11 जुलाई 2015 – विश्व जनसंख्या दिवसः किंतु अपने देश को उससे कोई मतलब नहीं

जनसंख्या दिवस

आज 11 जुलाई ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ था/है । मैं उम्मीद कर रहा था कि इस दिन देश की जनसंख्या पर विभिन्न व्यक्तियों-संगठनों के बीच गंभीर चर्चा होगी, और मीडिया मुद्दे को जनता तक पहुंचाएगा तथा जनता में जागरूता फैलाएगा । मेरे लिए यह देखना आश्चर्य एवं खेद की बात थी कि अखबारों में इस विषय का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं, किसी संस्था या सरकार की कोई विज्ञप्ति नहीं । टीवी चैनलों पर भी कोई जिक्र नहीं, गोया कि जनसंख्या वृद्धि का हससे कुछ लेना-देना नहीं ।

अभी हाल ही में देश के प्रधानमंत्री मोदीजी ने बड़े जोशोखरोश के साथ ‘विश्व योग दिवस’ मनाया । कई-कई दिनों तक उसकी तैयारी चली । लोगों ने बढ़चढ़कर सहभागिता निभाई । योग की उपादेयता में मैं संदेह नहीं करता, लेकिन ये सवाल जरूर उठाता हूं कि जिस देश में लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब न हो रही हो, जहां 40-50 फीसदी बच्चे कुपोषित हों, जहां लोगों को सड़कों पर रातें गुजारनी पड़ती हों, जहां जीवन-निर्वाह के लिए दिन भर आदमी भागदौड़ में लगा हो, वहां योग का लाभ कितने लोग उठा सकते हैं ?

मैं उम्मीद कर रहा था कि प्रधानमंत्री जी जनसंख्या दिवस को भी अहमियत देगें और जनसंख्या नियंत्रण की बातें जनता के बीच करेंगे । यह ठीक है कि योग दिवस उनके दिमाग की उपज थी, लेकिन उसके सापेक्ष जनसंख्या दिवस महत्वहीन बना के छोड़ना प्रधानमंत्री जी को शोभा नहीं देता । जनसंख्या इस देश की अतिगंभीर समस्या है यह उन्हें नहीं भूलना चाहिए था ।

दिवस की अहमियत

याद रहे कि इस दिवस के पीछे संयुक्त राष्ट्र संगठन (सं.रा.सं. अथवा यू.एन.ओ.) का एक ध्येय रहा है । ध्येय है कि इस विश्व की मानव जनसंख्या लगातार नहीं बढ़ने दी जा सकती है । प्रकृति ने हमें सीमित संसाधन दिए हैं । हमें और हमारे साथ-साथ अन्य प्राणियों को उन्हीं संसाधनों को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या सीमित रखनी है । मानवेतर प्राणियों की जनसंख्या प्रकृति सीधे तौर पर नियंत्रित करती है । उन प्राणियों के लिए न जनसंख्या के कोई अर्थ हंै और न ही उसे सीमित रखने का कोई विचार ।

किंतु मनुष्य की स्थिति भिन्न है । उसने अपने बौद्धिक बल के सहारे रोगों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है जिससे मृत्यु दर घटी है । इसके अतिरिक्त प्राकृतिक विपदाओं के कारण से होने वाली मौतों को भी कुछ हद वह रोकने में समर्थ हुआ है । फलतः परिस्थितियां ऐसी बन चुकी हैं कि उसकी जनसंख्या वढ़ती जाएगी यदि उसे रोकने के प्रयास न किए जाएं । मृत्यु दर कम हो ऐसा विचार तभी ठीक माना जा सकता है जब जन्म दर भी उसी के अनुरूप कम हो । अन्यथा जनसंख्या उस सीमा तक पहुंच जाएगी जहां जीवन-निर्वाह के संसाधन कम पड़ने लगेंगे । उस सीमा पर या तो प्रकृति अपने तरीके से जनसंख्या नियंत्रित करेगी, या मनुष्य स्वयं को विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में असमर्थ पाकर आत्म-हनन का रास्ता चुनने लगेगा । ऐसी भयावह स्थिति न पैदा हो इसी प्रयोजन से सं.रा.सं. ने 11 जुलाई को जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता की याद दिलाने वाले दिवस के रूप में स्थापित किया है ।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस धरती पर केवल हमें (हम मनुष्य) ही जीने का अधिकार नहीं है, बल्कि अन्य प्राणियों को भी अधिकार है । वैसे भी उनके अस्तित्व पर हमारा अस्तित्व टिका है, भले ही इस तथ्य का एहसास अधिकांश लोगों को न हो । वर्तमान काल में बढ़ती जनसंख्या हमें पूरी धरती पर एकाधिकार जमाने के लिए प्रेरित या विवश कर रही है । उन प्राणियों के लिए उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन भी हम कब्जे में ले रहे हैं । परिणाम यह है कि उनमें से कइयों की संख्या घट रही है और कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं । वे हमारी दया के पात्र बन चुके हैं । ऐसी संभावना राकने के लिए भी जनसंख्या नियंत्रण बांछित है ।

इस धरती का सौभाग्य है कि विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि कमोबेश नियत्रण में है । कई देश तो नकारात्मक (ऋणात्मक) जनसंख्या दर पर चल रहे हैं, अर्थात उनकी जनसंख्या समय के साथ घट रही है; कारणों में विविधता है । इनमें रूस, पोलैंड, जापान, क्यूबा आदि के साथ यूरोप के कई छोटेबड़े देश शामिल हैं । इस विषय की विस्तृत जानकारी निम्नलिखित इंटरनेट पते पर प्राप्य है:

https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_population_growth_rate

भारत की स्थिति

दुनिया के प्रमुख देशों में भारत के अतिरिक्त शायद ही कोई अन्य देश हो जिसकी जनसंख्या दर आवश्यकता से अधिक हो । विकसित देशों के लोगों की आर्थिक संपन्नता और उनका लगभग सौ फीसदी शिक्षित होना ही जनसंख्या नियंत्रण का आधार बन गया । चीन ने कानून की सख्ती से जनसंख्या को काबू में किया । लेकिन अपने देश की स्थिति निराशाजनक रही है । यहां तो कोई राजनेता जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं करता । इसका कारण है 1970 के दशक की संजय गांधी की एक भूल । किसी संवैधानिक पद पर न होते हुए भी उसने सरकारी महकमों पर अपना नियंत्रण पा लिया था । परिवार नियोजन उस व्यक्ति के कार्यक्रमों में से एक था । उसके इरादे तो नेक थे किंतु कार्यप्रणाली जोर-जबरदस्ती वाली थी, जिसके दुष्परिणाम तब कांग्रेस को भुगतने पड़े थे । तत्कालीन घटनाओं ने परिवार नियोजन को ऐसा विषय बना दिया जिसको जबान पर लाना राजनेताओं के लिए वर्जित हो गया । सबको यह भय सताने लगा कि जनसंख्या की बात करेंगे तो हमारा वोटबैंक खिसक जाएगा । हमारे लोकतंत्र की यह दुःखद विडंबना है ।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि अगर जनसंख्या बढ़ती जाए तो देश प्रगति नहीं कर सकता । हमने जनसंख्या को भगवान भरोसे छोड़ रखा है । दक्षिण भारत के चार राज्यों के साथ कुछ अन्य राज्यों ने अच्छी प्रगति दिखाई है और वहां लोगों का जीवन-स्तर अपेक्षया उठा भी है । वहां प्रति दम्पती जन्मे बच्चों  की संख्या 2 के निकट है । यह माना जाता है कि करीब 2.3 बच्चे प्रति दम्पती जनसंख्या को स्थिरता प्रदान करती है, न बढ़ना न घटना । लेकिन सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के साथ बिहार, मध्यप्रदेश आदि में यह संख्या 3 से ऊपर है । अर्थात इन प्रदेशों की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है । लगता नहीं कि यहां की सरकारें गंभीर प्रयास की इच्छुक हैं ।

जनसंख्या के संदर्भ में एक रोचक तथ्य मेरे देखने में आया है कि आज के अपेक्षया संपन्न मध्य एवं उसके ऊपर के वर्ग में परिवार को 1 या 2 बच्चों तक सीमित रखने का चलन बढ़ रहा है । कुछ कामकाजी दम्पती तो “एक भी बच्चा नहीं” के हिमायती मिल जाएंगे । ये वे वर्ग हैं और जो अधिक बच्चों के भरण-पोषण स्वास्थ्य एवं शिक्षा आदि का निर्वाह कर सकते हैं । फिर भी परिवार सीमित रखकर ये जनसंख्या स्थिरीकरण में योगदान दे रहे हैं ।

असल समस्या समाज के निम्नतर वर्गों के साथ । धनाभाव के कारण वे कुपोषण, शिक्षा के अभाव, स्वास्थ्य की समस्याओं आदि से घिरे रहते हैं । फिर भी परिवार में बच्चों की संख्या वहीं अधिक देखी जाती है । कारण भले ही कुछ भी हों वहां चार-चार, छः.छः बच्चों की पैदाइश सामान्य बात है । देश की जनसंख्या वृद्धि इन्हीं के कारण है । इस समय आवश्यकता इन्हीं को ऊपर उठाने की है । जब तक इन तबकों में परिवार सीमित रखने की भावना न पैदा होगी स्थिति में वांछित बदलाव नहीं हो सकेगा, क्योंकि जब तक कुछ जने गरीबी से उबर पाते हैं तब तक कई अन्य गरीब पैदा हो चुकते हैं ।

जनसंख्या दिवस इनमें जागरूकता फैलाने का दिन है; उन्हें यह विश्वास दिलाने का दिन है कि सीमित परिवार उनके लिए घाटे का सौदा नहीं है क्योंकि सरकार उनका साथ देगी । दुर्भाग्य से आज इस दिवस पर प्रधानमंत्री जी ने वांछित संकल्प लेने की कोशिश नहीं की । अतः जनसंख्या का स्थिरीकरण भगवान भरोसे । – योगेन्द्र जोशी

 

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गांधी जयंती के अवसर पर जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (2)

मोदी तथा स्वच्छता अभियान

इस विषय पर एक आलेख मैंने गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को लिखा था ।

उसमें मैंने गांधी-चिंतन की कुछ बातों पर टिप्पणी करते हुए मोदी के स्वच्छता अभियान का जिक्र किया था और इस अभियान की सफलता पर शंका जताई थी । मैं अपनी शंका के कारण स्पष्ट करता हूं ।

मैं मोदी या अन्य किसी राजनेता का समर्थक नहीं रहा हूं, किंतु मोदी का फिलहाल प्रशंसक अवश्य हूं । कारण सीधा-सा यह है कि मोदी के कथनों तथा कार्यप्रणाली में मौलिकता है ओर वह घिसे-पिटे ढर्रे पर चलने वाले राजनेता एवं प्रधानमंत्री नहीं लगते हैं । मुझे लगता है कि वे सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल (Charles de Gaulle) की जैसी भूमिका निभाना चाहते हैं, जिन्होंने कुछ हद तक डिक्टेटरों सदृश व्यवहार करते हुए अपने-अपने देशों की आरंभिक प्रगति में महती भूमिका निभाई थी । मोदी स्पष्टतः दिखाई देने वाले नयेपन के साथ देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं और देश का स्वरूप बदलना चाहते हैं । उनकी विभिन्न योजनाएं और चंद रोज पहले घोषित स्वच्छता अभियान कितने सफल होंगे यह अभी कोई नहीं बता सकता । मैं इतना जरूर कहूंगा कि यदि सफलता मिली तो श्रेय मोदी को देना ही होगा, और यदि विफलता मिली तो दोष हमारी शासकीय व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र एवं आम जनों का कहा जाएगा, जो वांछित दायित्व न निभा पाए हों और जिन पर प्रधानमंत्री होने के बावजूद मोदी का अतिसीमित नियंत्रण है ।

स्वच्छता अभियानः चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

मामला स्वच्छता का हो या किसी और बात का, अभियान स्वयं में उद्येश्य की प्राप्ति नहीं करते । अभियानों का मुख्य मकसद लोगों को मुद्दे के प्रति सचेत करना और उन्हें समुचित दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है । यदि मकसद पूरा हो सका और समस्या को लेकर कुछ कर पाने की संभावना लोगों में निहित हो जाए तो अभियान की सार्थकता सिद्ध हो जाती है । अन्यथा अभियान अभियान मात्र बन कर रह जाता है । आप प्रतिदिन अभियान नहीं चला सकते और न ही आम जन उसमें रोज-रोज भागीदारी निभा सकते हैं । चूंकि इस अभियान में सामान्य लोगों के अलावा कई गण्यमान्य जन भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, इसलिए थोड़ी उम्मीद बनती जरूर है कि कुछ सार्थक परिणाम निकलेंगे । लेकिन कुछ समय पश्चात मौजूदा आरंभिक जोश ठंडा पड़ जाये तो आश्चर्य नहीं होगा । ऐसा प्रायः सभी अभियानों एवं आंदोलनों के साथ देखने को मिलता है । तब “चार दिनों की…”

जहां तक स्वच्छता का मामला है मैं समझ नहीं पाता कि अपनी तरफ से सफाई बरतने के लिए लोगों से अनुरोध क्यों करना पड़ता है । यह बात उनके जेहन में खुद-ब-खुद क्यों नहीं आती ? अपने परिवेश को स्वच्छ रखें इस आशय के संदेश कई स्थलों पर लिखे दिखते हैं, जैसे रेलवे प्लेटफार्मों पर और रेल के डिब्बे के भीतर, अथवा चौराहों पर अपने शहर को स्वच्छ रखें के संदेश । फिर भी गंदगी फैलाने वाले गंदगी फैलाते रहते हैं । संदेशों का कोई असर क्यों नहीं पड़ता ? सड़क के किनारे दीवारों पर अक्सर लिखा रहता है “यहां मूत्रत्याग या पेशाब न करें” फिर भी पेशाब करने वालों की कमी नहीं रहती । क्या अभियानों का असर वास्तव में पड़ता है ? शायद नहीं; कइयों को ये नौटंकियों सदृश लगते हैं, तमाशे के माफिक ! मैं इस समय मुम्बई, पश्चिम भांडुप, में हूं । मुझे तो यहां इस अभियान के संकेत तक नहीं दिखे । पता नहीं देश के किस-किस कोने में कुछ हुआ हो, मीडिया में छपी तस्वीरों से अधिक ।

फिर भी मैं मान लेता हूं कि मौजूदा जिस अभियान की शुरुआत मोदी ने की है, और जिसे जनसमर्थन मिल रहा है, वह लोगों को प्रेरित करेगा । तब सवाल है कि उसके अनुसार आम आदमी से क्या अपेक्षा की जाती है ? यही न कि लोग सड़कों, सार्वजनिक स्थलों, आदि पर गंदगी न फैलाएं । वे सड़कों पर पान की पीक नहीं थूकें, उनके किनारे खड़े होकर पेशाब नहीं करें, जहां-तहां कूड़ा नहीं फैंकें, नालियों में प्लास्टिक की थैलियां नहीं डालें, रेलगाड़ी के डिब्बों के फर्श पर मूंगफली के छिलके, बिस्कुट के रैपर नहीं गिराएं, इत्यादि । ऐसे तमाम कार्य करने के लिए आम जन, विशेषकर नौजवान, किशोरवय,  बालक-बालिकाएं प्रेरित की जा सकती हैं, किंतु नागरिकों का व्यक्तिगत योगदान पर्याप्त है क्या ?

प्रशासन की भूमिका

वस्तुतः सफाई कार्यक्रम में प्रमुखतया दो पक्षों की भागीदारी रहती हैः (1) पहले में जन-सामान्य हैं जिनके व्यक्तिगत योगदान की बात ऊपर की गई है, और (2) दूसरा संस्थाएं हैं जिनका दायित्व सार्वजनिक क्षेत्रों की साफ-सफाई की व्यवस्था करना है । घरों और व्यावसायिक कार्य-स्थलों से निकलने वाले कूड़े-कचरे के निस्तारण का दायित्व इन्हीं संस्थाओं का होता है । सड़कों, नालों, एवं पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों को समय-समय पर साफ करना संस्थाओं की जिम्मेदारी होती है । आम जन के उपयोग के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण भी संस्थाओं का ही कार्य होता है, न कि निजी तौर पर किसी व्यक्ति का ।

हमारे देश में ये संस्थाएं सामान्यतः प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा होती हैं । लेकिन वे गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्थाएं भी हो सकती है जिन्हें शासकीय नियमों के अनुरूप कार्य करने की अनुमति रहती है । “सुलभ इंटरनैशनल” ऐसी ही एक प्रतिष्ठित संस्था है जो सार्वजनिक उपयोग हेतु शौचालयों का निर्माण कराती आ रही है । जब कोई व्यक्ति जनहित में ऐसा ही कोई कार्य करे तो वह भी एक गैरसरकारी संस्था की तरह कार्य कर रहा होता है । उसका कार्य समाज के प्रति उदारता का परिचायक कहा जाएगा । किंतु यह स्वीकारा जाना चाहिए कि मूलतः सार्वजनिक सफाई प्रशासन की ही जिम्मेदारी होती है, भले ही वह अपने दम पर यह करे अथवा गैरसरकारी संस्थाओं से सहयोग लेकर चले ।

मैं देश के कई हिस्सों में बतौर पर्यटक के घूम-फिर चुका हूं । यह सभी जानते हैं कि हमारा देश विधिधताओं से भरा है । खानपान, पहनावा, स्थानीय रीतिरिवाज, भाषा-बोली, आदि में विविधता पाई जाती है । फिर भी मुझे यह देखना बेहद दिलचस्प लगा कि एक माने में सभी देशवासियों में समानता है, वह है स्वच्छता के प्रति उदासीनता या बेपरवाही । इस माने में संस्थाओं में भी काफी हद तक एकरूपता देखने को मिलती है । अवश्य ही कुछ जगहों पर मैंने पर्याप्त प्रशासनिक चुस्ती देखी है तो अन्यत्र उसकी सुस्ती ही सुस्ती । तदनुसार सड़कों, सार्वजनिक स्थलों में प्राप्य गंदगी की मात्रा में थोड़ा-बहुत अंतर जरूर रहता है, फिर भी गंदगी तो रहती ही है । उदाहरणार्थ देश में प्रायः सभी शहरों में जहां-तहां प्लास्टिक थैलियों का बिखरा होना, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर लगे रहना, दुर्गंध फैलाती बदबदाती नालियों की मौजूदगी, आदि आम बातें हैं । ये बातें प्रशासनिक उदासीनता के प्रमाण होते हैं । इसी प्रकार आम जनता का सफाई के प्रति रवैया भी कमोबेश एक जैसा ही है । यह है भारत की विविधता में एकता

वाराणसी का उदाहरण

मैं पिछले करीब 42 सालों से वाराणसी मैं रह रहा हूं । मैंने इस शहर को शनैः-शनैः दुर्व्यवस्था का शिकार होते देखा है । पहले सड़कें अधिक चौढ़ी नहीं थीं, फिर भी जाम की स्थिति नहीं पैदा होती थी । आज सड़कें दोहरी या अधिक चौढ़ी हैं, किंतु हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है । पहले कारें नहीं के बराबर थीं, आज इतनी हैं कि सर्वत्र धुआं-ध्वनि प्रदूषण फैल रहा है । पहले सड़कें 5-7 साल चल जाती थीं, अब 2-4 माह में ही उखड़ने लगती हैं । पहले कागज के थैले इस्तेमाल होते थे, अब उनकी जगह गंदगी के कारक प्लास्टिक की थैलियों ने ले ली है ।

मेरा मानना है कि वाराणसी में प्रशासन वस्तुस्थिति के प्रति उदासीन, निष्क्रिय, या बेपरवाह रहता है । संसाधनों तथा कार्यबल का अभाव उसे और पंगु बना देता है । अतः मुझे उससे उम्मीद नहीं है । न ही मैं आम जनता से कोई उम्मीद रखता हूं, जो “बनारस की मस्ती” के नाम पर अनुशासनहीनता बरतती है और नागरिक दायित्वों से बेखबर रहती है । ऐसे में अहम स्थलों में स्वच्छता के विभिन्न टापू उभर सकते हैं जहां निजी संस्थाएं अथवा प्रशासनिक तंत्र विशेष तौर पर प्रयासरत हों, किंतु वृहत्तर स्तर पर स्थिति दयनीय ही रहनी है ।

कुल मिलाकर मुझे लगता नहीं कि वाराणसी में प्रशासन और आम जनता से स्वच्छता की आशा की जा सकती है । देश में अन्यत्र भी स्थिति विशेष आशाप्रद होगी यह मैं नहीं सोच पाता । मैं ऐसा क्यों सोचता हूं इसे अपने निजी अनुभवों पर आधारित दो-एक उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

 

भारतीय राजनीति में माफी मांगने का नाटक

मौजूदा भारतीय राजनीति में सब कुछ जायज है और सब कुछ क्षम्य । आप चौराहे पर जाकर किसी को झूठे ही बदनाम कर आएं और फिर उस व्यक्ति से माफी मांग लें तो आपका अपराध माफ । ऐसा लगता है कि माफी मांगने से किया गया अपराध ‘न किया हुआ’ हो जाता है । माफी के रास्ते बदनाम करने का काम भी आप कर लेते हैं और साथ में बिना किसी घाटे के छूट भी जाते हैं । यह सब ऐसा ही है जैसे कि आप पापकर्म भी करिए और गंगास्नान करके उस पाप से मुक्त भी हो जाइए । वाह क्या नाटकबाजी है, निहायत बेशर्मी के साथ ।

मैं राजनेताओं के माफी मांगने को एक मजाक से अधिक कुछ नहीं समझता । मुझे उस व्यक्ति पर तरस आता है जिसके विरुद्ध कुछ कहा जाता है और माफी मांगे जाने पर संतुष्ट हो जाता है । ऐसा करना यह दर्शाता है कि वह व्यक्ति भी कही गई बातों को गंभीरता से नहीं लेता है । लगता है कि माफी मांगे जाने से उसके अहंभाव को तसल्ली हो जाती है, जिसके आगे उसे कुछ नहीं चाहिए ।

मैं मानता हूं कि माफी मांगने और माफी पा जाने की जो परंपरा हाल में चली है उसने राजनेताओं में यह भावना भर दी है कि ऊलजलूल, निरंर्थक, अप्रासंगिक, बकबास कर लो और फिर जरूरत पडने पर माफी भी मांग लो । उनका उल्टासीधा बोलना भी हो जाए और बदले में उनके किरुद्ध कुछ काररवाई भी न होने पाये । अगर मामलों को गंभीरता से लिया जा रहा होता तो राजनीति में लोग अपनी जबान पर लगाम लगाने को मजबूर होते । लेकिन ऐसा होता नहीं ।

मेरा मत है कि किसी का माफी मांगना तभी कोई अर्थ रखता है जब उसे इस बात का अहसास हो कि उसने वाकई गलत कार्य किया है, जब उसे अपने किए पर आत्मग्लानि हो, जब उसे घटना पर शर्मिदंगी अनुभव हो, जब उसके मन मैं यह संकल्पभाव जगे कि उसके हाथों ऐसा अनुचित कर्म फिर न होने पाए । ऐसा व्यक्ति ही क्षमा का हकदार होता है । धर्मशास्त्रों के अनुसार ऐसा व्यक्ति ही पापमुक्त होता है । लेकिन हमारी राजनीति में माफी मांगने वाले के चेहरे पर आत्मग्लानि के भाव नहीं दिखते । वह कुछ इस अंदाज में माफी मांगता है कि जैसे कहना चाहता हो, “तू कह रहा है न, चल माफी मांग लेता हूं । तुझे भी तसल्ली हो जाएगी । मेरे बाप क्या जाता है !”

ऐसे में माफी मांगना महज एक रस्मअदायगी बन के रह जाती है । व्यक्ति के मन में जो दुर्भावना रहती है और उसके आचरण में जो दुर्जनता छिपी होती है वह ऐसी माफी के बाद भी यथावत बनी रहती हैं ।

क्षमायाचना का आत्मग्लानि के भाव से गहन संबंध है इस तथ्य को राजनेता नहीं तो कम से कम आम आदमी तो समझे । – योगेन्द्र जोशी

 

 

राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना देशहित में होगा या …?

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

आलोचना राहुल गांधी की

यदि मैं राहुल गांधी पर कोई नकारात्मक या आलोचनात्मक टिप्पणी करूं तो कांग्रेसजन आगबबूला हो जाएंगे । चूंकि प्रायः सभी लोग कहते हैं कि इस देश में अपनी बात कहने का सबको हक है, इसलिए मैं भी कुछ कहने की हिम्मत कर रहा हूं । शायद दो-चार ऐसे लोग मिल जाएं जो मुझसे सहमत हों । तब यह समझूंगा कि मेरी बात सौ फीसद मिथ्या नहीं मानी जा रही, अन्यथा खुद के खयालात पर शक होने लगेगा ।

मेरी नजर में राहुल गांधी राजनैतिक दृष्टि से नितांत अपरिपक्व हैं । वे नहीं जानते कि उन्हें क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं । लगता है उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की भी जानकारी नहीं । अपने भाषणों में वे अपने एवं अपने परिवार की बातें जरूरत से अधिक करते है, परिवार के तथाकथित त्याग की चर्चा करते हैं, गोया कि लोग, यानी आगामी चुनावों के मतदाता, अपने समस्त कष्टों को भूलकर उनकी पार्टी को सत्ता सोंप देंगे ।

आगामी (2014) केंद्रीय सरकार का प्रधानमंत्री

कह नहीं सकता कि अगली सरकार कांग्रेस की अगुवाई में बनेगी या नहीं । मुझे नहीं लगता कि इस पार्टी को खास सफलता मिलेगी । उनके नाम उपलब्धियों की तुलना में विफलताएं कहीं अधिक हैं । जनता शायद उन्हें वोट देना पसंद न करे । तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं बनेगा, यदि बनेगा तो कैसे ये सवाल अभी पूर्णतः अनुत्तरित हैं । जिसका जन्म अभी हुआ नहीं उस तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी इसकी संभावना मेरे मत में क्षीण है । हो सकता है भाजपा अधिक सीटें ले जाए, लेकिन अपर्याप्त । मुझे डर है कि वह सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में समर्थन जुटाने में असफल रहेगी । क्या पता अन्य दल तथाकथित “सेक्युलरिज्म” के नाम पर उसे रोकने की कोशिश में एकजुट हो जाएं । इस देश में सेक्युलरिज्म का फेबिकॉल दुश्मनों को भी आपस में जोड़ सकता है । इसलिए अंततः घूमफिर के कांग्रेस के हाथ में ही कमान आ जाए, किंतु उसकी स्थिति इस बार काफी कमजोर रहेगी ।

अगर जोड़तोड़ करके कांग्रेस ने सत्ता संभाल ही ली तो उसका प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह बात फिलहाल भविष्य के गर्त में ही छिपी है । मेरा मानना है राहुल गांधी इस पद को स्वीकार नहीं करेंगे । मैं उन्हें मूर्ख तो मानता हूं (क्षमा करें यदि आपको बुरा लगे तो), लेकिन वे महामूर्ख नहीं हैं कि इस समय खाहमखाह जोखिम उठाएं और अपना भविष्य दांव पर लगाएं । परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं हैं, भले ही कांग्रेस-नीत सरकार बन जाए ।

यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार ही सभी निर्णय लेता है । वह परिवार ही अंततोगत्वा बताएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा । राहुल गांधी को यह जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे “हां” या “न” कहें । अन्य लोगों को यह अधिकार नहीं है । अतः जिसे यह परिवार कहेगा उसे प्रधानमंत्री का पद सम्हालना ही पड़ेगा ।  और इस कार्य के लिए अपने मनमोहन जी से बेहतर कौन हो सकता है ? उन जैसा समर्पित व्यक्ति भला कौन हो सकता है । कांग्रेसजन लाख कहें कि उनकी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री का चयन चुनाव जीतकर आए सांसद करते हैं, हकीकत में ऐसा है नहीं ।

आन्तरिक लोकतंत्र का अभाव

दरअसल भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है देश के अधिकांश दल किसी न किसी व्यक्ति या परिवार की बपौती बनकर रह गये हैं, जहां संपूर्ण अधिकार मुखिया या उसके परिवार में निहित रहते हैं । कांग्रेस ही में यह नहीं है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही कहानी है प्रायः सभी दलों की है । एनसीपी के फारूख अब्दुला, अकाली दल का बादल परिवार, लोकदल के अजीत सिंह, सपा के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती, राजद के लालू यादव, लोजपा के रामविलास पासवान, त्रिणमूल की ममता, बीजद के बीजू पटनायक, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, एमएनएस के राज ठाकरे, डीएमके के करुणानिधि, एआईएडीएमके की जयललिता, तथा अन्य कई दलों की यही कहानी है । इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नाम की चीज ही नहीं है, लेकिन वे लोकतंत्र की बात करते अवश्य हैं । खैर, मेरे कहने से क्या होता है !

मैंने कहा कि मैं राहुल गांधी को कुछ हद तक मूर्ख मानता हूं, क्योंकि वे कई मौकों पर बेसिरपैर की बातें कर जाते हैं । कांग्रेसजनों की खूबी यह है कि वे हर हाल में उनकी बातें सही ठहराते हैं । राहुल भला कैसे गलत हो सकते हैं ? वे हमारे नेता हैं जो भी कहते है सही कहते है, दूसरे लोग ही गलत समझते हैं । वाह रे राजनैतिक दर्शन ! किसी लोकतांत्रिक दल में यह हो ही नहीं सकता कि किसी एक सदस्य की सभी बातों को समवेत स्वर में सही कहा जा सके । किसी विशिष्ट व्यक्ति के साथ अन्य सदस्यों की यदाकदा असहमति हो यह किसी भी लोकतांत्रिक दल के लिए स्वाभाविक है । राहुल गांधी की गलतियों को कांग्रेसजन कभी भी सहजतया क्यों नहीं स्वीकारते ?

तथ्यहीन उद्गार

मेरा राहुल गांधी के प्रति जो नजरिया है उसके कारण स्पष्ट करना चाहूंगा । हाल में इंदौर की रैली में उन्होंने कुछ बातें कहीं जो हास्यास्पद अथवा आपत्तिजनक, और उनकी अपर्याप्त जानकारी के द्योतक मानी जा सकती हैं । मैं उदाहरण पेश करता हूं:

(1) राहुल गांधी भाजपा का नाम नहीं लेते हैं, किंतु जब वे सांप्रदायिक ताकतों की बात करते हैं तो इशारा भाजपा की ओर ही रहता है । उनकी बातों से लगता है कि देश में सभी दंगे भाजपा ही कराती है । क्या कभी यह बातें प्रमाणित हुई हैं ? इन दंगों के दौरान केंद्र सरकार ओैर राज्य सरकारें कहां सोई रहती हैं ? और जब शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो क्या वे भी भाजपा-प्रायोजित होते हैं ? देश के तथाकथित “सेक्युलरवादी दल” सभी दंगों के लिए आंतरिक कारणों के तौर पर भाजपा और बाह्य कारणों के तौर पर पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” को जिम्मेदार मानते हैं बिना असंदिग्ध प्रमाणों के ।

(2) राहुल गांधी दंगों के संदर्भ में बिना नाम लिए भाजपा को समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने और मारकाट मचाने वाली पार्टी कहते हैं । उसी रौ में वह अनर्गल बोल जाते हैं: “इन लोगों ने मेरी दादी को मारा, मेरे पिता को मारा, और अब मुझे भी मार डालेंगे ।” कौन हैं उनके वक्तव्य के “ये लोग” ? किसकी ओर इशारा है उनका ? क्या उनको यह मालूम नहीं कि उनके दादी-पिता किसी दंगे के शिकार नहीं हुए । वे कुछ हद तक अपनी ही गलतियों से मारे गये । कैसे ? क्या वे इस हकीकत को नहीं जानते कि उनकी दादी, इंदिरा गांधी, ने सेना को अमृतसर के स्वर्णमंदिर में घुसकर भिंडरावाले का सफाया करने का आदेश दिया था ? सिखों की दृष्टि में यह मंदिर को अपवित्र करने की घटना थी । इससे दो-चार सिख उनकी जान के दुश्मन बन गये थे । कहा जाता है कि उनकी दादी को अपनी सुरक्षा में समुचित तबदीली की सलाह दी गयी थी जो उन्होंने नहीं मानी । उसी तंत्र से एक सिख ने गुस्से में उनकी जान ले ली थी ? कौन जिम्मेदार था ? इसी प्रकार श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के विरुद्ध वहां की सरकार को उनके पिता, राजीव गांधी, ने भारतीय सेना की टुकड़ी भेजी थी । कई तमिलों की नजर में यह उनके तमिल-बंधुओं के विरुद्ध कदम था । और उन्हीं में से एक ने मानव-बम बनकर उनकी जान ले ली ? भाषण हेतु मंच पर वे लोग पहुंचे कैसे ? किसकी गलती थी ?

(3) मुजफ्फरपुर के हालिया दंगों के सिलसिले में जो बात राहुल गांधी ने कही उसे मैं अक्षम्य और आपत्तिजनक मानता हूं । क्या कहा यह आरंभ में दिए न्यूज-क्लिप से स्पष्ट है । राहुल गांधी को किस खुफिया अधिकारी ने कथित बातें बताईं और किस हैसियत से ? क्या खुफिया अधिकारी इतने मूर्ख होते हैं कि सरकार का हिस्सा न होते हुए भी राहुल गांधी को खुफिया जानकारी दें ? इसके अलावा उसने अपने उच्चाधिकारियों को समुचित रिपोर्ट दी ? नहीं ! इसके अलावा यह कहना कि पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” वहां के 10-15 नौजवानों के संपर्क में है कहां तक सही है ? क्या वे सच बोल रहे हैं या जनता को महज मूर्ख बना रहे हैं ? देश में अनेक जन उनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं । तब क्या उन्हें सोच-समझकर नहीं बोलना चाहिए ?

राहुल गांधी: प्रधानमंत्री बन गये तो?

मुझे लगता है कि राहुल गांधी यदि सचमुच में प्रधानमंत्री बन गये तो इस देश का बंटाधार ही होगा ! जो व्यक्ति ऐतिहासिक तथ्यों को न जानता हो, जो भावनाओं में बह जाता हो तथा अपने परिवार का गुणगान करने लगता हो, और शब्दों को नापतौलकर न बोल पाता हो, वह क्या सफल प्रधानमंत्री हो सकेगा ? ऐसे व्यक्ति को समुचित सलाह देने वाले साथ हों तो समस्या नहीं होगी । लेकिन आज की कांग्रेस की यह परंपरा बन चुकी है कि राहुल गांधी कुछ गलत भी बोल जाएं तो उसका भी कांग्रेसजन एक सुर से समर्थन करते हैं । उनकी कोई भी बात न काटी जाए यह उस दल की नीति बन चुकी है । तात्पर्य यह है कि तब उस दल में कौन होगा जो सही सलाह दे ?

मैं भाजपा का पक्षधर नहीं हूं । उसे मैं वोट नहीं देता । दरअसल मैं पिछले 10-12 सालों से किसी भी दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता । मेरी दृष्टि में सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं । जब मौका मिले आपस में गले लग जाते हैं, और जरूरत पड़े तो एक-दूसरे के विरुद्ध अनापशनाप बोल जाते हैं । येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाना उन सभी का लक्ष्य बन चुका है । भाजपा सत्ता में आ जाए तो भी कोई मौलिक शासकीय परिवर्तन नहीं होने का ।

मेरी ये बातें भाजपा का पक्ष लेकर नहीं कहीं गई हैं । मैं तो राहुल गांधी की अनर्गल बातों की आलोचना कर रहा हूं । – योगेन्द्र जोशी

शौचालय पहले या देवालय? बात-बात पर धर्म/संस्कृति के नाम पर आाहत होना

          अभी चंद रोज पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने एक बयान देकर हिन्दुओं को धार्मिक रूप से “आहत” कर दियाइससे पहले कांग्रेसी नेता एवं मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसा ही बयान दिया था । बहुत से लोग तब भी नाखुश हुए थे । लेकिन इस बार मामला कुछ लोगों को अधिक गंभीर लगा, क्योंकि मोदी कथित तौर पर कट्टर हिन्दूवादी नेता की छवि रखते हैं, अतः उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी । लोग भूल जाते हैं कि तरह-तरह के कभी शिष्ट तो कभी अशिष्ट बयान तो राजनेता देते ही रहते हैं । उनकी जबान पर इस स्वतंत्र “इंडिया दैट इज भारत” राष्ट्र में कोई रोक नहीं है । दरअसल कुछ और चीजें देश की जनता को मिले या न जो मुख में जो आया उसे बक देने की स्वतंत्रता तो सबको मिली ही है । क्यों न कोई इसका फायदा उठाए ? आम आदमी – मेरा मतलब “आप” पार्टी के सदस्य से नहीं है – कुछ कहे तो मीडिया उसे जनजन तक नहीं पहुंचाएगा, परंतु मोदी सरीखा व्यक्ति कुछ कहे और उसकी चर्चा न हो यह असंभव ही है ।

मोदी का बयान ठीक था या अनुचित यह कह पाना कठिन है, क्योंकि हम सब इन चीजों को अपने-अपने नजरिये से देखते हैं और “मेरे विचार ही सही हैं” का भाव रखते हैं । व्यक्तिगत तौर पर मुझे आपत्ति की कोई बात नहीं लगती, जिसके कारण हैं । लेकिन मोदी के कथित धुरविरोधी तोगड़िया बेहद नाखुश हैं । देखें बीबीसी समाचार

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_indiabol_ss.shtml

खबर है कि इस सिलसिले में “मानवाधिकार पार्टी” के प्रवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, वाराणसी, की अदालत में याचिका दाखिल कर रखी है, जिसकी सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

(देखें http://khabar.ibnlive.in.com/news/109403/12)

मेरी समझ में नहीं आता कि अपने देशवासी (हिंदू हों या मुस्लिम, सिख, इसाई, आदि) बात-बात पर “हमारी धार्मिक भावना आहत हुई है” का हल्ला मचाना क्यों शुरू कर देते हैं । अदालतें भी ऐसे वाद को बहस के लिए कैसे स्वीकार लेती हैं, यह जानते हुए कि अंततः कुछ निकलना नहीं है, सिवाय न्यायाधीश के समय की बरवादी के ? इतना ही नहीं मोदी के कथन के संदर्भ में कैसे कोई दावा कर सकता है कि सभी हिंदू आहत हुए हैं ? मैं भी एक हिंदू हूं और मैं मोदी का समर्थक न होते हुए भी उसके उक्त वक्तव्य का समर्थन करता हूं । दरअसल जिन दो-चार लोगों से मैंने पूछा किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की । सवाल उठता है कि जो व्यक्ति आपत्ति करता है वह कैसे पूरे हिंदू समुदाय (या किसी अन्य धार्मिक समुदाय) की भावनाओं का ठेका ले लेता है ?

हिंदू समाज की विशेषता यह है कि हम जहां-तहां मंदिर खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी लेते हैं । जो देवालय पहले से ही अस्तित्व में हैं क्या वे पर्याप्त नहीं हैं ? उससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि हम देवी-देवताओं को देवालयों में ही क्यों खोजते हैं ? जिन के घरों में पूजाघर हैं वे भी अपने घर में स्थापित देवी-देवताओं को देवालयों में क्यों खोजते हैं ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि लोग उसी देवता की महत्ता को अलग-अलग देवालयों में स्थापित होने पर अलग-अलग प्रकार से आंकते हैं ? लोगों को अक्सर कहते हुए सुनता हूं कि इस मंदिर के हनुमानजी यह मनोकामना पूरी करते हैं और उस मंदिर के हनुमानजी उस मनोकामना को, गोया कि हनुमानजी भी कई हों और वे अलग-अलग प्रकार से पेश आते हों । कहने का मतलब यह है कि देवी-देवतोओं की पूजा-अर्चना तो घर में भी उसी श्रद्धा से की जा सकती है जो देवालयों में संभव है । पुरातन मंदिरों का महत्व कुछ हद तक समझ में आता है, क्योंकि वे प्रायः पौराणिक कथाओं से संबद्ध होते हैं, जैसे शक्तिपीठों के देवी मंदिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि । लेकिन जो नित नये मंदिर स्थापित होते हैं उनके साथ तो ऐसी बात भी नहीं रहती ।

कहने का मतलब यह है कि देवालयों की वैसी आवश्यकता वस्तुतः नहीं है जैसी जनसुविधाओं एवं सामुदायिक संस्थाओं की यथा अस्पताल, स्कूल-कालेज एवं शौचालय । इनके संदर्भ में अपने देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है । कहा जाता है कि शौचालयों के मामले में तो अपना देश कुछ अविकसित देशों से भी पीछे है । और तब कोई यदि शौचालयों की वकालत करे तो क्या गलत करता है ? हाल के वर्षों में कितने देवालय बने हैं मैं कह नहीं सकता, किंतु बनते जरूर हैं और आगे भी बनेंगे यह सत्य है । आप दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देख लीजिए, कितना पुराना है ? कितना विशाल और भव्य है यह ? जितना खर्च इसे बनाने में लगा होगा उसमें न जाने कितनी जनसुविधाओं की व्यवस्था देश के कोने-कोने में संभव हो सकती थी । यह सही है कि यह स्वयं में पर्यटक-आकर्षण बन सकता है, किंतु यह जनसामान्य की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करता । और इसे फिलहाल तो धार्मिक आस्था वालों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है ।

यों तो उपसना स्थल अन्य धार्मिक समुदायों के भी बनते हैं, लेकिन वे जहां-जहां, जब-तब नहीं बनते रहते हैं । वे योजनावद्ध तरीके से, पर्याप्त आकार के, और स्थानीय सामुदायिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बनते हैं । लेकिन हिंदू मंदिर कब-कहां रातोरात खड़े कर दिये जाएंगे कहना मुश्किल है । कम से कम मैं अपने शहर बनारस में यही देखता आ रहा हूं । मैंने तो यह भी महसूस किया है कि कभी-कभी इन मंदिरों की आड़ में अतिक्रमण करने में भी किसी की आस्था आहत नहीं होती है । सड़क के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर रातोंरात एक मूर्ति रख दो, उस पर पुष्पादि चढ़ाना आंरभ कर दो, तो राह चलते अन्य जन भी फूलपत्र चढ़ाना शुरू कर देंगे । फिर उसे थोड़ा बढ़ा दो और उसके बगल में छोटा-मोटा कारोबार करना आरंभ कर दो, मंदिर को बीच-बीच में बढ़ाने का काम करो और साथ में अपना करोबार भी । इस प्रकार अतिक्रमण सफल हो जाता है । कुछ ऐसा घटित होते मैंने देखा है । इस बात को मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं:

हाल में अपने शहर वाराणसी में प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर सड़कों को चौढ़ी करने का सफल अभियान छेड़ा है । दिखावटी अभियान तो कई बार पहले भी छेड़े गए, किंतु वे कभी प्रभावी नहीं रहे । इस बार वाकई गंभीरता दिखी । उसी के परिणामस्वरूप यहां के करीब 500 मीटर के लंका-नरिया सड़क का नजारा ही बदल गया । पहले जो सड़क करीब 20-22 फुट चौड़ी थी अब करीब 35-40 फुट चौढ़ी हो गई है । मुझे इस शहर में रहते 40 वर्ष से अधिक हो चुके हैं । मैं उक्त सड़क के बारे में यही सोचता था कि शहर पुराने ढर्रे का है, इसलिए यहां के हिसाब से ये सड़क बनी ही ऐसी होगी । सोचा न था कि सड़क के किनारे के मकान-दुकान तो अतिक्रमण की देन हैं । अब जाना कि सड़क के एक सिरे से दूसरे तक लगभग 15 फुट चौढ़ी पट्टी अतिक्रमित थी । असली दिलचस्प पहलू तो यह है कि चौड़ीकरण के बाद अतिक्रमित भूमि पर बने 3-4 मंदिर भी खुले में – असल में अब नये बने डिवाइडर पर या उसके निकट – नजर आने लगे । मैं एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Mid-Road Temple-1

तस्वीर में दिखाए मंदिरनुमा ढांचे की सीध में पहले मिठाई की दुकान थी जो अब करीब 15 फुट पीछे चली गयी है । अब लगता है इस ढांचे में रखे शिवलिंग की कद्र भी करने वाला कोई नहीं । ये सभी कोई प्राचीन मंदिर नहीं हैं, बल्कि आस्था के नाम पर बनाये गये अवैधानिक ढांचे हैं । हमारी आस्था हमें अतिक्रमण से नहीं रोकती । आस्था के नाम पर प्रशासन भी इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करता ।

लोग चाहते हैं कि उनकी भावनाओं को अन्य जन ठेस न पहुचाएं । परंतु वे स्वयं दूसरों की भावनाओं की कद्र करना क्यों भूल जाते हैं ? वे क्यों इसे अपना अधिकार समझते हैं कि आस्था के नाम पर उन्हें हर चीज की छूट हो, भले ही उससे दूसरों को घोर असुविधा हो । मेरे शहर वाराणसी में धर्मकर्म के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन होते रहते हैं जिससे सड़कों पर जाम लगता है । कई मौकों पर सड़क घेरकर पूजा-पंडाल तन जाते हैं, दूसरों की परवाह किए बिना । सर्वाधिक आपत्तिजनक तो यह होता है कि लाउडस्पीकरों से शोर मचाया जाता है । मेरे घर के पास ही एक मंदिर है और उसी के सामने सड़क पार एक अस्पताल है । आये दिन मंदिर में कोई न कोई आयोजन होता है और उसके साथ लाउडस्पीकरों से कानफाड़ू शोर । सोचिए कि अस्पताल के मरीजों का क्या हाल होता होगा जहां शोर मचाना मनाही रहती है ।

आपत्तियां अनेकों हैं । हम श्रीगंगा नदी के प्रदूषण की चर्चा करते हैं और उसके नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद भी कर चुके हैं, लेकिन उसमें गंदगी गिराने से नहीं हिचकते हैं । उसमें अधजले शव तक बहा देते हैं । नवरात्र की दुर्गा-प्रतिमाएं विसर्जित तो की ही जाती हैं, अब शहर वाराणसी में कालीपूजा, सरस्वतीपूजा, गणेशपूजा, विश्वकर्मापूजा आदि अनेकों पूजाओं के नाम पर स्थापित प्रतिमाएं भी श्रीगंगा को समर्पित की जाती हैं । और यह सब होता है आस्था के नाम पर ।

आस्था के इन तमाम खेलों पर कोई आपत्ति उठाता है, या उस पर टिप्पणी करता है तो लोग आक्रोषित हो उठते हैं । देवालयों की आवश्यकता नहीं है, हमें आवश्यकता है शौचालयों की ऐसा कहने पर तुरंत भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है का राग अलापना शुरू हो जाता है । लोगों को विवेकशील होकर विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में क्या पहले शामिल होना चाहिए और क्या बाद में । – योगेन्द्र जोशी 

My words on October 2 – Gandhi Jayanti and International Nonviolence Day

Mahatma, the Naked Fakir

I hold Mahatma Gandhi, the so-called Naked Fakir, in great reverence. I count him to be one of those few 10-20 historical persons for whom I have a special sense of respect. These include, Buddha, Socrates, and Christ, etc. I do that not because they were perfect human beings, or superhumans, or God- incarnates. In my opinion, they were mortals like us, but with a distinctly different personality. They were people having determination, compassion, sensitive to the miseries and ills of life, and commitment to some cause. I believe that they had their own weaknesses and that they might have had committed trivial wrongs in their own times, yet they had strength of character that dwarfed their weaknesses. And these points made them nearly singular in the society.

Today is October 2, Gandhi Jayanti and International Nonviolence Day. Gandhi is remembered and respected almost exclusively for his commitment and advocacy to nonviolence. But my respect for him is based more on other aspects of his life. In Indian history Mahavir and Buddha were perhaps the greatest advocates of nonviolence and compassion not only for human beings but also for all living beings. Gandhi was not the first to advocate nonviolence. True that he was perhaps the first to advocate that in the wider political context.

Ahimsa, Nonviolence

I should point out here that ancient Indian pieces of literature talk about of Ahimsa – the opposite of Himsa. This is translated to nonviolence in English. But the two are not synonymous, because Ahimsa has much wider scope. It refers to abstaining from any ill towards others – all living beings, in fact!  It refers to avoidance of commitment of an ill in action (कर्मणा, Karmana), in speech (वाचा, Vacha), and in thought (मनसा, Manasa). I do not believe the term ‘nonviolence’ connotes that much.

We mostly relate violence to actions that physically harm a person, damage their property, etc. Physical damage of any kind is definitely so obvious that people will always criticize violence. Is uttering foul words to somebody not equally bad? It may have deep-rooted effect on one’s psyche. I do not know if violence also refers to speaking words that hurt others. But I emphasize that when we talk of Ahimsa we also mean that one should avoid harbouring ill thoughts about others. You may argue that that is immaterial simply because others cannot know about it unless it gets translated to a speech or to an action. That is true, but the person concerned knows what he thinks and thinks not. I can imagine some human actions the knowledge of which may remain secret to others except to the person herself/himself. One can well imagine such things as I do.

Well, that is how I define Ahimsa, somewhat different than nonviolence. Anyway my interest here lies not in defining this term. What I find strange is that people the world over know Gandhi only in the context of violence. Is that the most important aspect of Gandhi’s personality, his philosophy of earthly life? Perhaps not! We conveniently ignore many other things which he was committed to. But Ahimsa or nonviolence, whatever you call it, is most talked about because practically every human being fears violence and strives to evade that. Violence is something that can indiscriminately harm any human being; no one can be safe if violence spreads anywhere.

Gandhi: There’s more than Ahimsa 

But other positive aspects of Gandhi’s life are considered to be not as much important as Ahimsa. What are these? I am not one who has devotedly and in detail studied Gandhi. My knowledge and understanding of him are limited, but they suffice for me to present some comments. We must remember that Gandhi also advocated many things like:

  1. Respect for physical labour. He teaches us that one should not shirk physical labour oneself. One must also respect all fellow humans engaged in work demanding physical labour.
  2. Social and economic equality. It is true that all human beings are not born equal, their physical and mental abilities often differing remarkably. But Gandhi advocates that a civilized society should take steps to reduce economic disparity. People poorer in competence must be helped by those better-off. Likewise we must treat all human beings equal and extend respect to everyone. All this does not mean we ignore anybody’s wrongs.
  3. Avoiding exploitation of the weaker in the society. Exploitation is definitely the most damaging to the society. Most ills of the society originate from this instinct of humans. Not paying adequately for somebody’s service is a weakness of most of us. But we must remember that we also are bestowed with wisdom. If we decide we can become superior beings. How many value that?
  4. Compassion for fellow humans. Gandhi was of the opinion that people committed only to their self-interests cannot form a truly civilized society. He favoured that we must all take care of the larger good of the society. How many people feel compassionate towards others? How many are willing to extend helping hand to a needy person? Perhaps not even those who can afford that.
  5. Truth and honesty These were perhaps closest to Gandhi’s heart. But how many of us have in practice a reasonable appreciation for these virtues? No one can become a perfect human being, but one can still avoid becoming totally dishonest. The rampant corruption and dishonesty in our society shows we have no respect for these virtues. Where are we vis a vis Gandhi?
  1. Setting imitable examples. There is a saying “महाजनो येन गतः सः पन्था (महाभारत)” (follow the path set by the great – Mahabharat). Who is great? The term महाजन (Mahajan) or the great refers to one who has a distinct position in the society, is known for character and integrity, is respected for being helpful to others, etc.  Such people are followed by others, and therefore they have the sacred responsibility of setting examples before others. At present do we have people in our society who set imitable examples before others? The responsibility lies first on those who are higher in position in the society. Unfortunately, things are far from what Gandhi would have expected of us.

These are some points that come to my mind on this occasion of Gandhi Jayanti. One can present similar more points.

What I find discouraging is that while we emphasis Gandhi’s nonviolence, we almost ignore other things that Gandhi stands for. All these other things are not less important, remember!

बाबागिरी का खूबसूरत धंधा बनाम आसाराम बापू पर लगे आारोप

निवेदन

सर्वप्रथम मैं राजनेताओं एवं ‘संत-महात्माओं’ के समर्पित भक्तों से क्षमायाचना करता हूं, क्योंकि मैं जो कहने जा रहा हूं उससे वे आहत अनुभव कर सकते हैं । उनसे यही निवेदन है कि वे आगे न पढ़े । उनके आहत होने की संभवना से मैं अपनी बात कहना बंद नहीं कर सकता । किसी को बातें बेहद घटिया लग सकती हैं तो कुछ को उनमें तथ्य नजर आ सकते हैं । कोई भी व्यक्ति सबके मन की नहीं कर सकता है । अतः जिसे पसंद न हो वह खुद ही दूर हो जाए यह नीति ही ठीक है ।

asaram bapu

सम्मान खोती जमाअतें

समाज के दो जमाअतों के प्रति मेरे मन में मुश्किल से कुछ – यों कहिए कि बहुत ही कम – सम्मान बचा है । पहली है राजनेताओं की जमाअत और दूसरी है उन लोगों की जो अध्यात्म के नाम पर दुकानें खोलकर स्वयं को भगवान, महात्मा, संत, संन्यासी, आदि उपाधियों से संबोधित करवाते हैं । यह मेरा दुर्भाग्य है कि इस इक्कीसवीं सदी में शायद ही कोई भारतीय राजनेता दिखाई देता है जिसे मैं सम्मानीय समझ सकूं । सामान्य शिष्टाचार के नाते मैं किसी के प्रति अपशब्द प्रयोग नहीं करना चाहूंगा, किंतु मन में श्रद्धाभाव नहीं उपजता यह बात तो कह ही सकता हूं । यही बात तथाकथित साधु-संतों के बारे में भी कहता हूं । दुर्भाग्य से किसी ऐसे व्यक्ति के दर्शन नहीं हुए जो मुझे अपने सत्कर्मों से प्रभावित कर सका हो । अभी मैं यहां पर राजनेताओं के बारे में कुछ नहीं कह रहा हूं ।

आरोप से घिरे आसाराम बापू

आजकल मीडिया में आसाराम बापू छाए हुए हैं कथित दुष्कर्म के आरोपों से घिरे हुए । असल मामला क्या है यह घर बैठे भला मैं कैसे ठीक-से जान सकता हूं ? मेरे पास महाभारत के संजय – प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र के ‘कमेंटेटर’ – की भांति दिव्यदृष्टि होती तो मामले का सही-सही ज्ञान मुझे बैठे-बैठे हो जाता । काश! कि ऐसा होता ।

आसाराम पर टिप्पणी करने से पहले मैं इस तथ्य का उल्लेख करना चाहता हूं कि आधुनिक काल भौतिकता और उपभोक्तावाद का है । बहुत से मनुष्यों को इस बात का भली-भली ज्ञान हो चला है कि जीवन के सुखदुःख सब इसी जीवन में भोगने होते हैं; इसके आगे कुछ है भी यह कोई माने नहीं रखता है । मनुष्य का पुनीत कर्तव्य है इस जीवन को यथासंभव सुख से जिये और अधिकाधिक सुखोपार्जन के लिए जो भी व्यवसाय ठीक लगे उसे अपना ले । इसी कारण आज वह सब खुलकर होते दिखाई दे रहा है, जिससे लोग कभी पाप कहते हुए बचते थे और जिसे ज्ञानी-धर्मात्मा नरक का मार्ग बतलाते थे । नरक-स्वर्ग, पाप-पुण्य, जन्म-परजन्म जैसे शब्द अब अपनी अहमियत काफी कुछ खो चुके हैं ।

इस धरती पर ऊपर वाले की सृष्टि में निरीह, धर्मभीरु, चिंतनक्षमता में कमजोर, और सरलता से सम्मोहित हो सकने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है । वे धर्मभीरु तो हैं किंतु धर्म की समझ नहीं रखते हैं, और आसानी से बहकावे में आ जाते हैं । उनकी कमजोरी का लाभ लेने के लिए कुछ अतिचतुर लोगों ने लाभप्रद व्यवसाय के तौर पर धर्म-अध्यात्म की दुकानें खोल ली हैं, और उन निरीह जनों के बल पर सुखभोग कर रहे हैं । वे जब तक इन निरीह जनों का शोषण सीमा के भीतर करते हैं तब तक दुकान बढ़िया चलती है, लेकिन जब कभी आत्मसंयम खोकर अमर्यादित आचरण कर बैठते हैं तो समस्या से घिर जाते हैं । आसाराम ऐसे ही ‘दुकानदार’ हैं जो दुर्भाग्य से अपनी अति के जाल में फंस गये हैं ।

बाबागिरी का कलयुगी धंधा

धर्म-अध्यात्म की दुकान खोलने/चलाने, जिसे में बाबागिरी कहता हूं, में सफल होने के लिए

(1) आपमें संबंधित हुनर होना आवश्यक है । बिना हुनर के तो किसी भी व्यवसाय में सफल नहीं हुआ जा सकता है ।

(2) दूसरा व्यक्ति में वह अदम्य इच्छाशक्ति होनी चाहिए की आप अपने हुनर का लाभ उठाने में हरगिज नहीं हिचकिचाएंगे । मान लें कि कोई लोगों के बटुए पर सफाई से हाथ फेर सकता है, लेकिन उसका मन गवाही न दे तो वह उसे नहीं कर सकता ।

(3) बाबागिरी के लिए व्यक्ति में लोगों को सम्मोहित करने की सामर्थ्य होनी चाहिए । अपने हावभाव, आधे-अधूरे अध्यात्मज्ञान, धार्मिक कथाओं की रोचक प्रस्तुति, लोगों की रुच्यानुसार भजन-कीर्तन गायन-वादन में भागीदारी, आदि से उनका मन मोहने की कला आनी ही चाहिए । परचून की दुकान के लिए शिष्ट व्यवहार काफी होता है, लेकिन बाबागिरी के लिए अभिनय-क्षमता भी जरूरी है ।

(4) बाबागिरि के माध्यम से सुखभोग की इच्छा रखने वाले में धैर्य का होना आवश्यक है । कोई यह न समझे कि वह रातोंरात बहुत कुछ पा जाएगा । जिस प्रकार फैक्टरी स्थापित करते समय उससे लाभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, केवल बाद में लाभ मिलने लगता है, वैसे ही बाबागिरी में भी होता है । आरंभ में स्वयं को लोगों के समक्ष ऐसे प्रस्तुत करना होता है कि व्यक्ति अलौकिक शक्ति का धनी है । अगर वह सफल हो गया तो एक-एककर निरीह जन उससे जुड़ने लगेंगे । उतावलापन हानिकर होता है ।

(5) जब लोग जुड़ने लगते हैं तो कोशिशें होती हैं कि राजनेता और उच्चाधिकारी भी बाबा के मायाजाल में फंसें, जो वक्त-बेवक्त बाबा का ही नहीं उसके ‘भक्तों’ का भी काम कर देेते हैं और उसका श्रेय बाबा को मिलता है । इससे अनुयायी ‘ब्रेन-वाश्ड’ हो जाते हैं और वे हर कष्ट से बाबा को उबारने में लग जाते हैं । ऐसे ही चेलों ने आसाराम को बचाने की कोशिश की होगी कानून को ताक पर रखकर !

(6) स्मरण रहे कि राजनेतागण वोट को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं । अनुयायियों की तादाद बढ़ाकर बाबा भय या भ्रम पैदा कर सकता है कि राजनेता अनुयायिओं का वोटबैंक खो सकते हैं । तब वे उसके पक्ष में बोलने को विवश हो जाते हैं और उसे पाकसाफ घोषित करने लगते हैं ।

(7) समय बीतने के साथ बाबा को सभी सुखसाधन मिल जाते हैं, जब अनुयायी उसपर बहुत कुछ न्यौछावर करने लगते हैं । स्थापित हो चुकने पर भी बाबा को अति से बचना चाहिए । जब तक वह समझदारी और सावधानी से बाबागिरी का सुख भोगता है कोई गंभीर टिप्पणी नहीं करता ।

(8) यदि कोई बाबागिरी के रास्ते कामपिपासा भी शांत करने की इच्छा करे तो उसके सामने खतरा अवश्य रहता है । अन्यथा यह मुमकिन है कि ब्रेन-वाश्ड हो चुके ‘भक्तों’ की भीड़ में समर्पित व्यक्ति मिल जाएं जो स्वेच्छया सहयोग दें और स्वयं को उपकृत समझें न कि ठगा हुआ । लेकिन कभी-कभी धोखा भी हो सकता है, जैसा लगता है आसाराम के साथ इस बार हो गया । मनुष्य ऐसी चूक कर बैठता है ।

(9) बाबागिरी में लगे तथाकथित संत अपने अनुयायियों का चुनाव नहीं करता, बल्कि वह तो चाहता है कि अधिक से अधिक लोग उससे जुड़ें । उसकी ‘अलौकिक’ शक्तियों से आकर्षित होकर कोई भी ‘भक्त’ बन जाता है । बाबा की तथाकथित शक्ति से कुछ पाने की लालसा में आपराधिक मानसिकता वाले भी उसकी भीड़ में शामिल हो लेते हैं । ऐसे अनुयायी काफी काम के होते हैं, जब कभी बाबा पर बाहरी तत्व ‘हमला’ बोलें तो ये खुद उपद्रव पर उतर आते हैं । आसाराम के ‘भक्तों’ में ऐसे लोग भी शामिल हैं यह मीडियाकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार से स्पष्ट है । आसाराम के लिए धरना-प्रदर्शन करने वाले इसी प्रकार के लोग हैं ।

(10) समझदार बाबा उल्टासीधा काम करने से पहले अपनी ऐसी छवि बनाता है कि उसके ‘ब्रेन-वाश्ड’ अनुयायी उसमें देवता के दर्शन पाएं । (वैसे कुछ देवता खुद में खुराफाती रहे हैं जैसे इंद्र जिसके बारे में तमाम पौराणिक कथाएं हैं ।) तत्पश्चात् बाबा कुछ भी करे वह उन लोगों को निर्दोष ही दिखेगा ।

कौन सच्चा, आसाराम या वह नाबालिग?

अब मैं आसाराम पर लगे मौजूदा आरोपों के संदर्भ में कुछएक शब्द कहता हूं । यह तो तय है कि आसाराम एवं उस नाबालिक लड़की में कोई एक तो दोषी है ही । जो कहते हैं कि आसाराम निर्दोष हैं वे प्रकारांतर से यह स्वीकारते हैं कि वह लड़की झूठ बोल रही है । वे खुले शब्दों में भले ही कुछ न कहें, उनका मंतव्य तो यही निकलता है कि वह मक्कार, बदचलन, बिकाऊ और साजिश में शरीक लड़की है । असल बात क्या है यह तो आसाराम और वह ही जानते हैं । जांचकर्ता तो उपलब्ध साक्षों के आधार पर निष्कर्ष निकाल सकते हैं, वह भी तब जब साक्ष बचे भी हों और ईमानदारी से जांच हो, जिसकी उम्मीद मैं तो नहीं करता । इसलिए सही बात जानना आसान नहीं ।

फिर भी मैं लड़की पर 99% भरोसा करूंगा और आसाराम पर मात्र 1% । इसके कई कारण हैं जिनमें

प्रथम तो यही है कि मेरी बाबा लोगों के प्रति नकारात्मक धारणा रही है ।

दूसरा मैं मानता हूं कि हमारे समाज में लड़िकयां ऐसे मामले की शिकार होने के बावजूद रिपोर्ट करने से कतराती हैं; यहां तक कि वे मां-बाप से तक नहीं बोल पाती हैं ।

तीसरा झूठा आरोप लगाकर अपनी ही बेइज्जती कराने वाली लड़कियां समाज में कम ही मिलेंगी, और वह लड़की शायद ही ऐसी खुराफाती हो ।

चौथा झूठा आरोप लगाकर आसाराम जैसे रसूखदार आदमी से पंगा लेने की हिम्मत उसने अकारण जुटा ली हो इसे मैं असंभव-सा मानता हूं । आसाराम तो करोड़ों की फीस देकर वकीलों की फौज की मदद ले सकते हैं, उनके सामने उसकी क्या औकाद ?

पांचवां आसाराम का कहना कि उन्हें साजिशन फंसाया जा रहा है बेमानी है, क्यों ऐसा तर्क तो हर अपराधी देता है ।

छटा आसाराम खुद को संत-महात्मा कहलवाते हैं, लेकिन इस बीच उन्होंने अपने बचाव के लिए तरह-तरह हथकंडे अपनाए । पाकसाफ एवं संत जैसा आदमी पुलिस से क्यों घबड़ाएगा भला ?

सातवां मेरी जानकारी के अनुसार आसाराम का विगत जीवन संदिग्ध रहा है ।

अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि आसाराम दोषी भी हों तो भी लचर न्यायिक व्यवस्था के चलते वे इस जीवन में दंडित नहीं होंगे । – योगेन्द्र जोशी

विडंबना

मानव समाज की विडंबना है कि यहां सच बोलने वाले को कहना होता है, “मैं झूठ नहीं बोलता ।”, और यही वक्तव्य झूठ बोलने वाले के मुख से भी निकलता है। कौन सच्चा तथा कौन नहीं यह जानना अक्सर कठिन होता है, और कभी-कभी तो असंभव भी ।

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23 मार्च, ‘दि अर्थ ऑवर, यानी पृथ्वी के नाम एक घंटा: है इसकी कोई अहमियत?

आज के दिन (अंताराष्ट्रीय मौसम दिवस – International Meteorological Day) संध्याकाल विश्व में ‘अर्थ ऑवर’ मनाया जाता है । अर्थात् दुनिया के प्रायः सभी देशों में रात्रि प्रथम प्रहर 8:30 बजे से घंटे भर के लिए रोशनियां बंद कर दी जाती हैं । यह दिवस अब 9 वर्ष पुराना हो चला है ।

          क्या है इस दिवस की अहमियत? यों दावा तो यही किया जाता है कि इसके माध्यम से इस धरती के बाशिंदों को ऊर्जा की अधिकाधिक बचत करने और जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस) पर अपनी निर्भरता घटाने का संदेश जाता है । और यह भी कि ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोतों को व्यवहार में लिया जाना चाहिए । जहां तक नये ऊर्जा स्रोतों का प्रश्न है, इस प्रकार के प्रयास तो विभिन्न देशों में चल ही रहे हैं और उसमें सामान्यतः आम आदमी का हाथ कम ही रहता है, क्योंकि इस प्रकार के प्रयास सरकारें अथवा संस्थाएं ही सामान्यतः कर पाती हैं ।

          आम आदमी तो ऊर्जा की बचत ही कर सकता है । दूसरे शब्दों में यह दिवस आम जनों को ऊर्जा की मितव्ययिता का संदेश देता है । मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई संदेश लोगों तक वास्तव में पहुंचता भी है ? और क्या वे इस संदेश को ग्रहण करते हैं ? यह ठीक है कि आज के दिन घंटे भर के लिए घर-बाहर की रोशनी बंद कर देंगे, लेकिन क्या उसके एवज में मोमबत्ती सरीखे प्रकाश-स्रोतों का इस्तेमाल नहीं करेंगे ? क्या उतने समय फ्रिज, ए.सी., टी.वी. जैसे विद्युच्चालित उपकरण भी बंद रखेंगे ? मामला केवल रोशनी बंद रखने तक सीमित नहीं है । आपको बिजली की खपत यथासंभव कम करनी है । क्या लोग तैयार हैं ? संदेश का असल मकसद क्या वे समझ पाते हैं, उसे ग्रहण करते हैं और तदनुरूप व्यवहार करते हैं ? मुझे संदेह है कि मुद्दे के प्रति समर्पण भाव से अपनी भूमिका स्वीकारते हुए ऐसा करने का विचार कम ही लोगों के मन में उपजता होगा ।

          और असल बात तो यह है कि यह दिन केवल प्रतीकात्मक है ऊर्जा की खपत घटाने के पक्ष में । वस्तुतः यह कार्य तो चौबीसों घंटे, 365 दिन चलना चाहिए । कितने लोग हैं जो जीवन में मितव्ययिता बरतते होंगे ? घरों में अनावश्यक बिजली-बल्ब न जलें इसका खयाल कितनों को रहता है ? ए.सी. जैसे सुविधा-भोग के साधन कितने लोग नहीं चाहते हैं ? कितने लोग निजी वाहनों के प्रयोग से बचते हैं ? कितनों के मन में यह विचार आता है कि जहां तक संभव हो साइकिल जैसे साधन प्रयोग में लेने चाहिए ? कितने लोग यह जानकारी रखते हैं कि ‘स्टैंड-बाई की अवस्था में छोड़े गये उपकरणों के साथ भी बिजली की खपत होती है जिसे रोका जा सकता है ? कितनों को मालूम है कि कैसे भोजन बनाते समय गैस की खपत घटाई जा सकती है ?

और मैं तो यह सवाल पूछता हूं कि आदमी धनोपार्जन करता ही क्यों है ? क्या समाजसेवा के लिए ? नहीं, भौतिक सुख-सुविधा के साधन जुटाने के लिए । और यदि वह मितव्ययिता ही बरतने लगे तो अपने धन का उपभोग करेगा कैसे ? उसे ढेर-सी धन-दौलत की जरूरत ही क्या रह जाएगी यदि वह कम से कम खर्चापानी चलाने का इच्छुक हो । स्मरण रहे कि आदमी के प्रायः सभी क्रियाकलाप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऊर्जा पर निर्भर होते हैं, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी जीवाश्म इंधनों से मिल रहा है । यह भी अनुमान है कि अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जो वृद्धि हो रही है वह ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरा करने भर के लिए भी पर्याप्त नहीं है ।

मेरा कहने का आशय यह है कि अर्थ ऑवर का संदेश यह समझा जाना चाहिए कि हमें मितव्ययिता अपनाते हुए सादगी भरी जीवनशैली अपनानी चाहिए, न कि एक-दूसरे की नकल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग में लेना चाहिए । मनुष्य और अन्य जीवधारियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को रहने योग्य यदि छोड़ना हो तो हमें भोगवाद से बचना होगा । कितने लोग हैं जो इस विचार से सहमत होंगे ? शायद गिनेचुने ही, बस !! – योगेन्द्र जोशी

शिंदे ने सच ही तो बोलाः जैसे लोग बोफोर्स भूल गए वैसे ही ‘कोल-गेट’ भी भूलेंगे

अपने देश के राजनेता जो मुंह में आया उसे ‘बकने’ में झिझकते नहीं हैं । उनकी बकबास की जब चारों ओर आलोचना होने लगती है तो अपने बचाव में चिरपरिचित कुतर्क पेश कर देते हैं, “मीडिया ने मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया ।” हाल में केन्द्र सरकार के गृहमंत्री ने कहा था, “जैसे लोग बोफोर्स भूल गए वैसे ही कोयला खदान आबंटन घोटाला भी भूल जाएंगे ।” आलोचना होने पर उन्होंने मीडिया को दोष न देकर निरीह भाव से कह दिया, “मैंने तो वह बात मजाक में कही थी ।” श्री शिंदे महोदय ने समझदारी दिखा दी ।

बेचारे शिंदे !! मजाक में कहा या गंभीर होकर, कहा तो उन्होंने सच ही । मैं समझता हूं कि बात को थोड़ा स्पष्ट करते हुए वे कह सकते थे, “जनता को भला लगे या अच्छा, बात तो सच है ।” सो कैसे ? हो सकता है वे अपना तर्क पेश करने में घबड़ा गए हों और बात को वहीं खत्म करने के चक्कर में “ये मजाक में कहा” कह बैठे हों । वे बात पर टिके रहकर अपना बचाव बखूबी कर सकते थे । सो कैसे बताता हूं:

किसी भी सामान्य आदमी को बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की तमाम घटनाओं की याद रहती है (बशर्ते कि वह डिमेंशिया या अल्जीमर रोग से पीड़ित न हो) । लेकिन वे घटनाएं स्मृतिपटल पर अंकित भर रहती हैं, और उन पर कभी-कभार चर्चा भी छिड़ जाती है । लेकिन रोजमर्रा की अपनी जिंदगी में आदमी सामान्य तरीके से ही जीता है । अगर कोई घटना निजी तौर पर किसी के लिए अति दुःखद एवं असामान्य रही हो तभी वह उस मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करती है । अन्यथा बात आई-गई ही होती है । आम आदमी के जीवन में बोफोर्स कांड भी इसी श्रेणी की घटना है । आदमी के लिए ऐसी घटनाएं इतिहास के पन्नों में दर्ज बातें होती हैं । वह उनके बारे में सोच-सोच कर जिंदगी नहीं बिताता है । ये बात तब भी माने रखती है जब चुनाव होते हैं । जिसको जिसे वोट देना होता है देता है, कोई घटना हुई हो या नहीं, खास तौर पर तब जब घटना बासी हो चली हो ।

सरकारी खजाने की लूट और साधिकार भ्रष्टाचार का हर मामला कुछ समय तक तो ताजा-ताजा रहता है, वह भी हर किसी के दिमाग में नहीं । और अंत में बासी पड़कर इतिहास के पन्नों में दब जाता है । बोफोर्स के साथ ही नहीं बल्कि हर मामले में यही हुआ है । हाल की जितनी ऐसी घटनाएं हुई हैं उन सबका हाल यही होना है । कुछ दिन मीडिया में जोरशोर से चर्चा और फिर उनकी जगह अन्य घटनाएं ले लेती हैं । चाहे कोयला घोटाला हो, टू-जी घोटाला, या कॉमन-वेल्थ गेम्ज घोटाला, या कोई और घोटाला सब एक न दिन भुला दिये जाने हैं । और इसी तथ्य को शिंदे महोदय ने अपने मुखारविंद से कह डाला । आखिर झूठ तो बोला नहीं । पता नहीं क्यों उनकी आलोचना होने लगी ।

सच तो यह है कि ऐसी किसी भी घटना का असर उन पर भी नहीं पड़ता है जो उस घटना में संलिप्त रहते हैं । आज तक किसी का कुछ बिगड़ा है क्या ? किसी को दंडित होना पड़ा है क्या ? मेरी याददास्त में तो कोई मामला नहीं है । जब उन संलिप्त लोगों के लिए भी घटना भुलाने की चीज हो, तब आम आदमी के लिए उसका मतलब ही क्या रह जाता है ?

मैं तो यह भी कल्पना कर बैठता हूं कि समय बीतने के साथ घटना के सक्रिय पात्र अपने नाती-पोतों को अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते होंगे कि देश की जनता को ऐसा चकमा दिया कि किसी को पता ही नहीं चला । जैसे मोहल्ले के बच्चे खेल-खेल में किसी की खिड़की का शीशा तोड़ डालते हैं और उस बेचारे भुक्तभोगी को पता ही नहीं चल पाता कि कारस्तानी असल में किसकी रही, ठीक वैसा ही हमारे देश के घोटालों के मामले में होता है । घोटाला हुआ भी क्या, अगर हुआ तो किसने किया, ये बातें दशकों तक पता ही नहीं चलतीं । और जनता को घटना की याद ताजा करने के लिए इतिहास के पन्नों पर लौटना पड़ता है । – योगेन्द्र जोशी

संस्कारहीनता की राह पर भारतीय समाज एवं गुवाहाटी की घटना

गुवाहाटी की घटना

पिछले दो-चार दिन से टीवी समाचार चैनलों पर अपने देशवासियों की एक बेशर्म हरकत की खबर छाई हुई है । खबर है असम राज्य के गुवाहाटी नगरी की, जहां पांच-छः दिन पहले युवाओं की भीड़ खुले आम व्यस्त राजमार्ग पर एक किशोरी/युवती को निर्वस्त्र करने या उसकी असमत लूटने की कोशिश में जुटा था ।

इसे मैं संयोग ही मानता हूं कि स्थानीय टीवी चैनल के संवाददाता एवं कैमरामैन वहां प्रकट हो गये । वे मानव-पशुओं की उस भीड़ से उस युवती को बचा तो नहीं पा रहे थे, अलबत्ता घटना की फूटेज वे जरूर बना सके । यही फूटेज देश भर में समाचार चैनलों की मुख्य खबर बन बैठी । अगर यह फूटेज न होता तो न लोगों को खबर लगती और न ही इतना हो-हल्ला मचता । और घटना सहज रूप से रफा-दफा हो गयी होती । उस भीड़ के ‘प्रमुख पात्रों’ ने सोचा नहीं होगा कि उनकी फोटो होर्डिंग पर प्रदर्शित हो जाएंगी, और उनकी गिरफ्तारी का पुलिसिया नाटक भी चल पड़ेगा ।

संबंधित संवाददाता का कहना है कि उसने पुलिस को तुरंत खबर दी थी । लेकिन भारतीय पुलिस दल से यह आशा तो की ही नहीं जा सकती है कि वह घटनास्थल पर अविलंब पहुंचे । संवाददाता का कहना था कि वह अकेले में असहाय था । उसने वारदात को अपने कैमरे में कैदकर देशवासियों को दिखाया तो । अन्यथा खबर दबकर रह जाती । इसके विपरीत एक ‘आरटीआई’ कार्यकर्ता का दावा है कि टीवी चैनल वालों के उकसाने पर ही भीड़ ने वारदात को अंजाम दिया । अब संवाददाता गौरवज्योति नियोग स्वयं आरोपों के घेरे में है ।

इस देश में कौन सच बोलता है और कौन झूठ यह कहना असंभव-सा है । कोई भी प्रमाण यहां विवादास्पद बनकर रह जाता है । भगवान ही देश का मालिक है!

समाज में फैल रही संस्कारहीनता

उक्त घटना की व्याख्या मैं इस देश में निरंतर बढ़ रही संस्कारहीनता के प्रतिबिंब के रूप में करता हूं ।
देशवासियों ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर डाला है । स्वतंत्रता का अर्थ अब स्वच्छंदता, निरंकुशता, अनुशासनहीनता लिया जाने लगा है । नियम-कानूनों का उल्लंघन, जो मर्जी आए वह कर बैठना, जब जो मन में आए बक देना, आदि लोगों का शगल बन चुका है ।

संस्कारहीन व्यक्ति समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है ।
वह सहनागरिकों को सम्मान नहीं दे सकता है ।
वह दूसरों की सुविधा-असुविधा की परवाह किए बिना अपने हित साधता है ।
मेरा काम कैसे निकले यही उसकी चिंता होती है ।
इत्यादि ।

आप दावा करेंगे कि देश में अधिकांश लोग संस्कारहीन नहीं हैं । आपकी बात अवश्य ही सच है । लेकिन जिस समाज में सौ में एक भी संस्कारहीन नहीं होना चाहिए, वहां सौ में पांच वैसे हों तो उसे कम कहेंगे क्या ? समाज को दूषित करने के लिए 50 फीसदी लोगों की जरूरत होती है क्या ? तथ्य तो यह है कि बस चंद लोग ही समाज का स्वरूप बिगाड़ने के लिए काफी होते हैं । और अपने समाज में उनकी कमी नहीं है ।

उदाहरण एक नहीं, अनेकों हैं

यह संस्कारहीनता हमारे सामाजिक जीवन में अलग-अलग रूपों में उजागर हो रही है । कहीं वह अपेक्षया महत्वहीन घटना को जन्म दे रही है, तो कहीं अपने को बेहद घिनौनी सूरत में पेश कर रही है । देश इस समय भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा है तो वह संस्कारों के अभाव के ही कारण है । सरकारी मुलाजिम मोटी तनख्वाह ऐंठने के बावजूद कर्तव्यों से आंखें मूंदे रहते हैं तो संस्कारशून्य होने कारण । सत्तासीन लोग अपराधियों को संरक्षण एवं प्रशय देते आ रहे हैं तो संस्कारच्युत होने के कारण ही । क्या-क्या गिनाएं ? गुवाहाटी की घटना और उस सरीखी अन्य घटनाएं, जिसमें स्त्रीजाति के साथ दुराचार-अत्याचार किया गया हो, इसी संस्कारहीनता के परिणामों में से हैं ।

यह सोचना निहायत बचकानी बात होगी कि यह संस्कारहीनता भटके हुए निरंकुश युवकों के एक छोटे-से वर्ग तक सीमित है । दरअसल यह समाज के हर क्षेत्र में जड़ें जमा चुकी है, खास तौर पर हमारे राजनैतिक दलों एवं उनके अधीनस्थ पुलिस बलों में और अन्य सरकारी महकमों में ।

टीवी कार्यक्रमों में हम जितनी भी बहस कर लें होना कुछ भी नहीं है, क्योंकि जिन पर कारगर कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनको करना कुछ नहीं है । आम आदमी चीखने से अधिक कुछ कर नहीं सकता है, क्योंकि उसके हाथ में वैधानिक ताकत नहीं है ।

हम ‘प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न’ पर पहुंच चुके हैं, इसलिए लगता नहीं कि अब कुछ संभव है । ऐसा क्यों अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी