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता । मेरी दृष्टि में सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं । जब मौका मिले आपस में गले लग जाते हैं, और जरूरत पड़े तो एक-दूसरे के विरुद्ध अनापशनाप बोल जाते हैं । येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाना उन सभी का लक्ष्य बन चुका है । भाजपा सत्ता में आ जाए तो भी कोई मौलिक शासकीय परिवर्तन नहीं होने का ।

मेरी ये बातें भाजपा का पक्ष लेकर नहीं कहीं गई हैं । मैं तो राहुल गांधी की अनर्गल बातों की आलोचना कर रहा हूं । – योगेन्द्र जोशी

शौचालय पहले या देवालय? बात-बात पर धर्म/संस्कृति के नाम पर आाहत होना

          अभी चंद रोज पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने एक बयान देकर हिन्दुओं को धार्मिक रूप से “आहत” कर दियाइससे पहले कांग्रेसी नेता एवं मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसा ही बयान दिया था । बहुत से लोग तब भी नाखुश हुए थे । लेकिन इस बार मामला कुछ लोगों को अधिक गंभीर लगा, क्योंकि मोदी कथित तौर पर कट्टर हिन्दूवादी नेता की छवि रखते हैं, अतः उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी । लोग भूल जाते हैं कि तरह-तरह के कभी शिष्ट तो कभी अशिष्ट बयान तो राजनेता देते ही रहते हैं । उनकी जबान पर इस स्वतंत्र “इंडिया दैट इज भारत” राष्ट्र में कोई रोक नहीं है । दरअसल कुछ और चीजें देश की जनता को मिले या न जो मुख में जो आया उसे बक देने की स्वतंत्रता तो सबको मिली ही है । क्यों न कोई इसका फायदा उठाए ? आम आदमी – मेरा मतलब “आप” पार्टी के सदस्य से नहीं है – कुछ कहे तो मीडिया उसे जनजन तक नहीं पहुंचाएगा, परंतु मोदी सरीखा व्यक्ति कुछ कहे और उसकी चर्चा न हो यह असंभव ही है ।

मोदी का बयान ठीक था या अनुचित यह कह पाना कठिन है, क्योंकि हम सब इन चीजों को अपने-अपने नजरिये से देखते हैं और “मेरे विचार ही सही हैं” का भाव रखते हैं । व्यक्तिगत तौर पर मुझे आपत्ति की कोई बात नहीं लगती, जिसके कारण हैं । लेकिन मोदी के कथित धुरविरोधी तोगड़िया बेहद नाखुश हैं । देखें बीबीसी समाचार

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_indiabol_ss.shtml

खबर है कि इस सिलसिले में “मानवाधिकार पार्टी” के प्रवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, वाराणसी, की अदालत में याचिका दाखिल कर रखी है, जिसकी सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

(देखें http://khabar.ibnlive.in.com/news/109403/12)

मेरी समझ में नहीं आता कि अपने देशवासी (हिंदू हों या मुस्लिम, सिख, इसाई, आदि) बात-बात पर “हमारी धार्मिक भावना आहत हुई है” का हल्ला मचाना क्यों शुरू कर देते हैं । अदालतें भी ऐसे वाद को बहस के लिए कैसे स्वीकार लेती हैं, यह जानते हुए कि अंततः कुछ निकलना नहीं है, सिवाय न्यायाधीश के समय की बरवादी के ? इतना ही नहीं मोदी के कथन के संदर्भ में कैसे कोई दावा कर सकता है कि सभी हिंदू आहत हुए हैं ? मैं भी एक हिंदू हूं और मैं मोदी का समर्थक न होते हुए भी उसके उक्त वक्तव्य का समर्थन करता हूं । दरअसल जिन दो-चार लोगों से मैंने पूछा किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की । सवाल उठता है कि जो व्यक्ति आपत्ति करता है वह कैसे पूरे हिंदू समुदाय (या किसी अन्य धार्मिक समुदाय) की भावनाओं का ठेका ले लेता है ?

हिंदू समाज की विशेषता यह है कि हम जहां-तहां मंदिर खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी लेते हैं । जो देवालय पहले से ही अस्तित्व में हैं क्या वे पर्याप्त नहीं हैं ? उससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि हम देवी-देवताओं को देवालयों में ही क्यों खोजते हैं ? जिन के घरों में पूजाघर हैं वे भी अपने घर में स्थापित देवी-देवताओं को देवालयों में क्यों खोजते हैं ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि लोग उसी देवता की महत्ता को अलग-अलग देवालयों में स्थापित होने पर अलग-अलग प्रकार से आंकते हैं ? लोगों को अक्सर कहते हुए सुनता हूं कि इस मंदिर के हनुमानजी यह मनोकामना पूरी करते हैं और उस मंदिर के हनुमानजी उस मनोकामना को, गोया कि हनुमानजी भी कई हों और वे अलग-अलग प्रकार से पेश आते हों । कहने का मतलब यह है कि देवी-देवतोओं की पूजा-अर्चना तो घर में भी उसी श्रद्धा से की जा सकती है जो देवालयों में संभव है । पुरातन मंदिरों का महत्व कुछ हद तक समझ में आता है, क्योंकि वे प्रायः पौराणिक कथाओं से संबद्ध होते हैं, जैसे शक्तिपीठों के देवी मंदिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि । लेकिन जो नित नये मंदिर स्थापित होते हैं उनके साथ तो ऐसी बात भी नहीं रहती ।

कहने का मतलब यह है कि देवालयों की वैसी आवश्यकता वस्तुतः नहीं है जैसी जनसुविधाओं एवं सामुदायिक संस्थाओं की यथा अस्पताल, स्कूल-कालेज एवं शौचालय । इनके संदर्भ में अपने देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है । कहा जाता है कि शौचालयों के मामले में तो अपना देश कुछ अविकसित देशों से भी पीछे है । और तब कोई यदि शौचालयों की वकालत करे तो क्या गलत करता है ? हाल के वर्षों में कितने देवालय बने हैं मैं कह नहीं सकता, किंतु बनते जरूर हैं और आगे भी बनेंगे यह सत्य है । आप दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देख लीजिए, कितना पुराना है ? कितना विशाल और भव्य है यह ? जितना खर्च इसे बनाने में लगा होगा उसमें न जाने कितनी जनसुविधाओं की व्यवस्था देश के कोने-कोने में संभव हो सकती थी । यह सही है कि यह स्वयं में पर्यटक-आकर्षण बन सकता है, किंतु यह जनसामान्य की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करता । और इसे फिलहाल तो धार्मिक आस्था वालों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है ।

यों तो उपसना स्थल अन्य धार्मिक समुदायों के भी बनते हैं, लेकिन वे जहां-जहां, जब-तब नहीं बनते रहते हैं । वे योजनावद्ध तरीके से, पर्याप्त आकार के, और स्थानीय सामुदायिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बनते हैं । लेकिन हिंदू मंदिर कब-कहां रातोरात खड़े कर दिये जाएंगे कहना मुश्किल है । कम से कम मैं अपने शहर बनारस में यही देखता आ रहा हूं । मैंने तो यह भी महसूस किया है कि कभी-कभी इन मंदिरों की आड़ में अतिक्रमण करने में भी किसी की आस्था आहत नहीं होती है । सड़क के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर रातोंरात एक मूर्ति रख दो, उस पर पुष्पादि चढ़ाना आंरभ कर दो, तो राह चलते अन्य जन भी फूलपत्र चढ़ाना शुरू कर देंगे । फिर उसे थोड़ा बढ़ा दो और उसके बगल में छोटा-मोटा कारोबार करना आरंभ कर दो, मंदिर को बीच-बीच में बढ़ाने का काम करो और साथ में अपना करोबार भी । इस प्रकार अतिक्रमण सफल हो जाता है । कुछ ऐसा घटित होते मैंने देखा है । इस बात को मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं:

हाल में अपने शहर वाराणसी में प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर सड़कों को चौढ़ी करने का सफल अभियान छेड़ा है । दिखावटी अभियान तो कई बार पहले भी छेड़े गए, किंतु वे कभी प्रभावी नहीं रहे । इस बार वाकई गंभीरता दिखी । उसी के परिणामस्वरूप यहां के करीब 500 मीटर के लंका-नरिया सड़क का नजारा ही बदल गया । पहले जो सड़क करीब 20-22 फुट चौड़ी थी अब करीब 35-40 फुट चौढ़ी हो गई है । मुझे इस शहर में रहते 40 वर्ष से अधिक हो चुके हैं । मैं उक्त सड़क के बारे में यही सोचता था कि शहर पुराने ढर्रे का है, इसलिए यहां के हिसाब से ये सड़क बनी ही ऐसी होगी । सोचा न था कि सड़क के किनारे के मकान-दुकान तो अतिक्रमण की देन हैं । अब जाना कि सड़क के एक सिरे से दूसरे तक लगभग 15 फुट चौढ़ी पट्टी अतिक्रमित थी । असली दिलचस्प पहलू तो यह है कि चौड़ीकरण के बाद अतिक्रमित भूमि पर बने 3-4 मंदिर भी खुले में – असल में अब नये बने डिवाइडर पर या उसके निकट – नजर आने लगे । मैं एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Mid-Road Temple-1

तस्वीर में दिखाए मंदिरनुमा ढांचे की सीध में पहले मिठाई की दुकान थी जो अब करीब 15 फुट पीछे चली गयी है । अब लगता है इस ढांचे में रखे शिवलिंग की कद्र भी करने वाला कोई नहीं । ये सभी कोई प्राचीन मंदिर नहीं हैं, बल्कि आस्था के नाम पर बनाये गये अवैधानिक ढांचे हैं । हमारी आस्था हमें अतिक्रमण से नहीं रोकती । आस्था के नाम पर प्रशासन भी इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करता ।

लोग चाहते हैं कि उनकी भावनाओं को अन्य जन ठेस न पहुचाएं । परंतु वे स्वयं दूसरों की भावनाओं की कद्र करना क्यों भूल जाते हैं ? वे क्यों इसे अपना अधिकार समझते हैं कि आस्था के नाम पर उन्हें हर चीज की छूट हो, भले ही उससे दूसरों को घोर असुविधा हो । मेरे शहर वाराणसी में धर्मकर्म के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन होते रहते हैं जिससे सड़कों पर जाम लगता है । कई मौकों पर सड़क घेरकर पूजा-पंडाल तन जाते हैं, दूसरों की परवाह किए बिना । सर्वाधिक आपत्तिजनक तो यह होता है कि लाउडस्पीकरों से शोर मचाया जाता है । मेरे घर के पास ही एक मंदिर है और उसी के सामने सड़क पार एक अस्पताल है । आये दिन मंदिर में कोई न कोई आयोजन होता है और उसके साथ लाउडस्पीकरों से कानफाड़ू शोर । सोचिए कि अस्पताल के मरीजों का क्या हाल होता होगा जहां शोर मचाना मनाही रहती है ।

आपत्तियां अनेकों हैं । हम श्रीगंगा नदी के प्रदूषण की चर्चा करते हैं और उसके नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद भी कर चुके हैं, लेकिन उसमें गंदगी गिराने से नहीं हिचकते हैं । उसमें अधजले शव तक बहा देते हैं । नवरात्र की दुर्गा-प्रतिमाएं विसर्जित तो की ही जाती हैं, अब शहर वाराणसी में कालीपूजा, सरस्वतीपूजा, गणेशपूजा, विश्वकर्मापूजा आदि अनेकों पूजाओं के नाम पर स्थापित प्रतिमाएं भी श्रीगंगा को समर्पित की जाती हैं । और यह सब होता है आस्था के नाम पर ।

आस्था के इन तमाम खेलों पर कोई आपत्ति उठाता है, या उस पर टिप्पणी करता है तो लोग आक्रोषित हो उठते हैं । देवालयों की आवश्यकता नहीं है, हमें आवश्यकता है शौचालयों की ऐसा कहने पर तुरंत भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है का राग अलापना शुरू हो जाता है । लोगों को विवेकशील होकर विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में क्या पहले शामिल होना चाहिए और क्या बाद में । – योगेन्द्र जोशी 

भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

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इस दिवस पर देशवासियों के प्रति शुभकामना व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य बनता है । तदनुरूप उक्त संदेश सभी को स्वीकार्य होवे । किंतु इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने और देश के भविष्य के प्रति आशान्वित होने का कोई विश्वसनीय आधार मुझे कहीं नहीं दिखता । देश की जो निराशाप्रद स्थिति मुझे वर्षों से दिखती आ रही है, उसकी ओर मेरा ध्यान इस मौके पर कुछ अधिक ही चला जाता है । मुझे लगता है कि आंख मूंदकर खुश होने के बजाय देशवासियों को तनिक गंभीरता से अपनी राजनैतिक उपलब्धियों पर विचार करना चाहिए । उन्हें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या साड़ेछः दशक पूर्व हासिल की गयी स्वाधीनता का उपयोग हम एक स्वस्थ एवं जनहित पर केंद्रित लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था स्थापित करने में कर पाये ? इस अवसर पर कई प्रश्न मेरे मन में उठते हैं जिनके उत्तर मुझे नकारात्मक ही मिलते हैं । मेरी बातें सुन मुझ पर पूर्वाग्रह-ग्रस्त होने का आरोप लग सकता है । क्या मैं वाकई गलत हूं; मेरी बातों में कोई सार नहीं; मैं निराशावादी हूं ?

भारतीय संविधान कहता है:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved constitute India into a SOVEREIGN  SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens

JUSTICE …

LIBERTY …

EQUALITY …

FRATERNITY …

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT, AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(SECULAR ‘kCn 1976 ds 42osa la’kks/ku esa tksM+k x;k A)

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाबत कुछ प्रश्न उठाता हूं । हमारी तत्संबंधित उपलब्धियां क्या हैं ? परमाणु परीक्षण, मिसाइल तकनीकी, उपग्रह प्रक्षेपण, और चंद्रयान अभियान या अन्य विकास कार्यों को मैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बेहतरी के संकेतक नहीं मानता । ऐसे विकास कार्य तो राजशाही, तानाशाही, लोकशाही अथवा किसी भी अन्य शासकीय तंत्र में होते ही रहते हैं । हर एक तंत्र में शासक अपने को मजबूत करने में लगा ही रहता है । चीन इसका उदाहरण है जो इन सब मामलों में हमसे कहीं आगे है । मेरे सवाल सीधे-सीधे अपने लोकतंत्र से जुड़े हैं कि क्या उसकी गुणवत्ता उत्तरोत्तर बढ़ी है; क्या वह आम जन की आकांक्षाओं के अनुरूप है, आदि । चलिए एक-एक सवाल पर विचार करें:

कहां है लोकतंत्र ? मूल भावना का अभाव

हमने बहुदलीय शासन पद्धति स्वीकारी है, जिसके अनुसार व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक दलों को प्राप्त हुई है । उनसे अपेक्षा रही है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृड़ ही नहीं करेंगे, बल्कि उसकी मर्यादाओं का पूर्णतः सम्मान करेंगे । लेकिन जिन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उन्होंने ही लोकतांत्रिक प्रणाली का दायित्व संभाल रखा है । क्या इसमें विरोधाभास नहीं है ? आज के प्रमुख दलों में कितने हैं जो शपथ लेकर कह सकें कि उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है ? प्रायः हरएक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा उसके परिवार की निजी राजनैतिक जागीर बना हुआ है और उसके कार्यकर्ता तोते की भांति मुखिया के कथनों को उच्चारित करना अपना धर्म मानते हैं ।

कहां है लोकतंत्र ? सत्ता हथियाने की होड़

सत्ता हथियाना ही सभी दलों का एकमेव लक्ष बन चुका है । सत्ता क्यों चाहिए ? देश का स्वरूप आने वाले 20-30 सालों में क्या होगा इसके चिंतन से प्रेरित होकर सत्ता नहीं पाना चाहते । देश की कोई भावी तस्वीर उनके मन में नहीं उभरती है, बल्कि उनकी नजर पांचसाला सत्ता पर रहती है कि कैसे वे भरपूर सत्तासुख भोगें और और सत्ता से तमाम सही-गलत लाभ बटोर सकें । यही वजह है कि उनके पास देश के लिए कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, और न ही वे किसी सिद्धांत पर टिके रहते हैं । चुनाव में जिसका विरोध करें उसी से हाथ मिलाकर सत्ता पर बैठने से कोई नहीं हिचकता है । हर प्रकार का समझौता, हर प्रकार का गठबंधन उन्हें स्वीकार्य है, बशर्ते कि वह उनके निजी हित में हो, देशहित दरकिनार करते हुए ।

कहां है लोकतंत्र ? क्षेत्रीय दलों का उदय

जोड़तोड़ से सत्ता में भागीदारी पाने, और अपनी शर्तों पर दूसरे दलों से मोलभाव करने की क्षमता बटोरनेे के लिए क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ है । स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक ऐसे दलों का जन्म नहीं  हुआ था ऐसा मैं समझता हूं । कदाचित डीएमके पहला ऐसा दल था जो क्षेत्रीय दल के रूप में हिंदीविरोध के साथ जन्मा था । अन्य दल बाद में ही उभरे जब नेताओं को लगने लगा कि इस रास्ते से उनकी कीमत बढ़ जाएगी । इन दलों ने केंद्र की सत्ता को कमजोर ही किया । हाल के समय में गठबंधन-धर्म जैसा शब्द गढ़ा गया और राष्ट्रधर्म को दरकिनार कर इस धर्म को अहमियत मिलने लगी । इन दलों ने कुछ भी करने की छूट की शर्त पर गठबंधन बनाए रखने की घातक परंपरा को जन्म दिया है । क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र है ?

अहंकारग्रस्त सांसद-विधायक

जनता के द्वारा बतौर प्रतिनिधि के चुन लिए जाने के बाद हमारे राजनेता स्वयं को पांच-साला राजा समझने लगते हैं । विनम्रता तो उनमें मुश्किल से ही मिलेगी । वे किसी भी विषय पर जनता की राय जानने के लिए क्षेत्र में नहीं जाते हैं, बल्कि दल एवं मुखिया की बात ही उनके लिए माने रखती है । जब वे अपने हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं और जनता विरोध करती है तो अहंकार के साथ कह देते हैं कि हम चुनकर आए हैं । हिम्मत हो तो आप भी चुनकर आओ हमें रोक लो । मतलब यह कि हम अब राजा हैं और अपनी मरजी से चलेंगे । नेताओं की ऐसी सोच कभी भी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं कही जा सकती है । हिम्मत तो उन्हें होनी चाहिए कि अपने मतदाताओं के बीच जाकर उनके विचार जानें । ऐसा वे कभी नहीं करते । कहना ही पड़ेगा कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान नहीं उपज पाता है ।

सेक्यूलरिज्म का ढिंढोरा

सेक्यूलरिज्म, जिसे हिंदी में धर्मनिरपेक्षता कहा गया है, के अर्थ क्या होते हैं यह शायद ही किसी राजनेता को मालूम हो । यह शब्द वे तोते की तरह बिना सोचे-समझे कही भी बोल देते हैं । उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह शब्द यूरोपीय देशों में गढ़ा गया जहां शासकीय व्यवस्था को ईसाई धर्म के प्रभाव के मुक्त करने का अभियान चला था । फलतः वहां इस विचारधारा ने जन्म लिया कि लोकतंत्र में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, और शासन के नियम-कानून में देश और समाज के समग्र हित के अनुसार बनने चाहिए न कि किसी धर्म के मतानुसार । जब नेहरू-आंबेडकर ने हिन्दू भावना के विरुद्ध हिन्दू कोड बिल पारित करवाया तो उनकी सोच यही थी कि कालांतर मे कॉमन सिवल कोड देश में स्थापित किया जाऐगा । लेकिन ऐसा हो न सका और अब संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों के होते हुए भी यह कभी होगा नहीं । हमने ‘सेक्युलर’ शब्द का आयात का तो कर लिया, किंतु उसकी भावना अपनाई नहीं । वस्तुत यह देश मल्टीरिलीजस या बहुधर्मी है न कि धर्मनिरपेक्ष, क्योंकि हमारे कुछ कानून धर्मसापेक्ष ही हैं । फिर कैसे हम स्वयं को सेक्युलर कहें । यह आत्मप्रवंचना है ।

अल्पसंख्यकवाद

इस देश में सेक्युलर का व्यावहारिक अर्थ अल्पसंख्यक हितों की बात करना हो चुका है । बहुसंख्यकों की चर्चा करना सेक्युलर न होना समझा जाता है । और दिलचस्प बात तो यह है कि जब भी अल्पसंख्यक शब्द राजनेताओं के मुख से निकलता है तो उनका इशारा प्रायः मुसलिम समुदाय से ही होता है । देश में सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से तो कुछ सही अर्थ में अल्पसंख्यक हैं । परंतु उनकी बात शायद ही कभी कोई राजनेता करता है । दरअसल सबसे कमजोर आर्थिक एवं शैक्षिक दशा में होने के बावजूद मुसलिम समुदाय चुनावी नजर से अत्यधिक अहम समुदाय है, क्योंकि वह चुनाव परिणामों में उलटफेर कर सकता है । उनकी इसी ताकत को देखते हुए हमारे कई राजनैतिक दलों की नीति उनके हितों की जबरन बातें करना रही है । उनको अपने पक्ष में करने के लिए वे हर चारा उनके सामने डालते आ रहे हैं, और उन्हें वोट बैंक के रूप में देखते हैं । उनके वास्तविक हितों में शायद ही किसी की दिलचस्पी होगी । मुझे तो पूरा संदेह है कि ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि वे कभी ऊपर उठें और प्रलोभनों से मुक्त हो पाएं । इस प्रकार का घटिया अल्पसंख्यकवाद मेरी नजर में लोकतंत्र के विरुद्ध है ।

नेतागण – अनुकरणीय दृष्टांतों का अभाव

हमारे राजनेताओं का अहंकार तब खुलकर सामने आता है जब वे कानूनों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते हैं । वे अदालतों के आदेशों/निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते है । वे भले ही मुख से न बोलें, किंतु उनका इशारा इस ओर सदैव रहता है कि उन्हें कानूनों के ऊपर होने का ‘विशेषाधिकार’ होना चाहिए, क्योंकि वे राजा से कम नहीं हैं । इस प्रकार का रवैया स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में देखने को नहीं मिलता था । तब के नेता नैतिक स्तर पर कहीं अधिक ऊपर थे । कहने का अर्थ है कि इस क्षेत्र में भी गिरावट ही आई है । होना तो यह चाहिए था कि नेता जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करें, वे अपने संयत व्यवहार से उन्हें प्रेरित करें । यही सब बातें हैं जिससे जनता में उनके प्रति सम्मानभाव घटता जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं हैं । क्या वे इन बातों को समझ पाएंगे ।

बढ़ता भ्रष्टाचार और लचर न्याय प्रणाली

कोई यह दावा कर सकता है कि समय बीतने के साथ देश में भ्रष्टाचार घटा है ? जो इसका उत्तर हां में दें मैं उनसे माफी ही मांग सकता हूं । शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जहां उल्टे-सीधे काम न होते हों, लेकिन दंडित कोई नहीं होता । यह राजनेताओं समेत सभी मानते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है, लेकिन तमाशा देखिए कि भ्रष्टाचारी कोई सिद्ध नहीं होता है, गोया कि यह भी कोई दैवी चमत्कार हो । दरअसल हमारी न्यायप्रणाली है ही ऐसी कि आरोपी को बचाने के लिए उसने तमाम रास्ते दिए हैं । रसूखदार व्यक्ति किसी न किसी बहाने मामले को सालों लटका लेता है और दंड से बच जाता है । क्या यही अपने लोकतंत्र से अपेक्षित था ?

लोकपाल, आरटीआई, एवं आपराधिक राजनीति

हमारे देश के मौजूदा राजनेता भ्रष्टाचार के प्रति कितने संजीदा हैं यह उनके लोकपाल के मामले को टालने एवं आरटीआई से अपने दलों को मुक्त रखने के इरादे से स्पष्ट है । इसी प्रकार वे राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध भी कारगर उपाय नहीं अपनाना चाहते हैं । जिन आपराधिक छवि के नेताओं के बल पर वे सत्ता हासिल करते आ रहे हैं आज उन्हें वे बचाने की जुगत में लगे हैं । मेरा विश्वास है कि शुरुवाती दौर में राजनीति इतनी अस्वच्छ नहीं थी । समय के साथ आपराधिक छवि के लागों की पैठ जो शुरू हुई तो आज संसद तथा विधानसभाओं में उनका बोलबाला दिखाई देता है । जब ऐसे नेता और उनको बचाने वाले नेता संसद में तो अपराधमुक्त राजनीति कहां से आएगी ? इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें ?

चुनावी एवं प्रशासनिक सुधार

मुझे अब विश्वास हो चला है कि हमारे नेता ऐसे कोई उपाय नहीं करना चाहते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे पर उनकी मनमर्जी पर अंकुश लगाए । मैं अब मानता हूं कि उनमे परस्पर यह मुक सहमति बनी है कि ऐसे किसी भी कानून का हममें कोई न कोई किसी न किसी बहाने विरोध करता रहेगा ताकि वह कानून पास न हो सके । ऊंची-ऊंची बातें होती रहती हैं लेकिन ठोस कुछ किसी को नहीं करना है । यही वजह है कि चुनाव, न्याय-व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, तथा पुलिस तंत्र में सुधार आज तक नहीं हुए हैं और न आगे होने हैं । यही हमारी उपलब्धि है क्या ?

इंडिया बनाम भारत

स्वतंत्र हिंतुस्तान की सबसे त्रासद और दुःखद घटना है इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटवारा । ये देश की चिंताजनक प्रगति है कि यहां दो समांतर व्यवस्थाएं साथ-साथ चल रही हैं । एक व्यवस्था है देश के समर्थ एवं संपन्न वर्ग के लिए और दूसरी है बचेखुचे कमजोर लोगों के लिए । चाहे शिक्षा हो, चिकित्सा हो, यातायात हो या कुछ और, दोनों के लिए असमान व्यवस्था कायम हुई हैं । तर्क दिया जाता है कि लोकतंत्र में तो लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम पाने का अधिकार है । संविधान में जिस EQUALITY की बात कही गई हैं उसके निहितार्थ क्या हैं यह मैं समझ नहीं पाता ।

स्वतंत्रता यानी अनुशासनहीनता

अंत में । क्या ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार्य हो सकती है जिसमें व्यक्तियों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न हो, जहां मर्यादाएं न हों ? लेकिन बहुत से लोगों के लिए स्वतंत्रता के अर्थ हैं अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, जो मर्जी वह करने का अधिकार, कानूनों का उल्लंघन, आदि । हमारा लोकतंत्र लोगों को दायित्यों का एहसास दिलाने का कार्य नहीं कर सका है । लोगों को कार्य-संस्कृति, दूसरों के प्रति संवेदना, देश-समाज के प्रति कर्तव्य का पाठ कोई नहीं पड़ा सका है । सभी को खुली छूट जैसे मिली हो ।

ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठते हैं । ये सब बातें व्यापक बहस के विषय के हैं, किंतु इनसे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि यह देश सही दिशा में नहीं जा रहा है ।

मेरी दृष्टि में चंद्रमा पर यान उतार देना उतना महत्व नहीं रखता जितना सड़क पर कूड़ा बीनने वाले को उस दशा से मुक्त करना । – योगेन्द्र जोशी

समाचारः यूपी यानी उत्तर प्रदेश को मिलेगा पिछड़े राज्य का दर्जा

कल के जागरण अखबार में खबर थी कि यूपी को पिछड़े राज्य का दर्जा मिलेगा । मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि अपने प्रदेशवासियों को इस खबर पर बधाई दूं या उनके प्रति सहानुभूति जताऊं ।\

UP - Pichada Raaya

मेरी दुविधा अकारण नहीं है । मेरी जानकारी के अनुसार आजादी के समय उत्तर प्रदेश देश के अग्रणी या उन्नत राज्यों में से एक था । तमिलनाडु, आंध्र आदि उससे पिछड़े थे । आज स्थिति यह है कि उन राज्यों से यह पिछड़ चुका है और हालात यह हो गए हैं कि उसके पिछड़ा कहे जाने की नौबत आ गई । अवश्य ही प्रदेश की सरकार पिछड़ा घोषित होने पर खुश हो रही होगी, क्योंकि पिछड़ेपन के अनुरूप उसे केंद्र सरकार से कुछ मदद/रियायतें मिलेंगी । इस खिताब को वह अपनी उपलब्धि मान रही होगी । लेकिन मुद्दे का दूसरा पहलू देखिए कि आगे बढ़ने के बजाय यह राज्य पिछड़ा बन गया । यह यहां के बाशिंदों के लिए शर्मिदगी की बात है कि नहीं ?

पिछड़े होने की ‘उपाधि’ राज्य को राजनैतिक कारणों से मिला होगा यह कोई भी समझ सकता है । केंद्र की कांग्रेस-नीत सरकार आगामी चुनावों के मद्देनजर इस कदम को लाभदायी देख रही होगी । उसे राज्य की कितनी चिंता है यह कहकर वह मतदाताओं के वोट बटोरना चाहती होगी । मतदाताओं को सुभाने के लिए वह हर हथकंडा अपना रही है । इसके अलावा उसे राज्य सरकार की ‘मालिक’ समाजवादी पार्टी का भी सहारा चाहिए । पिछड़ेपन का दर्जा देकर वह उक्त पार्टी के सहयोग की भी व्यवस्था कर रही है ऐसा मेरा मत है । उसके राजनैतिक इरादे किस हद तक सफल होंगे यह भविष्य के चुनाव ही बताएंगे ।

उत्तर प्रदेश आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ता ही क्यों गया ? इसके कारण कई होंगे, किंतु मैं इस अवनति के लिए मायावती-मुलायम सरीखे राजनेताओं को जिम्मेदार मानता हूं । इन नेताओं ने इस प्रदेश की सत्ता को निजी स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बना डाला । उन्होंने “बांटो और राज करो” की नीति अपनाकर अपन-अपने वोट बैंक तैयार कर लिए । मायावती ने दलितों की भावनाएं उभाड़कर दलित वोट बैंक बनाया तो मुलायम सिंह ने ‘एम-वाई’ यानी यादव-मुस्लिम की राजनीति से अपना स्वार्थ साधा । भारतीय जनतंत्र है ही जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता की भावनाओं को भड़काकर मत बटोरने पर आधारित । शायद ही कोई दल होगा जो कह सके कि वह ऐसी घटिया राजनीति से मुक्त है । इसलिए मुलायम-मायावती अकेले दोषी नहीं रहे, किंतु उन्होंने जातीय राजनीति को पराकाष्ठा पर पहुंचाया जरूर ।

इस सबके अलावा इन दलों ने गुंडे-माफियाओं को भी भरपूर प्रश्रय दिया । आज हालात यह हैं कि सर्वत्र लूट मची है । बालू-माफिया कितनी चर्चा में हैं यह तो सभी देख ही रहे हैं । इन दलों ने प्रशासनिक तंत्र का भी राजनीतिकरण कर दिया । सबके अपने चहेते अधिकारी हैं, जिन्हें अहम अथवा तथाकथित ‘मलाईदार’ पदों पर नियुक्त किया जाता है और निष्ठावान अधिकारियों को दरकिनार कर दिया जाता है । आज हालत यह है कि वाराणसी जैसे शहर में सड़कें बनने के बाद साल भर नहीं टिक पाती हैं । कहने का मतलब है कि प्रदेश को तो नीचे लुड़कते ही जाना है । अब इस अवनति के लिए पुरस्कार स्वरूप “पिछड़ा” प्रदेश घोषित किया जा रहा है । हमारे राजनेता “पिछड़ा” कहलाने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करते, बल्कि इसे अपनी राजनैतिक उपलब्धि समझते हैं ।

उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य रहा है कि सबसे बड़ा राज्य होने के कारण यह राजनीति का अखाड़ा भी बना रहा । यह धारणा सभी दलों में घर कर गई कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता इसी प्रदेश से होकर गुजरता है । इस प्रदेश की सुध लेने के बजाय सभी दल दिल्ली पर कब्जा करने के प्रयासों में लगे रहे । आज भी मुलायम-मायावती दिल्ली का ख्वाब पूरा करने के लिए प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से 50-50 पर जीत की तिकड़म में लगे हुए हैं ।

असीमित भ्रष्टाचार, जाति-धर्म की गिरी हुई राजनीति, एवं प्रशासन में भाई-भतीजावाद के चलते इस राज्य का भला होने वाला नहीं । राजनैतिक अखाड़ेबाजी घटे और सरकारों का ध्यान दिल्ली के बजाय राज्य पर हो इसके लिए इसका 3-4 भागों में बंटवारा निहायत जरूरी है । उत्तराखंड का उदाहरण यह दिखाता है कि वह, अच्छा-बुरा जैसा भी कर रहा हो, यहां की राजनीति से मुक्त तो है ! – योगेन्द्र जोशी