11 जुलाई – विश्व जनसंख्या दिवस और इंडिया बनाम भारत

बधाई एवं शुभकामना

आज विश्व जनसंख्या दिवस (World Population Day) है । इस अवसर पर मैं अपने देशवासियों को बधाई और शुभकामना देना चाहता हूं ।

बधाई इस बात पर कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ शीघ्र ही सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा । अभी चीन की जनसंख्या सर्वाधिक है किंतु उसकी आबादी नियंत्रण में है । विशेषज्ञों के अनुसार वह अधिकतम करीब 140 करोड़ के आंकड़े को छुएगी । अभी वह 135 के आसपास है । अपने इंडिया दैट इज भारत की आबादी फिलहाल 120 करोड़ से ऊपर है । जिस रफ्तार से वह बढ़ रही है उसे देखते हुए उसे 140 करोड़ पहुंचने में 15 वर्ष से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए । थोड़ा विलंब हो भी गया तो भी 20 साल के भीतर तो हम चीन से आगे बढ़ ही जाएंगे । तब हम सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन ही जाएंगे । हम अपने को किसी क्षेत्र में – चाहे जनसंख्या का ही क्षेत्र क्यों न हो – सर्वोंपरि सिद्ध कर लेंगे । क्या यह छोटी-मोटी उपलब्धि होगी ? इसी बात पर मेरी देशवासियों के प्रति बधाई !

साथ में मेरी शुभकामना भी । अपना देश इस बढ़ती जनसंख्या के बोझ को किसी प्रकार वहन कर सके ऐसी शुभेच्छाएं लोगों के प्रति हैं । ऊपर वाले से मेरी प्रार्थना है – अगर वह किसी की सुनता हो तो – कि दुनिया के सभी कुपोषित, भूखे, रुग्ण, अनपढ़ एवं बेरोजगार यहीं हों ऐसी मेहरबानी कृपया न करे । देश भगवान भरोसे है, आगे भी रहेगा, इसलिए उससे प्रार्थना करना निहायत जरूरी है ।

जनसंख्या दिवस – औचित्य?

वैसे ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाने का क्या औचित्य है यह मैं आज तक समझ नहीं सका । दीवाली हो तो पटाखे छुड़ाऊं, होली हो तो मित्रों के अबीर-गुलाल लगाऊं, ईद हो तो सेवई खाने-खिलाने की सोचूं, किसी महापुरुष का जन्मदिन हो तो भी जश्न मनाने की सोचूं, आदि-आदि । लेकिन इस दिन को कैसे मनाऊं ?

आप कहेंगे कि जनसंख्या वृद्धि को लेकर कुछ करिए । क्या करूं ? क्या कर सकता हूं मैं ? अपने हाथ में है क्या ? आप कहेंगे लोगों को समझाएं । साल में एक दिन ऐसा करना क्या माने रखता है ? साल के एक दिन क्या किसी शराबी को शराब न पीने की, किसी तंबाकूबाज को सिगरेट न पीने की, सलाह दे दें तो क्या वह मान जाएगा ? बार-बार याद दिलाने पर भी कुछ काम बनेगा इसकी भी आशा मैं नहीं कर पाता । किसी को सलाह देने पर वह कह सकता कि आप परेशान न हों; मेरे परिवार का पेट आपको नहीं भरना पड़ेगा । वह यह भी कह सकता है कि परिवार की वृद्धि तो ऊपर वाले की मरजी से है, मैं भला क्या करूं । वह ऐसे ही तमाम तर्क दे सकता है । मेरे पास समझाने को कुछ नहीं । जिसे ‘सन्मति’ होगी उसे समझाने की जरूरत नहीं, और जिसे नहीं है, उसके मामले में ‘भैंस के आगे बीन बजे, भैंस खड़ी पगुराय’ वाली कहावत लागू होती है ।

यों भी अपने देश में इस दिवस की कोई अहमियत नहीं । हमारे सरकारों, राजनैतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं बुद्धिजीवियों ने इस मुद्दे को दशकों पहले तिलांजलि दे दी थी । मुझे पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशकों की याद है, जब मैं युवावस्था में प्रवेश कर चुका था और परिवार नियोजन के अर्थ समझने लगा था । वे दिन थे जब ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे जहां-तहां दिखाई-सुनाई पड़ते थे । सड़क किनारे होर्डिंगों, बसों, पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों आदि पर ‘उल्टा लाल तिकोन’ के निशान दिखते थे । नियोजित परिवार के पक्ष में विज्ञापनों एवं अन्य साधनों का सहारा लिया जाता था ।

पटरी से उतरा परिवार नियोजन कार्यक्रम

तब परिवार नियोजन की गाड़ी चल तो रही थी । इसे देश का दुर्भाग्य कहें कि सौभाग्य यह तो आप जानें कि गाड़ी पटरी से उतरी तो उतरी ही रह गई । ठप हो गयी तो हो गयी । सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी के कनिष्ठ पुत्र, स्व. संजय गांधी, के मन में यह जोशीला विचार उठा कि जनसंख्या पर जबर्दस्त तरीकों से नियंत्रण किया जाना चाहिए । उनके बारे में लोगों में यह धारणा व्याप्त थी कि सत्ता पर उनका जोरदार प्रभाव था, और उनके कार्यक्रम के विरोध का साहस सत्तापक्ष में किसी को नहीं था । वे सत्ता में न होते हुए भी सत्ता की हैसियत रखते थे । उनके जोश का परिणाम था कि गाड़ी ने तेज रफ्तार पकड़ी और पटरी से ऐसी उतरी कि फिर पटरी पर चढ़ नहीं सकी । उसके बाद आपात्काल घोषित हुआ, सत्ता परिवर्तन हुआ, कालांतर में श्री संजय गांधी भी इहलोक से विदा हो गये, इत्यादि ।

उस काल की घटनाओं का परिणाम यह रहा कि सभी राजनैतिक दलों ने कसम खा ली कि अब जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं की जानी चाहिए । चूंकि जनसंख्या वृद्धि के बाबत चिंता सारी दुनिया में व्यक्त की जा रही है, अतः इस देश को भी उस कोलाहल में चीखना ही है । लेकिन यह चीखना सतही एवं दिखावे का है, गंभीरता कहीं नहीं है ।

मामला इंडिया बनाम भारत

और असल सवाल तो यह है कि आबादी बढ़ किसकी रही है ? ‘इंडिया’ की कि ‘भारत’ की ? याद रहे यह देश दो खंडों में बंटा है, इंडिया एवं भारत । इंडिया की पॉप्युलेशन नहीं बढ़ रही है । वहां टू-चाइल्ड, वन-चाइल्ड अथवा नो-चाइल्ड नॉर्म प्रैक्टिस में आ चुका है । वहां कि समस्याएं वही नहीं हैं जो भारत की है । वह तो वाकई शाइन कर रहा है । जनसंख्या वृद्धि तो भारत की समस्या है, जहां एक-एक परिवार में छः-छः, सात-सात बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनकी परवरिश बेढंगी है, जो कुपोषित हैं, जिनका इलाज छोलाछाप डाक्टर करते हैं, जिनकी स्कूली व्यवस्था में अक्षरज्ञान तक दुर्लभ है । और क्या-क्या बताऊं ?

भारत की जनसंख्या बढ़ जाए तो इंडिया को क्या फर्क पड़ता है ? देश की व्यवस्था तो इंडिया के हाथ में है । इंडिया घाटे में न रहे इसके लिए हर क्षेत्र में दोहरी व्यवस्था अपनाई गयी है अघोषित रूप में । आबादी बढ़ जाए तो उसको थोड़ी परेशानी तो होगी, लेकिन उसे सह लिया जाएगा । असली परेशानी तो भारत को होगी । उसी को तो संसाधनों के अभाव का दंश झेलना होगा । इंडिया उसके लिए क्यों परेशान होवे ?

इसलिए जनसंख्या की बात बेमानी है !

युवा शक्ति – पूंजी?

विश्व के तमाम देशों में आबादी बुढ़ा रही है; यानी उनके यहां आबादी का बृहत्तर हिस्सा प्रौढ़ों-बुजुर्गों का है । इसके विपरीत इंडिया दैट इज भारत में 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है ऐसा दावा किया जाता है । कुछ लोगों का मत है ये युवा तो अपने देश की पूंजी हैं । किन युवाओं की बात करते हैं आप ? सड़क पर कूड़ा बीनते हुए, ढाबे पर चायपानी के बर्तन साफ करते हुए, चौराहे पर फल-सब्जी बेचते हुए अथवा ईंटा-गारा ढोते हुए सार्थक स्कूली शिक्षा से वंचित जो बच्चे युवावस्था में पहुंच रहे हों उनको आप पूंजी कहते हैं ? हो सकता है, मेरी समझ निहायत घटिया हो । – योगेन्द्र जोशी

आवश्यक नहीं कि न्यायिक व्यवस्था निर्दोष हो – निरपराध को मृत्युदंड का एक मामला

बीबीसी वेबसाइट पर प्रकाशित एक समाचार पढ़ने को मिला मुझे; शीर्षक था ।  “अमरीका में ‘एक निर्दोष’ को हुई मौत की सजा” ।

समाचार अमेरिका के टेक्सस राज्य में घटित एक पुराने न्यायिक मामले से जुड़ा है । सन् 1989 में कारलोस दे लूना नामक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा दी गई थी, जिसे वांदा लोपेज नाम की एक महिला की 1983 में की गई हत्या का दोषी ठहराया गया था । समाचार `द गार्जियन’ में भी पढ़ सकते हैं ।

मामले का अहम पहलू यह है कि लूना मौत की सजा दिए जाने तक यह कहता रहा कि वह निर्दोष है और असल हत्यारा कारलोस हैर्नादेज नामक व्यक्ति है । लेकिन उसके कथन को नजरअंदाज कर दिया गया ।

कारलोस दे लूना वस्तुतः निर्दोष रहा होगा इस बात का संकेत अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के विधि विभाग के एक अध्ययन से मिलता है । उक्त मामले का शैक्षिक शोध के तौर पर बारीकी से गवेषणात्मक अध्ययन प्रोफेसर जेम्स लीबमैन के मार्गदर्शन में पिछले पांच वर्षों तक बारह छात्रों ने किया गया था । पेट्रोल पंप पर कार्य करने वाली उक्त महिला की चाकू घोंपकर हत्या की गई थी । छात्रों ने पुलिस की मामले से संबंधित फाइलों को खंगाला, उपलब्ध चस्मदीदों के साक्षात्कार लिए, और मामले से जुड़े जासूसों से बात की । हत्या के बाद के 40 मिनटों के दौरान क्या-क्या घटित हुआ इस पर विशेष ध्यान दिया गया । पुलिस अधिकारियों ने कारलोस दे लूना को पास के एक ट्रक के नीचे छिपा पाया । अपने बचाव में उसके द्वारा दिए गये बयानों को दरकिनार करते हुए उसी को हत्यारा ठहरा दिया गया ।

छात्रों ने पाया कि पूरी पड़ताल में तमाम खामियां थीं । एक खामी यह थी कि चस्मदीदों के अनुसार हत्यारा घटना-स्थल से उत्तर दिशा की ओर भागा था, जब कि दे लूना पूर्व की ओर खड़े केट्र के नीचे छिपा मिला । उसके कपड़ों पर खून के निशान भी नहीं थे । छात्रों के अनुसार पुलिस ने प्रयुक्त हथियार, और मृतक के शरीर के ऊतकों (नाखून, बाल आदि) के नमूने लेने में भी चूक की थी । न ही इस बात की पर्याप्त छानबीन की कि हत्या कहीं कार्लोस हैर्नादेज ने तो नहीं की थी, जैसा कि दे लूना ने बारबार कहा । लूना के अनुसार उसने हैर्नादेज को पंप परिसर में घुसते देखा था । (वह कदाचित् हैर्नादेज को पहचानता था ।) मुकदमे के दौरान हैर्नादेज को दे लूना द्वारा हत्यारा बताए जाने को अभियोजकों ने उसकी कोरी कल्पना कहा था ।

उपर्युक्त अध्ययन में हैर्नादेज को एक खतरनाक अपराधी बताया गया है, जिसे पड़ोसी पर हमले के लिए जेल की सजा भी हो चुकी थी ।

हैर्नादेज का देहांत 1999 में एक जेल में हुआ था । दे लूना को पहले ही 1989 में मौत की सजा मिल चुकी थी । वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे ताकि वे अपनी बात रख सकें । कुल मिलाकर लगता यही है कि दे लूना को निर्दोष होने के बावजूद मौत दी गयी ।

वास्तव में न्यायप्रणाली जटिल होती है और उसमें कदम-कदम पर त्रुटियों की संभावनाएं रहती हैं । न्यायिक प्रक्रिया में अपनी-अपनी भूमिका निभाने वाले लोगों की अपनी कमजोरियां भी उसमें दोष पैदा कर सकती हैं । इसलिए अंतिम न्यायिक निर्णय सही ही होगा यह दावा करना कठिन है ।

बीबीसी के इस समाचार के साथ ही मुझे न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में भी न्यायप्रणाली संबंधी कुछ बातें पढ़ने को मिलीं । उनमें
कुछएक कारकों की चर्चा की गयी है, जिनका निर्णय-प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है । इनमें कुछ यों हैं:

आरोपी की सही-सही पहचान करने में साक्षियों की विफलता ।
आरोपी के प्रति नस्ल, जाति आदि संबंधी पूर्वाग्रह ।
आरोपी के चरित्र, सामाजिक स्थिति, आदि के आधार पर कथित अपराध को आंकना ।
इत्यादि । – योगेन्द्र जोशी

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‘सत्यमेव जयते’ – आमिर खान का नया धारावाहिक

आम तौर पर मैं टेलिविजन कार्यक्रम नहीं देखता । बस समाचार चैनलों पर नजर दौड़ाता हूं, वह भी चाय-पानी या भोजन करते हुए । वर्षों से मैंने कोई टीवी सीरियल नहीं देखा है ।

 ‘सत्यमेव जयते’ 

किंतु आज, रविवार, 6 मई, मेरा मन हुआ कि मैं फिल्म अभिनेता आमिर खान का नितांत नया धारावाहिक ‘सत्यमेव जयते’ देख लूं; देखूं तो कि इस सीरियल में आखिर क्या है । इस सीरियल को लेकर आमिर के किसी टीवी समाचार चैनल पर प्रसारित एक साक्षात्कार के कुछ अंश मैं पहले देख-सुन चुका था, जिसमें आमिर ने यह खुलासा नहीं किया कि धारावाहिक में वह असल में क्या दिखाने जा रहे हैं । महज इस बात पर जोर था कि कुछ हटकर, कुछ नया, उसमें रहेगा । मुझे जिज्ञासा हुई कि मैं भी देखूं तो उसमें कुछ भी नया क्या है, उसमें क्या संदेश देने की आमिर ने कोशिश की है, इत्यादि ।

दरअसल आमिर को मैं लीक से हटकर कार्य करने वाला कलाकार समझता आया हूं । पिछले 20-25 वर्षों में मैंने एक या दो फिल्में देखी होंगी । इसलिए में इस काल के कलाकारों के बारे में खास कुछ जानता । चलते-चलाते जो सुनने-पढ़ने में आता है उसी पर मेरी जानकारी आधारित है । कुछ भी हो आमिर के बारे में मेरी धारणा थोड़ा हटकर ही रही है

इन आरंभिक शब्दों के बाद मैं धारावाहिक की विषयवस्तु पर लौटता हूं ।

विषयवस्तु 

निःसंदेह इसमें बहुत कुछ नया है, सामयिक एवं पीड़ाप्रद सामाजिक समस्या को धारावाहिक का मुद्दा बनाया गया है, और समाज को रचनात्मक संदेश का सार्थक प्रयास किया गया है । ‘स्टार प्लस’ पर पूर्वाह्न 11:00 से 12:30 बजे तक प्रसारित आज के प्रथम अंक (एपिसोड) में क्या था मैं इस स्थल पर उसका संक्षिप्त उल्लेख करने जा रहा हूं ।

पहले इसके नाम के बारे में । धारावाहिक का नाम ‘सत्यमेव जयते’ चुना गया है । ये शब्द हमारे संघीय सरकार के अशोक की लाट वाले प्रतीक अथवा मोहर के साथ प्रयुक्त हुए हैं । मेरा अनुमान है कि उक्त पदबंध ‘मुण्डक उपनिषद्’ के एक मंत्र का आरंभिक वाक्यांश है, किंतु वहां पर ‘जयति’ प्रयुक्त है न कि ‘जयते’, जो कि व्याकरण की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण लगता है । इस मंत्र के बारे में मैंने अन्यत्र लिखा भी है

आमिर के धारावाहिक का आज का अंक देश में इस समय प्रचलित भ्रूण हत्या पर केन्द्रित है । आमिर ने दो-तीन पीड़ित महिलाओं की व्यथा-कथा उन्हीं की जुबानी सुनाई है कि किस प्रकार उनकी सहमति के बिना उनके गर्भ इसलिए गिराए गये कि भावी संतानें कन्याएं होतीं; कैसे उन्होंने अंततः कन्याओं को जन्म दिया और परिवार (ससुराल) से अलग होकर नया जीवन आरंभ किया ।

कन्या भ्रूण हत्या

‘अल्ट्रासाउंड’ की चिकित्सकीय निदान विधि पर आधारित कन्या भ्रूण हत्या समाज के किस वर्ग में प्रमुखतया प्रचलित होगी इस बाबत आमिर ने कार्यक्रम में शामिल दर्शकों की राय जाननी चाही । लोगों का मत यही था कि यह समाज के अपेक्षया गरीब एवं अनपढ़ लोगों में अधिक प्रचलित है । आमिर ने एक शोधकर्ता के हवाले से इस धारणा का खंडन किया और बताया कि कन्या भ्रूण हत्या समाज के अपेक्षया संपन्न, उच्चशिक्षित और लब्धप्रतिष्ठ लोगों में अधिक मिलती है । आम धारणा के विपरीत अपने इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए अतिसामान्य तबके की दो-एक महिलाओं के साक्षात्कार भी प्रस्तुत किए गये कि कन्या-जन्म क्यों उनको स्वीकार्य है ।

यहां इस बात पर मैं टिप्पणी करना समीचीन समझता हूं कि समाज में एक भ्रम सदैव से व्याप्त रहा है । वह यह कि भ्रष्ट आचरण, आपराधिक प्रवृत्ति, और अशिष्ट व्यवहार आदि समाज के गरीब और अशिक्षित वर्ग में अधिक होता है । मेरे अनुभव में यह धारणा पूर्वाग्रहजनित एवं तथ्यहीन है । अभिजात लोगों के इस मत पर मुझे संस्कृत नाट्यकृति ‘मृच्छकटिकम्’ की यह उक्ति याद आती है “पापं कर्म च यत्परैरपि कृतं तत्तस्य संभाव्यते ।” अर्थात् दूसरों के पापकर्म को भी बेचारे गरीब द्वारा किया हुआ मानने में लोग नहीं हिचकिचाते हैं । भर्तृहरि नीतिशतक में भी कहा गया है “सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति”, अर्थात् सभी गुण धनवानों में ही देखे जाते हैं न कि धनहीनों में ।

आमिर ने अपने कार्यक्रम में आंकड़ों द्वारा यह भी दिखाया है कि पुरुष एवं स्त्रियों के मध्य लिंगानुपात पिछले 25 वर्षों में किस प्रकार लगातार घटता गया है, और कुछ राज्यों में तो यह 1000 पुरुषों पर लगभग 800 स्त्रियों के स्तर पर पहुंच चुका है । अल्ट्रासोनिक विधि को अपनाते हुए गर्भ में पल रही कन्या का भ्रूण गिराना दो-तीन हजार करोड़ रुपये का व्यवसाय बन चुका है इसका भी खुलासा किया गया है । देश के भौगोलिक मानचित्र के माध्यम से यह दिखाने की चेष्टा भी कार्यक्रम में की गयी है कि हरयाणा के आसपास आरंभ हुए यह व्यवसाय किस प्रकार देश के प्रायः हर कोने में फैल चुका है यह देखना चिंताजनक है । गर्भ गिराने का यह रोग उत्तराखंड (मेरा गृहराज्य) तक पहुंच गया है यह जान मुझे हैरानी हुई, जिसका मुझे अंदेशा नहीं था ।

परिवार नियोजन  से संबंध

कार्यक्रम में प्रस्तुत अधिकांश जानकारी मुझे कमोबेश पहले से थी । किंतु एक नई बात हैरान करने और कष्ट पहुंचाने वाली थी । एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ ने यह जानकारी दी कि भ्रूण हत्या का यह फैशन विगत सदी के सत्तर के दशक में चलन में आया, जब परिवार नियोजन की बात जोर-शोर से चल रही थी । परिवार नियोजन लोग अपनाना तो चाहते थे, लेकिन चाहते थे कि ऐसा कोई रास्ता हो कि लड़का ही हो न कि लड़की । हैरानी की बात यह थी कि इसकी शुरुआत सरकारी अस्पतालों से हुई जो कालांतर में विरोध के चलते हुए चोरीे-छिपे जारी रहा । बाद में इसे गैरकानूनी घोषित तो कर दिया, लेकिन यह निजी अस्पतालों में घड़ल्ले से आज तक चलता आ रहा है । कार्यक्रम में दो पत्रकारों ने यह भी स्पष्ट किया कि कैसे उन्होंने सौ-एक डाक्टरों की इस अवैधानिक व्यवसाय में संलिप्तता पर स्टिंग आपरेशन किया । राजस्थान के विभिन्न अदालतों में उनके मामले कछुआ चाल से चल रहे हैं, और उन पर निर्णय आने की फिलहाल कोई उम्मींद नहीं ।

इस घटते अनुपात के गंभीर दुष्परिणामों की ओर आमिर ने ध्यान आकर्षित किया है । एक वीडियो दिखाया गया है जिसमें हरयाणा के कुछ युवकों ने अपना दुखड़ा रोया है कि लड़कियों की अनुपलब्धता के कारण उनकी शादी नहीं हो पा रही है । यह बात भी बताई गयी है कि किस प्रकार देश के अन्य क्षेत्रों से गरीब परिवारों की लड़कियां खरीदकर राजस्थान, हरयाणा जैसे जगहों पर बेचा जा रहा है । इन लड़कियों से शादी का स्वांग भर होता है, किंतु उन्हें नौकरानी से अधिक का दर्जा नहीं मिलता है ।

आमिर का निवेदन

आमिर ने इस मुद्दे पर रचनात्मक क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी लोगों को दी है । यह बताया गया है कि कुछ सालों पहले पंजाब के नवाशहर में एक सरकारी अधिकारी (डिपुटी कमिश्नर/कलेक्टर ?) ने कन्याओं के पक्ष में मुहिम चलाई जो सफल रहा । लोग उससे जुड़ते गये और आज उसके आशाप्रद परिणाम सामने आ रहे हैं । लोगों की सोच में उल्लेखनीय अंतर आया है ।
कार्यक्रम में स्वयंसेवी संस्था ‘स्नेहालय’ की भी चर्चा की गई है, जो मां-बापों द्वारा त्यागी गई कन्याओं को अपनाता है, उनका लालन-पालन करता है । अंत में आमिर ने लोगों से स्नेहालय की मुहिम से जुड़ने की अपील की है, और उसके लिए चंदा देने की भी प्रार्थना की है । लोगों से यह भी मांग की गयी है कि वे आमिर से संपर्क साधकर राजस्थान सरकार से निवेदन करें कि ऊपर कहे गये अदालती मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाए और अपराधियों को शीघ्र सजा दिलाई जाए ।

कुल मिलाकर यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए अहमियत रखता है जो संवेदनशील हों और सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने के इच्छुक हों । ‘अरे सब चलता है’ की सोच रखने वालों के लिए यह कार्यक्रम नहीं है ।

आमिर और उनके सहयोगियों को मेरी बधाई और आगे सफलता के लिए शुभकामनाएं । योगेन्द्र जोशी

आमिर के धारावाहिक की वेबसाइट हैः satyamevjayate.in

विजयादशमी के पर्व पर व्यक्त विचार: बेचारा रावण

विजयादशमी के पावन पर्व पर
सभी देशवासी एवं विदेशवासी भारतीयों को
मेरी मंगलकामनाएं

आज विजयादशमी का पर्व संपन्न हो चुका है । देश भर में अपने-अपने तरीके से इस मनाया गया है । इस पर्व पर देश के कई भागों में रावण के पुतले के दहन की परंपरा प्रचलन में है । कहा जाता है कि जब भगवान् श्रीराम ने रावण का वध करके लंका पर विजय पाई और वे अयोध्या लौटे तब नगरवासियों ने हर्षोल्लास के साथ विजय पर्व मनाया था । उसी घटना की स्मृति में यह पर्व रावण-दहन के रूप में मनाया जाता है ।

विजयादशमी बुराई के ऊपर अच्छाई की, असत्य के ऊपर सत्य की, अनर्थ के ऊपर अर्थ की, कदाचार के ऊपर सदाचार की, स्वोपकार के ऊपर परोपकार की, जीर के रूप में देखा जाता है । रावण को बुराई के प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत करते हुए उसका दहन किया जाता है, और उस दहन को समाज में व्याप्त बुराइयों के खात्मे के संकेत के तौर पर देखा जाता है । रावण-दहन समाज की बुराइयों के खात्मे के संकल्प की याद दिलाता है, ऐसा समझा जा सकता है ।

क्या रावण-दहन वाकई में बुराइयों को दूर करने का संकल्प व्यक्त करता है, और क्या यह लोगों को अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे पाता है ? या यह एक विशुद्ध उत्सव भर है जिसे हम साल में इस दिन मनाते हैं और फिर अगले साल के उत्सव का इंतजार करते हैं । भले ही हम विजयादशमी के दिन संपन्न रावण-दहन की व्याख्या तरह-तरह से करें, हकीकत यह है कि यह भी होली-राखी के पर्व की तरह ही महज एक पर्व है – आज मनाया और साल भर के लिए भूल गए ।

मुझे नहीं लगता है कि लेखों-व्याख्यानों में कही जाने वाली ‘अच्छाई की जीत एवं बुराई की हार’ जैसी औपचारिक बातें वास्तविक जीवन से कोई ताल्लुक रखती हैं । मुझे तो यह मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों की तरह का एक और कार्यक्रम लगता है । बड़े-बड़े पुतले जलाओ, पटाखे छोड़ो, आतिशबाजी दिखओ, और एक दर्शनीय नजारा जुटी हुई भीड़ के सामने पेश करो, बस । बुद्धिजीवीगण राहण-दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर भले ही दर्ज करें, आम जन के लिए तो यह एक तमाशा भर है, जिसे देखने बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी भीड़ में शामिल होते हैं । रावण-दहन के बाद जिंदगी अपने ढर्रे पर चल निकलती है । जिसे घूस लेना है वह लेता रहेगा, जिसे दूसरे की संपदा हथियानी है वह हथियाएगा, जिसे कमजोर का शोषण करना है वह करता रहेगा, जिसे गुंडई-बदमाशी करनी है वह करेगा ही है । रावण का पुतला जले या न यह सब यथावत् चलता रहेगा । समाज में अच्छाई-बुराई का मिश्रण चलता रहेगा । फिर किस बात को लेकर बुराई पर अच्छाई की जीत कहें ? बुराई का प्रतीक तो जल जाता है, लेकिन बुराई बनी रहती है ! इस संसार का यही सच है ।

मैंने एसे अवसरों पर लोगों को कहते सुना है और लेखों में पढ़ा है कि हमें ‘यह करना चाहिए, वह करना चाहिए; ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए’ आदि-आदि । क्या वयस्क मनुष्य इतना नादान होता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं का ज्ञान ही न हो ? अगर विशेषज्ञता स्तर की बात हो तो संभव है कि आम आदमी को बहुत कुछ समझाना पड़े । जैसे आदमी को यह बताने की आवश्यकता होती है कि हृद्रोग से कैसे बचा जाए, इंटरनेट कैसे काम करता है, केमिस्ट्री में पॉलिमराइजेशन क्या होता है, भौतिकी का सापेक्षता सिद्धांत क्या है, इत्यादि । लेकिन एक व्यक्ति के समाज के प्रति क्या कर्तव्य हैं यह भी कोई बताने की चीज है ? क्या यह भी किसी से कहा जाना चाहिए कि उसे नियम-कानूनों का पालन करना चाहिए और अपराध नहीं करना चाहिए । हम सब ये बातें बखूबी जानते हैं, लेकिन आदत से बाज नहीं आते हैं ।

इसमें दो राय नहीं कि यदि सभी लोग अपने-अपने हिस्से के कर्तव्य निभाएं तो समाज में बुराइयां ही न रहें । लेकिन ऐसा होता नहीं है । किसको क्या करना चाहिए यह तो सभी बता देते हैं, परंतु यह कोई नहीं बताता कि जब कोई कर्तव्य-पालन नहीं करता तो क्या करें । मुझे आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बता सके कि तब क्या करें । आप अपराध करने वाले को सजा दे सकते हैं (वह भी इस देश में कम ही होता है !), लेकिन वह अपराध ही न करे, उस प्रवृत्ति से बचे, इसके लिए कोई क्या करे ? कुछ नहीं कर सकते न ! तब भ्रष्टाचार यथावत् बना रहेगा ।

रावण हर वर्ष जलेगा । बार-बार जलने के लिए उसे अस्तित्व में बना रहना है । रावण की अहमियत बनी रहे इसके लिए भ्रष्टाचार को भी बने रहना है । बेचारा रावण, समाज उसे बार-बार मरने को मजबूर करते आ रहे हैं । हा हा हा … ! जय हिंद – योगेन्द्र जोशी

क्या महात्मा गांधी की अहिंसा नीति वास्तव में व्यावहारिक है ?

गांधीजी और स्वाधीनता संघर्ष

कल 2 अक्टूबर गांधी जयंती है और साथ ही विश्व अहिंसा दिवस भी । वस्तुतः गांधीजी विश्व भर में उनके अहिंसात्मक आंदोलन के लिए जाने जाते हैं, और यह दिवस उनके प्रति वैश्विक स्तर पर सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है । यह आम धारणा लोगों में व्याप्त है कि गांधीजी के अहिंसक आंदोलन ने ही देश को स्वाधीनता दिलाई थी । मुझे इस मत को पूर्णतः स्वीकारने में हिचकिचाहट होती है । मेरी अपनी धारणा है कि उस संग्राम में अनेकों सेनानियों ने योगदान दिया था । उस काल में अंग्रेज सामाज्य कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था । एक ओर विश्वयुद्ध की समस्या पूरे यूरोप को घेरे थी तो दूसरी ओर विश्व के प्रायः सभी पराधीन देश अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए आंदोलनरत थे । ब्रितानी सरकार को यह अहसास हो चुका था कि अब अपने सामाज्य को यथावत् बनाए रखना आसान नहीं । याद करें कि उस कालखंड में अनेकों लोग यूरोप में मारे गये थे, और उन्हें ‘मैन-पावर’ की समस्या का सामना करना पड़ रहा था, जिस कारण से कालांतर में भारत-पाकिस्तान सरीखे देशों से कई-कई लोग पुरुष कर्मियों की कमी पूरा करने के लिए ब्रिटेन पहुंचे थे । ऐसे में ब्रितानी हुकूमत ने एक-एक कर विभिन्न देशों को स्वाधीनता देना आरंभ कर दिया था । गांधीजी के आंदोलन को अकेले फलदायक मान लेना उचित नहीं है । स्वाधीनता प्राप्ति में उन अनेकों लोगों का निर्विवाद योगदान भी शामिल था जो गांधीजी से मतभेद रखते थे ।

अगर यह मान भी लें कि गांधीजी का अहिंसक आंदोलन वस्तुतः कारगर रहा, तो भी इतने मात्र से उसकी प्रभाविता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उचित नहीं होगा । यद्यपि मैं व्यक्तिगत तौर पर अहिंसा का पक्षधर हूं, और कामना करता हूं कि सभी सांसारिक जन ऐसा ही करें, तथापि इस तथ्य को नकारना मैं नादानी मानता हूं और इस पर जोर डालता हूं कि ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा । मेरे अपने तर्क हैं; उन्हें प्रस्तुत करने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरे लिए महात्मा गांधी उन गिने-चुने ऐतिहासिक महापुरुषों – शायद दर्जन भर भी नहीं – में से एक हैं, जिनको मैं विशेष सम्मान की दृष्टि से देखता हूं । साफ-साफ कहूं तो इस सूची में उनके अलावा महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, ईसा मसीह, और यूनानी दार्शनिक सुकरात जैसे महापुरूष शामिल हैं । मैं इन सभी को उनकी सिद्धांतवादिता, स्पष्टवादिता, त्यागशीलता, आम जन के प्रति संवेदनशीलता, और इन सबसे अधिक अहम (भेड़चाल से हटकर) स्वतंत्र चिंतन की गुणवत्ता के कारण सम्मान देता हूं ।

हिंसा: स्वाभाविक प्रवृत्ति

अब मैं मुद्दे पर लौटता हूं । मनुष्य में तमाम प्रकार की स्वाभाविक प्रवृत्तियां अलग-अलग तीव्रता के साथ मौजूद रहती हैं । जो प्रवृत्तियां समाज के लिए किसी भी प्रकार से हितकर हों उन्हें सकारात्मक कहा जा सकता है, और जो अहितकर हों उन्हें नकारात्मक । किसी भी व्यक्ति में दोनों ही अलग-अलग मात्रा में मौजूद हो सकती हैं । परिस्थितियां नियत करती हैं कि कब कौन-सी प्रवृत्तियां हावी होंगी और कितने समय तक प्रभावी रहेंगी । इन प्रवृतियों में से एक हिंसा की प्रवृत्ति है, जो प्रायः सभी विकसित जीव-जन्तुओं में विद्यमान रहती है । वस्तुतः प्रकृति ने जीवधारियों में यह प्रवृत्ति अपनेे अस्तित्व को बनाए रखने के एक साधन के रूप में प्रदान किया है । इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि मनुष्य में भी यह स्वाभाविक तौर पर मौजूद रहती है । किंतु अन्य प्राणियों तथा मनुष्य में अंतर यह है कि मनुष्य हिंसात्मक प्रवृत्ति के नकारात्मक पहलू को समझ सकता है और यदि वह चाहे तो स्वयं को एक हद तक उससे मुक्त कर सकता है । ‘यदि वह चाहे तो’ एक महत्वपूर्ण शर्त है जो कम ही मौकों पर पूरी हो पाती है ।

कौन ऐसा है जो खुलकर एस बात की वकालत न करे कि समाज में संवेदनशीलता हो, परोपकार भावना हो, अन्य जनों पर हावी होने का भाव न हो, दूसरों के शोषण की प्रवृत्ति न हो, इत्यादि । पर क्या हमारे चाहने भर से ये बातें समाज में व्यापक स्तर पर दिखाई देती हैं ? विश्व के इतिहास में कितने महापुरुष हैं जो अपने अथक प्रयासों से समाज को इन गुणों के प्रति पे्ररित कर सके हों ? निश्चित ही एक बहुत बड़ा जनसमुदाय उन इतिहास-पुरुषों का प्रशंसक हो सकता है और स्वयं को उनका अनुयायी होने का दंभ भर सकता है । किंतु इसके यह अर्थ कतई नहीं है वह उन गुणों को अपनाने का संकल्प भी लिए हो । यह विडंबना ही है कि अनुयायी होने की बात अनेक जन करते हैं, परंतु तदनुरूप आचरण विरलों का ही होता है ।

मैं कहना चाहता हूं बहुत-से सामाजिक चिंतक/उपदेष्टा अहिंसा की बातें करते आए हैं, फिर भी हिंसा की प्रवृत्ति समाज में बनी हुई है और उससे लोग मुक्त नहीं हुए हैं । वास्तविकता के धरातल पर अहिंसा की बात कितनी सार्थक है यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि किसी भी देश का शासन तंत्र हिंसा के प्रयोग पर टिका है । उनकी न्यायिक व्यवस्था मैं दंड का प्रावधान हिंसा पर आधारित है । शासन तंत्र नागरिकों में यह भय पैदा करता है कि यदि वे अनुचित कार्य करेंगे तो उन्हें दंडित होना पड़ेगा । चाहे परिवार के भीतर की बात हो या समाज की बात व्यक्ति को हिंसा का ही भय दिखाया जाता है, और लोगों को दंडित करके उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं । देश बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, सेना एवं पुलिस का गठन ही हिंसा पर आधारित होता है ।

यह तर्क दिया जा सकता है कि उपर्युक्त मामलों को हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए । हिंसा परिभाषा ही बदलकर उसका औचित्य निर्धारण करना क्या उचित है यह विचारणीय एवं विवादास्पद विषय है । जब आप अहिंसक आंदोलनों की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि वे तभी सफल होते हैं जब दूसरा पक्ष – जो अक्सर शासन में होता है – भयभीत हो जाता है यह सोचते हुए कि आंदोलन उग्र होकर हिंसक रूप ले लेगा । हालिया अन्ना हजारे आंदोलन जब देशव्यापी हो गया तो सरकार को भय लगने लगा कि स्थिति विस्फोटक हो सकती है । अन्यथा कई जन अहिंसक विरोध का रास्ता अपनाते हैं, लेकिन असफल रहते हैं ।

अहिंसक विरोध: संदिग्ध सफलता

मेरा अनुभव यह है कि अहिंसक विरोध/आंदोलन तभी सफल होता है जब उठाया गया मुद्दा समाज को व्यापक स्तर पर उद्वेलित करता है । स्वाधीनता-पूर्व गांधीजी का आंदोलन, आठवें दशक का जेपी आंदोलन, और हालिया अन्ना हजारे का आंदोलन इसलिए सफल हुए – अगर आप सफल मानते हों तो – क्योंकि उठाया गया मुद्दा लोगों की सहभागिता पा सका और उन्हें आंदोलन से जोड़ सका । लेकिन जब मुद्दा क्षेत्रीय स्तर की अहमियत रखता हो या एक सीमित जनसमुदाय की दिलचस्पी का हो, तब सफलता की संभावना घट जाती है । वास्तव में जैसे-जैसे मुद्दे की व्यापकता घटती जाती है, वैसे-वैसे अहिंसक आंदोलन/विरोध की सफलता भी कम होते जाती है । देखने में तो यही आता है कि जब विरोध करने वाला अकेला या केवल दो-चार व्यक्तियों का समूह होता है, तब वह असफल ही हो जाता है । हरिद्वार में गंगा बालू उत्खनन रोकने के लिए अनशनरत स्वामी निगमानंद की मृत्यु इसी तथ्य की पुष्टि करता है । ऐसे अवसरों पर हिंसक आंदोलन ही कुछ हद तक सफल होते हैं, या शासन उनको दंड के सहारे दबा देता है, जो उसकी हिंसक नीति दर्शाता है ।

अहिंसक आंदोलन तभी सफल होता है जब विरोधी पक्ष में किंचित् संवेदना, लज्जा, विनम्रता एवं दायित्व भाव हो । जिसमें ये न हों उसका मन आंदोलन को देख पसीजेगा यह सोचना ही मुर्खता है । आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में लोग निहायत स्वार्थी एवं संवेदनशून्य होते जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में अहिंसा की वकालत करना बेमानी हो जाता है ऐसा मेरा दृढ मत है ।

गांधी दर्शन: केवल अहिंसा ही नहीं

गांधीजी की चर्चा अहिंसा के पुजारी के तौर पर की जाती है । लोग यह भूल जाते हैं कि गांधीजी के अन्य बातें मानव समाज के लिए अहिंसा से कम अहमियत नहीं रखती हैं । वे शारीरिक परिश्रम के पक्षधर थे । वे आ बात पर जोर देते थे हर इंसान को अपना निजी कार्य को यथासंभव स्वयं ही करना चाहिए । वे मानव-मानव के बीच असमानता के विरोधी थे । उनके मतानुसार हमारी नीतियां आर्थिक विषमता को घटाने वाली होनी चाहिए । वे ग्रामीण विकास, कृषि, एवं घरेलू उद्योगों की वकालत करते हैं । दुर्भाग्य से वर्तमान भारतीय समाज इन मूल्यों को भुला चुका है । कहां हैं गांधीजी अब ?योगेन्द्र जोशी

हादसों का देश – लापरवाही, नियम-कानूनों की अनदेखी, संवेदनहीनता आदि-आदि का दुष्परिणाम

अनूठा देश

अपना देश वाकई अनूठा है, चामत्कारिक है, अपने किस्म का अकेला है । यहां ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जिसकी संभावना दुनिया के उन प्रमुख देशों में नहीं के बराबर रहती है जिनके स्तर पर पहुंचने का हम ख्वाब देखते हैं । यह चमत्कारों का देश है, लापरवाही का देश है, कर्तव्यहीनता का देश है, भ्रष्टाचार का देश है, प्रशासनिक संवेदनहीनता का देश है, और इस सब के ऊपर, नियम-कानूनों एवं सलाह-मशविरा को न मानने वाला देश है ।

इस प्रकार के खयाल मेरे मन में तब उठने लगते हैं जब कभी दुर्घटनाओं की बात टेलीविजन चैनलों पर देखता हूं । मेरे मत में अधिकांश दुर्घटनाएं आम आदमी अथवा सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही की वजह से होते हैं । अलग-अलग स्तरों पर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो यह न हों । आम आदमी लापरवाह न हो और प्रशासन संवेदनशून्यता तथा कर्तव्यहीनता का बुरी तरह शिकार न हो तो ये न घटनाएं न घटें । लेकिन किसी से भी कुछ कहना बेकार है । अपने देशवासियों पर तो “भैंस के आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय” की उक्ति सटीक बैठती है ।

दर्दनाक हादसा

परसों सुबह एक दर्दनाक दुर्घटना की खबर किसी टीवी चैनल पर देखने-सुनने को मिली । बाद में मैंने पाया कि संबंधित खबर एवं वीडियो एनडीटीवी चैनल की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है । (देखें एनडीटीवी समाचार) परसों की खबर थी कि इंदौर के पास पातालपानी नामक झरने के पास एक परिवार पिकनिक मनाने पहुंचा था । संबंधित नदी के बीच धारा में एक चट्टान पर परिवार के पांच सदस्य खड़े होकर फोटो खिंचवाने के लिए उत्सुक थे । इसी बीच पानी का जलस्तर बढ़ने लगा । चट्टानों पर खड़े पर्यटक दौड़कर नदी के किनारे पहुंच गये । लोंगों ने उन्हें भी आगाह किया, लेकिन वे इस गलतफहमी के साथ वहीं पर डटे रहे कि वे सुरक्षित रह जाएंगे । एक-दूसरे को सहारा देते हुए वे वहां पर कुछ देर तक तो खडे़ रह सके । लेकिन नदी थी कि उसने अपना विकराल रूप दिखा ही दिया । नदी का जलस्तर बढ़ता गया और उसका प्रवाह झेलना उन लोगों के सामर्थ्य से बाहर हो गया । परिणाम दुःखद – सभी बह गये और आगे जलप्रपात से नीचे गिर गये । एक लाश तो जल्दी मिल गयी शेष की खोज चलने लगी ।

मुझे इस बात का अंदाजा है कि बरसात में किस प्रकार पहाड़ी नदी का प्रवाह कभी-कभी इतना तेज हो जाता है कि उसमें खड़े रह पाना असंभव-सा हो जाता है । अपने बचपन में मैंने घर (उत्तराखंड) के आसपास की नदियों की भयावहता का अनुभव किया है । हमें हिदायतें होती थीं कि किसी अनुभवी सयाने व्यक्ति की मदद के बिना उसे पार करने का दुस्साहस न करें । बरसात के दिनों में धोखे की बहुत गुंजाइश रहती है । ऐसा हो सकता है कि आप जहां खड़े हों उस क्षेत्र में पानी न बरस रहा हो, किंतु नदी के उद्गम की ओर कहीं अन्यत्र तेज पानी बरस रहा हो । तब वर्षा का वह पानी चारों ओर से पहाड़ी ढलान पर मिट्टी-कंकड़-पत्थर लेते हुए एक साथ उतरकर नदी में जलस्तर अनायास बहुत अधिक बढ़ा देता है । इस बढ़े हुए जलस्तर का अग्रभाग साफ पहचान में आ जाता है और देखना दिलचस्प होता कि कैसे यह पूरी ताकत से उस स्थान तक पहुचता है जहां आप खड़े हों । जिसे इस बात का अंदाजा न हो कि कहीं अन्यत्र पानी बरस रहा होगा वह ऐसे अवसरों पर धोखा खा सकता है ।

पिकनिक पर गये उस अभागे परिवार को बरसात में पहाड़ी नदी के इस व्यवहार का अंदाजा नहीं रहा होगा । लेकिन आसपास खड़े लोगों ने उन्हें आगाह तो किया ही था । वे अपने दुस्साहस के शिकार हुए । इसे मैं लापरवाही का परिणाम मानता हूं । दुस्साहस जीवन के ध्येय के लिए तो समझ में आता है, किंतु महज मौजमस्ती के लिए मूर्खता ही मानी जानी चाहिए ।

दुर्घटनाएं और दुर्घटनाएं

कल-परसों ही कहीं एक बस इसी प्रकार नदी में बह गयी एक बच्चे को छोड़कर सभी बच गये, लेकिन बस उलटते-पलटते बीच धारा में फंस गयी । इसी प्रकार चंद रोज पहले किसी लेखपाल महोदय के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ । नदी पार करते-करते पानी का स्तर बढ़ गया और उनकी जीप मझदार में फंस गयी । भला हो आसपास के लोगों का कि वे उनकी मदद कर सके । असल में छोटी नदियों में सामान्यतः पानी काफी कम रहता है । कई जगहों पर साल के अधिकांश समय के लिए पत्थरों की दीवार खड़ी करके नदी के ऊपर सड़क बना ली जाती है । पानी उसके नीचे पत्थरों के बीच छोड़ी गयी खाली जगहों से होते हुए बह जाता है । बरसात में कभी-कभी जलस्तर के अनायास बढ़ जाने पर पानी उस सड़क के ऊपर बहने लगता है । तब सड़क अधिक दिनों तक नहीं टिक पाती है । लेकिन जब तक वह कामचलाऊ दिखती है, वाहन चलते हैं और प्रवाह तेज होने पर वह अनियंत्रित होते हुए सड़क के किनारे पहुचकर पलट जाती है । ऐसे मौकों पर वाहनचालक का गलत अनुमान या अति साहस ही हादसे का कारण होता है

चिंता एवं पीड़ा की बात यह है कि अपने यहां हर प्रकार के हादसे होते रहते हैं । कल ही नौइडा/गाजियाबाद में एक कार चलते-चलते सड़क पर आठ-दस फुट नीचे धंस गयी । चलते-चलते चालक को लगा कि सड़क धंस रही है, और जब तक वह कुछ समझ पाता सड़क पर कार के नीचे गड्ढा हो चुका था । बाद में क्रेन की मदद से कार निकाली गयी । यही गनीमत रही कि बेचारा वाहनमालिक चालक बच गया । बताते हैं कि अभी चंद रोज पहले ही उस सड़क का निर्माण था । इसमें दो राय नहीं कि ठेकेदार तथा सरकारी अभियंताओं की घोर लापरवाही और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार का ही यह परिणाम था । लेकिन अपने देश के सरकारी तंत्र में यह सब क्षम्य है । किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता । न शर्मिंदगी न आत्मग्लानि । धन्य हैं ऐसे राष्ट्रभक्त नागरिक !

आजकल पूरे उत्तर प्रदेश में सड़कें खुदी हुई हैं, या यों कहिए कि प्रदेशवासियों की किस्मतें खुदी हैं । बनारस में सदाबहार गड्ढेदार सड़कें रहती हैं और लोग उनसे भलीभांति परिचित रहते हैं । इसलिए गंभीर दुर्घटनाएं कम ही होती हैं । फिर भी पूरे शहर का मुआयना करने निकलें तो आप को कहीं न कहीं कोई वाहन गड्ढे में धंसा दिख ही जाएगा । क्यों होता है ऐसा, यह सोचने की बात है ।

कल-परसों ही एक लगभग पूर्णतः निर्मित इमारत ढह गयी, कहां यह ठीक-से याद नहीं आ रहा । कहा जाता है उसमें प्लास्टर का कार्य चल रहा था । पानी बरसा और इमारत ढह गयी । संवाददाता दिखा रहा था कि उसमें प्रयुक्त बालू-सीमेंट कैसे भुरभुरी होकर गिर रही थी । एक दो जने गिरफ्तार किए गये हैं, लेकिन बिल्डर भाग गया । गिरफ्तारी सरकारी स्तर की रस्मअदायगी के लिए की जाती है, ताकि लोगों को लगे कि कुछ हो रहा है । कुछ दिनों बाद बात भुला दी जाती है, और पकड़े गये लोग अगली दुर्घटना को अंजाम देने निकल पड़ते हैं, पूरी बेहयाई के साथ । वा रे मेरा ‘महान्’ देश !

प्रशासनिक भ्रष्टाचार

राजमार्गों/सड़कों पर कारों-बसों आदि की दुर्घटनाओं के समाचार आम बातें हैं । दो वाहन आपने-सामने से टकरा गये, बस अनियंत्रित होकर पुल से नीचे गिर गयी, चालक को झपकी आने से कार गड्ढे में गिर गयी या पेड़ से जा टकराई, जैसी खबरें समाचार माध्यमों पर देखने-सुनने को मिलती रहती हैं । या खबर मिलेगी की हाइटेंशन तार की चपेट में आने से बस आग का गोला बन गयी । इस प्रकार की घटनाएं अपने देश में आम हैं, जब कि प्रमुख देशों में वे शायद ही कभी घटती हैं, और जब घटती हैं तो उन्हें संजीदगी से लिया जाता है । हमारे नेता हों या सरकारी मुलाजिम बेशरमी से कहते हैं कि हादसे तो होते रहते हैं । अपने देश में आदमी के जान की कोई अहमियत नहीं । अधिक से अधिक लाख-दो-लाख के मुआवजे की कोरी घोषणा कर दी और बात खत्म । मुआवजा भी सरकारी मुलाजिम डकार जाते हों तो कोई आश्चर्य नहीं ।

पिछले कुछ समय से रेल हादसों की बाढ़ आ गयी है । लेकिन न तो रेलमंत्री और न ही प्रधानमंत्री के चेहरे पर चिंता एवं आत्मग्लानि के भाव उभरते दिखई देते हैं । उनका रवैया साफ रहता है – हमारा क्या नुकसान हुआ है जो हम आंसू बहाएं । वाह रे भारत के राजनेतागण ! इनकी अपनी सुरक्षा के लिए न धन की कमी रहती है और न त्वरित कार्य-निष्पादन की । लेकिन जब रेल सुरक्षा की बात होती है तो उनकी लापरवाही की कोई सीमा नहीं रहती है । लेबल-क्रासिंग पर वाहन रेलगाड़ियों से टकरा जाती हैं, लेकिन किसी को समुचित कदम उठाने की चिंता कहां ?

आजकल अग्निकांडों की खबरें भी खूब मिलती हैं । कल ही दिल्ली के कनाटप्लेस में एलआइसी की बहुमंजिली इमारत में आग लग गयी । ऐसे अवसरों पर जब कुछ समझ में नहीं आता है तो कह दिया जाता है कि शार्ट-सर्किट से आग लगी । बेचारी बिजली पर दोष मढ़ना सबसे आसान है । गलती तो बिजली की है, फिर भला कोई आदमी दोषी कैसे हो सकता है ? शार्ट-सर्किट हो या कुछ, आजकल ऐसे साधन उपलब्ध हैं जो तुरंत चेतावनी दे देते हैं । भवनों में आग बुझाने के साधन तैयार रहने चाहिए । ऐसी बातें कही तो जाती हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं होता । किसे दोष दें इस लापरवाही के लिए ? सरकारों को या आम आदमी को या दोनों को ? किंतु लापरवाही तो भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है !

सभी प्रमुख देशों में वाहन-चालन का लाइसेंस तभी मिलता है जब आवेदक लिखित तथा प्रायोगिक परीक्षा पास कर लेता है । इन परीक्षणों को गंभीरता से लिया जाता है । आवेदक को कभी-कभी दो या अधिक बार परीक्षा देनी पड़ती है । (पढ़िये मेरा एक अनुभव) परंतु अपने देश में लाइसेंस का मामला गंभीरता से नहीं लिया जाता है । मैं किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसने ‘ड्राइविंग टेस्ट’ देकर लाइसेंस पाया हो । लाइसेंस लेना सब्जीमंडी से आलू खरीदने जैसा है । दलाल को आर्डर दीजिए, और घर बैठे लाइसेंस लीजिए । कम से कम वाराणसी में तो यही चलता है । यह व्यवस्था लापरवाही का संकेतक नहीं है क्या ? कौन है जिम्मेदार ? दरअसल सरकारी तंत्र और आम आदमी, दोनों ही । परिणाम यह है कि लाइसेंस-धारक को स्टियरिंग घुमाने, एक्सीलरेटर दबाने और ब्रेक लगाने से अधिक जानकारी वाहन-चालन के बारे में नहीं होती है । ऐसे चालकों द्वारा दुर्घटना होना आश्चर्य की बात नहीं है ।

भगवान भरोसे

कुल मिलाकर यह देश भगवान भरोसे चल रहा है । यहां सभी नियम-कानून कागजों तक सिमटकर रह जाते हैं । व्यवहार में हर कोई ‘मेरी मरजी’ की नीति पर चलता है । तब आये दिन हादसे होना कोई नहीं रोक सकता है । या खुदा, लोगों की अक्ल का ताला कभी खुलेगा क्या ! – योगेन्द्र जोशी

पागलपन की हद पार कर चुकी क्रिकेट की दीवानगी

“अतिसर्वत्र वर्जितम्” – चिंतकों-विचारकों के सर्वकालिक वचन

मैं उन गिने-चुने लोगों में से एक हूं जिसे क्रिकेट में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं । क्रिकेट का बल्ला शायद ही कभी मैंने पकड़ा होगा, कंमेंटरी भी शायद ही गौर से सुनी होगी, और क्रिकेट मैच तो शर्तिया कभी नहीं देखा । यदि किसी ने मुझे क्रिकेट विश्व कप का टिकट भेंट किया होता और साथ में कीमती उपहार भी दिये होते तो भी मैं विनम्र भाव से मना कर देता । 8-9 घंटों की मैच देखने की सजा मुझे स्वीकार्य नहीं । पर यह सब मेरी बात है । कई लोगों को क्रिकेट में बेहद रुचि रहती है, खास तौर पर युवा वर्ग के लोगों को, जिसमें आज की तारीख में युवतियां भी अच्छी-खासी संख्या में शामिल हैं । शौक होना समझ में आता है, लेकिन वह पागलपन की हदें पार कर ले तो वह मेरी नजर में चिंताजनक है । सद्यःसंपन्न विश्व कप मैचों के दौरान मैंने क्रिकेट का जो जनून मैंने लोगों में देखा वह मेरी समझ से परे है ।

चिरकालिक प्रतिद्वंदी पाकिस्तान

विगत बुधवार, 30 मार्च, के भारत-पाकिस्तान (जिसे लोग इंडिया-पाकिस्तान कहना अधिक ठीक समझते हैं) सेमीफाइनल मैच में पागलपन का जो नजारा मैंने देखा वह वाकई दिलचस्प था । जब भी भारत एवं पाकिस्तान के बीच क्रिकेट या हाकी मैच होता है (अन्य कोई मैच तो शायद ही कभी होता हो!), तब ऐसा लगता है कि मानो बॉर्डर पर तोपों-मिसाइलों के साथ दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया हो । यदि वाकई युद्ध छिड़े तो भी उतने लोग इस कदर उत्सुक, बेचैन या चिंतित नहीं होंगे जितने कि क्रिकेट मैच के मामले में । लोगों की दिलचस्पी खेल की बारीकियों, खिलाड़ियों के अंदाज, उनकी कलाकारी आदि में उतनी नहीं रहती है जितनी कि अपने ‘पुस्तैनी प्रतिद्वंदी’ देश को हराकर विजयी मुद्रा अख्तियार करने में । हम कितना ही भारत-पाक मैत्री की बात कर लें, दोनों देशों के मैच में परस्पर ‘दुश्मन’ होने का भाव साफ झलकता है । हम भले ही खुलकर बोलने से परहेज करते दिखें, किंतु पाकिस्तान के प्रति मन में छाए ‘घृणा भाव’ से मुक्त नहीं हो सके हैं । (भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया भी कुछ ऐसा ही है ।) अपने अनुभव से मुझे यही लगता रहा है कि पाकिस्तान बनाम किसी अन्य देश के मैच में हम देशवासियों की दिली इच्छा यही रहती है कि पाकिस्तान हार जाये । सच क्या है इसका दावा मैं नही करता । बीते बुधवार के सेमीफाइनल के प्रति लोगों के बीच जो दिलचस्पी मैंने देखी वह कल, 2 अप्रैल, के फाइनल मैच से कम नहीं थी, जब कि कल का मैच अहम एवं निर्णायक मैच था – विश्व कप विजेता बनने के लिए । जाहिर है कि पाकिस्तान के साथ ‘लड़ाई’ के माने ही कुछ खास हैं !

क्रिकेट – ब्रिटिश राज की निशानी

खैर, यह तो हुई पाकिस्तान के संदर्भ में अनुभव की जाने वाली खास बात । लेकिन हम भारतीयों का क्रिकेट-बुखार तो बहुत व्यापक है, पाकिस्तान मैदान में हो न हो । आगे अपनी बात कहूं इससे पहले बता दूं कि जिज्ञासावश मैंने इंटरनेट से कुछ जानकारी जुटाई । एक वेबसाइट पर मुझे यह रोचक टिप्पणी पढ़ने को मिली (देखें http://www.worldcricketblog.com/world-cricket/why-still-so-few-countries-play-cricket):

“Countries like Bangladesh, Kenya, Bermuda, Netherlands, Ireland etc etc should not be considered cricket playing countries because they are poor performers. But to save face of cricket boards, they are entered into world cups and other big profile tournaments only so that the sport officials can declare that now many countries play cricket.” (बांग्लादेश, केन्या, बरमूडा, नेदरलैंड, आयरलैंड इत्यादि सरीखों को क्रिकेट खेलने वाले देश नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि इनका खेल निम्नस्तरीय है । लेकिन क्रिकेट बोर्डों की साख रखने के लिए उनको विश्व कपों एवं अन्य नामी-गिरामी टूर्नामेंटों में शामिल किया जाता है, ताकि खेल अधिकारी कह सकंे कि बहुत सारे देश क्रिकेट खेलते हैं ।)

निःसंदेह उपर्युक्त देश क्रिकेट के मामले में कहीं नहीं टिकते हैं । बांग्लादेश के बारे में लोग शायद एकमत न हों । किंतु एक बात तो सभी मानेंगे कि क्रिकेट केवल कुछ ही देशों में खेला जाता है और उनमें से सभी, नेदरलैंड को छोड़कर, ब्रितानी राज के हिस्से रहे हैं । शायद उसी राज के अंतर्गत क्रिकेट ने इन देशों में अपने पांव पसारे, और कालांतर में वहां की जनता को अपने मोहपाश में बांध लिया । ये देश राजकाज की दृष्टि से स्वतंत्र तो हो गये, लेकिन दो चीजों से मुक्ति नहीं पा सके । ये दो चीजें हैं:  क्रिकेट एवं अंग्रेजी ।

क्रिकेट में लेशमात्र भी रुचि न होने के बावजूद मैंने इंटरनेट से यह जानकारी हासिल की कि इस खेल की स्पर्धाओं पर नियंत्रण रखने वाली विश्वस्तरीय संस्था ‘अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद्’ (International Cricket Council, कार्यालय दुबई में) है जिसके केवल 10 ‘पूर्ण’ सदस्य हैं: (1) आस्ट्रेलिया, (2) बांग्लादेश, (3) इंग्लैंड (ब्रिटेन नहीं!), (4) ‘इंडिया’, (5) न्यूजीलैंड, (6) पाकिस्तान, (7) साउथ अफ्रिका, (8) श्रीलंका, (9) वेस्ट इंडीज – उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका के मध्य के द्वीप समूह, और (10) जिम्बाब्वे (पूर्व में रोडेसिया) । (देखें http://en.wikipedia.org/wiki/Cricket)

गौर करें कि ये सभी देश पूर्व में ब्रितानी राज के अधीन थे । मेरी नजर में क्रिकेट अंग्रेजी की भांति हमारी गुलामी की निशानी है, जिसे हम बड़े गर्व से अपनाए रखना चाहते हैं !

उपरिलिखित के अलावा अफगानिस्तान, आयरलैंड, स्कॉटलैंड सरीखे 94 ‘एसोसिएट/एफिलिएट’ सदस्यों की बात भी की जाती है, किंतु क्रिकेट के क्षेत्र में इनका नाम शायद ही कोई लेता है । बहरहाल क्रिकेट वहां लोकप्रिय तो नहीं ही है ।

क्रिकेट – दीवानगी की कोई हद नहीं

क्रिकेट की दीवानगी उस इंग्लैंड में भी नहीं है जिसे इसका जन्मस्थल माना जाता है । इंग्लैंड और प्रायः पूरे यूरोप में फुटबॉल सर्वाधिक लोकप्रिय है । आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड में भी रग्बी की लोकप्रियता क्रिकेट के ऊपर आंकी जाती है । मेरे मतानुसार विश्व के प्रमुख देशों में लोगों की वैयक्तिक रुचि विभिन्न खेलों में देखी जाती है, अपने भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की तरह क्रिकेट और केवल क्रिकेट में नहीं । चीन, जापान, रूस, जर्मनी, स्पेन, ब्र्राजील आदि देशों में क्रिकेट की स्थिति वैसी ही होगी जैसी तमाम अन्य खेलों की, जिनमें आम आदमी की खास रुचि नहीं रहती; दीवानगी तो हरगिज नहीं ।

मैं कभी-कभी उन कारणों को जानने-समझने की कोशिश करता हूं, जिनके चलते इस देश में क्रिकेट की दीवानगी पागलपन की हदें पार कर चुकी है । क्रिकेट का रोग इस देश को वर्षों से लगा हुआ है । मुझे अपनी युवावस्था के दिन याद हैं, जब केवल 5-दिनी टेस्ट क्रिकेट खेला जाता था, और लोग रेडियो से चिपके रहते थे, या स्कूल-कालेज-आफिस आते-जाते चौराहों पर स्कोर जानने या कमेंटरी सुनने के लिए भीड़ लगाते थे । बीच-बीच में चौके-छक्के लगने या खिलाड़ी के आउट होने पर तालियां बजतीं या हल्ला मचता । दिन-ही-दिन में खेल आरंभ और समाप्त होते । लिहाजा तब न पटाखे छूटते थे और न ही समाचारों में क्रिकेट छाया रहता था । प्रायः सभी खिलाड़ी ‘स्टेट बैंक’ जैसी संस्थाओं के कर्मी होते थे, जिनकी आमदनी लाखों करोड़ों में नहीं होती थी । या फिर वे धनी परिवारों से होते थे जैसी नवाब पटौदी । उस जमाने में टेलिविजन भी नहीं था और आम आदमी के मनोरंजन के लिए सिनेमा था या फिर क्रिकेट । आज मनोरंजन के अनेकों साधन हैं, किंतु क्रिकेट की महत्ता घटने के बजाय बढ़ती जा रही है । क्यों ?

क्रिकेट – आर्थिक लाभ की खान

क्योंकि समय के साथ क्रिकेट खेल कम और धन-कमाऊ धंधा अधिक बन चुका है । गरीब देश भारत का क्रिकेट बोर्ड तो दुनिया का सर्वाधिक धनी बोर्ड बन चुका है । क्रिकेट कार्पोरेट व्यवसाय का रूप धारण कर चुका है, जो हर उस व्यक्ति का व्यावसायिक हित साधता है जो उससे जुड़ा है, दर्शक को छोड़कर । खिलाड़ी खेल से नहीं विज्ञापनों से अब मालामाल हो रहे हैं, क्योंकि टेलीविजन घर-घर पहुंच चुका है । खिलाड़ी और टीमें बिकने लगी हैं, सट्टेबाजी और मैच-फिक्सिंग इस ‘बिजनेस’ का हिस्सा बन चुके हैं । खेल खेल नहीं रह गया है । इस धंधे के केंद्र में है दर्शक । वह नहीं न रहे तो पूरा धंधा चौपट । इसलिए उसकी भावनात्मक कमजोरी का भरपूर लाभ उठाकर उसे क्रिकेट का अंधभक्त बनाए रखना आवश्यक है, ताकि वह क्रिकेट के सामने सब कुछ भूल जाए । क्रिकेट एक तरफ और सारी दुनिया दूसरी तरफ । मैं महसूस करता हूं कि दर्शकों का ‘ब्रेन-वाश’ करने की तमाम कोशिशें इस समय चल रही हैं, परोक्ष तौर पर, कुछ ऐसे कि उन्हें पता न चले, जैसे ठगी का धंधा चलता है ।

हर कोई इस समय क्रिकेट के प्रति समर्पित है, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से लेकर आम शहरी तक । ऐसा लगता है कि हमारी विदेश नीति भी क्रिकेट तय करेगी । पिछले कुछ दिनों से मैं टेलीविजन पर समाचारों के लिए तरस गया हूं । हर न्यूज चैनल पर क्रिकेट ! यूं टीवी चैनल जितना समय अकेले क्रिकेट को देते हैं उतना अल्पांश भी किसी और मुद्दे को नहीं । अखबारों के भी दो-तीन पृष्ठ क्रिकेट को ही समर्पित रहते हैं । ‘गेम्ज एंड स्पोर्ट‌स’ के नाम पर भी केवल क्रिकेट । इधर क्रिकेट, उधर क्रिकेट, सर्वत्र क्रिकेट । और बीते दिनों तो प्रथम पृष्ठ भी क्रिकेट की बातों से रंगा देखा है । क्या क्रिकेट को छोड़कर कुछ भी अब हमारे लिए अहम नहीं रह गया है ?

आप कहेंगे कि भारतीयों का क्रिकेट के प्रति लगाव ही बहुत अधिक है तो हम उसकी बात क्यों नहीं करेंगे । वे चाहते ही क्रिकेट चर्चा या समाचार । लेकिन आप विचार करें कि यह तथाकथित लगाव पैदा किया किसने ? दरअसल सवाल पहले अंडा कि मुर्गी का है । आप बचपन से ही किसी को शराब पिलाए, सिगरेट पिलाएं, नशे की दवाएं खिलाएं और फिर बाद में कहें कि वह तो इनका आदी है । क्या आपने कभी किसी और खेल की बातें उसी प्रकार से की हैं जैसे क्रिकेट की करते हैं । देश के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक जिस उत्साह से और सम्मान भाव से क्रिकेट खिलाड़ियों से मिलते हैं उतना अपने राष्ट्रीय खेल हाकी खिलाड़ियों से भी नहीं मिलते । जैसे कल के फाइनल मैच में राजनीति और अन्य क्षेत्रों की ‘टाप सेलेब्रिटीज’ स्टेडियम में मौजूद थे, उनकी वैसी दिलचस्पी अन्यत्र देखने को मिल सकती है क्या ? आप क्रिकेट को परोसते हुए उसका नशा लोगों में पैदा करते चलें और फिर कहें कि हम क्या करें । क्रिकेट का व्यवसाय में पैसा ही पैसा है, और ऐसे बहाने उसे आगे बढ़ाने में मददगार होते हैं । मीडिया तक उसमें शामिल है । सच यही है, और आप इसे हरगिज नहीं मानेंगे ।

क्या वजह है कि आप क्रिकेट संबंधी प्रसारण को सनसनीखेज बना के प्रस्तुत करते हैं ? क्यों सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते हैं ? अपने-अपने क्षेत्रों में महारत हासिल करने वाले कई लोग आज तक पैदा हो चुके हैं । उनके लिए भी कभी ऐसे शब्द इस्तेमाल किया है क्या ? क्रिकेट के फाइनल को महायुद्ध क्यों कहते हैं ? यह युद्ध नहीं एक खेल है, रोमांचक । दुनिया फतह कर ली जैसे उद्गार क्यों मुख से निकलते हैं ? विश्व कप जीतते हैं, कोई फतह नहीं करते, किसी भी क्षेत्र में नहीं । फिर ऐसे शब्द किसको आकर्षित करने के लिए कहते हैं ? और क्रिकेट का विश्व कप तो नाम भर को वैश्विक है, अंग्रेजों के गुलाम रह चुके देशों तक सीमित । किसी और देश को यह जानने की भी फुरसत नहीं होगी कि कौन जीता कौन हारा । देश की प्रतिष्ठा की झूठी बात करते हैं । ओलल्पिक में हमारे हालात पतले रहते हैं, तब प्रतिष्ठा की बात क्यों भूल जाते है । केवल क्रिकेट ही प्रतिष्ठा का द्योतक क्यों है ? क्योंकि इससे पैसा जुड़ा है ! प्रतिष्ठा के लिए अन्य क्षेत्र कहीं अधिक अहम हैं ।

पिछले कुछ दिनों से मैं पुणे प्रवास पर हूं, एक बहु-आवासीय संकुल में अपने मेजमान के साथ । क्रिकेट कप के बीते सेमीफाइनल-फाइनल की जीतों पर रात्रि 11-12 बजे जो शोर-शराबे और आतिशबाजी का दौर चला वह मेरे लिए असह्य था । आसपास बूढ़ों, छोटे बच्चों, मरीजों पर क्या बीत सकती है इसकी किसी को भी चिंता नहीं । दीवाली पर्व पर अपीलें होती हैं कि पटाखे न छोड़े, वायु-ध्वनि प्रदूषण से बचें, आदि । कई शहरों में रात्रि 10 बजे के बाद शोर-शराबे की खास मनाही है । किंतु क्रिकेट के नाम पर सब माफ है । वाह रे स्वतंत्रता की ‘इंडियन’ परिभाषा ! जश्न के नाम पर जिसकी जो मर्जी वह करे ।

क्रिकेट के नाम पर टोटके भी

और जिस बात को लेकर मेरी हंसी रुक नहीं पाती है वह है कि लोगबाग क्रिकेट कप जीतने के लिए हर टोटका अपनाने को तैयार थे । यज्ञ-यागादि, भजन-कीर्तन, पूजापाठ, गंगास्नान और न जाने क्या-क्या का किया गया । क्रिकेट का विश्व कप क्या हो गया जीवन-मरण का खेल बन गया । यदि ये टोटके कारगर ही होते हों तो क्यों नहीं उन्हें देश की ज्वलंत समस्याओं को सुलझाने में किया जाता है ? क्यों नहीं क्रिकेट के लिए चिंतित ये लोग भुखमरी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, अपराध आदि से मुक्ति पाने के लिए इन टोटकों को अपनाते हैं ? ऐसी हरकतों को मैं पागलपन या अव्वल दर्जे की मूर्खता न कहूं तो क्या कहूं ? – योगेन्द्र जोशी

महात्मा गांधी की हत्या तो हर रोज हो रही है (पुण्यतिथि 30 जनवरी)

आज 30 जनवरी के दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है । 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में जन्मे और भारतीय जनसमुदाय में बापू के नाम से पुकारे जाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी की नृशंस हत्या इसी दिन देश के स्वातंत्र्य-प्राप्ति के चंद महीनों के भीतर १९४८ में हुयी थी । तब नाथूराम गोडसे ने भारत विभाजन के नाम पर उत्पन्न आक्रोश के वशीभूत होकर उन पर जानलेवा गोली चलाई थी । उसे अपने कृत्य पर मृत्युदंड के पूर्व कभी पछतावा हुआ भी कि नहीं यह पता नहीं । आक्रोश अभिव्यक्ति का उसका यह मार्ग कितना उचित था इस पर कुछ मतभेद अवश्य हो सकता है, किंतु इतना तो जरूर है उसने उनकी हत्या केवल एक बार की और शायद ऐसा कुछ और नहीं किया जिसे उनकी हत्या की बारंबार की हत्या की कोशिश कहा जा सके । तब महात्मा करीब 80 के हो चुके थे और मैं नहीं समझता कि उसके बाद वे सामाजिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में बहुत कुछ कर सके होते ।

स्वतंत्रता के आंरभिक कई वर्षों तक देश के हालात कमोबेश ठीक ही चल रहे थे और बापू कुछ साल और भी जीवित रह लिए होते तो कुछ खास फर्क न पड़ता । वे उस समय ऐसा कुछ भी न कर सके होते जो आज के राजनैतिक, आर्थिक और प्रशासनिक हालत को बिगड़ने से रोक पाता । मुझे नहीं लगता कि उनका तब दिवंगत हा जाना दःखद तो थी, लेकिन ऐसी घटना नहीं थी जिसके कारण आज के निराशाप्रद हालात पैदा हुए हों । मुझे तो अब देश के भीतर हर उनका रोज का मारा जाना अधिक विचलित करता है । जी हां, मेरी नजर में वे हर रोज मारे जा रहे हैं । उनके नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इस देश में अनेकों लोग उनकी शिक्षाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं, अपने कुकृत्यों से उनके देश को रसातल में धकेल रहे हैं ।

इस देश में क्या कुछ नहीं हो रहा है जो महात्मा गांधी के यशःशरीर पर आघात करने जैसा नहीं है? आज की राजनीति आपराधिक वृत्तियों वालों का अखाड़ा बनता जा रहा है । साफ-सुथरेपन का मुखौटा पहने हुए राजनेता अपराधियों के बल पर सत्ता हथियाने और उससे चिपके रहने के जुगाड़ में लगे हैं । वे हर प्रकार के समझौतों को स्वीकारने को तैयार हैं । अपने को साफ दिखाते हैं, लेकिन अपराधियों को संरक्षण देने का कुत्सित कार्य करते आ रहे हैं । यह ठीक है उनमें से बहुत से नेता स्वयं घूस नहीं लेते, देश का पैसा नहीं लूटते हैं, किसी की जमीन-जायदाद नहीं छीनते हैं, लेकिन ऐसा करने की छूट वे अपने सहयोगियों को तो देते ही हैं । ‘जो चाहो करो भैया, बस मेरी कुर्सी बचाये रखो’ का मूक वचन उनके चरित्र का हिस्सा बन चुका है । अनर्गल बातें करना, दूसरों पर सही-गलत आरोप लगाना, कुछ भी बोलकर उसे नकारने का थूककर चाटने जैसा कृत्य उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हो चुके हैं । क्या ये सब गांधी की वैचारिक हत्या करना नहीं है?

देश का प्रशासन संवेदनशून्य, अकर्मण्य, मुफ्तखोर और गैरजिम्मेदार बन चुका है । शर्मो-हया और आत्मग्लानि को जैसे देश-निकाला मिल गया है । वह तब तक सोता रहता है जब तक जनता धरना, चक्काजाम, आगजनी एवं हिंसक प्रदर्शन पर उतर नहीं उतर आती । पुलिस बल अपराधियों की नकेल कसने के बजाय निरपराध लोगों को जेल की सलाखों के पीछे करने से नहीं हिचकती है । एफआईआर दर्ज करने के लिए तक अदालत की शरण लेनी पड़ रही है । यह सब गांधी की हत्या से बदतर है !

और अदालतों का भी भरोसा है क्या? न्यायाधीशों पर भी गंभीर आरोप लगने लगे हैं । फिर भी जनता असहाय होकर उनको अपने पदों पर देख रही है । कोई कुछ नहीं कर पा रहा है । अवैधानिक या आपत्तिजनक कार्य कर चुकने पर भी किसी के चेहरे पर सिकन नहीं दिखती, तनाव का चिह्न नहीं उभरता, शर्म से गर्दन नहीं झुकती । क्या गांधी यही देखना चाहते थे? क्या उनके स्वप्नों की हत्या नहीं हो रही है?

गांधी का मत था कि हमारे समाज में सबसे निचले तबके के आदमी को सर्वाधिक महत्त्व मिलना चाहिए । वे इस पक्ष के थे कि संपन्न और अभिजात वर्ग को उनके लिए त्याग करना चाहिए । कृषि को प्राथमिकता मिलनी चाहिए । इस गरीब देश के तमाम लोगों के हित में श्रमसाध्य छोटे-मोटे उद्योगधंधों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । सभी को सादगी का मंत्र अपनाना चाहिए । लेकिन हो उल्टा रहा है । हाल की सरकारों का ध्यान कृषि से हटकर बड़े उद्योगों की ओर जा चुका है, ताकि संपन्न वर्ग अधिक संपन्न हो सके । आज हालात यह हैं कि दुनिया के सबसे अमीर लोगों में यहां के उद्योगपति हैं तो सबसे दरिद्र आदमी भी यहीं पर देखने को मिल रहे हैं । संपन्नता और विपन्नता की नित चौढ़ी हो रही खाई इसी देश की खासियत बन चुकी है । आज का आर्थिक मॉडल गांधी के विचारों के विपरीत है । किसानों की हालत बिगड़ती जा रही है और वे आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं । देश को ऐसी व्यवस्था की ओर धकेलना गांधी की हत्या करने के समान ही तो है

हत्या, बलात्कार, लूट, अपहरण और आर्थिक भ्रष्टाचार के रूप में गांधी की हत्या हर दिन हो रही है । देश के शासनकर्ता और प्रशासन-तंत्र मूक बने हुए हैं । हाल के समय में अपराधियों का मनोबल तेजी से बढ़ा है । उन्हें राजनेताओं और शीर्षस्थ प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण मिला रहता है इस बात में कोई शक नहीं है । हाल के वर्षों में असामाजिक तत्वों एवं माफियाओं के द्वारा पुणे में आरटीआई कार्यकर्ता सतीश सेट्टी, अहमदाबाद में अमित जेठवा, लखनऊ में इंडियन ऑयल के अधिकारी मंजुनाथ षण्मुगम, बिहार में एनएचएआई के इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे, और नासिक में अतिरिक्त डिपुटी कलेक्टर यशवंत सोनावणे आदि की हत्याओं को मैं इस देश में महात्मा गांधी की हर रोज हो रही हत्या के तौर पर देख रहा हूं । हर दिन उनकी पुण्यतिथि के योग्य नजर आता है ।

सभी क्षेत्रों में फैल रही भ्रष्टाचार की बेल के विरोध में आज दिल्ली के रामलीला मैदान में देश के लब्धप्रतिष्ठ जनों द्वारा विशाल रैली आयोजित होने वाली थी । इस क्षण तक तो तत्संबंधित कोई समाचार मैं नहीं सुन सका हूं । यदि वे लोग प्रयासरत हों तो मेरी शुभाशंसा है कि वे गांधी को वैचारिक तौर पर जीवित कर पायें । – योगेन्द्र जोशी

वर्ष 2011 की भविष्यवाणी – राशिनाम को लेकर की गयी बेतुकी कवायद

बात 2011 के वर्षफल की

ज्योतिष् एक विवादास्पद विषय माना जाता है । दुनिया में बहुत-से लोग ज्योतिषीय भविष्यवाणी में विश्वास करते हैं । अपने देश में आस्थावानों की संख्या अपेक्षया अधिक ही है । यहां तो बहुत से सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार करने की ही परंपरा रही है । ऐसे बहुत ही कम लोग मिलेंगे जो ज्योतिष् पर आधारित भविष्यवाणियों को सिरे से नकार दें । लोगों में व्याप्त विश्वास के कारण ही देश के समाचार माध्यमों पर ज्योतिष् संबंधी बातों की भरमार देखने को मिलती है । अब चंद घंटों के भीतर नये कलेंडर वर्ष का आगमन होने जा रहा है । यह उपयुक्त काल है जब टेलीविजन चैनल, पत्र-पत्रिकाएं एवं समाचारपत्र अपने पृष्ठों में नये वर्ष की संभावनाओं की भविष्यवाणियां भी शामिल करें – भविष्यवाणियां जो कहीं व्यक्तियों से संबंध रखती हैं तो कहीं व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय संदर्भ में कही जाती हैं । किसकी क्या सफलता/असफलता रहेगी, राजनैतिक गतिविधियां क्या रहेंगी, प्राकृतिक आपदाएं कितनी विकट होंगी, आदि की बातें । वह सब कितना सच सिद्ध होगा और कितना झूठ यह तो समय बीतने पर ही स्पष्ट हो पाएगा, किंतु कुछ बातें तो जाहिरा तौर पर ही बेतुकी नजर आती है । मैं भविष्यवाणियों के ऐसे ही एक वाकये की बात करने जा रहा हूं ।

मेरे हिंदी दैनिक समाचारपत्र के साथ एक साप्ताहिक परिशिष्ट भी नियमतः आया करता है । आज के अंक के साथ जो परिशिष्ट मिला है वह वर्ष 2011 के लिए ज्योतिषीय भविष्यवाणी को समर्पित है । इसमें बारहों राशियों से संबंधित लोगों के भविष्य की प्रमुख दशा-दिशा की बातें कही गयी हैं । प्रत्येक राशि के लोगों के बारे में अगले वर्ष की संभावनाओं की चर्चा के साथ ही देश केे स्तर पर ख्यात एक-एक हस्ती के बारे में भी दो-चार शब्द कहे गये हैं । जैसा सोचा जा सकता है हमारे देश में सर्वाधिक महत्त्व फिल्मी हस्तियों की दिया जाता है, और उसी के अनुरूप उक्त परिशिष्ट में 12 में से 10 फिल्मी दुनिया से ही चुनी गयी हैं, तकरीबन सभी तारिकाएं, जिनमें से एक मुस्लिम समुदाय की है । इनके अतिरिक्त मात्र एक महिला खेल-कूद की दुनिया से है – बैडमिंटन के क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय स्तर की मौजूदा नामी खिलाड़ी । और दूसरी अपने देश की शीर्षस्थ यानी नंबर एक दलित राजनेत्री (बोलचाल में राजनेता) ।

राशिनाम

जिन भविष्यवाणियों पर मैं टिप्पणी कर रहा हूं वह पूरी तरह राशिनामों पर आधारित है । मतलब यह है कि आपकी राशि क्या है यह आपके नाम के प्रथम अक्षर पर निर्भर करता है । जैसे चू, चे चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ में से किसी एक से आरंभ होने वाले नाम वाले व्यक्ति की राशि मेष होगी । क्या इसका मतलब यह है कि नाम से किसी की राशि निर्धारित होती है ? जी नहीं, नाम से राशि निर्धारित नहीं होती है, बल्कि राशि के अनुसार नाम चुना जाना चाहिए यह ज्योतिषीय परंपरा है । ज्योतिषियों का सुझाव रहता है कि व्यक्ति (तकनीकी भाषा में जातक) का नाम उसकी राशि को ध्यान में रखकर चुना जाना चाहिए, और यह राशि वस्तुतः चंद्र-राशि होती है । चंद्र-राशि वह राशि है जिसमें चंद्रमा उस काल में स्थित होता है जब ‘जातक’ जन्म लेता है । सुविधा एवं व्यक्ति की राशि का त्वरित ज्ञान हो सके इस प्रयोजन से ज्योतिषियों ने वर्णमाला के विभिन्न अक्षरों (समुचित स्वर-मात्रा के साथ) को इन राशियों से संबद्ध किया गया है । साफ जाहिर है कि जातक के जन्म का सही-सही समय का हिसाब रखा जाना चाहिए और राशि की गणना करते हुए जातक का नामकरण किया जाना चाहिए ।

परंतु नामकरण की यह व्यवस्था व्यापक नहीं है । मेरा अनुमान है कि यह परंपरा ब्राह्मणों तक सीमित है और वह भी शायद सर्वत्र नहीं । मेरी जानकारी के अनुसार पूर्वांचल में राशिनाम का उल्लेख केवल जन्मकुंडली में रहता है, और व्यक्ति को संबोधित करने के लिए कोई ‘अच्छा-सा’ वैकल्पिक नाम चुना जाता है । मैंनं इस आम धारणा के बारे में भी सुना है कि राशिनाम से किसी को संबोधित करने से उसकी उम्र घटती है । वस्तुतः बच्चों का नामकरण बिरले लोग ही राशि को ध्यान में रखकर करते हैं । भले ही राशिनाम क्या होना चाहिए यह लोग जानते हों, लेकिन वे अपनी पसंद से नाम ही चुनते हैं । इसलिए जब आप व्यक्तियों के नाम सुनकर ही राशि की बात करते हैं तो ज्योतिषीय विसंगति के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं । पहले यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि प्रश्नगत कोई नाम राशि पर आधारित है भी कि नहीं । उक्त मौलिक सिद्धांत पर ध्यान दिए बिना ही नाम के आधार पर भविष्यवाणी करना लोगों को मूर्ख बनाने से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है

मेरे विचार में शायद ही किसी फिल्मी हस्ती का नाम उसकी राशि से संबंधित हो । वे सब आवश्यकतानुसार आकर्षक नाम चुनने से नहीं हिचकते हैं । मैंने कहा कि ज्योतिषीय चर्चा में एक मुस्लिम महिला भी शामिल की गयी है । मुझे पूरा विश्वास है कि उसका नाम राशि पर विचार के साथ नहीं रखा गया होगा । मेरी जानकारी में मुस्लिम समाज में हिंदू ज्योतिष् की मान्यता नहीं है । यह भी मैंने कहा है कि एक दलित राजनेत्री के बारे में भी कुछ बातें कही गयी हैं । क्या जन्म के समय उस राजनेता के तब के ‘गरीब’ माता-पिता ने पंडितजी से सलाह करके उसका नाम रखा होगा ? दलित और वह भी गरीब, भला कौन पंडित मुंह लगाएगा ? उसके राशिनाम पर भी मुझे शंका है । असल बात तो यह है कि आजकल लोग शब्दकोश में खोज-खोज कर नितांत नये-नये लुभावन नाम अपने बच्चों के लिए चुनने लगे हैं । गौर करें तो कई बार अ से आरंभ होने वाले नामों की भरमार देखने को मिलती है । किसी-किसी दौर में तो कुछ नाम अत्यधिक लोकप्रिय हो जाते हैं और उस दौर के लोगों में वह नाम आम दिखाई देता है । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत कम ऐसे नाम सुनने में आयेंगे जो ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार हों ।

सौर मास आधारित राशि

ऐसी स्थिति में नाम पर आधारित भविष्यवाणी का अर्थ ही क्या रह जाता है ? चलते-चलते एक बात और । पाश्चात्य ज्योतिष् में सूर्य पर आधारित राशि का प्रचलन है । अर्थात् व्यक्ति के जन्म के समय सूर्य जिस राशि में हो वही व्यक्ति की राशि कहलाती है । पाश्चात्य ज्योतिष् में एक कलेंडर माह के 27-28 तारीख के आसपास सूर्य नयी राशि में प्रवेश करता है और तीसएक दिन उस राशि में रहता है । इस काल में जन्मे सभी लोग एक ही राशि में माने जाते हैं और उनके लिए कमोबेश एक ही वर्षफल मान्य रहता है । किंतु इसी बीच चंद्रमा बारहों राशियों का चक्रमण कर चुका होता है और भारतीय ज्योतिष् के अनुसार बारह प्रकार की भविष्यवाणियां उन लोगों के लिए क्रमशः बताई जाती हैं । है न विसंगति ? कौन-सी पद्धति वस्तुतः सही है । इतना ही नहीं भारतीय ज्योतिष् में सूर्य एक राशि से दूसरे में संक्रमण कलेंडर माह के करीब 14-15 तारीख के आसपास करता है, जैसे 14-15 जनवरी में वह मकर राशि में प्रवेश करता है (माघ मास) । तदनुसार दो महीनों की उक्त तारीखों के बीच जन्मे व्यक्तियों की ‘सौर-राशि’ एक रहती है, जो पाश्चात्य पद्धति से मेल नहीं खाती । फिर सही क्या है ?

मीडिया में वर्णित ज्योतिषीय बातें सार्थक होती हैं यह बात संदेहास्पद है, किंतु वे मनोरंजन का अच्छा मसाला जरूर बनाते हैं । लोग विश्वास न भी करें तो भी चाव से ऐसी बातें पढ़ते हैं, और एकबारगी उसे सच मानकर प्रमुदित भी हो लेते हैं, एक प्रकार की तसल्ली पा लेते हैं । परंतु गंभीरता से इन बातों को लेने का कोई तुक नहीं बनता । पाठकवृंद इस बात के लिए क्षमा करें कि मैं इन्हें ऊटपटांग बातें मानता हूं । – योगेन्द्र जोशी

नोबेल शांति पुरस्कार मानवाधिकार तथा लोकतंत्र समर्थक लिउ जियाओबो को और चीन की नाराजगी

वर्ष 2010 का नोबेल शांति पुरस्कार

इस वर्ष का ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ चीन के 54 वर्षीय लिउ जियाओबो (Liu Xiaobo)  को दिया गया है । विगत 8 अक्टूबर इस बात की घोषणा ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा नार्वे की राजधानी ओस्लो में की गयी । मैंने यह समाचार बीबीसी-हिंदी वेबसाइट पर पढ़ा । यों आज के प्रायः सभी समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक सूचना माध्यमों ने इसकी चर्चा प्रमुखता से की है ।

इस वर्ष के पुरस्कार का समाचार अधिक दिलचस्प एवं महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लियाओबो चीन के नागरिक हैं और पिछले कई वर्षों से वे चीन में मानवाधिकार के हनन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में प्रमुख रहे हैं । 1989 में बीजिंग के तियाननमेन चौक में संपन्न हुई विरोध रैली में उनकी विशेष भूमिका रही थी । पिछले ही वर्ष उन्होंने बहुदलीय शासन व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में चाटंर-8 नाम का दस्तावेज तैयार किया था, जिसे चीनी सरकार ने अपराध मानते हुए उन्हें 11 साल की कारावास की सजा दे रखी है ।

नाराजगी चीन की

इस पुरस्कार से चीन बेहद नाखुश है । उसने जियाओबो को गंभीर अपराधी कहते हुए नॉर्वे के राजदूत को बुलाया और तुरंत अपना विरोध दर्ज किया । चीन ने आगाह किया है कि नार्वे के साथ उसके संबंध इस पुरस्कर से बिगड़ सकते हैं । लेकिन नार्वे ने स्पष्ट किया है कि नोबेल समिति एक स्वतंत्र संस्था है, और वह उसके निर्णयों को प्रभावित नहीं कर सकता । कहा जाता है कि चीन ने उस समिति पर काफी दबाव डाला था कि जियाओबो को पुरस्कर न दिया जाये । दरअसल उसकी नजर में, और कदाचित वहां के राष्ट्रवादी जनता की नजर में, यह पुरस्कार चीन को नीचा दिखाने और उसे निर्दय देश के रूप में पेश करने का प्रयास है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस पुरस्कार से विश्व भर में जियाओबो के पक्ष में जनमत बनने लगा है । हांक-कांग में उनके पक्ष में आवाज उठने लगी है । अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी उनको रिहा किए जाने की बात कही है । राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून के अनुसार यह पुरस्कार विश्व भर में मानवाधिकार स्थापना और सांस्कृतिक परिष्करण की आवश्यकता को रेखांकित करता है । वस्तुतः विश्व भर के राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है । जियाओबो की पत्नी लिउ जिया पुरस्कार से अतीव संतुष्ट है और उसने उन सभी की प्रशंसा की है जो जियाओबो के पक्ष में बोलते रहे हैं । अब नई खबर है कि उसे सरकार बीजिंग छोड़कर छोटे शहर जिनझाओ (Jinzhou), जहां जियाओबो जेल में हैं, जाने को विवश कर रही है

लोकतंत्र मानवाधिकार की गारंटी नहीं

उक्त पुरस्कार दो खास बातों को ध्यान में रखते हुए दिया गया हैः पहला शासन के स्तर पर मानवाधिकार हनन का विरोध, और दूसरा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पक्ष में जनमत बनाना, ताकि चीन की एकदलीय व्यवस्था समाप्त हो । मैं व्यक्तिगत तौर पर मानवाधिकार के पक्ष में हूं और उन सभी को

मेरा समर्थन है जो इस दिशा में सक्रिय हैं । किंतु मैं इस बात पर जोर डालता हूं कि मानवाधिकार का बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था से कोई सीधा रिश्ता नहीं हैं । यह कोई गारंटी नहीं है कि ऐसी व्यवस्था मानवाधिकार के लिए समर्पित हो । यह भी जरूरी नहीं है कि राजशाही अथवा एकदलीय शासन-पद्धति में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो ही । वस्तुतः बहुदलीय लोकतंत्र सभी मौकों पर सफल रहेगा यह मानना गलत है । अपना देश भारत इस बात का उदाहरण पेश करता है कि लोकतंत्र यदि अयोग्य हाथों में चला जाए तो वह घातक सिद्ध हो सकता है । अपने देश में मानवाधिकार हनन आम बात है । लेकिन चूंकि उसके शिकार कमजोर और असहाय लोग होते हैं और उसमें बलशाली लोग कारण होते हैं, अतः वे बखूबी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं । हमारे जनप्रतिनिधि जिसको चाहें उसे परेशान कर सकते हैं, प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी किसी भी निरपराध को सलाखों के पीछे भेज सकते हैं, न्यायिक व्यवस्था कमजोरों को न्याय नहीं दिला सकती है, और सरकार अपने विरोधियों पर कभी भी डंडे बरसा सकती है, इत्यादि । ये सब मानवाधिकार के विरुद्ध होते हैं, किंतु जांच-पड़ताल का कार्य करने वाले लीपापोती करके ‘जो हुआ’ उसे ‘नहीं हुआ’ घोषित कर देते हैं ।हमें यह भी समझना चाहिए कि पिछले तीस वर्षों में चीन ने भिभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, और कभी भारत से पिछड़ा रहा वह देश अब कहीं आगे निकल चुका है, उसके पीछे उसका अनुशासित एकदलीय शासन है । यदि भारत की तरह का लोकतंत्र वहां भी स्थापित हो जाए तो उसकी भी हालत बदतर हो जाएगी । हमारे यहां के लोकतंत्र में स्वतंत्रता का अर्थ है अनुशासनहीनता, निरंकुशता, नियम-कानूनों के प्रति निरादर भाव, आदि-आदि । हमारे राजनीतिक दलों के कोई सिद्धांत नहीं हैं, केवल सत्ता हथियाना और उस पर टिके रहने के लिए हर सही-गलत समझौता स्वीकारना उनकी प्रकृति बन चुकी है । क्या लोकतंत्र की हिमायत करते समय ऐसी बातों पर ध्यान दिया जाता है ? मैं इस पक्ष का हूं कि लोकतंत्र का समर्थन आंख मूंदकर नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह देखना निहायत जरूरी है कि संबंधित जनता और राजनेता लोकतंत्र की भावना को सही अर्थों में स्वीकारते हैं और उसके प्रति समर्पित हैं कि नहीं ? वास्तव में बुद्धिजीवी उसकी हिमायत महज इसलिए करते हैं कि आजकल लोकतंत्र का पक्ष लेना एक फैशन बन चुका है । कैसा लोकतंत्र, किसके द्वारा प्रबंधित लोकतंत्र, इन बातों पर विचार किए बिना ही वे उसकी हिमायत करते हैं ।

मेरी मान्यता है कि भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल आदि इस क्षेत्र के देश लोकतंत्र के लिए ढले ही नहीं हैं । इन देशों में लोकतंत्र की सफलता संदिग्ध है/रहेगी ।

और अंत में

इस बार के ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की जानकारी लेते समय मुझे पता चला कि यह पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ऑस्लो में दिये जाते हैं, और पुरस्कार के चयन का कार्य ‘नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट’ (Norwegian Nobel Institute) में अवस्थित ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा किया जाता है । अन्य सभी पुरस्कार-प्राप्त-कर्ताओं का चयन और उन्हें प्रदान करने का कार्य स्वेडन की राजधानी स्टॉकहोम में ही ‘नोबेल पुरस्कार समिति’ द्वारा किया जाता है । आल्फ्रेड नोबेल, जिनके नाम पर यह पुरस्कार दिये जाते हैं वस्तुतः नॉर्वे के थे, किंतु उनका कार्यक्षेत्र प्रमुखतया स्वेडन ही रहा । अपनी वसीहत में लिख गये थे शांति पुरस्कार की चयन-प्रक्रिया आदि नॉर्वे में ही संपन्न होवे । नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट के निदेशक गायर लुंडस्टाड (Geir Lundestad) ने पुरस्कार के संदर्भ में बताया है कि इस बार पुरस्कार के लिए प्रस्तावित नामों की संख्या 237 थी, जो विगत सभी वर्षों की तुलना में सर्वाधिक है । इनमें 38 संस्थाओं के नाम भी शामिल थे । – योगेन्द्र जोशी